अभ्यास (2)

बीते समय में, लोग परमेश्वर के साथ रहने और प्रत्येक क्षण आत्मा के भीतर जीने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करते थे। आज के अभ्यास की तुलना में, यह एक साधारण आध्यात्मिक प्रशिक्षण है; इससे पहले कि लोग जीवन के सही रास्ते पर प्रवेश करें यह अभ्यास का सबसे सतही और सबसे साधारण तरीका है, और यह लोगों के विश्वास में अभ्यास का बिलकुल पहला चरण गठित करता है। यदि लोग अपने जीवन में सर्वदा इस तरह के अभ्यास पर निर्भर करें, तो उनकी बहुत सी भावनाएँ होंगी और उनकी ग़लतियाँ करने की संभावना होगी तथा वे जीवन के असल अनुभवों में प्रवेश करने में असमर्थ होगें; वे मात्र अपनी आत्माओं को प्रशिक्षित करने और अपने हृदयों में सामान्य तरीके से परमेश्वर के निकट आने में सक्षम होंगे और परमेश्वर के उनके संग होने में सर्वदा अत्यधिक आनन्द पाएंगे। वे परमेश्वर के साथ अपनी निकटता के छोटे से दायरे में खुद को सीमित कर लेंगे और इससे अधिक गहरी किसी भी चीज़ को समझने में अयोग्य होंगे। वे लोग जो इन सीमाओं में रहते हैं, वे अधिक विकास करने के अयोग्य होते हैं। वे किसी भी समय चिल्ला सकते हैं "आह! प्रभु यीशु। आमीन!" वे लगभग प्रतिदिन ऐसे ही होते हैं—बीते समय का यही अभ्यास है, प्रत्येक क्षण आत्मा में जीने का अभ्यास। क्या यह अशिष्ट नहीं है? आज, जब परमेश्वर के वचनों पर मनन करने का समय है, बस परमेश्वर के वचनों पर मनन करने पर ध्यान दो; जब सत्य का अभ्यास करने का समय है, तो बस अपना कर्तव्य पूरा करो। इस प्रकार का अभ्यास वास्तव में आज़ादी देने वाला है, यह तुम्हें मुक्त कर देता है। यह वैसा नहीं है जैसे एक धार्मिक वृद्ध व्यक्ति प्रार्थना और विनती करता है। निस्संदेह, पहले विश्वास करने वालों का ऐसा अभ्यास होता था, परन्तु अब इस रीति से अभ्यास करना अत्यधिक पिछड़ा हुआ है। परमेश्वर का काम अब ऊँचे स्तर पर है; आज जो "परमेश्वर को वास्तविक जीवन में लाने" की बात की जाती है, वह अभ्यास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यह वह उचित मानवता है जो लोगों के पास उनके वास्तविक जीवन में होना अपेक्षित है, लोगों की उचित मानवता में जो होना चाहिए वह है आज परमेश्वर द्वारा बोले गए सारे वचन। परमेश्वर के इन वचनों को वास्तविक जीवन में लाना ही "परमेश्वर को वास्तविक जीवन में लाने" का व्यवहारिक अर्थ है। आज, लोगों को स्वयं को मुख्यतः निम्नलिखित बातों से सुसज्जित करना चाहिए : एक लिहाज से, उन्हें अपनी क्षमता में वृद्धि करनी चाहिए, शिक्षित होना चाहिए, और अपने पठन और बोध कौशल में वृद्धि करनी चाहिए; और दूसरे लिहाज से, उन्हें उचित व्यक्ति का जीवन जीना चाहिए। तुम अभी-अभी संसार से परमेश्वर के सम्मुख आए हो; तुम्हें सर्वप्रथम अपने हृदय को परमेश्वर के सम्मुख शांत रहने के लिए प्रशिक्षित करना होगा। यह अभ्यास का मूल आरंभ है, और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव हासिल करने में पहला कदम भी है। कुछ लोग अपने अभ्यास में तुलनात्मक रूप से अनुकूलनशील होते हैं; वे कार्य करते हुए सत्य पर मनन करते हैं, उन सत्यों और अभ्यास के सिद्धांतों को समझते हैं जो वास्तविकता में उन्हें समझने चाहिए। एक पहलू है कि तुम्हारे पास एक उचित मानव-जीवन होना चाहिए, और दूसरा पहलू है कि सत्य में प्रवेश अवश्य होना चाहिए। वास्तविक जीवन के लिए ये सभी बातें सर्वोत्तम अभ्यास हैं।

परमेश्वर को लोगों के वास्तविक जीवन में लाने के लिए मुख्यतः जिसकी आवश्यकता होती वह है कि लोग परमेश्वर की आराधना करें, परमेश्वर के बारे में ज्ञान पाने का प्रयत्न करें, और उचित मानवता के भीतर परमेश्वर के जीव के कर्तव्य को पूरा करें। ऐसा नहीं है कि, जैसे ही वे कुछ करना आरम्भ करें, उन्हें उसी क्षण प्रार्थना करनी ही होगी और यदि वे प्रार्थना नहीं करते हैं तो यह ठीक नहीं है और उन्हें इसके कारण परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस करना चाहिए। आज का अभ्यास ऐसा नहीं है; यह तनावमुक्त और सरल है! इसमें लोगों को सिद्धांतों का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत कद-काठी के अनुसार कार्य करना चाहिए : यदि तुम्हारे परिवार के सदस्य परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो उनसे अविश्वासियों के समान व्यवहार करो, और यदि वे विश्वास करते हैं, तो उनसे विश्वासियों के समान व्यवहार करो। प्रेम और धैर्य का नहीं, अपितु बुद्धि का अभ्यास करो। कुछ लोग सब्जियाँ खरीदने बाहर जाते हैं, चलते हुए वे बड़बड़ाते हैं : "हे परमेश्वर! तू आज मुझसे कौन-सी सब्ज़ियाँ खरीदवाना चाहता है? मैं तेरी सहायता के लिए विनती करता हूँ। परमेश्वर चाहता है कि हम सब बातों में उसके नाम की महिमा करें, हम सभी साक्ष्य दें, इसलिए अगर दुकानदार मुझे कुछ सड़ा सामान दे देता है, तो मैं फिर भी परमेश्वर का धन्यवाद करूँगा—मैं झेल लूँगा! हम जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे सब्ज़ियों में से चुन नहीं सकते।" उन्हें लगता है कि यह करना परमेश्वर का साक्ष्य देना है, और इसका नतीजा यह है कि वे कुछ सड़ी सब्जियाँ खरीदने के लिए पैसे खर्च करते हैं और फिर भी प्रार्थना करते और कहते हैं : "हे परमेश्वर! जब तक तुझे स्वीकार्य है तब तक मैं ये सड़ी हुई सब्जियाँ भी खा लूँगा।" क्या ऐसा व्यवहार बेतुका नहीं है? क्या यह सिद्धांत का अनुसरण करना नहीं है? बीते समय में, लोग प्रत्येक क्षण आत्मा में जीने के लिए प्रशिक्षण लेते थे—यह अनुग्रह के युग में पहले किए गए कार्य से संबंधित है। धर्मपरायणता, नम्रता, प्रेम, धैर्य, सभी बातों के लिए धन्यवाद देना—यही वे अपेक्षाएँ थीं, जो अनुग्रह के युग में प्रत्येक विश्वासी से की गयी थीं। उस समय में, लोग समस्त बातों