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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग चार

नीनवे के लोगों के हृदयों में सच्चे पश्चाताप से उन्होंने परमेश्वर की दया को प्राप्त किया और उस ने उनके अंत को बदल दिया

क्या वहां परमेश्वर के हृदय के बदलाव और उसके क्रोध के बीच कोई परस्पर विरोध था? नहीं, बिलकुल भी नहीं! यह इसलिए है क्योंकि उस विशेष समय पर परमेश्वर की सहनशीलता का अपना कारण था। इसका कारण क्या हो सकता है? यह वह है जिसे बाईबिल में दिया गया है: "प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कुमार्ग से फिर गया," और अपने हाथों के उपद्रवी कार्यों को तज दिया।

यह "कुमार्ग" कुछ मुटठीभर बुरे कार्यों की और संकेत नहीं करता है, परन्तु लोगों के व्यवहार के पीछे पाए जाने वाले बुरे स्रोत की और संकेत करता है। "अपने कुमार्ग से फिर जाना" इसका अर्थ है कि जिन पर सन्देह है वे कभी भी इन कार्यों को दोबारा नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, वे पुन: इस बुरे तरीके से व्यवहार नहीं करेंगे; वह तरीका, स्रोत, उद्देश्य, इरादा और उनके कार्यों का सिद्धान्त सब बदल चुका है; वे अपने हृदय में आनन्द और प्रसन्नता को लाने के लिए पुनः उन तरीकों और सिद्धान्तों का उपयोग कभी नहीं करेंगे। "हाथों के उपद्रव को त्याग देना" में "त्याग देना" का अर्थ है नीचे रख देना या छोड़ देना, बीते कल से पूर्ण रूप से नाता तोड़ देना और उस ओर कभी न फिरना। जब नीनवे के लोगों ने अपने हाथों से उपद्रव करना त्याग दिया, तो इसने उनके सच्चे पश्चाताप को प्रमाणित और साथ ही साथ प्रदर्शित भी किया। परमेश्वर लोगों के बाहरी रूप और साथ ही साथ उनके हृदय का भी अवलोकन करता है। जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के हृदयों में बिना किसी सन्देह के सच्चे पश्चाताप को देखा और साथ ही यह अवलोकन भी किया कि वे अपने कुमार्ग से फिर गए थे और हाथों के उपद्रव को त्याग दिया था, तो उसने अपना मन बदल लिया। कहने का तात्पर्य है कि इन लोगों के चालचलन, व्यवहार और कार्य करने के विभिन्न तरीकों ने, साथ ही साथ उनके हृदय के सच्चे अंगीकार और पापों के पश्चाताप ने, परमेश्वर को प्रेरित किया कि वह अपने मन को बदल दे, अपने इरादों को बदल दे, अपने निर्णय को वापस ले ले, और उन्हें दण्ड न दे या नष्ट न करे। इस प्रकार, नीनवे के लोगों ने एक अलग अंत को प्राप्त किया। उन्होंने अपने जीवन को छुड़ाया और उसी समय परमेश्वर की दया और करुणा को जीत लिया, इस बिन्दु पर परमेश्वर ने भी अपने क्रोध को वापस ले लिया।

परमेश्वर की करुणा और सहनशीलता दुर्लभ नहीं है - मनुष्य का सच्चा पश्चाताप दुर्लभ है

