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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

(II) परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है     भाग दो के क्रम में

मेरे द्वारा इस रीति से चीज़ों पर चर्चा करने और मेरे द्वारा इस रीति से वार्तालाप करने के विषय में तुम लोगों को कैसा महसूस होता है? क्या यह अच्छा है? (यह अच्छा है। यह वास्तविक है।) इसके विषय में क्या अच्छा है? (यह समझने में सरल है और इसके व्यावहारिक उदाहरण हैं।) यह चीज़ों पर चर्चा करने का एक ठोस तरीका है, सही है? क्या यह कहानी इसलिए ज़रूरी है ताकि यह पहचानने में लोगों की सहायता की जाए कि परमेश्वर सभी प्राणियों के लिए जीवन का स्रोत है? (हाँ।) यदि यह ज़रूरी है, तो हम अगली कहानी के साथ जारी रहेंगे। अगली कहानी में विषयवस्तु थोड़ी बहुत भिन्न हैं और साथ ही मुख्य बिन्दु भी थोड़ी भिन्न है; इस कहानी में ऐसी बातें हैं जिन्हें लोग परमेश्वर की सृष्टि के मध्य देख सकते हैं। मैं एक बार फिर से कहानी बताने की पद्धति का इस्तेमाल करूंगा, जिसे तुम सभी चुपचाप सुन सकते हो और उसके ऊपर विचार कर सकते हो कि वह क्या है जिसके विषय में मैं बात कर रहा हूँ। जब मैं कहानी समाप्त करूँ उसके बाद, मैं तुम लोगों से यह देखने के लिए कुछ प्रश्न पूछूँगा कि तुम सब लोगों ने कितना कुछ सीखा है? इस कहानी के मुख्य पात्र हैं एक बड़ा पर्वत, एक छोटी जलधारा, एक प्रचण्ड हवा, एक विशाल लहर।

कहानी 2. एक बड़ा पर्वत, एक छोटी जलधारा, एक प्रचण्ड हवा, एक विशाल लहर।

एक छोटी सी जलधारा थी जो यहाँ वहाँ घूमती हुई बहती थी, और अन्ततः वह एक बड़े पर्वत के निचले सिरे पर पहुँची। पर्वत उस छोटी जलधारा के मार्ग को रोक रहा था, अतः उस जलधारा ने अपनी कमज़ोर एवं धीमी आवाज़ में पर्वत से कहा, "कृपया मुझे गुज़रने दें, तुम मेरे मार्ग में खड़े हुए हो और मेरे आगे के मार्ग रोक रहे हो।" तब उस पर्वत ने पूछ, "तुम कहाँ जा रही हो?" इस पर उस छोटी सी जलधारा ने जवाब दिया, "मैं अपने घर को ढूंढ़ रही हूँ।" पर्वत ने कहा, "ठीक है, आगे बढ़ो और सीधे मेरे ऊपर से बहकर निकल जाओ!" परन्तु क्योंकि वह छोटी जलधारा बहुत ही कमज़ोर थी और काफी छोटी थी, उसके लिए कोई और मार्ग नहीं था कि वह ऐसे विशाल पर्वत के ऊपर से बहे, अतः उसके पास पर्वत के निचले सिरे पर लगातार बहते रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था...।

एक प्रचण्ड हवा वहाँ घूमने लगी, और अपने साथ धूल और रेत को लेकर वहाँ आई जहाँ वह पर्वत था। हवा पर्वत पर जोर से चीखी, "मुझे जाने दो!" पर्वत ने कहा, "तुम कहाँ जा रही हो? हवा ने पलटकर चिल्लाया, "मैं पर्वत के उस पार जाना चाहती हूँ।" पर्वत ने कहा, "ठीक है, अगर तुम मेरे बीच से होकर निकल सकती हो, तो तुम जा सकती हो!" प्रचण्ड हवा इस तरह से और उस तरह से चिल्लाने लगी, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि वह कितनी प्रचण्डता से बही, वह पर्वत के बीच से होकर नहीं निकल सकी। हवा थक गई, और आराम करने के लिए रूक गई। अतः पर्वत के उस किनारे पर केवल एक कमज़ोर हवा व्याकुलता से बहने लगी, जिसने वहाँ लोगों को प्रसन्न कर दिया। वह अभिवादन ऐसा ही था जिसे पर्वत ने लोगों को दिया...।

