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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

एक व्यावहारिक प्रश्न जो लोगों में सब प्रकार की शर्मिंदगी को लाता है

एक अन्य प्रकार का व्यक्ति है जिसका परिणाम सभी परिणामों से सबसे अधिक दुखदाई होता है? ये ऐसे लोग हैं जिनकी चर्चा मैं कम से कम करना चाहता हूँ। यह दुखदाई नहीं है क्योंकि यह व्यक्ति परमेश्वर के दण्ड को प्राप्त करता है, या यह कि उनसे की गई परमेश्वर की मांगें कठोर होती हैं और उनका दुखदायी परिणाम होता है। इसके बजाय, यह दुखदाई है क्योंकि वे इसे स्वयं के लिए करते हैं, जैसा अकसर कहा जाता है: वे अपनी स्वयं की कब्र खोदते हैं? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? यह व्यक्ति सही पथ पर नहीं चलता है, और उनका परिणाम पहले से ही प्रकट हो जाता है? परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को अपनी घृणा के चरम लक्ष्य के रूप में देखता है? जैसा लोग इसका वर्णन करते हैं, ऐसे लोग सभी मनुष्यों में सबसे अधिक दुखदाई होते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अनुसरण करने के आरम्भ में अत्यधिक उत्साहित रहता है; वे बहुत सी कीमतें चुकाते हैं, उनके पास परमेश्वर के कार्य के बाहरी दृष्टिकोण पर एक अच्छी राय होती है; वे अपने स्वयं के भविष्य के विषय में कल्पनाओं से भरपूर होते हैं; वे विशेष रूप से परमेश्वर में आत्मविश्वास रखते हैं, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण कर सकता है, और उसे एक महिमामय मंज़िल में ला सकता है। फिर भी किसी कारण से, तब ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के पथक्रम से दूर भाग जाता है। इसका क्या अभिप्राय है कि यह व्यक्ति दूर भाग जाता है? इसका अर्थ है कि वे बिना अलविदा कहे और बिना किसी आवाज़ के गायब हो जाते हैं। वे बिना कुछ कहे छोड़कर चले जाते हैं। यद्यपि इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास करने का दावा करता है, फिर भी वे परमेश्वर पर विश्वास करने के पथ पर कोई जड़ नहीं पकड़ते हैं। इस प्रकार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन्होंने कितने लम्बे समय से विश्वास किया है, क्योंकि वे अभी भी परमेश्वर से दूर जा सकते हैं। कुछ लोग व्यापार में जाने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ अपने जीवन को जीने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ लोग धनवान बनने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ लोग विवाह करने के लिए, एवं संतान पाने के लिए छोड़कर चले जाते हैं। उन लोगों में से जो चले जाते हैं, कुछ ऐसे लोग हैं जिनका विवेक उन्हें कचोटता है और वे वापस आना चाहते हैं, और कुछ अन्य लोग गरीबी से कठिनाई में जीवन गुज़ारते है, एवं संसार में साल दर साल भटकते फिरते हैं। इन भटकने वाले लोगों ने बहुत से कष्टों का अनुभव किया है, और वे मानते हैं कि इस संसार में रहना अति दुखदाई है, और उन्हें परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है। वे राहत, शांति, एवं आनन्द पाने के लिए परमेश्वर के घर में लौटना चाहते हैं, और आपदाओं से बचने के लिए, या उद्धार पाने के लिए और एक खूबसूरत मंज़िल को पाने के लिए परमेश्वर में लगातार विश्वास करना चाहते हैं। यह इसलिए है क्योंकि ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, कि परमेश्वर का अनुग्रह अक्षय है और यह एकदम से समाप्त नहीं हो सकता