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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी
सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नवीनतम कथन

वह कार्य जो मनुष्य के दिमाग में होता है उसे बहुत ही आसानी से मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, इस धार्मिक संसार में पास्टर एवं अगुवे अपने कार्य को करने के लिए अपने वरदानों एवं पदों पर भरोसा रखते हैं। ऐसे लोग जो लोग लम्बे समय से उनका अनुसरण करते हैं वे उनके वरदानों के द्वारा संक्रमित हो जाएंगे और जो वे हैं उनमें से कुछ के द्वारा उन्हें प्रभावित किया जाएगा। वे लोगों के वरदानों, योग्यताओं एवं ज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, और वे कुछ अलौकिक कार्यों और अनेक गम्भीर अवास्तविक सिद्धान्तों पर ध्यान देते हैं (हाँ वास्तव में, इन गम्भीर सिद्धान्तों को हासिल नहीं किया जा सकता है)। वे लोगों के स्वभाव के परिवर्तनों पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं, किन्तु इसके बजाए वे लोगों के प्रचार एवं कार्य करने की योग्यताओं को प्रशिक्षित करने, और लोगों के ज्ञान एवं समृद्ध धार्मिक सिद्धान्तों को बेहतर बनाने के ऊपर ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे इस पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं कि लोगों के स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है या इस पर कि लोग सत्य को कितना समझते हैं। वे लोगों के मूल-तत्व के साथ अपने आपको नहीं जोड़ते हैं, और वे लोगों की सामान्य एवं असमान्य दशाओं को जानने की कोशिश तो बिलकुल भी नहीं करते हैं। वे लोगों की धारणाओं का विरोध नहीं करते हैं या उनकी धारणाओं को प्रगट नहीं करते हैं, और वे अपनी कमियों या भ्रष्टता में सुधार तो बिलकुल भी नहीं करते हैं। अधिकांश लोग जो उनका अनुसरण करते हैं वे अपने स्वाभाविक वरदानों के द्वारा सेवा करते हैं, और जो कुछ वे अभिव्यक्त करते हैं वह ज्ञान एवं अस्पष्ट धार्मिक सत्य है, जिनका वास्तविकता के साथ कोई नाता नहीं है और वे लोगों को जीवन प्रदान में पूरी तरह से असमर्थ हैं। वास्तव में, उनके कार्य का मूल-तत्व प्रतिभाओं का पोषण करना है, शून्य के साथ किसी व्यक्ति का पोषण करना है कि वह एक योग्य सेमेनरी स्नातक बन जाए जो बाद में काम एवं अगुवाई करने के लिए जाता है। परमेश्वर के हज़ार वर्षों के कार्य में क्या आप इसके किसी नियम का पता लगा सकते हैं? उस काम में जिसे मनुष्य करता है बहुत सारे नियम एवं प्रतिबन्ध होते हैं, और मानवीय मस्तिष्क बहुत ही कट्टर है। अतः जो कुछ मनुष्य अभिव्यक्त करता है वह उसके समस्त अनुभवों के अंतर्गत उसका थोड़ा सा ज्ञान एवं एहसास है। मनुष्य इसके आलावा कुछ भी अभिव्यक्त करने में असमर्थ है। मनुष्य के अनुभव या उसका ज्ञान उसके स्वाभाविक वरदानों या सहज प्रवृत्ति से उत्पन्न नहीं होते हैं; वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर की प्रत्यक्ष चरवाही से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के पास केवल इस चरवाही को स्वीकार करने का अंग है और उसके पास वह अंग नहीं है कि वह सीधे तौर पर यह अभिव्यक्त करे कि ईश्वरीयता क्या है। मनुष्य वह स्रोत बनने में असमर्थ है, वह केवल ऐसा पात्र हो सकता है जो स्रोत से पानी प्राप्त करता है; यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है, यह ऐसा अंग है जिसे किसी मानव के पास मानव प्राणी होने के नाते होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को ग्रहण करनेवाले उस अंग को खो देता है और मानवीय सहज प्रवृत्ति को खो देता है, तो वह व्यक्ति उसे भी खो देता है जो अत्यंत बहुमूल्य है, और सृजे गए मनुष्य के कर्तव्य को खो देता है। यदि किसी मनुष्य के पास कोई ज्ञान या परमेश्वर के वचन या उसके कार्य का अनुभव न हो, तो वह व्यक्ति अपने कर्तव्य को खो देता है, ऐसा कर्तव्य जिसे उसे एक सृजे गए प्राणी के रूप में निभाना चाहिए, और वह एक सृजे गए प्राणी के रूप में अपनी गरिमा को खो देता है। यह अभिव्यक्त करना परमेश्वर की सहज प्रवृत्ति है कि ईश्वरीयता क्या है, चाहे इसे देह में अभिव्यक्त किया गया है या सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा अभिव्यक्त किया गया है; यह परमेश्वर की सेवकाई है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के दौरान या उसके बाद अपने स्वयं के अनुभवों या ज्ञान (अर्थात्, जो वह है उसे अभिव्यक्त करता है) को अभिव्यक्त करता है; यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति और मनुष्य का कर्तव्य है, यह वही है जिसे मनुष्य को हासिल करना चाहिए। हालाँकि मनुष्य की अभिव्यक्ति उससे रहित है जिसे परमेश्वर अभिव्यक्त करता है, और जो कुछ मनुष्य अभिव्यक्त करता है उसमें बहुत सारे नियम होते हैं, फिर भी मनुष्य को उस कर्तव्य को निभाना होगा जिसे उसे निभाना चाहिए और उसे उस कार्य को करना है जिसे उसे अवश्य करना चाहिए। मनुष्य को अपने कर्तव्य को निभाने के लिए हर वह चीज़ करना चाहिए जो मानवीय रूप से सम्भव है, और उसमें थोड़ा सा भी सन्देह नहीं होना चाहिए।

अनेक वर्षों तक काम करने के पश्चात्, मनुष्य इन वर्षों के काम के कुछ अनुभव, साथ ही साथ संग्रहित किए गए बुद्धि एवं नियमों का सार निकालेगा। वह जिसने लम्बे समय से कार्य किया है वह जानता है कि पवित्र आत्मा के कार्य की गति का एहसास कैसे किया जाता है; वह जानता है कि पवित्र आत्मा कब कार्य करता है और कब नहीं करता है; वह जानता है कि बोझ उठाते समय भी किस प्रकार संगति करनी है, वह पवित्र आत्मा के कार्य की सामान्य स्थिति के विषय में और जीवन में लोगों की उन्नति की सामान्य दशा के विषय में जागरूक होता है। वह व्यक्ति ऐसा ही होता है जिसने सालों साल काम किया है और जो पवित्र आत्मा के कार्य को जानता है। ऐसे लोग जिन्होंने लम्बे समय तक काम किया है वे दृढ़ निश्चय से एवं बिना हड़बड़ाए बोलते हैं; यहाँ तक कि जब उनके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं होता है तब भी वे शांत रहते हैं। भीतर से, वे बिना किसी बेचैनी एवं तनाव के पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने के लिए निरन्तर प्रार्थना कर सकते हैं; वे कार्य करने में अनुभवी हैं। कोई व्यक्ति जिसने लम्बे समय तक कार्य किया है और उसके पास बहुत सारे सबक एवं अनुभव हैं उसके भीतर ऐसा बहुत कुछ होता है जो पवित्र आत्मा के कार्य को बाधित करता है; यह उसकी लम्बी-अवधि के कार्य की खामी है। कोई व्यक्ति जिसने बस अभी अभी कार्य करना आरम्भ किया है उसने मानवीय शिक्षाओं एवं अनुभव को प्राप्त नहीं किया है, पवित्र आत्मा किस प्रकार काम करता है उसके विषय में कुछ पता नहीं होता है। फिर भी, कार्य के पथक्रम के दौरान, वह धीरे धीरे यह एहसास करना सीख जाता है कि किस प्रकार पवित्र आत्मा कार्य करता है और इस बात के प्रति जागरूक हो जाता है कि पवित्र आत्मा के कार्य को पाने के लिए क्या करना है और दूसरों के जीवन के महत्वपूर्ण हिस्सों को स्पर्श करने के लिए