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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है (III)     भाग तीन

2. परमेश्वर मनुष्य को जीवित रहने के लिए एक स्थायी वातावरण देने के लिए सभी चीज़ों के मध्य सम्बन्धों को संतुलित करता है

हमने बस अभी बात की कि किस प्रकार परमेश्वर सभी चीज़ों के नियमों के ऊपर शासन करता है साथ ही साथ वह किस प्रकार सभी जीवों के लिए अपने नियमों के जरिए और उन नियमों के भीतर सम्पूर्ण मानवजाति की आपूर्ति और उनका पालन पोषण करता है। यह एक पहलू है। आगे, हम अन्य पहलु के बारे में बात करने जा रहे हैं, जो एक तरीका है जिससे परमेश्वर के पास हर चीज़ का नियंत्रण है। यह ऐसा है, सभी चीज़ों की सृष्टि करने के बाद, उसने उनके मध्य सम्बन्धों को सन्तुलित किया था। यह तुम लोगों के लिए एक बहुत ही बड़ा विषय भी है। सभी चीज़ों के मध्य सम्बन्धों को सन्तुलित करना-क्या यह कुछ ऐसा है जिसे लोग पूरा कर सकते हैं? मनुष्य स्वयं नहीं कर सकते हैं। लोग केवल नाश करने में सक्षम हैं। वे सभी चीज़ों के मध्य सम्बन्धों को सन्तुलित नहीं कर सकते हैं; उनके पास ऐसा बड़ा अधिकार या सामर्थ नहीं है। केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही इस प्रकार का काम करने के लिए इस प्रकार की सामर्थ है। इस प्रकार का काम करने में परमेश्वर का उद्देश्य-यह किस लिए है? बस वैसा ही, यह मानवजाति के जीवित रहने से करीब से जुड़ा हुआ है। हर एक चीज़ जो परमेश्वर करना चाहता है वह ज़रुरी है-ऐसा कुछ नहीं है जो वह कर सकता है या नहीं कर सकता है। उसके लिए मानवजाति के जीवित रहने का बचाव करने हेतु और जीवित रहने के लिए लोगों को एक अनुकूल वातावरण देने हेतु, कुछ परम आवश्यक, और कुछ महत्वपूर्ण चीज़ें हैं जिन्हें उसे उनके जीवित रहने का बचाव करने के लिए करना होगा।

इस वाक्यांश "परमेश्वर सभी चीज़ों को सन्तुलित करता है," के शाब्दिक अर्थ से यह पता चलता है कि यह एक अति विस्तृत शीर्षक है; यह सबसे पहले तुम्हें एक अवधारणा प्रदान करता है जिससे तुम जान जाते हो कि सभी चीज़ों को सन्तुलित करना निश्चित रूप से सभी चीज़ों के ऊपर उसकी प्रभुता है। "सन्तुलन" शब्द का क्या अर्थ है? प्रथम, "सन्तुलन" किसी चीज़ को सन्तुलन से बाहर होने की अनुमति नहीं देने की ओर संकेत करता है। हर कोई तराजू के विषय में जानता है। किसी चीज़ का वज़न करने के लिए तराजू का इस्तेमाल करते समय, तुम इसे तराजू के एक पलड़े में रखते हो दूसरे पलड़े में बाट को रखते हो। वजन की अंतिम मात्रा वस्तु के वज़न को निर्धारित करती है-उसे सन्तुलित करना कहते है। इसे सन्तुलित करने के लिए, दोनों पलड़ों का वज़न समान होना चाहिए। परमेश्वर ने सभी चीज़ों के मध्य बहुत सारी चीज़ों की सृष्टि की-उसने ऐसी चीज़ों की सृष्टि की जो स्थिर हैं, ऐसी चीज़ें जो गतिमान हैं, ऐसी चीज़ें जो जीवित हैं, और ऐसी चीज़ें जो सांस ले रही हैं, साथ ही वे जो सांस नहीं लेती हैं। उसने बहुत सारी चीज़ों की सृष्टि की-क्या सभी चीज़ों के लिए परस्पर निर्भरता, आपसी सहयोग और प्रतिरोध, और परस्पर जुड़ाव का सम्बन्ध प्राप्त करना आसान है? इन सभी चीजों के भीतर निश्चित रूप से एक सिद्धान्त है। भले ही यह बहुत जटिल है, फिर भी परमेश्वर के लिए यह कठिन नहीं है। फिर भी, लोगों के लिए इसकी खोज करना बहुत ही कठिन है। यह बहुत ही साधारण शब्द के समान दिखाई देता है-सन्तुलन। फिर भी, यदि लोगों ने इसकी खोज की होती, यदि लोगों को सन्तुलन को बनाने की आवश्यकता होती, तो वे सभी प्रतिभावान वैज्ञानिक इस पर कार्य कर रहे होते-मानव जीव विज्ञानी, खगोल-विज्ञानी, भौतिक-शास्त्री, रसायन-शास्त्री, और इतिहासकार भी। उस खोज का अंतिम परिणाम क्या होता? इसका परिणाम कुछ नहीं होता? ऐसा इसलिए क्योंकि परमेश्वर के द्वारा सभी चीजों की सृष्टि बहुत ही अविश्वसनीय है और मनुष्य कभी भी इसके रहस्य को नहीं खोल सकता है। जब परमेश्वर ने सभी प्राणियों की सृष्टि की, उसने उनके बीच सिद्धान्तों को स्थापित किया, उसने पारस्परिक प्रतिरोध, पारस्परिक अभिनन्दन, और जीवन आधार के लिए जीवित रहने के विभिन्न तरीकों को स्थापित किया। ये विभिन्न पद्धतियाँ बहुत पेचीदा हैं; वे साधारण और दिशाहीन नहीं हैं। लोग सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के नियन्त्रण के पीछे के सिद्धान्तों की पुष्टि या खोज करने के लिए अपने मस्तिष्क, अपने ज्ञान, और उस घटना को इस्तेमाल करते हैं जिसे उन्होंने देखा है, किन्तु इन चीज़ों की खोज करना अत्यंत कठिन है। साथ ही किसी परिणाम की खोज करना या उसे प्राप्त करना बहुत कठिन है। यह कहा जा सकता है कि लोगों के लिए परिणामों को प्राप्त करना बहुत कठिन है। परमेश्वर के द्वारा सृजे गए सभी जीवों पर शासन करने के लिए मानवीय मस्तिष्कों और ज्ञान पर भरोसा करने के द्वारा सन्तुलन कायम करना बहुत कठिन है। जबकि लोग सभी प्राणियों के जीवित रहने के सिद्धान्तों को नहीं जानते हैं, वे नहीं जानते हैं कि इस प्रकार के सन्तुलन का बचाव कैसे करें। अतः, यदि लोगों को सभी प्राणियों का प्रबन्ध और सन्तुलन करना पड़ता, तो ज़्यादा सम्भावना होती कि वे इस सन्तुलन को नष्ट कर देते। जैसे ही उसे नष्ट किया जाता, जीवित रहने के लिए उनके वातावरण नष्ट हो जाते, और जब ऐसा होता, तो उनके जीवित बचे रहने पर संकट आ जाता। यह एक सर्वनाश लेकर आता। जब मानवता सर्वनाश के बीच में जी रही है, तो उनके सामने क्या पड़ा होता? यह एक परिणाम होता जिसका अन्दाज़ा लगाना कठिन है, और भविष्यवाणी करना कठिन है। यह बस उसी प्रकार का ख़तरा है जिसका सामना वर्तमान में संसार के द्वारा किया जाता है।