है। वे विश्वास करते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किसी व्यक्ति ने क्या किया है, परमेश्वर को उन्हें क्षमा करना चाहिए और उनके अतीत के विषय में सहनशील होना चाहिए। ये लोग कहते हैं कि वे वापस आना और अपने कर्तव्य को निभाना चाहते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो अपनी सम्पत्ति के कुछ भाग को कलीसिया को दान कर देते हैं, यह आशा करते हुए कि यह परमेश्वर के घर की ओर वापस जाने के लिए उनका मार्ग है। इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? परमेश्वर को उनके परिणाम को कैसे निर्धारित करना चाहिए? कृपया खुलकर बोलो। (सोचा था कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार करेगा, पर अभी उसे सुनने के बाद, शायद उन्हें फिर से स्वीकार नहीं किया जाएगा।) और तेरा तर्क क्या है? (इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष आता है ताकि उनका परिणाम एक प्रकार से मृत्यु न हो। वे शुद्ध ईमानदारी से नहीं आते हैं। इसके बजाय, उस जानकारी से आते हैं कि परमेश्वर के कार्य को शीघ्र पूरा किया जाएगा, वे आशीषों को पाने के भ्रम में आते हैं।) तू कह रही है कि ऐसा व्यक्ति ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है, अतः परमेश्वर उन्हें स्वीकार नहीं कर सकता है? क्या ऐसा ही है? (हाँ।) (मेरा मानना है कि इस प्रकार का व्यक्ति अवसरवादी है, और वे ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं।) वे परमेश्वर में विश्वास करने के लिए नहीं आए हैं; वे एक अवसरवादी हैं? सही कहा! ये अवसरवादी इस प्रकार के इंसान है जिनसे हर कोई नफरत करता है। जिस किसी दिशा में हवा बहती है वे बस उस दिशा में बहते हैं, और तब तक किसी भी कार्य को करने की परवाह नहीं कर सकते हैं जब तक उन्हें उससे कुछ प्राप्त न हो जाए। निश्चित रूप से वे घृणित हैं! क्या किसी भाई या बहन के पास कोई दृष्टिकोण है? (परमेश्वर उन्हें अब और स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि परमेश्वर का कार्य समाप्त होने ही वाला है और अभी वह समय है जब लोगों के परिणामों को तय किया जाता है। यही वह समय है जब ये लोग वापस आना चाहते हैं। यह इसलिए नहीं है क्योंकि वे वास्तव में सत्य का अनुसरण करना चाहते हैं; वे वापस आना चाहते हैं क्योंकि वे आपदाओं को उतरते हुए देखते हैं, या उन्हें बाहरी कारकों के द्वारा प्रभावित किया जा रहा है। यदि उनके पास वास्तव में ऐसा हृदय होता जो सत्य की खोज करता, तो वे पथक्रम के बीच में ही छोड़कर कभी नहीं भागते।) क्या कोई अन्य राय हैं? (उन्हें स्वीकार नहीं किया जाएगा। परमेश्वर ने वाकई में उन्हें अवसर दिए थे, परन्तु परमेश्वर के प्रति उनकी मनोवृत्ति ऐसी थी कि वे उस पर हमेशा कोई ध्यान नहीं देते थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि ऐसे व्यक्ति के इरादे क्या हैं, और भले ही वे वास्तव में पश्चाताप करें, परमेश्वर उन्हें अभी भी स्वीकार नहीं करेगा। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें पहले से ही बहुत सारे अवसर दिए थे, फिर भी उन्होंने अपनी मनोवृत्ति का प्रदर्शन पहले से ही किया था: वे परमेश्वर को छोड़ देना चाहते थे। इसलिए, अब जब वे वापस आते हैं, तो परमेश्वर उन्हे स्वीकार नहीं करेगा।) (मैं भी यह स्वीकार करता हूँ कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति ने सच्चे मार्ग को देखा है, इतनी लम्बी समय अवधि तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, और अभी भी संसार में वापस लौट सकता है, और शैतान के आलिंगन में वापस लौट सकता है, तो यह परमेश्वर से बड़ा विश्वासघात है। इस तथ्य के बावजूद कि परमेश्वर का सार करुणा है एवं प्रेम है, यह उस प्रकार के व्यक्ति पर निर्भर करता है जिसकी ओर इसे निर्देशित किया जा रहा है। यदि ऐसा व्यक्ति राहत की खोज करने के लिए, एवं ऐसी चीज़ की खोज करने के लिए परमेश्वर के समक्ष आता है कि उस पर अपनी आशा को रख सके, तो इस प्रकार का व्यक्ति उस किस्म का नहीं है जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता है, और उनके प्रति परमेश्वर की दया केवल इतनी दूर तक ही जाती है।) परमेश्वर का सार दया है, अतः वह इस प्रकार के व्यक्ति को थोड़ी और दया क्यों नहीं देता है? थोड़ी सी दया के साथ, क्या तब उन्हें एक अवसर नहीं मिलता है? इससे पहले, ऐसा अकसर कहा जाता: परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति उद्धार पाए, और नहीं चाहता है कि कोई भी नाश हो। यदि सौ में से एक भेड़ खो जाए, तो परमेश्वर उन निन्यानवे भेड़ों को छोड़ देगा और उस एक खोई हुई भेड़ को खोजेगा। आजकल, इस प्रकार के व्यक्ति के सम्बन्ध में, यदि यह परमेश्वर में उनके सच्चे विश्वास की खातिर है, तो क्या परमेश्वर को उन्हें स्वीकार करना और दूसरा अवसर देना चाहिए? यह वास्तव में एक कठिन प्रश्न नहीं है; यह बिलकुल सरल है! यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर को समझते हो, और तेरे पास परमेश्वर की एक वास्तविक समझ है, तो अधिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं है; और अधिक अनुमान लगाने की आवश्यकता भी नहीं है, सही है? तुम लोगों के उत्तर सही मार्ग पर हैं, परन्तु अभी भी उनमें और परमेश्वर की मनोवृत्ति के बीच में कुछ अन्तर है।

अभी इस वक्त तुम लोगों में से कुछ ऐसे थे जो इस बात से निश्चित थे कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार नहीं कर सकता है। अन्य लोग अधिक स्पष्ट नहीं थे, वे विश्वास करते थे कि शायद परमेश्वर उन्हें स्वीकार कर सकता है, और शायद उन्हें स्वीकार नहीं भी कर सकता है—यह मनोवृत्ति कहीं अधिक औसत दर्जे की है; और फिर ऐसे लोग थे जिनका दृष्टिकोण था कि वे आशा करते थे कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार करता है—यह अस्पष्ट मनोवृत्ति है। ऐसे लोग जिनके पास ऐसी निश्चित मनोवृत्ति है वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने अब तक कार्य किया है और उसका कार्य पूर्ण है, अतः परमेश्वर को इन लोगों के प्रति सहनशील होने की आवश्यकता नहीं है, और वह उन्हें दोबारा स्वीकार नहीं करेगा। औसत दर्जे के लोग विश्वास करते हैं कि इन मामलों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार संभाला जाना चाहिए: यदि इस व्यक्ति का हदय परमेश्वर से अविभाज्य है, और वे अभी भी ऐसे व्यक्ति हैं जो सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ऐसे व्यक्ति हैं जो सत्य की खोज करते हैं, तो परमेश्वर को उनकी पिछली निर्बलताओं एवं गलतियों को स्मरण नहीं करना चाहिए; उसे उन्हें क्षमा करना चाहिए, उन्हें एक और अवसर देना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के घर में वापस लौटने, और परमेश्वर के उद्धार को ग्रहण करने की अनुमति देनी चाहिए। फिर भी, यदि ऐसा व्यक्ति एक बार फिर से भाग जाता है, यह तब होता है जब परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को अब और नहीं