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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

लोग अनुभव के आधार पर परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए प्रवृत्त होते हैं

परमेश्वर को जानने के विषय में वार्तालाप करते समय, क्या तुम लोगों ने किसी चीज़ पर ध्यान दिया है? क्या तुम सब ने ध्यान दिया है कि परमेश्वर की वर्तमान मनोवृत्ति एक परिवर्तन से होकर गुज़री है? क्या मानवजाति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति अपरिवर्तनीय है? क्या परमेश्वर हमेशा इसी तरह से सहता रहेगा, अनिश्चित काल तक मनुष्य को अपना सारा प्रेम एवं दया प्रदान करता रहेगा? यह मामला परमेश्वर के सार को भी शामिल करता है। इससे पहले आओ हम उस तथाकथित उड़ाऊ पुत्र के उस प्रश्न की ओर वापस लौटें। जब इस प्रश्न को पूछा गया था उसके पश्चात्, तुम सब के उत्तर बिलकुल स्पष्ट नहीं थे। दूसरे शब्दों में, तुम लोग अभी भी परमेश्वर के इरादों को अच्छी तरह से नहीं समझते हो। जब एक बार लोग यह जान जाते हैं कि परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, तो वे परमेश्वर को प्रेम के एक प्रतीक के रूप में परिभाषित करते हैं; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग किस प्रकार बर्ताव करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे परमेश्वर से कैसा व्यवहार करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है वे कितने अनाज्ञाकारी हैं, किसी भी चीज़ से फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि परमेश्वर के पास प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम असीमित एवं अथाह है। परमेश्वर के पास प्रेम है, अतः वह लोगों के साथ सहनशील हो सकता है; परमेश्वर के पास प्रेम है, अतः वह लोगों के प्रति दयावान हो सकता है, उनकी अपरिपक्वता के प्रति दयावान हो सकता है, उनकी अज्ञानता के प्रति दयावान हो सकता है, और उनकी अनाज्ञाकारिता के प्रति दयावान हो सकता है। क्या यह वास्तव में ऐसा ही है? कुछ लोगों के लिए, जब उन्होंने एक बार या कुछ बार परमेश्वर के धीरज का अनुभव कर लिया है, तो परमेश्वर के विषय में अपनी स्वयं की समझ में वे इसके साथ एक महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में बर्ताव करते हैं, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उनके प्रति सदैव धैर्यवान होगा, और उनके प्रति सदैव दयावान होगा, और उनके जीवन के पथक्रम के दौरान वे परमेश्वर के धीरज का ग्रहण करेंगे और उसे एक मानक के रूप में मानेंगे कि किस प्रकार परमेश्वर उनसे बर्ताव करता है। ऐसे भी लोग हैं जो, जब उन्होंने एक बार परमेश्वर की सहनशीलता का अनुभव कर लिया है, हमेशा परमेश्वर को सहनशीलता के रूप में परिभाषित करेंगे, और यह सहनशीलता अनिश्चित है, बिना किसी शर्त के है, और यहाँ तक कि पूरी तरह से असैद्धांतिक है। क्या ये विश्वास सही हैं? हर बार जब परमेश्वर के सार या परमेश्वर के स्वभाव के मामलों की चर्चा की जाती है, तुम सब परेशान दिखाई देते हो। तुम लोगों को इस प्रकार देखना मुझे कुछ कुछ क्रोधित करता है। तुम लोगों ने परमेश्वर के सार के बारे में बहुत सारी सच्चाईयों को सुना है; तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव से सम्बन्धित बहुत सारे विषयों को भी ध्यान से सुना है। फिर भी, तुम सब के मनों में ये मामले और इन पहलुओं की सच्चाई मात्र स्मृतियां हैं जो मत (थ्योरी) एवं लिखित वचनों पर आधारित हैं। तुम लोगों में से कोई