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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग पांच

(III) पांच प्रकार के लोग

फिलहाल के लिए, मैं परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के विषय में हमारी सभा को यहीं छोडूंगा। आगे मैं परमेश्वर के अनुयायियों को अनेक श्रेणियों में वर्गीकृत करूंगा, परमेश्वर के विषय में उनकी समझ और उसके धर्मी स्वभाव के साथ उनकी समझ और अनुभव के अनुसार, ताकि तुम सब उस अवस्था को जिससे तुम सब वर्तमान में सम्बन्धित हो साथ ही साथ अपने वर्तमान डीलडौल को जान सको। परमेश्वर के विषय में उनके ज्ञान और उसके धर्मी स्वभाव के विषय में उनकी समझ के सम्बन्ध में, वे अलग अलग अवस्थाएं एवं डीलडौल जिन्हें लोग धारण करते हैं उन्हें साधारण तौर पर पांच प्रकारों में बांटा जा सकता है। इस विषय को अद्वितीय परमेश्वर और उसके धर्मी स्वभाव को जानने के आधार पर आधारित किया गया है; इसलिए, जैसे तुम सब निम्लिखित विषयवस्तु को पढ़ते हो, तो तुम्हें सावधानीपूर्वक यह मालूम करने की कोशिश करनी चाहिए कि तुम सब के पास परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके धर्मी स्वभाव के सम्बन्ध में वास्तव में कितनी समझ और कितना ज्ञान है, और तब तुम सब यह अनुमान लगाने के लिए इसका उपयोग कर सकते हो कि तुम सब सचमुच में किस अवस्था से सम्बन्धित हो, तुम लोगों का डीलडौल सचमुच में कितना बड़ा है, और तुम सब सचमुच में किस प्रकार के व्यक्ति हो।

पहले प्रकार के लोगों को "कपड़े में लिपटे हुए नवजात शिशु" की अवस्था के रूप में जाना जाता है।

कपड़े में लिपटा हुआ एक नवजात शिशु क्या है? कपड़े में लिपटा हुआ एक नवजात शिशु एक ऐसा शिशु है जो हाल ही में संसार में आया है, एक नया जन्मा बच्चा। यह तब होता है जब लोग बहुत ही छोटे और बिलकुल अपरिपक्व होते हैं।

इस अवस्था में लोग आवश्यक रूप से परमेश्वर में विश्वास के विषयों को लेकर कोई जागरुकता और सचेतता धारण नहीं करते हैं। वे हर चीज़ के प्रति व्याकुल और अनभिज्ञ होते हैं। हो सकता है कि इन लोगों ने एक लम्बे समय से परमेश्वर पर विश्वास किया है या लम्बे समय से बिलकुल भी विश्वास नहीं किया है, परन्तु उनकी व्याकुल और अनभिज्ञ दशा और उनका असली डीलडौल उन्हें कपड़े में लिपटे हुए एक नवजात शिशु की अवस्था के अंतर्गत रखता है। कपड़े में लिपटे हुए एक नवजात शिशु की स्थति की सटीक परिभाषा इस प्रकार हैः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इस प्रकार के व्यक्ति ने कितने लम्बे समय से परमेश्वर में विश्वास रखा है, वह हमेशा नासमझ, व्याकुल और सामान्य मस्तिष्क का होगा; वह नहीं जानता है कि वह परमेश्वर में क्यों विश्वास करता है, न ही वह यह जानता है कि कौन परमेश्वर है या परमेश्वर कौन है? यद्यपि वह परमेश्वर का अनुसरण करता है, फिर भी उसके हृदय में परमेश्वर की कोई सटीक परिभाषा नहीं है, और वह यह निर्धारित नहीं कर सकता है कि वह जिसका अनुसरण करता है वह परमेश्वर है कि नहीं, इसकी तो बात ही छोड़ दीजिए कि उसे सचमुच में परमेश्वर पर विश्वास करना और उसका अनुसरण करना चाहिए कि नहीं। इस प्रकार के व्यक्ति की असली परिस्थितियां ये हैं। इन लोगों के विचार धुंधले हैं, और साधारण तौर पर कहें, तो उनका विश्वास एक तरह से भ्रमित है। वे हमेशा व्याकुलता और खालीपन की अवस्था में बने रहते हैं; नासमझ, भ्रम और सामान्य मस्तिष्क उनकी परिस्थितियों को संक्षेप में बताते हैं। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व को कभी नहीं देखा है और न ही उसे महसूस किया है, और इसलिए, परमेश्वर को जानने के बारे में उनसे बात करना उतना ही उपयोगी है जितना उनसे एक पुस्तक पढ़वाना जो गूढ़ लिपि में लिखा गया है; वे न तो उसे समझेंगे और न ही उसे ग्रहण करेंगे। उनके लिए, परमेश्वर को जानना एक काल्पनिक कहानी को सुनने के समान है। जबकि उनके विचार धुंधले हो सकते हैं, किन्तु वे वास्तव में दृढ़ता से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को जानना पूरी तरह से समय और प्रयास की बर्बादी है। यह पहले प्रकार का व्यक्ति है - कपड़े में लिपटा हुआ एक नवजात शिशु।