क्या करना है। वह ऐसे सामान्य ज्ञान को जान पाता है जिसे उन लोगों को धारण करना चाहिए जो कार्य करते हैं। अधिक समय बीतने के साथ, वह काम करने के विषय में ऐसी बुद्धि एवं ऐसे साधारण ज्ञान को लगभग अपनी उंगलियों पर जान जाता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि वह काम करते समय इन्हें आसानी से इस्तेमाल करता है। फिर भी, जब पवित्र आत्मा अपने कार्य करने की रीति को बदल देता है, तो मनुष्य तब भी अपने पुराने कार्यकारी ज्ञान एवं पुराने कार्यकारी नियमों से चिपका रहता है और नई कार्यकारी गतिविधि के विषय में बहुत कम जानता है। सालों के कार्य और पवित्र आत्मा की उपस्थिति से भरपूर होने से एवं उसके मार्गदर्शन से उसे और भी अधिक कार्य करने के सबक एवं अनुभव प्राप्त हो जाते हैं। ऐसी चीज़ें उसे आत्मविश्वास से भर देती हैं जो घमण्ड नहीं होता। दूसरे शब्दों में, मनुष्य अपने स्वयं के कार्य से बहुत खुश होता है और उस साधारण ज्ञान से बहुत संतुष्ट होता है जिसे उसने पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में अर्जित किया होता है। विशेष रूप से, ऐसी चीज़ें जिन्हें अन्य लोगों ने अर्जित नहीं किया होता है एवं जिनका एहसास नहीं किया होता है वे उसे स्वयं के प्रति और भी अधिक आत्मविश्वास प्रदान करती हैं; ऐसा प्रतीत होता है कि पवित्र आत्मा के कार्य को उसके भीतर कभी बुझाया नहीं जा सकता है, जबकि अन्य लोग इस विशेष व्यवहार के योग्य नहीं होते हैं। केवल उसके जैसे लोग ही जिन्होंने सालों तक कार्य किया है और जिनके पास बड़ा उपयोगी मूल्य है वे ही इसका आनन्द लेने के योग्य होते हैं। ये चीज़ें उसके द्वारा पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करने में एक बड़ा अवरोध बन जाती हैं। भले ही वह नए कार्य को स्वीकार कर पाए, फिर भी यह एक रात की बात नहीं होती है। यह निश्चित है कि वह इसे ग्रहण करने से पहले कई घुमावों और मोड़ों से होकर गुज़रता है। जब उसकी धारणाओं से निपटा जाता है और उसके पुराने स्वभाव का न्याय किया जाता है केवल तभी इस स्थिति को धीरे धीरे मोड़ा जा सकता है। इन चरणों से होकर गुज़रे बिना, वह हार नहीं मानता है और आसानी से नई शिक्षाओं एवं कार्य को स्वीकार नहीं करता है जो उसकी पुरानी धारणाओं के साथ सामंजस्यता में नहीं हैं। मनुष्य में यह सबसे कठिन चीज़ है जिसके साथ निपटना पड़ता है, और इसे बदलना आसान नहीं है। यदि, एक कार्यकर्ता के रुप में, वह पवित्र आत्मा के कार्य की समझ को हासिल करने और उसकी गतिविधि का सार निकलने के योग्य है, साथ ही साथ यदि वह इस योग्य भी है कि उसके कार्य करने के अनुभव के द्वारा उसे सीमित नहीं किया गया है और यदि वह पुराने कार्य के प्रकाश में नए कार्य को स्वीकार करने के योग्य है, तो वह एक बुद्धिमान मनुष्य और योग्य कार्यकर्ता है। मनुष्य अपने कार्य करने के अनुभव का सार निकालने के योग्य हुए बिना ही अकसर कई सालों तक कार्य करता रहता है, या अपने कार्य करने के अनुभव एवं बुद्धि का सार निकलने के पश्चात् नए कार्य को स्वीकार करने से रुका रहता है और पुराने एवं नए काम को उचित रीति से समझ नहीं सकता है या उनसे सही रीति से बर्ताव नहीं कर सकता है। मनुष्यों को वास्तव में सम्भालना कठिन है! आप लोगों में से अधिकांश लोग ऐसे ही हैं। ऐसे लोग जिन्होंने वर्षों तक पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव किया है, उन्हें नए कार्य को स्वीकार करने में मुश्किल होती है, वे हमेशा धारणाओं से भरे हुए होते हैं जिन्हें छोड़ने में