एक सच्ची भागीदारी

22 दिसम्बर, 2017

फैंग ली एन्यांग शहर, हेनान प्रान्त

हाल ही में मैंने सोचा था कि मैंने एक सामंजस्यपूर्ण भागीदारी में प्रवेश किया है। मैं और मेरा सहभागी किसी भी चीज़ पर चर्चा कर सकते थे, कभी-कभी मैंने उससे यहाँ तक कि मेरी कमियों की ओर इशारा करने के लिए भी कहा, और हमने कभी भी लड़ाई नहीं की, इसलिए मैंने सोचा कि हमने एक सामंजस्यपूर्ण भागीदारी को प्राप्त कर किया है। किन्तु जब तथ्य प्रकट हुए, तो एक सच्ची सामंजस्यपूर्ण भागीदारी ऐसी कुछ नहीं थी जिसकी मैंने कल्पना की थी।

एक दिन एक सभा में, मेरे सहभागी ने यह कहते हुए हमारे वरिष्ठों के सामने मेरी कुछ कमियों की ओर इशारा किया, कि मैं अहंकारी, सत्य को अस्वीकार करनेवाला, नियन्त्रण करनेवाला और दबंग हूँ...। उसे ऐसा कहते हुए सुनकर मैं अत्यंत क्रोधित हो गया, और मैंने सोचा कि: "कल मैंने तुमसे कहा था कि क्या मेरे बारे में तुम्हारी कोई राय है, तो तुमने कहा था कि नहीं, किन्तु अब, हमारे वरिष्ठों के सामने, तुम इतना कुछ कहते हो! यह बहुत झूठ है!" मैंने सोचा था कि मेरे और मेरे सहभागी में एक शांतिपूर्ण रिश्ता है, किन्तु उसके पास मेरे बारे में बहुत से मत थे, जो यह साबित करता था कि अभी भी हमारे बीच में गलतफहमियाँ थीं और कि हमारा रिश्ता शांतिपूर्ण बिल्कुल भी नहीं था। तथ्यों का सामना होने पर, मैं भागीदारी में अपने स्वयं के व्यवहार की छानबीन करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था: सभाओं में, यदयपि मेरा भाई भी संगति करता था, किन्तु वह कम बोलता था, क्योंकि मैं अधिकांश सभाओं के लिए बोलता था और उसे बोलने का नाममात्र के लिए ही अवसर देता था; जो भी समस्याएँ उभरकर आती थीं काम पर हम वास्तव में उस पर चर्चा करते थे, किन्तु जब हमारी राय अलग-अलग होती थी, तो मैं हमेशा अपने स्वयं के मत से चिपका रहता था और उसके मत को इनकार करता था, और मामलों का समाधान तब होता था जब मेरा भाई केवल बहस करना बन्द कर देता था; बाहर से हमारे बीच में कोई विवाद या झगड़ा नहीं था, किन्तु भीतर से हमेशा यह महसूस होता था कि हमारे बीच में एक अवरोध है, कोई चीज़ जो हमें पूरी तरह से स्पष्ट होने से रोकती है। यह तब हुआ जब मैंने महसूस किया कि जबकि हम दोनों साथ मिल कर कार्य करने वाले सहभागी प्रतीत होते थे, किन्तु मैं वास्तव में सभी आदेश दे रहा था, और उसे अपने कर्तव्यों को निभाने का सचमुच कभी कोई अवसर नहीं मिला। मैं सोचता था कि हमारा रिश्ता पारस्परिक रूप से अनुपूरक और समान सहभागियों का है, किन्तु यह वास्तव में अगुवे और अनुयायी का था। तथ्यों ने मेरे लिए प्रकट किया कि जिसे मैंने सामंजस्यपूर्ण भागीदारी के रूप में सोचा था वह केवल एक सतही अभ्यास का समुच्चय ही था। तो, वास्तव में सामंजस्यपूर्ण भागीदारी क्या है? मैंने परमेश्वर के वचनों में अपने प्रश्न के उत्तरों की खोज की, और मुझे संयोगवश ये वचन मिले, "तुम लोगों ने ढेर सारे उपदेश सुने होंगे, और सेवा करने के बारे में तुम सबको कुछ अनुभव होगा। अगर कलीसियाओं में काम करते समय तुम लोग एक दूसरे से नहीं सीखते, एक दूसरे की मदद नहीं करते या एक दूसरे की कमियों को दूर नहीं करते हो, तो तुम कैसे कोई सबक सीख पाओगे? जब भी किसी चीज़ से तुम्हारा सामना होता है, तुम लोगों को एक दूसरे से सहभागिता करनी चाहिये ताकि तुम्हारे जीवन को लाभ मिल सके। इसके अलावा, तुम लोगों को किसी भी चीज़ के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले, उसके बारे में ध्यान से सहभागिता करनी चाहिये। सिर्फ़ ऐसा करके ही तुम लापरवाही से काम करने के बजाय कलीसिया की जिम्मेदारी उठा सकते हो। सभी कलीसियाओं में जाने के बाद, तुम्हें एक साथ इकट्ठा होकर उन सभी मुद्दों और समस्याओं के बारे में सहभागिता करनी चाहिये जो अपने काम के दौरान तुम्हें पता चली हैं; फिर तुम्हें उस प्रबुद्धता और रोशनी के बारे में बात करनी चाहिये जो तुम्हें प्राप्त हुई हैं—यह सेवा का एक अनिवार्य अभ्यास है। परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन के लिए, कलीसिया के फ़ायदे के लिये और अपने भाई-बहनों को आगे बढ़ाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिये, तुम लोगों को