दूसरे प्रकार की अवस्था "दूध पीते हुए शिशु" की अवस्था है।

कपड़े में लिपटे हुए एक शिशु की तुलना में, इस प्रकार के व्यक्ति ने कुछ प्रगति कर ली है। खेद की बात है, कि उनमें अभी भी परमेश्वर की कुछ भी समझ नहीं है। उनमें अभी भी परमेश्वर के विषय में स्पष्ट समझ और अन्तःदृष्टि की कमी है, और वे बिलकुल भी स्पष्ट नहीं हैं कि उन्हें परमेश्वर पर विश्वास क्यों करना चाहिए, किन्तु उनके हृदयों में उनके स्वयं के अपने उद्देश्य और स्पष्ट युक्तियां हैं। वे स्वयं को इस बात से नहीं जोड़ते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना सही है या नहीं। वह लक्ष्य एवं उद्देश्य जिन्हें वे परमेश्वर में विश्वास के जरिए खोजते हैं वह उसके अनुग्रह का आनन्द उठाने के लिए, आनन्द और शांति पाने के लिए, आरामदेह ज़िन्दगी बिताने के लिए, परमेश्वर की देखभाल एवं सुरक्षा को पाने के लिए और परमेश्वर की आशीषों के अधीन जीवन बिताने के लिए है। वे इस बात से चिंतित नहीं हैं कि वे किस हद तक परमेश्वर को जानते हैं; उनमें परमेश्वर की समझ को खोजने के लिए कोई उत्तेजना नहीं है, न ही वे इस बात से चिंतित हैं कि परमेश्वर क्या कर रहा है या वह क्या करना चाहता है। वे सिर्फ आंख बंद करके उसके अनुग्रह का आनन्द उठाने तथा उसकी और भी अधिक आशीषों को हासिल करने की खोज करते हैं; वे वर्तमान युग में सौ गुना और आनेवाले युग में अनन्त जीवन प्राप्त करने की खोज करते हैं। उनके विचार, खर्च और भक्ति, साथ ही साथ उनका दुख उठाना, सभी एक ही प्रायोजन को आपस में बांटते हैं: परमेश्वर के अनुग्रह को और आशीषों को हासिल करना। उन्हें किसी भी अन्य चीज़ की कोई चिंता नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति केवल इस बात में निश्चित है कि परमेश्वर उन्हें सुरक्षित रख सकता है और उन्हें अपनी दया प्रदान कर सकता है। कोई कह सकता है कि वे इसमें रूचि नहीं रखते हैं और वे बिलकुल भी स्पष्ट नहीं हैं कि परमेश्वर क्यों मनुष्य को या उस परिणाम को बचाना चाहता है जिसे परमेश्वर अपने वचनों और कार्य से हासिल करना चाहता है। उन्होंने परमेश्वर की हस्ती और धर्मी स्वभाव को जानने के लिए कभी प्रयास नहीं किया है, और न ही वे ऐसा करने के लिए रूचि जुटा सकते हैं। उन्हें इन चीज़ों पर ध्यान देने की इच्छा नहीं होती है, और न ही वे इन्हें जानना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की अपेक्षाओं, परमेश्वर की इच्छा या कोई चीज़ जो परमेश्वर से सम्बन्धित है उसके विषय में पूछना नहीं चाहते हैं; न ही इन चीज़ों के विषय में पूछकर उन्हें कष्ट दिया जा सकता है। यह इसलिए है क्योंकि वे विश्वास करते हैं कि ये मुद्दे उनके द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लिए जाने से सम्बन्धित नहीं हैं; वे केवल एक ऐसे परमेश्वर से मतलब रखते हैं जो अनुग्रह करता है और जो उनकी व्यक्तिगत रुचियों से सम्बन्धित है। उनमें किसी और चीज़ की कोई रूचि नहीं है चाहे वह कुछ भी हो, और इस प्रकार वे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हैं; इसके बावजूद कि उन्होंने कितने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है। किसी ऐसे व्यक्ति के बिना जो बार बार उन्हें सींचे और उनका पोषण करे, उनके लिए परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग पर निरन्तर बढ़ते जाना कठिन है। यदि वे अपने प्रारम्भिक खुशी और शांति का आनन्द या परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द नहीं उठा सकते हैं, तो वे पीछे हट सकते हैं। यह दूसरे प्रकार का व्यक्ति है: वह व्यक्ति जो दूध पीते हुए शिशु की अवस्था में बना रहता है।

