एक कलाकार का रूपांतरण

29 अगस्त, 2020

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतः करण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए" (वचन देह में प्रकट होता है)।

मई 2016 में, मैं कलीसिया के लिए एक फ़िल्म में अभिनय कर रही थी। मुझे इस बात को लेकर बड़ा गर्व था कि मुझे कलीसिया की फ़िल्मों में अभिनय करने का मौका मिला है, जिसके ज़रिए मैं परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर सकती हूँ और उसके कार्य की गवाही दे सकती हूँ। इन फ़िल्मों को देखकर परमेश्वर के लिए तरसने वाले लोग उसकी वाणी सुन सकते हैं और बचाये जा सकते हैं। जब मुझे एक छोटी फ़िल्म में मुख्य भूमिका मिली, जिसके लिए मैंने कोशिश की थी, तो मैं बहुत खुश और उत्साहित थी। ये मेरा पहला मुख्य किरदार था। मैं जानती थी अगर मैंने अच्छा अभिनय किया, तो कलीसिया में सभी मुझे इज़्ज़त से देखने लगेंगे। बेहतरीन अभिनय करने का संकल्प लेकर, मैं तुरंत काम पर लग गयी। जब मुझे किसी डायलॉग में कोई परेशानी होती, तो मैं उसे एक अनुभवी अभिनेता की मदद लेकर पढ़ती। जब मेरी चाल-ढाल ठीक न होती, तो मैं किसी को वैसा करके दिखाने को कहती, और फिर बार-बार अभ्यास करती। कभी-कभी तो मैं पूरी रात जागकर भी थकान महसूस न करती। मैंने इसके लिए बहुत मेहनत की, और फिर कुछ भाई-बहन मेरे पास आये, प्रीव्यू देखने के बाद उन्होंने मुझसे कहा, "उस छोटी फ़िल्म में तुमने काफ़ी अच्छा काम किया है।" उनके ऐसा कहने पर मानो मेरे अहंकार को बढ़ावा मिल गया। मुझे लगने लगा मैं मशहूर हो गयी हूँ, कोई बड़ी अभिनेत्री बन गयी हूँ। लेकिन मैं हैरान रह गई, जब निर्देशक ने मुझसे कहा इस फ़िल्म को कई कारणों से दोबारा शूट करना पड़ेगा। मैं जैसे औंधे मुँह गिर पड़ी। "दोबारा शूट करना पड़ेगा? अब मैं कलीसिया की दूसरी एक सुसमाचार फ़िल्म, फ़िल्म में एक्स्ट्रा कलाकार हूँ। अगर उस छोटी फ़िल्म की स्क्रिप्ट को संपादित किया गया और तय कार्यक्रम में बदलाव करना पड़ा, तो क्या मैं तब भी मुख्य किरदार ही निभाऊँगी?" लेकिन फिर मैंने सोचा चूँकि सभी ने मेरे अभिनय को इतना पसंद किया, इसलिए सिर्फ़ मैं ही उस किरदार में फ़िट बैठती हूँ। कुछ दिनों बाद मैंने सुना कि स्क्रिप्ट में बदलाव किया गया है, लेकिन किसी ने मुझे सेट पर नहीं बुलाया। मैं बहुत बेचैन हो गयी। हर सुबह उठते ही अपना फ़ोन देखती, कहीं मेरे लिए कोई संदेश तो नहीं आया, शायद किसी का मैसेज हो। लेकिन मुझे डर भी था कि कहीं अपना फ़ोन देखते ही मुझे ये पढ़ने को न मिले कि उन्होंने किसी और को ले लिया है। हर मैसेज के साथ मैं बेचैन हो जाती, डरती कि कहीं मेरा किरदार किसी और को न मिल गया हो। उन दिनों, मेरा दिल किसी भी काम में नहीं लग रहा था, यहाँ तक कि मैं अपनी मौजूदा फ़िल्म पर भी ध्यान नहीं दे पा रही थी। मुझसे और इंतज़ार नहीं हो रहा था, मुझे सुसमाचार फ़िल्म की भी कोई परवाह नहीं थी। मैंने उस छोटी फ़िल्म के क्रू मैनेजर से मिलकर कहा कि मैं ये किरदार निभा सकती हूँ। लेकिन कुछ दिनों बाद, उन्होंने मुझे एक संदेश भेजा कि वो बहन झाओ को मुख्य किरदार में ले रहे हैं, ताकि मैं जिस सुसमाचार फ़िल्म में हूँ उसमें कोई रुकावट न आये। मुझे ये सब बहुत गलत लगा। मैंने उस किरदार के लिए इतनी मेहनत की और उस फ़िल्म के लिये इतना वक्त बर्बाद किया। जब स्क्रिप्ट में संशोधन हो गया था और वो किरदार मेरा ही था, तो वो फिल्म मुझसे क्यों छीन ली गयी? मैं इसे स्वीकार नहीं कर पा रही थी। मैं काफ़ी देर तक बाथरूम में