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XV फरीसियों और परमेश्वर का विरोध करती धार्मिक दुनिया के सार को किस तरह पहचानें इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाहिए

1. प्रभु यीशु ने फरीसियों को क्यों शाप दिया था? वास्तव में फरीसियों का सार क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"तुम भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों परमेश्‍वर की आज्ञा टालते हो? क्योंकि परमेश्‍वर ने कहा है, 'अपने पिता और अपनी माता का आदर करना', और 'जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।' पर तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, 'जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुँच सकता था, वह परमेश्‍वर को भेंट चढ़ाया जा चुका', तो वह अपने पिता का आदर न करे, इस प्रकार तुम ने अपनी परम्परा के कारण परमेश्‍वर का वचन टाल दिया। हे कपटियो, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक ही की है: 'ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं'" (मत्ती 15:3-9)।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।

हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

हे अंधे अगुवो तुम पर हाय! जो कहते हो कि यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की सौगन्ध खाए तो उससे बंध जाएगा। हे मूर्खो और अंधो, कौन बड़ा है; सोना या वह मन्दिर जिससे सोना पवित्र होता है? फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उसकी शपथ खाए तो बंध जाएगा। हे अंधो, कौन बड़ा है; भेंट या वेदी जिससे भेंट पवित्र होती है? इसलिये जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी और जो कुछ उस पर है, उसकी भी शपथ खाता है। जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह उसकी और उसमें रहनेवाले की भी शपथ खाता है। जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्‍वर के सिंहासन की और उस पर बैठनेवाले की भी शपथ खाता है।

हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम पोदीने, और सौंफ, और जीरे का दसवाँ अंश तो देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात् न्याय, और दया, और विश्‍वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो।

हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर और असंयम से भरे हुए हैं। हे अंधे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों।

हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।

हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम भविष्यद्वक्‍ताओं की कब्रें सँवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो, और कहते हो, 'यदि हम अपने बापदादों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्‍ताओं की हत्या में उनके साझी न होते।' इससे तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो कि तुम भविष्यद्वक्‍ताओं के हत्यारों की सन्तान हो। अत: तुम अपने बापदादों के पाप का घड़ा पूरी तरह भर दो। हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे? इसलिये देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्‍ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उनमें से कुछ को मार डालोगे और क्रूस पर चढ़ाओगे, और कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे। जिससे धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा। मैं तुम से सच कहता हूँ, ये सब बातें इस समय के लोगों पर आ पड़ेंगी" (मत्ती 23:13-36)।

"प्रधान याजकों और पुरनियों ने लोगों को उभारा कि वे बरअब्बा को माँग लें, और यीशु का नाश कराएँ। हाकिम ने उनसे पूछा, "इन दोनों में से किस को चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूँ?" उन्होंने कहा, "बरअब्बा को।" पिलातुस ने उनसे पूछा, "फिर यीशु को, जो मसीह कहलाता है, क्या करूँ?" सब ने उससे कहा, "वह क्रूस पर चढ़ाया जाए!" हाकिम ने कहा, "क्यों, उसने क्या बुराई की है?" परन्तु वे और भी चिल्‍ला-चिल्‍लाकर कहने लगे, "वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।" जब पिलातुस ने देखा कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इसके विपरीत हुल्‍लड़ बढ़ता जाता है, तो उसने पानी लेकर भीड़ के सामने अपने हाथ धोए और कहा, "मैं इस धर्मी के लहू से निर्दोष हूँ; तुम ही जानो।" सब लोगों ने उत्तर दिया, "इसका लहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो!" इस पर उसने बरअब्बा को उनके लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया जाए" (मत्ती 27: 20—26)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

10. फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना

(मरकुस 3:21-22) जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उस का चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि "उस में शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

11. यीशु फरीसियों को डाँटता है

(मत्ती12:31-32) इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, पर पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

(मत्ती23:13-15) हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो तुम स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। [हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।] हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिए सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

ऊपर दो अलग अलग अंश हैं—आओ पहले प्रथम पर एक नज़र डालें: फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना।

बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का मूल्याँकन और वे चीज़ें जो उसने की थी वे थेः क्योंकि वे कहते थे, कि उस का चित्त ठिकाने नहीं है। …"उस में शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या हवा के हल्के बयार में कल्पना करना नहीं था—जो कुछ उन्होंने देखा और उसके कार्यों के विषय में सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के लिए उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष व्यर्थ दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, फिर भी वह अहंकार जिसके तहत उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी नफरत की आवेग से भरी हुई ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षा और उन के बुरे शैतानी चेहरे, साथ ही साथ परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्रोही स्वभाव का भी का खुलासा कर दिया था। ये बातें उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कहा था जो उनके खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर एवं सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के गन्दे और द्रोही स्वभाव से प्रेरित था। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा था या किया था उसके सार की खोज की। परन्तु उन्होंने असावधानी, अधीरता, सनक और जानबूझकर की गई ईर्ष्या के साथ जो कुछ उसने किया था उस पर आक्रमण किया और उस पर विश्वास नहीं किया। यह इस बिन्दु तक था कि उन्होंने बिना सोचे विचारे उसके आत्मा पर, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा पर कलंक लगाया। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "उसका चित ठिकाने नहीं है," "बील्ज़ेबूब और दुष्टात्माओं का सरदार।" ऐसा कहना चाहिए, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा बालजबूल और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने उस देहधारी शरीर के कार्य को पागलपन कहा जिसे परमेश्वर के आत्मा ने धारण किया था। उन्होंने ना केवल बालजबूल और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की निन्दा की, परन्तु उन्होंने परमेश्वर के कार्य पर दोष भी लगाया था। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी निन्दा की। उनके प्रतिरोध और परमेश्वर की निन्दा का सार बिल्कुल शैतान और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्माओं के प्रतिरोध और ईश निन्दा के सार के समान ही था। वे ना केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते हैं, बल्कि इस से कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप है। वे मानव जाति के मध्य एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और सन्देशवाहक थे। उनकी ईश निन्दा का निचोड़ और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह के चरित्र को दूषित किया जाना यह सब परमेश्वर के साथ पद को लेकर उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, और परमेश्वर को परखने की उनकी कभी ना खत्म होनेवाली इच्छा थी। परमेश्वर के प्रति उनके प्रतिरोध का निचोड़ और उसके प्रति उनकी शत्रुता की मनोवृत्तियाँ, साथ ही साथ उनके शब्द और उनके विचारों ने सीधे सीधे परमेश्वर के आत्मा की निन्दा की और उसे क्रोधित किया था। इस प्रकार, परमेश्वर ने जो कुछ उन्होंने कहा था और किया था उसके लिए एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उन के कार्यो को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया था। यह पाप इस संसार और आनेवाले संसार में भी क्षमा करने योग्य नहीं है, बिल्कुल वैसा ही जैसा निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" और "परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आओ हम परमेश्वर से इन शब्दों के सच्चे अर्थ के बारे में बातें करें "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" यह सरल रीति से समझना है कि परमेश्वर किस प्रकार वचनों को पूरा करता है "उस का अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" …

