मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 4.स्वभाव का समाधान करना और सत्य का अभ्यास करना

1. मानवता और सत्य का अभ्यास करने की क्षमता के बीच सम्बन्ध

लोग कहते हैं कि सत्य का अभ्यास करना बहुत ही कठिन होता है। तो ऐसा क्यों है कि कुछ लोग सत्य का अभ्यास करने में समर्थ हैं? कुछ लोग कहते हैं यह इसलिए है क्योंकि वे सहज रूप में पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करते हैं जो वह उनके ऊपर कार्य कर रहा है, और साथ ही इसलिए क्योंकि वे स्वाभाविक रूप से अच्छे हैं। इस बहस में इसके प्रति थोड़ा सा तर्क तो है। कुछ लोग स्वाभाविक रूप से अच्छे होते हैं; वे सत्य का अभ्यास करने में समर्थ होते हैं। कुछ लोगों की मानवीयता कमज़ोर होती है, इस प्रकार उनके लिए सत्य का अभ्यास करना कठिन होता है; इसका अर्थ है कि वे कुछ दुखों का सामना करेंगे। क्या आप लोग कहेंगे कि वह जो सत्य का अभ्यास नहीं करता है उसने कभी सत्य की खोज की है? उसने उसकी खोज बिल्कुल भी नहीं की है! उसकी स्वयं की सोच जागृत होती है: “यह मार्ग अच्छा है, यह मेरे लाभ के लिए है।” अंत में, वह अभी भी अपने स्वयं के विचारों पर ही आधारित होकर काम करता है। वह सत्य का अभ्यास इसलिए नहीं करता है क्योंकि उसके ह्रदय में कुछ ग़लत है, और उसका ह्रदय सही नहीं है। वह खोजता नहीं है, वह जाँच नहीं करता है, और न ही वह परमेश्वर के सामने प्रार्थना करता है; वह बस ढिठाई से अपनी स्वयं की इच्छाओं के अनुसार ही कार्य करता है। इस प्रकार के व्यक्ति में साधारणतया सत्य के लिए कोई स्नेह नहीं होता है। यह कहना कि वह सत्य के प्रति प्रेम को आश्रय नहीं देता है, किन्तु यह कि वह सिद्धान्तों के साथ बने रहने के लिए कुछ चीज़ों को अंजाम देता है और सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं करता है, तो इस प्रकार उल्लंघन के न होने का मतलब यह नहीं है कि वह परमेश्वर को खोजने का इरादा रखता है। केवल यही कहा जा सकता है कि यह महज संयोग है। कुछ लोग कुछ निश्चित चीज़ों को बिना खोजबीन किए भ्रामक और अव्यवस्थित रीति से करते हैं; और सत्य के प्रकट होने के बाद ही अपने आपको जाँचते हैं। यदि उन्हें पता लगता है कि ऐसी चीज़ों को करना सत्य के साथ मेल नहीं खाता है, तो वे अगली बार से ऐसा करने से परहेज करेंगे। इससे यह माना जा सकता है कि उनमें सत्य के लिए थोड़ा सा प्रेम है। इस किस्म का व्यक्ति थोड़ा सा परिवर्तित होने में सक्षम होता है। ऐसे लोग जिनमें सत्य के लिए प्रेम नहीं है वे न तो उसे उस समय खोजेंगे, और न ही उसके बाद वे अपने आपको जाँचेंगे। वे कभी बारीकी से नहीं जाँचते हैं कि अंत में वह कार्य सही रीति से किया गया था या ग़लत रीति से, इस प्रकार वे हमेशा सिद्धान्तों का उल्लंघन करते हैं, और सत्य का उल्लंघन करते हैं। भले ही आप कुछ ऐसा करें जो सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं करता है, फिर भी यह सत्य से असंगत होता है, और सिद्धान्तों का यह तथा-कथित गैर-उल्लंघन साधारणतया दृष्टिकोण का मामला है। अतः इस प्रकार का व्यक्ति किस दशा में होता है जब वे अपनी इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं? वे विस्मित और नासमझ दशा में कार्य नहीं कर रहे हैं: अंतिम विश्लेषण में क्या यह सत्य के अनुरूप होता है? यह वह परिस्थिति नहीं है जिसके अंतर्गत वे अपने आपको पाते हैं, उसके बजाए वे ढिठाई से ऐसी रीति से कार्य करने में लगे रहते हैं; उन्होंने उस तरह से उसे करने के लिए अपने मस्तिष्क