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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का अधिकार (I)    भाग दो के क्रम में

छठवें दिन, सृष्टिकर्ता ने कहा, और हर प्रकार के जीवित प्राणी जो उसके मस्तिष्क में थे एक के बाद एक अपने आप को प्रगट करने लगे

स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर न होते हुए, सब वस्तुओं को बनाने के लिए सृष्टिकर्ता का कार्य लगातार पाँचवे दिन तक चलता रहा, उसके तुरन्त बाद सृष्टिकर्ता ने सब वस्तुओं की सृष्टि के छठवें दिन का स्वागत किया। यह दिन एक और नई शाम थी, तथा एक और असाधारण दिन था। तब, इस नए दिन की शाम के लिए सृष्टिकर्ता की क्या योजना थी? कौन से नए जीव जन्तुओं को उसने उत्पन्न, और पैदा करना चाहा? ध्यान से सुनो, यह सृष्टिकर्ता की आवाज़ है....।

"फिर परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलु पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों; और वैसा ही हो गया। सो परमेश्वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वनपशुओं को, और जाति जाति के घरेलु पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को भी बनायाः और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:24-25)। इन में कौन कौन से जीवित प्राणी शामिल हैं? पवित्र शास्त्र कहता हैः पालतु जानवर, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के जाति जाति के जंगली पशु। कहने का तात्पर्य है कि, उस दिन वहाँ पृथ्वी के सब प्रकार के जीवित प्राणी ही नहीं थे, परन्तु उन सभों को प्रजाति के अनुसार वर्गीकृत किया गया था, और, उसी प्रकार, "परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।"

पिछले पाँच दिनों के दौरान, उसी लय में होकर, छ्ठे दिन सृष्टिकर्ता ने अपने इच्छित प्राणियों के जन्म का आदेश दिया, और हर एक अपनी अपनी प्रजाति के अनुसार पृथ्वी पर प्रकट हुआ। जब सृष्टिकर्ता ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, उसके कोई भी वचन व्यर्थ में नहीं बोले गए, और इस प्रकार, छ्ठे दिन, हर प्राणी, जिसको उसने बनाने की इच्छा की थी, समय पर प्रकट हो गए। जैसे ही सृष्टिकर्ता ने कहा "पृथ्वी से एक एक जाति के प्राणी, उत्पन्न हों," पृथ्वी तुरन्त जीवन से भर गई, और पृथ्वी के ऊपर अचानक ही हर प्रकार के प्राणियों की श्वास प्रकट हुई....। हरे भरे घास के जंगली मैदानों में, हृष्ट पुष्ट गाएँ, अपनी पूछों को इधर उधर हिलाते हुए, एक के बाद एक प्रगट होने लगीं, मिमियाती हुई भेड़ें झुण्डों में इकट्ठे होने लगीं, और हिनहिनाते हुए घोड़े सरपट दौड़ने लगे....। एक पल में ही, शांत घास के मैदानों की विशालता में जीवन अंगड़ाई लेने लगा....। पशुओं के इन विभिन्न झुण्डों का प्रकटीकरण निश्चल घास के मैदान का एक सुन्दर दृश्य था, और अपने साथ असीमित जीवन शक्ति लेकर आया था....। वे घास के मैदानों के साथी, और घास के मैदानों के स्वामी होंगे, और प्रत्येक एक दूसरे पर निर्भर होगा; वे भी इन घास के मैदानों के संरक्षक और रखवाले होंगे, जो उनका स्थायी निवास होगा, जो उन्हें उनकी सारी ज़रूरतों को प्रदान करेगा, और उनके अस्तित्व के लिए अनंत पोषण का स्रोत होगा।

