सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी
वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

श्रेणियाँ

Recital-the-word-appears-in-the-flesh-1
अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के इस अंश के इस अन्तिम वाक्य पर एक नज़र डालें: "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।" क्या इस वाक्य का एक व्यावहारिक पहलू है? क्या तुम लोग इसके व्यावहारिक पहलू को देख सकते हो? हर एक बात जो परमेश्वर कहता है उसके हृदय से आती है, तो उसने ऐसा क्यों कहा? तुम लोग इसे कैसे समझते हो? तुम लोग शायद इस वाक्य का अर्थ अब समझते हो, परन्तु उस समय बहुत से लोग नही समझते थे क्योंकि मनुष्यजाति बस उसी समय व्यवस्था के युग से बाहर निकली थी। उनके लिए, सब्त से बाहर निकलना एक कठिन बात थी, और सच्चे सब्त को समझने का तो जिक्र भी नहीं कर सकते थे।

यह वाक्य "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" लोगों को बताता है कि परमेश्वर का सब कुछ आध्यात्मिक है, और यद्यपि परमेश्वर तुम्हारी सारी भौतिक जरूरतों को पूरा कर सकता है, और जब एक बार तुम्हारी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी कर दी जाती हैं, तो क्या इन चीज़ों की सन्तुष्टि तुम्हें सत्य की खोज के बदले हो सकती हैं? यह बिल्कुल भी संभव नहीं है! परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है जिसके बारे में हमने सभाओं में विचार विमर्श किया है दोनों सत्य हैं। इसे भारी कीमत के भौतिक पदार्थों के द्वारा तौला नहीं जा सकता है और ना ही उसके मूल्य को पैसे में गिना जा सकता है, क्योंकि वह एक भौतिक पदार्थ नहीं है, और यह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की आवश्यकताओं को प्रदान करता है। प्रत्येक मनुष्य के लिए, इन अस्पृश्य सच्चाईयों का मूल्य किसी भी भौतिक चीज़ से जिन्हें तुम अच्छा, और सही समझते हो बढ़कर होना चाहिए, सही है न? यह कथन ऐसा है जिस पर तुम लोगों को लम्बे समय तक बने रहने की आवश्यकता है। जो कुछ मैंने कहा था उसका मुख्य बिन्दु यह है कि परमेश्वर का स्वरूप और उसका सब कुछ हर एक व्यक्ति के लिए अति महत्वपूर्ण चीज़ें हैं और इन्हें किसी भौतिक पदार्थ के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। मैं तुम्हें एक उदाहरण दूँगाः जब तुम्हें भूख लगती है, तो तुम्हें भोजन की आवश्यकता होती है। यह भोजन तुम्हारे लिए अच्छा हो सकता है या इसमें तुम्हारे लिए अभाव हो सकता है, किन्तु जब तक यह तुम्हें तृप्त करता है, भूखे होने का वह अप्रिय एहसास वहां नहीं होगा—वह चला जाएगा। तुम वहां आराम से बैठ सकते हो, और तुम्हारा शरीर आराम से रहेगा। लोगों की भूख का भोजन से समाधान किया जा सकता है, किन्तु जब तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और तुम्हें यह एहसास होता है कि तुम्हारे पास उसकी कोई समझ नहीं है, तो तुम अपने हृदय के खालीपन का समाधान कैसे करोगे। क्या इसका समाधान भोजन से किया जा सकता है? या जब तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो और उसकी इच्छा को नहीं समझते हो, तो तुम अपने हृदय की उस भूख को मिटाने के लिए किस चीज़ का प्रयोग कर सकते हो? परमेश्वर के द्वारा उद्धार के तुम्हारे अनुभव की प्रक्रिया में, जब तुम अपने स्वभाव में एक परिवर्तन का अनुसरण कर रहे हो, यदि तुम उसकी इच्छा को नहीं समझोगे या यह नहीं जानोगे कि सच्चाई क्या है, और यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझोगे, तो