तब परमेश्वर कैसे सभी चीज़ों के मध्य सम्बन्धों का सन्तुलन करता है? प्रथम, संसार में कुछ स्थान हैं जो साल भर बर्फ और हिम से ढंके होते हैं, जबकि कुछ स्थानों में, सभी चारों मौसम बसंत के समान होते हैं। तुम कभी भी बर्फ का एक टुकड़ा या एक हिम की एक परत नहीं देखोगे। वहाँ कोई सर्दी नहीं होती-यह हमेशा बसंत के समान होता है। यह एक तरीका है-यह एक अधिक बड़े जलवायु के दृष्टिकोण से है। दूसरा प्रकार है जब लोग पर्वतों को देखते हैं जो घनी रसीली वनस्पति से भरे हुए हैं, जहाँ सभी प्रकार के पौधे धरती को ढँक रहे हैं; वहां जंगलों का व्यापक फैलाव है और जब उनके बीच से चलते हैं तो तुम सूरज को भी नहीं देख सकते हो। अन्य पर्वतों में घास तक नहीं उगती-वहां परत दर परत बंजर ज़मीन और जंगल के पहाड़ हैं। बाहर से देखने पर, वे दोनों इकट्ठी हुई धूल के पर्वत हैं। पर्वतों का एक समूह घनी रसीली वनस्पति से भरा हुआ है, और दूसरा समूह घास से भी वंचित हैं। यह दूसरे प्रकार का है। तीसरे प्रकार में, तुम अंतहीन घास के मैदानों को देख सकते हो, लहराते हुए हरे रंग का मैदान। या जहाँ तक तुम्हारी आँख देख सकती है तुम एक मरुस्थल को देख सकते हो; तुम किसी जीवित प्राणी को नहीं देखते हो, जल के किसी स्रोत को तो बिलकुल भी नहीं देख सकते हो, बस रेत के साथ बहती हुई हवा की सांय सांय की आवाज़ को सुन सकते हो। चौथे प्रकार में, एक स्थान जो समुद्र से ढंका हुआ है, जो महाजलराशि से बना हुआ है, जबकि अन्य स्थान में तुम किसी जल-स्रोत का पता लगाने के लिए बहुत अधिक परेशान हो जाते हो। पांचवे प्रकार में, एक स्थान में बारिश की बूंदा-बांदी बार बार होती है और यह कोहरे से भरा हुआ और नम है, जबकि दूसरे स्थान में प्रचण्ड धूप वाले दिन बहुत ही सामान्य हैं और तुम वर्षा की एक बूँद भी नहीं देखोगे। छठवें में, एक प्रकार का स्थान पठार है जहां हवा विरल है और सांस लेना मुश्किल है, और अन्य प्रकार के स्थान जहां दलदल और तराईयां हैं, जो विभिन्न प्रकार के प्रवासी पक्षियों के लिए आवास का काम करते हैं। ये विभिन्न प्रकार के जलवायु हैं, या ऐसे जलवायु या वातावरण हैं जो विभिन्न भौगोलिक वातावरण के अनुरूप हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर उस विशाल वातावरण के पहलुओं से जीवित रहने के लिए मानवजाति के मूल वातावरण को सन्तुलित करता है, अर्थात् उस जलवायु से लेकर भौगोलिक वातावरण तक, मिट्टी के विभिन्न तत्वों से लेकर जल के स्रोतों की मात्रा तक जिससे उन विभिन्न वातावरण की वायु, तापमान और आर्द्रता में सन्तुलन हासिल किया जा सके जिनमें लोग जीवित रहते हैं। इन विभिन्न भौगोलिक वातावरण के बड़े अन्तर के साथ, लोगों के पास स्थायी वायु होगी और विभिन्न मौसमों में तापमान और आर्द्रता स्थायी होगी। यह हमेशा की तरह जीवित रहने के लिए लोगों को निरन्तर उस प्रकार के वातावरण में जीने की अनुमति देता है। यह उस विशाल वातावरण के नज़रिए से कह रहा है। पहले, उस विशाल वातावरण को सन्तुलित किया जाना चाहिए। इसे विभिन्न भौगोलिक स्थितियों और पद्धतियों के इस्तेमाल के साथ ही साथ पारस्परिक प्रतिरोध के लिए विभिन्न जलवायु के बीच परिवर्तन के माध्यम से किया जाता है जिससे उस सन्तुलन को हासिल किया जा सके जो परमेश्वर चाहता है और जिसकी मानवजाति को आवश्यकता है। यह विशाल वातावरण के नज़रिए से है।