उसी दिन जब ये विभिन्न मवेशी सृष्टिकर्ता के वचनों द्वारा अस्तित्व में आए थे, ढेर सारे कीड़े मकौड़े भी एक के बाद एक प्रगट हुए। भले ही वे सभी जीवधारियों में सबसे छोटे थे, परन्तु उनकी जीवन शक्ति अभी भी सृष्टिकर्ता की अद्भुत सृष्टि थी, और वे बहुत देरी से नहीं आए थे.....। कुछ ने अपने पंखों को फड़फड़ाया, जबकि कुछ अन्य धीर धीरे रेंगने लगे; कुछ उछलने और कूदने लगे, और कुछ अन्य लड़खड़ाने लगे, कुछ आगे बढ़कर खोल में घुस गए, जबकि अन्य जल्दी से पीछे लौट गए; कुछ दूसरी ओर चले गए, कुछ अन्य ऊँची और नीची छलांग लगाने लगे....। वे सभी अपने लिए घर ढूँढ़ने के प्रयास में व्यस्त हो गएः कुछ ने घास में घुसकर अपना रास्ता बनाया, कुछ ने भूमि खोदकर छेद बनाना शुरू कर दिया, कुछ उड़कर पेड़ों पर चढ़ गए, और जंगल में छिप गए.....। यद्यपि वे आकार में छोटे थे, परन्तु वे खाली पेट की तकलीफ को सहना नहीं चाहते थे, और अपने घरों को बनाने के बाद, वे अपना पोषण करने के लिए भोजन की तलाश में चल पड़े। कुछ घास के कोमल तिनकों को खाने के लिए उस पर चढ़ गए, कुछ ने धूल से अपना मुँह भर लिया और अपना पेट भरा, और स्वाद और आनंद के साथ खाने लगे (उनके लिए, धूल भी एक स्वादिष्ट भोजन था); कुछ जंगल में छिप गए, परन्तु आराम करने के लिए नहीं रूके, क्योंकि चमकीले गहरे हरे पत्तों के भीतर के रस ने रसीला भोजन प्रदान किया....। सन्तुष्ट होने के बाद भी कीड़े मकौड़ों ने अपनी गतिविधियों को समाप्त नहीं किया, भले ही वे आकार में छोटे थे, फिर भी वे भरपूर ऊर्जा और असीमित उत्साह से भरे हुए थे, और उसी प्रकार सभी जीवधारी भी, वे सबसे अधिक सक्रिय, और सबसे अधिक परिश्रमी थे। वे कभी आलसी न हुए, और न कभी आराम से पड़े रहे। एक बार संतृप्त होने के बाद, उन्होंने फिर से अपने भविष्य के लिए परिश्रम करना प्रारम्भ कर दिया, अपने आने वाले कल के लिए अपने आपको व्यस्त रखा, और जीवित बने रहने के लिए तेज़ी से आगे बढ़ते गए....। उन्होंने मधुरता से विभिन्न प्रकार की धुनों और सुरों को गुनगुनाकर अपने आपको आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया। उन्होंने घास, वृक्षों, और ज़मीन के हर इन्च में आनंद का समावेश किया, और हर दिन और हर वर्ष को अद्वितीय बना दिया....। अपनी भाषा और अपने तरीकों से, उन्होंने भूमि के सभी प्राणियों तक जानकारी पहुँचायी। और अपने स्वयं के विशेष जीवन पथक्रम का उपयोग करते हुए, उन्होंने सब वस्तुओं को जिनके ऊपर उन्होंने निशान छोड़े थे चिन्हित किया....। उनका मिट्टी, घास, और जंगलों के साथ घनिष्ठ संबंध था, और वे मिट्टी, घास, और वनों में शक्ति और जीवन चेतना लेकर आए, और सभी प्राणियों को सृष्टिकर्ता का प्रोत्साहन और अभिनंदन पहुँचाया....।