भी यह अनुभव करने में सक्षम नहीं है कि तुम्हारे वास्तविक जीवन में परमेश्वर का स्वभाव क्या है, और न ही तुम सब यह देख सकते हो कि परमेश्वर का स्वभाव क्या है। इसलिए, तुम सभी अपने अपने विश्वास में गड़बड़ा गए हो, तुम सब आंखें मूंदकर विश्वास करते हो, उस बिन्दु तक जहाँ तुम लोगों के पास परमेश्वर के प्रति श्रद्धा विहीन मनोवृत्ति है, और तुम सब उसे एक ओर धकेल देते हो। तुम लोगों के पास परमेश्वर के प्रति जो इस प्रकार की मनोवृत्ति है वह तुम सब को किस ओर ले जाती है? यह उस ओर ले जाती है जहाँ तुम लोग हमेशा परमेश्वर के विषय में निष्कर्ष बनाते हो। जब एक बार तुम सब को थोड़ा सा ज्ञान मिल जाता है, तो तुम लोग अत्यंत संतुष्ट महसूस करते हो, तुम सब महसूस करते हो कि तुम लोगों ने परमेश्वर को उसकी सम्पूर्णता में पा लिया है। उसके बाद, तुम सब निष्कर्ष निकालते हो कि परमेश्वर ऐसा ही है, और तुम लोग उसे स्वतन्त्रता से बढ़ने नहीं देते हो। और जब कभी परमेश्वर कुछ नया करता है, तो तुम लोग स्वीकार ही नहीं करते हो कि वह परमेश्वर है। एक दिन, जब परमेश्वर कहता है: "मैं अब मनुष्य से प्रेम नहीं करता हूँ; मैं अब उसको अपनी दया प्रदान नहीं करता हूँ; मनुष्य के प्रति मेरे पास अब और सहनशीलता या धीरज नहीं है; मैं मनुष्य के प्रति अत्यंत घृणा एवं चिढ़ से भर गया हूँ," तो लोग अपने हृदय की गहराईयों से इस प्रकार के कथन से मुठभेड़ करेंगे। कुछ लोग तो यह भी कहेंगे: "तू अब मेरा परमेश्वर नहीं है, तू अब आगे से वह परमेश्वर नहीं है जिसका मैं अनुसरण करना चाहता हूँ। जो कुछ तू कहता है यदि यह वही है, तो तू अब आगे से मेरे परमेश्वर होने के योग्य नहीं है, और मुझे लगातार तेरा अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तू मुझे दया प्रदान नहीं करता है, मुझे प्रेम नहीं देता है, मुझे सहनशीलता नहीं देता है, तो मैं अब आगे से तेरा अनुसरण नहीं करूंगा। यदि तू अनिश्चित काल तक मेरे प्रति सहनशील बना रहता है, और हमेशा मेरे साथ धैर्यवान रहता है, और मुझे यह देखने देता है कि तू प्रेम है, कि तू धैर्यवान है, कि तू सहनशील है, केवल तभी मैं तेरा अनुसरण कर सकता हूँ, और केवल तभी मेरे पास वह आत्मविश्वास हो सकता है कि अन्त तक अनुसरण करूं। चूँकि तेरे पास तेरा धीरज एवं दया है, मेरी अनाज्ञाकारिता और मेरे अपराधों को अनिश्चित काल तक क्षमा किया जा सकता है, और अनिश्चित काल तक माफ किया जा सकता है, और मैं किसी भी समय और किसी भी स्थान पर पाप कर सकता हूँ, किसी भी समय और किसी भी स्थान पर पाप अंगीकार कर सकता हूँ और माफ किया जा सकता हूँ, और किसी भी समय और किसी भी स्थान पर तुझे क्रोध दिला सकता हूँ। तेरे पास मुझ से सम्बन्धित अपने स्वयं के कोई विचार एवं निष्कर्ष नहीं होने चाहिए।" यद्यपि शायद तू इस प्रकार के प्रश्न के विषय में ऐसे आत्मनिष्ठ रूप से एवं चैतन्य रूप से नहीं सोचता है, फिर भी जब कभी तू परमेश्वर का विचार करता है कि वह तेरे पापों की क्षमा के लिए एक यन्त्र है और एक वस्तु है कि उसे एक खूबसूरत मंज़िल को पाने के लिए उपयोग में लाया जाए, तो तूने पहले से ही अतिसूक्ष्म रूप से जीते परमेश्वर को अपने शत्रु के रूप में अपने विरुद्ध रख दिया है। यह वही है जो मैं देखता हूँ। तू शायद लगातार कह सकता है , "मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ" "मैं सत्य की खोज करता हूँ"; "मैं अपने स्वभाव को बदलना चाहता हूँ"; "मैं अंधकार के प्रभाव को तोड़कर स्वतन्त्र होना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहता हूँ"; मैं परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य होना चाहता हूँ, और अपने कर्तव्य को अच्छे से निभाना चाहता हूँ"; एवं इत्यादि। फिर भी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तू जो कुछ भी कहता है वह कितना अच्छा सुनाई देता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तू कितने मत (थ्योरी) को जानता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह मत (थ्योरी) कितनी प्रभावशाली है, यह कितनी प्रतिष्ठित है, क्योंकि उस मामले की सच्चाई यह है कि तुम लोगों में से बहुत से लोग हैं जिन्होंने पहले से ही सीख लिया है कि किस प्रकार नियम, सिद्धान्त, और मत (थ्योरी) का उपयोग करें जिन पर तुम सब ने परमेश्वर के विषय में निष्कर्ष निकलने के लिए महारत हासिल की है, और पूरी तरह से स्वभाविक रीति से उसे स्वयं के विरुद्ध रख दिया है। यद्यपि तूने पत्रियों पर महारत हासिल कर ली है और सिद्धान्तों पर महारत हासिल कर ली है, फिर भी तूने असल में सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, अतः तेरे लिए परमेश्वर के करीब जाना, परमेश्वर को जानना, और परमेश्वर को समझना बहुत कठिन है। यह दयनीय है!

मैं ने एक वीडियो में यह दृश्य देखा था: कुछ बहनें वचन देह में प्रकट होता है (The Word Appears in the Flesh) पुस्तक को पकड़े हुए थीं, और उन्होंने उसे बहुत ऊंचाई पर रखा हुआ था। वे उस पुस्तक को अपने बीच में थामे हुए थीं, उनके सिरों से भी ऊपर। हालाँकि यह मात्र एक तस्वीर है, जो वह मेरे भीतर जागृत करता है वह एक तस्वीर नहीं है। इसके बजाय, यह मुझे सोचने के लिए बाध्य करता है कि जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपने हृदय में ऊँचा उठाए रखता है वह परमेश्वर का वचन नहीं है, परन्तु परमेश्वर के वचन की पुस्तक है। यह बहुत ही निराश करनेवाली बात है। अभ्यास करने का यह तरीका सामान्यतः परमेश्वर को ऊंचाई पर रखने की स्थिति नहीं है। यह इसलिए है क्योंकि तुम लोग उस तरह से परमेश्वर को नहीं समझते हो जैसे एक स्पष्ट प्रश्न, एवं बहुत ही छोटे प्रश्न को समझते हो, तुम सब अपनी स्वयं की धारणाओं के साथ सामने आते हो। जब मैं तुम लोगों से चीज़ों के विषय में पूछता हूँ, जब मैं तुम सब के साथ गंभीर होता हूँ, तो तुम सब अनुमान के साथ एवं अपनी स्वयं की कल्पनाओं के साथ प्रत्युत्तर देते हो, तुम लोगों में से कुछ सन्देहास्पद स्वर अपना लेते हो और पलट कर प्रश्न करते हो। यह इसे मेरे लिए और भी अधिक स्पष्ट रीति से पुष्ट करता है कि वह परमेश्वर जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो वह सच्चा परमेश्वर नहीं है। इतने सालों से परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, तुम सब एक बार फिर से परमेश्वर के विषय में निष्कर्षों को निकालने के लिए परमेश्वर के वचन का उपयोग करते हो, परमेश्वर के कार्य का उपयोग करते हो, तथा और अधिक सिद्धान्तों का उपयोग करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम लोग परमेश्वर को समझने के लिए कभी प्रयास नहीं करते हो; तुम सभी परमेश्वर के इरादों का पता लगाने की कभी कोशिश नहीं करते हो; तुम लोग यह समझने का प्रयास नहीं करते हो कि मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है; या परमेश्वर किस प्रकार सोचता है, वह दुखी क्यों है, वह क्रोधित क्यों है, और वह लोगों को क्यों ठुकराता है, और ऐसे ही कुछ अन्य प्रश्न। इससे अधिक और क्या, यहाँ तक कि अधिकतर लोग मानते हैं कि परमेश्वर हमेशा से खामोश रहा है