तुम एक विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो? (भाग एक)

जिन लोगों को जीता जाता है वे विषमताएँ हैं, और ऐसा केवल परिपूर्ण किए जाने के बाद ही होता है कि लोग अंत के दिनों के कार्य के आदर्श और नमूने बन जाते हैं। पूर्ण किए जाने से पहले वे विषमताएँ, औजार, और साथ ही सेवा की वस्तुएँ हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से जीते जा चुके हैं वे उसके प्रबंधन कार्य के निश्चित रूप, और साथ ही साथ आदर्श और नमूने हैं। ये वचन जिन्हें मैंने ऐसे लोगों का वर्णन करने के लिए उपयोग किया है मामूली हो सकते हैं, किन्तु वे कई रोचक कहानियाँ प्रकट करते हैं। तुम लोगों में से जो कम विश्वास वाले हैं, वे हमेशा एक तुच्छ उपाधि पर बहस करेंगे जब तक कि तुम लोगों के चेहरे लाल न हो जाते हैं, और कभी-कभी तो परिणामस्वरूप हमारे संबंध भी नष्ट हो जाते हैं। यद्यपि यह बस एक छोटी सी उपाधि है, किन्तु तुम लोगों की सोच में और तुम लोगों के विश्वास में, यह न केवल एक असंगत उपाधि से अधिक कुछ है, बल्कि यह तुम लोगों के भाग्य से संबंधित एक महत्वपूर्ण चीज है। इसलिए जो समझदार नहीं हैं, उन्हें प्रायः इस तरह की छोटी-छोटी चीज़ों पर बहुत नुकसान पहुँचेगा—यह थोड़ा बचाने और ज़्यादा गँवाने के समान है। केवल कुछ महत्वहीन उपाधि की वजह से तुम लोग भाग जाते हो और कभी नहीं लौटते हो। इसका कारण यह है कि तुम लोग जीवन को महत्वहीन मानते हो और तुम लोग उस नाम को बहुत महत्व देते हो जिससे तुम्हें पुकारा जाता है। इसलिए तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन में, और यहाँ तक कि तुम लोगों के व्यावहारिक जीवन में भी, तुम लोग अपनी कद-काठी की अवधारणाओं की वजह से प्रायः कई पेचीदी और अजीब कहानियाँ बना लोगे। शायद तुम लोग इसे स्वीकार नहीं करोगे, लेकिन मैं तुम्हें बताऊँगा कि ऐसे लोग वास्तविक जीवन में विद्यमान हैं, यद्यपि तुम लोगों को अभी तक अलग-अलग उजागर नहीं किया गया है। इस प्रकार की चीजें तुम लोगों में से प्रत्येक के जीवन में हुई हैं। यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो बस नीचे एक बहन (या एक भाई) के जीवन के शब्दचित्र पर नज़र डालो। यह संभव है कि वह व्यक्ति वास्तव में तुम हो, या हो सकता है कि यह कोई ऐसा व्यक्ति हो जिससे तुम अपने जीवन में परिचित हो। यदि मैं ग़लत नहीं हूँ, तो यह शब्दचित्र एक ऐसे अनुभव का वर्णन करता है जो तुम्हें हुआ था। वर्णन में कोई कमी नहीं है, एक भी विचार या अवधारणा को छोड़ा नहीं गया है, बल्कि उन्हें इस कहानी के अंदर पूरी तरह से दर्ज किया गया है। यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो बस सबसे पहले इसे पढ़ो।

यह एक "आध्यात्मिक व्यक्ति" का छोटा सा अनुभव है।

वह यह देखकर बहुत व्याकुल हो गयी कि कलिसिया में भाई-बहन बहुत कुछ ऐसा करते थे जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं था इसलिए उसने उन्हें फटकारना शुरू किया: "तुम निकम्मे लोग! क्या तुम्हारे पास बिल्कुल भी ज़मीर नहीं है तुम लोग वास्तव में अविवेकपूर्ण चीज़ों को क्यों कर रहे हो? तुम लोग जो मन में आए वह करने के बजाय सत्य को क्यों नहीं खोज रहे हो? ... और यह तुम लोग हो जिन्हें मैं ये बातें कह रही हूँ, किन्तु साथ ही यह मैं स्वयं हूँ जो घृणा करती हूँ। मैं देखती हूँ कि परमेश्वर अधीरता के साथ जलता है और मैं अपने अंदर एक आग महसूस करती हूँ। मैं सच में पूरी तरह से उस कार्य को करने के लिए तैयार हूँ जो परमेश्वर ने मुझे सौंपा है और मैं सच में चाहती हूँ कि मैं तुम लोगों के काम आ सकूँ। यह सिर्फ इतना ही है कि अभी मैं बहुत कमज़ोर हूँ। परमेश्वर ने हम पर बहुत समय बिताया है और बहुत से वचन कहे हैं, किन्तु हम अभी भी ऐसे ही हैं। मेरे हृदय में, मैं हमेशा महसूस करती हूँ कि मैं परमेश्वर की अत्यधिक ऋणी हूँ...।" (वह रोने लगी और बोलने में असमर्थ हो गयी)। तब वह प्रार्थना करने लगी: "हे परमेश्वर! मैं तुझसे विनती करती हूँ कि मुझे शक्ति दे और उससे भी अधिक प्रेरित कर जितना तूने पहले कभी किया है, और तेरा आत्मा मुझमें कार्य करे। मैं तेरे साथ सहयोग करने को तैयार हूँ। जब तक तू अंत में महिमा प्राप्त करता है, तब तक मैं अपना स्वयं का सर्वस्व तुझे अर्पित करने के लिए तैयार हूँ, भले