सृष्टिकर्ता की निगाहें सब वस्तुओं पर पड़ीं जिन्हें उसने बनाया था, और इस पल उसकी निगाहें जंगलों और पर्वतों पर आकर ठहर गईं, और उसका मस्तिष्क मोड़ ले रहा था। जैसे ही उसके वचन घने जंगलों, और पहाड़ों के ऊपर बोले गए, इस प्रकार के पशु प्रगट हुए जो पहले कभी नहीं आए थेः वे "जंगली जानवर" थे जो परमेश्वर के वचन के द्वारा बोले गए थे। लम्बे समय से प्रतीक्षारत, उन्होंने अपने अनोखे चेहरे के साथ अपने अपने सिरों को हिलाया और हर एक ने अपनी अपनी पूंछ को लहराया। कुछ के पास रोंएदार लबादे थे, कुछ हथियारों से लैस थे, कुछ के खुले हुए ज़हरीले दाँत थे, कुछ के पास घातक मुस्कान थी, कुछ लम्बी गर्दन वाले थे, कुछ के पास छोटी पूँछ थी, कुछ के पास ख़तरनाक आँखें थीं, कुछ डर के साथ देखते थे, कुछ घास खाने के लिए झुके हुए थे, कुछ के पूरे मुँह में ख़ून लगा हुआ था, कुछ दो पाँव से उछलते थे, कुछ चार खुरों से धीरे धीरे चलते थे, कुछ पेड़ों के ऊपर से दूर तक देखते थे, कुछ जंगलों में इन्तज़ार में लेटे हुए थे, कुछ आराम करने के लिए गुफाओं की खोज में थे, कुछ मैदानों में दौड़ते और उछलते थे, कुछ शिकार के लिए जंगलों में गश्त लगा रहे थे.....; कुछ गरज रहे थे, कुछ हुँकार भर रहे थे, कुछ भौंक रहे थे, कुछ रो रहे थे.....; कुछ ऊँचे सुर , कुछ नीची सुर वाले, कुछ खुले गले वाले, कुछ साफ साफ और मधुरस्वर वाले थे....; कुछ भयानक थे, कुछ सुन्दर थे, कुछ बड़े अजीब से थे, और कुछ प्यारे-से थे, कुछ डरावने थे, कुछ बहुत ही आकर्षक थे....। एक के बाद एक वे आने लगे। देखिए कि वे गर्व से कितने फूले हुए थे, उन्मुक्त-जीव थे, एक दूसरे से बिलकुल उदासीन थे, एक दूसरे को एक झलक देखने की भी परवाह नहीं करते थे....। प्रत्येक उस विशेष जीवन को जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था, और अपनी बर्बरता, और क्रूरता को धारण किए हुए, जंगलों और पहाड़ियों के ऊपर प्रगट हो गए। सबसे घृणित, पूरी तरह ढीठ - किसने उन्हें पहाड़ियों और जंगलों का सच्चा स्वामी बना दिया था? उस घड़ी से जब से सृष्टिकर्ता ने उनके आविर्भाव को स्वीकृति दी थी, उन्होंने जंगलों पर "दावा किया," और पहाड़ों पर भी "दावा किया," क्योंकि सृष्टिकर्ता ने पहले से ही उनकी सीमाओं को ठहरा दिया था और उनके अस्तित्व के पैमाने को निश्चित कर दिया था। केवल वे ही जंगलों और पहाड़ों के सच्चे स्वामी थे, इसलिए वे इतने प्रचण्ड और ढीठ थे। उन्हें पूरी तरह "जंगली जानवर" इसी लिए कहा जाता था क्योंकि, सभी प्राणियों में, वे ही थे जो इतने जंगली, क्रूर, और वश में न आने योग्य थे। उन्हें पालतू नहीं बनाया जा सकता था, इस प्रकार उनका पालन पोषण नहीं किया जा सकता था और वे मानवजाति के साथ एकता से नहीं रह सकते थे या मानवजाति के बदले परिश्रम नहीं कर सकते थे। यह इसलिए था क्योंकि उनका पालन पोषण नहीं किया जा सकता था, वे मानवजाति के लिए काम नहीं कर सकते थे, और यह कि उन्हें मानवजाति से दूर