तीसरे प्रकार की अवस्था दूध छुड़ाए हुए बच्चे की है – छोटे बच्चे की अवस्था।

इस समूह के लोग कुछ स्पष्ट जागरूकता रखते हैं। ये लोग जानते हैं कि परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेने का अर्थ यह नहीं है कि वे अपने आप में सच्चा अनुभव रखते हैं; वे जानते हैं कि यदि वे आनन्द और शांति की खोज करते हुए, और अनुग्रह की खोज करते हुए कभी न थकें, या यदि वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेने के अनुभव को बांटने के द्वारा या उन आशीषों की प्रशंसा करने के द्वारा गवाही देने में समर्थ हैं जिन्हें परमेश्वर ने उन्हें दिया है, तो इन चीज़ों का अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने जीवन को धारण किया है, न ही इसका अर्थ यह है कि उन्होंने सत्य की वास्तविकता को धारण किया है। उनकी सचेतता की शुरुआत से ही, उन्होंने निरर्थक आशाओं का सत्कार करना छोड़ दिया है ताकि सिर्फ परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा ही उनका साथ दिया जाएगा; उसके बजाए, जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाते हैं, तो वे उसी समय परमेश्वर के लिए कुछ करना भी चाहते हैं; वे अपने कर्तव्यों को निभाने, थोड़ी बहुत कठिनाई और थकान सहने, और परमेश्वर के साथ कुछ हद तक सहयोग करने के लिए तैयार हैं। फिर भी, क्योंकि परमेश्वर के प्रति उनके विश्वास में उनका अनुसरण बहुत अधिक मिलावटी है, क्योंकि उनके व्यक्तिगत इरादे और इच्छाएं जिन्हें वे आश्रय देते हैं बहुत ही ताकतवर हैं, क्योंकि उनका स्वभाव बहुत ही स्पष्ट रूप से अभिमानी है, तो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना या परमेश्वर के प्रति वफादार होना उनके लिए बहुत कठिन है; इसलिए, वे अक्सर अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का एहसास या परमेश्वर से की गई प्रतिज्ञाओं का सम्मान नहीं कर सकते हैं। वे अकसर अपने आपको परस्पर विरोधी स्थितियों में पाते हैं: जहां तक सम्भव हो वे सर्वाधिक मात्रा में परमेश्वर को सन्तुष्ट करने की बहुत इच्छा करते हैं, फिर भी वे उसका विरोध करने के लिए अपनी सारी सामर्थ का उपयोग करते हैं; वे अक्सर परमेश्वर से वादे तो करते हैं परन्तु तुरन्त ही अपनी मन्नतों से पीछे हट जाते हैं। उससे भी बढ़कर वे अकसर अपने आपको अन्य परस्पर विरोधी स्थितियों में पाते हैं: वे ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, फिर भी उसका और जो कुछ उससे आता है उसका इंकार करते हैं; वे व्याकुलता से आशा करते हैं कि परमेश्वर उन्हें ज्योर्तिमय करेगा, उनकी अगुवाई करेगा, और उनकी आपूर्ति करेगा और उनकी सहायता करेगा, फिर भी वे बाहर निकलने का अपना मार्ग खोज ही लेते हैं। वे परमेश्वर को समझना और जानना चाहते हैं, फिर भी वे उसके करीब आने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बदले, वे हमेशा परमेश्वर से परहेज करते हैं; उनका हृदय उसके लिए बंद हो गया है। जबकि उनके पास परमेश्वर के वचनों और सच्चाई के शाब्दिक अर्थ की सतही समझ और अनुभव है, और परमेश्वर और सत्य की सतही अवधारणा है, किन्तु अवचेतन रूप में वे अभी भी इसकी पुष्टि या इसे निर्धारित नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर वह सत्य है या नहीं; वे इसकी पुष्टि नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर सचमुच में धर्मी है या नहीं; न ही वे परमेश्वर के स्वभाव और उसकी हस्ती की यथार्थता को निर्धारित कर सकते हैं, उसके सच्चे अस्तित्व की तो बात ही छोड़ दीजिए। परमेश्वर के प्रति उनके विश्वास में सदैव सन्देह और ग़लतफ़हमी होती है, और साथ ही उसमें कल्पनाएं और अवधारणाएं होती हैं। जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हैं, तो वे न चाहते हुए भी उन में से कुछ का अनुभव या अभ्यास करते हैं जिन्हें वे सम्भावित सच्चाईयां मानते हैं, ताकि वे अपने विश्वास को समृद्ध कर सकें, परमेश्वर के प्रति विश्वास में अपने अनुभव को बढ़ा सकें, परमेश्वर के प्रति विश्वास के विषय में अपनी समझ को सत्यापित कर सकें, जीवन के पथ पर अपनी चहलक़दमी की व्यर्थता को सन्तुष्ट कर सकें जिसे उन्होंने स्वयं स्थापित किया था और मानवजाति की नेक वज़ह को पूरा कर सकें। उसी समय वे इन चीज़ों को भी अंजाम देते हैं ताकि आशीषों को हासिल करने के लिए अपनी स्वयं की इच्छा को सन्तुष्ट कर सकें, शर्त लगाने के लिए जिससे वे मानवता की सबसे बड़ी आशीषों को प्राप्त कर सकते हैं, और उस महत्वाकांक्षी आकांक्षा और जीवनभर की इच्छा को पूरा करने के लिए कि वे तब तक विश्राम नहीं करेंगे जब तक वे परमेश्वर को प्राप्त न कर लें। ये लोग कभी कभार ही परमेश्वर के अद्भुत प्रकाशन को हासिल करने में सक्षम होते हैं, क्योंकि आशीषों को पाने की उनकी इच्छा और उनके इरादे उनके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उनके पास इसे छोड़ने की कोई इच्छा नहीं है और इसे छोड़ने की बात को वे सह नहीं सकते हैं। वे डरते हैं कि आशीषों को पाने की इच्छा के बिना, लम्बे समय से पोषित उस महत्वाकांक्षा के बिना कि वे तब तक विश्राम नहीं करेंगे जब तक वे परमेश्वर को प्राप्त न कर लें, वे परमेश्वर पर विश्वास करने हेतु उस प्रेरणा को खो देंगे। इसलिए, वे वास्तविकता का सामना नहीं करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के वचन या परमेश्वर के कार्य का सामना नहीं करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के स्वभाव या हस्ती का सामना तक नहीं करना चाहते हैं, परमेश्वर को जानने के विषय की शिक्षा देने की तो बात ही छोड़ दीजिए। यह इसलिए है क्योंकि जब एक बार परमेश्वर, उसकी हस्ती और उसका धर्मी स्वभाव उनकी कल्पनाओं का स्थान ले लेता है, तो उनके सपने धुएं में उड़ जाएंगे; उनका तथाकथित विश्वास और "योग्यताएं" जिन्हें वर्षों के कठिन परिश्रम के कार्य के जरिए इकट्ठा किया गया था लुप्त और निष्फल हो जाएंगे; उनका "इलाका" जिसे उन्होंने कई वर्षों से खून पसीने से जीता था वे धराशायी होने के कगार पर होंगे। यह सूचित करेगा कि उनके अनेक वर्षों के कठिन परिश्रम और प्रयास व्यर्थ हैं, और यह कि उन्हें शून्य से दोबारा शुरुआत करना होगा। अपने हृदय में सहन करने के लिए यह उनके लिए सबसे कठिन दर्द है, और यह ऐसा परिणाम है जिसको देखने की इच्छा वे बहुत ही कम करते हैं; इसलिए वे हमेशा इस प्रकार के अनिर्णय एवं असहमति की विकट स्थिति में बंद रहते हैं, और वापस लौटने से माना करते हैं। यह तीसरे प्रकार का व्यक्ति है: ऐसा व्यक्ति जो दूध छुड़ाए हुए बच्चे की अवस्था में बना रहता है।

