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29. "देखने पर ही विश्वास होता है" पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए

झियाओवेन, झेंगझोउ नगर, हेनन प्रांत

पहले, जब मैं लोगों को किसी बात पर टीका-टिप्पणी करते हुए सुनती थी, तो वे अक्सर यही कहते थे कि "देखने पर ही विश्वास होता है"। जैसे-जैसे समय गुजरता गया, मैंने भी चीजों को देखने के लिए इसी को आधार बना लिया, और परमेश्वर के वचनों के लिए भी यही मेरी धारणा थी। परिणाम यह हुआ कि, परमेश्वर के कई वचन जो परिपूर्ण नहीं हुए थे, मैं उन पर विश्वास करने में असमर्थ हो गई। जैसे-जैसे परमेश्‍वर में मेरे विश्‍वास का समय बढ़ता गया, मैंने देखा कि परमेश्वर के वचन, अलग-अलग स्तरों में पूर्ण हो रहे हैं, मैंने परमेश्वर के वचनों की परिपूर्णता से जुड़े तथ्यों को देखा और मुझे परमेश्वर के वचनों पर रत्ती भर भी अविश्वास न रहा। मैंने सोचा कि यह कुछ हद तक परमेश्वर की विश्वसनीयता की मेरी समझ का परिणाम था, और यह कि मैं इस बात पर विश्वास करने मेँ मैं समर्थ हो गई थी कि परमेश्वर के समस्‍त कथन सत्‍य हैं।

लेकिन एक दिन, जब मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा, "परमेश्वर तुम लोगों को दर्शायेगा कि अंतिम दिनों में देहधारी परमेश्वर के उद्धार के बिना परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नर्क में नष्ट कर दिया होता," तो एक बार फिर मैं इन पर विश्वास नहीं कर सकी। मैंने सोचा कि अगर यह कहा गया होता, "अंत के दिनों मेँ देहधारी परमेश्वर के उद्धार के बिना, पूरी भ्रष्ट मानवता का नाश हो जाना चाहिए।" तब मैं इसमें पूरी तरह विश्वास कर लेती, क्योंकि मुझे ज्ञात था कि देहधारी परमेश्वर हम सभी के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। लेकिन यह कथन कि अंत के दिनों में परमेश्वर के उद्धार के बिना, परमेश्वर ने बहुत पहले नरक मेँ मनुष्य का नाश कर दिया होता, मैंने सोचा कि यह सिर्फ़ एक व्याख्या है। जब मैंने इसके बारे मेँ सोचा तो मुझे बहुत बेचैनी महसूस हुई। मुझे परमेश्वर की सहायता और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए उनके सम्मुख आना पड़ा: "हे परमेश्वर! मैं आपके वचनों के प्रति इस प्रकार का दृष्टिकोण नहीं रखना चाहती हूँ और मुझे अत्यंत घृणा हो रही है कि मैं इतनी कुटिल हूं। मैंने इतने लंबे समय तक आपका अनुसरण किया है और आपके वचनों की पूर्णता के अनेक तथ्‍यों को देखा है, फिर भी मैं इस प्रकार से कैसे सोच रही हूँ? हे परमेश्वर! मैं आपके कहे हर वचन पर विश्‍वास करना चाहती हूँ और आपके वचनों के प्रति सच्‍ची आस्‍था रखती हूं। मेरी अभिलाषा है कि इस सत्‍यता में आप मेरा पथ प्रदर्शन करें।"