… क्या तुम लोगों ने पवित्र शास्त्र के इन दोनों अंशों में कुछ ध्यान दिया था? कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के क्रोध को देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं जो मानव जाति के अपराध को सहन नहीं कर सकता है, और यह कि यदि लोग कुछ ऐसा करें जिस से परमेश्वर की निन्दा हो, तो वे उसकी क्षमा को प्राप्त नहीं करेंगे। इस सच्चाई के अतिरिक्त कि लोग इन दोनों अंशों में परमेश्वर के क्रोध और असहिष्णुता को देखते हैं और महसूस करते हैं, फिर भी वे अभी तक उसकी प्रवृत्ति को सचमुच में समझ नहीं पाए हैं। ये दोनों अंश उनके प्रति जो उसकी निन्दा करते हैं और उसे क्रोधित करते है परमेश्वर की सच्ची प्रवृत्ति और पहुँच के अर्थ को धारण किए हुए है। पवित्र शास्त्र का यह अंश उसकी सच्ची प्रवृत्ति और पहुँच के अर्थ को थामे हुए हैः "परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उस का अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की निन्दा करते हैं, जब वे उसे रिस दिलाते हैं, वह एक आदेश जारी करता है, और उसका आदेश उसका अन्तिम परिणाम होता है। इसे बाइबल मे इस प्रकार से वर्णित किया गया हैः "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31-32), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से

यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के अनुकूल होने की खोज नहीं की, बल्कि नियम का अक्षरशः पालन कर्मठतापूर्वक किया, इस हद तक किया कि अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को, पुराने नियम की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए, क्रूस पर चढ़ा दिया। उनका सारतत्व क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के अनुकूल होने के मार्ग की खोज नहीं की? उनमें पवित्रशास्त्र के हर एक वचन का जुनून सवार हो गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और कार्य की विधियों पर कोई भी ध्यान नहीं दिया। ये वे लोग नहीं थे जो सत्य को खोज रहे थे, बल्कि ये वे लोग थे जो कठोरता से पवित्रशास्त्र के वचनों का पालन करते थे; ये वे लोग नहीं थे जो सत्य की खोज करते थे, बल्कि ये वे लोग थे जो बाइबल में विश्वास करते थे। दरअसल वे बाइबल के रक्षक थे। बाइबल के हितों की सुरक्षा करने, और बाइबल की मर्यादा को बनाये रखने, और बाइबल की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए, वे यहाँ तक गिर गए कि उन्होंने दयालु यीशु को भी क्रूस पर चढ़ा दिया। यह उन्होंने सिर्फ़ बाइबल की रक्षा करने के लिए, और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन के स्तर को बनाये रखने के लिए ही किया। इस प्रकार उन्होंने यीशु को, जिसने पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त का पालन नहीं किया, मृत्यु दंड देने के लिये अपने भविष्य और पापबलि को त्यागना बेहतर समझा। क्या वे पवित्रशास्त्र के हर एक वचन के नौकर नहीं थे?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए" से

और स्मरण करें कि 2000 वर्ष पहले यहूदियों द्वारा यीशु को सलीब पर चढ़ा दिए जाने के बाद क्या हुआ था। यहूदियों को इस्राएल से निर्वासित कर दिया गया था और वे दुनियाभर के देशों में भाग गए थे। कई लोगों को मार दिया गया था, और सम्पूर्ण यहूदी देश अभूतपूर्व विनाश के अधीन कर दिया गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था-जघन्य अपराध किया था-और परमेश्वर के स्वभाव को उकसाया था। उन्होंने जो किया था उसका उनसे भुगतान करवाया गया था, उनसे उनके कार्यों के परिणामों को भुगतवाया गया था। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी: परमेश्वर द्वारा दण्डित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा है जो उनके शासक अपने देश और राष्ट्र पर लाए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है" से

फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। और इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और, ऊपर से, क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से

पिछला:परमेश्वर केवल उस कलीसिया को आशीष क्यों देता है जो उसके कार्य को स्वीकार कर उसका अनुपालन करती है? वह धार्मिक संगठनों को क्यों शाप देता है?

अगला:यह क्यों कहा जाता है कि धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग सभी फरीसियों के मार्ग पर चल रहे हैं? उनका सार क्या है?

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