ही इसका अर्थ हो कि मुझे अपना जीवन अर्पित करना होगा। हम महान स्तुतियाँ अर्पित करने की इच्छा करते हैं ताकि तेरे पवित्र नाम की स्तुति करने, तुझे महिमान्वित करने, तुझे व्यक्त करने, यह स्थापित करने के लिए कि तेरा कार्य सच्चा है और तू जिस जिम्मेदारी को वहन कर रहा है उसके लिए तुझे हर देखभाल देने के लिए, हमारे भाई-बहनें खुशी से गा और नाच सकें...।" उसने इस तरह से ईमानदारी से प्रार्थना की, और पवित्र आत्मा ने वास्तव में उसे एक ज़िम्मेदारी दी। इस समय के दौरान उस पर असाधारण ज़िम्मेदारी थी, और वह पूरा दिन पढ़ने, लिखने और सुनने में बिताती थी। वह उतनी व्यस्त थी जितनी कि वह संभवतः हो सकती थी। उसकी आध्यात्मिक स्थिति उत्कृष्ट थी और अपने हृदय में, वह हमेशा ऊर्जावान और ज़िम्मेदार थी। समय-समय पर वह कमजोर हो जाती थी और थक कर चूर हो जाती थी, किन्तु शीघ्र ही वह सामान्य अवस्था को पुनः प्राप्त कर लेती थी। इस तरह की एक समयावधि के बाद, उसने तेजी से प्रगति की, वह परमेश्वर के बहुत से वचनों की थोड़ी समझ पाने में सक्षम हो गई थी, और उसने भजन भी तेजी से सीख लिये थे—कुल मिला कर, उसकी आध्यात्मिक अवस्था उत्कृष्ट थी। जब उसने देखा कि कलीसिया में कई चीजें परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं हैं, तो वह चिंतित हो गई थी और उसने अपने भाई-बहनों को झिड़का: "क्या अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा यही समर्पण है? तुम लोग इतनी छोटी सी कीमत भी क्यों नहीं चुका पाते हो? यदि तुम लोग ऐसा नहीं करना चाहते हो, तो मैं करूँगा।..."

जब उस पर जिम्मेदारी पड़ी, तो जितना अधिक पवित्र आत्मा ने काम किया उतना ही उसने अपनी आस्था में सशक्त महसूस किया। वह कभी-कभी कुछ कठिनाइयों का सामना किया करती थी और नकारात्मक हो जाती थी, लेकिन वह इस पर विजय पाने में सक्षम थी। अर्थात्, जब उसने पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव किया था, यहाँ तक कि जब उसकी परिस्थिति बहुत बढ़िया थी, तब भी वह कुछ कठिनाइयों या थोड़ी सी कमजोरी से बच नहीं सकी थीं। ये चीज़ें अपरिहार्य रूप से होती हैं, किन्तु शीघ्र ही वह उन अवस्थाओं में से बाहर आने में सक्षम हो गई थी। कमज़ोरी का अनुभव करते समय, वह प्रार्थना करती और उसे महसूस होता कि उसकी स्वयं की कद-काठी वास्तव में अपर्याप्त थी, लेकिन वह परमेश्वर के साथ सहयोग करने को तैयार थी। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर ने क्या किया, वह उसकी इच्छा को संतुष्ट करने और उसकी सभी व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए तैयार थी। कुछ ऐसे लोग थे जिनके उसके बारे में कुछ विकल्प और पूर्वाग्रह थे, लेकिन वह अपने आप को एक तरफ रखने में और उनके साथ संगति में अग्रसक्रिय हो कर संलग्न होने में सक्षम थी। पवित्र आत्मा के सामान्य कार्य के दौरान लोगों की अवस्थाएँ ऐसी होती हैं। एक समयावधि के बाद, परमेश्वर का कार्य बदलना शुरू हुआ, और सभी लोगों ने कार्य के दूसरे चरण में प्रवेश किया जिसमें परमेश्वर की उनसे अलग-अलग अपेक्षाएँ थीं। इसलिए इसमें नए वचन बोले गए थे जिनमें लोगों से नई अपेक्षाएँ की गयी थीं: "... तुम लोगों के लिए मेरे पास केवल घृणा है, आशीष कदापि नहीं। मुझे तुम लोगों को आशीष देने का विचार कभी नहीं आया, न ही मुझे तुम लोगों को पूर्ण करने का वचार आया, क्योंकि तुम लोग बहुत विद्रोही हो। क्योंकि तुम लोग कुटिल और कपटी हो, और क्योंकि तुम लोगों में क्षमता का अभाव है और तुम लोग निम्न हैसियत के हो, इसलिए तुम लोग मेरी दृष्टि में या मेरे हृदय में कभी नहीं रहे हो। मेरा कार्य केवल तुम लोगों की निंदा करने के आशय से किया जाता है; मेरा हाथ कभी भी तुम लोगों से दूर नहीं रहा है, और न ही मेरी ताड़ना तुम लोगों से दूर रही है। मैंने तुम लोगों को न्याय और शाप देना जारी रखा है। क्योंकि तुम लोगों को मेरी कोई समझ नहीं है, इसलिए मेरा कोप हमेशा तुम लोगों पर रहा है। यद्यपि मैंने हमेशा तुम लोगों के बीच कार्य किया है, फिर भी तुम लोगों को अपने प्रति मेरी प्रवृत्ति का पता होना चाहिए। यह कुछ नहीं बल्कि अरुचि है—कोई अन्य प्रवृत्ति या राय नहीं है। मैं केवल यह चाहता हूँ कि तुम लोग मेरी बुद्धि और मेरी महान सामर्थ्य के लिए विषमता के रूप