में परमेश्वर से प्रार्थना करते थे; जब वे कपड़े खरीदते थे, वे प्रार्थना करते थे, जब उन्हें किसी सभा की सूचना दी जाती थी, वे तब भी प्रार्थना करते और कहते : "हे परमेश्वर! क्या तू मुझे वहाँ जाने देना चाहता है? यदि तू मुझे जाने देना चाहता है तो मेरे लिए एक सरल मार्ग तैयार कर। यदि तू मुझे नहीं जाने देना चाहता तो मुझे लड़खड़ा कर नीचे गिर जाने दे।" प्रार्थना करते हुए वे परमेश्वर से विनती करते थे और प्रार्थना करने के पश्चात वे बेचैनी का अनुभव करते और सभा में नहीं जाते। कुछ बहनें इस बात से डर कर कि लौटने पर उन्हें उनके अविश्वासी पतियों द्वारा मार पड़ सकती है, प्रार्थना करते समय बेचैन हो जाती थीं और इसलिए वे सभा में नहीं जाती थीं। वे लोग विश्वास करते थे कि यह परमेश्वर की इच्छा थी, जबकि वास्तव में यदि वे चले गए होते, तो कुछ नहीं होता। परिणाम यह था कि वे एक सभा से चूक गए थे। यह सब लोगों की अपनी अज्ञानता के कारण हुआ था। जो लोग इस रीति से अभ्यास करते हैं, वे सभी अपनी ही भावनाओं से जीवनयापन करते हैं। इस रीति से अभ्यास करना बहुत गलत और बेतुका है और अस्पष्टता से पूरी तरह कलंकित है। उनकी अपनी व्यक्तिगत भावनाएँ और विचार बहुत अधिक होते हैं। यदि तुम्हें एक सभा के विषय में बताया गया है, तो जाओ; इस बारे में परमेश्वर से और प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है। क्या यह सरल नहीं है? यदि, आज तुम्हें, कोई कपड़ा खरीदना है, तो बाहर जाओ और खरीद लो। परमेश्वर से यह कहते हुए प्रार्थना मत करो : "हे परमेश्वर! तू मुझे आज जाने देना चाहता है या नहीं? यदि मेरे न रहने पर कोई भाई-बहन अचानक आ जाएँ तो क्या होगा?" तुम्हें डर है कि शायद कोई भाई या बहन आ जाएंगे, परन्तु परिणाम यह होता है कि सन्ध्या हो जाती है और कोई नहीं आता। यहाँ तक कि अनुग्रह के युग में भी, इस प्रकार का अभ्यास गलत और पथभ्रष्ट था। इस प्रकार यदि लोग बीते समय के अनुसार अभ्यास करेंगे, तो उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं होगा। वे मात्र अज्ञानतापूर्वक जो मिले वो ले लेंगे, वे विवेक पर कोई ध्यान नहीं देंगे, और वे अंधाधुंध पालन करने औए सहने के अलावा कुछ नहीं करेंगे। उस समय लोग परमेश्वर को महिमान्वित करने पर केन्द्रित थे—परन्तु परमेश्वर को उनसे कोई महिमा प्राप्त नहीं हुई, क्योंकि उन्होंने कुछ व्यवहारिक नहीं जिया था। उन्होंने मात्र स्वयं को नियंत्रित रखा और व्यक्तिगत अवधारणाओं के द्वारा सीमित रखा, और अनेक वर्षों का अभ्यास भी उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं लाया। वे मात्र झेलना, नम्र रहना, प्रेम करना, और क्षमा करना ही जानते थे किन्तु उनमें पवित्र आत्मा द्वारा ज़रा-सा भी प्रबुद्धता का अभाव था। लोग परमेश्वर को उस तरह कैसे जान सकते थे? और उनका परमेश्वर को महिमन्वित करना कैसे संभव था?