छुपकर रोती रही। फ़िर मेरे मन में एक ख़ौफ़नाक-सा खयाल आया : "अगर बहन झाओ यह किरदार न निभा पाये, तब शायद मुझे मौक़ा मिल जाए...।" मैं जानती थी ऐसा सोचना गलत है, लेकिन मैं लाचार थी। मुझे बहुत बुरा लग रहा था। उन्होंने निश्चित समय में फ़िल्म दोबारा शूट कर ली। सभी कह रहे थे कि नयी फ़िल्म ज़्यादा अच्छी है। अगुआ ने कहा कि नयी फ़िल्म ज़्यादा वास्तविक और परमेश्वर के मार्गदर्शन से भरी है, और कहा कि हम सभी को ये फिल्म देखनी चाहिए। मैंने खुद से शिकायत की, "उनकी फ़िल्म इतनी अच्छी बन गयी, लेकिन वहीं जब मैं इस फ़िल्म में थी तो इसमें बहुत सारी खराबियां थीं? उन्होंने ठीक से शेड्यूल क्यों नहीं बनाया, ताकि उसमें मेरा ही अभिनय रहता?" मुझे बहन झाओ से ईर्ष्या हो रही थी, और गुस्सा भी आ रहा था। मैं उनकी शक्ल तक नहीं देखना चाहती थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसने मुझसे मेरी शोहरत छीन ली हो। शोहरत पाने की चाह मेरे ऊपर इतनी हावी हो चुकी थी कि मेरा दम घुटने लगा था। मुझे हर तरफ अंधेरा नज़र आ रहा था। मैं हर दिन परमेश्वर से प्रार्थना करती, उसकी मदद की भीख मांगती ताकि मैं सारे दुख-दर्द और निराशा से मुक्ति पा सकूँ।

एक बार अपने धार्मिक कार्य में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, जिसने मेरे दिल को छू लिया और मैं दुखी हो गयी। परमेश्वर के वचन कहते हैं, "जैसे ही पद, प्रतिष्ठा या रुतबे की बात आती है, हर किसी का दिल प्रत्याशा में उछलने लगता है, तुममें से हर कोई हमेशा दूसरों से अलग दिखना, मशहूर होना, और अपनी पहचान बनाना चाहता है। हर कोई झुकने को अनिच्छुक रहता है, इसके बजाय हमेशा विरोध करना चाहता है— इसके बावजूद कि विरोध करना शर्मनाक है और परमेश्वर के घर में इसकी अनुमति नहीं है। हालांकि, वाद-विवाद के बिना, तुम अब भी संतुष्ट नहीं होते हो। जब तुम किसी को दूसरों से विशिष्ट देखते हो, तो तुम्हें ईर्ष्या और नफ़रत महसूस होती है, तुम्हें लगता है कि यह अनुचित है। 'मैं दूसरों से विशिष्ट क्यों नहीं हो सकता? हमेशा वही व्यक्ति दूसरों से अलग क्यों दिखता है, और मेरी बारी कभी क्यों नहीं आती है?' फिर तुम्हें कुछ नाराज़गी महसूस होती है। तुम इसे दबाने की कोशिश करते हो, लेकिन तुम ऐसा नहीं कर पाते, तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। और कुछ समय के लिए बेहतर महसूस करते हो, लेकिन जब एक बार फिर तुम्हारा सामना इसी तरह के मामले से होता है, तो तुम इससे जीत नहीं पाते हो। क्या यह एक अपरिपक्व कद नहीं दिखाता है? क्या किसी व्यक्ति का इस तरह की स्थिति में गिर जाना एक फंदा नहीं है? ये शैतान की भ्रष्ट प्रकृति के बंधन हैं जो इंसानों को बाँध देते हैं। ... अगर तुम इस तरह की स्थिति को बदलना चाहते हो, और इन चीज़ों से नियंत्रित नहीं होना चाहते हो, तो तुम्हें पहले इन चीज़ों को अलग करना होगा और इन्हें छोड़ना होगा। अन्यथा, तुम जितना अधिक संघर्ष करोगे, उतना ही अंधेरा तुम्हारे आस-पास छा जाएगा, तुम उतनी ही अधिक ईर्ष्या और नफ़रत महसूस करोगे, और कुछ पाने की तुम्हारी इच्छा अधिक मजबूत ही होगी। कुछ पाने की तुम्हारी इच्छा जितनी अधिक मजबूत होगी, तुम ऐसा कर पाने में उतने ही कम सक्षम होगे, जैसे-जैसे तुम कम चीज़ें प्राप्त करोगे, तुम्हारी नफ़रत बढ़ती जाएगी। जैसे-जैसे तुम्हारी नफ़रत बढ़ती है, तुम्हारे अंदर उतना ही अंधेरा छाने लगता है। तुम्हारे अंदर जितना अधिक अंधेरा छाता है, तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन उतने ही बुरे ढंग से करोगे; तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन जितने बुरे ढंग से करोगे, तुम उतने ही कम उपयोगी होगे। यह एक आपस में जुड़ा हुआ, कभी न ख़त्म होने वाला दुष्चक्र है। ऐसी अवस्था में तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन अच्छी तरह से नहीं कर सकते, इसलिए, धीरे-धीरे तुम्हें हटा दिया जाएगा" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचन बिल्कुल मेरे हालात को बयां कर रहे थे। जब से मैं कलीसिया की फ़िल्मों की कलाकार बनी थी, तब से मैं सिर्फ़ एक बड़ी स्टार बनने की कोशिश कर रही थी। उस छोटी फ़िल्म में मुख्य किरदार के मिलने के बाद, मैं बस मशहूर होना चाहती थी, इसलिए मैंने कभी कोई शिकायत नहीं की, चाहे काम कितना भी मुश्किल क्यों न हो। जब मुझे फ़िल्म को दोबारा शूट किए जाने के बारे में बताया गया, तो मैं डर गयी कि कहीं मुझे इससे निकाल न दिया जाये, मैं भय और चिंता में जी रही थी। काम में मेरा दिल नहीं लग रहा था। जब अभिनय करने का मौक़ा मेरे हाथ से निकल गया और शोहरत पाने का मेरा सपना टूट गया, तो मैं इसे स्वीकार न कर सकी, मैं परमेश्वर और उस आदमी को दोष देने लगी। किसी और को मेरा किरदार दिये जाने पर मुझे बहुत ईर्ष्या हो रही थी, मेरे मन में उसके लिए बहुत से बुरे खयाल आ रहे थे। मैं उम्मीद कर रही थी कि वो फ़िल्म में अभिनय न कर पाये, ताकि उसकी जगह मैं ले सकूँ। फ़िल्म के दोबारा शूट होने और अच्छी बनने से सब खुश थे, लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकी और सोच में डूब गयी, पहले से भी ज़्यादा ईर्ष्यालु कड़वी और गुस्सैल बन गयी। मैं अपना काम परमेश्वर की इच्छा पूरी करने या उसकी गवाही देने के लिए नहीं कर रही थी, बल्कि मशहूर और सबकी चहेती बनने के लिए कर रही थी। मैं तो फ़िल्म को रुकवाने तक को तैयार थी ताकि मुझे मुख्य किरदार मिल सके। मुझमें परमेश्वर के लिए कोई श्रद्धा नहीं थी। जब तक परमेश्वर के वचनों ने मुझे ये एहसास नहीं दिलाया कि मैं सिर्फ़ शोहरत और हैसियत पाने के लिए कितनी नीच बन गयी थी। मैंने अपनी इंसानियत खो दी थी और परमेश्वर इससे काफ़ी नाराज़ था। मैं जानती थी अगर मैंने परमेश्वर के सामने पश्चाताप नहीं किया, तो वो मुझे बाहर निकाल देगा।

फिर, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा : "मानवजाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं और अँधकार के संसार से वास्ता रखती हैं। वे परमेश्वर की इच्छा के लिए अस्तित्व में नहीं हैं, परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं हैं। इसलिए मनुष्य और परमेश्वर का उल्लेख एक साँस में नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर सर्वदा सर्वोच्च है और हमेशा आदरणीय है, जबकि मनुष्य सर्वदा तुच्छ और हमेशा निकम्मा है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर हमेशा मनुष्यों के लिए बलिदान करता रहता है और अपने आप को समर्पित करता है; जबकि, मनुष्य हमेशा लेता है और सिर्फ अपने आप के लिए ही परिश्रम करता है। परमेश्वर सदा मानवजाति के अस्तित्व के लिए परिश्रम करता रहता है, फिर भी मनुष्य ज्योति और धार्मिकता में कभी भी कोई योगदान नहीं देता है। भले ही मनुष्य कुछ समय के लिए परिश्रम करे, लेकिन वह इतना कमज़ोर होता है कि हल्के से झटके का भी सामना नहीं सकता है, क्योंकि मनुष्य का परिश्रम केवल अपने लिए होता है दूसरों के लिए नहीं। मनुष्य हमेशा स्वार्थी होता है, जबकि परमेश्वर सर्वदा