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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

पवित्र आत्मा का कार्य कुल मिलाकर लोगों को इस योग्य बनाना है कि वे लाभ प्राप्त कर सकें; यह कुल मिलाकर लोगों की उन्नति के विषय में है; ऐसा कोई कार्य नहीं है जो लोगों को लाभान्वित न करता हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सत्य गहरा है या उथला, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन लोगों की क्षमता किसके समान है जो सत्य को स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी पवित्र आत्मा करता है, यह सब लोगों के लिए लाभदायक है। परन्तु पवित्र आत्मा का कार्य सीधे तौर पर नहीं किया जाता है; इसे उन मनुष्यों से होकर गुज़रना होगा जो उसके साथ सहयोग करते हैं। यह केवल इसी रीति से होता है जिससे पवित्र आत्मा के कार्य के परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है। हाँ वास्तव में, जब यह पवित्र आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य है, तो इसमें मिलावट बिलकुल भी नहीं की जाती है; परन्तु जब यह मनुष्य के माध्यम का उपयोग करता है, तो यह अत्यंत मिश्रित हो जाता है और यह पवित्र आत्मा का मूल कार्य नहीं है। इस रीति से, सच्चाई विभिन्न मात्राओं में बदल जाती है। अनुयायी पवित्र आत्मा के मूल अर्थ को प्राप्त नहीं करते हैं परन्तु पवित्र आत्मा के कार्य और मनुष्य के अनुभव एवं ज्ञान के संयोजन को प्राप्त करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य का भाग जिसे अनुयायियों के द्वारा प्राप्त किया जाता है वह सही होता है। मनुष्य का अनुभव एवं ज्ञान जिन्हें प्राप्त किया जाता है वे भिन्न होते हैं क्योंकि कार्यकर्ता भिन्न होते हैं। जब एक बार कार्यकर्ताओं को पवित्र आत्मा का अद्भुत प्रकाशन एवं मार्गदर्शन प्राप्त होता है, तो वे इसके बाद इस अद्भुत प्रकाशन एवं मार्गदर्शन के आधार पर अनुभव करते हैं। इन अनुभवों के अंतर्गत मनुष्य का मस्तिष्क एवं अनुभव, साथ ही साथ मानवता का अस्तित्व भी मिला हुआ होता है, जिसके बाद वे उस ज्ञान को हासिल करते हैं या उन चीज़ों को देखते हैं जिन्हें उन्हें देखना चाहिए। जब मनुष्य सत्य का अनुभव कर लेता है उसके पश्चात् यह अभ्यास का मार्ग है। अभ्यास का यह मार्ग हमेशा एक समान नहीं होता है क्योंकि लोगों के पास भिन्न भिन्न अनुभव होते हैं और ऐसी चीज़ें जिनका लोग अनुभव करते हैं वे भिन्न भिन्न होती हैं। इस रीति से, पवित्र आत्मा का वही अद्भुत प्रकाशन भिन्न भिन्न ज्ञान एवं अभ्यास में परिणित होता है क्योंकि ऐसे लोग जिन्होंने अद्भुत प्रकाशन को प्राप्त किया है वे भिन्न भिन्न लोग हैं। कुछ लोग अभ्यास के दौरान छोटी छोटी ग़लतियां करते हैं जबकि कुछ लोग बड़ी बड़ी ग़लतियां करते हैं, और कुछ लोग और कुछ नहीं सिर्फ ग़लतियां ही करते हैं। यह इसलिए है क्योंकि लोगों की समझने की योग्यताएं भिन्न होती हैं और इसलिए क्योंकि उनकी वास्तविक क्षमता भी भिन्न होती है। किसी सन्देश को सुनने के बाद कुछ लोग इसे इस तरह से समझते हैं, और एक सच्चाई को सुनने के बाद कुछ लोग इसे उस तरह से समझते हैं। कुछ लोग थोड़ा सा भटक जाते हैं; और कुछ लोग सत्य के अर्थ को बिलकुल भी समझ नहीं पाते हैं। इसलिए, चाहे कोई इसे जैसे भी समझे वह इस प्रकार ही दूसरों की अगुवाई करेगा; यह बिलकुल सच है, क्योंकि उसका कार्य मात्र उसके अस्तित्व को अभिव्यक्त कर रहा है। ऐसे लोग जिनकी अगुवाई उन लोगों के द्वारा की जाती है उनके पास भी सत्य की सही समझ होती है। भले ही ऐसे लोग हैं जिनकी समझ में त्रुटियां होती हैं, फिर भी उनमें से बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं, और