सद्भावपूर्ण सहयोग करना होगा। तुम्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिये, एक दूसरे में सुधार करके कार्य का बेहतर परिणाम हासिल करना चाहिये, ताकि परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखा जा सके। सच्चे सहयोग का यही मतलब है और जो लोग ऐसा करेंगे सिर्फ़ वही सच्चा प्रवेश हासिल कर पाएंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो')। परमेश्वर के वचनों को सावधानीपूर्वक तौलने के बाद, मेरे हृदय ने अचानक ही समझ लिया। एक सच्ची भागीदारी का मतलब है कि सहभागी कलीसिया के कार्य को पहले स्थान पर रखते हैं; कलीसिया के हितों और भाइयों एवं बहनों के जीवन के लिए, वे एक दूसरे के साथ संगति कर सकते हैं और एक दूसरे की कमज़ोरियों के पूरक बन सकते हैं, ताकि उनके काम में बेहतर परिणामों को प्राप्त किया जा सके; वे एक दूसरे के प्रति कोई गलतफहमियों या पूर्वाग्रहों को नहीं रखते हैं और हैसियत में कोई अन्तर नहीं बनाए रखते हैं। उससे अपने स्वयं के व्यवहार की तुलना करके, मैंने अवर्णनीय रूप से लज्जा एवं खेद का एहसास किया। अपने व्यवहार की ओर वापस मुड़कर देखने पर, मैंने एहसास किया कि मैंने कभी भी कलीसिया के हित पर विचार नहीं किया था, मैंने हमेशा स्वयं को पहले रखा था, मैंने अपनी हैसियत का सहारा लेते हुए अगुवाई की और सतर्कता से अपनी स्वयं की प्रतिष्ठा और पद का ध्यान रखा, और मैं केवल इस बात से डरता था कि अन्य लोग मुझे छोटा समझेंगे या मुझे नीचा देखेंगे, और मेरे भाइयों एवं बहनों के साथ मेरी संगति अनुपूरक नहीं थी या समकक्षता के स्थान से संचालित नहीं थी, अतः इसने कभी भी परमेश्वर के वचन में सामान्य, पारस्परिक रूप से मददगार प्रवेश के उद्देश्य को प्राप्त नहीं किया। जबकि सतह पर मेरा सहभागी और मैं इस बात पर चर्चा करते हुए प्रतीत होते रहते थे कि हमें अपने काम को कैसे करना है, अपने हृदय में मैंने उसके विचारों को स्वीकार नहीं किया था, और अन्त में मैं इस बात पर विचार करने की अपेक्षा कि कलीसिया के कार्य के लिए क्या सर्वोत्तम होगा अपने स्वयं के विचारों के साथ जाता था; यद्यपि कभी-कभी मैं उसे मेरी कमज़ोरियों की ओर इशारा करने के लिए कहता था, फिर भी उन्हें स्वीकार करने के बजाए, मैंने हमेशा बहस की, उनके औचित्य दिए, और स्वयं के लिए वक़ालत की, जिसने उस पर दबाव डाला और खुलकर मुझ से बात करने से उसे अति भयभीत किया और फिर से मेरी कमियों की चर्चा करने के लिए अनिच्छुक किया, जो हमारे बीच गलतफहमियों का कारण बना और हमें एक इच्छा के साथ कलीसिया के काम को पूरा करने की योग्यता की हानि सहनी पड़ी। अपने भाइयों एवं बहनों के बीच मैंने, हमेशा यह मानते हुए, और भी अधिक अहंकार के साथ और श्रेष्ठ बन कर व्यवहार किया, कि मैं उनका अगुवा हूँ क्योंकि सत्य के बारे में मेरी अधिक महान समझ ने मुझे उनकी अगुवाई करने के योग्य बनाया है। उनके साथ, मैंने बिलकुल कोई विनम्रता या सच्ची खोज को नहीं दर्शाया, इसके बदले अपने आप को सत्य का स्वामी मानता रहा और यह जोर देता रहा कि हर कोई मुझे सुने। ... यह तब हुआ जब मैंने महसूस किया कि सेवा में मेरी भागीदीरी में भागीदारी का कोई सार नहीं था, या यहाँ तक कि और भी अधिक गंभीर शब्दावली में, मैं निरंकुशता एवं तानाशाही में संलग्न हो रहा था। एक अगुवे एवं सहभागी के रूप में व्यवहार करना इस बात की तुलना में अलग नहीं था कि किस प्रकार बड़ा लाल अजगर सत्ता पर अपनी पकड़ को बनाए रखता है! बड़ा लाल अजगर निरंकुशता को अभ्यास में लाता है, सभी चीज़ों में अंतिम अधिकार पर जोर देता है और जन-समूह की आवाज़ को सुनने से या अपने स्वयं के सिद्धान्तों से अलग राजनैतिक सिद्धान्तों के माध्यम से शासन करने से डरता है। और मैं, थोड़ी सी हैसियत के साथ जो आज मेरे पास है, उस सीमित क्षेत्र का प्रभारी होना चाहता हूँ जिसे मैं नियन्त्रित करता हूँ। यदि किसी दिन मैं सामर्थ्य को धारण करता हूँ, तो मैं उस बड़े लाल अजगर से किस प्रकार भिन्न होऊँगा? यह सब सोचते हुए, मैंने अचानक ही भय का एहसास किया। इस तरह से आगे बढ़ते रहना कहीं अधिक ख़तरनाक होगा, और यदि मैं नहीं बदला, तो मेरा अन्त भी उस बड़े लाल अजगर के समान ही होगा—परमेश्वर के द्वारा दण्डित होना।