स्वार्थविहीन होता है। परमेश्वर उन सब का स्रोत है जो धर्मी, अच्छा, और सुन्दर है, जबकि मनुष्य सब प्रकार की गन्दगी और बुराई का वाहक और प्रकट करने वाला है। परमेश्वर कभी भी अपनी धार्मिकता और सुन्दरता के सार-तत्व को नहीं बदलेगा, जबकि मनुष्य किसी भी समय, किसी भी परिस्थिति में, धार्मिकता से विश्वासघात कर सकता है और परमेश्वर से दूर जा सकता है" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ कर मैं काफ़ी परेशान हो गयी। मुझे पता चला कि मेरी प्रकृति कितनी ख़ुदगर्ज़ और बुरी थी। मेरे सभी खयाल सिर्फ़ मेरे लिए थे। मैं दिल से चाहती थी कि इनकी फ़िल्म की शूट खराब हो जाये, सिर्फ़ इसलिए कि मैं फ़िल्म में अभिनय नहीं कर रही थी। मैं उम्मीद कर रही थी कि ये फ़िल्म दिखाई ही न जाये। यहाँ तक कि जब एक अगुआ ने हमसे ये फ़िल्म देखकर कुछ सीख लेने को कहा, तब भी मैंने ये फिल्म नहीं देखी। जब कलीसिया कोई अच्छी फ़िल्म रिलीज़ करती है तब परमेश्वर बहुत खुश होता है, क्योंकि हर फ़िल्म में जिन सत्यों पर संगति की जाती है उनसे सत्य मार्ग की तलाश करने वालों को सच्चा मार्ग ढूँढ कर अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने में मदद मिल सकती है। वे अंधकार से घिरे लोगों के जीवन में प्रकाश भर सकते हैं। वे सत्य बहुत मददगार होते हैं। परमेश्वर को सभी तरह की सकारात्मक चीज़ों से खुशी मिलती है। परमेश्वर जिन चीज़ों से प्रेम करता है मैं उनसे प्रेम नहीं कर सकी। मुझे हर उस चीज़ से नफ़रत थी जिससे वो प्रेम करता है, हर उस चीज़ से प्रेम था जिससे वो नफ़रत करता है। क्या मैं परमेश्वर के विरुद्ध नहीं जा रही थी? क्या मुझे एक विश्वासी कहा जाएगा? मैं परमेश्वर के घर में छिपी हुई शैतान थी। एक अविश्वासी। मुझे खुद से नफ़रत हो गयी कि मैं इतनी बुरी हूँ, फिर मैंने ये प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, मैं गलत थी। मैं तुम्हारे काम में रुकावट पैदा करना चाहती थी, ताकि मैं मशहूर हो सकूँ। मैं बहुत विद्रोही हूँ। मैं पश्चाताप करना चाहती हूँ ताकि शोहरत पाने और खुद को लोगों की नज़र में आने की कोशिश करने से रोक सकूँ। मैं खुद को तुम्हारी योजना के प्रति समर्पित कर अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहती हूँ।" फिर मैंने परमेश्वर के कुछ वचनों को पढ़ा जो मेरे हालात को बयां कर रहे थे, तब मैं समझ पायी कि हमारा कर्तव्य हमारी ज़िम्मेदारी है। ये हमारे लिए दिखावा करने या अपने अहम को बढ़ाने का मौक़ा नहीं है। बल्कि यह हमें विनम्र बनने और परमेश्वर के लिए कड़ी मेहनत करने की याद दिलाता है। कलीसिया चाहे मुझे मुख्य किरदार के तौर पर रखे या एक्स्ट्रा कलाकार के तौर पर, मुझे हर हालत में इस पर पूरा ध्यान देना होगा, ताकि मैं परमेश्वर के, अंत के दिनों के कार्य के संदेश का प्रचार करने में मदद कर सकूँ। इनका एहसास होते ही मैं आज़ाद महसूस करने लगी। मैंने कलीसिया की कुछ और फ़िल्मों के मुख्य किरदारों के लिए ऑडिशन दिये, मगर एक भी किरदार न पा सकी, लेकिन मैंने इन सबको अच्छी भावना से लिया, मैंने अपने किरदार अच्छे से निभाये।

