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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर की पवित्रता (I)     भाग तीन के क्रम में

अपने अब तक के जीवन में पीछे मुड़कर उन सब कार्यों को देखो जिन्हें परमेश्वर ने तेरे विश्वास के उन सभी वर्षों में किया है। तू इसे गहराई से महसूस करता है या नहीं, क्या यह अत्यंत आवश्यक नहीं था? क्या यह वह नहीं है जिसे प्राप्त करना तेरे लिए अत्यंत आवश्यक था? (हाँ।) क्या यह सच नहीं है? क्या यह जीवन नहीं है? (हाँ।) अतः इन चीज़ों को देने के पश्चात् कुछ वापस करने के लिए या बदले में कोई चीज़ देने के लिए क्या परमेश्वर ने तुझे कभी प्रबुद्ध किया? (नहीं।) तो परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? परमेश्वर इसे क्यों करता है? क्या परमेश्वर के पास भी तुझ पर कब्जा करने के लिए कोई उद्देश्य है? (नहीं।) क्या परमेश्वर मनुष्य के हृदयों में अपने सिंहासन को ऊंचा उठाना चाहता है? (हाँ।) अतः परमेश्वर के द्वारा अपने सिंहासन को ऊंचा उठाने और शैतान के बलपूर्वक कब्जा करने के बीच क्या अन्तर है? परमेश्वर मनुष्य के हृदय को अर्जित करना चाहता है, वह मनुष्य के हृदय में काबिज़ होना चाहता है—इसका क्या मतलब है? क्या इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर मनुष्य को अपनी कठपुतलियां, एवं अपनी मशीनें बनाना चाहता है? (नहीं।) तो परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? क्या मनुष्य के हृदयों में काबिज़ होने की परमेश्वर की इच्छा और शैतान के बलपूर्वक कब्जे, और उसके द्वारा स्वयं को मनुष्य से जोड़ने के बीच कोई अन्तर है? (हाँ।) अन्तर क्या है? क्या तू मुझे साफ साफ बता सकता है? (शैतान इसे बलपूर्वक करता है किन्तु परमेश्वर मनुष्य को स्वेच्छा से करने देता है) शैतान इसे बलपूर्वक करता है जबकि परमेश्वर तुझे स्वेच्छा से करने देता है। क्या यही अन्तर है? अतः यदि तू स्वेच्छा से नहीं करता है, तो क्या? यदि तू स्वेच्छा से नहीं करता, तो क्या परमेश्वर कुछ करता है? (वह कुछ मार्गदर्शन एवं प्रबुद्धता देता है, किन्तु यदि अंत में मनुष्य इच्छुक नहीं है, तो वह उसे बाध्य नहीं करता है) परमेश्वर तेरा हृदय किस लिए चाहता है? और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर किस लिए तुझ पर काबिज़ होना चाहता है? तुम सब अपने हृदय में "परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर काबिज़ होता है" के बारे में किस तरह से समझते हो? हमें यहाँ पर परमेश्वर के प्रति ईमानदार होना होगा, नहीं तो लोग हमेशा, यह कहते हुए ग़लत समझेंगे कि: "परमेश्वर हमेशा से मुझ पर कब्जा करना चाहता है। वह मुझ पर किस लिए कब्जा करना चाहता है? मैं नहीं चाहता हूँ कि मुझ पर कब्जा किया जाए, मैं जैसा हूँ बस वैसा ही रहना चाहता हूँ। तुम लोग कहते हो कि शैतान लोगों पर कब्जा करता है, किन्तु परमेश्वर भी लोगों पर कब्जा करता है। क्या ये एक समान ही नहीं हैं? मैं किसी को भी मुझ पर कब्जा करने की अनुमति नहीं देना चाहता हूँ। मैं स्वयं मैं हूँ।" यहाँ अन्तर क्या है? इसके विषय में सोचने के लिए एक मिनट लीजिए। (मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए, एवं मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए मनुष्य के हृदय को प्राप्त करना और उस पर काबिज़ होना चाहता है।) जो तू कहता है कि वह मनुष्य के