लोग परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर मात्र तभी प्रवेश कर सकते हैं, जब वे परमेश्वर को अपने वास्तविक जीवन और अपने सामान्य मानवीय जीवन में ले आएँगे। आज, परमेश्वर के वचन तुम लोगों का मार्गदर्शन करते हैं; और बीते समय के समान खोजने और टटोलते रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कर सकते हो और उन मानवीय अवस्थाओं से अपनी जाँच और आकलन कर सकते हो, जिन्हें मैंने उजागर किया है, तब तुम परिवर्तन हासिल करने के योग्य हो जाओगे। यह सिद्धांत नहीं है, परन्तु वह है जिसकी परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा करता है। आज मैं तुम्हें बताता हूँ कि चीज़ें किस प्रकार हैं : मात्र मेरे वचनों के अनुसार व्यवहार करने पर अपना ध्यान लगाओ। तुम से मेरी अपेक्षाएँ उचित व्यक्ति की ज़रूरतों के अनुसार हैं। मैंने अपने वचनों को तुम्हें पहले ही बता दिया है; जब तक तुम इस रीति से अभ्यास करने पर केन्द्रित रहते हो, तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होगे। परमेश्वर के वचनों में जीवनयापन करने का समय अभी है : परमेश्वर के वचनों ने सबकुछ समझा दिया है, सबकुछ स्पष्ट कर दिया गया है और जब तक तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीते हो, तुम एक ऐसा जीवन जियोगे जो पूर्णत: स्वतन्त्र और मुक्त होगा। पहले, जब लोग परमेश्वर को अपने वास्तविक जीवन में ले कर आए, तो उन्होंने अत्यधिक सिद्धांतों और संस्कारों का अभ्यास और अनुभव किया; अप्रधान मामलों में भी, वे प्रार्थना करते और तलाशते थे, परमेश्वर के सुस्पष्ट वचनों को एक ओर रख देते थे, उन्हें पढ़ने की अनदेखी करते थे। बल्कि अपने समस्त प्रयास खोज में अर्पित कर देते थे—जिसका परिणाम यह हुआ कि उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उदाहरण के लिए, खाने और पहनने के मामलों को लो : तुम प्रार्थना करते हो और बात परमेश्वर के हाथों में सौंप देते हो कि परमेश्वर तुम्हारे लिए सब कुछ का समाधान कर दे। जब परमेश्वर इन शब्दों को सुनेगा, वो कहेगा : "क्या मुझे इन छोटी-छोटी बातों की चिन्ता करने कि आवश्यकता है? वह सामान्य मानवता और विवेक, जो मैंने तुम्हारे लिए बनायी थी, कहाँ जा चुकी है?" कभी-कभी, कोई व्यक्ति अपने कार्यों में गलती कर देता है; फिर वो मानने लगता है कि उसने परमेश्वर को अप्रसन्न कर दिया है, और वो संकोची हो जाता है। कुछ लोगों की अवस्था अत्यधिक अच्छी होती है, परन्तु जब वे कोई छोटा-सा कार्य गलत कर देते हैं, वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें ताड़ना दे रहा है। वास्तव में यह परमेश्वर का किया नहीं है, परन्तु लोगों के अपने विचारों का प्रभाव है। कई बार तुम जो अनुभव कर रहे हो, उसमें कुछ गलत नहीं होता, परन्तु अन्य लोग कहते हैं कि तुम सही से अनुभव नहीं कर रहे हो, और इस प्रकार तुम फन्दे में फंस जाते हो—तुम नकारात्मक हो जाते हो और भीतर ही भीतर अन्धकारमय बन जाते हो। प्राय: जब लोग इस रीति से नकारात्मक हो जाते हैं, वे विश्वास करते हैं कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा ताड़ना दी जा रही है, परन्तु परमेश्वर कहता है : "मैंने तुम्हें ताड़ना देने का कार्य नहीं किया है; तुम मुझ पर इस प्रकार दोष कैसे लगा सकते हो?" लोग बहुत आसानी से अत्यधिक नकारात्मक हो जाते हैं। वे अक्सर अति संवेदनशील भी होते हैं और प्राय: परमेश्वर के विषय