रहकर जीवन बिताना था, और मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे, और यह इसलिए था क्योंकि वे मानवजाति से दूरी पर जीवन बिताते थे। और मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे, वे उन ज़िम्मेदारियों को निभा सकते थे जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दी गई थी: अर्थात् पर्वतों और जंगलों की सुरक्षा करना। उनके जंगलीपन ने पर्वतों की सुरक्षा की और जंगलों की हिफाज़त की, और उनके अस्तित्व और बढो‌तरी के लिए सबसे बेहतरीन सुरक्षा और आश्वासन था। उसी समय, उनकी बर्बरता ने सब वस्तुओं के मध्य सन्तुलन को कायम और सुनिश्चित किया। उनका आगमन पर्वतों और जंगलों के लिए सहयोग और टिके रहने के लिए सहारा लेकर आया; उनके आगमन ने शांत तथा रिक्त पर्वतों और जंगलों में शक्ति और जीवन चेतना का संचार किया। उसके बाद से, पर्वत और जंगल उनके स्थायी निवास बन गए, और वे अपने घरों से कभी वंचित नहीं रहेंगे, क्योंकि पर्वत और पहाड़ उनके लिए प्रगट हुए और अस्तित्व में आए थे, और जंगली जानवर अपने कर्तव्य को पूरा करेंगे, और उनकी हिफाज़त करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। इस प्रकार, जंगली जानवर भी सृष्टिकर्ता के प्रोत्साहन के द्वारा दृढ़ता से रहना चाहते थे ताकि अपने सीमा क्षेत्र को थामे रह सकें, और सब वस्तुओं के सन्तुलन को कायम रखने के लिए अपने जंगली स्वभाव का निरन्तर उपयोग कर सकें जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा स्थापित किया गया था, और सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ को प्रकट कर सकें!

सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन, सभी चीज़ें पूर्ण हैं

परमेश्वर के द्वारा सब वस्तुओं की सृष्टि की गई, जिन में वे शामिल हैं जो चल फिर सकते थे और वे जो चल फिर नहीं सकते थे, जैसे पक्षी और मछलियाँ, जैसे वृक्ष और फूल, और जिसमें पशुओं का झुण्ड, कीड़े मकौड़े, और छठवें दिन बनाए गए जंगली जानवर भी शामिल थ—वे सभी परमेश्वर के साथ अच्छे से थे, और, इसके अतिरिक्त, परमेश्वर की निगाहों में ये वस्तुएँ उसकी योजना के अनुरूप थे, और पूर्णता के शिखर को प्राप्त कर चुके थे, और एक ऐसे स्तर तक पहुँच गए थे जिस तक पहुँचाने की परमेश्वर ने अभिलाषा की थी। कदम दर कदम, सृष्टिकर्ता ने उन कार्यों को किया जो वह अपनी योजना के अनुसार करने का इरादा रखता था। एक के बाद दूसरा, जो कुछ उसने बनाने का इरादा किया था प्रगट होते गए, और प्रत्येक का प्रकटीकरण सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रतिबिम्ब था, और उसके अधिकार के विचारों का ठोस रूप था, और विचारों के इन ठोस रूपों के कारण, सभी जीवधारी सृष्टिकर्ता के अनुग्रह, और सृष्टिकर्ता के प्रयोजन के लिए धन्यवादित होने के सिवाए कुछ नहीं कर सकते थे। जैसे ही परमेश्वर के चमत्कारी कार्यों ने अपने आपको प्रगट किया, यह संसार अंश अंश कर के परमेश्वर के द्वारा सृजी गई सब