विषय में परमेश्वर के प्रबंधन का लक्ष्य है—उसे सिद्ध बनाने के लिए। अतः क्या तू समझ गया कि "कब्जा" करने का अर्थ यहाँ क्या है? (इसका अर्थ है कि शैतान को मनुष्य पर कब्जा करने नहीं देना। यदि परमेश्वर उस स्थान पर काबिज़ होता है, तो शैतान के पास कब्जा करने का कोई मार्ग नहीं है।) तेरा मतलब है कि परमेश्वर वहाँ कब्जा करने वाला पहला शख्स है; किसी खाली घर के समान, जो कोई पहले प्रवेश करता है वह उस घर का मालिक बन जाता है। वह जो बाद में आता है वह उस घर का मालिक नहीं बन सकता है, परन्तु इसके बदले वह नौकर बन जाता है, या फिर वह बिलकुल भी प्रवेश नहीं कर सकता है। क्या यही तेरा मतलब है। (हाँ, मेरा मतलब कुछ ऐसा ही है।) क्या किसी के पास एक अलग नज़रिया है? ("परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर काबिज़ होता है" इसके विषय में मेरी स्वयं की समझ यह है कि परमेश्वर हम से अपने परिवार के समान व्यवहार करता है, हमारी देखभाल करता है और हम से प्रेम करता है। शैतान हमें बर्बाद करने के लिए, एवं नुकसान पहुंचाने के लिए मनुष्य के हृदय पर कब्जा करता है।) यह "परमेश्वर मनुष्य पर काबिज़ होता है" के विषय में तेरी समझ है, है ना? क्या कोई भिन्न समझ या नज़रिया है? (परमेश्वर अपने वचन का उपयोग करते हुए मनुष्य पर काबिज़ होता है, इस आशा में कि मनुष्य परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में स्वीकार कर सकता है, जिससे मनुष्य परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन जी सकता है।) "परमेश्वर मनुष्य पर काबिज़ होता है," इसके पीछे का सही अर्थ यही है, है ना? क्या कोई भिन्न नज़रिया है? (मेरा दृष्टिकोण यह है कि परमेश्वर सत्य का मूर्त रूप है इसलिए परमेश्वर हमें सारी सच्चाईयां प्रदान करना चाहता है, और क्योंकि हमने उस सच्चाई को अर्जित किया है और हमें उसकी देखरेख एवं सुरक्षा के अधीन लाया गया है, इसलिए हम शैतान की धूर्त युक्तियों में फंसने और उससे हताहत होने को टाल सकते हैं। व्यावहारिक तौर पर कहें, तो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को पाना चाहता है ताकि मनुष्य इस पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जी सके और परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त कर सके।) किन्तु तूने अभी तक "परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर काबिज़ होता है" के वास्तविक अर्थ को नहीं छुआ है। (मनुष्य मूल रूप से परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है, अतः मनुष्य को उसकी आराधना करना और उसके पास वापस लौट जाना चाहिए। मनुष्य परमेश्वर का है।) मैं आप लोगों से पूछता हूँ, कि क्या "परमेश्वर मनुष्य पर काबिज़ होता है" एक खोखला वाक्यांश है? क्या मनुष्य पर परमेश्वर के काबिज़ होने का अर्थ है कि परमेश्वर तेरे हृदय में रहता है। क्या परमेश्वर तेरे प्रत्येक शब्द एवं प्रत्येक हलचल पर शासन करता है? यदि वह तुझ से कहता है कि अपना बायां हाथ उठाओ, तो क्या तुम लोग दायां हाथ उठाने की हिम्मत नहीं करते हो? यदि वह तुमसे कहता है कि बैठो, तो क्या तुम सब खड़े होने की हिम्मत नहीं करते हो? यदि वह तुझसे कहता है कि पूर्व दिशा में जाओ, तो क्या तू पश्चिम दिशा में जाने की हिम्मत नहीं करता है? क्या यह एक कब्जा है जिसका अर्थ कुछ ऐसा है? (नहीं।) तो यह क्या है? (मनुष्य के लिए इसका अर्थ है कि