समुद्र के तट पर, सागर की फुहार चट्टानों पर आहिस्ता आहिस्ता लुढ़कने लगी। अचानक, एक विशाल लहर ऊपर आई और गरजती हुई पर्वत की ओर आपना मार्ग बनाने लगी। "हट जाओ!" विशाल लहर चिल्लाने लगी। पर्वत ने पूछा, "तुम कहाँ जा रही हो?" बड़ी लहर नहीं रूकी, और वह लगातार उमड़ने लगी जब उसने जवाब दिया, "मैं अपनी सीमा को बढ़ा रही हूँ और मैं अपने बाजुओं को थोड़ा और फैलाना चाहती हूँ।" पर्वत ने कहा, "ठीक है, यदि तुम मेरी चोटी से गुज़र सकती हो, तो मैं तुम्हें रास्ता दे दूँगा। विशाल लहर थोड़ा पीछे हटी, और तब एक बार फिर से पर्वत की ओर उमड़ने लगी। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि उसने कितना कठिन प्रयास किया, वह पर्वत के ऊपर से नहीं जा सकी। उसके पास इसके सिवाय कोई और विकल्प नहीं था कि धीरे से वापस वहाँ चली जाए जहाँ से वह आई थी...।

शताब्दियाँ गुज़रने के बाद, वह छोटी जलधारा आहिस्ता आहिस्ता पर्वत के निचले सिरे के चारों ओर रिसने लगी। उस पथक्रम का अनुसरण करने के द्वारा जिसे पर्वत ने बनाया था, वह छोटी जलधारा वापस अपने निवास में पहुँच गई; वह नदी में मिल गई, और समुद्र में बह गई। पर्वत की देखभाल के अधीन, वह छोटी जलधारा कभी खत्म नहीं हुई। छोटी जलधारा और पर्वत एक दूसरे पर भरोसा करते थे, वे एक दूसरे को रोके हुए थे, और वे एक दूसरे पर निर्भर रहे।

शताब्दियाँ गुज़रने के बाद, प्रचण्ड हवा ने पर्वत पर चीखने चिल्लाने की अपनी आदतों को नहीं बदला। जब प्रचण्ड हवा पर्वत के पास “पहुँची” तो वह रेत की बड़े बड़े भंवरों को उड़ाने लगी ठीक वैसे ही जैसे वह पहले करती थी। उसने पर्वत को धमकाया, लेकिन पर्वत के बीच में से होकर कभी नहीं निकल पाई। प्रचण्ड हवा और बड़ा पर्वत एक दूसरे पर भरोसा करते थे, वे एक दूसरे को रोके हुए थे, और एक दूसरे पर निर्भर थे।

शताब्दियाँ गुज़रने के बाद, विशाल लहर ने भी आराम नहीं किया, और कभी फैलना बन्द नहीं किया। वह पर्वत की ओर बार बार गरजती और उमड़ती, फिर भी पर्वत कभी एक इंच भी नहीं हिला। पर्वत ने समुद्र की निगरानी की, और इस तरह से, समुद्र के जलचर बहुगुणित हुए और फले फूले। विशाल लहर और बड़ा पर्वत एक दूसरे पर भरोसा करते थे, वे एक दूसरे को रोके हुए थे, और एक दूसरे पर निर्भर थे।