सभी लोगों में त्रुटियां नहीं होती हैं। ऐसे लोग जिनकी अगुवाई उन लोगों के द्वारा की जाती है जिनमें सत्य की समझ को लेकर त्रुटियां होती हैं तो वे निःसन्देह त्रुटिपूर्ण होते हैं। ये लोग वचन के प्रत्येक एहसास में ग़लत होंगे। अनुयायियों के मध्य सत्य को समझने की मात्रा वृहद रूप से कार्यकर्ताओं पर निर्भर होती है। हाँ वास्तव में, ऐसा सत्य जो परमेश्वर से है वह त्रुटिहीन है, और पूरी तरह से निश्चित होता है। परन्तु, कार्यकर्ता पूरी तरह से सही नहीं होते हैं और ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि वे पूरी तरह से विश्वसनीय हैं। यदि कार्यकर्ताओं के पास सत्य का अभ्यास करने के लिए एक तरीका होता जो काफी व्यावहारिक है, तो अनुयायियों के पास भी अभ्यास का एक तरीका होता। यदि कार्यकर्ताओं के पास सत्य का अभ्यास करने के लिए कोई तरीका नहीं होता परन्तु केवल सिद्धान्त ही होता, तो अनुयायियों के पास कोई वास्तविकता नहीं होती। अनुयायियों की क्षमता एवं स्वभाव जन्म से ही तय होते हैं और उन्हें कार्यकर्ताओं के साथ जोड़ा नहीं जाता है। परन्तु जिस हद तक अनुयायी सत्य को समझते हैं और परमेश्वर को जानते हैं यह उन कार्यकर्ताओं पर निर्भर होता है (यह केवल कुछ लोगों के लिए ही ऐसा है)। चाहे कोई कार्यकर्ता जिसके भी समान हो, वे अनुयायी जिनकी वह अगुवाई करता है उनको ऐसा ही होना होगा। जो कुछ एक कार्यकर्ता अभिव्यक्त करता है वह उसका स्वयं का अस्तित्व है, और यह बिना किसी सन्देह के है। वे मांगें जिन्हें वह अपने अनुयायियों से करता है वे ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें वह स्वयं प्राप्त करना चाहता है या जिसे प्राप्त करने के लिए वह योग्य है। अधिकांश कार्यकर्ता जो कुछ वे स्वयं करते हैं उसके आधार पर अपने अनुयायियों से मांग करते हैं, इसके बावजूद ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जिन्हें लोग बिलकुल भी हासिल नहीं कर सकते हैं। जिसे लोग प्राप्त नहीं कर सकते हैं वह उनके प्रवेश में बाधा बन जाती है।

ऐसे लोगों के कार्य में बहुत ही कम ग़लतियां होती हैं जो कांट-छांट एवं न्याय से होकर गुज़र चुके हैं। उनके कार्य की अभिव्यक्ति बहुत ही अधिक सटीक होती है। ऐसी लोग जो कार्य करने के लिए अपनी साधारणता पर निर्भर होते हैं वे काफी बड़ी ग़लतियां करते हैं। ऐसे लोग जो सिद्ध नहीं हैं उनके कार्य में बहुत ही अधिक साधारणता होती है, जो पवित्र आत्मा के कार्य में बड़ा अवरोध उत्पन्न करता है। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी जिनके पास स्वभाविक रूप से कार्य करने की स्थितियां होती हैं उन्होंने भी परमेश्वर के कार्य को सम्पन्न करने के योग्य होने के लिए कांट-छांट एवं न्याय का अनुभव किया होगा। यदि वे ऐसे न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, तो चाहे वे कितना भी अच्छा काम करें, यह सत्य के सिद्धान्तों के साथ मेल नहीं खा सकता है और यह पूरी तरह से साधारणता एवं मानवीय भलाई है। परमेश्वर का कार्य करने में, ऐसे लोग जो कांट-छांट एवं न्याय से होकर गुज़रे हैं उनका कार्य उन लोगों के कार्य की अपेक्षा अधिक सटीक होता है जिनका न्याय नहीं किया गया है। ऐसे लोग जो न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं वे मानव शारीर एवं विचारों के सिवाए और कुछ भी व्यक्त नहीं करते हैं, जिसमें बहुत सारी मानवीय बुद्धि एवं स्वाभाविक प्रतिभाएं मिली हुई होती हैं। यह परमेश्वर के कार्य के विषय में मनुष्य की सटीक अभिव्यक्ति नहीं है। ऐसे लोग जो उनका अनुसरण करते हैं उन्हें उनकी स्वाभाविक क्षमता के द्वारा उनके सामने लाया जाता है। क्योंकि वे बहुत सारी देखी हुई बातों और