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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का अधिकार (II)     भाग छे:

4. सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आ जाओ और शान्ति से मृत्यु का सामना करो

उस घड़ी जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब एक अकेला आत्मा इस पृथ्वी पर जीवन के विषय में अपने अनुभवऔर सृष्टिकर्ता के अधिकार के विषय में अपने अनुभव का प्रारम्भ करता है जिसे सृष्टिकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं है, उस व्यक्ति, अर्थात् उस आत्मा, के लिए यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान को अर्जित करने के लिए, और उसके अधिकार को जानने और व्यक्तिगत तौर पर इसका अनुभव करने के लिए सबसे उत्तम अवसर है। लोग नियति के नियमों के अधीन अपने जीवन को जीते हैं जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उनके लिए व्यवस्थित किया गया है, और किसी भी न्यायसंगत व्यक्ति के लिए जिसके पास विवेक है, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और पृथ्वी पर मनुष्यों के कई दशकों के जीवनक्रम के ऊपर उसके अधिकार को पहचानना कोई कठिन कार्य नहीं है कि उसे किया न जा सके। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पहचानना बहुत ही सरल होना चाहिए, कई दशकों से पुरुष या स्त्री के स्वयं के जीवन के अनुभवों के माध्यम से, कि सभी मनुष्यों की नियति को पूर्वनिर्धारित किया गया है, और इस बात का आभास करना एवं इसे संक्षेप में कहना चाहिए कि जीवित रहने का अर्थ क्या है। ठीक उसी समय जब कोई व्यक्ति जीवन की इन शिक्षाओं को स्वीकार करता है, तब वह धीरे-धीरे यह समझने लगता है कि जीवन कहाँ से आया है, यह आभास करता है कि हृदय को सचमुच में किसकी आवश्यकता है, कौन जीवन के सही मार्ग पर उसकी अगुवाई करेगा, किसी मानव के जीवन का मिशन एवं लक्ष्य क्या होना चाहिए; और वह धीरे-धीरे पहचानने लगेगा कि यदि वह सृष्टिकर्ता की आराधना नहीं करता है, यदि वह उसके प्रभुत्व के अधीन नहीं आता है, तो जब वह मृत्यु का सामना करता है – जब एक आत्मा एक बार फिर से सृष्टिकर्ता का सामना करने वाला है–तब उसका हृदय असीमित भय एवं बेचैनी से भर जाएगा। यदि कोई व्यक्ति इस संसार में कुछ दशकों से अस्तित्व में रहा है और फिर भी नहीं जान पाया है कि मानव जीवन कहाँ से आया है, अभी तक नहीं पहचान पाया है कि किसकी हथेली में मानव की नियति होती है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि वह शान्ति से मृत्यु का सामना करने के योग्य नहीं होगा या नहीं होगी। कोई व्यक्ति जिसने जीवन के कई दशकों का अनुभव करने के बाद सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान को हासिल किया है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के अर्थ एवं मूल्य की सही समझ है; वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के उद्देश्य का गहरा ज्ञान है, और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का सच्चा अनुभव एवं सच्ची समझ है; और उससे भी बढ़कर, वह ऐसा व्यक्ति है जो सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हो सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा मानवजाति की सृष्टि के अर्थ को समझता है, यह समझता है कि मनुष्य को सृष्टिकर्ता की आराधना करनी चाहिए, यह कि जो कुछ मनुष्य के पास है वह सृष्टिकर्ता से आता है और वह किसी दिन उसके पास लौटेगा जो भविष्य में ज़्यादा दूर नहीं