क्योंकि वह बस मानवजाति के कामों को देख रहा है, क्योंकि उसके पास उनके प्रति कोई मनोवृत्ति नहीं है, और न ही उसके पास अपने स्वयं के विचार हैं। एक अन्य समूह इसे और भी आगे ले जाता है। ये लोग मानते हैं कि परमेश्वर जरा भी आवाज़ नहीं करता है क्योंकि उसने मौन स्वीकृति दी है, परमेश्वर जरा सी भी आवाज़ नहीं करता है क्योंकि वह इन्तज़ार कर रहा है, परमेश्वर जरा सी भी आवाज़ नहीं करता है क्योंकि उसके पास कोई मनोवृत्ति नहीं है, क्योंकि परमेश्वर की मनोवृत्ति को पहले से ही पुस्तक में विस्तार से समझाया जा चुका है, उसे उसकी सम्पूर्णता में पहले से ही मानवजाति पर अभिव्यक्त किया जा चुका है, और समय समय पर लोगों को बार-बार बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। यद्यपि परमेश्वर खामोश है, फिर भी उसके पास अभी भी एक मनोवृत्ति है, और उसके पास एक मानक है जिसकी मांग वह लोगों से करता है। यद्यपि लोग उसे समझने का प्रयत्न नहीं करते हैं, और उसे खोजने का प्रयास नहीं करते हैं, फिर भी उसकी मनोवृत्ति बिलकुल साफ है। किसी ऐसे व्यक्ति का विचार करें जिसने किसी समय बड़े धुन के साथ परमेश्वर का अनुसरण किया था, परन्तु किसी मुकाम पर उसे छोड़ दिया और चला गया था। अगर अब यह व्यक्ति वापस आना चाहता है, तो अत्यंत आश्चर्यजनक रूप से, तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर का दृष्टिकोण क्या होगा, और परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या होगी। क्या यह दयनीय नहीं है? वास्तव में, यह असल में एक सतही मामला है, यदि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के हृदय को समझते हो, तो तुम सब इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति को समझोगे, और तुम लोग एक अस्पष्ट उत्तर नहीं दोगे। चूँकि तुम सब नहीं जानते हो, इसलिए मुझे उत्तर देने दो।

ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

तू इस प्रकार के व्यक्ति को हर जगह पाएगा: जब वे परमेश्वर के मार्ग के विषय में सुनिश्चित हो जाते हैं उसके पश्चात्, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप और बिना कुछ कहे छोड़कर चले जाते हैं और जो कुछ उनका हृदय चाहता है वही करते हैं। कुछ समय के लिए, हम इस बात पे नहीं जाएंगे कि यह व्यक्ति छोड़कर क्यों चला जाता है। पहले हम इस ओर देखेंगे कि इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस क्षण यह व्यक्ति छोड़कर चला जाता है, परमेश्वर की नज़रों में उनके विश्वास का दायरा समाप्त हो जाता है। यह वह व्यक्ति नहीं है जिसने इसे समाप्त किया है, परन्तु परमेश्वर है। यह कि इस व्यक्ति ने परमेश्वर को छोड़ दिया था, इसका अर्थ है उन्होंने पहले से ही परमेश्वर का तिरस्कार कर दिया है, यह कि वे पहले से ही परमेश्वर को नहीं चाहते हैं। इसका अर्थ है कि उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार नहीं किया है। चूँकि यह व्यक्ति परमेश्वर को नहीं चाहता है, क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाहता है? इसके अतिरिक्त, जब इस व्यक्ति के पास ऐसी मनोवृत्ति एवं ऐसा दृष्टिकोण है, और उसने परमेश्वर को छोड़ने का संकल्प किया है, तो उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। यद्यपि वे आवेश में नहीं आए थे और परमेश्वर को कोसते नहीं थे, यद्यपि वे किसी बुरे या चरम व्यवहार में संलग्न नहीं हुए थे, और यद्यपि ऐसा व्यक्ति सोच रहा है: यदि ऐसा दिन आता है जब मैं बाह्य रुप से आनन्द से तृप्त हो जाता