मनुष्य के अनुभवों को अभिव्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल अर्थ से लगभग असम्बद्ध होते है, और इससे बहुत दूर भटक जाते हैं, इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख लाने में असमर्थ है, परन्तु अपने सामने लाने में समर्थ है। अतः ऐसे लोग जो न्याय एवं ताड़ना से होकर नहीं गुज़रे हैं वे परमेश्वर के कार्य को सम्पन्न करने में असमर्थ हैं। एक योग्य कार्यकर्ता का कार्य लोगों को सही मार्ग पर ला सकता है और उन्हें सत्य की गहराई में जाने की अनुमति देता है। जो कार्य वह करता है वह लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके साथ ही, जो कार्य वह करता है वह एक व्यक्ति से लेकर दूसरे व्यक्ति तक भिन्न होता है और यह नियमों से बंधा हुआ नहीं होता है, और यह लोगों को छुटकारा एवं स्वतन्त्रता पाने की अनुमति देता है। इसके अतिरिक्त, वे धीरे धीरे जीवन में आगे बढ़ सकते हैं, और वे लगातार सत्य की गहराई में जा सकते हैं। एक अयोग्य कार्यकर्ता का कार्य अधूरा होता है; उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह केवल लोगों को नियमों के अंतर्गत ला सकता है; वह लोगों से जो मांग करता है वह एक व्यक्ति से लेकर दूसरे व्यक्ति तक भिन्न नहीं होता है; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं कर सकता है। इस प्रकार के कार्य में, बहुत सारे नियम एवं बहुत सारे सिद्धान्त होते हैं, और ये लोगों को वास्तविकता में या जीवन में बढ़ोत्तरी के सामान्य अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। यह केवल लोगों को कुछ बेकार नियमों में चुपचाप बने रहने के योग्य बना सकता है। इस प्रकार का मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह आपकी अगुवाई करता है ताकि आप उसके समान बन जाएं; जो उसके पास है और जो वह है वह आपको उसमें ला सकता है। अनुयायियों के लिए यह परखना कि अगुवे योग्य हैं या नहीं, मुख्य बात है कि वे उस मार्ग को जिसकी वे अगुवाई करते हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखें, और इस बात को देखें कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धान्तों को प्राप्त करते हैं या नहीं, और वे उनके रूपान्तरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के मार्गों को प्राप्त करते हैं या नहीं। आपको विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के मध्य अन्तर करना चाहिए; आपको एक मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह आपके प्रवेश के मामले में बुरा प्रभाव डाल सकता है। यदि आप यह अन्तर करने में असमर्थ हैं कि किस व्यक्ति के नेतृत्व के पास एक मार्ग है और किस व्यक्ति के पास नहीं है, आपको धोखा दिया जाएगा। इन सबका आपके स्वयं के जीवन से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। ऐसे लोग जो सिद्ध नहीं हैं उनके कार्य में ऐसा बहुत कुछ है जो साधारण है; इसमें बहुत ही अधिक मानवीय इच्छा मिली हुई है। उनका अस्तित्व साधारण है, जिसके साथ वे पैदा हुए हैं, और व्यवहार किया जाने के पश्चात् वह जीवन नहीं है या रूपान्तरित होने के पश्चात् वह वास्तविकता नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति किस प्रकार उनका भरण-पोषण कर सकता हैं जो जीवन का अनुसरण कर रहे हैं? मनुष्य का मूल जीवन उसकी स्वाभाविक बुद्धिमत्ता या प्रतिभा है। इस प्रकार की बुद्धिमत्ता या प्रतिभा मनुष्य के प्रति परमेश्वर की यथार्थ मांगों से काफी दूर है। यदि किसी मनुष्य को सिद्ध नहीं किया गया है और उसके भ्रष्ट स्वभाव की कांट-छांट नहीं की गई है और उसके साथ निपटा नहीं गया है, तो जो कुछ वह अभिव्यक्त करता है और उस सच्चाई के बीच एक बहुत