क्या तुम अति व्याकुलता का एहसास नहीं करोगे? क्या तुम अपने हृदय में एक बड़ी भूख और प्यास का एहसास नहीं करते हो? क्या इन एहसासों ने तुम्हें तुम्हारे हृदय में शांति का एहसास करने से रोक नहीं दिया है? तो तुम अपने हृदय की भूख के लिए क्या कर सकते हो—क्या इसका समाधान करने के लिए कोई तरीका है। कुछ लोग खरीद फरोख्त के लिए बाज़ार जाते हैं, कुछ लोग भरोसा करने के लिए मित्रों को ढूँढ़ लेते हैं, कुछ लोग जी भरकर सोते हैं, कुछ अन्य लोग और ज़्यादा परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, या अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए कठिन मेहनत और अधिक कोशिश करते हैं। क्या ये चीज़ें तुम्हारी वास्तविक कठिनाईयों को सुलझा सकती हैं? तुम लोगों में से हर कोई इस प्रकार की रीतियों को पूर्णत: समझ ले। जब तुम निर्बलता का एहसास करते हो, जब तुम परमेश्वर से ज्योति पाने के लिए एक दृढ़ इच्छा का एहसास करते हो ताकि वह तुम्हें उसकी सच्चाई और उसकी इच्छा की वास्तविकता को जानने की अनुमति दे सके, तो तुम्हें सबसे ज़्यादा किस की आवश्यकता होगी। जो तुम्हें जरूरत है वह एक भरपेट आहार नहीं है, और वह कुछ भले वचन नहीं हैं। उससे बढ़कर, यह कुछ पल का आराम और देह की सन्तुष्टि नहीं है—जो तुम्हें आवश्यक है वह यह है कि परमेश्वर तुम्हें सीधे और साफ-साफ बताए कि तुम्हें क्या करना चाहिए और कैसे करना करना चाहिए, और तुम्हें साफ साफ बताए कि सत्य क्या है। तुम्हारे द्वारा इसे समझने के बाद, भले ही यह थोड़ा सा ही क्यों ना हो, क्या तुम एक अच्छा भोजन करने की तुलना में अपने हृदय में अधिक सन्तुष्टि का एहसास नहीं करते हो? जब तुम्हारा हृदय सन्तुष्ट हो जाता है, तो क्या तुम्हारा हृदय, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व सच्ची शांति को प्राप्त नहीं करता है। इस उपमा और विश्लेषण के द्वारा, क्या तुम लोगों को अब समझ में आया कि मैं तुम लोगों के साथ यह वाक्य क्यों साझा करना चाहता था कि, "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है?" इसका अर्थ वह है जो परमेश्वर से आता है, जो उसका स्वरूप है, और उसका सब कुछ किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर है, जिसमें वह चीज़ या वह व्यक्ति भी शामिल है जिस पर तुमने किसी समय विश्वास किया था और जिसे तुमने सब से बढ़कर सहेज कर रखा था। ऐसा कहना चाहिए, यदि एक मनुष्य के पास परमेश्वर के मुँह के वचन नहीं होते हैं या वे उसकी इच्छा को नहीं समझते हैं, तो वे शांति हासिल नहीं कर सकते हैं। अपने भविष्य के अनुभवों में, तुम लोग समझोगे कि मैं क्यों चाहता था कि आज तुम लोग इस अंश को देखो—यह बहुत महत्वपूर्ण है। सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह सत्य और जीवन है। मानव जाति के लिए सत्य एक ऐसी चीज़ है जिसकी कमी उन के जीवन में नहीं हो सकती है, जिसके बिना वे कभी कुछ नहीं कर सकते हैं; तुम यह भी कह सकते हो कि यह सब से बड़ी चीज़ है। यद्यपि तुम उसे नहीं देख सकते हो या उसे नहीं छू सकते हो, फिर भी तुम्हारे लिए उसके महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती है; यह ही वह एकमात्र चीज़ है जो तुम्हारे हृदय में शांति ला सकती है।

