1. प्रभु यीशु ने फरीसियों को शाप क्यों दिया था, और फरीसियों का सार क्या था?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"तुम भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों परमेश्‍वर की आज्ञा टालते हो? क्योंकि परमेश्‍वर ने कहा है, 'अपने पिता और अपनी माता का आदर करना', और 'जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।' पर तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, 'जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुँच सकता था, वह परमेश्‍वर को भेंट चढ़ाया जा चुका', तो वह अपने पिता का आदर न करे, इस प्रकार तुम ने अपनी परम्परा के कारण परमेश्‍वर का वचन टाल दिया। हे कपटियो, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक ही की है : 'ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं'" (मत्ती 15:3-9)।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। (हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो : इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।)

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

"हे अंधे अगुवो, तुम पर हाय! जो कहते हो कि यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की सौगन्ध खाए तो उससे बंध जाएगा। हे मूर्खो और अंधो, कौन बड़ा है; सोना या वह मन्दिर जिससे सोना पवित्र होता है? फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उसकी शपथ खाए तो बंध जाएगा। हे अंधो, कौन बड़ा है; भेंट या वेदी जिससे भेंट पवित्र होती है? इसलिये जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी और जो कुछ उस पर है, उसकी भी शपथ खाता है। जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह उसकी और उसमें रहनेवाले की भी शपथ खाता है। जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्‍वर के सिंहासन की और उस पर बैठनेवाले की भी शपथ खाता है।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम पोदीने, और सौंफ, और जीरे का दसवाँ अंश तो देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात् न्याय, और दया, और विश्‍वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर और असंयम से भरे हुए हैं। हे अंधे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम भविष्यद्वक्‍ताओं की कब्रें सँवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो, और कहते हो, 'यदि हम अपने बापदादों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्‍ताओं की हत्या में उनके साझी न होते।' इससे तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो कि तुम भविष्यद्वक्‍ताओं के हत्यारों की सन्तान हो। अत: तुम अपने बापदादों के पाप का घड़ा पूरी तरह भर दो। हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे? इसलिये देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्‍ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उनमें से कुछ को मार डालोगे और क्रूस पर चढ़ाओगे, और कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे। जिससे धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा। मैं तुम से सच कहता हूँ, ये सब बातें इस समय के लोगों पर आ पड़ेंगी" (मत्ती 23:13-36)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने मसीहा के नाम के साथ व्यर्थ ही चिपके रहने की ग़लती की, जबकि किसी भी संभव ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, तब तक परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा' से उद्धृत

यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के साथ अनुकूल होने की कोशिश नहीं की, बल्कि कर्मठतापूर्वक व्यवस्था का इस हद तक अक्षरशः पालन किया कि—यीशु पर पुराने विधान की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए—निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुकूलता के मार्ग की खोज नहीं की? उनके दिमाग़ में पवित्रशास्त्र का एक-एक वचन घर कर गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं थे, बल्कि कठोरता से पवित्रशास्त्र के वचनों से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं थे, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। दरअसल वे बाइबल की रखवाली करने वाले कुत्ते थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए किया। इस प्रकार उन्होंने अपना भविष्य त्यागने और यीशु की निंदा करने के लिए उसकी मृत्यु के रूप में पापबलि देने को प्राथमिकता दी, क्योंकि यीशु पवित्रशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक वचन के नौकर नहीं थे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए' से उद्धृत

फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना

मरकुस 3:21-22 जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

प्रभु यीशु की फरीसियों को डाँट

मत्ती 12:31-32 इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

............

बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का और उसके द्वारा कही गई चीज़ों का मूल्यांकन यह था: "क्योंकि वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ... उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या शून्य में कल्पना करना नहीं था—उसके कार्यों के बारे में जो कुछ उन्होंने देखा और सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के बारे में उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो कि उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, किन्तु वह अहंकार जिसके साथ उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी उन्मत्त ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्वेषपूर्ण स्वभाव को भी उजागर कर दिया था। ये बातें जो उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कही थीं वे उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के कुरूप और द्वेषपूर्ण स्वभाव से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा या किया था उसके सार की खोज की। परन्तु जो कुछ उसने किया था उस पर उन्होंने बिना देखे, अधीरता से, सनक और जानबूझकर किए गए द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। यह यहाँ तक कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा को विवेकहीन तरीके से बदनाम करने की हद तक था। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "उसका चित ठिकाने नहीं है," "बालज़बूल" और "दुष्टात्माओं का सरदार।" अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने उस देह के कार्य को जिसे परमेश्वर के आत्मा ने पहना हुआ था पागलपन कहा। उन्होंने ना केवल बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि उन्होंने परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके प्रतिरोध का सार और परमेश्वर की ईशनिंदा पूरी तरह से शैतान के सार और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्मा के प्रतिरोध और परमेश्वर की निंदा के समान था। वे न केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते थे, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मनुष्यजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और हरकारे थे। उनकी ईशनिंदा का सार और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, परमेश्वर की परीक्षा लेने की उनकी कभी न खत्म होने वाली इच्छा थी। परमेश्वर के उनके प्रतिरोध का सार और उसके प्रति उनकी शत्रुता का रवैया, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था उसके लिए परमेश्वर ने एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया। यह पाप इस संसार और आने वाले संसार में, दोनों में अक्षम्य है, बिल्कुल वैसे ही जैसा कि पवित्रशास्त्र का निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