तीन प्रकार के लोग जिनका वर्णन ऊपर किया है - दूसरे शब्दों में, ऐसे लोग जो इन तीन अवस्थाओं में बने रहते हैं – वे परमेश्वर की पहचान और हस्ती में या उसके धर्मी स्वभाव में कोई सच्चा विश्वास नहीं रखते हैं, न ही उनके पास इन चीज़ों के विषय में कोई स्पष्ट, और निश्चित पहचान या पुष्टिकरण है। इसलिए, इन तीनों अवस्थाओं के लोगों के लिए सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करना बहुत कठिन है, और साथ ही उनके लिए परमेश्वर की दया, अद्भुत प्रकाशन और अद्भुत ज्योति को प्राप्त करना भी कठिन है क्योंकि वह प्रणाली जिसके अंतर्गत वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर के प्रति उनकी ग़लत मनोवृत्ति इसे परमेश्वर के लिए असम्भव बना देती है कि वह उनके हृदयों के भीतर कार्य करे। परमेश्वर के सम्बन्ध में उनके सन्देह, ग़लत अवधारणाएं और कल्पनाएं परमेश्वर के विषय में उनके विश्वास और ज्ञान से आगे बढ़ चुके हैं। ये तीनों बहुत ही ख़तरनाक प्रकार के लोग हैं साथ ही साथ तीनों बहतु ही ख़तरनाक अवस्थाओं में हैं। जब कोई परमेश्वर, परमेश्वर की हस्ती, परमेश्वर की पहचान, वह विषय कि परमेश्वर सत्य है या नहीं और उसके अस्तित्व की वास्तविकता के प्रति सन्देह की मनोवृत्ति को बनाए रखता है और इन चीज़ों के विषय में निश्चित नहीं हो सकता है, तो कोई कैसे हर चीज़ को स्वीकार कर सकता है जो परमेश्वर से आता है? कैसे कोई उस तथ्य को स्वीकार कर सकता है कि परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है? कोई कैसे परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय को स्वीकार कर सकता है? कोई कैसे परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर सकता है? इस किस्म का व्यक्ति परमेश्वर के सच्चे मार्गदर्शन और आपूर्ति को कैसे प्राप्त कर सकता है? वे जो इन तीन अवस्थाओं में हैं वे परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं, परमेश्वर पर दोष लगा सकते हैं, परमेश्वर की निंदा कर सकते हैं या किसी भी समय परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं। वे किसी भी समय सत्य के मार्ग को त्याग सकते हैं और परमेश्वर को छोड़ सकते हैं। कोई कह सकता है कि इन तीनों अवस्थाओं के लोग कठिन समयावधि में रहते हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर में विश्वास के विषय में सही पथ में प्रवेश नहीं किया है।