इसके बावजूद कि परमेश्वर नीनवे के लोगों से कितना क्रोधित था, ज्यों ही उन्होंने उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर राख पर बैठ गए, त्यों ही उसका हृदय धीरे-धीरे कोमल होता गया, और उसने अपना मन बदलना शुरू कर दिया। जब उसने उनके लिए घोषणा की कि वह उनके नगर को नष्ट कर देगा – अपने पापों के निमित्त उनके अंगीकार और पश्चाताप के कुछ समय पहले - परमेश्वर तब भी उन से क्रोधित था। जब एक बार वे पश्चाताप के कार्यों की एक श्रृंखला से होकर गुज़र गए, तो नीनवे के लोगों के निमित्त परमेश्वर का क्रोध धीरे धीरे उनके लिए दया और सहनशीलता में रूपान्तरित हो गया। एक ही घटना में परमेश्वर के स्वभाव के इन दोनों पहलुओं के प्रकाशन को एक साथ मिलने के विषय में कोई विरोधाभास नहीं है। किसी व्यक्ति को विरोधाभास की इस कमी को कैसे समझना और जानना चाहिए? चूंकि नीनवे के लोगों ने पश्चाताप किया तो परमेश्वर ने सफलतापूर्वक इन दोनों ध्रुवीय-विपरीत हस्तियों को प्रकट और प्रकाशित किया, जिसने लोगों को परमेश्वर की हस्ती की यथार्थता और उसके उल्लंघन न किए जा सकनेवाले गुण को देखने की अनुमति दी। परमेश्वर ने लोगों को निम्नलिखित बातें बताने के लिए अपनी मनोवृत्ति का उपयोग किया: ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को बर्दाश्त नहीं करता है, या वह उन पर दया करना नहीं चाहता है; यह ऐसा है कि वे कभी कभार ही परमेश्वर के प्रति सच्चा पश्चाताप करते हैं, और ऐसा कभी कभार ही होता है कि लोग सचमुच में अपने कुमार्ग से फिरते हैं और अपने हाथों से उपद्रव करना त्यागते हैं। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर मनुष्य से क्रोधित हो जाता है, तो वह आशा करता है कि मनुष्य सचमुच में पश्चाताप करने में समर्थ होगा, और वह मनुष्य के सच्चे पश्चाताप को देखना चाहता है, ऐसी दशा में तब वह उदारता से मनुष्य को अपनी दया और सहनशीलता प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य का बुरा चालचलन परमेश्वर के क्रोध को उनके ऊपर लाता है, जबकि परमेश्वर की दया और करुणा को उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो परमेश्वर को ध्यान से सुनते हैं और सचमुच में उसके सम्मुख सच्चा पश्चाताप करते हैं, और इसे उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो अपने कुमार्ग से फिर जाते हैं और अपने हाथों से उपद्रव करना त्याग कर देते हैं। नीनवे के लोगों के उपचार में परमेश्वर की मनोवृत्ति को बिलकुल साफ साफ प्रकाशित किया गया है: परमेश्वर की दया और सहनशीलता को प्राप्त करना बिलकुल भी कठिन नहीं है; वह एक व्यक्ति से सच्चे पश्चाताप की अपेक्षा करता है। जब तक लोग अपने कुमार्गों से परे रहते हैं और अपने हाथों से उपद्रव करना त्याग देते हैं, परमेश्वर उनके प्रति अपने हृदय और अपनी मनोवृत्ति को बदलेगा।