है; ऐसा व्यक्ति समझता है कि सृष्टिकर्ता मनुष्य के जन्म की व्यवस्था करता है और उसके पास मनुष्य की मृत्यु के ऊपर संप्रभुता है, और यह कि जीवन व मृत्यु दोनों सृष्टिकर्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनिर्धारित हैं। अतः, जब कोई व्यक्ति सचमुच में इन बातों का आभास कर लेता है, तो वह शांति से मृत्यु का सामना करने, अपनी सारी संसारिक सम्पत्तियों को शांतिपूर्वक दूर करने, और बाद में जो कुछ आता है उसको खुशी से स्वीकार करने एवं उसके अधीन होने, और सृष्टिकर्ता द्वारा व्यवस्थित जीवन के अंतिम घटनाक्रम का स्वागत करने योग्य हो जाएगा बजाए इसके कि आँख बंद करके इससे भय खाए और इसके विरुद्ध संघर्ष करे। यदि कोई जीवन को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए एक अवसर के रूप में देखता है और उसके अधिकार को जानने लगता है, यदि कोई अपने जीवन को सृजे गये प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए और अपने मिशन को पूरा करने के लिए एक दुर्लभ अवसर के रूप में देखता है, तो उसके पास आवश्यक रूप से जीवन के विषय में सही नज़रिया होगा, और सृष्टिकर्ता के द्वारा वह आशीषित जीवन बिताएगा और मार्गदर्शन पाएगा, वह सृष्टिकर्ता के प्रकाश में चलेगा, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानेगा, उसके प्रभुत्व में आएगा, और उसके अद्भुत कार्यों एवं उसके अधिकार का एक गवाह बनेगा। कहने की आवश्यकता नहीं है, ऐसे व्यक्ति को सृष्टिकर्ता के द्वारा प्रेम किया जाएगा एवं स्वीकार किया जाएगा, और केवल ऐसा व्यक्ति ही मृत्यु के प्रति शांत मनोवृत्ति रख सकता है, और जीवन के अंतिम घटनाक्रम का प्रसन्नता से स्वागत कर सकता है। अय्यूब स्पष्ट रूप से मृत्यु के प्रति इस प्रकार की मनोवृत्ति रखता था; वह जीवन के अंतिम घटनाक्रम को प्रसन्नता से स्वीकार करने के लिए ऐसी स्थिति में था, और अपनी जीवन यात्रा को एक सुखदाई निष्कर्ष पर पहुँचाने के बाद, एवं जीवन में अपने मिशन को पूरा करने के बाद, वह सृष्टिकर्ता के पास वापस लौट गया।

5. अय्यूब के जीवन के उद्यमों एवं उपलब्धियों ने उसे शान्तिपूर्वक मृत्यु का सामना करने की अनुमति दी

पवित्र शास्त्र में अय्यूब के विषय में ऐसा लिखा हुआ हैः "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। इसका अर्थ है कि जब अय्यूब की मृत्यु हुई, उसे कोई पछतावा नहीं था और उसने किसी तकलीफ का एहसास नहीं किया, परन्तु प्राकृतिक रुप से इस संसार से चला गया। जैसा हर कोई जानता है, अय्यूब ऐसा इंसान था जो परमेश्वर से डरता था और बुराई से दूर रहता था जब वह जीवित था; परमेश्वर ने उसके धार्मिकता के कार्यों की सराहना की थी, लोगों ने उन्हें स्मरण रखा, और उसका जीवन किसी भी इंसान से बढ़कर अहमियत एवं महत्व रखता था। अय्यूब ने परमेश्वर की आशीषों का आनन्द लिया और उसे पृथ्वी पर उसके द्वारा धर्मी कहा गया, और साथ ही परमेश्वर के द्वारा उसे परखा गया और शैतान के द्वारा उसकी परीक्षा भी ली गई; वह परमेश्वर का गवाह बना रहा और वह धर्मी पुरुष कहलाने के योग्य था। परमेश्वर के द्वारा परखे जाने के बाद कई दशकों के दौरान, उसने ऐसा जीवन बिताया जो पहले से कहीं अधिक बहुमूल्य, अर्थपूर्ण, स्थिर, एवं शान्तिपूर्ण था। उसकी धार्मिकता के कार्यों के कारण, परमेश्वर ने उसे परखा था; उसकी धार्मिकता के कार्यों के कारण, परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ और सीधे उससे बात की। अतः, उसके परखे जाने के बाद के वर्षों के दौरान अय्यूब ने जीवन के