हूँ, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है, तो मैं वापस लौट आऊंगा। या यदि परमेश्वर मुझे पुकारता है, तो मैं वापस लौट आऊंगा। या वे कहते हैं: जब मैं बाहर से चोट खाया हुआ हूँ, जब मैं देखता हूँ कि बाहरी संसार अत्यंत अंधकारमय और अत्यंत दुष्ट है और मैं अब आगे से बहाव के साथ बहना नहीं चाहता हूँ, तो मैं परमेश्वर के पास वापस लौट आऊंगा। यद्यपि इस व्यक्ति ने अपने मन में गणना कर ली है कि वे समय के किस बिन्दु पर वापस लौट रहे हैं, यद्यपि वे अपनी वापसी के लिए द्वार को खुला छोड़ देते हैं, फिर भी वे एहसास नहीं करते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे किस प्रकार सोचते हैं और किस प्रकार योजना बनाते हैं, क्योंकि ये सब बस ख्याली पुलाव है। उनकी सबसे बड़ी गलती यह है कि वे इस बात के विषय में अस्पष्ट हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा लगता है। उस क्षण की शुरूआत से जब यह व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करता है, परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया है; परमेश्वर ने पहले से ही अपने हृदय में उनके परिणाम को निर्धारित कर दिया है। वह परिणाम क्या है? यह व्यक्ति हैमस्टर (चूहे की एक प्रजाति) में से एक है, और वह उनके साथ ही नाश होगा। इस प्रकार, लोग अकसर इस प्रकार की स्थिति को देखते हैं: कोई व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ देता है, परन्तु वे दण्ड नहीं पाते हैं। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धान्तों के अनुसार संचालन करता है। लोग कुछ चीज़ों को ही देख सकते हैं, और कुछ चीज़ों का निष्कर्ष परमेश्वर के हृदय में निकाला जाता है, अतः लोग नतीजे को नहीं देख सकते हैं। वह चीज़ जिसे लोग देखते हैं वह आवश्यक रूप से चीज़ों का सच्चा पहलु नहीं है; परन्तु अन्य पहलु है, ऐसा पहलु जिसे तू नहीं देखता है—ये परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार एवं निष्कर्ष हैं।

लोग जो परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग खड़े होते हैं वे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग को छोड़ देते हैं

अतः परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को ऐसा गंभीर दण्ड कैसे दे सकता है? परमेश्वर उनके प्रति इतना क्रोधित क्यों है? सबसे पहले हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव महाप्रतापी है, एवं रोष है। वह कोई भेड़ नहीं है कि कोई भी उसे घात कर दे; इससे भी बढ़कर, वह कोई कठपुतली नहीं है कि लोग जैसा चाहें वैसा उसे नियन्त्रित करें। साथ ही वह कोई खाली हवा नहीं है कि लोगों के द्वारा उस पर स्वामित्व जताया जाए। यदि तुम वास्तव में विश्वास करते हो कि परमेश्वर मौजूद है, तो तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए जो परमेश्वर का भय मानता है, और तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के सार-तत्व को क्रोधित नहीं करना है। हो सकता है कि यह क्रोध किसी एक शब्द के द्वारा उत्पन्न हुआ हो; कदाचित् एक विचार; कदाचित् किसी प्रकार का बुरा व्यवहार; कदाचित् सादा व्यवहार, ऐसा व्यवहार जो मनुष्य की नज़रों में एवं नैतिकता में स्वीकार्य है; या कदाचित् किसी सिद्धान्त एवं मत (थ्योरी) के द्वारा उत्पन्न हुआ हो। फिर भी, जब एक बार तुम परमेश्वर को क्रोधित कर देते हो, तो तुम्हारा अवसर चला जाता है और तुम्हारे अन्त के दिन आ जाते हैं। यह एक भयानक बात है! यदि तुम नहीं समझते हो कि परमेश्वर को ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता है, तो शायद तुम परमेश्वर से नहीं डरते हो, और शायद तुम उसे हर समय ठेस पहुंचाते हो। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का भय कैसे मानें, तो तुम परमेश्वर का भय मानने में असमर्थ होते हो, और तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर के मार्ग में चलने के पथ पर स्वयं को कैसे रखना है - परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। जब एक बार तुम जान जाते हो, तो तुम सचेत हो सकते हो कि परमेश्वर को ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता है, तो तुम जान लोगे कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना क्या है।

परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलना आवश्यक रूप से इसके विषय में नहीं है कि तुम कितनी अधिक सच्चाई को जानते हो, तुमने कितनी अधिक परीक्षाओं का अनुभव किया है, या तुमको कितना अधिक अनुशासित किया गया है। इसके बजाए, यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के लिहाज से तुम्हारे हृदय का सार-तत्व क्या है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति क्या है। लोगों का सार-तत्व और उनकी आत्मनिष्ठ मनोवृत्ति - ये अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मुख्य बातें हैं। उन लोगों के लिहाज से जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है और छोड़कर चले गये हैं, परमेश्वर के प्रति उनकी घृणित मनोवृत्ति ने और उनके हृदय ने जो सत्य को तुच्छ जानते हैं परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित किया है, इस प्रकार जहाँ तक परमेश्वर की बात है उन्हें कभी भी क्षमा नहीं किया जाएगा। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में जाना है, उनके पास वह जानकारी है कि परमेश्वर का आगमन पहले ही हो चुका है, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का भी अनुभव किया है। उनका चला जाना भ्रमित होने की स्थिति नहीं है, और न ही ऐसी स्थिति है कि वे इसके विषय में अस्पष्ट हैं। यह ऐसी स्थिति तो बिलकुल भी नहीं है कि उन्हें जबरदस्ती इसमें धकेला जा रहा है। इसके बजाए उन्होंने सचेत रूप से, एवं स्पष्ट मस्तिष्क के साथ, परमेश्वर को छोड़कर जाने का चुनाव किया है। उनका चले जाना अपने मार्ग को खोना नहीं है; यह उन्हें फेंक दिया जाना नहीं है। इसलिए, परमेश्वर की दृष्टि में, वे एक मेम्ने के समान नहीं हैं जो झुण्ड से भटक गया है, उड़ाऊ पुत्र की तो बात ही छोड़ दो जिसने अपने मार्ग को खो दिया था। वे दण्डमुक्ति के साथ चले गए, और ऐसी परिस्थिति, और ऐसी दशा परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करती है, और इस क्रोध के कारण ही है कि वह उन्हें एक आशाहीन परिणाम देता है। क्या इस प्रकार का परिणाम भयावह नहीं है? अतः यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो वे परमेश्वर को ठेस पहुंचा सकते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है! यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की मनोवृत्ति को गंभीरता से नहीं लेता है, और तब भी मानता है कि परमेश्वर उनके लौटकर आने की प्रतीक्षा कर रहा है - क्योंकि वे परमेश्वर की भटकी हुई भेड़ों में से एक हैं और परमेश्वर अभी भी उनके हृदय के परिवर्तन का इंतज़ार कर रहा है – तो यह व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे उनके दण्ड के दिन से बहुत दूर किया गया है। परमेश्वर उन्हें स्वीकार करने से मना