मेरी कहानी समाप्त हुई। पहले, तुम लोग मुझे इस कहानी के बारे में क्या बता सकते हो, मुख्य विषयवस्तु क्या थी? सबसे पहले एक पर्वत था, फिर क्या? (एक छोटी जलधारा, प्रचण्ड हवा और एक विशाल लहर।) पहले भाग में छोटी जलधारा और बड़े पर्वत के साथ क्या हुआ? क्या तुम लोगों को याद है? (छोटी जलधारा पर्वत के निचले सिरे पर बह रही थी।) छोटी जलधारा पर्वत के निचले सिरे पर बह रही थी, क्या यह वह कहानी है जो उन दोनों के बीच में घटी थी? वह जलधारा कहाँ चली गई? हम क्यों बड़े पर्वत और छोटी जलधारा के विषय में बात करेंगे? (क्योंकि पर्वत ने जलधारा की सुरक्षा की, और जलधारा कभी खत्म नहीं हुई, वे एक दूसरे पर भरोसा करते थे।) क्या तुम लोग कहोगे कि पर्वत ने छोटी जलधारा की सुरक्षा की या उसको बाधित किया? (उसकी सुरक्षा की।) क्या ऐसा हो सकता है कि उसने उसे बाधित किया? पर्वत और छोटी जलधारा एक साथ थे; उसने जलधारा की सुरक्षा की, और यह एक बाधा भी थी। पर्वत ने जलधारा की सुरक्षा की ताकि जलधारा नदी में बह सके, लेकिन साथ ही इसे उन सभी जगहों पर बहने से भी रोका जिन्हें वह जलमग्न कर सकती थी और लोगों के लिए विनाशकारी हो सकती थी। क्या यह इस सत्र का मुख्य बिन्दु है? (हाँ।) जलधारा के लिए पर्वत की सुरक्षा ने और एक अवरोध के रूप में इसके कार्य ने लोगों के घरों की हिफाज़त की। फिर तुम लोगों के पास वह छोटी जलधारा है जो पर्वत के निचले सिरे पर नदी से मिलती है और बाद में समुद्र में बह जाती है; क्या यह उस छोटी जलधारा के लिए अति आवश्यक नहीं है? (हाँ।) जब जलधारा नदी में और उसके बाद समुद्र में बह गई, तो वह किस पर भरोसा करती थी? क्या वह पर्वत पर भरोसा नहीं करती थी? वह पर्वत की सुरक्षा पर भरोसा करती थी और पर्वत ने एक अवरोध के रूप में कार्य किया था; क्या यह मुख्य बिन्दु है? (हाँ।) क्या तुम इस उदाहरण में जल के लिए पर्वतों के महत्व को देखते हो? (हाँ, हम देखते हैं।) क्या यह महत्वपूर्ण है? (हाँ।) पर्वतों को ऊँचा एवं नीचा दोनों बनाने में क्या परमेश्वर के पास उसका कोई उद्देश्य है? (उसके पास है।) इसका अवश्य एक उद्देश्य है, सही है? यह कहानी का एक छोटा सा हिस्सा है, और बस एक छोटी सी जलधारा से और एक बड़े पर्वत से हम उनके विषय में परमेश्वर की सृष्टि में इन दोनों चीज़ों के मूल्य एवं महत्व को देख सकते हैं। हम इस बात में भी उसकी बुद्धि एवं उद्देश्य को देख सकते हैं कि वह किस प्रकार इन दोनों चीज़ों पर शासन करता है? क्या यह सही नहीं है?