क्या सत्य के प्रति तुम लोगों की समझ स्वयं की अवस्थाओं से जुड़ जाती है? वास्तविक जीवन में, तुम्हें पहले यह सोचना है कि कौन सी सच्चाईयाँ लोगों, चीज़ों, और पदार्थों से सम्बन्ध रखती हैं जिनका तुमने सामना किया है; इन्हीं सच्चाईयों के मध्य तुम परमेश्वर की इच्छा को ढूँढ़ सकते हो और जिसका तुमने सामना किया है उसे उसकी इच्छा से जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते हो कि सच्चाई का कौन सा पहलू उन चीज़ों से सम्बन्ध रखता है जिनका तुमने सामना किया है परन्तु तुम सीधे जाकर परमेश्वर की इच्छा को खोजते हैं, तो ऐसी पहुँच बिल्कुल अँधकारमय है और परिणामों को प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा को जानना चाहते हो, तो पहले तुम्हें देखने की जरूरत है कि किस प्रकार की चीज़ें तुम्हारे ऊपर आयी हैं, वे सत्य के किस पहलू से सम्बन्ध रखती हैं, और परमेश्वर के वचनों में सत्य को देखना है जो उससे सम्बन्ध रखता है जिस का तुमने अनुभव किया है। तब तुम उस सच्चाई में अभ्यास के उस मार्ग को खोजो जो तुम्हारे लिए सही है; इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना तकनीकी रूप से एक सिद्धांत को लागू करना या एक सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य अनिच्छुक औपचारिक शब्दावली से सम्बन्धित नहीं है, ना ही वह व्यवस्था है। यह मरा हुआ नहीं है—यह जीवन है, यह एक जीवित चीज़ है, और यह एक नियम है जिसका अनुसरण एक जीवधारी को अवश्य करना चाहिए और यह एक नियम है जिसे एक मनुष्य के जीवन में अवश्य होना चाहिए। यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें अपने अनुभव से और अधिक समझना होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम अपने अनुभव के किस पड़ाव पर आ चुके हो, तुम परमेश्वर के वचनों और सच्चाई से अलग नहीं हो सकते हो, और तुम जो कुछ परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और तुम जो परमेश्वर का स्वरूप है उसके बारे में समझते हो वे सब परमेश्वर के वचनों में प्रकट है; और वे सत्य से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है ये सभी अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उस का एक प्रमाणिक प्रकटीकरण है। यह जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे ठोस करता है और खुलकर उनके बारे में बताता है; यह सीधे सीधे तुम्हें बताता है कि परमेश्वर को क्या पसंद है, और क्या पसंद नहीं है, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देना चाहता है, वह किस प्रकार के लोगों से घृणा करता है और वह किस प्रकार के लोगों से प्रसन्न होता है। उन सच्चाईयों के पीछे जो परमेश्वर प्रकट करता है लोग उसके आनन्द, क्रोध, दुःख, और प्रसन्नता, साथ ही साथ उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकाशन है। जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे जानने, और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अलावा, जो बात सब से ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि एक व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने तुम्हें वास्तविक जीवन से अलग कर दे, तो वे उसे हासिल नहीं कर पाएँगे। भले ही कुछ लोग हों जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर लें, फिर भी यह सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहता है, और वास्तव में परमेश्वर जैसा है यह उसके समान नहीं है।