चाहता है और इसे उनके प्रति अन्याय करना नहीं माना जा सकता है। एक और समूह है जो आशा करता है कि परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को स्वीकार कर सकता है। यह समूह स्पष्ट रूप से नहीं जानता है कि परमेश्वर उन्हें स्वीकार करेगा या नहीं। यदि वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को उन्हें स्वीकार करना चाहिए, किन्तु यदि परमेश्वर उन्हें स्वीकार नहीं करता है, तब ऐसा प्रतीत होता है कि वे परमेश्वर के दृष्टिकोण की अनुरूपता से थोड़ा बाहर हैं। यदि वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए, और यदि परमेश्वर कहे कि मनुष्य के प्रति उसका प्रेम अनिश्चित है और यह कि वह इस व्यक्ति को एक और अवसर देना चाहता है, तो क्या यह मानवीय अज्ञानता का ऐसा उदाहरण नहीं है जिसे प्रकट किया जा रहा है? किसी भी सूरत में, तुम सभी लोगों के पास अपने स्वयं के दृष्टिकोण होते हैं। तुम लोगों के अपने अपने विचारों में ये दृष्टिकोण एक ज्ञान है; साथ ही वे सत्य के विषय में तुम लोगों की समझ और परमेश्वर के इरादों के विषय में तुम लोगों की समझ की गहराई का प्रतिबिम्ब भी है। अच्छा कहा, नहीं? यह अद्भुत बात है कि तुम लोगों के पास इस मसले पर राय हैं! परन्तु इस सम्बन्ध में कि तुम सब के राय सही हैं या नहीं, अभी एक प्रश्न चिन्ह है। क्या तू थोड़ा चिन्तित नहीं है? "तो सही क्या है? मैं स्पष्ट रूप से देख नहीं सकता हूँ, और सटीक रूप से नहीं जानता हूँ कि परमेश्वर क्या सोच रहा है? परमेश्वर ने मुझे कुछ भी नहीं बताया था। मैं कैसे जान सकता हूँ कि परमेश्वर क्या सोच रहा है? मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति प्रेम है। परमेश्वर की पिछली मनोवृत्ति के अनुसार, उसे इस व्यक्ति को स्वीकार करना चाहिए। किन्तु मैं परमेश्वर की वर्तमान मनोवृत्ति पर अधिक स्पष्ट नहीं हूँ—मैं केवल यह कह सकता हूँ कि शायद वह ऐसे व्यक्ति को स्वीकार करेगा, और शायद वह नहीं करेगा।" क्या यह बेतुका नहीं है? इसने तुम लोगों को वास्तव में चकरा दिया है। यदि इस मसले पर तुम सब के पास एक उचित नज़रिया नहीं है, तब तुम लोग क्या करोगे जब तुम सब की कलीसिया का सामना सचमुच में इस प्रकार के व्यक्ति से होता है? यदि तुम लोग इससे उचित रीति से नहीं निपटते हो, तो शायद तुम सब परमेश्वर को ठेस पहुंचाओगे। क्या यह एक खतरनाक मामला नहीं है?

जिस पर मैं अभी अभी चर्चा कर रहा था मैं उस पर तुम लोगों के दृष्टिकोण के विषय में क्यों पूछना चाहता हूँ? मैं तुम सब के दृष्टिकोण के बिन्दुओं को जांचना चाहता हूँ, यह जांचना चाहता हूँ कि तुम लोगों के पास परमेश्वर का कितना ज्ञान है, तुम सब के पास परमेश्वर के इरादों एवं परमेश्वर की मनोवृत्ति का कितना ज्ञान है। उत्तर क्या है? उत्तर तुम लोगों के दृष्टिकोण के बिन्दुओं में निहित है। तुम लोगों में से कुछ बहुत रूढ़िवादी हो, और तुम लोगों में से कुछ अन्दाज़ा लगाने के लिए अपनी कल्पनाओं का उपयोग कर रहे हो। "अन्दाज़ा लगाना क्या है"? यह तब होता है जब तुम लोगों के पास कोई विचार नहीं होता है कि परमेश्वर किस प्रकार सोचता है, अतः तुम सब निराधार विचारों के साथ सामने आते हो कि परमेश्वर को किस प्रकार इस रीति से या उस रीति से सोचना चाहिए। तुम लोगों को वास्तव में पता नहीं होता है कि तुम्हारा अनुमान सही है या गलत, अतः तुम सब अस्पष्ट दृष्टिकोण को व्यक्त करते हो। इस तथ्य के साथ सामना होने पर, तुम लोग क्या देखते हो? परमेश्वर का अनुसरण