सृष्टिकर्ता का धर्मी स्वभाव सच्चा और स्पष्ट है

जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के वास्ते अपने मन को बदल लिया, तो क्या यह उसकी करुणा और सहनशीलता एक दिखावा थी? नहीं, बिलकुल भी नहीं! फिर एक ही मुद्दे के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के दोनों पहलुओं के बीच का रूपान्तरण तुम्हें क्या देखने देता है? परमेश्वर का स्वभाव पूरी तरह से सम्पूर्ण है; यह बिलकुल भी खण्डित नहीं है। इस पर ध्यान दिए बिना कि वह लोगों के प्रति क्रोध प्रकट कर रहा है या दया एवं सहनशीलता, यह सब उसके धर्मी स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। परमेश्वर का स्वभाव सच्चा एवं सुस्पष्ट है। वह अपने विचारों और रवैयों को चीज़ों के विकास अनुसार बदलता है। नीनवे के निवासियों के प्रति उसके रवैये का रूपान्तरण मानवता को बताता है कि उसके पास अपने स्वयं के विचार और युक्तियां हैं; वह रोबोट या मिट्टी का कोई पुतला नहीं है, परन्तु स्वयं जीवित परमेश्वर है। वह नीनवे के लोगों से क्रोधित हो सकता था, ठीक उसी तरह जैसे वह उनके रवैये के अनुसार उनके अतीत को क्षमा कर सकता था; वह नीनवे के लोगों के ऊपर दुर्भाग्य लाने का निर्णय ले सकता था, और वह उनके पश्चाताप के कारण अपना निर्णय बदल सकता था। लोग यांत्रिक रूप से नियमों को लागू करना अधिक पसंद करते हैं, और वे परमेश्वर को पूर्ण करने और परिभाषित करने के लिए नियमों का उपयोग करना अधिक पसंद करते हैं, ठीक उसी तरह जैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने के लिए सूत्रों का उपयोग करना अधिक पसंद करते हैं। इसलिए, मानवीय विचारों के आयाम के अनुसार, परमेश्वर विचार नहीं करते, और न ही उनके पास कोई स्वतन्त्र योजनाएँ हैं। असलियत में, परमेश्वर के विचार चीज़ों और वातावरण में परिवर्तन के अनुसार निरन्तर रूपान्तरित हो रहे हैं; जब तक ये विचार रूपान्तरित हो रहे हैं, परमेश्वर के अस्तित्व के विभिन्न पहलू प्रकट होंगे। रूपान्तरण की इस प्रक्रिया के दौरान, उस घड़ी जब परमेश्वर अपना मन बदलता है, तब वह मानवजाति पर अपने जीवन के अस्तित्व की सच्चाई को प्रकट करता है, और वह यह प्रकट करता है कि उसका धर्मी स्वभाव सच्चा और सुस्पष्ट है। इससे बढ़कर, परमेश्वर मानवजाति के प्रति अपने क्रोध, अपनी दया, अपनी करुणा और अपनी सहनशीलता के अस्तित्व की सच्चाई को प्रमाणित करने के लिए अपने सच्चे प्रकटीकरणों की उपयोग करता है। उसकी हस्ती को चीज़ों के विकास के अनुसार किसी भी समय पर और किसी भी स्थान में प्रकट किया जाएगा। उनमें एक सिंह का क्रोध और माता की ममता एवं सहनशीलता होती है। किसी मनुष्य को उनके धर्मी स्वभाव पर प्रश्न करने, उसका उल्लंघन करने, उसे बदलने या तोड़ने मरोड़ने की अनुमति नहीं दी गई है। समस्त मुद्दों और सभी चीज़ों के मध्य, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को, अर्थात्, परमेश्वर का क्रोध एवं उसकी करुणा, किसी भी समय पर और किसी भी स्थान में प्रकट किया जा सकता है। वे प्रकृति के हर एक कोने एवं छिद्र में इन पहलुओं को स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं और हर पल स्पष्ट रूप से उन्हें अंजाम देते हैं। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को समय या अन्तराल के द्वारा सीमित नहीं किया जाता है, या दूसरे शब्दों में, समय या अन्तराल की सीमाओं के द्वारा तय तरीके से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को यांत्रिक रूप से प्रकट या प्रकाशित नहीं किया जाता है। उसके बजाए, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को किसी भी समय और स्थान में स्वतन्त्र रूप से प्रकट और प्रकाशित किया जाता है। जब तुम परमेश्वर को अपना मन बदलते और अपने क्रोध को थामते और नीनवे के लोगों का नाश करने से पीछे हटते हुए देखते हो, तो क्या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर केवल दयालु और प्रेमी है? क्या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर का क्रोध खोखले वचनों से बना है? जब परमेश्वर प्रचण्ड क्रोध प्रकट करता है और अपनी दया को वापस ले लेता है, तो क्या तुम कह सकते हो कि वह मानवता के प्रति किसी सच्चे प्रेम का एहसास नहीं करता है? परमेश्वर लोगों के बुरे कार्यों के प्रत्युतर में प्रचण्ड क्रोध प्रकट करता है; उसका क्रोध दोषपूर्ण नहीं है। परमेश्वर का हृदय लोगों के पश्चाताप के द्वारा द्रवित हो जाता है, और यह वही पश्चाताप है जो इस तरह उसके हृदय को बदल देता है। उसका द्रवित होना, मनुष्य के प्रति उसके हृदय का बदलाव साथ ही साथ उसकी दया और सहनशीलता पूर्ण रूप से दोषमुक्त है; वह साफ, स्वच्छ, निष्कलंक और अमिश्रित है। परमेश्वर की सहनशीलता विशुद्ध रूप से सहनशीलता है; उनकी दया विशुद्ध रूप से दया है। उनका स्वभाव मनुष्य के पश्चाताप और उसके विभिन्न चाल-चलन के अनुसार क्रोध, साथ ही साथ दया एवं सहनशीलता को प्रकट करेगा। जो वह प्रकट या प्रकाशित करता है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि यह पूरी तरह पवित्र है; यह पूरी तरह प्रत्यक्ष है; उनकी हस्ती सृष्टि की किसी भी चीज़ की अपेक्षा पृथक है। कार्यों के वे सिद्धान्त जिन्हें परमेश्वर प्रकट करता है, उसके विचार एवं योजनाएँ या कोई विशेष निर्णय, साथ ही साथ हर एक कार्य, वह किसी भी प्रकार की त्रुटियों या दागों से स्वतन्त्र है। जैसा परमेश्वर ने निर्णय लिया है, वह वैसा ही करेगा, और इस रीति से वह अपने उद्यमों को पूरा करता है। इस प्रकार के परिणाम ठीक और दोषरहित हैं क्योंकि उनका स्रोत दोषरहित और निष्कलंक है। परमेश्वर का क्रोध दोषमुक्त है। इसी प्रकार, परमेश्वर की दया और सहनशीलता, जिसे किसी सृजन के द्वारा धारण नहीं किया जाता है, वे पवित्र एवं निर्दोष हैं, और वे सोच विचार और अनुभव किए जाने पर खरे निकल सकते हैं।