मूल्यों को और अधिक ठोस तरीके से समझाऔर उसकी सराहना की थी, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की और अधिक गहरी समझ प्राप्त की थी, और किस प्रकार सृष्टिकर्ता अपनी आशीषों को देता एवं वापस लेता है इसके विषय में और अधिक सटीक एवं निश्चित ज्ञान हासिल किया था। बाईबिल में दर्ज है कि यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आशीषें प्रदान की थीं, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए एवं शान्ति से मृत्यु का सामना करने के लिए उसने अय्यूब को और भी बेहतर स्थिति में रखा था। इसलिएअय्यूब, जब वृद्ध हुआ और मृत्यु का सामना किया, तो वह निश्चित रूप से अपनी सम्पत्ति के विषय में चिंतित नहीं हुआ होगा। उसे कोई चिन्ता न थी, कुछ पछतावा नहीं था, और वास्तव में वह मृत्यु से भयभीत नहीं था; क्योंकि उसने अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर का भय मानते हुए, बुराई से दूर रहते हुए बिताया था, और अपने स्वयं के अन्त के बारे में चिन्ता करने का कोई कारण नहीं था। आज कितने लोग हैं जो अय्यूब के सभी मार्गों के अनुसार कार्य कर सकते हैं जब उसने अपनी मृत्यु का सामना किया था? कोई भी व्यक्ति इस प्रकार के सरल बाह्य व्यवहार को बनाए रखने रखने के योग्य क्यों नहीं है? केवल एक ही कारण हैः अय्यूब ने अपना जीवन परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति विश्वास, पहचान, एवं समर्पण के आत्मनिष्ठ उद्यम (अनुसरण) में बिताया था, और यह इस विश्वास, पहचान एवं समर्पण के साथ था कि उसने अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम को उत्तीर्ण किया था, औरअपने जीवन के अंतिम घटनाक्रम का अभिनन्दन किया था। इसके बावजूद कि अय्यूब ने जो कुछ अनुभव किया, जीवन में उसकेउद्यम (अनुसरण) एवं लक्ष्य खुशगवार थे, न कि कष्टपूर्ण। अय्यूब आनन्दित था न केवल उन आशीषों या सराहनाओं के कारण जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा उसे प्रदान किया गया था, किन्तु अधिक महत्वपूर्ण रूप से, अपने उद्यमों (अनुसरण) एवं जीवन के लक्ष्यों के कारण, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के क्रमिक ज्ञान एवं सही समझ के कारण जिन्हें उसने परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने के माध्यम से अर्जित किया था, और इससे अतिरिक्त, उसके अद्भुत कार्यों के कारण जिन्हें अय्यूब ने सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के प्रति एक अधीनस्थ व्यक्ति के रूप में अपने समय के दौरान व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया था, और मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच सह-अस्तित्व, जान-पहचान, एवं परस्पर समझ के सरगर्म एवं अविस्मरणीय अनुभवों एवं यादों के कारण; उस राहत एवं प्रसन्नता के कारण जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को जानने से आई थी; उस परम आदर के कारण जो यह देखने से बाद उभरा कि वह कितना महान, अद्भुत, प्रेमी एवं विश्वासयोग्य है।