हम जिसके बारे में बातचीत कर रहे हैं वे सब बाइबल में दर्ज कहानियों के दायरे में हैं। इन कहानियों के द्वारा, और इन चीज़ों के विश्लेशण के द्वारा जो घटित हुए थे, लोग उसके स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है और जो कुछ उसने प्रकट किया है उसे समझ सकते हैं, उन्हें यह अनुमति देते हुए कि और अधिक विस्तार, अधिक गहराई, अधिक व्यापकता, और अधिक पूर्णता से परमेश्वर के हर पहलू को समझें। इस प्रकार, क्या ये कहानियाँ ही परमेश्वर के स्वभाव के हर पहलू को जानने का एकमात्र तरीका है? नहीं, यह एकमात्र तरीका नहीं है! क्योंकि जो परमेश्वर कहता है और वह कार्य जो वह राज्य के युग में करता है उस से परमेश्वर के स्वभाव को जानने, और उसे पूर्णत: जानने में लोगों की और अधिक सहायता हो सकती है। फिर भी, मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर के स्वभाव को जानना और जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे कुछ उदाहरणों और बाइबल में दर्ज कहानियों के द्वारा जिन से लोग परिचित हैं समझना थोड़ा आसान है। यदि मैं न्याय और ताड़ना और उन सच्चाईयों के वचनों को लेता हूँ जिन्हें आज परमेश्वर ने प्रकट किया है ताकि तुम उसे वचन के अनुसार जान सको, तो तुम महसूस करोगे कि यह बहुत मन्द और बहुत थका देने वाला है, और कुछ लोग यह भी महसूस करेंगे कि परमेश्वर के वचन अनिच्छुक औपचारिक शब्दावली के समान दिखाई देते हैं। परन्तु यदि हम बाइबल की इन कहानियों को उदाहरणों के रूप में लेते हैं ताकि परमेश्वर के स्वभाव को जानने में लोगों को मदद मिल सके, तो वे इसमें बोरियत महसूस नहीं करेंगे। तुम कह सकते हो कि इन उदाहरणों की व्याख्या करते समय, उस समय जो परमेश्वर के दिल में था उसका विवरण—उसकी मनःस्थिति या भावना, या उसके विचार और युक्तियाँ—लोगों को मानवीय भाषा में बताया गया था, और इन सब का उद्देश्य उन्हें प्रशंसा करने की मंजूरी देना, और यह एहसास कराना है कि जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है वह एक नुस्खा नहीं है। यह एक पौराणिक गाथा नहीं है, या ऐसा कुछ नहीं है जिसे लोग देख और छू नहीं सकते हैं। यह कुछ ऐसा है जो सचमुच में अस्तित्व में है जिस का लोग एहसास कर सकते हैं, और उसकी तारीफ कर सकते हैं। यह चरम लक्ष्य है। तुम कह सकते हो कि वे लोग जो इस युग में रह रहे हैं धन्य हैं। वे परमेश्वर के पिछले कार्यों की व्यापक समझ को प्राप्त करने के लिए बाइबल की कहानियों का उपयोग कर सकते हैं; वे उस कार्य के द्वारा जो उसने किया है उसके स्वभाव को देख सकते हैं। और वे इन स्वभावों के द्वारा जिन्हें उसने प्रकट किया है मानव जाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, और अपनी पवित्रता के ठोस प्रकटीकरण और मनुष्यों के लिए उसके लालन पालन को समझ सकते हैं ताकि परमेश्वर के स्वभाव के एक अधिक विस्तृत और गहरे ज्ञान तक पहुँच सकें। मैं विश्वास करता हूँ कि तुम लोग इसे महसूस कर सकते हो!

उस कार्य के क्षेत्र के भीतर जिसे प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में पूर्ण किया था, तुम जो परमेश्वर का स्वरूप है उसका दूसरा पहलू भी देख सकते हो। यह उसके शरीर के द्वारा प्रकट हुआ था, और उसे लोगों के लिए संभव किया गया था ताकि वे देखें और उसकी मानवता में होकर तारीफ करें। मनुष्य के पुत्र में, लोगों ने देखा कि किस प्रकार देहधारी परमेश्वर ने अपनी मानवता में जीवन बिताया था, और उन्होंने परमेश्वर की ईश्वरीयता को देखा जो उसकी देह के द्वारा प्रकट हुआ था। इन दो प्रकार के प्रकटीकरण ने लोगों को अनुमति दी कि वे एक सच्चे परमेश्वर को देख सकें, और उन्हें यह भी अनुमति दी कि वे परमेश्वर के बारे में एक अलग विचार बनाएँ। फिर भी, संसार की सृष्टि और व्यवस्था के युग के अन्त के मध्य के समयकाल में, अर्थात्, अनुग्रह के युग से