इन विवरणों को देख कर, जैसे पेड़-पौधे, उस सन्तुलन को पाना कैसे संभव है? अर्थात्, पेड़-पौधों को जीवित रहने के लिए सन्तुलित वातावरण के भीतर निरन्तर जीवित बचे रहने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? इसे जीवित रहने के लिए उनके वातावरण का बचाव करने के लिए विभिन्न प्रकार के पौधों के जीवनकाल, वृद्धि दर, और प्रजनन दर का प्रबन्ध करने के द्वारा दिया जा सकता है। छोटी सी घास को एक उदाहरण के रूप में लीजिए-बसंत ऋतु में कोपलें हैं, ग्रीष्म ऋतु में फूल हैं, और शरद ऋतु में फल हैं। फल भूमि पर गिर जाता है और वह घास मर जाती है। अगले वर्ष, उस फल से बीज अंकुरित होता है और उन्हीं नियमों के अनुसार निरन्तर आगे बढ़ता है। घास का जीवनकाल बहुत छोटा होता है-यह बसंत से लेकर पतझड़ तक जीवित रहती है, फिर यह मर जाती है। हर बीज ज़मीन में गिरता है, जड़ें फूटती हैं और वह अंकुरित होता है, खिलता है और फल उत्पन्न करता है; यह प्रक्रिया केवल बसंत, ग्रीष्म, और पतझड़ में होती है, और सभी प्रकार के वृक्षों का भी अपना जीवनकाल और अंकुरित होने और फलने का अलग अलग समय होता है। कुछ वृक्ष बस 30 से 50 सालों के बाद मर जाते हैं-उनके पास 30 से 50 साल का जीवनकाल होता है, किन्तु उनका बीज ज़मीन पर गिरता है, जो उसके बाद जड़ पकड़ता और अंकुरित होता है, खिलता है और फल उत्पन्न करता है, और अगले 30 से 50 सालों तक जीवित रहता है। यह इसकी पुनरावृत्ति की दर है। एक पुराना पेड़ मरता है और नया पेड़ बढ़ता है-इसी लिए तुम जंगल में हमेशा पेड़ों को बढ़ते हुए देखते हो। परन्तु साथ ही उनके पास जन्म और मृत्यु का अपना उचित चक्र और प्रक्रिया है। कुछ वृक्ष 1000 वर्षों से भी अधिक जी सकते हैं, और कुछ 3000 वर्षों तक भी जी सकते हैं। वे उस प्रकार के वृक्ष हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस प्रकार का पौधा है या इसका जीवनकाल कितना लम्बा है, सामान्य रूप से कहें, तो परमेश्वर इस आधार पर कि वह कितने लम्बे समय तक जीवित रहता है, और प्रजनन करने की उसकी क्षमता, और प्रजनन की उसकी गति साथ ही साथ प्रजनन की उसकी मात्रा और दर के आधार पर इसके सन्तुलन को व्यवस्थित करता है। यह उन्हें, घास से लेकर वृक्ष तक, निरन्तर फलते रहने में सक्षम होने, और एक सन्तुलित पारिस्थितिक वातावरण के भीतर फलने-फूलने की अनुमति देता है। अतः जब पृथ्वी पर तुम एक जंगल को देखते हो, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता यदि वे वृक्ष हैं या घास, यह निरन्तर प्रजनन कर रहा है और अपने स्वयं के नियमों के अनुसार बढ़ रहा है। इसे मानवजाति की सहायता की ज़रुरत नहीं है; इसे मानवजाति से किसी अतिरिक्त कार्य की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके पास इस प्रकार का सन्तुलन है तो क्या वे जीवित रहने के लिए अपने वातावरण को बनाए रखने में सक्षम हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके पास ज़िन्दा बचे रहने के लिए एक उपयुक्त वातावरण है तो क्या ये जंगल, और ये घास के मैदान पृथ्वी पर निरन्तर जीवित रह सकते हैं। उनकी मौज़ूदगी जंगलों और घास के मैदानों में रह रहे सभी प्रकार के जीवित प्राणियों-पशु एवं पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों, और सभी प्रकार के अति सूक्ष्म जीवों के साथ साथ पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों का पालन पोषण करती है।