वह कारण कि अय्यूब बिना किसी कष्ट के अपनी मृत्यु का सामना करने के योग्य हो पाया वह यह था क्योंकि वह जानता था कि, मरने पर, वह सृष्टिकर्ता के पास वापस लौट जाएगा। और जीवन में यही उसका उद्यम एवं उपलब्धि थी जिसने उसे शान्ति से मृत्यु का सामना करने, सृष्टिकर्ता के द्वारा उसके जीवन को वापस लेने की सम्भावना का स्थिर हृदय के साथ सामना करने, और इसके अतिरिक्त, शुद्ध एवं चिंतामुक्त होकर, सृष्टिकर्ता के सामने खड़े होने की अनुमति दी थी। क्या आजकल लोग उस प्रकार की प्रसन्नता को हासिल कर सकते हैं जो अय्यूब के पास थी? क्या तुम सब स्वयं ऐसा करने के स्थिति में हो? जबकि लोग आजकल ऐसा करने की स्थिति में होते हैं, फिर भी वे अय्यूब के समान खुशी से जीवन बिताने में असमर्थ क्यों हैं? वे मृत्यु के भय के कष्ट से बच निकलने में असमर्थ क्यों हैं? मृत्यु का सामना करते समय, कुछ पसीने से भीग जाते हैं; कुछ कांपते, मूर्छित होते, तथा स्वर्ग एवं मनुष्य के विरुद्ध समान रूप से तीखे शब्दों से हमला करते हैं, और यहाँ तक कि रोते एवं विलाप करते हैं। ये किसी भी तरह से अचानक होनेवाली प्रतिक्रियाएं नहीं हैं जो तब घटित होती हैं जब मृत्यु नज़दीक आ जाती है।लोग मुख्यत: ऐसे शर्मनाक तरीकों से व्यवहार करते हैं क्योंकि, अपने हृदय की गहराई में वे मृत्यु से डरते हैं, क्योंकि उनके पास परमेश्वर की संप्रभुता एवं उसके इंतज़ामों के विषय में स्पष्ट ज्ञान एवं समझ नहीं है, और सही मायने में वे उनके अधीन तो बिलकुल भी नहीं होते हैं; क्योंकि लोगों को स्वयं ही हर चीज़ का इंतज़ाम एवं शासन करने, अपनी नियति, अपने जीवन एवं मृत्यु का नियन्त्रण करने के सिवाय और कुछ नहीं चाहिए। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि लोग कभी मृत्यु के भय से बचने में समर्थ नहीं होते हैं।

6. सिर्फ सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने के द्वारा ही कोई व्यक्ति उसकी ओर वापस आ सकता है

जब किसी व्यक्ति के पास सृष्टिकर्ता की संप्रभुता एवं उसके इंतज़ामों के विषय में स्पष्ट ज्ञान एवं अनुभव नहीं होता है, तो नियति एवं मृत्यु के विषय में उसका ज्ञान आवश्यक रूप से असंगत होगा। लोग स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं कि यह सब परमेश्वर की हथेली में होता है, यह एहसास नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर उनके ऊपर नियन्त्रण एवं संप्रभुता रखता है, यह पहचान नहीं सकते हैं कि मनुष्य ऐसी संप्रभुता को दूर नहीं फेंक सकता है या उससे बच नहीं सकता है; और इस प्रकार मृत्यु का सामना करते समय उनके अंतिम शब्दों, चिंताओं एवं पछतावों का कोई अन्त नहीं होता है। वे अत्याधिक बोझ, अत्याधिक अनिच्छाओं, अत्याधिक भ्रम, से नीचे दबे हुए होते हैं, और इन सब से उन्हें मृत्यु का भय होता है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति जिसने इस संसार में जन्म लिया है, उनका जन्म ज़रूरी होता है और उसकी मृत्यु अनिवार्य होती है, और कोई भी इस पथक्रम से बढ़कर नहीं हो सकता है। यदि कोई इस संसार से बिना किसी तकलीफ के चले जाना चाहता है, यदि कोई जीवन के इस अंतिम घटनाक्रम का बिना किसी अनिच्छा या चिंता के सामना करने के योग्य होना चाहता है, तो इसका एक ही रास्ता है कि कोई पछतावा न करें। और बिना किसी पछतावे के चले जाने का एकमात्र मार्ग है सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानना, उसके अधिकार को जानना है, और उनके अधीन हो जाना। केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति मानवीय लड़ाई-झगड़ों से, बुराई से, एवं शैतान के बन्धन से दूर रह सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान जीवन जी सकता है जो सृष्टिकर्ता के द्वारा निर्देशित एवं आशीषित था, ऐसा जीवन जो बंधनों से मुक्त हो, ऐसा जीवन जिसका मूल्य एवं अर्थ हो, और ऐसा जीवन जो सत्यनिष्ठ एवं खुले हृदय का हो; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान इस बात के अधीन हो सकता है कि उसे