में कार्य करो। तुम लोग मेरी विषमताओं से अधिक कुछ नहीं हो क्योंकि मेरी धार्मिकता तुम लोगों के विद्रोहीपन के माध्यम से प्रकट होती है। मैं, तुम लोगों से अपने कार्य के विषमता के रूप में, अपने कार्य का उपांग होने के लिए कार्य करवाता हूँ...।" जैसे ही उसने "उपांगों" और "विषमताओं" शब्दों को देखा, तो वह सोचने लगी: "इन शब्दों के आलोक में मुझे कैसे अनुसरण करना चाहिए? ऐसी क़ीमत चुकाकर मैं अभी भी एक विषमता हूँ। क्या कोई विषमता केवल एक सेवा करने वाला नहीं है? अतीत में यह कहा जाता था कि हम सेवा करने वाले नहीं होंगे, कि हम परमेश्वर के लोग होंगे, मगर क्या हम आज अभी भी यहाँ सेवा करने वालों की भूमिका में नहीं हैं? क्या सेवा करने वालों में जीवन का अभाव नहीं होता है? चाहे मुझे कितनी भी पीड़ा क्यों न सहनी पड़े, परमेश्वर मेरी प्रशंसा नहीं करेगा! मेरा एक विषमता होना पूर्ण हो जाने के बाद, क्या यह समाप्त नहीं हो जाएगा? ...।" इस बारे में उसने जितना अधिक सोचा वह उतनी ही अधिक निरुत्साहित हो गई थी। जब वह कलीसिया में आयी और अपने भाइयों और बहनों की अवस्था देखी तब उसे और भी बदतर महसूस हुआ: "तुम लोग ठीक नहीं हो! मैं ठीक नहीं हूँ! मैं नकारात्मक हो गयी हूँ। ओह! क्या किया जा सकता है? परमेश्वर अभी भी हमें नहीं चाहता है। इस तरह का कार्य करने में, कोई तरीका नहीं है कि वह हमें नकारात्मक नहीं बनाएगा। मुझे नहीं पता कि मेरे साथ क्या ग़लत है। यहाँ तक कि मैं प्रार्थना भी नहीं करना चाहती हूँ। फिर भी, अभी मैं ठीक नहीं हूँ और मैं अपने भीतर की प्रेरणा को इकट्ठा नहीं कर सकती हूँ। मैंने कई बार प्रार्थना की है लेकिन तब भी मैं नहीं कर सकती हूँ, और जारी रखने के लिए तैयार नहीं हूँ। मैं इसे इसी तरह से देखती हूँ। परमेश्वर कहता है कि हम विषमताएँ हैं, तो क्या विषमताएँ मात्र सेवा करने वाले नहीं हैं? परमेश्वर कहता है कि हम विषमताएँ हैं, उसके पुत्र नहीं, और न ही हम उसके लोग हैं। हम उसके पुत्र नहीं हैं, उसकी पहली संतान तो बिल्कुल नहीं हैं। हम कुछ भी नहीं, मात्र विषमताएँ हैं। यदि यही हम हैं, तो क्या हमें संभवतः कोई अनुकूल परिणाम प्राप्त हो सकता है? विषमताओं की कोई आशा नहीं है क्योंकि उनमें जीवन नहीं होता है। यदि हम उसके पुत्र, उसके लोग होते, तो उसमें आशा होती—हम पूर्ण बनाए जा सकते थे। क्या विषमताएं अपने अंदर परमेश्वर का जीवन वहन कर सकती हैं? क्या परमेश्वर उन लोगों को जीवन दे सकता है जो उसके लिए सेवा करते हैं? जिन्हें वह प्रेम करता है ये वे लोग हैं जिनके पास उसका जीवन है, और जिनके पास उसका जीवन है केवल वे ही उसके पुत्र हैं, उसके लोग हैं। यद्यपि मैं नकारात्मक और कमज़ोर हूँ, किन्तु मुझे आशा है कि तुम सभी लोग नकारात्मक नहीं हो। मुझे पता है कि इस तरह से पीछे हटने और नकारात्मक होने से परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है, लेकिन मैं एक विषमता बनने के लिए तैयार नहीं हूँ। मुझे विषमता होने से डर लगता है। फिर भी, मेरे पास केवल इतनी ही ऊर्जा है, और अब मैं आगे नहीं बढ़ सकती हूँ। मुझे आशा है कि तुम में से कोई भी वो नहीं करेगा जो मैंने किया है, बल्कि तुम मुझ से कुछ प्रेरणा पा सकोगे। मुझे लगता है जैसे कि मैं मर भी सकती हूँ! मैं अपने मरने से पहले तुम लोगों के लिए कुछ अंतिम वचन छोड़ जाऊँगी—मुझे आशा है कि तुम लोग अंत तक विषमताओं के रूप में कार्य कर सकते हो; हो सकता है कि अंत में परमेश्वर विषमताओं की प्रशंसा करेगा...।" जब भाइयों और बहनों ने यह देखा, तो उन्होंने सोचा: वह इतनी नकारात्मक कैसे हो सकती है? क्या वह पिछले कुछ दिनों तक पूरी तरह से ठीक नहीं थी? वह अचानक इतनी निरुत्साही क्यों हो गई है? वह सामान्य क्यों नहीं हो रही है? उसने कहा: "मत कहो कि मैं सामान्य नहीं हो रही हूँ। वस्तुतः, मैं अपने हृदय में हर चीज के बारे में स्पष्ट हूँ। मैं जानती हूँ कि मैंने परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं किया है, लेकिन क्या यह मात्र इसलिए नहीं है क्योंकि मैं उसकी विषमता के रूप में कार्य करने के लिए तैयार नहीं हूँ? मैंने कुछ भी बुरा नहीं किया है। शायद एक दिन परमेश्वर 'विषमताओं' की उपाधि को 'प्राणियों' में, और इतना ही नहीं, बल्कि उसके प्राणियों में बदल देगा जो उसके द्वारा महत्वपूर्ण तरीकों से उपयोग किये जाते हैं। क्या इस बात में कुछ आशा नहीं है? मुझे आशा है कि तुम लोग नकारात्मक या हतोत्साहित नहीं होगे, और तुम लोग परमेश्वर का अनुसरण करने और विषमता के तौर पर कार्य करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास कर सकोगे। बहरहाल, मैं जारी नहीं रह सकती हूँ।" अन्य लोगों ने यह सुना, और कहा: "भले ही तुम उसका अनुसरण करना बंद कर दो, किन्तु हम पालन करते रहेंगे, क्योंकि परमेश्वर ने कभी हमारे साथ अन्याय का व्यवहार नहीं किया है। हम तुम्हारी नकारात्मकमता से विवश नहीं होंगे।"