चौथे प्रकार की अवस्था परिपक्व होते हुए बालक की अवस्था है; अर्थात्, बचपना।

जब एक बच्चे का दूध पीना छुड़ाया जाता है – अर्थात्, उनके द्वारा प्रचुर मात्रा में अनुग्रह का आनन्द लिए जाने के पश्चात, एक व्यक्ति यह खोज करना प्रारम्भ कर देता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने, और विभिन्न प्रश्नों को समझने की इच्छा करने का क्या अर्थ है, जैसे मनुष्य क्यों जी रहा है, मनुष्य को कैसे जीवन जीना चाहिए और परमेश्वर क्यों मनुष्य पर अपने कार्य को क्रियान्वित करता है? जब ये अस्पष्ट विचार और भ्रमित कल्पनाएं उनके भीतर से उठती हैं और उनके भीतर बनी रहती हैं, तो वे लगातार सिंचाई को प्राप्त करती हैं और साथ ही वे अपने कर्तव्य को निभाने में समर्थ भी होती हैं। इस समयावधि के दौरान, उनके पास परमेश्वर के अस्तित्व की सच्चाई को लेकर आगे से कोई सन्देह नहीं होता है, और उनके पास एक सटीक समझ होती है कि परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ क्या है। इस नींव पर उन्हें धीरे धीरे परमेश्वर का ज्ञान होता है, और वे आहिस्ता आहिस्ता परमेश्वर के स्वभाव और उसकी हस्ती के सम्बन्ध में अपने अस्पष्ट विचारों और भ्रमित कल्पनाओं के कुछ उत्तर हासिल करते हैं। उनके स्वभाव में हुए परिवर्तनों साथ ही साथ परमेश्वर के विषय में उनके ज्ञान के सम्बन्ध में, इस अवस्था में लोग सही पथ पर कदम बढ़ाना आरम्भ कर देते हैं और एक रूपान्तरण की समयावधि में प्रवेश करते हैं। यह इस अवस्था के अंतर्गत होता है कि लोग जीवन पाना शुरू कर देते हैं। जीवन को धारण करने के स्पष्ट संकेत परमेश्वर को जानने से सम्बन्धित उन विभिन्न प्रश्नों का क्रमिक समाधान है जो लोगों के हृदयों में होते हैं – ग़लतफ़हमियां, कल्पनाएं, अवधारणाएं और परमेश्वर की अस्पष्ट परिभाषाएं – यह कि वे न केवल सचमुच में परमेश्वर के अस्तित्व की वास्तविकता पर विश्वास करते हैं और उसे जानते हैं बल्कि अपने हृदय में परमेश्वर की एक स्पष्ट परिभाषा और प्रारम्भिक ज्ञान भी रखते हैं, कि सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण करना उनके अस्पष्ट विश्वास का स्थान ले लेता है। इस अवधि के दौरान, लोग परमेश्वर के प्रति अपनी मिथ्या अवधारणाओं और अपने ग़लत अनुसरण और विश्वास के तरीकों को धीरे धीरे जान जाते हैं। वे सत्य के लिए लालायित होना, परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और अनुशासन के अनुभव हेतु लालायित होना, और अपने स्वभाव में परिवर्तन के लिए लालायित होना प्रारम्भ कर देते हैं। वे इस अवस्था के दौरान परमेश्वर के विषय में सभी प्रकार की अवधारणाओं और कल्पनाओं को धीरे धीरे त्याग देते हैं; ठीक उसी समय वे परमेश्वर के विषय में अपने ग़लत ज्ञान को बदलते और सुधारते हैं और परमेश्वर के विषय में कुछ सही आधारभूत ज्ञान हासिल करते हैं। यद्यपि इस अवस्था में लोगों के द्वारा धारण किए गए ज्ञान का एक अंश बहुत विशिष्ट या सटीक नहीं होता, फिर भी कम से कम वे परमेश्वर के विषय में अपनी अवधारणाओं, ग़लत ज्ञान और ग़लतफ़हमियों को त्यागना आरम्भ कर देते हैं; वे परमेश्वर के प्रति अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं को आगे से बनाए नहीं रखते हैं। वे यह सीखना आरम्भ करते हैं कि किस प्रकार त्यागें – अपनी स्वयं की अवधारणाओं के मध्य पाई जानेवाली चीज़ों को त्यागना, जो ज्ञान से और शैतान से हैं; वे सही और सकारात्मक चीज़ों के अधीन होने के लिए तैयार होना शुरू कर देते हैं, और यहां तक कि उन चीज़ों के प्रति भी जो परमेश्वर के वचनों से आते हैं और सत्य के अनुरूप होते हैं। साथ ही वे परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का प्रयास करना, उसके वचनों को व्यक्तिगत रूप से जानना और उसे क्रियान्वित करना, उसके वचनों को अपने कार्यों के सिद्धान्तों के रूप में