उसके बाद, मैंने उपरोक्त संगति का अध्ययन किया, जिसमें कहा गया है कि: "व्यक्ति को यह स्वीकार करना चाहिए कि परमेश्वर द्वारा कहा गया प्रत्येक वचन पूर्ण एवं सिद्ध होगा, लेकिन मनुष्य इन सभी को पहचान या देख नहीं सकता है। चूंकि परमेश्वर के वचनों की पूर्ति, मनुष्य की कल्पनाओं के पूरी तरह अनुरूप नहीं होगी, कभी-कभी अनेक बाहरी आवरणों में छिपी होगी, और मनुष्य उसको सहजता से पहचान नहीं सकेगा; सिर्फ परमेश्वर ही जानते हैं कि उनके वचन किस तरह पूर्ण होंगे। कुछ चीजों में परमेश्वर के वचनों की पूर्ति मनुष्य द्वारा स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है और कुछ में यह इतनी स्‍पष्‍टता से दिखाई नहीं देती है, इसलिए मनुष्यजाति को परमेश्‍वर के वचनों की पूर्ति होने या ना होने के निष्‍कर्षों को अपनी कल्‍पनाओं पर आधारित नहीं करना चाहिए। तुलनात्मक रूप से सत्य की बेहतर समझने रखने वाले भी इस बात को पूर्ण स्पष्टता के साथ नहीं देख पाते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर का प्रत्‍येक वचन पूर्ण होता है। जिन चीजों में मनुष्य, परमेश्वर के वचनों को पूरा होते हुए स्पष्ट रूप से देख पाता है वे अत्यंत सीमित होती हैं, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर की बुद्धिमत्‍ता की गहराई कभी भी नहीं जान सकता है। परमेश्वर के किसी भी वचन की पूर्ति किस प्रकार होगी, यह पूर्णत: उन पर निर्भर है और इन सभी में परमेश्वर की बुद्धिमत्‍ता निहित होती है – तो ऐसी स्थिति मेँ मनुष्य इसकी थाह कैसे ले सकता है?" (कलीसिया 1 की संगति और व्यवस्थाओं के इतिहास में "दृष्टिकोण मेँ आधारभूत परिवर्तन, सत्य की सही समझ का संकेत है")। इस वाक्य को पढ़ते समय अचानक मेरे मन में योना का विचार आया। नीनवे के लोगों की दुष्‍टता यहोवा तक पहुंची, और परमेश्वर ने योना को यह कहने के लिए नीनवे भेजा, "अब से चालीस दिन के बीतने पर, नीनवे को तबाह कर दिया जायेगा! (योना 3:4)". लेकिन योना वैसा नहीं करना चाहता था जैसी यहोवा की आज्ञा थी, क्योंकि उसे ज्ञात था कि यहोवा परमेश्वर दया और करुणा की प्रतिमूर्ति हैं, उनका हृदय प्रेम से भरा हुआ है, और उन्हें अनायास क्रोध नहीं आता है। योना को भय था कि यदि वह यहोवा द्वारा दी गई आज्ञा के अनुसार घोषणा कर देता है, और परमेश्वर 40 दिनों के अंदर नीनवे के लोगों पर आपदा नहीं लाते हैं तो लोग कहेंगे कि वह झूठा और कपटी है। कई हज़ार वर्षों बाद, मैं इस पूरी प्रक्रिया से एक बार पुन: गुजर रही थी जिसे बाइबल में अभिलिखित देखा जा सकता है। मुझे स्पष्ट रूप से यह ज्ञात था कि, उस समय, परमेश्वर वास्तव मेँ नीनवे को नष्ट करना चाहते थे, लेकिन वहाँ के लोगों के पश्‍चाताप के कारण उन्‍होंने ऐसा नहीं किया। किन्तु यदि मैं योना की समकालीन होती, जिसे यह ज्ञात नहीं होता कि योना पर क्या गुजरी है और मैंने सिर्फ ये देखा होता कि नीनवे में सब कुछ कुशल है – तो क्या तब भी मैं यही सोचती कि योना झूठा और कपटी है? निश्चित रूप से मैं ऐसा ही सोचती।