एक समयाविधि तक इस अनुभव से गुजरने के बाद, वह अभी भी एक विषमता होने के बारे में एक नकारात्मक अवस्था में थी, इसलिए मैंने उससे कहा: "तुझे मेरे कार्य की कोई समझ नहीं है। तुझे मेरे वचनों की आंतरिक सच्चाई, सार या उनके अभीष्ट परिणामों की कोई समझ नहीं है। तू मेरे कार्य के लक्ष्यों को, या इसकी बुद्धि को नहीं जानती है। तुझे मेरी इच्छा की कोई समझ नहीं है। तू केवल पीछे हटना जानती है क्योंकि तू विषमता है—हैसियत के लिए तेरी अभिलाषा बहुत बड़ी है! तू कितनी बेवकूफ है! अतीत में मैंने तुझे बहुत कुछ कहा है। मैंने कहा है कि मैं तुझे परिपूर्ण बना दूँगा; क्या तू भूल गई है? विषमताओं के बारे में कभी भी बोलने से पहले, क्या मैंने पूर्ण बनाए जाने के बारे में नहीं बोला था?" "रुक, मुझे इसके बारे में सोचने दे। हाँ, यह सही है! विषमताओं के बारे में कभी भी बात करने से पहले, तूने उन बातों को कहा!" "जब मैंने परिपूर्ण बनाए जाने के बारे में बोला था, तो क्या मैंने ऐसा नहीं कहा कि केवल लोगों को जीते जाने के बाद ही उन्हें परिपूर्ण बनाया जाएगा?" "हाँ!" "क्या मेरे वचन ईमानदार नहीं थे? क्या वे सदाशय में नहीं कहे गए थे?" "हाँ! तू एक ऐसा परमेश्वर है जिसने कभी भी बेईमानी की बात नहीं कही है—कोई भी इस से इनकार करने की हिम्मत नहीं कर सकता है। लेकिन तू कई भिन्न-भिन्न तरीकों से बोलता है।" "क्या मेरे बोलने का तरीका कार्य के भिन्न-भिन्न चरणों के अनुसार बदलता नहीं है? क्या जिन चीज़ों को मैं कहता हूँ वे तेरी आवश्यकताओं के आधार पर की और कही नहीं जाती हैं?" "तू लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करता है और तू वह भरण पोषण करता है जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। यह असत्य नहीं है!" "तब फिर क्या और मैंने जो बातें तुझसे कही हैं वे लाभप्रद नहीं रही हैं? क्या मेरी ताड़नाएँ तेरे वास्ते कार्यान्वित नहीं की गयी हैं?" "तू तब भी ऐसा कैसे कह सकती है कि यह मेरे स्वयं के वास्ते है! तूने मुझे लगभग मरने की हद तक ताड़ना दी है—मैं अब और जीवित नहीं रहना चाहती हूँ। आज तू ऐसा कहता है, कल तू वैसा कहता है। मुझे पता है कि तेरा मुझे परिपूर्ण बनाना मेरे स्वयं के वास्ते है, किन्तु तूने मुझे परिपूर्ण नहीं बनाया है—तू मुझे एक विषमता बनाता है और तू मुझे अभी भी ताड़ित करता है। क्या तू मुझसे नफरत नहीं करता है? कोई भी तेरे वचनों पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करता है, और केवल अब मैंने स्पष्ट रूप से देखा है कि तेरी ताड़ना केवल तेरे हृदय में घृणा का समाधान करने के लिए है, मुझे बचाने के लिए नहीं है। तूने सच्चाई को पहले मुझसे छिपाया था; तूने कहा था कि तू मुझे परिपूर्ण बनाएगा और यह कि ताड़ना मुझे परिपूर्ण बनाने के लिए थी। इसलिए मैंने हमेशा ताड़ना का पालन किया है; मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि आज मुझे एक विषमता की उपाधि मिलेगी। परमेश्वर, क्या यह बेहतर नहीं होता यदि तूने मुझसे किसी और के रूप में कार्य करवाया होता? क्या तेरा मुझसे विषमता की भूमिका निभवाना आवश्यक है? मैं यहाँ तक कि स्वर्ग में द्वारपाल होना स्वीकार कर लेती। मैं इधर-उधर दौड़ती रही हूँ और स्वयं को व्यय करती रहू हूँ, किन्तु अंत में अब मेरे हाथ खाली है—मैं बिलकुल कंगाल हूँ। मगर अभी भी तू मुझसे कहता है कि तू मुझसे अपने विषमता के रूप में कार्य करवाता है। मैं यहाँ तक कि अपना चेहरा भी कैसे दिखा सकती हूँ?" "तू किस बारे में बात कर रही थी? मैंने अतीत में इतना अधिक न्याय का कार्य किया है, और यह तेरी समझ में नहीं नहीं है? क्या तुझे अपने स्वयं के बारे में