सृष्टिकर्ता के द्वारा परखा एवं वंचित किया जाए, केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता के आयोजनों एवं इंतज़ामों के अधीन हो सकता है; केवल इसी तरह से ही वह अपने जीवन भर सृष्टिकर्ता की आराधना कर सकता है और उसकी प्रशंसा को अर्जित कर सकता है, जैसा अय्यूब ने किया था, एवं उसकी आवाज़ को सुना था, और उसे प्रकट होते हुए देखा था; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान बिना किसी तकलीफ, चिंता एवं पछतावे के आनन्दपूर्वक जी एवं मर सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान प्रकाश में जीवन बिता सकता है, प्रकाश में अपने जीवन के घटनाक्रमों से होकर गुज़र सकता है, अपनी यात्रा को प्रकाश में सरलता से पूरा कर सकता है, और अपने मिशन को सफलतापूर्वक हासिल कर सकता है – एक सृजे गए प्राणी के रूप में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करना, सीखना, और जानना – और प्रकाश में मर सकता है, और उसके पश्चात् एक सृजे गए प्राणी के रूप में हमेशा सृष्टिकर्ता के पास खड़ा हो सकता है, और उसके द्वारा सराहना पा सकता है।

सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के अवसर को मत खो

छ: घटनाक्रम जिनका ऊपर वर्णन किया गया है वे ऐसे महत्वपूर्ण पहलू हैं जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा प्रदर्शित किया गया है जिनसे होकर प्रत्येक सामान्य पुरुष या स्त्री को अपने जीवन में गुज़रना होगा। इन घटनाक्रमों में से हर एक घटनाक्रम वास्तविक है; इनमें से किसी से भी किसी उपाय से बचकर निकला नहीं जा सकता है, और सभी सृष्टिकर्ता के पूर्वनिर्धारण एवं उसकी संप्रभुता से सम्बन्ध रखते हैं। अतः एक मानव प्राणी के लिए, इन घटनाक्रमों में से प्रत्येक घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण जाँच चौकी है, और किस प्रकार इनमें से प्रत्येक से आसानी से गुज़रा जाए यह एक गम्भीर प्रश्न है जिसका अब तुम सब को सामना करना है।

कुछ मुट्ठी भर दशक जो किसी मानव जीवन को बनाते हैं वे न तो लम्बे होते हैं और न ही छोटे। जन्म एवं व्यस्क होने के बीच के बीस-असाधारण वर्ष पलक झपकते ही गुज़र जाते हैं, और यद्यपि जीवन के इस मुकाम पर किसी व्यक्ति को व्यस्क माना जाता है, फिर भी इस आयु वर्ग के लोग मानव जीवन एवं मानव की नियति के बारे में लगभग कुछ भी नहीं जानते हैं। जैसेजैसे वे और भी अधिक अनुभव प्राप्त करते जाते हैं, वे आहिस्ता आहिस्ता लम्बे लम्बे डग भरते हुए मध्यम आयु की ओर बढ़ने लगते हैं। लोग अपने तीस एवं चालीस वर्ष की आयु में जीवन एवं नियति के विषय में आरम्भिक अनुभव ही अर्जित कर पाते हैं, परन्तु इनके बारे में उनके विचार अभी भी बिलकुल अस्पष्ट होते हैं। यह चालीस वर्ष की आयु तक तो नहीं होता है कि कुछ लोग मानवजाति एवं सृष्टिकर्ता को समझना आरम्भ करें, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था, कि वे आभास करें कि मानव जीवन सम्पूर्ण रीति से किस के विषय में है, और मानव की नियति सम्पूर्ण रीति से किस के विषय में है। कुछ लोग, हालाँकि वे काफी लम्बे समय से परमेश्वर के अनुयायी रहे हैं और अब वे मध्यम आयु के हैं, फिर भी वे अभी भी परमेश्वर की संप्रभुता का सटीक ज्ञान एवं परिभाषा धारण नहीं करते हैं, सच्चे समर्पण की तो बिलकुल भी नहीं। कुछ लोग आशीषों को पाने की खोज करने के आलावा किसी भी चीज़ के विषय में परवाह नहीं करते हैं, और हालाँकि उन्होंने अनेक वर्षों से जीवन बिताया है, फिर भी वे मानव की नियति के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के उस तथ्य को बिलकुल भी जानते एवं समझते नहीं हैं, और इस प्रकार उन्होंने परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों के प्रति समर्पण की थोड़ी सी भी व्यावहारिक शिक्षा में प्रवेश नहीं किया है। ऐसे लोग पूरी तरह से मूर्ख हैं; ऐसे लोग अपने जीवन को व्यर्थ में ही जीते हैं।