को व्यवस्थित कर लिया है, और उनका सत्य की खोज करने का इरादा बिलकुल भी नहीं है। यदि वे सचमुच में परमेश्वर के इरादों को खोजते, फिर भी वे परमेश्वर के इरादों को पूरी तरह बूझने में पहले से ही असफल हो जाते, तब वे निम्नलिखित कार्य की श्रृंखला पर विचार कर सकते हैं: मैं पहले आगे बढ़ूंगा और उसे इस तरह से करूँगा, यदि यह सत्य का अनुपालन करता है तो मैं उसे निरन्तर इसी रीति से करता रहूँगा, और यदि यह सत्य के अनुरूप नहीं है, तो मैं उसका इलाज करने में फुर्ती करूँगा तथा आगे से ऐसे रीति से कार्य नहीं करूँगा। यदि वे इस रीति से सत्य की खोज करने के योग्य हैं, तो वे भविष्य में परिवर्तित होने के योग्य होंगे। इस इरादे के बिना, वे परिवर्तित होने के योग्य नहीं होंगे। एक व्यक्ति जिसके पास हृदय है वह केवल एक बार ही ग़लती कर सकता है जब वह कार्यवाही का प्रारम्भ करता है, अधिक से अधिक दो बार- एक या दो बार, न कि तीन और चार बार, यह सामान्य भावना है। यदि वे उसी ग़लती को तीन या चार बार करते हैं, तो इससे साबित होता है कि उन्होंने सत्य के प्रति प्रेम नहीं है, और न ही वे सत्य की खोज करते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति निश्चित रूप में एक मानवीय व्यक्ति नहीं है। यदि एक या दो बार के बाद ह्रदय में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है, और उनके विवेक में कोई हलचल नहीं होती है, तो वे उसी कार्य को तीन या चार बार करने में सक्षम होते हैं, इस प्रकार का व्यक्ति साधारणतया बदलने के योग्य नहीं है, वे बस इस तरह के इंसान हैं- पूरी तरह न छुड़ाए जाने योग्य। एक बार कार्य करने के बाद, यदि वे महसूस करते हैं कि उस मामले में कुछ तो सही नहीं है, और उसके लिए अपने आपसे बहुत घृणा करते हैं और अपने ह्रदय में दोष भावना का एहसास करते हैं, तो इस परिस्थिति में, वे अगली बार कम मात्रा में ऐसी रीति से कार्य करेंगे और धीरे धीरे यह स्थिति भविष्य में आगे से घटित नहीं होगी। यदि वे अपने ह्रदय में ऐसी अभिलाषा करना भी चाहें, तो भी वे उस पर कार्य नहीं करेंगे। यह परिवर्तन का एक पहलु है। कदाचित् आप कहेंगे: “मैं इस स्थिति को बदल नहीं सकता हूँ।” बदल नहीं सकते हैं? यह इसलिए है क्योंकि आप बदलना नहीं चाहते हैं। यदि आप सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हैं, तो क्या आप बदल नहीं सकते हैं? ऐसे लोग जो यह कहते हैं उनमें इच्छा की कमी है। वे सभी नीच अभागे हैं। वे दुख सहने में अनिच्छुक हैं। वे सत्य का अभ्यास नहीं करना चाहते हैं; उसके बजाए वे कहते हैं कि सत्य उनको बदल नहीं सकता है। क्या ऐसा व्यक्ति बहुत अधिक धोखेबाज़ नहीं है? ये वे हैं जो सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ हैं, उनकी मानवीयता दूषित है, फिर भी वे कभी अपने स्वयं के स्वभाव को नहीं जानते हैं। उसके स्थान पर वे सन्देह करते हैं कि परमेश्वर का कार्य हर मोड़ पर मनुष्य को सम्पूर्ण कर सकता है या नहीं। मैं कहता हूँ कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर को अपना ह्रदय देने का कभी इरादा नहीं करता है, और दुख सहने की कोई योजना कभी नहीं बनाता है। एकमात्र कारण जिसके लिए वे यहाँ टिके हुए हैं वह महज एक सुदूर-अवसर पर निर्भर है कि वे भविष्य में अच्छा सौभाग्य हासिल कर सकते हैं। हम इस तरह के व्यक्ति का उल्लेख मानवीयता से वंचित लोगों के रूप में हैं। यदि वे एक मानवीय व्यक्ति हैं, उस समय भी जब पवित्र आत्मा उन पर सामर्थी रूप में कार्य नहीं कर