और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के एक आधार के रूप में स्वीकार करना आरम्भ कर देते हैं। इस समयावधि के दौरान, लोग अचैतन्य रूप में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हैं, और अचैतन्य रूप में परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हैं। जबकि वे परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, और उसके वचनों को स्वीकार करते हैं, तो वे और भी अधिक सचेत हो जाते हैं और यह एहसास करने में सक्षम होते हैं कि वह परमेश्वर जिस पर वे अपने हृदय से विश्वास करते हैं वह सचमुच में अस्तित्व में है। परमेश्वर के वचनों, उनके अनुभवों और उनकी ज़िन्दगियों में, वे बहुतायत से महसूस करते हैं कि परमेश्वर ने सदैव मनुष्य की नियति के ऊपर अध्यक्षता की है, उनकी अगुवाई की है, और उनकी आपूर्ति की है। परमेश्वर के साथ अपनी संगति के जरिए, वे धीरे धीरे परमेश्वर के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। इसलिए, इससे पहले कि वे इसका एहसास करते, उन्होंने अर्ध चेतनावस्था में ही परमेश्वर के कार्य को मंज़ूर कर लिया था और उस पर दृढ़ता से विश्वास किया था, और उन्होंने परमेश्वर के वचनों को मंज़ूर कर लिया था। जब एक बार लोग परमेश्वर के वचनों को मंज़ूर कर लेते हैं और परमेश्वर के कार्यों को मंज़ूर कर लेते हैं, तो वे बिना रुके अपने आपका इंकार करते हैं, अपनी स्वयं की अवधारणाओं का इंकार करते हैं, अपने स्वयं के ज्ञान का इंकार करते हैं, अपनी स्वयं की कल्पनाओं का इंकार करते हैं, और साथ ही उसी समय वे बिना रुके खोजते हैं कि सत्य क्या है और परमेश्वर की इच्छा क्या है। विकास की इस अवधि के दौरान परमेश्वर के विषय में लोगों का ज्ञान बहुत ही सतही है - वे तो शब्दों का उपयोग करते हुए इस ज्ञान को परिश्रम से विस्तृत करने में भी असमर्थ हैं, न ही वे इसे विशेष रूप से परिश्रम से विस्तृत कर सकते हैं – और उनके पास सिर्फ महसूस की जानेवाली समझ है; फिर भी, जब पिछली तीन अवस्थाओं के साथ तुलना की जाती है, तो इस समयावधि के लोगों की अपरिपक्व ज़िन्दगियों ने पहले से ही परमेश्वर के वचनों की सिंचाई और आपूर्ति को प्राप्त कर लिया है, और पहले से ही अंकुरित होना प्रारम्भ कर दिया है। यह एक बीज के समान है जिसे भूमि में गाड़ा गया है; नमी और पोषक तत्वों को पाने के बाद; वह मिट्टी से फूटता है, उसका अंकुरित होना एक नए जीवन की उत्पत्ति को दर्शाता है। नए जीवन की यह उत्पत्ति एक व्यक्ति को जीवन के संकेतों की झलक देखने की अनुमति देती है। जीवन के साथ, लोग इस प्रकार बढ़ते जाएंगे। इसलिए, इन नीवों पर - परमेश्वर में विश्वास करने के सही पथ पर धीरे धीरे अपना मार्ग बनाना, अपनी स्वयं की अवधारणाओं को त्यागना, परमेश्वर के मार्गदर्शन को प्राप्त करना – लोगों की ज़िन्दगियां अनिवार्य रूप से आहिस्ता आहिस्ता प्रगति करेंगी। किस आधार पर इस प्रगति को नापा जाता है? इसे परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की सही समझ के साथ उसके अनुभव के अनुसार नापा जाता है। यद्यपि प्रगति की इस समयावधि के दौरान परमेश्वर और उसकी हस्ती के विषय में अपने ज्ञान का सटीकता से वर्णन करने के लिए अपने स्वयं के शब्दों का उपयोग करना उन्हें बहुत ही कठिन जान पड़ता है, फिर भी इस समूह के लोग परमेश्वर के अनुग्रह के आनन्द के जरिए प्रसन्नता का अनुसरण करने के लिए, या परमेश्वर में विश्वास करने के पीछे अपने उद्देश्य का अनुसरण करने से लिए आगे से चैतन्य रूप से तैयार नहीं हैं, जो उसके अनुग्रह को हासिल करने के लिए है। उसके बजाए, वे परमेश्वर के वचन के द्वारा जीविका की खोज करने, और परमेश्वर के उद्धार का एक विषय बनने के इच्छुक हैं। इसके अतिरिक्त, वे आत्मविश्वास रखते हैं और परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने हेतु तैयार हैं। यह प्रगति की अवस्था में एक व्यक्ति की पहचान है।