वस्तुओं से फैल गया, और यह बर्बादी और अँधकार से स्वच्छता और जगमगाहट में बदल गया, घातक निश्चलता से जीवन्त और असीमित जीवन चेतना में बदल गया। सृष्टि की सब वस्तुओं के मध्य, बड़े से लेकर छोटे तक, और छोटे से लेकर सूक्ष्म तक, ऐसा कोई भी नहीं था जो सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ के द्वारा सृजा नहीं गया था, और हर एक जीवधारी के अस्तित्व की एक अद्वितीय और अंतर्निहित आवश्यकता और मूल्य था। उनके आकार और ढांचे के अन्तर के बावजूद भी, उन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा बनाया जाना था ताकि सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन अस्तित्व में बने रहें। कई बार लोग एक ऐसे कीड़े को देखेंगे जो बहुत घृणित है और कहेंगे, "वह कीड़ा बहुत भद्दा है, ऐसा हो ही नहीं सकता कि ऐसे घृणित चीज़ को परमेश्वर के द्वारा बनाया जा सकता था" - ऐसा हो ही नहीं सकता कि परमेश्वर किसी घृणित चीज़ को बनाए। कितना मूर्खतापूर्ण नज़रिया है! इसके बजाय उन्हें यह कहना चाहिए, "भले ही यह कीड़ा इतना भद्दा है, उसे परमेश्वर के द्वारा बनाया गया था, और इस प्रकार उसके पास उसका अपना अनोखा उद्देश्य होगा।" परमेश्वर के विचारों में, विभिन्न जीवित प्राणी जिन्हें उसने बनाया था, वह उन्हें हर प्रकार का और हर तरह का रूप, और हर प्रकार की कार्य प्रणालियाँ और उपयोगिताएँ देना चाहता था, और इस प्रकार परमेश्वर के द्वारा बनाए गए वस्तुओं में से कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे उस साँचे से अलग किया गया था। उनकी बाहरी संरचना से लेकर भीतरी संरचना तक, उनके जीने की आदतों से लेकर उनके निवास तक जिन में वे रहते थे - हर एक चीज़ अलग थी। गायों के पास गायों का रूप था, गधों के पास गधों का रूप था, हिरनों के पास हिरनों का रूप था, हाथियों के पास हाथियों का रूप था। क्या तुम कह सकते हो कि कौन सबसे अच्छा दिखता था, और कौन सबसे भद्दा दिखता था? क्या तुम कह सकते हो कि कौन सबसे अधिक उपयोगी था, और किसकी उपस्थिति की आवश्यकता सबसे कम थी? कुछ लोगों को हाथियों का रूप अच्छा लगता है, परन्तु कोई भी खेती के लिए हाथियों का इस्तेमाल नहीं करता है; कुछ लोग शेरों और बाघों के रूप को पसंद करते हैं, क्योंकि उनका रूप सब वस्तुओं में सबसे अधिक प्रभावकारी है, परन्तु क्या तुम उन्हें पालतु जानवर की तरह रख सकते हो? संक्षेप में, जब सब वस्तुओं की बात आती है, तो मनुष्य सृष्टिकर्ता के अधिकार के अनुसार अन्तर कर सकता है, दूसरे शब्दों में, सब वस्तुओं के सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किए गए क्रम के अनुसार अन्तर कर सकता है; यह सबसे सही मनोवृत्ति है। सृष्टिकर्ता के मूल अभिप्रायों को खोजने और उसके प्रति आज्ञाकारी होने की एकमात्र मनोवृति ही सृष्टिकर्ता के अधिकार की सच्ची स्वीकार्यता और निश्चितता है। यह परमेश्वर के साथ अच्छा है, तो मनुष्य के पास दोष ढूँढ़ने का कौन सा कारण है?