पहले, लोगों के द्वारा जो कुछ देखा, सुना, और अनुभव किया जाता था वह केवल परमेश्वर का ईश्वरीय पहलू था। यह वह था जो परमेश्वर ने अस्पृश्य आयाम में किया था और कहा था, और वे चीज़ें जिन्हें उसने अपने सच्चे व्यक्तित्व से प्रकट किया था उसे देखा और छुआ नहीं जा सकता है। अक्सर, ये चीज़ें लोगों को यह एहसास कराती थीं कि परमेश्वर कितना महान था, और यह कि वे उसके नज़दीक नहीं जा सकते हैं। वह प्रभाव जो परमेश्वर सामान्यतः लोगों के ऊपर डालता था यह था कि वह ज्योति के समान एकदम से प्रकट होता था फिर ग़ायब हो जाता था, और लोगों ने यहाँ तक महसूस किया कि उसके हर एक विचार और युक्ति इतने रहस्यमयी और इतना मायावी थे कि उन तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं था, और वे उनको समझने एवं उनकी तारीफ करने की कोशिश कदापि नहीं करते थे। लोगों के लिए, परमेश्वर के बारे में सब कुछ बहुत दूर था—इतना दूर कि लोग उसे देख नहीं सकते थे, और उसे छू भी नहीं सकते थे। ऐसा लगता था कि वह ऊपर आकाश में है, और ऐसा प्रतीत होता था कि वह बिल्कुल अस्तित्व में ही नहीं है। इस प्रकार लोगों के लिए, परमेश्वर के दिल और मस्तिष्क या उस की किसी सोच को समझना नामुमकिन था, और यहाँ तक कि अगम्य था। यद्यपि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में कुछ ठोस कार्य किए, और कुछ विशेष शब्द प्रकाशित किए और कुछ विशेष स्वभाव को प्रकट किया ताकि लोग उसकी प्रशंसा करें और उसके बारे में कुछ सच्चे ज्ञान को देखें, जो कि अंत में, जो एक अस्पृश्य क्षेत्र में परमेश्वर का प्रकटीकरण है, जो उससे संबंधित है जो उसका स्वरूप है, और जो लोगों ने समझा, जो उन्होंने उस परमेश्वरीय पहलू को जाना जिसमें वह विषय है जो उसके पास है और जो वह है। परमेश्वर के स्वरूप की इस अभिव्यक्ति[क] से मानव ठोस विचार प्राप्त नहीं कर सका, और परमेश्वर के विषय में उनकी पहली छवि अभी भी इसी दायरे के भीतर अटकी हई थी कि वह "एक आत्मा है जिसके करीब जाना कठिन है, जो ज्योति के समान आता है और फिर चला जाता है।" क्योंकि परमेश्वर ने भौतिक आयाम में लोगों को दिखाई देने के लिए एक विशिष्ट तत्व या एक स्वरूप का प्रयोग नहीं किया था, इसलिए वे अभी भी मानवीय भाषा में उसे परिभाषित नहीं कर सकते थे। लोग अपने हृदय और मस्तिष्क में, परमेश्वर के लिए एक ऊँचा स्तर स्थापित करने के लिए, और उसे स्पृश्य और मानवीय बनाने के लिए हमेशा से अपनी स्वयं की भाषा का प्रयोग करना चाहते थे, जैसे कि वह कितना लम्बा है, वह कितना बड़ा है, वह कैसा दिखाई देता है, वह विशेष रूप से क्या पसंद करता है और उसका विशेष व्यक्तित्व क्या है। वास्तव में, परमेश्वर अपने हृदय में जानता था कि लोग इस तरह से सोचते थे। वह लोगों की आवश्यकताओं के विषय में बिल्कुल स्पष्ट था, और हाँ वह यह भी जानता था कि उसे क्या करना चाहिए, इसलिए उसने अनुग्रह के युग में एक अलग तरीके से अपने कार्य को अन्जाम दिया था। यह तरीका ईश्वरीय और मानवीय दोनों था। समय के अन्तराल में प्रभु यीशु काम कर रहा था, लोग यह देख सकते हैं कि परमेश्वर के पास अनेक मानवीय प्रकटीकरण थे। उदाहरण के लिए, वह नृत्य कर सकता था, वह शादी ब्याह में शामिल हो सकता था, वह लोगों से सहभागिता रख सकता था, उनसे बात कर सकता था, और विभिन्न चीज़ों के विषय में उनसे बात कर सकता था। उसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु ने बहुत सारे कार्यों को भी पूर्ण किया था जो उसकी दिव्यता को दर्शाते थे, और हाँ ये सभी कार्य परमेश्वर के