करते समय, लोग कभी कभार ही परमेश्वर के इरादों पर ध्यान देते हैं, और कभी कभार ही परमेश्वर के विचारों एवं मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति पर ध्यान देते हैं। तुम लोग परमेश्वर के विचारों को नहीं समझते हो, अतः जब ऐसे प्रश्नों को पूछा जाता है जिनमें परमेश्वर के इरादे शामिल होते हैं, एवं परमेश्वर का स्वभाव शामिल होता है, तो तुम लोग गड़बड़ा जाते हो; और अत्यंत अनिश्चित होते हो, और तुम लोग या तो अन्दाज़ा लगाते हो या दांव लगाते हो। यह मनोवृत्ति क्या है? यह इस तथ्य को साबित करता है: अधिकांश लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं वे उसे खाली हवा के रूप में एवं अस्पष्ट रूप में मानते हैं। मैं ने इसे इस प्रकार क्यों कहा है? क्योंकि जब भी तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तब तुम सब परमेश्वर के इरादों (अभिप्रायों) को नहीं जानते हो। तुम सब क्यों नहीं जानते हो? ऐसा नहीं है कि तुम लोग बस अभी इस समय नहीं जानते हो। इसके बजाय, आरम्भ से लेकर अंत तक तुम सब नहीं जानते हो कि इस मामले के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है। उन समयों में जब तू परमेश्वर की मनोवृत्ति को नहीं देख सकता है और नहीं जानता है, तो क्या तूने उस पर विचार किया है? क्या तूने उसकी खोज की है? क्या तूने उसके बारे में बताया है? नहीं! यह एक तथ्य को प्रमाणित करता है: तेरे विश्वास (जैसा तू मानता है) का परमेश्वर और सच्चा परमेश्वर आपस में सम्बन्धित नहीं हैं। तू, जो परमेश्वर पर विश्वास करता है, केवल अपनी स्वयं की इच्छा पर विचार करता है, एवं केवल अपने अपने अगुवों की इच्छा पर विचार करता है, और केवल परमेश्वर के वचन के सतही एवं सैद्धान्तिक अर्थ पर विचार करता है, परन्तु सचमुच में परमेश्वर की इच्छा को जानने एवं खोजने की कोशिश बिलकुल भी नहीं करता है। क्या यह ऐसा ही नहीं है? इस मामले का सार भयानक है! बहुत वर्षों से, मैं ने बहुत से लोगों को देखा है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यह विश्वास कौन सा आकार लेता है? कुछ लोग परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह खाली हवा है। इन लोगों के पास परमेश्वर के अस्तित्व के प्रश्नों के विषय में कोई उत्तर नहीं होता है क्योंकि वे परमेश्वर की उपस्थिति या अनुपस्थिति को महसूस नहीं कर सकते हैं या उससे अवगत नहीं होते हैं, साफ साफ देखने या समझने की तो बात ही छोड़ दो। अवचेतन रूप से, ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में नहीं है। कुछ अन्य परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह एक मनुष्य हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन सभी कार्यों को कार्य करने में असमर्थ होता है जिन्हें करने में वे असमर्थ होते हैं, और यह कि परमेश्वर को वैसा सोचना चाहिए जैसा वे सोचते हैं। इस व्यक्ति की परमेश्वर की परिभाषा यह है कि वह "एक अदृश्य एवं अस्पर्शनीय व्यक्ति" है। लोगों का एक समूह ऐसा भी है जो परमेश्वर में ऐसा विश्वास करता है मानो वह एक कठपुतली हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के पास कोई भावनाएं नहीं हैं, यह कि परमेश्वर एक मूरत है। जब किसी मसले से सामना होता है, तब परमेश्वर के पास कोई मनोवृत्ति, कोई दृष्टिकोण, एवं कोई विचार नहीं होता है; वह मनुष्य की दया पर निर्भर होता है। लोग बस वैसा ही विश्वास करते हैं जैसा वे विश्वास करना चाहते हैं। यदि वे उसे महान