उन्हें कठिनाई होती है, जबकि ऐसा मनुष्य जिसने हाल ही में कार्य करना प्रारम्भ किया है उसमें कार्य करने के साधारण ज्ञान की कमी होती है और वह यह भी नहीं जानता है कि कुछ अत्यंत सरल मामलों को कैसे सम्भाला जाए। आप लोग वास्तव में बहुत ही कठिन हैं। ऐसे लोग जिनके पास कुछ पिछला अनुभव है वे इतने घमण्डी और अभिमानी हैं कि वे यह भूल गए हैं कि वे कहाँ से आए हैं। वे छोटे लोगों को हमेशा नीची दृष्टि से देखते हैं, फिर भी वे नए कार्य को स्वीकार करने असमर्थ हैं और वे उन धारणाओं को दूर करने में असमर्थ हैं जिन्हें उन्होंने कई सालों से एकत्रित किया है और सुरक्षित रखा है। हालाँकि वे अनजान युवा लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को थोड़ा बहुत स्वीकार करने के योग्य हैं और वे बहुत उत्साहित हैं, फिर भी वे हमेशा भ्रमित रहते हैं और यह नहीं जानते हैं कि जब समस्याओं से सामना होता है तो क्या करना है। यद्यपि वे उत्साहित तो हैं, फिर भी वे बहुत ही अनजान हैं। उनके पास पवित्र आत्मा के कार्य की थोड़ी सी समझ होती है और वे अपने जीवन में उसका उपयोग करने में असमर्थ होते हैं; यह सिर्फ सिद्धान्त है जो किसी भी काम का नहीं है। आप सभों के जैसे बहुत से लोग हैं; कितने लोग उपयोग के लायक हैं? कितने लोग ऐसे हैं जो ऐसा कार्य कर सकते हैं जो पवित्र आत्मा के योग्य हो? ऐसा प्रतीत होता है कि आप सभी अब तक बहुत ही आज्ञाकारी रहें हैं, परन्तु वास्तव में, आप लोगों ने अपनी धारणाओं को छोड़ा नहीं है, आप सब अभी भी बाइबल में खोज रहे हैं, अस्पष्टता में विश्वास करते हैं, या धारणाओं में भटक रहे हैं। ऐसा कोई भी नहीं है जो सावधानीपूर्वक आज के वास्तविक कार्य की खोज करता है या इसकी गहराई में जाता है। आप सभी अपनी पुरानी धारणाओं के साथ आज के कार्य को स्वीकार करते हैं। आप लोग ऐसे विश्वास से क्या प्राप्त कर सकते हैं? ऐसा कहा जा सकता है कि आप सब में बहुत सारी धारणाएं छिपी हुई हैं जिन्हें प्रगट नहीं किया गया है, और यह बिलकुल ऐसा है कि आप लोग उन्हें छिपाने के लिए सर्वोच्च कोशिश कर रहे हैं और उन्हें आसानी से प्रगट नहीं करते हैं। आप लोग नए कार्य को ईमानदारी से स्वीकार नहीं करते हैं और अपनी पुरानी धारणाओं को त्यागने की योजना नहीं बनाते हैं; आपके पास बहुत सारे, और बहुत ही दुखदाई जीवन दर्शन हैं। आप सभी अपनी पुरानी धारणाओं को नहीं छोड़ते हैं और अनिच्छा से नए कार्य के साथ व्यवहार करते हैं। आपके हृदय बहुत ही भयावह हैं, और आप सभी बस यों ही नए कार्य के चरणों को अपने हृदय में नहीं लेते हैं। क्या ऐसे रद्दी सामान के समान लोग सुसमाचार को फैलाने का काम कर सकते हैं? क्या आप लोग सम्पूर्ण विश्व में इसे फैलाने के काम का आरम्भ करने के योग्य हैं? आपके ये अभ्यास आपके स्वभाव को रूपान्तरित होने से और परमेश्वर को जानने से आप सभी को रोक रहे हैं। यदि आप सभी इसी प्रकार से चलते रहे, तो आप लोगों का निष्कासित होना तय है।

आप सभी को जानना होगा कि परमेश्वर के कार्य से मनुष्य के काम को कैसे अलग किया जाता है। आप मनुष्य के काम से क्या देख सकते हैं? मनुष्य के काम में मनुष्य के अनुभव के बहुत सारे तत्व होते हैं; मनुष्य जैसा अभिव्यक्त करता है वह वैसा ही होता है। परमेश्वर का स्वयं का कार्य भी उसे ही अभिव्यक्त करता है, परन्तु जो वह है वह मनुष्य से अलग है। मनुष्य जो कुछ है वह मनुष्य के अनुभव एवं जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव एवं सामना करता है, या जो उसके जीवन-दर्शन हैं), और विभिन्न