जो परमेश्वर के पास है एवं जो वह है मनुष्य उसे जीए।) परमेश्वर ने सालों से मनुष्य का प्रबंध किया है, अतः इस अंतिम चरण में अब तक मनुष्य पर किए गए परमेश्वर के कार्य में, उन सब वचनों का मनुष्य पर क्या असर होगा जिन्हें परमेश्वर ने कहा था? क्या यह ऐसा है कि जो परमेश्वर के पास एवं जो वह है मनुष्य उसे जीता है। "परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर काबिज़ होता है" के शाब्दिक अर्थ को देखने पर, ऐसा प्रतीत होता है मानो परमेश्वर मनुष्य के हृदयों को लेता है और उन पर कब्जा करता है, उनमें रहता है और फिर बाहर नहीं आता है; वह उनके भीतर रहता है और मनुष्य के हृदयों का स्वामी बन जाता है, ताकि अपनी इच्छा से मनुष्य के हृदयों पर प्रभुता करे और उनका प्रबंध करे, जिससे मनुष्य को वहाँ जाना होगा जहाँ जाने के लिए परमेश्वर उससे कहता है। अर्थ के इस स्तर पर, ऐसा प्रतीत होता है मानो हर व्यक्ति परमेश्वर बन गया है, और उसने परमेश्वर के सार को धारण किया है, एवं परमेश्वर के स्वभाव को धारण किया है। अतः इस स्थिति में, क्या मनुष्य भी परमेश्वर के कार्यों एवं कृत्यों को अंजाम दे सकता है? क्या "कब्जे" को इस रीति से समझाया जा सकता है? (नहीं।) तो वह क्या है? (ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर चाहता है वे कठपुतलियां नहीं हैं, उनके पास विचार हैं और उनके हृदय जीवित हैं। इसलिए, मनुष्य पर परमेश्वर का काबिज़ होना इस आशा से है कि मनुष्य के पास विचार हो सकते हैं और वह परमेश्वर की खुशियों एवं दुखों का एहसास कर सकता है; मनुष्य एवं परमेश्वर परस्पर एक दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं।) मैं तुम सब से पूछता हूँ: सारे वचन एवं सत्य जिन्हें परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है क्या वे परमेश्वर के सार और जो उसके पास है एवं जो वह है उसका एक प्रकटीकरण है? (हाँ।) यह निश्चित है, है कि नहीं? किन्तु सभी वचन जिन्हें परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है क्या वे स्वयं परमेश्वर के अभ्यास के लिए हैं, एवं स्वयं परमेश्वर के धारण करने के लिए हैं? इसके विषय में सोचने के लिए एक मिनट लीजिए। जब परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है, तो वह किस कारण ऐसा करता है? ये वचन कहाँ से आए हैं? इन वचनों की विषय-वस्तु क्या है जिन्हें परमेश्वर बोलता है जब वह मनुष्य का न्याय करता है? वे किस पर आधारित हैं? क्या वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर आधारित हैं? (हाँ।) अतः क्या वह प्रभाव जिसे मनुष्य पर परमेश्वर के न्याय के द्वारा हासिल किया गया है वह परमेश्वर के सार पर आधारित होता है? (हाँ।) अतः क्या परमेश्वर का मनुष्य पर काबिज़ होना एक खोखला वाक्यांश है? यह निश्चित तौर पर नहीं है। अतः परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य से क्यों कहता है? इन वचनों को कहने में उसका क्या उद्देश्य है? क्या वह मनुष्य के जीवन के लिए इन वचनों को कहना चाहता है? (हाँ।) परमेश्वर इस समस्त सच्चाई का उपयोग करना चाहता है जिसे उसने मनुष्य के जीवन के लिए कहा है। अतः जब मनुष्य इस समस्त सच्चाई और परमेश्वर के वचन को लेता है और उन्हें अपने जीवन में रूपान्तरित करता है, तब क्या मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मानेगा? तब क्या मनुष्य परमेश्वर का