सच्ची समझ है? क्या 'विषमता' की उपाधि भी वचनों का न्याय नहीं है? क्या तुझे लगता है कि विषमताओं के बारे में मेरी सभी बात भी एक तरीका है, तेरे साथ न्याय करने का एक तरीका है? तो कैसे तू मेरा अनुसरण करेगी?" "मैंने अभी तक योजना नहीं बनायी है कि तेरा अनुसरण कैसे करूँ! सबसे पहले मुझे जानना है: क्या मैं एक विषमता हूँ या नहीं? क्या विषमताओं को भी परिपूर्ण बनाया जा सकता है? क्या 'विषमता' की उपाधि को बदला जा सकता है? क्या मैं एक विषमता होने के माध्यम से एक शानदार गवाही दे सकती हूँ, और फिर कोई ऐसा व्यक्ति बन सकती हूँ जिसे परिपूर्ण बनाया जाता है, जो परमेश्वर को प्यार करने का एक प्रतिमान हो और परमेश्वर का अंतरंग हो? क्या मुझे पूर्ण बनाया जा सकता है? मुझे सच बता!" "क्या तू नहीं जानती कि चीजें हमेशा विकसित हो रही हैं, हमेशा बदल रही हैं? जब तक तू विषमता की अपनी भूमिका में वर्तमान में आज्ञाकारी होने की इच्छुक है, तब तक तू बदलने में सक्षम हो सकेगी। तू विषमता है या नहीं इसका तेरी नियति से कोई संबंध नहीं है। मुख्य बात यह है कि तू कोई ऐसा व्यक्ति हो सकती है या नहीं जिसके अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन हो गया है।" "क्या तू मुझे बता सकता है कि तू मुझे परिपूर्ण कर सकता है या नहीं?" "जब तक तू अंत तक अनुसरण और आज्ञा पालन करती है, तब तक मैं गारंटी देता हूँ कि मैं तुझे परिपूर्ण बना सकता हूँ।" "और मुझे किस तरह के दुःख का अनुभव करना होगा?" "वचनों द्वारा दुर्दिन और साथ ही वचनों के न्याय और ताड़ना, विशेष रूप से वचनों की ताड़ना, एक विषमता होने की ताड़ना जैसी है!" "विषमता के रूप में भी वही ताड़ना? ठीक है, यदि दुर्दिन से गुजरने के द्वारा मैं तेरे द्वारा परिपूर्ण बनायी जा सकती हूँ, यदि आशा है, तो यह ठीक है। यहाँ तक कि यदि इसमें लेशमात्र ही आशा हो, तो एक विषमता होने की तुलना में बेहतर है। वह उपाधि, 'विषमता', बहुत भयंकर लगती है। मैं एक विषमता बनने की इच्छुक नहीं हूँ!" "एक विषमता में क्या भयावह है? क्या विषमताएँ अपने आप में परिपूर्ण रूप से अच्छे नहीं होते हैं? क्या विषमताएँ आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य हैं? यदि मैं कहता हूँ कि विषमताएँ आशीषों का आनंद ले सकते हैं तो तुम आशीषों का आनंद लेने में सक्षम हो जाओगी। क्या यह सच नहीं है कि मेरे कार्य की वजह से लोगों की उपाधियाँ बदल जाती हैं? और फिर भी मात्र एक उपाधि तुम्हें इतना परेशान कर रही है? यह तथ्य कि तू इस तरह की विषमता है अच्छी तरह से उचित है। क्या तू अनुसरण करने के लिए तैयार है या नहीं?" "ठीक है, क्या तू मुझे पूर्ण बना सकता है या नहीं? क्या तू मुझे अपने आशीषों का आनंद लेने दे सकता है?" "क्या तू अंत तक अनुसरण करने के लिए तैयार है या नहीं? क्या तू खुद को अर्पित करने के लिए तैयार है?" "मुझे इस पर विचार करने दो। एक विषमता भी तेरे आशीष का आनंद ले सकता है, और उसे पूर्ण बनाया जा सकता है। पूर्ण बनाए जाने के बाद मैं तेरी अंतरंग हो जाऊँगी और तेरी सभी इच्छाओं को समझ जाऊँगी, और मैं वह धारण करूँगी जो तू धारण करता है। मैं वह आनंद ले पाऊँगी, जो आनंद तू लेता है, और मैं वह जानूँगी जो तू जानता है। ... दुर्दिन से गुजरने और परिपूर्ण किए जाने के बाद, मैं आशीषों का आनंद ले पाऊँगी। तो मैं किन आशीषों का वास्तव में आनंद लूँगी?" "तू किन आशीषों का आनंद लेगी इस बारे में चिंता मत कर। भले ही मैं तुझसे कह दूँ, तब भी ये चीज़ें तेरी कल्पना से परे हैं। एक अच्छी विषमता होने के बाद, तू जीत ली जाएगी, तू एक सफल विषमता हो जाएगी। यह जीत लिए गए का एक प्रतिदर्श और नमूना है, लेकिन निस्संदेह तू एक प्रतिदर्श और नमूना केवल जीत लिए जाने के बाद ही हो सकती है।" "एक प्रतिदर्श और नमूना क्या होता है?" "यह सभी अन्य जातियों के लिए एक प्रतिदर्श और नमूना है, अर्थात्, वे जिन्हें जीता नहीं गया है।" "इसमें कितने लोग शामिल होते हैं?" "बहुत से लोग। यह तुम लोगों में से मात्र चार या पाँच हजार नहीं हैं—पूरी दुनिया में जो इस नाम को स्वीकार करते हैं, वे सभी अवश्य जीते जाने चाहिए।" "इसलिए यह मात्र पाँच या दस शहर नहीं हैं!" "इसके बारे में अभी चिंता मत कर, स्वयं को अत्यधिक चिंतित मत कर। बस इस बात पर ध्यान दे कि