साथ ही परमेश्वर सभी प्रकार के पशुओं के सन्तुलन का भी नियन्त्रण करता है। इस सन्तुलन का नियन्त्रण कैसे किया जाता है? यह पौधों के समान ही है-वह उनके सन्तुलन का प्रबन्ध करता है और प्रजनन की उनकी क्षमता, प्रजनन की उनकी मात्रा और दर और वे भूमिकाएं जिन्हें वे पशुओं के बीच में अदा करते हैं उसके आधार पर उनकी संख्याओं को निर्धारित करता है। उदाहरण के लिए, शेर जैबरों को खाते हैं, अतः यदि शेरों की संख्या जैबरों की संख्या से ज़्यादा हो जाए, तो जैबरों की नियति क्या होगी? वे विलुप्त हो जाएंगे। और यदि जैबरों के प्रजनन की मात्रा शेरों की अपेक्षा बहुत कम हो जाए, तो उनकी नियति क्या होगी? वे भी विलुप्त हो जाएंगे। अतः, जैबरों की संख्या शेरों की संख्या से कहीं अधिक होनी चाहिए। यह इसलिए है क्योंकि जैबरे सिर्फ स्वयं के लिए ही अस्तित्व में नहीं है; बल्कि वे शेरों के लिए भी अस्तित्व में हैं। तुम यह भी कह सकते हो कि प्रत्येक जैबरा सारे जैबरों का एक भाग है, किन्तु यह एक शेर के मुंह में भोजन भी है। शेरों के प्रजनन की गति जैबरों से आगे कभी नहीं बढ़ सकती है, अतः उनकी संख्याएं जैबरों की संख्याओं से बढ़कर कभी नहीं हो सकती हैं। सिर्फ इसी तरह से शेरों के भोजन के स्रोत की गारंटी दी जा सकती है। भले ही शेर जैबरों का प्राकृतिक शत्रु है, फिर भी लोग अक्सर उन्हें उसी इलाके के भीतर फुरसत से आराम करते हुए देखते हैं। शेर उनका शिकार करते हैं और खाते हैं उसके कारण जैबरे संख्या में कभी कम नहीं होंगे या वे कभी विलुप्त नहीं होंगे, और शेर "राजा" के रूप में अपनी पदवी के कारण कभी भी अपनी संख्या नहीं बढ़ाएंगे। यह सन्तुलन कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर ने बहुत पहले स्थापित किया था। अर्थात्, परमेश्वर ने सभी जानवरों के मध्य सन्तुलन के नियमों को स्थापित किया था ताकि वे सन्तुलन प्राप्त कर सकें, और यह कुछ ऐसा है जिसे देखने के लिए मानवजाति सक्षम है। क्या सिर्फ शेर ही जैबरों के प्राकृतिक शत्रु होते हैं? मगरमच्छ भी जैबरों को खाते हैं। क्या तुमने कभी मगरमच्छ को जैबरा खाते देखा है? मगरमच्छ के द्वारा जैबरे को खाने का दृश्य भी बहुत क्रूर होता है। ऐसा लगता है कि जैबरे वास्तव में एक प्रकार के असहाय पशु हैं। उनमें शेरों की क्रूरता नहीं है, और जब वे एक शेर अर्थात् इस भयंकर शत्रु का सामना करते हैं, तो वे केवल भाग सकते हैं। वे तो उसका प्रतिरोध भी नहीं कर सकते हैं। जब वे शेर से तेज भाग नहीं सकते हैं, तो वे सिर्फ स्वयं को अनुमति दे सकते हैं कि उन्हें शेर के द्वारा खाया जाए। इसे पशु जगत में अक्सर देखा जा सकता है। जब तुम लोग इस प्रकार की चीज़ को देखते हो तो तुम सब पर क्या प्रभाव पड़ता है? क्या तुम जैबरे के लिए दुखी होते हो? क्या तुम्हें शेरों के लिए घृणा का एहसास होता है? जैबरे कितने सुन्दर दिखाई देते हैं! लेकिन शेर, वे हमेशा उन्हें लालच से देखते रहते हैं। और मूर्खता से, जैबरे दूर नहीं भागते हैं। वे शेरों को वहाँ उनका इन्तजार करते हुए देखते हैं, बस यों ही पेड़ की छाया में इन्तजार करते हुए। कौन जानता है वह कब उन्हें खा जाएगा। क्या वे इस बात को अपने मनों में जानते हैं? वे अवश्य जानते हैं, परन्तु वे तब भी भूमि के उस टुकड़े को नही छोड़ेंगे। यह एक अद्भुत बात है। इस अद्भुत बात में परमेश्वर की पूर्वनियति, और उसका शासन समाविष्ट है। तुम उस जैबरे के लिए दुख महसूस करते हो लेकिन तुम उसे बचाने में असमर्थ हो, और तुम महसूस करते हो कि वह शेर घृणा के योग्य है किन्तु तुम इससे पीछा नहीं छुड़ा सकते हो। जैबरा वह भोजन है जिसे परमेश्वर ने शेर के लिए तैयार किया है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि शेर उन्हें कैसे खाते हैं, क्योंकि जैबरों का सफाया नहीं किया जाएगा। बच्चों की संख्या जिन्हें शेर पैदा करते हैं वह वास्तव में कम है, और वे बहुत धीरे धीरे प्रजनन करते हैं, इसलिए वे जैबरों के संख्या से आगे नहीं बढ़ सकते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितना अधिक खाते हैं, क्योंकि उनकी संख्या उन जैबरों से अधिक नहीं होगी। यह एक प्रकार का सन्तुलन है।