में शिकायत करते रहते हैं। परमेश्वर तुम से उस प्रकार दुखी होने की अपेक्षा नहीं करता, फिर भी तुम स्वयं को उस अवस्था में पड़ने देते हो। इस प्रकार से दुःख उठाने का कोई मूल्य नहीं है। लोग परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को नहीं जानते, और वे अनेक बातों में अज्ञानी और स्पष्ट रीति से देखने में असमर्थ होते हैं, इसलिए वे अपनी ही धारणाओं और कल्पनाओं में फंस जाते हैं, पहले से कहीं अधिक उलझ जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि सभी बातें और मसले परमेश्वर के हाथों में होते हैं—तो क्या जब लोग नकारात्मक होते हैं, तब परमेश्वर नहीं जान पाता? निस्संदेह परमेश्वर जानता है। जब तुम मानवीय धारणाओं के फन्दे में फंसे होते हो, तो पवित्र आत्मा का तुम में कार्य करने का कोई मार्ग नहीं होता। कई बार, कुछ लोग नकारात्मक अवस्था में फंस जाते हैं, परन्तु मैं फिर भी अपना कार्य करता रहता हूँ। उस समय, चाहे तुम नकारात्मक हो या सकारात्मक, मैं तुम्हारे द्वारा बाधित नहीं होता हूँ, परन्तु तुम्हें पता होना चाहिए कि जो अनेक वचन मैं बोलता हूँ, और बड़ी मात्रा में जो कार्य मैं करता हूँ, वह सब, लोगों की अवस्था के अनुसार, एक दूसरे से नज़दीक से जुड़ा है। जब तुम नकारात्मक होते हो, यह पवित्र आत्मा के कार्य को बाधित नहीं करता है। ताड़ना और मृत्यु के परीक्षण के समय के दौरान, सभी लोग नकारात्मक अवस्था के फन्दों में फंसे हुए थे; परन्तु उसने मेरे कार्य को बाधित नहीं किया। जब तुम नकारात्मक थे, तो पवित्र आत्मा ने अन्य लोगों में वह करना जारी रखा, जो किए जाने की आवश्यकता थी। तुम एक महीने तक अनुसरण करना बंद कर सकते हो, परन्तु मैं निरन्तर कार्य करता रहता हूँ—तुम चाहे भविष्य या वर्तमान में कुछ भी करो, यह पवित्र आत्मा के कार्य को रोक नहीं सकता। कुछ नकारात्मक अवस्थाएँ मानवीय दुर्बलता से आती हैं; जब लोग विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर कि अपेक्षाओं को पूरा करने या उन्हें समझने में पूर्णत: अयोग्य हैं, तो वे नकारात्मक बन जाते हैं। उदाहरण के लिए, ताड़ना दिए जाने के समय के दौरान, परमेश्वर के वचनों ने ताड़ना के बीच एक विशेष बिन्दु तक परमेश्वर से प्रेम करने के बारे में बोला था—परन्तु लोगों ने खुद को असमर्थ माना। इस अवस्था के दौरान उन्होंने विशेषत: दुखी और शोकित अनुभव किया, अनुभव किया कि शैतान ने उनकी देह को अत्यधिक भ्रष्ट कर दिया था और उनकी क्षमता अत्यधिक कम थी। उन्होंने अनुभव किया कि इस वातावरण में उनका जन्म होना बहुत दयनीय था। और कुछ लोगों ने अनुभव किया कि उनके लिए परमेश्वर में विश्वास करने में बहुत देरी हो गयी है और वे पूर्ण किए जाने के योग्य ही नहीं हैं। ये सभी सामान्य मानवीय अवस्थाएँ हैं।

मनुष्य की देह शैतान की है, यह विद्रोही स्वभावों से भरी हुई है, यह खेदजनक रूप से गंदी है, और यह एक अशुद्ध चीज़ है। लोग देह के आनन्द की अत्यधिक लालसा करते हैं और देह की अनेक अभिव्यक्तियाँ हैं; इसलिए एक निश्चित हद तक परमेश्वर मनुष्य की देह से घृणा करता है। जब लोग शैतान की गंदी, भ्रष्ट बातों को त्याग देते हैं, तो वे परमेश्वर द्वारा उद्धार को प्राप्त करते हैं। परन्तु यदि वे अब भी स्वयं को अशुद्धता और भ्रष्टता से वंचित नहीं करते हैं, तो वे अभी भी शैतान के अधिकार-क्षेत्र के अधीन रह रहे हैं। लोगों की धूर्तता, धोखेबाज़ी, और कुटिलता, ये सभी शैतान