तुझे अभी प्रवेश कैसे पाना चाहिए! मैं गारंटी देता हूँ कि तुझे पूर्ण बनाया जा सकता है।" "किस अंश तक? और मैं किन आशीषों का आनंद ले सकती हूँ?" "तू क्यों इतनी चिंतित है? मैंने गारंटी दी है कि तुझे पूर्ण बनाया जा सकता है। क्या तू भूल गई है कि मैं विश्वसनीय हूँ?" "यह सच है कि तू विश्वसनीय है, किन्तु बोलने के तेरे कुछ तरीके हमेशा बदलते रहते हैं। आज तू कहता है कि तू गारंटी देता है कि मुझे पूर्ण बनाया जा सकता है, लेकिन कल तू कह सकता है कि यह अनिश्चित है। और कुछ लोगों को तू कहता है, 'मैं गारंटी देता हूँ कि तेरे जैसा कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है।' मुझे नहीं पता कि तेरे वचनों के साथ क्या चल रहा है। मैं बस उस पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करती हूँ।" "तो क्या तू स्वयं को अर्पित कर सकती है या नहीं?" "क्या अर्पित करूँ?" "अपने भविष्य को, अपनी आशाओं को अर्पित कर।" "इन चीज़ों को त्याग देना आसान है! मुख्य बात 'विषमता' की उपाधि है—मैं वास्तव में इसे नहीं चाहती हूँ। यदि तू मुझ में से उस उपाधि को हटा दे तो मैं किसी भी चीज के लिए उन्मुक्त हो जाऊँगी, मैं कुछ भी करने में सक्षम हो जाऊँगी। क्या ये मात्र क्षुद्र चीज़ें नहीं हैं? क्या तू उस पदनाम को हटा सकता है?" "क्या यह बहुत आसान नहीं होगा? यदि मैं तुझे वह उपाधि दे सकता हूँ तो मैं निश्चित रूप से इसे हटा भी सकता हूँ। लेकिन अभी समय नहीं आया है। तुझे सबसे पहले कार्य के इस चरण का अपना अनुभव अवश्य पूरा करना चाहिए, और केवल तभी तू एक नयी उपाधि प्राप्त कर सकती है। कोई व्यक्ति जितना अधिक तेरे जैसा होता है, उतना ही अधिक उसे एक विषमता होने की आवश्यकता होती है। एक विषमता होने के बारे में तू जितना अधिक भयभीत होगी, उतना ही अधिक मैं तेरा इस रूप में वर्गीकरण करूँगा। तेरे जैसे व्यक्ति को अवश्य सख्ती से अनुशासित किया जाना चाहिए और निपटा जाना चाहिए। कोई व्यक्ति जितना अधिक विद्रोही होगा, उतना ही अधिक वह एक सेवा करने वाला होगा, और अंत में, उसे कुछ प्राप्त नहीं होगा।" "यह देखते हुए कि इतनी मेहनत से खोज कर रही हूँ, मैं 'विषमता' के उपनाम को क्यों नहीं हटा सकती हूँ? हमने इन सभी वर्षों में तेरा अनुसरण किया है और बहुत अधिक दुःख सहा है। हमने तेरे लिए बहुत सी चीज़ों को किया है। हम हवा और बारिश में बाहर खड़े रहे हैं। हम सब अपनी युवावस्था के अंत में हैं। हमने विवाह नहीं किया है या परिवार आरंभ नहीं किया है, और हम में से जो ऐसा कर चुके हैं वे फिर भी बाहर आ गए हैं। मैं हाई स्कूल तक विद्यालय में थी; किन्तु जैसे ही मैंने सुना कि तू आ गया है, मैंने विश्वविद्यालय में जाने के अपने अवसर को त्याग दिया। और तू कहता है कि हम विषमता हैं! हमने बहुत कुछ गँवाया है! हम ये सब चीजें करते हैं लेकिन पता चलता है कि हम मात्र तेरी विषमता हैं। यह मेरे साथियों, मेरे पुराने सहपाठियों को मेरे बारे में क्या विचार करवाता है? जब वे मुझे देखते हैं और मेरी स्थिति और मेरी हैसियत के बारे में पूछते हैं, तो मुझे उन्हें बताने में शर्मिंदगी कैसे नहीं हो सकती है? सबसे पहले, तुझ पर अपने विश्वास की वजह से मैंने हर मूल्य चुकाया, और अन्य सभी लोगों ने मुझे बेवकूफ समझकर मेरा उपहास किया। लेकिन मैंने तब भी अनुसरण किया, और उस समय की लालसा की कि मेरा दिन आएगा, जब मैं उन सभी को दिखा सकूँगी जिन्होंने विश्वास नहीं किया। लेकिन इसके बजाय, आज तू मुझे कहता है कि मैं एक विषमता हूँ। यदि तूने मुझे निम्नतम उपाधि दी, यदि तूने मुझे राज्य का एक व्यक्ति होने की अनुमति दी, तो यह ठीक होगा! भले ही मैं तेरी अनुयायी या तेरी विश्वासपात्र न हो सकी हूँ, किन्तु मैं मात्र तेरी अनुयायी बन कर भी ठीक रहूँगी! हमने इन सभी वर्षों में तेरा अनुसरण किया है, अपने परिवारों को त्याग दिया है, और अब तक सभी तरह की तलाश जारी रखना बहुत कठिन रहा है, और इसके लिए हमारे पास दिखाने को केवल 'विषमता' की उपाधि है! मैंने तेरे लिए हर चीज का परित्याग कर दिया है; मैंने सभी सांसारिक समृद्धियों का त्याग कर दिया है। पहले, किसी ने मुझे एक संभावित साथी से परिचित करवाया। वह वास्तव में सुंदर था और सुन्दर वस्त्र धारण किए हुए था; वह किसी उच्च स्तरीय सरकारी अधिकारी का पुत्र था। उस