इस प्रकार के सन्तुलन को बनाए रखने में परमेश्वर का लक्ष्य क्या है? यह जीवित रहने के लिए लोगों के वातावरण साथ ही साथ मानवजाति के जीवित रहने के साथ सम्बन्धित है। यदि जैबरा, या शेर का कोई ऐसा ही शिकार-हिरन या अन्य पशु-बहुत धीमे प्रजनन करते हैं और शेरों की संख्या तेजी से बढ़ती है, तो मानव प्राणियों को किस प्रकार के खतरे का सामना करना पड़ेगा? पहले, मुर्गियां, बत्तखें, कलहंस, और कुत्ते जिन्हें लोगों के द्वारा पाला पोसा जाता है वे शेरों के शिकार बन जाएंगे। यह इसलिए है क्योंकि वे बाहर रहते हैं, अतः वे शेरों के पहले शिकार होंगे। क्या वे चीज़ें शेरों के खाने के लिए पर्याप्त होंगी? कुछ घरों में दो सूअर होते हैं। यदि एक शेर पहाड़ों से नीचे आता और उन्हें खा जाता, तो ऐसा करने के बाद क्या वह बस यों ही चला जाता? वह सोचता: "पहाड़ों पर खाने के लिए तो कुछ भी नहीं है, मैं बस यहीं रहूँगा। इस परिवार के पास सूअर हैं-और कुछ मनुष्य होंगे जिन्हें अब मैंने खा लिया है। अगली बार के भोजन के लिए कुछ भी नहीं है-क्या यह सब तैयार नहीं है? लोग बस यों ही अन्दर बैठे हुए हैं-वे हमेशा के लिए अन्दर नहीं रह सकते हैं!" जैसे ही लोग बाहर आते हैं, वह एक ही झपटे में अपने जबड़े से उन्हें खा जाएगा। लोगों के पास प्रतिरोध करने की कोई क्षमता नहीं है। क्या यह एक दुखद बात न होगी? शेर जैबरों को खाते हैं जो एक सामान्य घटना है, किन्तु यदि एक शेर लोगों को खाता है, तो यह एक त्रासदी होगी। यह त्रासदी ऐसी चीज़ नहीं है जिसे परमेश्वर के द्वारा पहले से ठहराया गया था, यह उसके शासन के अंतर्गत नहीं है, और जो कुछ वह मानवजाति के लिए लाता है उसके अंतर्गत तो बिलकुल भी नहीं है। इसके बजाए, यह वह है जिसे लोग अपने ऊपर लाते हैं। अतः जैसा परमेश्वर इसे देखता है, सभी प्राणियों के मध्य सन्तुलन मानवजाति के जीवित बचे रहने के लिए निर्णायक है। चाहे वे पौधे हों या पशु, वे अपने उचित सन्तुलन नहीं खो सकते हैं। पौधों, पशुओं, पर्वतों, और झीलों ने मानवजाति के लिए एक सामान्य पारिस्थितिक वातावरण तैयार किया है। जब लोगों के पास इस प्रकार का पारिस्थितिक वातावरण होता है-एक सन्तुलित वातावरण-केवल तभी उनका अतिजीवन सुरक्षित होता है? यदि एक वृक्ष या घास की प्रजनन करने की क्षमता बहुत अच्छी नहीं होती या इसकी प्रजनन की गति बहुत धीमी होती, तो मिट्टी क्या करती? क्या मिट्टी अपनी नमी खो देती? यदि मिट्टी अपनी नमी खो देती, तो क्या यह एक समस्या होती? यदि मिट्टी अपनी वनस्पतियों और नमी को खो देती, तो इसका अपरदन बहुत जल्दी हो जाता, और इसके स्थान पर रेत बन जाता। मिट्टी आगे से उपजाऊ नहीं होती और यह रेतीली हो जाती, और जब मिट्टी और ख़राब हो जाती, तो जीवित रहने के लिए लोगों का वातावरण भी नष्ट हो जाता। इस तबाही के साथ विपत्तियाँ भी आतीं। इस प्रकार के पारिस्थितिक सन्तुलन के बिना, और इस प्रकार के पारिस्थितिक वातावरण के बिना, लोग सभी चीज़ों के मध्य इन असन्तुलन के कारण बार बार विपत्तियाँ सहते। उदाहरण के लिए, वातावरण सम्बन्धी असन्तुलन एक निश्चित स्थान में मेंढकों की संख्या में वृद्धि को बढ़ाता है-उनका पारिस्थितिक वातावरण नष्ट हो जाता है, वे सभी एक साथ इकट्ठे होते हैं, उनकी संख्या तेजी से बढ़ती है और यहाँ तक कि लोग मेढकों को शहरों की गलियां पार करते हुए, और बहुत बड़ी संख्या में मेढकों को सड़कों पर देखते हैं। यदि मेंढकों की बड़ी संख्या जीवित रहने के लिए लोगों के वातावरण पर कब्जा कर लेती, तो इसे क्या कहा जाता? एक विपत्ति। इसे विपत्ति क्यों कहा जाता? ये छोटे जानवर जो मानवजाति के लिए फायदेमंद और लोगों के लिए उपयोगी हैं जब वे उस स्थान में रहते हैं जो उनके लिए उपयुक्त हैः वे जीवित रहने के लिए लोगों के वातावरण को सन्तुलित बनाए रखते हैं। जैसे ही वे एक विपत्ति बन जाते हैं, वे लोगों के जीवन की सुव्यवस्था को प्रभावित करेंगे। सभी चीज़ें और सभी तत्व जो मेंढक अपने साथ लाते हैं वे लोगों के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। यहाँ तक कि उनके शारीरिक अंगों पर भी आक्रमण किया जा सकता है-यह एक प्रकार की विपत्ति है।

