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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

(II) परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है     भाग तीन

यहाँ तक चर्चा करने के बाद, क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम सब के पास इस वाक्यांश "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" के निहित अर्थ की एक आंशिक समझ है? (हाँ।) मैं जानता था कि जब मैंने इस विषय पर चर्चा की थी तब बहुत से लोग तुरन्त ही इसके विषय में सोचते कि परमेश्वर किस प्रकार सच्चाई है और किस प्रकार उसका वचन हमारे लिए आपूर्ति करता है, लेकिन वे सिर्फ इस स्तर पर ही इसके विषय में सोचते। कुछ लोग यहाँ तक महसूस करते कि परमेश्वर के द्वारा मानवीय जीवन की आपूर्ति को, और प्रतिदिन के भोजन एवं पेय पदार्थ एवं तमाम दैनिक आवश्यकताओं की आपूर्ति को मनुष्य की आपूर्ति के रूप नहीं गिना जाता है। क्या कुछ लोग इस तरह से महसूस करते हैं? (हाँ।) क्या इस बात में परमेश्वर का अभिप्राय बिलकुल स्पष्ट नहीं है कि किस प्रकार उसने हर एक चीज़ की सृष्टि की है ताकि मनुष्य सामान्य रूप से अस्तित्व में रह सके और जीवन बिता सके? परमेश्वर उस वातावरण को कायम रखता है जिस में लोग रहते हैं और वह उन सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है जिनकी इस मानवजाति को आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, वह सभी चीज़ों का प्रबंध करता है और उनके ऊपर प्रभुत्व रखता है। यह सब कुछ मानवजाति को सामान्य रूप से जीने और सामान्य रूप से फलने फूलने की अनुमति देता है; यह इसी तरह से है कि परमेश्वर सभी चीज़ों और मानवजाति के लिए आपूर्ति करता है। क्या लोगों को इन चीज़ों को पहचानने एवं समझने की आवश्यकता है? (हाँ।) शायद कुछ लोग कह सकते हैं, "यह विषय स्वयं सच्चे परमेश्वर के विषय में हमारे ज्ञान से बहुत दूर है, और हम इसे नहीं जानना चाहते हैं क्योंकि मनुष्य केवल रोटी से ही जीवित नहीं रह सकता है, किन्तु इसके बजाए परमेश्वर के वचन के द्वारा जीवित रहता है।" क्या यह सही है? (नहीं।) यहाँ क्या गलत है? क्या तुम लोगों के पास परमेश्वर के वचन की पूर्ण समझ हो सकती है यदि तुम सब केवल उन्हीं चीज़ों को जानते हो जिन्हें परमेश्वर ने कहा है? यदि तुम लोग केवल उसके कार्य एवं उसके न्याय और ताड़ना को ही स्वीकार करते हो, तो क्या तुम सब के पास परमेश्वर की पूर्ण समझ होगी? यदि तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के अधिकार के एक छोटे से भाग को ही जानते हो; तो यह परमेश्वर की समझ को हासिल करने के लिए काफी है, सही है? (नहीं।) ऐसा क्यों है? (यह अत्यधिक एक तरफा है, क्योंकि हमारा ज्ञान खोखला है। लेकिन परमेश्वर के हर कार्य में जीवित एवं निर्जीव[क] चीज़ो समेत जैसे पर्वत एवं जलधाराएँ, झीलें, बीज, धूप एवं वर्षा जिन्हें हम देखते हैं, निहारते हैं एवं अनुभव करते हैं, हम परमेश्वर के एक व्यावहारिक समझ को प्राप्त करते हैं। सन्तानों के रुप में जब हमारी समझ जागृत होती है तो हम इन चीज़ों को देखना प्रारम्भ करते हैं और यह महसूस करते हैं कि वे वास्तविक हैं।) परमेश्वर के कार्य संसार की उसकी सृष्टि के साथ प्रारम्भ होते हैं और वे आज तक जारी हैं जहाँ उसके कार्य सभी समयों पर और हर क्षण प्रकट होते हैं। यदि लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मौजूद है सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने कुछ लोगों को चुना है जिनके ऊपर वह अपने कार्य को अंजाम देता है ताकि उन लोगों को बचाए, और यदि वे विश्वास करते हैं कि अन्य चीज़ें परमेश्वर, उसके अधिकार, उसके रुतबे, एवं उसके कार्य को शामिल नहीं करती हैं, तो क्या माना जा सकता है कि यह वाकई में परमेश्वर को जानना है? ऐसे लोग जिनके पास परमेश्वर का ऐसा तथाकथित ज्ञान है—जो एक पक्षीय दृष्टिकोण पर आधारित है कि परमेश्वर बस लोगों के एक समूह तक ही सीमित है—वे अदूरदर्शी हैं। क्या यह परमेश्वर का असली ज्ञान है? ऐसे लोग जिनके पास परमेश्वर का इस प्रकार का ज्ञान है क्या वे उसके द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि का और उनके ऊपर उसके प्रभुत्व का इन्कार नहीं करते हैं? कुछ लोग इसे स्वीकार करने की इच्छा नहीं करते हैं, और शायद वे अपने आप में सोचते हैं: "मैं सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व को नहीं देखता हूँ, यह कुछ ऐसा है जो मुझ से बहुत दूर है और मैं इसे समझना नहीं चाहता हूँ। परमेश्वर जो कुछ चाहता है वह उसे करता है और इसका मुझ से कोई लेना देना नहीं है। मैं अपने आपको बस परमेश्वर की अगुवाई को स्वीकार करने से और उसके वचन से और परमेश्वर के द्वारा मुझे सार बनाया जाएगा और मुझे बचाया जाएगा इन बातों से ही जोड़ता हूँ। मैं केवल इन्हीं चीज़ों पर ध्यान दूंगा, लेकिन मैं किसी अन्य बात को समझने की कोशिश नहीं करूंगा या इसके बारे में बिल्कुल नहीं सोचूंगा। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी तब जो भी नियम उसने बनाए थे या उनकी एवं मानवजाति की आपूर्ति करने के लिए जो कुछ परमेश्वर करता है उसका मेरे साथ कोई लेना देना नहीं है।" यह किस प्रकार की बात है? क्या यह बिल्कुल शर्मनाक नहीं है? क्या तुम लोगों में से कोई है जो ऐसा सोचता है? मैं जानता हूँ कि अत्यधिक मात्रा में ऐसे लोग हैं जो इस रीति से सोचते हैं भले ही तुम लोग ऐसा नहीं कहोगे। इस प्रकार के नियमानुसार चलने वाले लोग शायद इस बात में अपने स्वयं के तथाकथित आत्मिक दृष्टिकोण का उपयोग कर सकते हैं कि वे किस प्रकार प्रत्येक चीज़ को देखते हैं। वे परमेश्वर को बाइबल तक सीमित करना चाहते हैं, उन वचनों तक सीमित करना चाहते हैं जिन्हें उसने कहा है, और परमेश्वर को बस लिखित वचनों तक ही सीमित करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के विषय में और अधिक जानने की इच्छा नहीं करते हैं और वे नहीं चाहते हैं कि परमेश्वर अन्य कार्यों को अंजाम देने में अधिक ध्यान दे। इस प्रकार की सोच बचकानी है और बहुत धार्मिक है। क्या ऐसे लोग परमेश्वर को जान सकते हैं जो ऐसे दृष्टिकोणों को थामे हुए हैं? उन्हें परमेश्वर को जानने में कठिनाई होगी। आज मैंने इन दो कहानियों को बताया है और इन दो पहलुओं के विषय में बात की है। उनको अभी अभी सुनने के बाद और बस अभी अभी उनके सम्पर्क में आने के बाद, हो सकता है कि तुम लोग महसूस करो कि वे गंभीर हैं या थोड़े संक्षिप्त हैं और बूझने एवं समझने के लिए कठिन हैं। हो सकता है कि उन्हें परमेश्वर के कार्यों से और स्वयं परमेश्वर से जोड़ना और भी अधिक कठिन हो। फिर भी, परमेश्वर के सभी कार्य और वह सब जिसे उसने सभी चीज़ों के मध्य एवं सम्पूर्ण मानवजाति के मध्य किया है उन्हें प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा तथा हर किसी के द्वारा स्पष्ट रूप से एवं सटीक रूप से पहचाना जाना चाहिए जो परमेश्वर को जानने का प्रयास करता है। यह ज्ञान तुम्हें परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व के विषय में पुष्टिकरण एवं उसमें विश्वास देगा। साथ ही यह तुम्हें परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सामर्थ्य, और किस प्रकार वह सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करता है इसके विषय में सटीक ज्ञान भी देगा। यह तुम्हें परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व को साफ साफ मन में ग्रहण करने और यह देखने की अनुमति देगा कि यह कपोल कल्पना नहीं है, और एक पौराणिक कथा नहीं है। यह तुम लोगों को यह देखने की अनुमति देता है कि यह अस्पष्ट नहीं है, और बस एक सिद्धान्त नहीं है, और यह कि परमेश्वर निश्चित तौर पर सिर्फ एक आत्मिक सहारा ही नहीं है, लेकिन वह सचमुच में मौजूद है। इसके अतिरिक्त यह तुम्हें अनुमति देता है कि उसे परमेश्वर के रूप में इस रीति से जानो कि उसने हमेशा से ही सभी चीज़ों के लिए और मानवजाति के लिए आपूर्ति की है; वह इसे अपने स्वयं के तरीके से और अपने स्वयं के सुर ताल के अनुसार करता है। अतः कहा जा सकता है कि यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने सभी चीज़ों को सृजा है और उसने उन्हें नियम दिए हैं कि उसकी आज्ञा के द्वारा उनमें से हर एक अपने आवंटित कार्य को क्रियान्वित करता है, अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करता है, और उस भूमिका को निभाता है जिसे उनमें से हर एक को दिया गया था। सभी चीज़ें मानवजाति के लिए अपनी स्वयं की भूमिका को निभाते हैं, और इसे ऐसे स्थान में एवं ऐसे वातावरण में अंजाम देते हैं जहाँ लोग रहते हैं। यदि परमेश्वर इस प्रकार से चीज़ों को अंजाम नहीं देता और मानवजाति का वातावरण ऐसा न होता जैसा है, तो परमेश्वर में लोगों का विश्वास या उनके द्वारा उसका अनुसरण करना—इसमें से कुछ भी सम्भव नहीं होता; यह महज खोखली बात होती, क्या यह सही नहीं है?