कहानी का दूसरा भाग किस बात से व्यवहार करता है? (प्रचण्ड हवा और एक बड़ा पर्वत।) क्या हवा एक अच्छी चीज़ है? (हाँ।) आवश्यक रूप से नहीं, कुछ समयों से यदि हवा बहुत तेज है तो यह विनाशकारी हो सकती है। यदि तुम्हें प्रचण्ड हवा में बाहर रहना पड़े तो तुम्हें कैसा महसूस होगा? यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितनी तेज़ थी, सही है? यदि यह हल्का सा झोंका होता, या यदि यह 2-3 के स्तर की हवा होती, या 3-4 स्तर की हवा होती तो यह तब भी सहन करने योग्य होती, अधिक से अधिक किसी व्यक्ति को अपनी आंखों को खुला रखने में तकलीफ होती। लेकिन क्या तुम इसे सम्भाल सकते हो यदि यह हवा एक बवंडर बनने के लिए काफी तेजी से बहती? तुम इसे झेल नहीं सकते। अतः लोगों का यह कहना गलत है कि हवा हमेशा अच्छी होती है, या यह कि वह हमेशा खराब होती है क्योंकि यह इस बात पर निर्भर होती है कि हवा कितनी तेज है। अतः यहाँ पर्वत की क्या उपयोगिता है? क्या यह हवा के लिए एक छलनी के समान है? (हाँ।) पर्वत इस प्रचण्ड हवा को झेलता है और उसे किस में बाँट देता है? (हवा के हल्के झोंके।) हवा के हल्के झोंके में। अधिकांश लोग इसे उस वातावरण में स्पर्श एवं महसूस कर सकते थे जहाँ वे रहते थे—क्या यह एक प्रचण्ड हवा थी या हवा का हल्का झोंका था जिसे उन्होंने महसूस किया था? (हवा का हल्का झोंका।) क्या यह परमेश्वर के द्वारा पर्वतों की सृष्टि के पीछे का एक उद्देश्य नहीं है? क्या यह उसका इरादा नहीं है? यह लोगों के लिए कैसा होता कि वे ऐसे वातावरण में रहते है जहाँ प्रचण्ड हवा रेत के कणों को चारों ओर उड़ाती जहाँ उसे रोकने या छानने के लिए कोई चीज़ नहीं होती? क्या ऐसा हो सकता है कि जहाँ रेत और पत्थर चारों तरफ उड़ते हैं, ऐसी भूमि पर लोग रहने में असमर्थ होते। शायद कुछ लोगों को चारों ओर उड़ते हुए पत्थरों के द्वारा सिर में चोट लग सकती थी, या दूसरों की आँखों में रेत जा सकती थी और वे देखने में असमर्थ होते। लोग हवा में खींचे जा सकते थे या हवा इतनी तेजी से बह सकती थी कि वे खड़े नहीं हो सकते थे। घर के घर नाश हो गए होते और सभी प्रकार की आपदाएँ घटित होतीं। क्या प्रचण्ड हवा का कोई मूल्य है? (हाँ।) यह मूल्य क्या है? जब मैंने कहा था कि यह बुरी है, तब शायद लोग महसूस कर सकते थे कि इसका कोई मूल्य नहीं है, लेकिन क्या यह सही है? क्या इसे हवा के हल्के झोंके में बदलने का कोई मूल्य है? लोगों को सबसे अधिक किस चीज़ की आवश्यकता होती है जब यह सीलनदार या रुखी होती है? उन्हें हवा के हल्के झोंके की आवश्यकता होती है कि उनके ऊपर से बहे, कि उनके मनों को तरोताज़ा और साफ करे, कि उनके मिज़ाज को शांत करे और उनकी मनोदशा को सुधारे। उदाहरण के लिए, तुम लोग एक कमरे में बैठे हुए हो जहाँ बहुत सारे लोग हैं और हवा घुटन भरी है, तुम लोगों को सबसे अधिक किस चीज़ की आवश्यकता है? (हवा के हल्के झोंके।) ऐसे स्थानों में जहाँ हवा गंदी और धूल से भरी है यह किसी व्यक्ति की सोच को धीमा कर सकती है, उनके रक्त प्रवाह को कम कर सकती है, और उन्हें कम समझदार बना सकती है। फिर भी, हवा ताजी हो जाएगी यदि इसे प्रवाहित होने एवं घूमने का अवसर मिलता, और लोग काफी अच्छा महसूस करते। यद्यपि वह छोटी सी जलधारा और प्रचण्ड हवा एक आपदा बन सकती थी, फिर भी जब तक वहाँ पर्वत है वह उन्हें ऐसी चीज़ों में बदल देगी जो वास्तव में लोगों को फायदा पहुँचाएगी; क्या यह सही नहीं है?

कहानी का तीसरा भाग किसके विषय में बात करता है? (बड़ा पर्वत और एक विशाल लहर।) बड़ा पर्वत और विशाल लहर। यहाँ दृश्य में समुद्र के किनारे पर्वत है जहाँ हम पर्वत, समुद्री फुहार, और साथ ही एक विशाल लहर को भी देख सकते हैं। इस उदाहरण में पर्वत उस लहर के लिए क्या है? (एक रक्षक और एक पर्दा।) यह एक रक्षक एवं पर्दा दोनों है। सही है? इसकी सुरक्षा करने का लक्ष्य यह है कि समुद्र के इस भाग को अदृश्य होने से बचाया जाए ताकि वे जलचर जो इसमें रहते हैं वे फल फूल सकें। एक परदे के रूप में, पर्वत समुद्री जल—इस जलराशी—को उमड़कर बहने से और किसी आपदा को उत्पन्न करने से रोकता है, जो लोगों के घरों को नुकसान पहुँचाता और नष्ट करता है। सही? अतः हम कह सकते हैं कि पर्वत पर्दा एवं रक्षक दोनों है। यह उस आपसी भरोसे के महत्व को दर्शाता है जो पर्वत एवं जलधारा, पर्वत एवं प्रचण्ड हवा, और पर्वत एवं उस विशाल लहर के बीच में है और वे किस प्रकार एक दूसरे को रोकते हैं और किस प्रकार एक दूसरे पर निर्भर हैं इसके बीच में है, जिसके विषय में मैंने कहा है।