कुछ ही समय बाद, मुझे कलीसिया की फ़िल्म में एक और मुख्य किरदार के तौर पर चुना गया। मैं बहुत खुश थी, लेकिन मैंने खुद से वादा किया, मैं शोहरत के पीछे नहीं भागूँगी, और परमेश्वर के लिए पूरे मन से अपना किरदार निभाऊँगी। जैसे ही मुझे स्क्रिप्ट मिली, मैं किरदार को जानने और अपनी पंक्तियाँ याद करने के काम में लग गयी। फिर भाई-बहनों ने मुझे कुछ पोशाकें पहनकर दिखाने को कहा। सभी को अपने आस-पास जमा देखकर, मैं खुद को ऊँचे दर्जे पर देखने लगी। मैंने सोचा "मुख्य किरदार होना वाकई ख़ास है। अगर मैंने इस फ़िल्म में अपना किरदार अच्छे से निभाया, तो ज़्यादा से ज़्यादा लोग मुझे पहचानेंगे और मेरी प्रशंसा करेंगे।" लेकिन ऐसा सोचते ही मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी शोहरत की कामना करते हुए खयाली पुलाव बनाने लगी थी, इसलिए मैंने अपने स्वार्थी ख़यालों को माफ़ करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की। लेकिन क्योंकि मैंने समस्या की जड़ को नहीं समझा था, इसलिए मैं खुद को एक स्टार बनने के बारे में सोचने से रोक नहीं पा रही थी। साथ ही, मैं बहुत परेशान भी थी। मैंने पहले कभी मुख्य किरदार नहीं निभाया था, इसलिए मेरा अभिनय कुछ ख़ास नहीं था। अगर मुझे खराब अभिनेत्री होने के कारण निकाल दिया गया, तो खेल खत्म। फिर कोई मुझे फ़िल्म में अभिनय नहीं करने देगा। मुझे बुनियादी गुणों को सीखने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी ताकि मैं फ़िल्म में अच्छा अभिनय कर सकूँ। मैं ये मौक़ा नहीं खो सकती थी। मैं ऑनलाइन जाकर अभिनय वाले वीडियो और कोर्स देखने लगी ताकि मैं उनसे सीख सकूँ, मैं कड़ी मेहनत करने लगी ताकि बेहतर अभिनेत्री और एक उम्दा मुख्य किरदार बन सकूँ। मैंने बहुत मेहनत की और अपना पूरा जोर लगा दिया, लेकिन जब हमने कुछ दृश्य फिल्माए, तब मुझे पता चला कि मेरा अभिनय मेरे असल किरदार से काफ़ी अलग था। मेरा अभिनय सहज नहीं था। निर्देशक ने कहा कि मेरी आँखें बेजान हैं और मेरे हाव-भाव दृश्यों से मेल नहीं खा रहे। ये सब सुनकर मैं बहुत परेशान हो गयी। मुझे लगा अभी तो मुझे बहुत काम करना है, और अगर मैंने जल्दी सुधार नहीं किया, तो मुझे निकाल दिया जाएगा। मैं और ज़्यादा मेहनत करने लगी, लेकिन मैं जितनी कोशिश करती, परेशानियाँ उतनी ही बढ़ती जातीं। मैं हर सीन बहुत धीरे-धीरे कर रही थी। जब मैंने देखा कि सब मुझे ही घूर रहे हैं और डायरेक्टर भी मायूसी से आहें भर रहा है, तो लगा जैसे मेरे कंधों पर कोई बोझ रख दिया गया हो, मेरा दम घुटने लगा। एक दिन डायरेक्टर ने मुझसे कहा, "देखो, बहन लियू, इस किरदार के लिए बिल्कुल सही है।" उसे देखो और कॉपी करने की कोशिश करो। मैंने सोचा, "सब ख़तम हो गया। मुझे यकीन है कि मेरे डायरेक्टर उसे इस किरदार के लिए बेहतर मानता है। अगर मैंने खुद को बेहतर साबित नहीं किया, तो वो मेरी जगह उसे ले लेगा। मैं ये मौक़ा नहीं गँवा सकती। अगर मैं इस बार नाकाम रही, तो कलीसिया में सबको पता लग जायेगा कि मैं एक अच्छी कलाकार नहीं हूँ, फिर मुझे और मुख्य किरदार कैसे मिलेंगे? मैं हमेशा के लिए एक एक्स्ट्रा कलाकार बनकर रह जाऊँगी और कभी स्टार नहीं बन पाऊँगी।" मुझे लगने लगा कि मैं सब कुछ खोने वाली हूँ, और मुझे अब निर्देशक के सामने दिखावा करना ही होगा। मैंने लंच ब्रेक लेने के बजाय, अभिनय की किताबें पढ़ने लगी, डारेक्टर की नज़रों के आस-पास बैठ कर स्क्रिप्ट पढ़ती रही। जब उसकी नज़र मुझ पर नहीं होती, तब मैं उसे घूरती और उसके खुश दिखते ही मैं निश्चिंत हो जाती। उसके मन को न पढ़ पाने पर मैं सोचने लगती कि क्या वो मुझे निकाल देगा। मैंने ये तक नहीं सोचा कि मैं उससे कहूँ कि मैं इस किरदार की भावनाओं से जुड़ नहीं पा रही हूँ, मुझे डर था कि सच्चाई जान लेने पर वो मुझे निकाल न दे। मैं तेज़ी से परमेश्वर से दूर होती जा रही थी। मैं अंधकार में गिरने लगी थी। मैं मन मसोसकर इसी तरह आगे बढ़ती रही।