आओ हम इस कहानी पर एक और नज़र डालें जिसे हमने बस अभी अभी सुना था। बड़े पर्वत एवं छोटी जलधारा के सम्बन्ध में, पर्वत क्या है? जीवित प्राणी पर्वत पर फलते फूलते हैं अतः इसके अस्तित्व का अपने आप में ही एक मूल्य है। ठीक इसी समय, पर्वत छोटी जलधारा को रोकता है, यह सुनिश्चित करता है कि वह जहाँ वह चाहती है वहाँ न बहे और इसके परिणामस्वरूप लोगों के लिए तबाही न लाए। क्या यह सही नहीं है? पर्वत के अस्तित्व के सद्गुण के द्वारा, यह जीवित चीज़ों जैसे वृक्ष एवं घास और सभी अन्य पौधों एवं जानवरों को पर्वत पर फलने फूलने की अनुमति देता है जबकि साथ ही जहाँ छोटी जलधारा बहती है उसे भी दिशानिर्देश देता है; पर्वत जलधारा के जल को एकत्रित करता है और प्राकृतिक रूप से अपने निचले सिरे पर उसका मार्गदर्शन करता है जहाँ वह नदी में जा कर मिल सकती है और अन्ततः समुद्र में मिल सकती है। वे नियम जो यहाँ पर हैं उन्हें प्रकृति के द्वारा नहीं बनाया गया था, किन्तु उन्हें सृष्टि के समय खास तौर पर परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित किया गया था। जहाँ तक बड़े पर्वत एवं प्रचण्ड हवा की बात है, पर्वत को भी हवा की आवश्यकता होती है। पर्वत को हवा की आवश्यकता होती है कि उन जीवित प्राणियों को प्रेम से स्पर्श करे जो उस पर रहते हैं, और ठीक इसी समय हवा जितनी भी तेजी एवं प्रचण्डता से बहे पर्वत उसे सीमित करता है ताकि यह तबाह एवं बर्बाद न करे। यह नियम, एक रीति से, बड़े पर्वत के कर्तव्य को धारण किए हुए है, अतः क्या पर्वत के कर्तव्य से सम्बन्धित यह नियम अपने आप ही आकार लेता है? (नहीं।) इसके बजाय इसे परमेश्वर के द्वारा बनाया गया था। उस बड़े पर्वत के पास अपना स्वयं का कर्तव्य है और साथ ही उस प्रचण्ड हवा के पास भी अपना स्वयं का कर्तव्य है। अब, उस बड़े पर्वत एवं विशाल लहर के विषय में, पर्वत के वहाँ न होने पर क्या जल अपने आप ही बहने की दिशा को ढूँढ़ पाता? (नहीं)। जल भी नाश एवं बर्बाद करता। पर्वत के पास एक पर्वत के रूप में अपना स्वयं का मूल्य है, और समुद्र के पास भी एक समुद्र के रूप में अपना स्वयं का मूल्य है। इस प्रकार से, इन परिस्थितियों के अंतर्गत जहाँ वे एक दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करते हैं और जहाँ वे सामान्य रूप से एक साथ मौजूद रह सकते हैं, वे एक दूसरे को रोकते भी हैं, बड़ा पर्वत समुद्र को रोकता है ताकि वह जलमग्न न करे और इस प्रकार यह लोगों के घरों की सुरक्षा करता है, और साथ ही यह समुद्र को अनुमति भी देता है कि वह उन जीवित प्राणियों का पोषण करे जो उसके भीतर रहते हैं। क्या इस भूदृश्य ने अपने आप ही आकार लिया है? (नहीं।) इसे भी परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था। हम इन छवियों से देखते हैं कि जब परमेश्वर ने संसार को सृजा था, तब उसने पहले से ही निर्धारित किया था कि पर्वत कहाँ स्थित होगा, जलधारा कहाँ बहेगी, किस दिशा से प्रचण्ड हवा बहनी शुरू होगी और वह कहाँ जाएगी, साथ ही साथ विशाल लहरें कितनी ऊँची होंगी। परमेश्वर के इरादे एवं उद्देश्य इन सभी चीज़ों के अंतर्गत हैं और वे उसके कार्य हैं। अब, क्या तुम लोग देख सकते हो कि परमेश्वर के कार्य सभी चीज़ों में मौजूद हैं? (हाँ।)

इन बातों के विषय में हमारी चर्चा का उद्देश्य क्या है? क्या यह इसलिए है ताकि लोग परमेश्वर के द्वारा संसार की सृष्टि के पीछे के नियमों पर शोध कर सकें? क्या यह इसलिए है ताकि लोग खगोल विज्ञान एवं भौतिकी में रूचि लेने लगेंगे? (नहीं।) फिर यह क्या है? यह इसलिए है ताकि लोग परमेश्वर के कार्यों को समझेंगे। परमेश्वर के कार्यों को समझने का अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसके कार्यों की समझ से, लोग यह दृढ़ता से कह सकते हैं और सत्यापित कर सकते हैं कि परमेश्वर ही सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है। यदि तुम इस बिन्दु को समझने में सक्षम हो, तो तुम वाकई में इसकी पुष्टि करने में सक्षम होगे कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में प्रभावी भूमिका रखता है और तुम इसकी पुष्टि करने में सक्षम होगे कि परमेश्वर ही स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, और