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3. मेरे विचार से, प्रत्येक धर्म मानवजाति को नेक बनना ही सिखाता है। क्या इसका अर्थ यह है कि मानवजाति चाहे जिस किसी भी धर्म का अनुसरण करे, जब तक वह ईमानदार रहे और कोई बुरे काम न करे, उसे उद्धार प्राप्त होगा?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

जो संसार का निर्माण करने में अक्षम है वह उसका अंत करने में भी अक्षम होगा, जबकि जिसने संसार की रचना की है वह उसका अंत भी निश्चित रूप से करेगा, और इसलिए यदि कोई युग का अंत करने में असमर्थ है और केवल मानव की उसके मस्तिष्क को विकसित करने में सहायता करने के लिए है, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं होगा, और निश्चित रूप से मानवजाति का प्रभु नहीं होगा। वह इस तरह के महान कार्य को करने में असमर्थ होगा; केवल एक ही है जो इस प्रकार का कार्य कर सकता है, और वे सभी जो इस प्रकार के कार्य करने में असमर्थ हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर से इतर अन्य दुश्मन हैं। यदि वे पंथ हैं, तो वे परमेश्वर के साथ असंगत हैं, और यदि वे परमेश्वर के साथ असंगत हैं, तो वे परमेश्वर के शत्रु हैं। समस्त कार्य केवल इसी एक सच्चे परमेश्वर के द्वारा किया जाता है, और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड केवल इसी एक परमेश्वर के द्वारा आदेशित किया जाता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से

इस कार्य के अन्त में, सभी सम्प्रदाय एक हो जाएँगे, सभी प्राणी रचयिता के प्रभुत्व के अधीन वापस लौट जाएँगे, सभी प्राणी एक ही सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे, और सभी पंथ समाप्त हो जाएँगे और कभी प्रकट नहीं होंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से

यह एक सामान्य सत्य है कि "इस पृथ्वी पर कोई भी धर्मी नहीं है, जो धर्मी हैं वे इस संसार में नहीं हैं।" जब तुम लोग परमेश्वर के सम्मुख आते हो, तो विचार करो कि तुम लोगों ने क्या पहना हुआ है, अपने हर शब्द और क्रिया, अपने सभी विचारों और अवधारणाओं, और यहाँ तक कि उन सपनों पर भी विचार करो जिन्हें तुम लोग हर दिन देखते हो—वे सब तुम लोगों के अपने वास्ते हैं। क्या यह सही वस्तु-स्थिति नहीं है? "धार्मिकता" का तात्पर्य भिक्षा देना नहीं है, इसका अर्थ अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना नहीं है, और इसका अर्थ लड़ाई-झगड़ा करना, बहस करना, लूटना या चोरी करना नहीं है। धार्मिकता का अर्थ परमेश्वर के आदेश को अपने कर्तव्य के रूप में लेना और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का, समय और स्थान की परवाह किए बिना, स्वर्ग से भेजी गयी वृत्ति के रूप में पालन करना है, ठीक वैसे ही जैसे प्रभु यीशु द्वारा किया गया था। यही वह धार्मिकता है जो परमेश्वर द्वारा कही गई थी। लूत को इसलिए धर्मी पुरुष कहा जा सका था क्योंकि उसने अपने लिए क्या खोया अथवा पाया इसकी परवाह किए बिना परमेश्वर के द्वारा भेजे गए दो फ़रिश्तों को बचाया था; उसने उस समय जो किया उसे धर्मी कहा जा सकता है, परंतु उसे धर्मी पुरुष नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि लूत ने परमेश्वर को देखा था केवल इसलिए उसने उन फ़रिश्तों के बदले में अपनी दो बेटियाँ दे दी। किन्तु अतीत का उसका समस्त आचरण धार्मिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, और इस लिए मैं यह कहता हूँ कि "इस पृथ्वी पर कोई धर्मी नहीं है।" यहाँ तक कि जो लोग सही हालत में आने की धारा में हैं उनमें से भी किसी को धर्मी नहीं कहा जा सकता है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम्हारा चाल-चलन कितना अच्छा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम परमेश्वर के नाम की महिमा करते हुए कैसे दिखाई देते हो, दूसरों को मारते नहीं हो और श्राप नहीं देते हो, या उन्हें लूटते और उनसे चोरी नहीं करते हो, तब भी तुमको धर्मी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि ऐसी बातें किसी भी सामान्य व्यक्ति द्वारा धारण की जा सकती हैं। आज, मुख्य बात यह है कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते हो। केवल यह कहा जा सकता है कि आज तुममें थोड़ी सी सामान्य मानवीयता है, फिर भी तुम परमेश्वर के द्वारा कही गयी धार्मिकता से वंचित हो, और इस लिए जो कुछ भी करते हो वह परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान का साक्ष्य नहीं है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए" से

मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को जाँचता है उसका आधार चरित्र या व्यवहार है; वह जिसका आचरण अच्छा है, वह धार्मिक है, और जिसका आचरण घृणित है, वह दुष्ट है। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य को जाँचता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का मूलतत्व परमेश्वर की आज्ञा मानना है, वह जो परमेश्वर की आज्ञा मानता है, धार्मिक है, और जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है—भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा हो, भले ही इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत हो। कुछ लोग अच्छे कर्मों का भविष्य में एक अच्छी नियति प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहते हैं, और कुछ लोग अच्छी वाणी का एक अच्छी नियति खरीदने के लिए उपयोग करना चाहते हैं। लोग गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार या वाणी के अनुसार उसका परिणाम निर्धारित करता है, और इसलिए बहुत से लोग धोखे के माध्यम से अस्थायी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास करते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

अब बहुत से लोग ऐसे हैं जो मानवजाति के भविष्य की नियति को समझने में असमर्थ हैं, और वे उन वचनों पर भी विश्वास नहीं करते जो मैं कहता हूँ, वे सब जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य पर अमल नहीं करते हैं, वे सब दुष्टात्माएँ हैं! वे जो खोज करते हैं और वे जो खोज नहीं करते, वे अब दो भिन्न प्रकार के लोग हैं, और इन दो प्रकार के लोगों के दो अलग-अलग गंतव्य हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य पर अमल करते हैं, परमेश्वर केवल उन्हीं का उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते हैं वे दुष्टात्माएँ और शत्रु के समान हैं। वे महादूत के वंशज हैं, और उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा। यहाँ तक कि एक अस्पष्ट परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? लोग जो भला विवेक रखते हैं परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं, उनका मूलतत्व भी परमेश्वर का प्रतिरोध करना है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और भले ही ऐसे व्यक्ति बहुत सी कठिनाइयों से होकर गुजरें, वे तब भी नष्ट होंगे। …प्रत्येक व्यक्ति जो देहधारण करने वाले परमेश्वर को नहीं मानता वह दुष्ट है, और वे सब के सब नष्ट होंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

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