एक बार, रेलवे स्टेशन पर एक सीन शूट करने के लिए निकलने से पहले, डायरेक्टर ने बार-बार मुझे दृश्य समझाया, और फिर अभिनय करने को कहा। मैं दृश्य तो समझ गयी थी, लेकिन किरदार की भावनाओं से खुद को जोड़ नहीं पा रही थी। कहीं डायरेक्टर को ये न लगे कि मैं समझी नहीं, मैं उसकी बात को समझने का दिखावा करने लगी। जब हमने सीन शूट करना शुरू किया तो मेरे चेहरे सही भाव नहीं आ रहे थे। ढाई घंटे की शूटिंग के बाद भी हमारे हाथ कुछ नहीं लगा। एक बार और जब हम पार्क में शूटकर रहे थे। मैंने सोचा, "मुझे फ़ौरन सीन को समझना होगा," लेकिन मैं जितना बेहतर करने की कोशिश करती, उतनी ही ज़्यादा घबरा जाती। मैं दृश्य को समझ नहीं पा रही थी। दोपहर से शाम तक लगातार शूटिंग के बावजूद, कोई अच्छा दृश्य हाथ नहीं लगा। हर कोई निराश और थक कर चूर हो गया था। मेरी हालत खराब देखकर, निर्देशक ने मेरी मदद करने की कोशिश की, लेकिन इस डर से कि कहीं सच बताने पर वो मुझे इस किरदार से निकाल न दे , मैंने पीछा छुड़ाने के ढेरों बहाने ढूँढ लिए। उन दिनों, मैं जब भी यह सोचती कि मैंने शूटिंग में कितनी बाधा खड़ी कर दी, मुझे बुरा लगता और मैं खुद को दोषी मानती। मैं बार-बार खुद से कहती कि मुझे शोहरत और रुतबे के बारे में सोचने के बजाय, अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन ऐसा कर नहीं पा रही थी। मुझ पर फ़िल्म के किरदार को अच्छे से निभाने का जूनून सवार था ताकि मैं फिल्म में बनी रहूँ। यहाँ तक कि मुझे सपने भी फ़िल्म के ही आते थे। मैं हमेशा बेचैन रहती थी, नींद आनी बंद हो गयी थी। सभी मुझसे पूछते, "क्या हुआ तुम्हें? हमेशा दुखी लगती हो।" मुझे लगता था अगर सच बता दिया तो मैं उनकी नज़र में गिर जाऊँगी, इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा।

मैं शोहरत और रुतबा पाने के जुनून में फंस गयी थी। हर वक्त यही सोचती रहती थी। मैं परमेश्वर से यही प्रार्थना करती थी मैं जल्द से जल्द इन सबसे उबर जाऊँ। इन चीज़ों से पीछा छुड़ाने के लिए कहती। कलीसिया की सभाओं में, सभी अपने बेहतरीन अनुभवों के बारे में चर्चा करते, और मैं बिना कुछ कहे चुपचाप वहाँ बैठी रहती थी। एक बार एक बहन ने मुझसे पूछ लिया, "क्या आप अपने अनुभवों के बारे में बताएंगी? आपको अपनी फ़िल्मों से ज़रूर कुछ अनुभव मिले होंगे?" मैं घबरा गयी। मेरे पास शब्द नहीं थे। तब मुझे अपने बीते हालात पर विचार करना पड़ा। क्या मैंने उस दौरान कलीसिया की फ़िल्मों में अभिनय करने से कुछ सीखा है? मुझे ऐसा क्यों लग रहा था जैसे मेरे पास कुछ भी नहीं है। मेरा ध्यान सिर्फ़ नाम और रुतबा पाने पर था, मैंने परमेश्वर के कार्यों का अनुभव करने के सभी मौके गँवा दिये। मैं इन सब चीज़ों को लेकर इतनी सुस्त क्यों रही? तब जाकर, सत्य की खोज न करने के कारण मैं खुद से नफ़रत करने लगी। मैं प्रार्थना और पश्चाताप करने के लिये परमेश्वर के पास आयी।

फिर मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े जो शोहरत और रुतबा पाने की मेरी इच्छा को गहराई से बयां करते हैं, मैंने इन पर विचार किया। मैंने परमेश्वर के वचनों में पढ़ा : "शैतान मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का तब तक उपयोग करता है जब तक लोग केवल और केवल प्रसिद्धि एवं लाभ के बारे में सोचने नहीं लगते। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाइयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते वे किसी भी प्रकार की धारणा बना लेंगे या निर्णय ले लेंगे। इस तरह से, शैतान लोगों को अदृश्य बेड़ियों से बाँध देता है और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ्‍य होती है न ही साहस होता है। वे अनजाने में इन बेड़ियों को ढोते हैं और बड़ी कठिनाई से पाँव घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते, मनुष्यजाति परमेश्वर को दूर कर देती है और उसके साथ विश्वासघात करती है, तथा निरंतर और दुष्ट बनती जाती है। इसलिए, इस प्रकार से एक के बाद दूसरी पीढ़ी शैतान के प्रसिद्धि एवं लाभ के बीच नष्ट हो जाती है" (वचन देह में प्रकट होता है)। मैंने जब इन सारी बातों पर विचार किया तो समझ में आया कि शैतान मुझे काबू करने के लिए शोहरत और हैसियत का इस्तेमाल कर रहा है। मैं बचपन से ही शैतान के प्रभाव में थी। "दूसरों से ऊँचा मुकाम हासिल करो," "इंसान को एक मज़बूत पहचान छोड़नी चाहिए," और "जैसे एक पेड़ अपनी छाल के लिए जीता है, वैसे ही इंसान अपनी पहचान के लिए जीता है।" शैतान के ज़हरीले फलसफे मेरे हर विचार और काम को काबू में करते थे, इसलिए मैं हमेशा शोहरत और रुतबे के पीछे भागती रही। मुझे लगता था कि जीने के मायने तभी हैं जब हर कोई मुझे पहचाने। जो लोग स्टार बने, जिन्हें बहुत सारे लोगों की सराहना मिली, सिर्फ़ वही एक सार्थक जीवन जी पाये। जब मुझे परमेश्वर के घर की फ़िल्मों में किरदार मिलने लगा, तो मैं स्टार बनने, मशहूर होने और एक दिन सबकी सराहना पाने के सपने देखने लगी। जब भी मुझे कोई मौक़ा मिलता, मैं कैमरे में अपना चेहरा दिखाने की कोशिश करती, और मुझे ज़रा भी थकान नहीं होती थी। दोबारा मुख्य किरदार निभाने का मौक़ा पाकर, नाम कमाने की मेरी इच्छा फिर से जाग उठी। ये मौक़ा गँवाने के डर से, जो बातें मुझे समझ नहीं आती थीं, मैं उनके बारे में पूछती नहीं थी और मुश्किल में पड़ने पर भी किसी से मदद नहीं लेती थी। मैंने एक मुखौटा पहन लिया था, मेरा ध्यान हमेशा इधर-उधर रहता कि कहीं कोई मुझे देख तो नहीं रहा, मुझे डर था अगर दूसरों को मेरी कमजोरी का पता लग गया तो मेरा किरदार मुझसे छीन लिया जाएगा। मैंने फ़िल्म की प्रगति को रोके रखना ही ठीक समझा, अपनी इच्छाओं का त्याग नहीं किया, दूसरों से बात नहीं की, न ही सत्य की खोज की। शोहरत और रुतबे के पीछे भागते वक्त मुझे परमेश्वर के कार्य की कोई परवाह नहीं थी। मैंने उसके प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझी। मैं बहुत स्वार्थी और बुरी थी। मैं परमेश्वर के प्रति अपना कर्तव्य नहीं निभा रही थी। मैं सिर्फ़ बुरे काम कर रही थी! शोहरत और रुतबा पाने के लिए जी-जान लगाकर, आख़िर मैंने क्या हासिल किया? मैं पहले से ज्यादा स्वार्थी, जिद्दी, और क्रूर बन गयी, मैंने अपना आत्मसम्मान खो दिया। मुझे एहसास हुआ कि शोहरत सिर्फ़ शैतान का बिछाया हुआ एक जाल है, जिसमें मैं उलझ गयी थी। जब मुझे प्रशंसा या सराहना नहीं मिली, तो मैंने इसे पाने की पूरी कोशिश की, और जब ये मेरे हाथ लगी, तो इसे बनाये रखने के लिए मैंने हर संभव कोशिश की। शोहरत और रुतबा पाने के लिए, मैं बहुत तर्कहीन बन गयी थी, मैंने अपनी ईमानदारी और सारी बुनियादी नैतिकता खो दी थी। मैं बार-बार परमेश्वर का विरोध करती, मेरे दिल में सिर्फ पीड़ा थी। मुझे एहसास हुआ कि शैतान लोगों को भ्रष्ट करने और धोखा देने के लिये शोहरत का इस्तेमाल करता है, यहां तक कि उन्हें निगल लेता है। इन चीज़ों की कामना हमें सिर्फ़ लालची और भ्रष्ट बनाकर, परमेश्वर से दूर कर सकती है। अगर मैं इसी मार्ग पर चलती रही, तो मेरे जीवन में सिर्फ़ पीड़ा ही बचेगी, और अंत में परमेश्वर के ख़िलाफ़ जाने के कारण मैं बर्बाद हो जाऊँगी। इसका एहसास होने पर, मैंने प्रार्थना में परमेश्वर के सामने घुटने टेक दिये। "हे परमेश्वर, मैं अब अपनी असलियत नहीं छिपाना चाहती। भले ही मेरे भाई-बहन मेरे झूठ और लालच का सच जान लें, मुझे मुख्य किरदार से निकाल ही क्यों न दें, मुझे उन्हें सच बताकर तुम्हारे सामने पश्चाताप करना है।" अगली सभा में, मैंने सभी को खुलकर अपनी भ्रष्टताओं के बारे में बता दिया। आख़िर में मुझे बहुत सुकून मिला और मेरे कंधों से ये बोझ हट गया। किसी ने मेरी आलोचना नहीं की, बल्कि मेरे साथ परमेश्वर की इच्छा पर संगति की। यह देखकर मेरा दिल भर आया।

फिरर, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतः करण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों से, मैंने समझा कि मेरे लिए परमेश्वर की इच्छा एक ऐसी इंसान बनना है जो उसके मानकों पर खरी उतरे। इसके बजाय, मैं एक मशहूर कलाकार बनने की चाह में परमेश्वर का विरोध करती रही। मैं एक स्टार बनना चाहती थी, मुझे सिर्फ़ दूसरों से सराहना और सम्मान पाने की चाह थी। मेरी हालत उस शैतान के समान थी जो खुद को परमेश्वर से ऊपर मानने लगा था। मैं परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करने के कारण विनाश के रास्ते पर चल पड़ी थी। मैं महज़ शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट की गयी एक इंसान हूँ, जो दूसरों की प्रशंसा और सराहना पाने के काबिल नहीं है। मैं जानती थी मुझे एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना दायित्व निभाना चाहिए जिससे परमेश्वर प्रसन्न हो। मेरे अभिनय में निखार और सुधार की काफ़ी गुंजाइश थी। लेकिन मैंने खुद से वादा किया अब मैं शोहरत या रुतबे के पीछे नहीं भागूँगी। मैं खुद को सुधारने के लिए मेहनत करूँगी और अपने कर्तव्य से नहीं भटकूँगी। मैंने अपना सारा ध्यान अपने अभिनय पर लगाया और मशहूर होने की फ़िक्र छोड़ दी। मैं अपने किरदार को आसानी से समझ गयी, और फिर तुरंत ही मुझे सीन समझ आ गया। और दिनों के मुकाबले शूटिंग भी तेज़ी से हुई। अंत में अपना कर्तव्य निभाकर ही मुझे सुकून मिला। सभी मुझसे कहने लगे कि मेरी चाल-ढाल ही बदल गयी है। मेरा ध्यान नहीं भटका और मेरे अभिनय में भी काफ़ी सुधार आया। मैं बार-बार परमेश्वर का धन्यवाद करती रही।

इस पूरे अनुभव से सबसे महत्वपूर्ण बात जो मैंने सीखी वो ये थी कि परमेश्वर के घर के लिए किया जाने वाला कोई भी कार्य अपने फ़ायदे के लिए नहीं होना चाहिए। ये परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने और उसकी गवाही देने के लिए है। यह हर सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारी है। पहले मैं दूरदर्शी नहीं थी और सत्य की समझ नहीं रखती थी। मैं शोहरत और रुतबे जैसे सांसारिक सुख पाना चाहती थी, और जब मैंने अपनी इंसानियत न खो दी, तब तक शैतान मेरा उत्पीड़न करता रहा। मैंने कलीसिया के कार्य को भी नुकसान पहुंचाया। परमेश्वर के वचनों के न्याय ने मुझे गलत काम करने से रोक दिया, और एक बार फिर शैतान के चंगुल से बचाकर सही मार्ग पर ला खड़ा किया। अब मैं एक सृजित प्राणी के तौर पर अपनी सही जगह पर वापस आ चुकी हूँ, और अपना कर्तव्य अच्छे से निभा रही हूँ। अब मुझे लग रहा है कि मेरे जीवन में सुख-शांति है। ये परमेश्वर का उद्धार और प्रेम था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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