यदि किसी मानव जीवन को उसके जीवन के अनुभवों की मात्रा और मानव की नियति के विषय में उसके ज्ञान के अनुसार विभाजित किया जाता, तो यह मोटे तौर पर तीन चरणों में विभक्त होगा। पहला चरण है युवावस्था, जन्म से लेकर मध्यम आयु के बीच के वर्ष, या जन्म से लेकर तीस वर्ष की आयु तक। दूसरा चरण है परिपक्व होने की प्रक्रिया, मध्यम आयु से लेकर वृद्धावस्था तक, या तीस से लेकर साठ वर्ष की आयु तक। तीसरा चरण है परिपक्व समय, वृद्धावस्था से, अर्थात् साठ वर्ष से शुरू होकर, जब तक वह इस संसार से चला नहीं जाता। दूसरे शब्दों में, जन्म से लेकर मध्यम आयु तक, नियति एवं भाग्य के विषय में अधिकतर लोगों का ज्ञान सीमित होता है जिससे वे दूसरों के विचारों को तोते से समान रटते हैं; इसमें लगभग कोई वास्तविक, एवं व्यावहारिक मूल-तत्व नहीं होता है। इस समयावधि के दौरान, जीवन के प्रति उसका नज़रिया और किस प्रकार वह इस संसार में अपना मार्ग बनाता है वे सभी बहुत ही सतही एवं सीधे-सादे होते हैं। यह उसके लड़कपन की समयावधि है। जब किसी व्यक्ति ने जीवन के सभी आनन्द एवं दुखोंका स्वाद चख लिया है, केवल उसके पश्चात् ही वह नियति की वास्तविक समझ को हासिल करता है, केवल उसके पश्चात् ही वह - अवचेतन रूप से, अपने हृदय की गहराई में – धीरेधीरे नियति की अपरिवर्तनीयता की प्रशंसा करने लगता है, और धीरे-धीरे एहसास करता है कि मानव की नियति पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता वाकई मौजूद है। यह किसी व्यक्ति के परिपक्व होने की समयावधि है। जब वह नियति के विरुद्ध संघर्ष करना समाप्त कर देता है, और जब वह आगे से लड़ाई-झगड़ों में पड़ने की इच्छा नहीं करता है, परन्तु अपने भागको जानता है, स्वर्ग की इच्छा के अधीन होता है, अपनी स्वयं की उपलब्धियों और जीवन में हुई ग़लतियों का सार निकलता है, और अपने जीवन में सृष्टिकर्ता के न्याय का इंतज़ार कर रहा है - यह उसकी परिपक्वता की समयावधि है। विभिन्न प्रकार के अनुभवों एवं उपलब्धियों पर विचार करने के बाद जिन्हें लोग इन तीन चरणों के दौरान अर्जित करते हैं, सामान्य परिस्थितियों के अधीन सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए उसके अवसर की खिड़की ज़्यादा बड़ी नहीं होती है। यदि कोई व्यक्ति साठ वर्ष की आयु तक जीवित रहता है, तो परमेश्वर की संप्रभुता को जानने ले लिए उसके पास केवल तीस वर्ष या इतना ही समय है; यदि वह और अधिक लम्बी समयावधि चाहता है, तो यह केवल तभी सम्भव है यदि उसका जीवन काफी लम्बाहै, यदि वह सौ वर्ष तक जीवित रहने के योग्य है। अतः मैं कहता हूँ, मानव अस्तित्व के सामान्य नियमों के अनुसार, हालाँकि यह एक बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है जब कोई व्यक्ति पहले पहल सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के विषय का सामना करता है वहाँ से लेकर उस समय तक जब वह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को पहचानने के योग्य हो जाता है, और वहाँ से लेकर उस बिन्दु तक जब वह उसके अधीन होने के योग्य हो जाता है, यदि वह वास्तव में उन वर्षों को गिने, तो वे तीस या चालीस से