की बातें हैं। परमेश्वर द्वारा तेरा उद्धार तुझे शैतान की इन बातों से निकालने के लिए है। परमेश्वर का कार्य ग़लत नहीं हो सकता है; यह सब लोगों को अन्धकार से बचाने के लिए है। जब तू एक हद तक विश्वास कर लेता है, और देह की भ्रष्टता से अपने आप को वंचित कर सकता है, और इस भ्रष्टता के द्वारा अब और जकड़ा हुआ नहीं है, तो क्या तू बचाया नहीं गया है? जब तू शैतान के अधिकार-क्षेत्र के अधीन रहता है, तो तू परमेश्वर को अभिव्यक्त करने में असमर्थ होता है, तू कोई गंदी चीज़ होता है, और परमेश्वर की विरासत को प्राप्त नहीं कर सकता है। एक बार जब तुझे शुद्ध कर दिया और पूर्ण बना दिया गया, तो तू पवित्र हो जाएगा, तू एक उचित व्यक्ति हो जाएगा, और तुझे परमेश्वर के द्वारा आशीष दिया जाएगा और तू परमेश्वर में आनंदित होगा। आज परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य उद्धार है, और इसके अतिरिक्त यह न्याय, ताड़ना, और श्रापित करना है। इसके अनेक पहलू हैं। तुम सभी देखते हो कि परमेश्वर के कथनों में न्याय और ताड़ना के साथ-साथ श्राप शामिल है। मैं एक प्रभाव डालने, लोगों को स्वयं को जानने देने के लिए बोलता हूँ न कि लोगों को जान से मारने के लिए। मेरा हृदय तुम सब के लिए है। बोलना अनेक विधियों में से एक विधि है जिसके द्वारा मैं कार्य करता हूँ; वचनों के द्वारा मैं परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करता हूँ, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा समझने देता हूँ। तुम्हारा शरीर मर सकता है, परन्तु तुम्हारे पास एक आत्मा और एक प्राण है। यदि लोगों के पास मात्र शरीर होता, तो उनकी आस्था का कोई अर्थ न होता और न ही इस समस्त कार्य का कोई अर्थ होता, जो मैं कर चुका हूँ। आज मैं एक तरह से बोलता हूँ और फिर दूसरी तरह से; कुछ समय के लिए तो मैं लोगों के प्रति अत्यधिक घृणा रखता हूँ और फिर कुछ समय के लिए मैं अत्यधिक प्रेम करने वाला हो जाता हूँ; मैं यह सब तुम्हारे स्वभावों को बदलने और साथ ही परमेश्वर के कार्य के प्रति तुम्हारी धारणाओं का रूपांतरण करने के लिए करता हूँ।

अन्तिम दिन आ चुके हैं, और विश्वभर के देशों में अशान्ति है। राजनीतिक अस्त-व्यस्तता, अकाल, महामारी और बाढ़ें हैं, प्रत्येक स्थान पर अकाल पड़ रहे हैं। मानव-संसार पर महाविपत्ति है; स्वर्ग ने भी विनाश को नीचे भेज दिया है। ये अन्तिम दिनों के चिह्न हैं। परन्तु लोगों को यह आनन्द और वैभव जैसा संसार प्रतीत होता है, ऐसा संसार लगता है जो अधिक आनंद और वैभव से भरता चला जा रहा है। लोगों के हृदय इसकी ओर आकर्षित होते हैं और अनेक लोग फंस जाते हैं और स्वयं को इसके बन्धन से मुक्त करने में असमर्थ रहते हैं; बहुत अधिक संख्या में लोग उनके द्वारा मोहित किए जाएँगे जो धोखेबाज़ी और जादूटोने में संलिप्त हैं। यदि तुम उन्नति का प्रयास नहीं करते और तुम आदर्शरहित हो, और तुमने सच्चे मार्ग में अपनी जड़ें नहीं जमायी हैं, तो तुम पाप की हिलोरे मारती लहरों के द्वारा बहा लिए जाओगे। सभी देशों में चीन सबसे पिछड़ा हुआ है; यह वह देश है जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मार कर बैठा हुआ है, इसके पास सबसे अधिक ऐसे लोग हैं, जो मूर्तिपूजा करते और जादूटोने में संलिप्त हैं, सबसे ज़्यादा मन्दिर हैं, और यह एक ऐसा स्थान है जहाँ अशुद्ध प्रेत निवास करते हैं। तुम इसमें जन्में थे, तुमने यहाँ से शिक्षा पायी और इसका