अन्य प्रकार की विपत्ति, जो कुछ ऐसी है जिसका मनुष्यों ने अक्सर अनुभव किया है-भारी संख्या में टिड्डियों का प्रगट होना। क्या यह एक विपत्ति नहीं है? यह एक भयावह विपत्ति है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि मनुष्य कितना समर्थ है-लोग हवाई जहाज़, तोप, और परमाणु बम बना सकते हैं-लेकिन जब टिड्डियाँ मनुष्य पर आक्रमण करती हैं, तो उनके पास क्या समाधान होता है? क्या वे उन पर तोप का उपयोग कर सकते हैं? क्या वे उन्हें मशीन गनों से मार सकते हैं? वे नहीं मार सकते हैं। तब क्या उन्हें भगाने के लिए वे उन पर कीटनाशक का छिड़काव कर सकते हैं। वह भी आसान नहीं है। अतः, वे छोटी छोटी टिड्डियाँ क्यों आएंगी? अनाज को खाने के लिए। जहाँ कहीं टिड्डियाँ जाती हैं वहां की फसलें पूर्णतया ख़त्म हो जाती हैं। वे खासतौर से फसलें और अनाज खाती हैं। जहाँ कहीं से वे गुज़रतीं हैं, किसी भी प्रकार का अनाज हो बस खत्म हो जाता है! टिड्डी के आक्रमण के अंतर्गत, पलक झपकते ही, वह भोजन जिस पर किसान निर्भर होते हैं-एक साल की कीमत का अनाज-उसे पूरी तरह टिड्डियों के द्वारा खाया जा सकता है। और मनुष्य के लिए टिड्डियों का आगमन क्या है? यह केवल एक चिढ़चिढ़ाहट ही नहीं है-यह एक विपत्ति है।

टिड्डी एक प्रकार की विपत्ति है, अतः चूहों के बारे में क्या? यदि चूहे बहुत तेजी से प्रजनन करें और उन्हें खाने के लिए वहां कोई भी उल्लू या बाज न हो, तो वे बहुत तेजी से बहुगुणित होंगे, तुम्हारी सोच से भी कहीं ज़्यादा तेजी से। और यदि चूहे बिना किसी रूकावट के बढ़ते हैं, तो क्या मनुष्य अच्छा जीवन जी सकते हैं? वे नहीं जी सकते! अतः वह क्या है जिसका मनुष्य सामना करेंगे? (एक महामारी)। केवल एक महामारी? चूहे कुछ भी खाएंगे? यहाँ तक कि वे लकड़ी को भी कुतर देंगे। यदि एक घर में दो चूहे हों, तो पूरे घर में प्रत्येक व्यक्ति परेशान हो जाएगा। कई बार वे तेल चुरा लेते हैं और उसे पी जाते हैं, कई बार वे अनाज खा जाते हैं और कपडे कुतर देते हैं-यह वह मुसीबत है जो चूहे लोगों के लिए लाते हैं। वे केवल छोटे चूहे हैं, लेकिन लोगों के पास उनसे निपटने का कोई तरीका नहीं है। यहाँ तक कि उनके द्वारा उन्हें भयभीत भी किया जाता है। कई बार वे थालीयां रखने के रैक पर चढ जाते हैं-क्या उन थालियों को अब भी उपयोग किया जा सकता है? उन थालियों को उपयोग नहीं किया जा सकता है, उनको कीटाणु मुक्त करने से भी काम नहीं चलता है और भले ही तुम उन्हें कीटाणु मुक्त करते हो फिर भी तुम्हें अच्छा महसूस नहीं होगा, अतः तुम बस उन्हें बाहर फेंक देते हो। और वे चीज़ें जिन्हें वे खा नहीं सकते हैं वे उसे चबा कर टुकड़े टुकड़े कर देते हैं और उन्हें पूरी तरह से गन्दगी में बदल देते हैं। वे कपड़े, जूते, लकड़ी, और कुर्सी टेबल को चबाते रहते हैं-वे सबकुछ को चबाते रहते हैं। चूहों के पूरे समूह के विषय में बात करने की भी कोई ज़रुरत नहीं है-गड़बड़ी फ़ैलाने के लिए चूहे का केवल एक जोड़ा ही पर्याप्त है। यदि उन्हें एक विपत्ति बनना होता, तो परिणाम अकल्पनीय होते।

अतः, यदि नन्हीं छोटी चींटियाँ एक विपत्ति बन जातीं, तो यह किसके समान होता? वह नुकसान जो वे मानवजाति को पहुंचातीं उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। चीटियाँ उस बिन्दु तक लकड़ी को खाती हैं कि एक घर धराशायी हो जाता है जो एक अनोखी चीज़ नहीं है। उनकी शक्ति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। अतः, यदि संयुक्त राष्ट्र में दीमक या दीमकों के अण्डों को लकड़ी के घर के भीतर पाया जाता है, तो यह एक बड़ी घटना होती है। तुम्हें एक पेशेवर कम्पनी खोजनी होगी जिसके पास तकनीकी कर्मचारी हों जिनके पास उन्हें मारने के लिए पेशेवर साधन हों। यदि तुम उन्हें नहीं मारते हो, तो उस घर को बेचना मुश्किल होगा और यह एक बड़ी समस्या होगी। क्या तुमने चींटियों की एक बस्ती के बारे में सुना था जिसने एक घोड़े को खा लिया था? चींटियों की एक बस्ती थी जो एक विशाल घोड़े के ऊपर झुण्ड में इक्कट्ठी थी, और जो कुछ उस घोड़े में बचा वह सिर्फ उसका कंकाल था। क्या यह डरावना है या क्या है? और जब घुड़सवार ने यह देखा, तो वह बचकर कहां भागा? वहां पास ही में एक झील थी, अतः वह झील की ओर भागा और तैरकर दूसरी ओर चला गया। वह उस तरह से ज़िन्दा बचा था। लेकिन इसे देखने के पश्चात्, वह अपनी बाकि ज़िन्दगी यह भूलने में असमर्थ था कि किस प्रकार उन नन्हीं छोटी चींटियों के पास अनपेक्षित रूप से ऐसी शक्ति थी। उन्होंने लगभग उसे खा ही लिया था। यदि उसके पास एक घोड़ा नहीं होता, तो निश्चित रूप से चींटियों ने पहले उसे खाया होता, और क्योंकि उनके बीच में पानी था, इसलिए चींटियाँ जाकर उसे खाने के लिए समय पर एक पुल बनाने में सक्षम नहीं हो पाई थीं। यदि वहां पानी नहीं होता तो घोड़े और उस व्यक्ति दोनों को एक साथ खा लिया गया होता। चींटियों की ताकत को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