अधिक नहीं होंगे जिनके दौरान उसके पास इन प्रतिफलों को हासिल करने का मौका होता है। और अकसर, कई बार लोग आशीषों को पाने के लिए अपनी इच्छाओं एवं महत्वाकांक्षाओं के द्वारा बहक जाते हैं; वे परख नहीं सकते हैं कि मानव जीवन का सार-तत्व कहाँ है, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने के महत्व का आभास नहीं करते हैं, और इस प्रकार वे मानव जीवन का एवं सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए मानव संसार में प्रवेश करने हेतु इस मूल्यवान अवसर को अपने हृदय में संजोकर नहीं रख पाते हैं, और एहसास नहीं कर पाते हैं कि एक सृजे गए प्राणी के लिए सृष्टिकर्ता के व्यक्तिगत मार्गदर्शन को प्राप्त करना कितना बहुमूल्य है। अतः मैं कहता हूँ, ऐसे लोग जो चाहते हैं कि परमेश्वर का कार्य जल्दी से समाप्त हो जाए, जो इच्छा करते हैं कि जितना जल्दी हो सके परमेश्वर मनुष्य के अंत का इंतज़ाम करे, ताकि वे तुरन्त ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख सकें और जल्दी से आशीषित हो जाएं, वे इस प्रकार की बदतरीन अनाज्ञाकारिता एवं अत्याधिक मूर्खता के दोषी हैं। और ऐसे लोग जो अपने सीमित समय के दौरान सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए इस अनोखे अवसर को समझने की इच्छा करते हैं, वे ही बुद्धिमान लोग हैं, और वे ही प्रतिभाशाली लोग हैं।ये दोअलग-अलग इच्छाएंदो बेहद ही अलग नज़रिए एवं उद्यमों (अनुसरण) का खुलासा करते हैं: ऐसे लोग जो आशीषों की खोज करते हैं वे स्वार्थी एवं नीच हैं; वे परमेश्वर की इच्छा के प्रति कोई विचार नहीं करते हैं, परमेश्वर की संप्रभुता की कभी खोज नहीं करते हैं, उसके प्रति समर्पित होने की कभी इच्छा नहीं करते हैं, और जैसा उनको अच्छा लगता है बस वैसे ही जीवन बिताते हैं। वे बेपरवाही से काम करनेवाले चरित्रहीन लोग हैं; वे ऐसे लोग हैं जिन्हें नष्ट किया जाना चाहिए। ऐसे लोग जो परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं वे अपनी इच्छाओं को दरकिनार करने के योग्य हैं, वे परमेश्वर की संप्रभुता एवं परमेश्वर के इंतज़ामों के अधीन होने के लिए तैयार हैं; वे इस प्रकार के लोग होने की कोशिश करते हैं जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन हैं और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करते हैं। ऐेसे लोग ज्योति में रहते हैं, परमेश्वर की आशीषों के बीच में रहते हैं; निश्चित तौर पर परमेश्वर के द्वारा उनकी प्रशंसा की जाएगी। चाहे कुछ भी हो जाए, मानव का चुनाव व्यर्थ है, मनुष्य यह नहीं कह सकता है कि परमेश्वर का कार्य कितना समय लेगा। लोगों के लिए यह अच्छा है कि वे अपने आपको परमेश्वर की दया पर छोड़ दें, और उसकी संप्रभुता के अधीन हो जाएं। यदि तू अपने आपको उसकी दया पर नहीं छोड़ता है, तो तू क्या कर सकता है? क्या परमेश्वर को नुकसान उठाना पड़ेगा? यदि तुम अपने आपको उसकी दया पर नहीं छोड़ते हो, यदि तुम उत्तरदायित्व लेने की कोशिश करते हो, तो तुम एक मूर्खतापूर्ण चुनाव कर रहे हो, और केवल तुम ही हो जो अंत में नुकसान उठाओगे। यदि लोग जितना जल्दी हो सके परमेश्वर के साथ सहयोग करेंगे, यदि वे उसके आयोजनों को स्वीकार करने के लिए, एवं उसके अधिकार को जानने के लिए शीघ्रता करेंगे, और वह सब जो उसने उनके लिए किया है उन्हें पहचानेंगे, केवल तभी उनके पास आशा होगी, केवल तभी वे अपने जीवन को व्यर्थ में नहीं बिताएंगे, केवल तभी वे उद्धार को हासिल करेंगे।

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