रहा है, और उनमें सत्य की थोड़ी सी समझ है, तो क्या वे दोषपूर्ण कार्यों में संलग्न हो सकते हैं? एक मानवीय व्यक्ति, इसकी परवाह किए बगैर कि पवित्र आत्मा उन पर कार्य कर रहा है या नहीं, दोषपूर्ण कार्यों को प्रारम्भ करने में असमर्थ होगा। कुछ अमानवीय लोग केवल इस शर्त के अंतर्गत कुछ अच्छे कार्यों को कर सकते हैं कि पवित्र आत्मा उनके ऊपर कार्य करता रहे। उनके ऊपर पवित्र आत्मा के कार्य के बगैर, उनके स्वभाव का खुलासा हो जाता है। किसके ऊपर पवित्र आत्मा हमेशा काम करता रह सकता है? अविश्वासियों में से कुछ लोगों के पास अच्छी मानवीयता है, साथ ही उनके पास पवित्र आत्मा भी नहीं है जो उनके ऊपर कार्य करे, फिर भी वे विशेष रूप से बुरे कार्यों में संलग्न नहीं होते हैं। यदि आप परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो आप बुरे कार्यों में संलग्न कैसे हो सकते हैं? यह आपके स्वभाव की समस्या को प्रदर्शित करता है। उनके ऊपर पवित्र आत्मा के कार्य के बगैर, लोगों के स्वभाव का खुलासा हो जाता है। उनके ऊपर पवित्र आत्मा के कार्य के साथ, पवित्र आत्मा उन्हें उकसाएगा, लोगों को अद्भुत ज्ञान और प्रकाशन देगा, सामर्थ्य के विस्फोट के साथ उन्हें लैस करेगा, अतः जब लोग कुछ अच्छे कार्यों को निष्पादित करते हैं, तो यह उनके अच्छे स्वभाव का प्रश्न नहीं है। इस प्रकार, अनेक लोग अपने कार्यवाहियों में दोषपूर्ण कार्यों को अंजाम देते हैं, और ऐसे समयों पर अपने स्वभाव को प्रकट करते हैं।

2. आपके स्वभाव का समाधान करने के लिए अनेक सिद्धान्तों को स्थापित करना

आप अपने स्वभाव का समाधान कैसे करते हैं? पहले, आपको अपने स्वभाव को जानना होगा और साथ ही आपको परमेश्वर के वचन एवं इच्छा दोनों को समझना होगा। तब आप अधिकतम सीमा तक कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं, कि आप दोषपूर्ण कार्यों को अंजाम देने से परहेज करते हैं, केवल उसे करके जो सत्य के अनुरूप है? यदि आप एक परिवर्तन करने की इच्छा करते हैं, तो आपको इस पर विचार-विमर्श करना होगा। आपके दूषित स्वभाव के सम्बन्ध में, यह कितने प्रकार की भ्रष्टता में शामिल होता है और यह किस तरह के कार्यों को करने में सक्षम है, तब किस प्रकार के दृष्टिकोण को अपनाया जा सकता है और उस पर नियन्त्रण करने के लिए उसका अभ्यास कैसे किया जा सकता है-यह वह निर्णायक प्रश्न है। आपको इस संबंध में सावधानीपूर्वक इस प्रश्न की खोजबीन करनी होगी, अंधकार के दौरान तो और भी अधिक करना होगा (इसमें ऊपर से सहभागिता प्राप्त करने के तुरन्त बाद का समय शामिल नहीं हैं, किन्तु इसे छोड़कर, अर्थात्, जब दस से अधिक दिन गुज़र जाएँ), कि आप किस प्रकार इस मुद्दे को सुलझा सकते हैं, आप किस प्रकार अपने कर्त्तव्यों को उचित रीति से पूरा कर सकते हैं, आप किस प्रकार सही मार्ग ले सकते हैं; आपको स्वयं के लिए एक सिद्धान्त स्थापित करना होगा। यह एक व्यक्ति की इच्छा और इस पर निर्भर करता है वे परमेश्वर को चाहते हैं या नहीं। लिन ज़ेक्सु बहुत जल्दी क्रोधित हो जाता था। अपनी स्वयं की कमज़ोरी के आधार पर उसने अपने कमरे में निम्नलिखित आदर्श-वाक्य लिखा था: “अपने गुस्से पर लगाम लगाओ।” यह मनुष्य का दृष्टिकोण है, फिर भी यह सचमुच में कार्य करता है। हर स्त्री या पुरुष के पास अनुसरण करने के लिए उसके स्वयं के सिद्धान्त होते हैं, अतः आपको भी अपने स्वयं के स्वभाव के अनुसार अपने सिद्धान्त स्थापित करने चाहिए। ये सिद्धान्त ज़रुरी हैं, उनके न होने का तो सवाल ही नहीं है। परमेश्वर पर और आपकी आचरण संहिता में विश्वास करने के लिए यह आपका आदर्श-वाक्य होना चाहिए।