इस सब का एहसास करने के बाद, मैंने अपने भाई के विरुद्ध अब और कोई दृष्टिकोण नहीं रखा। इसके बदले, ऐसी परिस्थितियों में मुझे स्वयं को जानने हेतु मेरी सहायता करने के लिए और मेरे स्वयं में ख़तरे को मुझे दिखाने के लिए मैं परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ था। उसके बाद, जब मुझे अपने भाइयों एवं बहनों के साथ सहभागी बनाया गया, तो मैंने अपने आपको विनीत करना, परमेश्वर की इच्छा की परवाह करने वाला हृदय रखना और अपने कार्य में ज़िम्मेदार होना, और अन्य लोगों की राय को और अधिक सुनना सीखा, और कुछ समय के पश्चात्, मैंने महसूस किया कि इस प्रकार के अभ्यास ने न केवल मुझे सत्य की और अधिक सम्पूर्ण एवं पूरी समझ दी, बल्कि इसने मुझे मेरे भाइयों और बहनों के और अधिक करीब ला दिया और हमें अधिक खुलकर साझा करने की अनुमति दी। और दर्शाने हेतु इस प्रकार के परिणामों के साथ, मैं अंततः समझा कि परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार सहभागी सेवा करना कितना अच्छा हो सकता है!

मैं परमेश्वर से इस प्रबुद्धता के लिए कृतज्ञ हूँ, जिसने न केवल एक सच्ची सामंजस्यपूर्ण भागीदारी को समझने में मेरी सहायता की, बल्कि इससे भी अधिक मेरे सहभागी के साथ मेरी स्वयं की सेवा में उजागर किये गए अहंकार के मेरे भ्रष्ट स्वभाव को मुझे दिखाने में सहायता की, और मुझे दिखाया कि जब भ्रष्ट मानवजाति सामर्थ्य प्राप्त करती है, तो परिणाम उस बड़े लाल अजगर के समान ही होता है। मैं आशा करता हूँ कि मैं उस बड़े लाल अजगर के ज़हर को निकाल सकता हूँ जो मुझ में है, सच्ची भागीदारी सेवा में प्रवेश कर सकता हूँ, और अन्ततः ऐसा व्यक्ति बन सकता हूँ जो परमेश्वर की सेवा करता है और जो परमेश्वर के हृदय के अनुरूप है।

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