स्वर्ग एवं पृथ्वी तथा सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता है। अतः, क्या यह परमेश्वर के विषय में तुम्हारी समझ के लिए उपयोगी है कि सभी चीज़ों के नियमों को जानें और परमेश्वर के कार्यों को जानें? (हाँ।) यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। सबसे पहले, जब तुम परमेश्वर के इन कार्यों को समझते हो, तो क्या तुम अब भी खगोल विज्ञान एवं भूगोल में रूचि लोगे? क्या तुम्हारे पास अभी भी संशयवादी हृदय होगा और तुम सन्देह करोगे कि परमेश्वर सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता है? क्या तुम्हारे पास अब भी एक शोधकर्ता का हृदय होगा और तुम सन्देह करोगे कि परमेश्वर सभी चीज़ों का सृष्टिकर्ता है? जब तुम इसकी पुष्टि करोगे कि परमेश्वर इस संसार का सृष्टिकर्ता है और इसके अतिरिक्त उसकी सृष्टि के पीछे नियमों को जानने लगोगे, तो क्या तुम अपने हृदय में सचमुच में विश्वास करोगे कि परमेश्वर संसार के लिए आपूर्ति करता है? क्या "आपूर्ति करने" को सिर्फ किसी प्रकार के अर्थ के लिए कहा जा रहा है या क्या इसे किसी विशेष परिस्थिति में कहा जा रहा है? यह कि परमेश्वर संसार के लिए आपूर्ति करता है इसका एक बहुत ही व्यापक अर्थ एवं उपयोग है। सही है? परमेश्वर सिर्फ लोगों की भोजन एवं पेय की उनकी दैनिक आवश्यकताओं की ही आपूर्ति नहीं करता है, बल्कि वह मानवजाति को हर उस चीज़ की आपूर्ति करता है जिसकी उन्हें ज़रूरत है, जिसमें हर वह चीज़ शामिल है जिसे लोग देख सकते हैं और ऐसी चीज़ें शामिल हैं जिन्हें देखा नहीं जा सकता है। परमेश्वर उस वातावरण को सम्भालता है, उसका प्रबंध करता है और उस पर शासन करता है जिसकी आवश्यकता मानवजाति को है। जैसे मौसम में मानवजाति को जैसे वातावरण की आवश्यकता होती है, परमेश्वर ने उसे तैयार किया है। मानवीय अस्तित्व के लिए जो भी वातावरण या जो भी तापमान उपयुक्त होता है वह भी परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन है और इनमें से कोई भी नियम अपने आप ही या यों ही बिना सोचे विचारे घटित नहीं होते है; वे परमेश्वर के नियम एवं उसके कार्यों का परिणाम हैं। स्वयं परमेश्वर ही इन सभी नियमों का स्रोत है और सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है। यह एक सार एवं अकाट्य सत्य है चाहे तुम इस पर विश्वास करते हो या नहीं, चाहे तुम इसे देख सकते हो या नहीं, या चाहे तुम इसे समझ सकते हो या नहीं।

जो कुछ परमेश्वर ने बाइबल में किया एवं कहा था मैं जानता हूँ कि बहुत ही भारी संख्या में लोग केवल उस पर विश्वास करते हैं, और यह कि परमेश्वर ने लोगों के एक छोटे समूह पर अपने कार्यों को प्रकट किया था ताकि लोग उसके अस्तित्व के महत्व को देख सकें, और उसके रुतबे को समझ सकें और यह जान सकें कि वह सचमुच में अस्तित्व में है। फिर भी, कई और लोगों के लिए यह तथ्य कि परमेश्वर ने संसार की रचना की थी और यह कि वह सभी चीज़ों के लिए प्रबंध करता है और उनकी आपूर्ति करता है अस्पष्ट एवं संदिग्ध प्रतीत होता है और यहाँ तक कि वे एक सन्देह की मनोवृत्ति भी रखते हैं। इस प्रकार की मनोवृत्ति लोगों को निरन्तर यह विश्वास करने के लिए प्रेरित करती है कि प्राकृतिक संसार के नियमों ने अपने आप ही आकार लिया है, यह कि प्राकृतिक संसार के परिवर्तन, रूपान्तरण, एवं प्राकृतिक घटनाएँ और ऐसे वास्तविक नियम जो प्रकृति को संचालित करते हैं वे उनकी स्वयं की सुइच्छा से उत्पन्न हुए हैं। इसका यह अर्थ है कि लोगों के मस्तिष्कों में, वे समझ नहीं सकते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी और उनके ऊपर शासन करता है, वे नहीं समझ सकते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रबंध करता है और उनकी आपूर्ति करता है। क्योंकि इस आधार कथन की सीमाओं के कारण, लोग परमेश्वर की सृष्टि में और सभी चीज़ों के ऊपर उसकी प्रभूता पर और इस बात पर विश्वास नहीं करते हैं कि वह आपूर्ति करनेवाला है; और यहाँ तक कि विश्वासी भी बस व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग तक ही सीमित हैं, अर्थात्, परमेश्वर के कार्य और साथ ही साथ मानवजाति के लिए उसकी आपूर्ति को किसी तरह से केवल उसके चुने हुए