प्रभाव तुममें गहराई तक समाया है; तुम इसके द्वारा भ्रष्ट और पीड़ित किए गए हो, परन्तु जगा दिये जाने के पश्चात तुम इसे त्याग देते हो और परमेश्वर के द्वारा पूर्णत: प्राप्त कर लिए जाते हो। यही परमेश्वर की महिमा है, इसी कारण कार्य का यह चरण अत्यधिक महत्व रखता है। परमेश्वर ने इतने बड़े पैमाने पर कार्य किया है, इतने अधिक वचन बोले हैं, और अन्ततः वह तुम लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा—यह परमेश्वर के प्रबन्धन के कार्य का एक पक्ष है और तुम सब शैतान के साथ परमेश्वर के युद्ध में "विजय का लाभ" हो। तुम लोग जितना अधिक सत्य समझोगे, कलीसिया का जीवन जितना ही बेहतर होगा, उस बड़े लाल अजगर को उसके घुटनों पर उतना ही अधिक लाया जा सकेगा। ये आध्यात्मिक संसार के विषय हैं—ये आध्यात्मिक संसार के युद्ध हैं, और जब परमेश्वर जयवन्त है, तो शैतान लज्जित और धराशायी होगा। परमेश्वर के कार्य का यह चरण अत्यन्त महत्व रखता है। परमेश्वर इतने विशाल स्तर पर कार्य करता है और इस समूह के लोगों को पूरी तरह से बचाता है ताकि तुम शैतान के प्रभाव से बच सको, पवित्र देश में जीवनयापन कर सको, परमेश्वर की ज्योति में जीवनयापन कर सको, और ज्योति की अगुवाई और मार्गदर्शन पा सको। फिर तुम्हारे जीवन का अर्थ है। तुम सब क्या खाते और क्या पहनते हो, यह अविश्वासियों से भिन्न है; तुम सब परमेश्वर के वचनों का आनन्द उठाते हो, और एक अर्थपूर्ण जीवन जीते हो—और वे किस से आनन्दित होते हैं? वे मात्र अपने "पूर्वजों की विरासत" और अपनी "देशभक्ति" का आनन्द लेते हैं। उनमें मानवता का थोड़ा-भी अवशेष नहीं है! तुम सब के वस्त्र, शब्द और कार्य उनसे भिन्न होते हैं। तुम सब अन्ततः अशुद्धता से पूरी तरह बच जाओगे, शैतान के प्रलोभन के फन्दे में और फंसे नहीं रहोगे और परमेश्वर का प्रतिदिन का प्रावधान प्राप्त करोगे। तुम सबको सर्वदा सावधान रहना चाहिए। यद्यपि तुम लोग एक गंदी जगह में रहते हो, तुम लोग गंदगी से बेदाग हो और परमेश्वर के साथ रह सकते हो, उसकी महान सुरक्षा को प्राप्त कर सकते हो। इस पीले देश में समस्त लोगों में से परमेश्वर ने तुम सबको चुना है। क्या तुम सब सबसे आशीषित लोग नहीं हो? तुम एक सृष्ट प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपने अशुद्ध शरीर में जीवनयापन करते रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में एक जानवर नहीं हो? चूँकि तुम एक मनुष्य हो, तुम्हें परमेश्वर के लिए खुद को खपाना और समस्त दुखों को सहना चाहिए! तुम्हें जो थोड़ा दुःख आज दिया जाता है, उसे तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और निश्चित ही स्वीकार करना चाहिए, अय्यूब और पतरस के समान एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य शैतान का भेष धारण करता है, शैतान के द्वारा दिया गया भोजन खाता है, और शैतान के अधीन कार्य और सेवा करता है, और उसकी अशुद्धता में पूरी तरह कुचला जा रहा है। यदि तुम जीवन का अर्थ नहीं समझते हो या सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं करते हो, तो इस तरह जीने का क्या महत्व है? तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, सुधार को खोजते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, वे लोग जिन्हें परमेश्वर धर्मी बुलाता है। क्या यही सब से अर्थपूर्ण जीवन नहीं है?

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