अतः, सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के लिए सुर में सुर मिलाकर गाती हो, और उसके नए दिन के कार्य के लिए एक बेहतरीन भूमिका का काम करती हैं, और इस समय सृष्टिकर्ता भी अपने कार्य के प्रबन्ध में एक नया पृष्ठ खोलेगा! बसंत ऋतु के अँकुरों, ग्रीष्म ऋतु की परिपक्वता, शरद ऋतु की कटनी, और शीत ऋतु के भण्डारण की व्यवस्था के अनुसार जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किया गया था, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता की प्रबंधकीय योजना के साथ प्रतिध्वनित होंगे, और वे अपने स्वयं के नए दिन, नई शुरूआत, और नए जीवन पथक्रम का स्वागत करेंगे, और वे सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन हर दिन का अभिनन्दन करने के लिए कभी न खत्म होनेवाले अनुक्रम के अनुसार जल्द ही पुनः उत्पन्न करेंगे।…

कोई भी सृजा और अनसृजा प्राणी सृष्टिकर्ता की पहचान को बदल नहीं सकता है

जब से उसने सब वस्तुओं की सृष्टि की शुरूआत की, परमेश्वर की सामर्थ प्रगट होने, और प्रकाशित होने लगी थी, क्योंकि सब वस्तुओं को बनाने के लिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल किया था। इसके बावजूद कि उसने किस रीति से उनको सृजा था, इसके बावजूद कि उसने उन्हें क्यों सृजा था, परमेश्वर के वचनों के कारण हीसभी चीज़ें अस्तित्व में आईं थीं और स्थिर बनी रहीं, और यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। इस संसार में मानवजाति के प्रगट होने के समय से पहले, सृष्टिकर्ता ने मानवजाति के लिए सब वस्तुओं को बनाने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ का इस्तेमाल किया, और मानवजाति के लिए उपयुक्त जीवन्त वातावरण तैयार करने के लिए अपनी अद्वितीय पद्धतियों का उपयोग किया था। जो कुछ भी उसने किया वह मानवजाति की तैयारी के लिए था, जो जल्द ही श्वास प्राप्त करनेवाले थे। दूसरे शब्दों में, मानवजाति की सृष्टि से पहले, सभी जीवधारियों में परमेश्वर का अधिकार प्रकट हुआ जो मानवजाति से अलग था, ऐसी वस्तुओं में जो स्वर्ग, ज्योतियों, समुद्रों, और भूमि के समान ही महान थे, और छोटे से छोटे पशुओं और पक्षियों में, साथ ही हर प्रकार के कीड़े मकौड़ों और सूक्ष्म जीवों में, जिन में विभिन्न प्रकार के जीवाणु भी शामिल थे जो नंगी आँखों से देखे नहीं जा सकते थे। प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों के द्वारा जीवन दिया गया था, हर एक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण उगने लगे थे, और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन जीवन बिताने लगे। यद्यपि उन्होंने सृष्टिकर्ता की श्वास को प्राप्त नहीं किया था, फिर भी वे उस जीवन व चेतना कोदर्शाने लगे थे जो सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें अलग अलग रूपों और आकारों के द्वारा दिया गया था; भले ही उन्हें बोलने की काबिलियत नहीं दी गई थी जैसा सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यों को दी गयी थी, फिर भी उन में से प्रत्येक ने अपने जीवन की अभिव्यक्ति का एक अन्दाज़ प्राप्त किया जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था, और वो मनुष्यों की भाषा से अलग था। सृष्टिकर्ता के अधिकार ने न केवल दृष्टिगोचर भौतिक पदार्थों को जीवन की चेतना दी, जिससे वे कभी भी विलुप्त न हों, बल्कि इसके अतिरिक्त, पुनः उत्पन्न करने और बहुगुणित होने के लिए हर जीवित प्राणियों को अंतःज्ञान दिया, ताकि वे कभी भी विलुप्त न हों, और इसलिए वे पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहने के सिद्धांतों को आगे बढ़ाते जाएँगे जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था। जिस रीति से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है वह अतिसूक्ष्म और अतिविशाल दृष्टिकोण से कड़ाई से चिपके नहीं रहता, और किसी आकार से सीमित नहीं होता है; वह विश्व के संचालन को अधिकार में रखने के योग्य है, और सभी चीज़ों के जीवन और मृत्यु के ऊपर प्रभुता रखता है, और इसके अतिरिक्त सब वस्तुओं को भली भाँति सँभाल सकता है जिस से परमेश्वर की सेवा कर सकें; वह पर्वतों, नदियों, और झीलों के सब कार्यों का प्रबन्ध कर सकता है, और उनके साथ सब वस्तुओं पर शासन कर सकता है, और इससे बढ़कर क्या, वह सब वस्तुओं के लिए जो आवश्यक है उसे प्रदान