एक नियम एवं एक व्यवस्था है जो इन चीज़ों के अस्तित्व में बने रहने को संचालित करता है जिन्हें परमेश्वर ने सृजा था। जो कुछ कहानी में हुआ था उससे क्या तुम लोग देख सकते हो कि परमेश्वर ने क्या किया? क्या परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की और फिर उसके बाद जो कुछ हुआ उसकी उपेक्षा की? क्या उसने उन्हें नियम दिए और जिन तरीकों से वे कार्य करते हैं उन्हें सुन्दर आकार दिया और फिर उसके बाद उनकी उपेक्षा की? क्या ऐसा ही हुआ था? (नहीं) तो वह क्या है? (हर चीज़ परमेश्वर के नियन्त्रण में है।) जल, हवा एवं लहरें अभी भी परमेश्वर के नियन्त्रण में हैं। वह उन्हें अनियन्त्रित रूप से गतिमान होने नहीं देता है और वह उन्हें लोगों के घरों को नुकसान पहुँचाने और बर्बाद करने नहीं देता है, और इस कारण से लोग इस पृथ्वी के इस भाग पर निरन्तर रह सकते हैं और फल फूल सकते हैं। जिसका मतलब यह है कि जब परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की थी तो उसने पहले से ही अस्तित्व के लिए नियमों की योजना बना ली थी। जब परमेश्वर ने इन चीज़ों को बनाया, तो उसने सुनिश्चित किया कि वे मनुष्य को लाभान्वित करेंगे, और साथ ही उसने उन्हें नियन्त्रित भी किया ताकि वे मानवजाति के लिए मुसीबत एवं विनाशकारी न हों। यदि परमेश्वर के द्वारा उनका प्रबंध नहीं किया जाता, तो क्या जल हर जगह नहीं बह रहा होता? क्या हवा सभी स्थानों के ऊपर नहीं बह रही होती? यदि परमेश्वर ने उनका प्रबंध नहीं किया होता तो उन्हें किसी नियम के द्वारा संचालित नहीं किया जाता, और हवा चीखती चिल्लाती और जल ऊपर उठता और हर जगह बहता रहता। यदि विशाल लहर पर्वत से अधिक ऊँची होती तो क्या समुद्र का वह हिस्सा तब भी अस्तित्व में रहता? समुद्र अस्तित्व में बने रहने में सक्षम नहीं होता। यदि पर्वत लहर के समान ही ऊँचा नहीं होता, तो समुद्र का वह क्षेत्र अस्तित्व में नहीं रहता और पर्वत अपने मूल्य एवं महत्व को खो देता।

क्या तुम लोग इन दो कहानियों में परमेश्वर की बुद्धि को देखते हो? (हाँ।) परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की और वह इसका प्रभु है; वह इसके प्रति उत्तरदायी है और हर एक वचन एवं कार्य की निगरानी करते हुए वह इसके लिए आपूर्ति करता है। साथ ही वह मानवीय जीवन के हर एक क्षेत्र का निरिक्षण भी करता है। अतः परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की और हर एक चीज़ के महत्व एवं मूल्य को और साथ ही साथ उसकी कार्य प्रणाली, उसके स्वभाव, और जीवित बचे रहने के लिए उसके नियमों को वह अपने हाथ की हथेली के समान स्पष्ट रूप से जानता है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की; क्या तुम लोग सोचते हो कि उसे इन नियमों पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है जो संसार को संचालित करते है? (नहीं।) क्या परमेश्वर को अनुसंधान करने एवं इसे समझने के लिए मानवीय ज्ञान या विज्ञान को पढ़ने की ज़रूरत है? क्या मानवजाति के मध्य कोई ऐसा है जिसके पास वृहद् विद्वता और प्रचुर ज्ञान है कि सभी चीज़ों को समझे जैसे परमेश्वर समझता है? कोई नहीं है। सही है? क्या कोई खगोलशास्त्री या जीव विज्ञानी हैं जो सचमुच में समझते हैं कि किस प्रकार सभी चीज़ें जीवित रहती और बढ़ती हैं? (नहीं।) क्या वे वाकई में हर चीज़ के अस्तित्व के मूल्य को समझ सकते हैं? (वे नहीं समझ सकते हैं।) ऐसा क्यों है? सभी चीज़ों को परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति कितना अधिक एवं कितनी गहराई से इस ज्ञान का अध्ययन करती है, या वे कितने लम्बे समय तक इसे सीखने के लिए प्रयत्न करते हैं, वे परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि के रहस्य एवं उद्देश्य की थाह लेने में कभी भी सक्षम नहीं होंगे, क्या यह सही नहीं है? (हाँ)।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
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