यद्यपि इस अवस्था में लोगों के पास परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का कुछ ज्ञान होता है, फिर भी यह ज्ञान बहुत धुंधला और अस्पष्ट है। जबकि वे इसका स्पष्ट रीति से विस्तार नहीं कर सकते हैं, उनको एहसास होता है कि उन्होंने पहले से ही अपने भीतर कुछ हासिल कर लिया है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की ताड़ना एवं न्याय के जरिए परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के विषय में कुछ मात्रा में ज्ञान और समझ हासिल कर लिया है; फिर भी, उसके बजाए यह सब सतही है, और यह अभी भी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। इस समूह के लोगों के पास ठोस दृष्टिकोण है जिसके तहत वे परमेश्वर के अनुग्रह से व्यवहार करते हैं। इस दृष्टिकोण को उद्देश्यों में हुए उन परिवर्तनों में प्रकट किया गया है जिनका वे अनुसरण करते हैं और जिस तरह से वे उनका अनुसरण करते हैं। उन्होंने पहले से ही देख लिया है - परमेश्वर के वचनों और कामों में, मनुष्य से की गई उसकी सभी प्रकार की अपेक्षाओं में और मनुष्य को दिए गए उसके प्रकाशनों में – कि यदि वे अभी भी सच्चाई का अनुसरण नहीं करेंगे, यदि वे अभी भी वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए अनुसरण नहीं करेंगे, यदि वे अभी भी परमेश्वर को सन्तुष्ट करने और जानने के लिए प्रयास नहीं करेंगे जबकि वे उसके वचनों का अनुभव करते हैं, तो वे परमेश्वर में विश्वास करने के महत्व को खो देंगे। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे परमेश्वर के अनुग्रह का कितना आनन्द उठाते हैं, वे अपने स्वभाव को नहीं बदल सकते हैं, परमेश्वर को सन्तुष्ट नहीं कर सकते हैं और परमेश्वर को नहीं जान सकते हैं, और यह कि यदि वे लगातार परमेश्वर के अनुग्रह के मध्य जीवन बिताएं, वे कभी उन्नति को प्राप्त नहीं करेंगे, जीवन को हासिल नहीं करेंगे या उद्धार पाने में समर्थ नहीं होंगे। संक्षेप में, यदि कोई परमेश्वर के वचनों का सचमुच में अनुभव नहीं कर सकता है और उसके वचनों के माध्यम से परमेश्वर को जानने में असमर्थ है, तो वह व्यक्ति अनंतकाल तक एक नवजात शिशु की अवस्था में बना रहेगा और कभी भी अपने जीवन की प्रगति में एक कदम भी नहीं ले पाएगा। यदि तुम सदैव एक नवजात शिशु की अवस्था में बने रहते हो, यदि तुम परमेश्वर के वचन की सच्चाई में कभी प्रवेश नहीं करते हो, यदि तुम परमेश्वर के वचनों के द्वारा जीवन व्यतीत करने में कभी समर्थ नहीं होते हो, यदि तुम परमेश्वर के सच्चे विश्वास और ज्ञान को धारण करने में कभी समर्थ नहीं होते हो, तो परमेश्वर के द्वारा तुम्हें पूर्ण किए जाने हेतु क्या कोई सम्भावना है? इसलिए, कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन की सच्चाई में प्रवेश करता है, कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के समान ग्रहण करता है, कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करता है, कोई भी व्यक्ति जिसका भ्रष्ट स्वभाव बदलना शुरू हो गया है, और कोई भी व्यक्ति जिसके पास एक ऐसा हृदय है जो सच्चाई के लिए लालायित होता है, जिसके पास परमेश्वर को जानने की इच्छा है, जिसके पास परमेश्वर के उद्धार को ग्रहण करने की इच्छा है - ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने सचमुच में जीवन को धारण किया है। यह सचमुच में चौथे प्रकार का व्यक्ति है, जो परिपक्व बच्चा है, वह व्यक्ति जो बालकपन की अवस्था में है।