वातावरणों में रहने वाले लोग विभिन्न प्राणियों को व्यक्त करते हैं। आपके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं और आप वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते एवं अनुभव करते हैं उसे जो कुछ आप अभिव्यक्त करते हैं उसमें देखा जा सकता है, जबकि आप देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते हैं कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार-तत्व से अच्छी तरह से परिचित है, वह सभी प्रकार के अभ्यास को प्रगट कर सकता है जो सब प्रकार के लोगों से सम्बन्धित होते हैं। वह मानव के भ्रष्ट स्वभाव एवं विद्रोही आचरण को भी बेहतर ढंग से प्रगट कर सकता है। वह सांसारिक लोगों के मध्य नहीं रहता है, परन्तु वह नश्वर मनुष्यों के स्वभाव और सांसारिक लोगों की समस्त भ्रष्टता से भली भांति अवगत है। वह ऐसा ही है। हालाँकि वह संसार के साथ व्यवहार नहीं करता है, फिर भी वह संसार के साथ व्यवहार करने के नियमों को जानता है, क्योंकि वह मानवीय स्वभाव को पूरी तरह से समझता है। वह वर्तमान एवं अतीत दोनों के आत्मा के कार्य के विषय में जानता है जिसे मनुष्य की आंखें नहीं देख सकती हैं जिसे मनुष्य के कान नहीं सुन सकते हैं। इसमें बुद्धि शामिल है जो जीवन का दर्शनशास्त्र एवं आश्चर्य नहीं है जिसकी गहराई नापना मनुष्य को कठिन जान पड़ता है। वह ऐसा ही है, लोगों के लिए खुला और साथ ही लोगों से छिपा हुआ भी है। जो कुछ वह अभिव्यक्त करता है वह ऐसा नहीं है जैसा एक असाधारण मनुष्य होता है, परन्तु अंतर्निहित गुण एवं आत्मा का अस्तित्व है। वह संसार भर में यात्रा नहीं करता है परन्तु उसके विषय में हर एक चीज़ को जानता है। वह "वन-मानुषों" के साथ सम्पर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं है, परन्तु वह ऐसे शब्दों को व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान मनुष्यों से ऊपर हैं। वह कम समझ एवं सुन्न लोगों के समूह के मध्य रहता है जिनके पास मानवता नहीं है और जो मानवीय परम्पराओं एवं जीवनों को नहीं समझते हैं, परन्तु वह मानवजाति से सामान्य मानवता को जीने के लिए कह सकता है, ठीक उसी समय वह मानवजाति के नीच एवं घटिया मनुष्यत्व को प्रगट करता है। यह सब कुछ वही है जो वह है, वह किसी भी मांस और लहू के व्यक्ति की अपेक्षा अधिक ऊँचा है। उसके लिए, यह जरुरी नहीं है कि वह उस काम को करने के लिए जिसे उसे करने की आवश्यक है जटिल, बोझिल एवं पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करे और भ्रष्ट मानवजाति के सार-तत्व को पूरी तरह से प्रगट करे। ऐसा पतित सामाजिक जीवन उसकी देह को उन्नत नहीं करता है। उसके कार्य एवं वचन मनुष्य केआज्ञालंघन को ही प्रगट करते हैं और संसार के साथ निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव एवं शिक्षाएं प्रदान नहीं करते हैं। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जांच पड़ताल करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। मनुष्य का खुलासा एवं न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लम्बे समय तक मनुष्य के आज्ञालंघन को जानने के बाद उसकी अधार्मिकता को प्रगट करने और मानवता के भ्रष्ट स्वभाव से घृणा करने के लिए है। वह कार्य जिसे परमेश्वर करता है वह मनुष्य पर अपने स्वभाव को पूरी तरह से प्रगट करने और अपने अस्तित्व को अभिव्यक्त करने के लिए है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है, यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसे मांस और लहू का व्यक्ति हासिल कर सकता है। परमेश्वर के कार्य के लिहाज से, मनुष्य यह नहीं बता सकता कि वह किस प्रकार का व्यक्ति है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के आधार पर भी उसे एक सृजे गए व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत करने में असमर्थ है। जो वह है उससे भी उसे एक सृजे गए प्राणी के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है। मनुष्य उसे केवल एक ग़ैर-मानव मान सकता है, किन्तु वह यह नहीं जानता है कि उसे किस श्रेणी में रखा जाए, अतः मनुष्य उसे परमेश्वर की श्रेणी में सूचीबद्ध रखने के लिए मजबूर है। मनुष्य के लिए ऐसा करना असंगत नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने लोगों के मध्य बहुत सारा कार्य किया है जिसे मनुष्य करने में असमर्थ है।

वह कार्य जिसे परमेश्वर करता है वह उसकी देह के अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है; वह कार्य जिसे मनुष्य करता है वह मनुष्य के अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अपने व्यक्तिगत अनुभव के विषय में बातचीत करता है। परमेश्वर सीधे तौर पर सत्य को अभिव्यक्त कर सकता है, जबकि मनुष्य केवल सत्य का अनुभव करने के पश्चात् ही उससे सम्बन्धित अनुभव को अभिव्यक्त कर सकता है। परमेश्वर के कार्य में कोई नियम नहीं होते हैं और यह समय या भौगोलिक अवरोधों के अधीन नहीं होता है। वह जो है उसे वह किसी भी समय, कहीं पर भी प्रगट कर सकता है। जो वह है उसे वह किसी भी समय एवं किसी भी स्थान पर व्यक्त कर सकता है। जैसा उसे अच्छा लगता है वह वैसा कार्य करता है। मनुष्य के काम में परिस्थितियां एवं सन्दर्भ होते हैं; अन्यथा, वह काम करने में असमर्थ होता है और वह परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान को व्यक्त करने या सत्य के विषय में अपने अनुभव को व्यक्त करने में असमर्थ होता है। आपको बस यह बताने के लिए उनके बीच के अन्तर की तुलना करनी है कि यह परमेश्वर का अपना कार्य है या मनुष्य का काम है। यदि स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया गया कोई कार्य नहीं है और केवल मनुष्य का ही काम है, तो आप जानेंगे कि मनुष्य की शिक्षाएं ऊँची हैं, किसी की भी क्षमता से परे हैं; उनके बोलने के अन्दाज़, चीज़ों को सम्भालने हेतु उनके सिद्धान्त और कार्य करने में उनका अनुभवी एवं स्थिर तरीका दूसरों की पहुंच से बाहर होते हैं। आप सभी इन लोगों की सराहना करते हैं जो ऊँचे मनुष्यत्व के हैं, परन्तु आप परमेश्वर के कार्य एवं वचनों से नहीं देख सकते हैं कि उसका मनुष्यत्व कितना ऊँचा है। इसके बजाए, वह साधारण है, और कार्य करते समय, वह सामान्य और वास्तविक है परन्तु वह नश्वर मनुष्यों के लिए अथाह है, इसलिए लोग उसके विषय में एक प्रकार का आदर भाव महसूस करते हैं। कदाचित् अपने कार्य में किसी व्यक्ति का अनुभव विशेष रूप से ऊँचा होता है, या उसकी कल्पना और तर्कशक्ति विशेष रूप से ऊँची होती है, और उसकी मानवता विशेष रूप से अच्छी होती है; ये केवल लोगों की प्रशंसा को ही अर्जित कर सकते हैं, परन्तु उनके भय-मिश्रित आदर या डर को जागृत नहीं कर सकते हैं। सभी लोग ऐसे लोगों की प्रशंसा करते हैं जिनके पास कार्य करने की क्षमता होती है और जिनके पास विशेष रुप से गहरा अनुभव होता है और जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, परन्तु वे कभी भी भय-मिश्रित आदर, मात्र प्रशंसा एवं ईर्ष्या को कभी निकाल नहीं सकते हैं। परन्तु ऐसे लोग