लोगों तक ही सीमित किया गया है। यह ऐसी चीज़ है जिसे देखने में मुझे घृणा आती है और यह अत्यधिक पीड़ा को लेकर आती है, क्योंकि मानवजाति उन सबका आनन्द उठाती है जो परमेश्वर लेकर आता है, और फिर भी ठीक उसी समय वे उन सबका इनकार करते हैं जो वह करता है और उन सब का इनकार करते हैं जो वह उन्हें देता है। लोग केवल यह विश्वास करते हैं कि स्वर्ग एवं पृथ्वी और सभी चीज़ें अपने स्वयं के प्राकृतिक नियमों के द्वारा और अपने स्वयं के प्राकृतिक विधियों के द्वारा संचालित होते हैं और यह कि उनका कोई शासक नहीं है कि उन पर नियन्त्रण करे और कोई शासक नहीं है कि उनकी आपूर्ति करे और उन्हें सुरक्षित रखे। भले ही तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, फिर भी तुम शायद यह विश्वास नहीं करते हो कि ये सब उसके कार्य हैं; परमेश्वर में हर एक विश्वासी के लिए, हर एक के लिए जो परमेश्वर के वचन को स्वीकार करता है, और हर एक के लिए जो परमेश्वर के वचन का पालन करता है यह एक अत्यंत उपेक्षित क्षेत्र है। अतः, जैसे ही मैं कुछ बातों पर चर्चा करना शुरू करता हूँ जो बाइबल से या तथाकथित आध्यात्मिक शब्दावली से मेल नहीं खाता है, तो कुछ लोग ऊब जाते हैं या थक जाते हैं या यहाँ तक कि असहज हो जाते हैं। ऐसा दिखाई देता है कि यह आत्मिक लोगों एवं आत्मिक बातों से अलग थलग हो गया है। यह बुरी बात है। जब परमेश्वर के कार्यों को जानने की बात आती है, हालाँकि हम खगोल विज्ञान, भूगोल या जीव विज्ञान की बात नहीं करते हैं, फिर भी हम सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की प्रभुता को जानते हैं, हम सभी चीज़ों के लिए उसकी आपूर्ति को जानते हैं, और यह कि वह सभी चीज़ों का स्रोत है। यह एक अति महत्वपूर्ण कार्य है और ऐसा कार्य है जिसका अवश्य अध्ययन किया जाना चाहिए, समझ गए? (हाँ।)

उन दो कहानियों के बारे में जिन्हें मैंने अभी अभी बताया था, हालाँकि उनमें शायद कुछ असामान्य विषयवस्तु हो सकती है और शायद उन्हें किसी अनोखी शैली में तुम लोगों को बताया गया होगा, तब भी मैं सीधी भाषा एवं एक सरल पद्धति का उपयोग करना चाहता था ताकि तुम लोग ऐसी चीज़ को समझ एवं स्वीकार कर सको जो और अधिक गंभीर है। यह मेरा एक मात्र लक्ष्य था: मैं चाहता था कि तुम लोग इन छोटी छोटी कहानियों एवं दृश्यों से देखो और विश्वास करो कि परमेश्वर सभी चीज़ों का शासक है। इन कहानियों को बताने का लक्ष्य यह है कि तुम लोगों को कहानी के सीमित घेरों के अंतर्गत परमेश्वर के असीमित कार्यों को देखने एवं जानने की अनुमति दी जाए। जब तुम लोग पूरी तरह से अपने आप में इस परिणाम पर पहुँच जाओगे, तो यह तुम्हारे स्वयं के व्यक्तिगत अनुभवों एवं तुम्हारे व्यक्तिगत अनुसरण पर निर्भर करता है। यदि तुम सत्य की तलाश करते हो और यदि तुम परमेश्वर को जानने की कोशिश करते हो, तो ये चीज़ें तुम्हारे लिए एक स्थायी एवं मज़बूत अनुस्मारक के रूप में कार्य करेंगी; वे तुम्हें अनुमति देंगी कि तुम्हारे पास एक गहरी जागरुकता हो, तुम्हारी समझ में एक स्पष्टता हो, और तुम परमेश्वर के वास्तविक कार्य में धीरे धीरे नज़दीक आते जाओगे, ऐसी नज़दीकी जिसमें कोई दूरी और कोई त्रुटि न होगी। फिर भी, यदि तुम परमेश्वर को जानने का प्रयास नहीं करते हो, तो ऐसी कहानियाँ जो तुमने सुनी हैं वे कहानियों से बढ़कर और कुछ भी नहीं हैं और वे तुम लोगों का कोई नुकसान नहीं कर सकती हैं। अतः तुम लोग उन्हें बस सच्ची कहानियाँ मान सकते हो।

क्या तुम लोगों ने इन दो कहानियों से कुछ समझा था? आगे बढ़ें और खुलकर बोलें। (परमेश्वर के द्वारा हमें इन दो कहानियों को बताने से, हम सचमुच में यह महसूस कर सकते हैं कि वह सभी चीज़ों का शासक, सृष्टिकर्ता एवं प्रबंधक है। हम परमेश्वर के कार्यों, उसकी सर्वसामर्थता, एवं उसकी बुद्धि को देखते हैं, और इससे हम और भी अधिक गहराई से उस बड़े प्रेम को भी महसूस करते हैं जो मानवजाति के प्रति परमेश्वर के पास है। जो कुछ परमेश्वर करता है, वह उसे मानवजाति के लिए करता है।) ठीक है, सबसे पहले, क्या मानवजाति के प्रति परमेश्वर की चिंता पर की गई हमारी पिछली चर्चा से इन दोनों कहानियों को अलग रखा गया है? क्या यहाँ कोई अनिवार्य सम्बन्ध है? (हाँ।) वह