केवल इसके बाद ही यह बात मेरी समझ मेँ आई कि सिर्फ बाहरी तथ्‍यों को देखकर चीजों पर निर्णय लेना अत्यधिक एकपक्षीय और एकांगी होता है। इसमें तथ्यों पर समग्रता से विचार नहीं किया जाता है, यह चीजों का सही निर्धारण नहीं है और ऐसा करना गलत है। ऐसा इसलिए क्योंकि जो कुछ मनुष्य की आँखों को दिखाई देता है वह बेहद कम, सीमित और सतही होता है। सिर्फ परमेश्वर के वचनों के अनुसार चीजों को देखना समग्र रूप से उचित होता है और सही स्थिति को प्रकट करता है। ठीक उसी तरह, जब यहोवा नीनवे को नष्ट करना चाहते थे। यदि लोगों को दिखाई देने वाले तथ्‍यों को देखा जाए, तो योना द्वारा इन वचनों के कहे जाने से लेकर उसके बाद तक नीनवे में सब कुछ सही था, इस बात का कदापि कोई संकेत नहीं था कि यहोवा इस शहर को नष्ट करना चाहते हैं। लेकिन अंदर की सही स्थिति, फिर भी, यही थी, कि परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के मुताबिक, उस शहर के लोग इतने भ्रष्ट थे कि परमेश्वर को उसे नष्ट करना पड़ता। परंतु परमेश्वर ने अपने लोगों पर दया दिखाई और उनसे प्रेम किया, इसलिए योना को उन्‍‍हें यह बताने के लिए भेजा कि वे प्रायश्चित्त करें। इसके बाद परमेश्वर ने देखा कि लोगों ने सचमुच प्रायश्चित्त किया और इसलिए, दयापूर्ण हृदय से, उन्‍होंने उन्‍हें नष्‍ट करने के लिए आपदा नहीं डाली। लेकिन यदि वे प्रायश्चित्त नहीं करते तो परमेश्वर ने अपने इस वचन को पूरा कर दिया होता: "अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे को तबाह कर दिया जायेगा" उस समय वास्तविक स्थिति इस तरह विकसित हुई, लेकिन इस घटना से जुड़े लोगों के लिए इसे पहचान पाना या देख पाना बिल्‍कुल संभव नहीं था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का हर वचन अवश्य ही पूर्ण और सिद्ध होगा - इसमें कोई संदेह नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि मनुष्‍य परमेश्वर की बुद्धिमत्‍ता की कभी भी थाह नहीं पा सकता, और परमेश्वर के किसी भी वचन की पूर्ति किस प्रकार होगी, यह पूर्णत: उन पर निर्भर है और इसमें परमेश्वर की बुद्धिमत्‍ता निहित होती है, ये तो मनुष्‍य ही है जो उसकी थाह तक नहीं ले सकता, उसको पूरी तरह समझना तो दूर की बात है।

परमेश्‍वर द्वारा इस विषय-वस्‍तु के माध्‍यम से मुझे प्रबुद्ध करने के लिए, मुझे यह समझाने के लिए धन्यवाद, जैसा कि लोग अक्सर कहते हैं "देखने पर ही विश्वास होता है" सही धारणा नहीं है, और परमेश्‍वर के वचनों का इस दृष्टिकोण ये मूल्‍यांकन करना पूरी तरह गलत है। यह अभिज्ञान होने पर, मैंने परमेश्‍वर द्वारा कहे गए इन वचनों को पुन: पढ़ा, "परमेश्वर तुम लोगों को दर्शायेगा कि अंतिम दिनों में देहधारी परमेश्वर के उद्धार के बिना परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नर्क में नष्ट कर दिया होता," और मेरा हृदय इन पर विश्वास करने लगा और मैं इसे सार्थक तरीके से स्वीकार कर सकी। हमारी भ्रष्‍टता और परमेश्‍वर की धार्मिकता के प्रकाश में, हमें बहुत पहले ही नष्‍ट हो जाना चाहिए था, परंतु क्‍योंकि परमेश्‍वर ने हम पर दया दिखाई और हमें बचाने के लिए व्यक्तिगत रूप से देहधारण कर वापस आए, इसलिए आज हम परमेश्‍वर की उपस्थिति में रह सकते हैं। सिर्फ अब ही मुझे ये सुस्‍पष्‍ट अभिज्ञान हुआ है कि परमेश्‍वर का हर एक वचन विश्‍वास करने योग्‍य है, और अपने हृदय से मैं यह महसूस करती हूं कि परमेश्‍वर मनुष्‍य के प्रति इतने धार्मिक और प्रेमपूर्ण हैं।

मैं परमेश्‍वर की इस प्रबुद्धता को धन्‍यवाद देती हूं जिसने मुझे सत्‍य के इस पहलू को समझाया, और जिसने मेरे पूर्व के गलत दृष्टिकोण की कायापलट कर दी। अब से मैं, परमेश्‍वर के वचनों के अनुरूप ही लोगों को या चीजों को देखूंगी, क्‍योंकि परमेश्‍वर के वचन सबसे सटीक होते हैं। परमेश्‍वर के वचनों के अतिरिक्‍त, "देखने पर ही विश्वास होता है" जैसा दृष्टिकोण, जो भले ही लोगों को सत्‍य लगते हों, चाहे अभ्‍यास के द्वारा परीक्षण किया गया हो या उनका एक लंबा इतिहास रहा हो, फिर भी गलत हैं। परमेश्‍वर के वचन ही वह मानक हैं जिससे मैं सभी बातों को देखती और तौलती हूं।

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