और यदि विभिन्न प्रकार के पक्षी विपत्ति में बदल जाएं तो यह भी एक भयावह बात होगी। अर्थात्, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस प्रकार के पशु या जीवित प्राणी हैं, जैसे ही वे अपना सन्तुलन खोते हैं, वे बढ़ेंगे, प्रजनन करेंगे, और एक असामान्य दायरे, और एक अनियमित दायरे के भीतर रहेंगे। यह मनुष्य के लिए अकल्पनीय परिणामों को लेकर आएगा। यह न केवल लोगों के जीवित रहने और जीवन को प्रभावित करेगा, बल्कि यह मानवजाति के लिए विपत्ति भी लाएगा, उस बिन्दु तक जहाँ लोग सम्पूर्ण विनाश का कष्ट सहते हैं, और विलुप्त होने के दुर्भाग्य का कष्ट सहते हैं।

जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की, तब उसने उन्हें सन्तुलित करने के लिए, पहाड़ों और झीलों की जीवित दशाओं को सन्तुलित करने के लिए, पौधों और सभी प्रकार के पशुओं, पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों की जीवित दशाओं को सन्तुलित करने के लिए सभी प्रकार की पद्धतियों और तरीकों का उपयोग किया-उसका लक्ष्य था सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को उन नियमों के अंतर्गत जीने और बहुगुणित होने की अनुमति दे जिन्हें उसने स्थापित किया था। सभी प्राणी इन नियमों के बाहर नहीं जा सकते हैं और न वे उन्हें तोड़ सकते हैं। केवल इस प्रकार के मूल वातावरण के अंतर्गत ही मनुष्य पीढ़ी दर पीढ़ी सकुशल जीवित रह सकते हैं और बहुगुणित हो सकते हैं। यदि कोई जीवित प्राणी परमेश्वर के द्वारा स्थापित मात्रा या दायरे से बाहर चला जाता है, या यदि वह उसके शासन के अधीन उस वृद्धि दर, आवृत्ति, या संख्या से अधिक बढ़ जाता है, तो जीवित रहने के लिए मानवजाति का वातावरण विनाश के भिन्न भिन्न मात्राओं को सहेगा। और उसी समय, मानवजाति का जीवित रहना खतरे में पड़ जाएगा। यदि एक प्रकार का जीवित प्राणी संख्या में बहुत अधिक है, तो यह लोगों के भोजन को छीन लेगा, लोगों के जल के स्रोत को नष्ट कर देगा, और उनके निवास स्थान को बर्बाद कर देगा। उस तरह से, मनुष्य का प्रजनन या जीवित रहने की दशा तुरन्त प्रभावित होगी। उदाहरण के लिए, पानी सभी चीज़ों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यदि बहुत सारे जानवर हैं-यदि चूहों, चींटियों, टिड्डियों, और मेंढकों की संख्या बहुत अधिक है और उन्हें पानी पीने की आवश्यकता है-जब इतनी बड़ी संख्या में पशु हैं, तो जल की वह मात्रा जो वे पीते हैं वह भी बढ़ जाएगी। जब कि पीने के पानी के स्रोत और जलीय क्षेत्रों के इस स्थायी दायरे के अंतर्गत जल की वह मात्रा जिसे वे पीते हैं बढ़ती जाती है, तो लोगों के पीने का पानी और जल के स्रोत कम हो जाएंगे, और उन्हें जल की कमी होगी। यदि लोगों के पीने का पानी नष्ट, दूषित, या बर्बाद हो जाता है क्योंकि सभी प्रकार के जानवर संख्या में बढ़ गए हैं, तो जीवित रहने के लिए उस प्रकार के कठोर वातावरण के अधीन, मानवजाति का जीवित रहना गम्भीर रूप से खतरे में पड़ जाएगा। यदि एक प्रकार के या अनेक प्रकार के जीवित प्राणी हैं जो अपनी उपयुक्त संख्या से आगे बढ़ जाते हैं, तो हवा, तापमान, आर्द्रता, और यहाँ तक कि जीवित रहने के मानवजाति के आकाश के अंतर्गत हवा के तत्व भी भिन्न भिन्न मात्रा में ज़हरीले और नष्ट हो जाएंगे। उसी प्रकार, इन परिस्थितियों के अधीन, मनुष्य का जीवित रहना और उसकी नियति तब भी उस प्रकार के वातावरण के खतरे के वश में होगी। अतः, यदि लोग इन सन्तुलनों को खो देते हैं, तो वह हवा जिसमें वे सांस लेते हैं ख़राब हो जाएगी, वह जल जो वे पीते हैं दूषित हो जाएगा, और वे तापमान जिसकी उन्हें ज़रुरत है वह भी बदल जाएगा, और भिन्न भिन्न मात्रा से प्रभावित होगा। यदि ऐसा होता है, तो जीवित रहने के लिए मानवजाति के देशीय वातावरण बहुत बड़े प्रभावों और चुनौतियों के अधीन होंगे। इस परिस्थिति के अधीन जहाँ जीवित रहने के लिए मनुष्यों के मूल वातावरण को नष्ट कर दिया गया है, तो मानवजाति की नियति और भविष्य की सम्भावनाएं क्या होंगी? यह एक बहुत गम्भीर समस्या है!