इस्राएल में "फरीसी" एक प्रकार की उपाधि हुआ करती थी। अब वह उसके बजाय एक ठप्पा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि फरीसी एक प्रकार के व्यक्ति के प्रतिनिधि बन गए हैं। इस प्रकार के व्यक्ति की क्या विशेषताएँ हैं? वे नारे लगाते हैं; वे ढोंग करने में, ठाट-बाट में, अपने असली आत्म को छिपाने में कुशल होते हैं, और वे महान कुलीनता, महान पवित्रता और ईमानदारी, महान निष्पक्षता और सम्मान का दिखावा करते हैं। नतीजतन, वे सत्य का ज़रा भी अभ्यास नहीं करते। वे कार्य कैसे करते हैं? वे धर्मग्रंथ पढ़ते हैं, उपदेश देते हैं, दूसरों को भलाई करने, बुराई न करने, परमेश्वर का विरोध न करने की शिक्षा देते हैं; वे प्रीतिकर बातें कहते हैं और दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करते हैं, किंतु जब दूसरों की पीठ फिरती है, तो वे चढ़ावे की चीज़ें चुरा लेते हैं। प्रभु यीशु ने कहा था कि वे "मच्छर तो छान डालते हैं, परंतु ऊँट निगल जाते हैं।" इसका मतलब यह है कि उनका सारा व्यवहार सतह पर तो अच्छा लगता है—वे आडंबरपूर्ण तरीके से नारेबाजी करते हैं, बड़े-बड़े सिद्धांत बोलते हैं, और उनके शब्द सुखद लगते हैं, लेकिन उनके कर्म अव्यवस्थित गड़बड़झाला होते हैं, पूरी तरह से परमेश्वर के प्रतिरोधी। उनके व्यवहार और बाह्य रूप सब ढोंग, सब धोखाधड़ी हैं; उनके दिलों में न तो सत्य के लिए ज़रा-सा भी प्रेम है, न ही सकारात्मक चीज़ों के लिए। वे सत्य से क्षुब्ध हैं, उस सबसे क्षुब्ध हैं जो परमेश्वर से आता है, और सकारात्मक चीजों से क्षुब्ध हैं। वे किस चीज़ से प्यार करते हैं? क्या वे निष्पक्षता और धार्मिकता से प्यार करते हैं? (नहीं।) तुम कैसे कह सकते हो कि वे इन चीज़ों से प्यार नहीं करते? (प्रभु यीशु काम करने और स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार फैलाने आया, फिर भी उन्होंने उसकी निंदा की।) अगर उन्होंने उसकी निंदा न की होती, तो क्या तुम यह कहने में सक्षम होते? प्रभु यीशु के कार्य करने के लिए आने से पहले, तुम किस आधार पर कह सकते थे कि उन्हें निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद नहीं है? तुम यह कह पाने में सक्षम नहीं रहे होगे, है ना? उनका सारा व्यवहार ढोंग है, और वे इस अच्छे व्यवहार का ढोंग दूसरों के विश्वास को ठगने के लिए करते हैं। क्या यह पाखंड और छल नहीं है? क्या ऐसे धोखेबाज सत्य से प्रेम कर सकते हैं? उनके इस अच्छे व्यवहार का छिपा हुआ उद्देश्य क्या है? उनके उद्देश्य का एक भाग दूसरों को ठगना है; दूसरा भाग दूसरों को धोखा देना, उन पर विजय पाना और उनसे अपनी आराधना करवाना, और अंत में, पुरस्कार पाना है। इतनी बड़ी धोखाधड़ी करने के लिए उनकी तकनीकें कितनी चतुर होंगी? तो, क्या ऐसे लोगों को निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद है? बेशक नहीं। वे हैसियत से प्यार करते हैं, वे प्रसिद्धि और संपत्ति से प्यार करते हैं, और वे पुरस्कार प्राप्त करना चाहते हैं। क्या वे लोगों के मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर के वचनों को व्यवहार में लाते हैं? बिलकुल नहीं। वे उनके ज़रा-से हिस्से को भी नहीं जीते; वे बस लोगों को धोखा देने और उन पर विजय पाने के लिए, अपनी हैसियत बचाने और प्रतिष्ठा मजबूत करने के लिए स्वांग रचते हैं और अपने को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करते हैं। एक बार जब ये चीजें हाथ में आ जाती हैं, तो वे इनका उपयोग पूँजी हासिल करने और आय के एक स्रोत के रूप में करते हैं। क्या यह घृणास्पद नहीं है? इसे उनके इन सभी व्यवहारों में देखा जा सकता है कि सत्य से प्रेम न करना ही उनका सार है, क्योंकि वे सत्य को कभी व्यवहार में नहीं लाते। इस बात का क्या संकेत है कि वे सत्य को व्यवहार में नहीं लाते? यह सबसे बड़ा संकेत था : प्रभु यीशु काम करने आया था और उसने जो कुछ कहा वह सही था, उसने जो कुछ कहा वह सत्य था। उन्होंने इन बातों के साथ कैसा व्यवहार किया? (उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।) क्या उन्होंने प्रभु यीशु के वचनों को इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे मानते थे कि वे गलत हैं, या उन्होंने यह जानते हुए भी उन्हें अस्वीकार किया कि वे सही हैं? (उन्होंने यह जानते हुए भी उन्हें अस्वीकार किया कि वे सही हैं।) और इसका क्या कारण हो सकता है? वे सत्य से प्रेम नहीं करते, और वे सकारात्मक चीजों से घृणा करते हैं। प्रभु यीशु ने जो कहा, वह सब बिना किसी त्रुटि के था, सही था, और हालाँकि उन्हें प्रभु यीशु के वचनों में उसके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कोई गलती नहीं मिली, फिर भी उन्होंने कहा, "क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं?" उन्होंने प्रभु यीशु के वचनों में दोष ढूँढ़ने की कोशिश की, ताकि उसके खिलाफ इस्तेमाल कर सकें, और कोई भी दोष न मिलने पर उन्होंने उसकी निंदा की, और फिर उन्होंने साजिश रची : "उसे सूली पर चढ़ा दो। या तो वह रहेगा या हम।" इस तरह वे प्रभु यीशु के खिलाफ खड़े हो गए। भले ही वे यह नहीं मानते थे कि प्रभु यीशु प्रभु है, वह एक अच्छा व्यक्ति तो था जिसने न तो सांसारिक व्यवस्था को तोड़ा और न ही मूसा की व्यवस्था को; फिर भी उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा क्यों की? उन्होंने प्रभु यीशु के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया? इससे यह देखा जा सकता है कि ये लोग कितने दुष्ट और दुर्भावनापूर्ण हैं—वे परम दुष्ट हैं! फरीसी अपना जो दुष्ट चेहरा उजागर करते हैं, वह उनके दयालुता के छद्मावरण से ज्यादा अलग नहीं हो सकता। ऐसे कई लोग हैं जो यह नहीं पहचान सकते कि उनका कौन-सा चेहरा असली है और कौन-सा नकली, फिर भी प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य ने उन सभी को प्रकट किया। फरीसी खुद को कितनी अच्छी तरह से छिपाते हैं, वे बाहर से कितने दयालु लगते हैं—अगर तथ्यों का खुलासा न हुआ होता, तो कोई भी यह देख पाने में सक्षम न होता कि असल में वे क्या हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे महत्वपूर्ण भाग सत्य को व्यवहार में लाना है' से उद्धृत

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अगला: 2. यह क्यों कहा जाता है कि धार्मिक पादरी और एल्डर सभी फरीसियों के मार्ग पर चल रहे हैं, और उनका सार क्या है?

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