बनाते हैं, तो वह महान है, यदि वे उसे छोटा बना देते है, तो वह छोटा है। जब लोग पाप करते हैं और उन्हें परमेश्वर की दया की आवश्यकता होती है, परमेश्वर की सहनशीलता की आवश्यकता होती है, और परमेश्वर के प्रेम की आवश्यकता होती है, तो परमेश्वर को अपनी दया प्रदान करनी चहिए। इन लोगों ने अपने अपने मनों में एक परमेश्वर खोज लिया है, और इस परमेश्वर से अपनी मांगों को पूरा करवाया है और अपनी सारी अभिलाषाओं को संतुष्ट करवाया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कहाँ या कब, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह व्यक्ति क्या करता है, परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में एवं परमेश्वर में अपने विश्वास में वे इस कल्पना को स्वीकार करेंगे। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो विश्वास करते हैं कि जब वे परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर देते हैं उसके पश्चात् भी परमेश्वर उनका उद्धार कर सकता है। यह इसलिए है क्योंकि वे मानते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, परमेश्वर का स्वभाव धर्मी है, और यह कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग किस प्रकार परमेश्वर को चोट पहुंचाते हैं, परमेश्वर उनमें से किसी भी चोट का स्मरण नहीं करेगा। चूँकि मनुष्य की गलतियां, मनुष्य के अपराध, एवं मनुष्य की अनाज्ञाकारिता उस व्यक्ति के स्वभाव की क्षणिक अभिव्यक्तियां हैं, परमेश्वर लोगों को अवसर देगा, और उनके साथ सहनशील एवं धीरजवंत होगा। परमेश्वर उनसे अभी भी पहले के समान प्रेम करेगा। अतः उनके उद्धार की आशा अभी भी महान है। वास्तव में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति किस प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करता है, जब तक वे सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, तब तक परमेश्वर उनके प्रति नकारात्मक मनोवृत्ति रखता है। यह इसलिए है क्योंकि जब तक तू परमेश्वर पर विश्वास कर रहा है, तो शायद तू परमेश्वर के वचन की पुस्तक को संजोकर रखता है, तू प्रतिदिन इसका अध्ययन करता है, तू हर दिन इसे पढ़ता है, परन्तु तू वास्तविक परमेश्वर को अलग रख देता है, तू उसे खाली हवा के रूप में मानता है, एक व्यक्ति के रूप में मानता है, और तुममें से कुछ लोग बस उसे एक कठपुतली के रूप में मानते हो। मैं इसे इस प्रकार क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि जिस प्रकार मैं इसे देखता हूँ, इसकी परवाह किये बगैर कि तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है या किसी परिस्थितियों से आमना-सामना करते हैं, क्योंकि वे बातें जो तुम सब के अवचेतन मन में मौजूद होती हैं, वे बातें जो भीतर ही भीतर विकसित होती हैं—उनमें से किसी का भी सम्बन्ध परमेश्वर के वचन से या सत्य की खोज से नहीं होता है? तू केवल उसे ही जानता है जो तू स्वयं सोच रहा है, और जो तेरे स्वयं के दृष्टिकोण हैं, और फिर तेरे स्वयं के विचार को, और तेरे स्वयं के दृष्टिकोण को परमेश्वर के ऊपर ज़बरदस्ती थोपा जाता है। वे परमेश्वर के दृष्टिकोण बन जाते हैं, जिन्हें मानकों के रूप में उपयोग किया जाता है ताकि बिना डांवाडोल हुए उनके मुताबिक चला जाए। समय के बीतने के साथ, इस प्रकार आगे बढ़ना तुझे परमेश्वर से दूर और दूर करता जाता है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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