नीनवे की कहानी को समझने के पश्चात्, क्या तुम सब परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के तत्व के अन्य पक्ष को देख पाते हो? क्या तुम सब परमेश्वर के अद्वितीय धर्मी स्वभाव के अन्य पक्ष को देख पाते हो? क्या मानवता के मध्य कोई इस प्रकार का स्वभाव धारण करता है? क्या कोई परमेश्वर के समान इस प्रकार का क्रोध धारण करता है? क्या कोई परमेश्वर के समान दया और सहनशीलता धारण करता है? सृष्टि के मध्य ऐसा कौन है जो इतना अधिक क्रोध कर सकता है और मानवजाति को नष्ट करने या उसके ऊपर विपत्ति लाने का निर्णय ले सकता है? और करुणा प्रदान करने, मनुष्यों को सहने और क्षमा करने, और उसके द्वारा मनुष्य को नष्ट करने के निर्णय को बदलने के योग्य कौन है? सृष्टिकर्ता अपने स्वयं की अनोखी पद्धतियों और सिद्धान्तों के माध्यम से अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करता है; वह लोगों, घटनाओं या चीज़ों के नियन्त्रण या प्रतिबन्ध के अधीन नहीं है। उसके अद्वितीय स्वभाव के साथ, कोई भी उसके विचारों और उपायों को बदलने में समर्थ नहीं है, न ही कोई उसे मनाने में और उसके निर्णयों को बदलने में समर्थ है। सृष्टि के व्यवहार और विचारों की सम्पूर्णता उसके धर्मी स्वभाव के न्याय के अधीन अस्तित्व में रहती है। चाहे वह क्रोध करे या दया इसे कोई भी नियन्त्रित नहीं कर सकता है; केवल सृष्टिकर्ता की हस्ती – या दूसरे शब्दों में, सृष्टिकर्ता का धर्मी स्वभाव – ही इसका निर्णय ले सकती है। सृष्टिकर्ता के धर्मी स्वभाव की अद्वितीय प्रकृति यही है!

जब हम ने एक बार नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये में रूपान्तरण का विश्लेषण कर लिया है और समझ लिया है, तो क्या तुम सब परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के अंतर्गत पाई जानेवाली दया का वर्णन करने के लिए "अद्वितीय" शब्द का उपयोग करने में समर्थ हो? हम ने पहले ही कहा था कि परमेश्वर का क्रोध उनके अद्वितीय धर्मी स्वभाव के तत्व का एक पहलू है। अब मैं दो पहलुओं, परमेश्वर का क्रोध और परमेश्वर की दया, को उनके धर्मी स्वभाव के रूप में परिभाषित करूंगा। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव पवित्र है; यह अनुल्लंघनीय साथ ही साथ निर्विवादित भी है; यह कुछ ऐसा है जिसे सृजी गई वस्तुओं और न सृजी गई वस्तुओं के मध्य कोई भी धारण नहीं कर सकता है। यह परमेश्वर के लिए अद्वितीय और अतिविशेष दोनों है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर का क्रोध पवित्र और अनुल्लंघनीय है; ठीक उसी समय, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का अन्य पहलू - परमेश्वर की दया - पवित्र है और उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। सृजी गई वस्तुओं या न सृजी गई वस्तुओं में से कोई भी परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता है या उनके कार्यों में उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और न ही कोई सदोम के विनाश या नीनवे के उद्धार में उनका स्थान ले सकता है या उनका प्रतिनिधित्व कर सकता है। यह परमेश्वर के अद्वितीय धर्मी स्वभाव की सच्ची अभिव्यक्ति है।