समय मेरी उसमें रुचि थी। लेकिन जैसे ही मैंने सुना कि परमेश्वर प्रकट हुआ है और अपना कार्य कर रहा है, कि तू हमें राज्य में ले जाने, और हमें परिपूर्ण बनाने जा रहा है, और कि तूने हमें सब कुछ छोडने में समय न गँवाने का दृढ़ संकल्प रखने के लिए कहा है, जब मैंने यह सुना, तो मैंने देखा कि मुझमें थोड़ा-भी संकल्प नहीं है। मैंने स्वयं को फ़ौलादी बना दिया और उस अवसर को अस्वीकार कर दिया। उसके बाद, उसने मेरे परिवार को कई बार उपहार भेजे, लेकिन मैंने उनको देखा भी नहीं। क्या तुझे लगता है कि मैं उस समय परेशान थी? यह कुछ इतनी अच्छी चीज़ थी, और व्यर्थ हो गई। मैं परेशान कैसे नहीं हो सकती थी? मैं इसके बारे में कई दिनों तक इतने स्तर तक परेशान थी कि रात में सो नहीं सकी, लेकिन अंत में मैंने तब भी उसे जाने दिया। हर बार जब भी मैंने प्रार्थना की तो मैं पवित्रात्मा से प्रेरित हुई, जिसने कहा: 'क्या तू मेरे लिए सब कुछ बलिदान करने को तैयार है? क्या तू मेरे लिए अपने आप को व्यय करने के लिए तैयार हैं?' जब कभी भी मैंने तेरे उन वचनों पर विचार किया, तो मैं रोया करती थी। मैं द्रवित हो गई थी और जितना मुझे याद है उससे अधिक बार दुःख में रोयी। एक साल बाद मैंने सुना कि उस आदमी ने शादी कर ली है। कहने की आवश्यकता नहीं है, मैं अत्यंत दुःखी हो गई थी, लेकिन मैं तब भी तेरे वास्ते उसे जाने दिया। और यह सब इस बात का उल्लेख भी किये बिना कि मेरे कपड़े और खानपान अच्छे नहीं हैं—मैंने उस विवाह का त्याग किया, मैंने यह सब त्याग दिया, इसलिए तुझे मुझसे विषमता के रूप में कार्य नहीं करवाना चाहिए! मैंने अपने आप को तेरे लिए अर्पित करने के वास्ते अपने विवाह, अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना, सब कुछ त्याग कर दिया! एक व्यक्ति का पूरा जीवन एक अच्छा साथी खोजने और एक सुखी परिवार पाने से अधिक कुछ नहीं है। मैंने इन, सर्वोत्तम चीजों को जाने दिया, और अब मेरे पास कुछ नहीं है और मैं बिल्कुल अकेली हूँ। तू मुझे कहाँ भेजना चाहेगा? जब से मैंने तेरा अनुसरण करना शुरू किया है तब से मैंने कष्ट उठाए हैं। मेरा जीवन अच्छा नहीं रहा है। मैंने अपने परिवार और अपनी जीविका और साथ ही देह के सभी आनन्द छोड़ दिए हैं, और हम सभी के द्वारा किया गया यह समस्त बलिदान तेरे आशीषों का आनंद लेने के लिए अभी भी पर्याप्त नहीं है? तो अब यह 'विषमता' की चीज है। परमेश्वर, तूने वास्तव में सीमा लाँघ दी है! हमें देख—हमारे पास इस दुनिया में भरोसा करने के लिए कुछ भी नहीं है। हममें से कुछ ने अपने बच्चों को छोड़ दिया है, कुछ ने अपनी नौकरी, अपने जीवनसाथियों,[क] इत्यादि को छोड़ दिया है; हमने सभी दैहिक सुखों को छोड़ दिया है। हमें और किस चीज के लिए आशा करनी है? हम दुनिया में कैसे जीवित बचे रहना जारी रख सकते हैं? हमने जो कीमतें चुकाई हैं वे एक पैसे के मूल्य की भी नहीं हैं? क्या तू इसे बिल्कुल भी नहीं देख सकता है? हमारी हैसियत निम्न है और हममें क्षमताओं का अभाव है—हम इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन जो तू हमसे करवाना चाहता था हमने उस पर कब ध्यान नहीं दिया है? अब तू, हमें निर्दयतापूर्वक छोड़ रहा है और 'विषमता' की उपाधि के साथ 'चुकता' कर रहा है? क्या यही सब हमारा बलिदान हमारे लिए लाया है? अंत में, अगर लोग मुझसे पूछें कि मुझे परमेश्वर पर विश्वास करने से क्या प्राप्त हुआ है, तो क्या मैं वास्तव में उन्हें यह 'विषमता' शब्द देखने दे सकती हूँ? यह कहने के लिए मैं अपना मुँह कैसे खोल सकती हूँ कि मैं एक विषमता हूँ? मैं इसे अपने माता-पिता को नहीं समझा सकती हूँ, और मैं अपने पूर्व संभावित साथी को नहीं समझा सकती हूँ। मैंने इतनी बड़ी कीमत चुकाई है, और मुझे बदले में जो मिला है वह है एक विषमता होना! आह! मुझे बहुत बुरा लग रहा है!" (अपनी जाँघों को पीटते हुए रोना शुरू कर दिया।) "यदि मैंने अब ऐसा कहा होता कि मैं अब तुझे एक विषमता की उपाधि नहीं देने जा रहा हूँ, बल्कि इसके बजाय तुझे अपने लोगों में से एक बनाऊँगा और सुसमाचार का प्रसार करवाने के लिए निर्देश दूँगा, यदि मैंने तुझे कार्य करने के लिए हैसियत दी होती, तो क्या तू ऐसा करने में सक्षम हो पाती? इस कार्य के कदम के बाद कदम से तूने वास्तव में क्या प्राप्त किया