क्योंकि परमेश्वर जानता है कि सभी चीज़ें मनुष्य के लिए क्या हैं, हर एक प्रकार की वस्तु की भूमिका जिसे उसने बनाया है, इसका लोगों पर कैसा प्रभाव है, और यह मानवजाति के लिए कितना बड़ा लाभ लेकर आता है-परमेश्वर के हृदय में इन सब के लिए एक योजना है और वह सभी चीज़ों के हर एक पहलु का प्रबन्ध करता है जिसे उसने सृजा है, अतः मनुष्यों के लिए, हर एक चीज़ जो वह करता है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है-यह सब ज़रुरी है। अतः चाहे तुम सभी चीज़ों के मध्य किसी पारिस्थितिक घटना को देखते हो, या सभी चीज़ों के मध्य कुछ प्राकृतिक नियमों को, तो तुम हर एक चीज़ की आवश्यकता के विषय में आगे से शंकालु नहीं होगे जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था। तुम सभी चीज़ों के विषय में परमेश्वर के इन्तज़ामों पर और मानवजाति के लिए आपूर्ति करने हेतु उसके विभिन्न तरीकों पर मनमाने ढंग से फैसले लेने के लिए आगे से अज्ञानता के शब्दों का उपयोग नहीं करोगे। साथ ही तुम सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर के नियमों पर मनमाने ढंग से निष्कर्ष नहीं निकालोगे। क्या मामला ऐसा ही नहीं है?

यह सब क्या है जिसके विषय में हमने अभी बात की है? इसके बारे में सोचिए। हर एक चीज़ में जो परमेश्वर करता है उसमें उसका अपना इरादा होता है। भले ही मनुष्य उस इरादे को नहीं देख सकते हैं, फिर भी यह हमेशा मानवजाति के जीवित रहने से बहुत अधिक सम्बन्धित होता है। यह अविभाज्य रूप से इससे सम्बन्धित है-यह परम आवश्यक है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने कभी ऐसा काम नहीं किया जो व्यर्थ हो। क्योंकि हर एक चीज़ जो वह करता है, उसकी योजना उसके वाद (थ्योरी) और सिद्धान्तों के अंतर्गत है, जिसमें उसकी बुद्धि समाविष्ट है। उस योजना और इरादे के पीछे का लक्ष्य मनुष्य की सुरक्षा के लिए है, और विनाश, किसी जीवित प्राणी द्वारा आक्रमण, और सभी चीज़ों के द्वारा मनुष्यों के किसी प्रकार के नुकसान को टालने हेतु मानवजाति की सहायता के लिए है। अतः परमेश्वर के कार्यों से जिन्हें हम ने इस शीर्षक से देखा है जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं, क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के लिए अन्य तरीके से प्रबन्ध करता है? क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर मानवजाति को इस तरह से खिला रहा है और उसकी चरवाही कर रहा है? तुम निश्चित रूप से कह सकते हो। अब तुम लोगों को समझना चाहिए, क्या इस विषय और हमारी संगति के शीर्षक, "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" के बीच एक मज़बूत सम्बन्ध है? (हां) एक मज़बूत सम्बन्ध है, और यह विषय उसका एक पहलु है। इन विषयों के बारे में बात करने से पहले, लोगों के पास परमेश्वर, स्वयं परमेश्वर और उसके कार्यों की कुछ अस्पष्ट कल्पनाएँ थीं-उनके पास इन चीज़ों की सच्ची समझ नहीं थी। फिर भी, जब लोगों को उसके कामों और उन चीज़ों के बारे में बताया जाता है जिन्हें उसने किया है, तो वे जो कुछ परमेश्वर करता है उसके सिद्धान्तों को समझ और बूझ सकते हैं और वे इस पर स्पष्टता हासिल कर सकते हैं, ठीक है? (हां।) भले ही परमेश्वर के हृदय में, उसके वाद (थ्योरी), सिद्धान्त और नियम बहुत ही जटिल हैं उस समय जब वह कुछ करता है, जब उसने सभी चीज़ों की सृष्टि की, और जब वह सभी चीज़ों पर शासन करता है, फिर भी यदि तुम लोगों के साथ संगति में बांटने के लिए एक चीज़ ली जाती है, तो क्या तुम सब अपने हृदय में समझने में सक्षम नहीं होगे कि ये परमेश्वर के कार्य हैं, और बहुत ठोस हैं? (हां)। तब परमेश्वर के विषय में तुम सबकी वर्तमान सोच पहले से अलग कैसे है? यह अपने सार-तत्व में भिन्न है। जो कुछ तुम सभी पहले समझते थे वह बहुत खोखला, एवं बहुत अस्पष्ट था, और जो कुछ तुम सब अब समझते हो उसमें परमेश्वर के कार्यों को थामें रहने के लिए, जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उससे तुलना करने के लिए बहुत सारे ठोस प्रमाण शामिल हैं। अतः, सब कुछ जो मैं ने कहा है वह परमेश्वर के विषय में तुम लोगों की समझ के लिए बड़ी सामग्री है।

आज की संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा! तुम्हारी शाम अच्छी हो! (अलविदा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर।)

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
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