मानवजाति के प्रति सृष्टिकर्ता की सच्ची भावनाएं

लोग अकसर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना सरल बात नहीं है। फिर भी, मैं कहता हूं कि परमेश्वर को जानना बिलकुल भी कठिन विषय नहीं है, क्योंकि वह बार बार मनुष्य को अपने कामों का गवाह बनने देता है। परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के साथ संवाद करना बंद नहीं किया है; उसने कभी भी मनुष्य से अपने आपको गुप्त नहीं रखा है, न ही उसने स्वयं को छिपाया है। उसके विचारों, उसके उपायों, उसके वचनों और उसके कार्यों को मानवजाति के लिए पूरी तरह से प्रकाशित किया गया है। इसलिए, जब तक मनुष्य परमेश्वर को जानने की कामना करता है, वह सभी प्रकार के माध्यमों और पद्धतियों के जरिए उन्हें समझ और जान सकता है। मनुष्य क्यों आँख बंद करके सोचता है कि परमेश्वर ने जानबूझकर उससे परहेज किया है, कि परमेश्वर ने जानबूझकर स्वयं को मानवता से छिपाया है, कि परमेश्वर का मनुष्य को उन्हें समझने या जानने देने का कोई इरादा नहीं है, उसका कारण यह है कि मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर कौन है, और न ही वह परमेश्वर को समझने की इच्छा करता है; उससे भी बढ़कर, वह सृष्टिकर्ता के विचारों, वचनों या कार्यों की परवाह नहीं करता है..... सच्चाई से कहता हूँ, यदि कोई सृष्टिकर्ता के वचनों या कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करने और समझने के लिए सिर्फ अपने खाली समय का उपयोग करे, और सृष्टिकर्ता के विचारों एवं उनके हृदय की आवाज़ पर थोड़ा सा ध्यान दे, तो उन्हें यह एहसास करने में कठिनाई नहीं होगी कि सृष्टिकर्ता के विचार, वचन और कार्य दृश्यमान और पारदर्शी हैं। उसी प्रकार, यह महसूस करने में उन्हें बस थोड़ा सा प्रयास लगेगा कि सृष्टिकर्ता हर समय मनुष्य के मध्य में है, कि वह मनुष्य और सम्पूर्ण सृष्टि के साथ हमेशा से वार्तालाप में है, और यह कि वह प्रति दिन नए कार्य कर रहा है। उसकी हस्ती और स्वभाव को मनुष्य के साथ उनके संवाद में प्रकट किया गया; उसके विचारों और उपायों को उसके कार्यों में पूरी तरह से प्रकट किया गया है; वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है और उसे ध्यान से देखता है। वह ख़ामोशी से अपने शांत वचनों के साथ मानवजाति और समूची सृष्टि से बोलता है: मैं ब्रह्माण्ड के ऊपर हूँ, और मैं अपनी सृष्टि के मध्य हूँ। मैं रखवाली कर रहा हूँ, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ, मैं तुम्हारी तरफ हूँ..... उसके हाथों में गर्मजोशी है और वे बलवान हैं, उसके कदम हल्के हैं, उसकी आवाज़ कोमल और अनुग्रहकारी है; उसका स्वरूप हमारे पास से होकर गुज़र जाता है और मुड़ जाता है, और समूची मानवजाति का आलिंगन करता है; उसका मुख सुन्दर और सौम्य है। वह छोड़कर कभी नहीं गया, और न ही वा गायब हुआ है। सुबह से लेकर शाम तक, वह मानवजाति के निरन्तर साथी है। मानवता के लिए उनकी समर्पित देखभाल और विशेष स्नेह, साथ ही साथ मनुष्य के लिए उनकी सच्ची चिंता और प्रेम, को थोड़ा थोड़ा करके प्रदर्शित किया गया जब उन्होंने नीनवे के नगर को बचाया था। विशेष रूप से, यहोवा परमेश्वर और योना के बीच के संवाद ने मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता की दया को खुलकर प्रकट किया जिसे उन्होंने स्वयं सृजा था। इन वचनों के माध्यम से, तुम मानवता के प्रति परमेश्वर की सच्ची भावनाओं की एक गहरी समझ हासिल कर सकते हो।

निम्नलिखित वचन को योना की पुस्तक 4:10-11 में दर्ज किया गया है: "तब यहोवा ने कहा, जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्ट भी हुआ, उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हजार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएं हाथों का भेद नहीं पहचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊं?" ये यहोवा परमेश्वर के वास्तविक वचन हैं, उनके और योना के बीच का वार्तालाप। यद्यपि यह संवाद एक संक्षिप्त वार्तालाप है, यह मनुष्य के निमित्त सृष्टिकर्ता की चिंता और उसे त्यागने की उनकी अनिच्छा से लबालब भरा हुआ है। ये वचन उस सच्चे रवैये और एहसासों को प्रकट करते हैं जिसे परमेश्वर ने अपनी सृष्टि के लिए अपने हृदय के भीतर संजोकर रखा है, और इन स्पष्ट वचनों से, जिस प्रकार के वचन मनुष्य के द्वारा कभी कभार ही सुने जाते हैं, परमेश्वर मानवता के लिए अपने सच्चे इरादों को बताता है। यह संवाद उस रवैये को दर्शाता है जिसे परमेश्वर नीनवे के लोगों के प्रति रखते थे – किन्तु यह किस प्रकार का रवैया है? यह वह रवैया है जिसे परमेश्वर नीनवे के लोगों के प्रति उनके पश्चाताप से पहले और बाद में अपनाते थे। परमेश्वर मानवता से इसी रीति से बर्ताव करता है। इन वचनों के भीतर कोई भी व्यक्ति उनके विचारों, साथ ही साथ उनके स्वभाव को पा सकता है।