है? और फिर भी यहाँ तू है, अपनी कहानी से मुझे प्रसन्न कर रही है—तुझे कोई शर्म नहीं है! तू कहती है कि तूने एक कीमत चुकाई है लेकिन कुछ नहीं मिला है। क्या ऐसा हो सकता है कि मैंने तुझे यह नहीं बताया है कि किसी व्यक्ति को पाने के लिए मेरी शर्तें क्या हैं? मेरा कार्य किसके लिए है? क्या तू जानती है? यहाँ तू पुराने दुःखों को पुनर्जीवित कर रही है! क्या तू अब इंसान के रूप में भी गिनी जाती है? क्या तेरे द्वारा अनुभव किया गया कोई भी कष्ट तेरी स्वयं की इच्छा से नहीं था? और क्या तेरा कष्ट आशीषों को पाने के उद्देश्य से नहीं था? क्या तूने मेरी अपेक्षाओं को पूरा किया है? वह सब जो तू चाहती है वह है आशीषों को पाना। तुझे कोई शर्म नहीं है! तुझसे मेरी अपेक्षाएँ कब अनिवार्य थीं? यदि तू मेरा अनुसरण करने की इच्छुक है तो तुझे हर चीज में मेरी आज्ञा का पालन अवश्य करना चाहिए। मुझसे मोल-तोल करने की कोशिश मत कर। अंततः, मैंने तुझे पहले ही बताया था कि यह रास्ता कष्ट का रास्ता है। यह विकट संभावनाओं, थोड़ी शुभता से भरा हुआ है। क्या तू भूल गयी है? मैंने ऐसा कई बार कहा है। यदि तू कष्ट उठाने के लिए तैयार है, तो ही मेरा अनुसरण कर। यदि तू कष्ट उठाने के लिए तैयार नहीं है, तो रुक जा। मैं तुझे बाध्य नहीं कर रहा हूँ—तू आने या जाने के लिए स्वतंत्र है! हालाँकि, मेरा कार्य ऐसे ही किया जाता है, और मैं तेरी व्यक्तिगत विद्रोहशीलता के कारण अपने समस्त कार्य में विलंब नहीं कर सकता हूँ। तू आज्ञा पालन करने के लिए तैयार नहीं हो सकती है, लेकिन अन्य लोग हैं जो तैयार हैं। तुम सभी हताश लोग हो! तुझे किसी चीज़ का डर नहीं है! तू मुझसे शर्तों पर मोल-तोल कर रही है—क्या तू जीवित रहना चाहती है या नहीं? तू अपने लिए योजना बनाती है और अपनी स्वयं की प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करती है। क्या मेरा कार्य तुम सभी लोगों के लिए नहीं है? क्या तू अंधी है? मेरे शरीर धारण करने से पहले, तू मुझे नहीं देख सकती थी, और ये वचन जो तूने बोले हैं माफ करने योग्य होते, लेकिन अब मैं देहधारी हूँ और मैं तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा हूँ, मगर तब भी तू नहीं देख सकती है? तू क्या नहीं समझती है? तू कहती है कि तूने नुकसान सहा है; इसलिए मैं तुम हताश लोगों को बचाने के लिए देह बन गया हूँ और इतना सारा कार्य किया है, और तब भी तू अब तक शिकायत कर रही है—क्या तू नहीं कहेगी कि मैंने नुकसान सहा है? क्या मैंने जो कुछ भी किया है वह तुम लोगों के लिए नहीं किया गया है? मैं लोगों के लिए इस उपाधि को उनकी वर्तमान कद-काठी के आधार पर लागू करता हूँ। यदि मैं तुझे एक 'विषमता' कहता हूँ, तो तू तुरंत एक विषमता बन जाती है। इसी तरह, यदि मैं तुझे 'परमेश्वर के लोगों में से एक' कहता हूँ, तो तू तुरंत परमेश्वर के लोग बन जाती है। मैं तुझे जो भी बुलाता हूँ, तू वह है। क्या यह मेरे होंठों के कुछ वचनों से प्राप्त नहीं होता है? और मेरे ये कुछ वचन तुझे इतना क्रोधित कर रहे हैं? ठीक है, तो मुझे क्षमा कर! यदि तू अब आज्ञापालन नहीं करती है, तो अंत में तुझे शाप दिया जाएगा—क्या तब तू खुश होगी? तू जीवन के तरीके पर ध्यान नहीं देती है बल्कि केवल अपनी हैसियत और उपाधि पर ध्यान केंद्रित करती है; तेरा जीवन किस प्रकार का है? मैं इनकार नहीं करता कि तूने एक बड़ी कीमत चुकाई है, लेकिन अपनी स्वयं की कद-काठी और अभ्यास पर एक नज़र डाल, और अभी भी तू मुझसे शर्तों पर मोल-तोल कर रही है। क्या यही वह कद-काठी है जो तूने अपने संकल्प के माध्यम से प्राप्त की है? क्या तेरे पास अभी भी कोई ईमानदारी है? क्या तुझ में कोई विवेक है? क्या मैंने कुछ ग़लत कर दिया है? क्या तुझ से मेरी अपेक्षाएँ त्रुटिवश थीं? अच्छा, तो यह क्या है? मैं तुझ से कुछ दिनों के लिए एक विषमता के रूप में कार्य करवाता और फिर भी तू ऐसा करने के लिए तैयार नहीं है। यह किस तरह का संकल्प है? तुम सभी कमजोर इच्छाशक्ति वाले हो, तुम डरपोक हो। अब तुझ जैसे लोगों को दंडित करना निस्संदेह अनिवार्य बात है!" एक बार मैंने यह कह दिया, तो वह एक शब्द नहीं बोली।

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "पत्नियाँ" लिखा है।

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