सम्बन्ध क्या है? क्या यह ऐसा है कि इन दोनों कहानियों के भीतर हम परमेश्वर के कार्यों को देखते हैं और यह देखते हैं कि वह किस प्रकार मानवजाति के लिए सभी चीज़ों की योजना बनाता है और उन्हें संभालता है? क्या यह ऐसा है कि जो कुछ परमेश्वर करता है और उसके सभी विचार मानवजाति के अस्तित्व के प्रति अग्रसर होते हैं? (हाँ।) क्या मानवजाति के लिए परमेश्वर के सतर्क विचार एवं सोच बिलकुल स्पष्ट नहीं है? (हाँ।) मानवजाति को कुछ भी नहीं करना पड़ता है। परमेश्वर ने लोगों के लिए उस वायु को बनाया है जिसमें से श्वास लेते हैं। तुम देख सकते हो कि सब्जियाँ एवं फल जिन्हें वे खाते हैं वे आसानी से उपलब्ध हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक, प्रत्येक प्रदेश के पास अपने स्वयं के प्राकृतिक संसाधन और विभिन्न फसलें होती हैं और फलों एवं सब्जियों को परमेश्वर के द्वारा लोगों के लिए तैयार किया गया है ताकि वे शान्ति से जीवन बिता सकें। यह सब सार करता है कि जो कुछ परमेश्वर ने सृजा है वह अच्छा है। विशाल वातावरण की बात करें, तो परमेश्वर ने सभी चीज़ों को आपस में जुड़ा हुआ, आपस में गुथा हुआ, और परस्पर निर्भर बनाया है। उसने सभी चीज़ों के जीवित बचे रहने के लिए और उनके अस्तित्व के लिए इस पद्धति एवं इन नियमों का उपयोग किया था और इस रीति से मानवजाति ने खामोशी से और शांति से जीवन बिताया है और विकसित हुई है और इस जीवन्त वातावरण में आज के दिन तक एक पीढ़ी से लेकर दूसरी पीढ़ी तक बहुगुणित हुई है। परमेश्वर ने मानवजाति के जीवित बचे रहने को सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक वातावरण को संतुलित किया है। यदि परमेश्वर के नियम एवं नियन्त्रण यथास्थान नहीं होते, तो कोई भी मनुष्य इस वातावरण को कायम एवं संतुलित नहीं रख सकता था, भले ही इसे परमेश्वर के द्वारा प्रथम स्थान पर सृजा गया था—यह अभी भी मानवजाति के जीवित बचे रहने को सुनिश्चित नहीं कर सकता है। अतः तुम देख सकते हो कि परमेश्वर इसे पूरी सारता से सम्भालता है। यदि मनुष्य एक बीज बनाता और उसे मिट्टी में बोता, तो क्या यह कभी अंकुरित होता? यदि मनुष्य एक वृक्ष बनाता और उसे भूमि पर लगता, तो कई सौ वर्षों में यह कभी एक पत्ते को भी उत्पन्न नहीं करता। मनुष्य जीवित बीजों को उत्पन्न नहीं कर सकता है। मनुष्य को परमेश्वर की योजना में बने रहकर जीवन जीना चाहिए। कुछ स्थानों में कोई हवा नहीं है, इसलिए लोग वहाँ नहीं रह सकते हैं और परमेश्वर तुम्हें वहाँ जाने की अनुमति नहीं देगा। अतः, सीमाओं के बाहर मत जाओ, यह मानवजाति की सुरक्षा के लिए है और ये सभी चीज़ें बड़ी रहस्यमयी हैं। वातावरण का हर एक कोना, पृथ्वी की लम्बाई एवं चौड़ाई, और पृथ्वी के सभी जीवित प्राणियों—जीवित एवं मृत दोनों—को परमेश्वर के द्वारा बनाया गया था और उसने उनके माध्यम से सोचा था: इस बात की आवश्यकता क्यों है? यह अनावश्यक क्यों है? इस चीज़ के यहाँ होने का क्या उद्देश्य है और उसे वहाँ क्यों जाना चाहिए? परमेश्वर ने पहले से ही यह सब बहुत अच्छे से सोच लिया था और लोगों को इन बातों को सोचने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर की समूची सृष्टि बिलकुल सार है! कुछ मूर्ख लोग हैं जो हमेशा पहाड़ों को हिलाने के विषय में सोचते रहते हैं, लेकिन ऐसा करने की अपेक्षा, मैदानों की ओर क्यों नहीं चले जाते हैं? यदि तुम पहाड़ों को पसन्द नहीं करते हो, तो तुम क्यों उनके पास रहने के लिए जाते हो? क्या यह मूर्खता नहीं है? यदि तुम उस पर्वत को हटा देते हो तो क्या होता है? तूफानी हवा आर पार बहने लगेगी या एक विशाल लहर बहाकर ले जाएगी और लोगों के घर नष्ट हो जाएँगे। क्या ऐसा करना एक मूर्खतापूर्ण कार्य नहीं होता? सही है? (हाँ।) लोग केवल नाश कर सकते हैं और शैतान बस इस विनाश को प्रोत्साहित करता है। शैतान हमेशा बड़ी बड़ी योजनाओं के विषय में सोचता रहता है और स्वयं को स्थापित करने के लिए और अपनी प्रतिष्ठा को अमर बनाने के लिए चालबाजी करता है। यहाँ तक कि इसने उस एकमात्र स्थान को भी तबाह कर दिया है जिसमें उसे रहना है, और फिर भी शैतान सभी चीज़ों की आपूर्ति और उनका प्रबंध करना चाहता है। कितना अज्ञानी और पूरी तरह से मूर्ख है!