तो नहीं करेगा। यह दूसरी बार है जब उन्होंने उसके स्वभाव को क्रोधित किया है; यह तो और भी अधिक भयानक बात है! इस व्यक्ति की श्रद्धा विहीन मनोवृत्ति ने पहले से ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेश को ठेस पहुंचा दिया है। क्या परमेश्वर अब भी उन्हें स्वीकार करेगा? इस मामले के सम्बन्ध में परमेश्वर के सिद्धान्त हैं: यदि कोई व्यक्ति सच्चे मार्ग के विषय में निश्चित है फिर भी वह जानते बूझते एवं स्पष्ट मस्तिष्क के साथ परमेश्वर को ठुकरा सकता है, और स्वयं को परमेश्वर से दूर कर सकता है, तब परमेश्वर उनके उद्धार के मार्ग को अवरुद्ध कर देगा, और इसके बाद राज्य में प्रवेश करने के उस दरवाजे को उनके लिए बन्द कर दिया जाएगा। जब यह व्यक्ति आकर एक बार फिर द्वार खटखटाता है, तो परमेश्वर उनके लिए दोबारा द्वार नहीं खोलेगा। इस व्यक्ति को सदा के लिए द्वार से बाहर रखा जाएगा। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ ने बाईबिल में मूसा की कहानी को पढ़ा है। जब मूसा को परमेश्वर के द्वारा अभिषिक्त किया गया था उसके पश्चात्, 250 अगुवे मूसा के कार्यों एवं अन्य विभिन्न कारणों की वजह से उससे असंतुष्ट थे। उन्होंने किसकी आज्ञा मानने से मना किया था? वह मूसा नहीं था। उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधों को मानने से इंकार किया था; उन्होंने इस मामले पर परमेश्वर के कार्य को मानने से मना किया। उन्होंने निम्नलिखित बातें कही थीं: "तू ने अपने ऊपर बहुत कुछ ले लिया है, देख सारी मंडली, और उनमें से हर एक जन पवित्र है, और यहोवा हमारे बीच में है ...। मनुष्य की नज़रों में, क्या ये शब्द बहुत गंभीर हैं? वे गंभीर नहीं हैं! कम से कम शब्दों का शाब्दिक अर्थ गंभीर नहीं है। वैधानिक अर्थ में, उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा है, क्योंकि सतही तौर पर यह कोई शत्रुतापूर्ण भाषा या शब्दावली नहीं है, और इसमें ईश निन्दा सम्बन्धी कोई अर्थ तो बिलकुल भी नहीं है। यहाँ केवल एक साधारण सा वाक्य है, इससे अधिक और कुछ नहीं। फिर भी ऐसा क्यों है कि ये शब्द परमेश्वर के ऐसे कोप को भड़का सकते हैं? यह इसलिए है क्योंकि उन्हें लोगों से नहीं कहा गया है, परन्तु परमेश्वर से कहा गया है। उनके द्वारा अभिव्यक्त की गई मनोवृत्ति एवं स्वभाव बिलकुल वही है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करता है, विशेषकर परमेश्वर के उस स्वभाव को क्रोधित करता है जिसे ठेस नहीं पहुंचाय जा सकता है। हम सब जानते हैं कि अन्त में उनका परिणाम क्या हुआ था। ऐसे लोगों के सम्बन्ध में जो परमेश्वर को छोड़ देते हैं, उनका दृष्टिकोण क्या है? उनकी मनोवृत्ति क्या है? और क्यों उनका दृष्टिकोण एवं मनोवृत्ति ऐसा कारण बनता है कि परमेश्वर उनके साथ इस तरह से व्यवहार करता है? कारण यह है कि वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि वह परमेश्वर है फिर भी वे अभी भी परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने का चुनाव करते हैं। इसी लिए उद्धार के लिए उनके अवसर से उन्हें पूरी तरह से वंचित कर दिया जाता है। ठीक वैसे ही जैसे बाईबिल कहती है: "क्योंकि सच्चाई की पहचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जानबूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिए फिर कोई बलिदान बाकी नहीं रहा।" क्या अब तुम लोग इस विषय पर स्पष्ट हो?

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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