भय मानेगा? तब क्या मनुष्य बुराई से दूर रह सकता है? जब मनुष्य इस बिन्दु तक पहुंच जाता है, तब क्या वह परमेश्वर की संप्रभुता एवं प्रबन्ध को मानेगा? तब क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार के अधीन होने की स्थिति में होता है? जब अय्यूब या पतरस के जैसे लोग अपने मार्ग के अंत में पहुंच जाते हैं, जब यह माना जाता है कि उनका जीवन परिपक्व हो चुका है, जब उनके पास परमेश्वर की वास्तविक समझ होती है—क्या शैतान उन्हें अभी भी भटका सकता है? क्या शैतान उन पर अभी भी कब्जा कर सकता है? क्या शैतान अभी भी स्वयं को उनके साथ बलपूर्वक जोड़ सकता है? (नहीं।) तो यह किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या यह कोई ऐसा है जिसे परमेश्वर के द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है। (हाँ।) अर्थ के इस स्तर पर, तुम सब इस प्रकार के व्यक्ति को किस प्रकार देखते हो जिसे परमेश्वर के द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है? परमेश्वर के लिए, इन परिस्थितियों के अंतर्गत वह पहले से ही इस व्यक्ति के हृदय में काबिज़ हो चुका है। किन्तु यह व्यक्ति कैसा महसूस करता है? क्या यह ऐसा है कि परमेश्वर का वचन, परमेश्वर का अधिकार, और परमेश्वर का मार्ग मनुष्य के भीतर जीवन बन जाता है, फिर यह जीवन जो मनुष्य के सम्पूर्ण अस्तित्व पर काबिज़ हो जाता है वह उसका जीवन निर्माण करता है जिसे वह प्रचुरता से जीता है, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसके सार को पर्याप्त कर देता है? अतः परमेश्वर के लिए, क्या इस घड़ी मनुष्य के हृदय पर उसके द्वारा कब्जा किया गया है? (हाँ।) अब तुम लोग इस स्तर के अर्थ को कैसे समझते हो? क्या यह परमेश्वर का आत्मा है जो तुझ पर काबिज़ होता है? (नहीं।) अतः वह वास्तव में क्या है जो तुझ पर काबिज़ हो जाता है? (परमेश्वर का वचन)। ठीक है, परमेश्वर का वचन, परमेश्वर का मार्ग। यह वह सच्चाई एवं परमेश्वर का वचन है जो तेरा जीवन बन गया है। इस समय, तो मनुष्य के पास वह जीवन है जो परमेश्वर से आता है, किन्तु हम यह नहीं कह सकते हैं कि यह जीवन परमेश्वर का जीवन है। यह वह जीवन है जिसे मनुष्य को परमेश्वर के वचन से पाना चाहिए। क्या हम कह सकते हैं कि यह जीवन परमेश्वर का जीवन है। (नहीं।) अतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य कितने लम्बे समय तक परमेश्वर का अनुसरण करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर से कितने वचनों को प्राप्त करता है, क्योंकि मनुष्य कभी परमेश्वर नहीं बन सकता है। क्या यह सही नहीं है? (हाँ।) भले ही परमेश्वर ने किसी दिन कहा था, "मैं तेरे हृदय में काबिज़ हो गया हूँ, अब तू मेरे जीवन को धारण कर," क्या तब तुझे लगा कि तू परमेश्वर है? (नहीं।) तब तुम क्या बन जाओगे? क्या तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता नहीं होगी? क्या तुम्हारा शरीर एवं तुम्हारा हृदय उस जीवन से भरपूर नहीं हो जाएगा जिसे परमेश्वर ने तुझे प्रदान किया है? यह बहुत ही सामान्य सा प्रकटीकरण है जब परमेश्वर मनुष्य के हृदयों पर काबिज़ हो जाता है। यह एक तथ्य है। अतः इसे इस पहलू से देखने पर, क्या मनुष्य परमेश्वर बन सकता है? (नहीं।) जब मनुष्य ने परमेश्वर के सारे वचनों को प्राप्त कर लिया है, जब मनुष्य परमेश्वर का भय मान सकता है और बुराई से दूर रह सकता है, तो क्या मनुष्य परमेश्वर की पहचान को धारण कर सकता है? (नहीं।) तो क्या मनुष्य परमेश्वर के सार को धारण कर सकता है? (नहीं।) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि क्या घटित हुआ है, क्योंकि मनुष्य अभी भी मनुष्य है जब सब कुछ कहा एवं किया गया है। तू एक रचना है; जब तुमने परमेश्वर से परमेश्वर के वचन को ग्रहण किया और परमेश्वर के मार्ग को ग्रहण किया, तो तूने केवल उस जीवन को धारण किया है जो परमेश्वर के वचन से आता है, और तू कभी परमेश्वर नहीं बन सकता है।

इसी समय अपने विषय पर वापस लौटते हुए, मैं ने तुम सब से पूछा था कि इब्राहिम पवित्र था या नहीं? वह नहीं है, और इसे तुम लोगों ने अब समझा है, क्या तुम लोगों ने नहीं समझा? क्या अय्यूब पवित्र है? (नहीं।) इस पवित्रता के भीतर परमेश्वर का सार निहित है। मनुष्य के पास परमेश्वर के सार या परमेश्वर का स्वभाव नहीं है। यहाँ तक कि जब मनुष्य ने परमेश्वर के समस्त वचन का अनुभव कर लिया है और परमेश्वर के वचन के सार को धारण कर लिया है, तब भी मनुष्य को पवित्र नहीं कहा जा सकता है; मनुष्य मनुष्य है। तुम सब समझ गए, सही है? (हाँ।) तो तुम सब अब इस वाक्यांश को कैसे समझते हो "परमेश्वर मनुष्य के हृदयों में काबिज़ होता है?" (यह परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का मार्ग है और उसकी सच्चाई है जो मनुष्य का जीवन बन जाता है।) आप सब ने इसे याद कर लिया है, सही है? मैं आशा करता हूँ कि अब तुम लोगों के पास और अधिक गहरी समझ है। कुछ लोग पूछ सकते हैं, "तो ऐसा क्यों कहते हैं कि परमेश्वर के सन्देशवाहक एवं स्वर्गदूत पवित्र नहीं हैं?" तुम सब इस प्रश्न के बारे में क्या सोचते हैं? कदाचित् आप लोगों ने इससे पहले इस पर विचार नहीं किया है। मैं एक साधारण से उदाहरण का उपयोग करूंगा: जब तू एक रोबोट को चालू करता है, तब वह नृत्य एवं बातचीत दोनों कर सकता है, और जो कुछ वह कहता है तू उसे समझ सकता है, परन्तु क्या तू उसे प्यारा कह सकता है? क्या तू उसे सजीव कह सकता है? तू ऐसा कह सकता है, परन्तु रोबोट नहीं समझेगा क्योंकि उसके पास जीवन नहीं है। जब तू उसकी विद्युत आपूर्ति को बन्द कर देता है, तो क्या वह तब भी इधर-उधर हिल-डुल सकता है? (नहीं।) जब यह रोबोट सक्रिय होता है, तो तू देख सकता है कि यह सजीव एवं प्यारा है। तू इसका मूल्यांकन कर सकता है, चाहे यह एक आवश्यक मूल्यांकन हो या सतही मूल्यांकन, किन्तु स्थिति चाहे कुछ भी हो तेरी आँखें इसे हरकत करते हुए देख सकती है। परन्तु जब तू उसकी विद्युत आपूर्ति बन्द कर देता है, तो क्या उसमें किसी प्रकार की विशेषता दिखाई देती है? क्या तू देखता है कि यह किसी प्रकार के सार को धारण किए हुए है? जो कुछ मैं कह रहा हूँ क्या तू उसके अर्थ को समझ रहा है? (हाँ।) तू समझ सकता है, सही है? कहने का तात्पर्य है, यद्यपि यह रोबोट हिल-डुल सकता है और यह रुक सकता है, फिर भी तू इसका वर्णन कभी नहीं कर सकता है कि इसके पास "किसी प्रकार का सार है।" क्या यह एक तथ्य नहीं है? हम इस पर और अधिक बात नहीं करेंगे। यह तुम लोगों के लिए पर्याप्त है कि तुम सबके पास इस अर्थ की एक सामान्य समझ है। आओ हम अपनी संगति को यहाँ पर समाप्त करते हैं। अलविदा!

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परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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