जिन्होंने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है वे परमेश्वर की प्रशंसा नहीं करते हैं, बल्कि वे महसूस करते हैं कि उसका कार्य मानव की पहुंच से परे है और यह मनुष्य के लिए अथाह है, और यह कि यह तरोताज़ा और अद्भुत है। जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तो उसके विषय में उनका पहला ज्ञान यह है कि वह अथाह, बुद्धिमान एवं अद्भुत है, और वे अवचेतन रूप से उसका आदर करते हैं और उस कार्य के रहस्य का एहसास करते हैं जिसे उसने किया है, जो मनुष्य के दिमाग की पहुंच से परे है। लोग बस यही चाहते हैं कि वे परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने, और उसकी इच्छाओं को संतुष्ट करने के योग्य हो जाएं; वे उससे बढ़कर होने की इच्छा नहीं करते हैं, क्योंकि जो कार्य परमेश्वर करता है वह मनुष्य की सोच एवं कल्पना से परे चला जाता है और मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक कि मनुष्य भी अपनी स्वयं की कमियों को नहीं जानता है, जबकि परमेश्वर ने एक नए मार्ग को खोला है और वह मनुष्य को एक बिलकुल नए एवं अधिक खूबसूरत संसार में ले जाने के लिए आया है, जिससे मानवजाति ने नई प्रगति की है और उसकी एक नई शुरुआत हुई है। जो कुछ मनुष्य उसके लिए महसूस करता है वह सराहना नहीं है, या फिर, यह सिर्फ सराहना नहीं है। उनका अत्यंत गहरा अनुभव भय-मिश्रित आदर एवं प्रेम है, और उनकी भावना यह है कि परमेश्वर वास्तव में अद्भुत है। वह ऐसा कार्य करता है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ है, वह ऐसी बातें बोलता है जिसे बोलने में मनुष्य असमर्थ है। ऐसे लोग जिन्होंने उसके कार्य का अनुभव किया है वे हमेशा अवर्णनीय एहसास का अनुभव करते हैं। ऐसे लोग जिनके पास अत्यंत गहरे अनुभव हैं वे विशेष रूप से परमेश्वर से प्रेम करते हैं। वे हमेशा उसकी मनोरमता को महसूस करते हैं, और यह महसूस करते हैं कि उसका कार्य कितना बुद्धिमत्तापूर्ण, एवं कितना अद्भुत है, और इसके परिणामस्वरूप यह उनके मध्य असीमित सामर्थ उत्पन्न करता है। यह डर या कभी कभार का प्रेम एवं आदर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की करुणा एवं सहिष्णुता का गहरा एहसास है। हालांकि, ऐसे लोग जिन्होंने उसकी ताड़ना एवं न्याय का अनुभव किया है वे महसूस करते हैं कि वह प्रतापी एवं अनुल्लंघनीय है। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी जिन्होंने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है वे भी उसकी थाह पाने में असमर्थ हैं; सभी लोग जो सचमुच में उसका आदर करते हैं वे यह जानते हैं कि उसका कार्य लोगों की धारणाओं से मेल नहीं खाता है बल्कि हमेशा उनकी धारणाओं के विरुद्ध जाता है। उसे इस बात की आवश्यकता नहीं है कि लोगों के पास सम्पूर्ण प्रशंसा हो या वे उसके प्रति समर्पण के भाव को प्रगट करें, बल्कि वो चाहता है कि उनके अंदर सच्ची श्रद्धा एवं सच्चा समर्पण हो। उसके इतने सारे कार्य में, कोई भी व्यक्ति सच्चे अनुभव के साथ उसके उसके प्रति आदर महसूस करता है, जो सराहना से बढ़कर है। लोगों ने ताड़ना एवं न्याय के कार्य के कारण उसके स्वभाव को देखा है, और इसलिए वे अपने अपने हृदय से उसका आदर करते हैं। परमेश्वर श्रद्धा एवं नमन योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व एवं उसका स्वभाव उन सृजे गए प्राणियों के समान नहीं है, और वह उन सृजे गए प्राणियों से ऊपर है। परमेश्वर सृजा गया प्राणी नहीं है, और केवल वही आदर एवं समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है। अतः, सभी लोग जिन्होंने उसके कार्य का अनुभव किया है और सचमुच में उसे जानते हैं वे उसके प्रति आदर महसूस करते हैं। फिर भी, ऐसे लोग जो उसके विषय में अपनी धारणाओं को नहीं छोड़ते हैं, अर्थात्, ऐसे लोग जो उसे परमेश्वर ही नहीं मानते हैं, उनके अंदर उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं है, और हालाँकि वे उसका अनुसरण करते हैं फिर भी उन्हें जीता नहीं गया है; वे स्वभाव से ही अवज्ञाकारी लोग हैं। वह उस परिणाम को हासिल करने के लिए इस कार्य को करता है कि सभी सृजे गए प्राणी सृष्टिकर्ता का आदर कर सकें, उसकी आराधना कर सकें, और बिना किसी शर्त के उसकी प्रभुता के अधीन हो सकें। यह वह अंतिम परिणाम है जिसे हासिल करना उसके समस्त कार्य का उद्देश्य है। ऐसे लोग जिन्होंने ऐसे कार्य का अनुभव किया है यदि वे परमेश्वर का थोड़ा सा भी आदर नहीं करते हैं, यदि उनके अतीत का आज्ञालंघन बिल्कुल भी नहीं बदली है, तो इन लोगों को निश्चित तौर पर निष्कासित कर दिया जाता है। यदि परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति यह है कि वह केवल दूर से ही सराहना करता है या सम्मान प्रगट करता है और थोड़ा सा भी प्रेम नहीं करता है, तो यह वही स्तर है जहाँ कोई व्यक्ति पहुंचता है जिसके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और उस व्यक्ति में पूर्ण किए जाने की स्थितियों की कमी होती है। यदि इतना अधिक कार्य किसी व्यक्ति के सच्चे प्रेम को अर्जित करने में असमर्थ है, तो इसका अर्थ है उस व्यक्ति ने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है और वह असल में सत्य का अनुसरण नहीं करता है। कोई व्यक्ति जो परमेश्वर से प्रेम नहीं करता है वह सत्य से प्रेम नहीं करता है और इस प्रकार वह परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता है, और उसकी स्वीकृति को तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता है। ऐसे लोग, इसके बावजूद कि वे किस प्रकार पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, और इसके बावजूद कि वे किस प्रकार न्याय का अनुभव करते हैं, वे अभी भी परमेश्वर का आदर करने में असमर्थ हैं। ये ऐसे लोग हैं जो अपने स्वभाव को बदल नहीं सकते हैं, जिनका स्वभाव अत्यंत दुष्ट है। वे सभी जो परमेश्वर का आदर नहीं करते हैं, उन्हें निष्कासित कर दिया जाता है, वे दण्ड के योग्य हैं, और उन्हें ठीक उनके समान दण्ड दिया जाता है जो बुराई करते हैं, और वे उन लोगों से भी अधिक कष्ट सहते हैं जिन्होंने अधर्म के कामों को अंजाम दिया है।

अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है परमेश्वर के प्रकटन को उनके न्याय और ताड़ना में देखना केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? तीन चेतावनियाँ परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं पतरस ने यीशु को कैसे जाना परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे क्या आप जाग उठे हैं? एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग एक परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "बाइबल के विषय में" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "बाइबल के विषय में" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग एक केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग दो परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग दो

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