इन वचनों में परमेश्वर के किस प्रकार के विचारों को प्रकट किया गया है? सावधानीपूर्वक पढ़ने से तुरन्त ही प्रकट हो जाता है कि उन्होंने "दया" शब्द का प्रयोग किया है; इस शब्द का उपयोग मानवजाति के प्रति परमेश्वर के सच्चे रवैये को दिखाता है।

शब्दों एवं वाक्यांशों के अध्ययन शास्त्र के दृष्टिकोण से, कोई व्यक्ति "दया" शब्द का विभिन्न प्रकार से व्याख्या कर सकता हैः पहला, प्रेम करना और रक्षा करना, किसी चीज़ के प्रति कोमलता महसूस करना; दूसरा, दीवानगी से प्रेम करना; और अंततः, उसे नुकसान पहुँचाना न चाहना और इस प्रकार के कार्य को बर्दाश्त करने में असमर्थ होना। संक्षेप में, इसका तात्पर्य कोमल स्नेह और प्रेम है, साथ ही साथ किसी व्यक्ति या किसी चीज़ को छोड़ने की अनिच्छा है; इसका अर्थ मनुष्य के प्रति परमेश्वर की दया और सहनशीलता है। यद्यपि परमेश्वर ने एक शब्द का उपयोग किया जिसे मनुष्यों के बीच सामान्य तौर पर बोला जाता है, फिर भी इस शब्द के इस्तेमाल ने मानवजाति के प्रति परमेश्वर के हृदय की आवाज़ और उनके रवैये को खुलकर प्रकट किया है।

यद्यपि नीनवे का नगर ऐसे लोगों से भरा हुआ था जो सदोम के लोगों के समान ही भ्रष्ट, बुरे और उपद्रवी थे, उनके पश्चाताप ने परमेश्वर को बाध्य किया कि वे अपना मन बदल दें और उन्हें नाश न करने का निर्णय लें। क्योंकि परमेश्वर के वचनों और निर्देशों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया ने एक ऐसे रवैये का प्रदर्शन किया जो सदोम के नागरिकों के रवैये के ठीक विपरीत था, और परमेश्वर के प्रति उनके सच्चे समर्पण और अपने पापों के लिए उनके सच्चे पश्चाताप, साथ ही साथ हर लिहाज से उनके सच्चे और हार्दिक आचरण के कारण, परमेश्वर ने एक बार फिर से उनके ऊपर अपनी हार्दिक दया दिखाई और उन्हें यह प्रदान किया। मानवता के लिए परमेश्वर के प्रतिफल और उनकी दया की नकल कर पाना किसी के लिए भी असंभव है; कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की दया या सहनशीलता को धारण नहीं कर सकता है, न ही मानवता के प्रति उनके सच्चे एहसासों को धारण कर सकता है। क्या कोई है जिसे तुम महान पुरुष या स्त्री मानते हो, या यहाँ तक कि कोई उत्कृष्ट मानव भी, जो, श्रेष्ठ नज़रिए से, एक महान पुरुष या स्त्री के रूप में, या उच्चतम बिन्दु पर बोलते हुए, मानवजाति या सृष्टि के लिए इस प्रकार का कथन कहेगा? मानवजाति के मध्य ऐसा कौन है जो मानवता के जीवन की स्थितियों को अपने हाथों की हथेली के समान जान सकता है? मानवता के अस्तित्व के लिए बोझ और ज़िम्मेदारी कौन उठा सकता है? किसी नगर के विनाश की घोषणा करने के लिए कौन समर्थ है? और किसी नगर को क्षमा करने के लिए कौन सक्षम है? कौन कह सकता है कि वह अपनी स्वयं की सृष्टि का पालन पोषण करता है? केवल सृष्टिकर्ता! केवल सृष्टिकर्ता ने ही इस मानवजाति के ऊपर दया की है। केवल सृष्टिकर्ता ने ही इस मानवजाति को कोमलता और स्नेह दिखाया है। केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति के लिए सच्चा और कभी न टूटनेवाला प्रेम रखता है। उसी प्रकार, केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति पर दया कर सकता है और अपनी सम्पूर्ण सृष्टि का पालन पोषण कर सकता है। उसका हृदय मनुष्य के हर एक कार्यों से खुशी से उछलता और दुखित होता है: वह मनुष्य की दुष्टता और भ्रष्टता के ऊपर क्रोधित, परेशान और दुखित होता है; वह मनुष्य के पश्चाताप और विश्वास के लिए प्रसन्न, आनंदित, क्षमाशील और प्रफुल्लित होता है; उसका हर एक विचार और उपाय मानवजाति के लिए अस्तित्व में बने हुए हैं और उसके चारों और परिक्रमा करते हैं; जो वह है और जो उसके पास है उसे पूरी तरह से मानवजाति के वास्ते प्रकट किया जाता है; उसकी भावनाओं की सम्पूर्णता मानवजाति के अस्तित्व के साथ आपस में गुथी हुई है। मनुष्य के वास्ते, वह भ्रमण करता है और यहां वहां भागता है, वह खामोशी से अपने जीवन का हर अंश दे देता है; वह अपने जीवन का हर मिनट और सेकेंड समर्पित कर देता है। उसने कभी नहीं जाना कि स्वयं अपने जीवन पर किस प्रकार दया करना है, फिर भी उसने हमेशा से मानवजाति पर दया की है और उसका पालन पोषण किया है जिसे उसने स्वयं सृजा था। वह सब कुछ देता है जिसे उसे इस मानवजाति को देना है। वह बिना किसी शर्त के और बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के अपनी दया और सहनशीलता प्रदान करता है। वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है जिससे मानवजाति उसकी नज़रों के सामने निरन्तर जीवित रहे, और जीवन के उसके प्रावधान प्राप्त करती रहे; वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है जिससे मानवजाति एक दिन उसके सम्मुख समर्पित हो जाए और यह पहचान जाए कि यह वही ईश्वर हैं जो मुनष्य के अस्तित्व का पालन पोषण करता है और समूची सृष्टि के जीवन की आपूर्ति करता है।