मनुष्य के स्वभाव का समाधान देह को त्यागने से प्रारम्भ होता है। साथ ही देह त्यागने के लिए भी सिद्धान्त आवश्यक हैं। क्या कोई बेतरतीब तरीके से देह त्याग सकता है? जब समय आता है तब आप देह से हार मान लेंगे। कुछ भाई सुन्दर स्त्रियों को देख कर अपने मार्गों पर रुक सकते हैं। तब आपको स्वयं के लिए एक आदर्श-वाक्य तय करना होगा। आप क्या कर सकते हैं जब एक सुन्दर स्त्री दिखाई देती है? आपको चले जाना चाहिए या आपको क्या करना चाहिए? आपको क्या करना चाहिए यदि वह आपका हाथ पकड़ लेती है? यदि आपका कोई सिद्धान्त नहीं हैं, तो जब आपका सामना एक ऐसी स्थिति से होगा तब आप ठोकर खाएंगे। यदि आप धन एवं सम्पत्ति को देखकर लालच महसूस करते हैं, तो आप इसके साथ कैसे निपटेंगे? ख़ास तौर पर इस प्रश्न का अध्ययन कीजिए, सावधानीपूर्वक इसका समाधान करने का अभ्यास कीजिए और आहिस्ता आहिस्ता आप देह को त्याग पाएंगे। एक सिद्धान्त है जो काफी महत्वपूर्ण है, वह है कि कार्य करने से पहले दो बार सोचिए; परमेश्वर के सामने उसकी जाँच कीजिए। उसके अलावा, हर शाम आपको अपनी स्वयं की स्थितियों का परीक्षण करना होगा। यह एक सिद्धान्त है। अपने स्वयं के व्यवहार का सूक्ष्म परीक्षण कीजिए: सत्य की अनुरूपता में कौन कौन से कार्य किए गए थे और सिद्धान्तों के उल्लंघन में कौन कौन से कार्य किए गए थे। ये दोनों बिन्दु अत्याधिक महत्वपूर्ण हैं! एक है कार्य करने के समय स्वयं का परीक्षण करना और दूसरा है बाद में स्वयं का परीक्षण करना। तीसरा सिद्धान्त है: सत्य का अभ्यास करने का क्या अर्थ होता है और सैद्धान्तिक रीति से मामलों को संभालना क्या सूचित करता है इस पर पूरी तरह स्पष्ट रहिए। जब एक बार आप इस पर बिलकुल स्पष्ट हो जाते हैं, तो आप मुद्दों को सही रीति से संभालेंगे। इन तीनों सिद्धान्तों से चिपके रहने के द्वारा आप स्वयं को नियंत्रित करने में सक्षम होंगे। आपका मूल स्वभाव स्वयं को प्रकट करने में असमर्थ होगा, और वह फिर से निर्मित होने में असमर्थ होगा। यह मानव स्वभाव को सँभालने हेतु मूल सिद्धान्त भी है। इन सिद्धान्तों को दृढ़ता से थामे रहने के द्वारा, उस समय भी जब पवित्र आत्मा आपके ऊपर कार्य नहीं कर रहा है, और ऊपर से बिना किसी सहभागिता की लम्बी अवधि के बाद, और अधिक ऊंचाई तक पहुँचने के लिए पर्याप्त कोशिश करके आप अभी भी स्वयं को साधारण अवस्था के भीतर बनाए रख सकते हैं, तो आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जो सत्य का ध्यान रखता है, और एक ऐसे इंसान हैं जिसने देह को त्याग दिया है। ऐसे लोग जो सत्य का सामना करने या उन्हें कांटने-छांटने या संचारित करने के लिए हमेशा उपरोक्त पर आश्रित रहते हैं वे दास हैं, उन्हें कभी स्वतन्त्र नहीं किया जा सकता है या वे कभी उन्नति नहीं कर सकते हैं। एक व्यक्ति जो सिद्धान्तों के बगैर कार्यों को अंजाम देता है, तो एक अवधि के बाद उनके साथ व्यवहार या कांट-छांट करने वाले किसी व्यक्ति के बगैर, उनके साथ संवाद करने वाले किसी व्यक्ति के बगैर, वे अपनी इच्छा के अनुसार ही कार्य करेंगे, और अपने आप पर नियन्त्रण खो देंगे और स्वछंद हो जाएंगे। क्या एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर को आराम से रहने दे सकता है? इसलिए, अपने स्वभाव का समाधान करने के लिए, मनुष्य को इन तीनों सिद्धान्तों से चिपके रहना होगा। इस रीति से, आप अपने आपको गंभीर अपराध करने से बचा पाएँगे।