पांचवे प्रकार की अवस्था परिपक्व जीवन की अवस्था है, या बालिग अवस्था है।

बालकपन की लड़खड़ाती हुई अवस्था का अनुभव करने के पश्चात्, प्रगति की यह अवस्था बार बार की जानेवाली पुनरावृत्तियों से भरी हुई है, लोगों का जीवन पहले से ही स्थिर हो गया है, उनके बढ़ते पग अब आगे से नहीं रुकते हैं, न ही कोई ऐसा है जो उन्हें रोकने में समर्थ है। यद्यपि आगे का पथ ऊबड़-खाबड़ और खुरदुरा है, फिर भी वे आगे से कमज़ोर और भयभीत नहीं होते हैं; वे आगे से फूहड़ता से काम नहीं करते हैं या अपने आचरण को नहीं खोते हैं। उनकी नींव परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभव में गहराई से जड़ पकड़े हुए हैं। उनके हृदयों को परमेश्वर की प्रतिष्ठा और महानता के द्वारा भीतर खींचा गया है। वे परमेश्वर के पदचिन्हों में चलने के लिए, परमेश्वर की हस्ती को जानने के लिए, और परमेश्वर को उसकी सम्पूर्णता में जानने के लिए लालायित हैं।

इस अवस्था में लोग पहले से ही साफ साफ जानते हैं कि वे किस में विश्वास करते हैं, और वे स्पष्ट रीति से जानते हैं कि उन्हें परमेश्वर में क्यों विश्वास करना चाहिए है और वे स्वयं अपनी अपनी ज़िन्दगियों के अर्थों को जानते हैं; साथ ही वे यह भी स्पष्ट रीति से जानते हैं कि हर चीज़ जिसे परमेश्वर प्रकट करता है वह सत्य है। उनके अनेक वर्षों के अनुभव में, वे महसूस करते हैं कि परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना के बिना, कोई व्यक्ति परमेश्वर को सन्तुष्ट करने और परमेश्वर को जानने में कभी सक्षम नहीं होगा, न ही कोई व्यक्ति परमेश्वर के सम्मुख आने में सचमुच में कभी समर्थ होगा। इन लोगों के अपने अपने हृदयों में एक बड़ी तीव्र इच्छा होती है कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा जांचा जाए, जिससे जांचे जाते समय परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को देख सकें, एक अधिक शुद्ध प्रेम को हासिल कर सकें, और ठीक उसी समय परमेश्वर को और अधिक सच्चाई से समझने और जानने में समर्थ हो सकें। वे जो इस अवस्था से सम्बन्धित हैं उन्होंने पहले से ही नवजात शिशु की अवस्था को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है, अर्थात् परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेने और रोटी खाने और तृप्त होने की अवस्था को। वे परमेश्वर को सहिष्णु बनाने और उन पर दया दिखाने के लिए असाधारण आशाओं को आगे से स्थान नहीं देते हैं; उसके बजाए, वे परमेश्वर की न रुकने वाली ताड़ना और उसके न्याय को पाने और उसकी आशा करने के लिए आश्वस्त हैं, ताकि अपने भ्रष्ट स्वभाव से अपने आपको अलग कर सकें और परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकें। परमेश्वर के विषय में उनका ज्ञान, उनका अनुसरण या उनके अनुसरण के अंतिम लक्ष्य: ये सभी चीज़ें उनके मनों में बहुत ही स्पष्ट हैं। इसलिए, बालिग अवस्था में लोगों ने पहले से ही अस्पष्ट विश्वास की अवस्था को, उस अवस्था को जिसके अंतर्गत वे उद्धार के लिए अनुग्रह पर आश्रित होते हैं, अपरिपक्व जीवन की अवस्था को जो परीक्षाओं का सामना नहीं कर सकती है, धुंधलेपन की अवस्था को, फूहड़पन से काम करने की अवस्था को, उस अवस्था को जिसमें अकसर चलने के लिए कोई पथ नहीं होता है, अचानक गर्म और ठण्डे होने के बीच के परिवर्तन की उस अस्थिर समयावधि को, और उस अवस्था को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है जहां कोई व्यक्ति एक आँख को ढंक करके परमेश्वर के पीछे पीछे चलता है। इस प्रकार का व्यक्ति अकसर परमेश्वर का अद्भुत प्रकाशन और उसकी अद्भुत ज्योति को प्राप्त करता है, और अक्सर परमेश्वर के साथ सच्ची संगति और संवाद में संलग्न रहता है। कोई कह सकता है कि इस अवस्था में रह रहे लोगों ने पहले से ही परमेश्वर की इच्छा के एक भाग को समझ लिया है; वे जो कुछ भी करते हैं उसमें वे सत्य के सिद्धान्तों को पाने में समर्थ हैं; वे जानते हैं परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरी करें। इससे बढ़कर, उन्होंने परमेश्वर को जानने के पथ को भी पा लिया है और परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान की गवाही देना भी प्रारम्भ कर दिया है। क्रमिक प्रगति की प्रक्रिया के दौरान, उनके पास परमेश्वर की इच्छा, मानवता की सृष्टि करने में परमेश्वर की इच्छा, और मानवता का प्रबंधन करने में परमेश्वर की इच्छा की क्रमिक समझ और उसका ज्ञान होता है; इसके अतिरिक्त, साथ ही उनके पास क्रमशः हस्ती के सम्बन्ध में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की समझ और ज्ञान भी होता है। कोई मानवीय अवधारणा या कल्पना इस ज्ञान का स्थान नहीं ले सकती है। जबकि कोई नहीं कह सकता है कि पांचवी अवस्था में किसी व्यक्ति का जीवन पूरी तरह से परिपक्व हो जाता है या इस व्यक्ति को धर्मी या पूर्ण कहा जाता है, क्योंकि इस प्रकार के व्यक्ति ने जीवन में परिपक्वता की अवस्था की ओर पहले से ही एक कदम बढ़ा लिया है; यह व्यक्ति परमेश्वर के सामने आने के लिए, परमेश्वर के वचन के आमने सामने खड़े होने के लिए और परमेश्वर के आमने सामने खड़े होने के लिए पहले से ही समर्थ है। क्योंकि इस प्रकार के व्यक्ति ने परमेश्वर के वचनों का इतना कुछ अनुभव कर लिया है, अनगिनित परीक्षाओं का अनुभव कर लिया है और परमेश्वर से अनुशासन, न्याय और ताड़ना की असंख्य घटनाओं का अनुभव कर लिया है, तो परमेश्वर के प्रति उनका समर्पण रिश्तों से सम्बन्धित नहीं है किन्तु सम्पूर्ण है। परमेश्वर के विषय में उनका ज्ञान अर्द्धचेतनावस्था से स्पष्ट एवं सटीक ज्ञान में, छिछलेपन से गहराई में, धुंधलेपन एवं अस्पष्टता से अति सतर्कता एवं स्पृश्यता में रूपान्तरित हो गया है, और वे ढीठ फूहड़पन एवं निष्क्रिय प्रयासों से सरल ज्ञान और प्रतिक्रियाशील गवाही में बदल गए हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि लोगों ने इस अवस्था में परमेश्वर के वचन की सच्चाई की वास्तविकता को धारण किया है, और यह कि उन्होंने पतरस के समान पूर्णता के पथ पर कदम रख दिया है। यह पांचवे प्रकार का व्यक्ति है, ऐसा व्यक्ति जो परिपक्व होने की दशा में जीवन व्यतीत करता है - बालिग अवस्था।

30 अक्टूबर 2014

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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