सृष्टिकर्ता मानवता के लिए अपनी सच्ची भावनाओं को प्रकट करता है

यहोवा परमेश्वर और योना के बीच यह वार्तालाप निःसन्देह मानवता के लिए सृष्टिकर्ता की सच्ची भावनाओं का एक प्रकटीकरण है। एक ओर यह उसके अधीन सम्पूर्ण प्रकृति के विषय में सृष्टिकर्ता की समझ के बारे में लोगों को सूचित करता है; जैसा यहोवा परमेश्वर ने कहा: "फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दहिने बाएं हाथों का भेद नहीं पहचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊं?" दूसरे शब्दों में, नीनवे के विषय में परमेश्वर की समझ जल्दबाज़ी से किए गए कार्य से कहीं दूर था। वह न केवल नगर में रहने वाले जीवित प्राणियों (मनुष्य व पशु) की संख्या को जानता था, बल्कि वह यह भी जानता था कि कितने लोग अपने दाहिने बाएं हाथों का भेद नहीं पहचानते थे – अर्थात्, कितने बच्चे या तरुण जो वहां मौज़ूद थे। यह मानवता के विषय में परमेश्वर की श्रेष्ठतम समझ का एक ठोस प्रमाण है। दूसरी ओर यह वार्तालाप मानवता के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति के विषय में लोगों को सूचित करता है, दूसरे शब्दों में यह सृष्टिकर्ता के हृदय में मानवता के बोझ को सूचित करता है। यह ठीक वैसा है जैसा यहोवा परमेश्वर ने कहा: "जिस रेंड़ के पेड़ के लिए तूने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्ट भी हुआ, उस पर तूने तरस खाई है। और क्या मैं नीनवे पर तरस न खाऊं, उस बड़े नगर पर....." योना पर दोष लगाते हुए ये परमेश्वर यहोवा के वचन हैं, किन्तु वे सब सत्य हैं।