परमेश्वर ने मनुष्य को सभी चीज़ों को सम्भालने और उनके ऊपर प्रभुता रखने की अनुमति दी है, पर क्या मनुष्य ने अच्छा काम किया है? (नहीं।) मनुष्य ने किस प्रकार ऐसा बुरा काम किया है? मानवजाति विनाश की ओर झुक जाती है; मानवजाति न केवल उन चीज़ों का संरक्षण करने में असमर्थ है जिन्हें परमेश्वर ने सृजा है, बल्कि उसने वास्तव में उनको नष्ट कर दिया है। मनुष्य ने पर्वतों को घटाकर मलबे में तब्दील कर दिया है, मिट्टी से समुद्रों का दम घोंट दिया है, और मैदानों को निर्जन स्थानों में बदल दिया है, जहाँ कोई नहीं रह सकता है। फिर भी निर्जन स्थानों में मनुष्य ने उद्योग की स्थापना की है और परमाणु संयंत्रों का निर्माण किया है और विनाश सभी दिशाओं में प्रबल होता है। नदियाँ अब आगे से नदियाँ नहीं रहीं, समुद्र अब आगे से समुद्र नहीं रहे, वे प्रदूषण से लबालब भर गए हैं। जब मानवजाति प्रकृति के संतुलन एवं नियमों को तोड़ती है, तो उनके विनाश एवं मृत्यु का दिन अधिक दूर नहीं है और यह अवश्यमभावी है। जब विनाश आता है, तब तुम जानोगे कि परमेश्वर की सृष्टि कितनी बहुमूल्य है और यह सब मानवजाति के लिए कितना महत्वपूर्ण है; इस तथ्य के प्रति मानवजाति जागना शुरू कर रही है। तुमने देखा, मनुष्य जो एक अच्छी जलवायु के साथ किसी वातावरण में रहता है तो यह स्वर्गलोक में रहने के समान है। लोग इस आशीष का एहसास नहीं करते हैं, परन्तु जिस क्षण वे इसे खो देते हैं तब वे यह देखेंगे कि यह सब कितना दुर्लभ एवं बेशकीमती है। कोई व्यक्ति किस प्रकार इन सब को वापस पाएगा? लोग क्या कर सकते हैं यदि परमेश्वर इसे फिर से बनाने के लिए तैयार न हो? तुम क्या कर सकते हो? (हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं।) वास्तव में, कुछ तो है जो तुम कर सकते हो और यह बहुत ही सरल है और जब मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि वह क्या है तो तुम लोग तुरन्त ही जान जाओगे कि यह संभव है। मनुष्य ने क्यों स्वयं को अपने मौजूदा वातावरण सम्बन्धी विकट परिस्थिति में पाया है? क्या यह मनुष्य के लोभ एवं विनाश के कारण है? यदि मनुष्य इस विनाश का अन्त करता है, तो क्या जीवन्त वातावरण अपने आप ही धीरे-धीरे ठीक नहीं होगा? यदि परमेश्वर कुछ नहीं करता है, यदि परमेश्वर आगे से मानवजाति के लिए कुछ भी करने की इच्छा नहीं करता है—कहने का तात्पर्य है, वह हस्तक्षेप करना नहीं चाहता है—इस विनाश को रोकने के लिए और चीज़ों को पुनः वैसा ही बनाने के लिए जैसे वे थे मानवजाति के लिए सबसे उत्तम तरीका यह होगा कि वह इस विनाश को रोक दे। इस समस्त विनाश को समाप्त करने का अर्थ है कि उन चीज़ों की लूट एवं बर्बादी को रोका जाए जिन्हें परमेश्वर ने सृजा है। यह उस वातावरण को धीरे धीरे सुधरने की अनुमति देगा जिसमें मनुष्य रहता है। ऐसा करने में असफल होने का परिणाम होगा वातावरण का और अधिक विनाश तथा यह केवल और अधिक गम्भीर हो जाएगा। क्या तुम नहीं देखते हो कि मेरा तरीका सरल है? (हाँ, यह है।) यह सरल एवं संभव है। वास्तव में सरल है, और यह कुछ लोगों के लिए संभव है, परन्तु क्या यह पृथ्वी पर बहुत भारी संख्या में लोगों के लिए संभव है? (यह नहीं है।) तुम्हारे लिए, कम से कम, क्या यह संभव है? (हाँ।) तुम्हारी "हाँ" कहाँ से आई है? क्या कोई कह सकता है कि इसमें परमेश्वर के कार्यों के विषय में समझ के एक आधार को स्थापित करना शामिल है? क्या कोई कह सकता है कि इसमें परमेश्वर के नियम एवं योजना में बने रहना शामिल है? (हाँ।) इन सब को बदलने का एक तरीका है, परन्तु यह वह विषय नहीं है जिस पर हम अभी चर्चा कर रहे हैं। परमेश्वर प्रत्येक मानव जीवन के लिए ज़िम्मेदार है और वह बिलकुल अन्त तक ज़िम्मेदार है। परमेश्वर तुम्हारे लिए आपूर्ति करता है, भले ही तुम्हें उस वातावरण के द्वारा बीमार कर दिया जाता है जिसे शैतान के द्वारा नष्ट किया गया था, या प्रदूषण के द्वारा प्रभावित किया गया था या कुछ हानि उठाई थी, फिर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है; परमेश्वर तुम्हारे लिए आपूर्ति करता है और वह तुम्हें निरन्तर जीवित रहने देगा। क्या तुम इसमें विश्वास रखते हो? (हाँ।) परमेश्वर मानव जीवन की हानि को हल्के में नहीं लेता है, सही है?