कर सकता है। यह मानवजाति के अलावा सब वस्तुओं के मध्य सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का प्रकटीकरण है। ऐसा प्रकटीकरण मात्र एक जीवनकाल के लिए नहीं है, और यह कभी नहीं रूकेगा, न थमेगा, और किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा बदला या तहस नहस नहीं किया जा सकता है, और न ही उस में किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा जोड़ा या घटाया जा सकता है - क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान को बदल नहीं सकता है, और इसलिए सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी सृजे गए प्राणी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है, और किसी भी न सृजे गए प्राणी के द्वारा उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के सन्देशवाहकों और स्वर्गदूतों को देखिए। उनके पास परमेश्वर की सामर्थ नहीं है, और सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है, और उनके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ क्यों नहीं है उसका कारण है क्योंकि उन्होंने सृष्टिकर्ता की हस्ती को धारण नहीं किया है। न सृजे गए प्राणी, जैसे परमेश्वर के सन्देशवाहक और स्वर्गदूत, हालांकि वे परमेश्वर की तरफ से कुछ कर सकते हैं, परन्तु वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। यद्यपि वे परमेश्वर की कुछ सामर्थ को धारण किए हुए हैं जिन्हें मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, सब वस्तुओं को बनाने, सब वस्तुओं को आज्ञा देने, और सब वस्तुओं के ऊपर सर्वोच्चता रखने के लिए उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है। और इस प्रकार परमेश्वर की अद्वितीयता को किसी न सृजे गए प्राणी द्वारा बदला नहीं जा सकता है, और उसी प्रकार किसी न सृजे गए प्राणी के द्वारा परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ को बदला नहीं जा सकता है। क्या तुमने बाईबिल में परमेश्वर के किसी सन्देशवाहक के बारे में पढ़ा है जिस ने सभी चीज़ों की सृष्टि की? और परमेश्वर ने सभी चीज़ों के सृजन के लिए किसी संदेशवाहक या स्वर्गदूत को क्यों नहीं भेजा? क्योंकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था, और इस प्रकार उनके पास परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल करने की योग्यता भी नहीं थी। सभी जीवधारियों के समान, वे सभी सृष्टिकर्ता की प्रभुता के अधीन हैं, और सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं, और इस प्रकार, इसी रीति से, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर भी है, और उनका शासक भी। उन में से हर एक के बीच में—भले ही वे उच्च श्रेणी के हों या निम्न, बड़ी सामर्थ की हों या छोटी—ऐसा कोई भी नहीं है जो परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर हो सके, और इस प्रकार उनके बीच में, ऐसा कोई भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान को बदल सके। उनको कभी भी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा, और वे कभी भी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये न बदलनेवाली सच्चाईयाँ और वास्तविकताएँ हैं!

उपरोक्त सभा के विचार विमर्श के जरिए, क्या हम दृढ़तापूर्वक निम्नलिखित बातों को कह सकते हैं: केवल सब वस्तुओं के सृष्टिकर्ता और शासक, वह जिसके पास अद्वितीय अधिकार और अद्वितीय सामर्थ है, क्या उसे स्वयं अद्वितीय परमेश्वर कहा जा सकता है? इस समय, शायद तुम लोग महसूस करोगे कि ऐसा प्रश्न बहुत ही गंभीर है। तुम सब, कुछ पल के लिए, उसे समझने में असमर्थ हो, और उसके भीतर के सार-तत्व का एहसास नहीं कर सकते हो, और इस प्रकार इस पल तुम लोग एहसास करते हो कि उसका उत्तर देना कठिन है। ऐसी स्थिति में, मैं अपनी सभा के विचार विमर्श को जारी रखूँगा। आगे, मैं तुम लोगों को मंजूरी दूँगा कि तुम सब सिर्फ परमेश्वर के द्वारा धारण किए गए सामर्थ और अधिकार के कई पहलुओं के वास्तविक कार्यों को देखो, और इस प्रकार मैं तुम लोगों को स्वीकृति दूँगा कि तुम सब सचमुच में समझो, प्रशंसा करो और परमेश्वर की अद्वितीयता, और परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार के अर्थ को जानो।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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