यद्यपि योना को नीनवे के लोगों के लिए यहोवा परमेश्वर के वचनों की घोषणा का काम सौंपा गया था, फिर भी उसने यहोवा परमेश्वर के इरादों को नहीं समझा था, न ही उसने नगर के लोगों के लिए उसकी चिंताओं और अपेक्षाओं को समझा था। एक फटकार के साथ परमेश्वर का अभिप्राय उसे यह बताना था कि मानवता उसके हाथों की रचना है, और परमेश्वर ने हर एक व्यक्ति के लिए दर्द सहते हुए प्रयास किया था; प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ परमेश्वर की आशाओं को लिए फिरता था, प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के जीवन की आपूर्ति का आनन्द लेता था; प्रत्येक व्यक्ति के लिए, परमेश्वर ने एक दर्दनाक कीमत चुकाई थी। साथ ही इस फटकार ने योना को यह भी बताया कि परमेश्वर मानवता का पोषण करता है, जो उसके हाथों की रचना है, उतना ही जितना जैसे योना ने स्वयं रेंड़ के पेड़ को प्रिय जाना था। परमेश्वर अंतिम सम्भावित घड़ी से पहले किसी भी कीमत पर उन्हें आसानी से नहीं त्यागेगा; इसके अतिरिक्त, उस नगर में इतने सारे बच्चे और निरीह पशु थे। परमेश्वर की सृष्टि के इन युवा और अनभिज्ञ प्राणियों से व्यवहार करते समय, जो अपने दहिने बाएं हाथों का भेद भी नहीं पहचानते सकते थे, परमेश्वर इस प्रकार की जल्दबाज़ी से उनके जीवन को समाप्त करने और उनके परिणाम को निर्धारित करने में और भी अधिक असमर्थ था। परमेश्वर ने उन्हें बढ़ते हुए देखने की आशा की थी; उसने आशा की थी कि वे अपने बापदादों के समान उन्हीं मार्गों पर नहीं चलेंगे, कि उन्हें फिर से यहोवा परमेश्वर की चेतावनी को नहीं सुनना होगा, और यह कि वे नीनवे के अतीत की गवाही देंगे। उससे भी बढ़कर परमेश्वर ने नीनवे के द्वारा पश्चाताप किए जाने के बाद उसे देखने, नीनवे के पश्चाताप के पश्चात् उसके भविष्य को देखने, और एक बार फिर से नीनवे को परमेश्वर की दया के अधीन जीवन जीते हुए देखने की आशा की थी। इसलिए, परमेश्वर की निगाहों में, सृष्टि के प्राणी जो अपने दहिने और बाएं हाथों का भेद नहीं जान सकते थे वे नीनवे के भविष्य थे। वे नीनवे के घृणित अतीत की ज़िम्मेदारी लेंगे, ठीक उसी तरह जैसे वे यहोवा परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन नीनवे के अतीत और भविष्य के प्रति गवाही देने के महत्वपूर्ण कर्तव्य की ज़िम्मेदारी लेंगे। उसकी सच्ची भावनाओं की इस घोषणा में, यहोवा परमेश्वर ने मानवता के लिए सृष्टिकर्ता की दया को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत किया है। इसने मानवता को दिखाया है कि "सृष्टिकर्ता की दया" कोई खोखला वाक्यांश नहीं है, न ही यह खोखला वादा है; इसमें ठोस सिद्धान्त, पद्धतियाँ और उद्देश्य हैं। वह सच्चा और वास्तविक है, और किसी झूठ या कपटवेश का उपयोग नहीं करता है, और इसी रीति से उसकी दया को बिना रुके हर समय और हर युग में मानवता को प्रदान किया जाता है। फिर भी, आज के दिन तक, योना के साथ सृष्टिकर्ता का संवाद परमेश्वर का एकमात्र और अति विशेष मौखिक कथन है कि वह मानवता पर दया क्यों करता है, वह मानवता पर दया कैसे करता है, वह मानवता के प्रति और मानवता के लिए अपनी सच्ची भावनाओं के प्रति कितना सहनशील है। यहोवा परमेश्वर का संक्षिप्त वार्तालाप मानवता के लिए उसके सम्पूर्ण विचारों को अभिव्यक्त करता है; यह मानवता के निमित्त परमेश्वर के हृदय की मनोवृत्ति की सच्ची अभिव्यक्ति है, और साथ ही यह मानवता पर व्यापक रूप से दया करने का ठोस सबूत भी है। उसकी दया न केवल मानवता की प्राचीन पीढ़ियों को दी गई है; बल्कि यह मानवता के युवा सदस्यों को भी दी गई है, ठीक उसी तरह जैसा हमेशा से होता आया है, एक पीढ़ी से लेकर दूसरी पीढ़ी तक। यद्यपि परमेश्वर का क्रोध बार बार मानवता के कुछ निश्चित कोनों और कुछ निश्चित क्षेत्रों पर नीचे उतरता है, फिर भी उसकी दया कभी खत्म नहीं हुई है। अपनी करुणा के साथ, वह अपनी सृष्टि की एक पीढ़ी के बाद अगली पीढ़ी का मार्गदर्शन एवं अगुवाई करता है, वह अपनी सृष्टि की एक पीढ़ी के बाद अगली पीढ़ी की आपूर्ति एवं उनका पालन पोषण करता है, क्योंकि मानवता के प्रति उसकी सच्ची भावनाएं कभी नहीं बदलेंगी। जैसा यहोवा परमेश्वर ने कहा: "क्या मैं नीनवे पर तरस न खाऊं....?" उसने सदैव अपनी सृष्टि का पालन पोषण किया है। यह सृष्टिकर्ता के धर्मी स्वभाव की दया है, और साथ ही यह सृष्टिकर्ता की विशुद्ध अद्वितीयता भी है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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