क्या तुम लोग परमेश्वर को समस्त जीवन स्रोत के रूप में पहचानने के महत्व को महसूस करने लगे हो? तुम्हारे पास क्या भावनाएँ हैं? आगे बढ़िए और मैं सुनूंगा। (अतीत में, हमने पर्वतों, समुद्र एवं झीलों को परमेश्वर के कार्यों के साथ जोड़ने के बारे में कभी नहीं सोचा था। आज, परमेश्वर की संगति के माध्यम से, हम अब समझ गए हैं कि ये हमेशा से ही परमेश्वर के कार्य थे और यह कि वे उसकी बुद्धि से उदय हुए हैं, अतः हम देखते हैं कि परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि को बिलकुल शुरुआत से ही पूर्वनिर्धारित किया गया था और वे सभी परमेश्वर की ख्याति को धारण किए हुए हैं। सभी चीज़ें आपस में जुड़ी हुई हैं और मानवजाति ही अंतिम लाभार्थी है। आज हमने जो कुछ सुना था वह बिलकुल ताज़ा और नया महसूस होता है, और हमने महसूस किया था कि परमेश्वर के कार्य कितने वास्तविक हैं। वास्तविकता में और हमारी दैनिक ज़िन्दगियों में जब हम जीवित प्राणियों के सम्पर्क में आते हैं तो हम वाकई में चीज़ों को वैसे ही देखते हैं जैसे वे हैं।) तुम सचमुच में इसे देखते हो, सही है? मानवजाति के लिए परमेश्वर की आपूर्ति किसी अच्छे आधार के बगैर नहीं होती है, वह मात्र कुछ वचनों को और बस इतना ही नहीं कहता है। परमेश्वर इतना कुछ करता है, यहाँ तक कि ऐसी चीज़ें जिन्हें तुम नहीं देखते हो उन्हें भी वह तुम्हारे लाभ के लिए करता है। मनुष्य इस वातावरण में एवं इस संसार में रहता है जिसे परमेश्वर ने सृजा है, और इसमें लोग एवं अन्य चीज़ें परस्पर निर्भर होती हैं, ठीक उसी तरह जैसे पौधों से निकली हुई गैस वायु को शुद्ध करती है और उन लोगों को लाभ पहुँचाती है जो इसे श्वास में लेते हैं। फिर भी, कुछ पौधे लोगों के लिए विषैले होते हैं, परन्तु क्या उन पौधों के पास अन्य पौधे नहीं होते हैं जो उनके साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं? यह परमेश्वर की सृष्टि के आश्चर्यों में से एक है! आज हमने इस विषय पर चर्चा नहीं की थी, इसके बजाए हमने मुख्य रूप से मनुष्य एवं अन्य चीज़ों की पारस्परिक निर्भरता पर, किस प्रकार मनुष्य अन्य चीज़ों के बगैर नहीं रह सकता है, और परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि के महत्व पर चर्चा की थी। मनुष्य अन्य चीज़ों के बिना नहीं रह सकता है, ठीक वैसे ही जैसे मनुष्य को जीने के लिए वायु की आवश्यकता होती है और कैसा होता यदि तुम्हें एक रिक्त स्थान में रख दिया जाता, तो तुम जल्द ही मर जाते। तुम्हें यह देखने की अनुमति देने के लिए यह एक मूलभूत सिद्धान्त है कि मनुष्य को अन्य चीज़ों की आवश्यकता होती है। अतः सभी चीज़ों के प्रति मनुष्य के पास किस किस्म की मनोवृत्ति होनी चाहिए? (उन्हें सँजोकर रखिए।) उन्हें सँजोकर रखिए, उनकी सुरक्षा कीजिए, प्रभावी ढंग से उनका उपयोग कीजिए, उन्हें नष्ट मत कीजिए, उन्हें बर्बाद मत कीजिए और किसी सनक के साथ उन्हें मत बदलिए, क्योंकि सभी चीज़ें परमेश्वर की ओर से हैं और उन्हें मानवजाति को प्रदान किया गया है और मानवजाति को उनसे ईमानदारी से व्यवहार करना होगा। आज हम ने इन दो विषयों पर चर्चा की है, और तुम लोग वापस जा सकते हो और अच्छी तरह से इनके बारे में सोच सकते हैं। अगली बार हम कुछ चीज़ों पर और अधिक विस्तार से चर्चा करेंगे। आज के लिए हमारी संगति यहाँ पर समाप्त होती है। अलविदा! (अलविदा!)

18 जनवरी 2014

पदटिप्पणियाँ:

क. मूल पाठ "जीवित एवं निर्जीव" को छोड़ देता है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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