स्वभाव का एक प्रकटीकरण और प्रकाशन थे। इस समय के दौरान, जब परमेश्वर की ईश्वरीयता को एक सामान्य देह में एहसास किया गया था जिसे लोग देख और छू सकते थे, और वे आगे से यह महसूस नहीं करते थे कि वह प्रकाश के समान अचानक प्रकट होता है और फिर गायब हो जाता है, जिसके करीब वे नहीं जा सकते थे। इस के विपरीत, वे परमेश्वर की इच्छा का आभास करने की कोशिश कर सकते थे या हरपल, उसके वचनों, और मनुष्य के पुत्र के कार्य के द्वारा उसकी ईश्वरीयता का एहसास कर सकते थे। मनुष्य के पुत्र के देहधारण ने परमेश्वर की मानवता के द्वारा उसकी ईश्वरीयता को प्रकट किया था और परमेश्वर की इच्छा को मानव जाति तक पहुँचाया था। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव के प्रकटीकरण के द्वारा, उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को प्रकाशित किया जिसे आध्यात्मिक आयाम क्षेत्र में देखा और छुआ नहीं जा सकता था। जो लोगों ने देखा वह स्वयं परमेश्वर था, स्पृश्य और हड्डी एवं माँस के साथ। इस प्रकार मनुष्य के पुत्र के देहधारण ने ऐसी चीज़ों को बनाया जैसे परमेश्वर की स्वयं की पहचान, स्तर, स्वरूप, स्वभाव, और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे ठोस और मानवीय किया। यद्यपि परमेश्वर के स्वरूप सम्बन्ध में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप में कुछ सीमाएँ थीं, फिर भी उसका सार और जो उसके पास है तथा जो वह है वे पूर्णत: परमेश्वर की स्वयं की पहचान और स्थिति को दर्शाने में सक्षम हैं—प्रकटीकरण के रूप में वहाँ केवल कुछ भिन्नताएँ थीं। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि ये मनुष्य के पुत्र की मानवता है या उसकी ईश्वरीयता, हम इन्कार नहीं कर सकते हैं कि यह स्वयं परमेश्वर की पहचान और उसकी स्थिति को दर्शाता है। फिर भी इस समय के दौरान, परमेश्वर ने देह में होकर कार्य किया, और देह के दृष्टिकोण से बात किया, और मानव जाति के सामने मनुष्य के पुत्र की पहचान और स्थिति के साथ खड़ा हुआ, और इस ने लोगों को मानव जाति के बीच में परमेश्वर के सच्चे वचनों और कार्य का सामना और अनुभव करने का अवसर दिया। इस ने लोगों को यह भी अनुमति दी कि वे विनम्रता के मध्य उसकी ईश्वरीयता और उसकी महानता की अंतःदृष्टि प्राप्त कर सकें, साथ ही साथ परमेश्वर की प्रमाणिकता और वास्तविकता की एक प्रारम्भिक समझ और एक प्रारम्भिक परिभाषा को भी प्राप्त कर सकें। भले ही प्रभु यीशु के द्वारा कार्य पूर्ण कर लिया गया था, फिर भी कार्य करने के उसके तरीके, और वह दृष्टिकोण जिसके तहत उसने कहा वह आध्यात्मिक संसार में परमेश्वर के सच्चे व्यक्तित्व से अलग था, उसके बारे में हर चीज़ सचमुच में स्वयं परमेश्वर को दर्शाता था जिसे मनुष्यों ने कभी भी नहीं देखा था—इसका इन्कार नहीं किया जा सकता है! ऐसा कहना होगा कि, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर किस रूप में प्रकट होता है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस दृष्टिकोण से बात करता है, या वह किस स्वरूप में मानव जाति के सामने आता है, परमेश्वर और किसी को नहीं बल्कि स्वयं अपने आपको दर्शाता है। वह किसी मनुष्य को दर्शा नहीं सकता है—वह किसी भ्रष्ट मनुष्य को दर्शा नहीं सकता है। परमेश्वर अपने आप में स्वयं परमेश्वर है, और इसका इनकार नहीं किया जा सकता है।

फुटनोटः

क. मूल पाठ "की इस अभिव्यक्ति" को छोड़ दिया गया है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

00:00
00:00

0खोज परिणाम