बड़ा अन्तर होगा; यह अस्पष्ट चीज़ों जैसे उसकी कल्पना एवं एक तरफा अनुभव, इत्यादि के साथ घुल मिल जाएगा। इसके अतिरिक्त, इसके बावजूद कि वह किस प्रकार कार्य करता है, लोग महसूस करते हैं कि यहाँ सामान्यतया कोई लक्ष्य या कोई सत्य नहीं है जो सभी लोगों के प्रवेश के लिए उपयुक्त हो। अधिकांश मांगें जिन्हें लोगों से की जाती है वह यह है कि उनसे वह करने की अपेक्षा की जाती है जो उनके बस के बाहर है, अर्थात् एक बत्तख को उसके पिंजरे की मध्यदंडिका में बैठाना। यह मनुष्य की इच्छा शक्ति का कार्य है। मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव, उसके विचार एवं धारणाएं उसके शरीर के सभी भागों में हर जगह फैल गई है। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने के लिए सहज ज्ञान के साथ पैदा नहीं हुआ है, न ही उसके पास सीधे तौर पर सत्य को समझने के लिए सहज ज्ञान है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को साथ लेकर, जब इस प्रकार का प्राकृतिक व्यक्ति कार्य करता है, तो क्या यह रुकावट नहीं है? परन्तु ऐसा मनुष्य जिसे सिद्ध किया गया है उसके पास सत्य का अनुभव होता है जिसे लोगों को समझना चाहिए, और उनके भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान होता है, ताकि उसके कार्य की अस्पष्ट एवं अवास्तविक चीज़ें धीरे धीरे कम हो जाएं, जिसका अर्थ है कि उसके द्वारा अभिव्यक्त की गई सच्चाई और भी अधिक सटीक बन जाए और साथ ही वास्तविक हो जाए। मनुष्य के दिमाग के विचार विशेष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य को बाधित करते हैं। मनुष्य के पास मुद्दों से निपटने के लिए एक समृद्ध कल्पना एवं न्यायसंगत तर्क एवं पुराने अनुभव होते हैं। यदि ये कांट-छांट एवं सुधार से होकर नहीं गुज़रते हैं, तो वे सभी कार्य में बाधाएं हैं। इसलिए मनुष्य का काम सबसे सटीक स्तर तक नहीं पहुंच सकता है, विशेषकर ऐसे लोगों का कार्य जो सिद्ध नहीं हैं।

मनुष्य के काम में एक दायरा एवं सीमाएं होती हैं। कोई व्यक्ति केवल एक ही निश्चित अवस्था के कार्य को करने के लिए योग्य होता है और सम्पूर्ण युग के कार्य को नहीं कर सकता हैं - अन्यथा, वह लोगों को नियमों के भीतर ले जाएगा। मनुष्य के काम को केवल एक विशेष समय या अवस्था पर ही लागू किया जा सकता है। यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य के अनुभव में एक दायरा होता है। कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के साथ मनुष्य के काम की तुलना नहीं कर सकता है। मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य के विषय में उसके समस्त ज्ञान को एक विशेष दायरे में लागू किया जाता है। आप नहीं कह सकते हैं कि वह मार्ग जिस पर कोई मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा की इच्छा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा के द्वारा ही प्रकाशित किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से भरा नहीं जा सकता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें मनुष्य अनुभव कर सकता है वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय मस्तिष्क में विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकती हैं। वे सभी जिनके पास व्यावहारिक अभिव्यक्ति है वे इस सीमा के अंतर्गत अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा ही पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन सामान्य मानवीय जीवन का एक अनुभव है, और यह ऐसी रीति से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से दूर हट जाता है। अपने मानवीय जीवन को जीने के आधार पर वे उस सच्चाई का अनुभव करते हैं जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकाशित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, यह सत्य एक व्यक्ति से लेकर दूसरे व्यक्ति तक भिन्न होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की दशा से सम्बन्धित होती है। कोई व्यक्ति केवल यह कह सकता है कि वह मार्ग जिस पर वे चलते हैं वह किसी मनुष्य का सामान्य जीवन है जो सत्य का अनुसरण कर रहा है, और यह कि यह वह मार्ग जिस पर किसी साधारण व्यक्ति के द्वारा चला गया है जिसके पास पवित्र आत्मा का अद्भुत प्रकाशन है। आप नहीं कह सकते हैं कि वह मार्ग जिस पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिसे पवित्र आत्मा द्वारा लिया गया है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि ऐसे लोग जो अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते हैं, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी एक समान नहीं होता है। इसके साथ ही, क्योंकि ऐसे वातावरण जिनका वे अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएं एक समान नहीं होती हैं, उनके मस्तिष्क एवं विचारों के मिश्रण के कारण, उनके अनुभव विभिन्न मात्राओं तक मिश्रित हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सच्चाई को समझ पाता है। सत्य के वास्तविक अर्थ के विषय में उनकी समझ पूर्ण नहीं है और यह इसका केवल एक या कुछ ही पहलु है। वह दायरा जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य के द्वारा उस सच्चाई का अनुभव किया जाता है वह हमेशा ही व्यक्तित्वों की विभिन्न परिस्थितियों पर आधारित होता है और इसलिए यह एक समान नहीं होता है। इस रीति से, वह ज्ञान जिसे विभिन्न लोगों के द्वारा उसी सच्चाई से अभिव्यक्त किया जाता है वह एक समान नहीं है। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य के अनुभव में हमेशा सीमाएं होती हैं और यह पवित्र आत्मा की इच्छा को पूरी तरह से दर्शा नहीं सकता है, और मनुष्य के काम को परमेश्वर के कार्य के समान महसूस नहीं किया जा सकता है, भले ही जो कुछ मनुष्य के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है वह परमेश्वर की इच्छा से नज़दीकी से सम्बन्ध रखता हो, भले ही मनुष्य का अनुभव सिद्ध करनेवाले कार्य के बेहद करीब हो जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा किया जाना है। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, और उस कार्य को कर सकता है जिसे परमेश्वर ने उसे सौंपा है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन उस ज्ञान को और उन सच्चाईयों को व्यक्त कर सकता है जिन्हें उसने अपने व्यक्तिगत अनुभवों से अर्जित किया है। मनुष्य अयोग्य है और उसके पास ऐसी स्थितियां नहीं हैं कि वह पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति का साधन बने। वह यह कहने का हकदार नहीं है कि मनुष्य का काम परमेश्वर का कार्य है। मनुष्य के पास मनुष्य के कार्य करने के सिद्धान्त होते हैं, और सभी मनुष्यों के पास विभिन्न अनुभव होते हैं और उनके पास अलग अलग स्थितियां होती हैं। मनुष्य का काम पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन उसके सभी अनुभवों को सम्मिलित करता है। ये अनुभव केवल मनुष्य के अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व या पवित्र आत्मा की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। इसलिए, वह मार्ग जिस पर मनुष्य के द्वारा चला जाता है उसे ऐसा मार्ग नहीं कहा जा सकता है जिस पर पवित्र आत्मा के द्वारा चला गया है क्योंकि मनुष्य का काम परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और मनुष्य का काम एवं मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा की सम्पूर्ण इच्छा नहीं है। मनुष्य के काम का झुकाव नियम के अंतर्गत आने के लिए होता है, और उसके कार्य करने के तरीके को आसानी से एक सीमित दायरे में सीमित किया जा सकता है और यह स्वतन्त्र रूप से लोगों की अगुवाई करने में असमर्थ है। अधिकांश अनुयायी एक सीमित दायरे में जीवन बिताते हैं, और उनके अनुभव करने का मार्ग भी इसके दायरे तक ही सीमित होता है। मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है; उसके कार्य करने का तरीका भी कुछ प्रकारों तक ही सीमित होता है और पवित्र आत्मा के कार्य से या स्वयं परमेश्वर के कार्य से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है - यह इसलिए है क्योंकि अंत में मनुष्य का अनुभव सीमित होता है। फिर भी परमेश्वर अपना कार्य करता है, इसके लिए कोई नियम नहीं है; फिर भी वह पूर्ण होता है, यह एक तरीके पर सीमित नहीं है। परमेश्वर के कार्य के लिए किसी भी प्रकार के नियम नहीं हैं, उसके समस्त कार्य को स्वतन्त्र रूप से मुक्त किया गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य उसका अनुसरण करते हुए कितना समय बिताता है, वे उसके कार्य करने के तरीकों के विषय में किसी भी प्रकार के नियमों का सार नहीं निकल सकते हैं। हालाँकि उसका कार्य सैद्धांतिक है, और इसे हमेशा नए तरीकों से किया जाता है और इसमें हमेशा नई नई प्रगति होती रहती है, जो मनुष्य की पहुंच से परे है। एक समय काल के दौरान, हो सकता है कि परमेश्वर के पास भिन्न भिन्न प्रकार के कार्य और भिन्न भिन्न प्रकार की अगुवाई हो, जो लोगों को अनुमति देती हो कि उनके पास हमेशा नए नए प्रवेश एवं नए नए परिवर्तन हों। आप उसके कार्य के नियमों का पता नहीं लगा सकते हैं क्योंकि वह हमेशा नए तरीकों से कार्य कर रहा है। केवल इस रीति से ही परमेश्वर के अनुयायी नियमों के अंतर्गत नहीं आते हैं। स्वयं परमेश्वर का कार्य हमेशा लोगों की धारणाओं से परहेज करता है और उनकी धारणाओं का विरोध करता है। ऐसे लोग जो एक सच्चे हृदय के साथ उसके पीछे पीछे चलते हैं और उसका अनुसरण करते हैं केवल उनका स्वभाव ही रूपान्तरित हो सकता है और वे किसी भी प्रकार के नियमों के अधीन हुए बिना या किसी भी प्रकार की धार्मिक धारणाओं के द्वारा अवरुद्ध हुए बगैर स्वतन्त्रता से जीवन जी सकते हैं। ऐसी मांगें जिन्हें मनुष्य का काम लोगों से करता है वे उनके स्वयं के अनुभव और उस चीज़ पर आधारित होते हैं जिन्हें वह स्वयं हासिल कर सकता है। इन अपेक्षाओं का स्तर एक निश्चित दायरे के भीतर सीमित होता है, और अभ्यास के तरीके भी बहुत ही सीमित होते हैं। इस प्रकार अनुयायी सीमित दायरे के भीतर अवचेतन रूप से जीवन बिताते हैं; जैसे जैसे समय गुज़रता है, वे नियम एवं रीति रिवाज बन जाते हैं। यदि एक समय अवधि के कार्य की अगुवाई ऐसे व्यक्ति के द्वारा की जाती है जो परमेश्वर के व्यक्तिगत सिद्धिकरण से होकर नहीं गुज़रा है और जिसने न्याय को प्राप्त नहीं किया है, तो उसके सभी अनुयायी कट्टर धर्मावलम्बी बन जाएंगे और परमेश्वर का विरोध करने में माहिर हो जाएंगे। इसलिए, यदि कोई योग्य अगुवा है, तो उस व्यक्ति को न्याय से होकर गुज़ारना होगा और सिद्धिकरण को स्वीकार करना होगा। ऐसे लोग जो न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, हालाँकि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, फिर भी वे केवल अस्पष्ट एवं अवास्तविक चीज़ों को ही व्यक्त करते हैं। समय के साथ, वे लोगों को अस्पष्ट एवं अलौकिक नियमों की ओर ले जाएंगे। वह कार्य जिसे परमेश्वर अंजाम देता है वह मनुष्य की देह के साथ मेल नहीं खाता है; यह मनुष्य के विचारों के साथ मेल नहीं खाता है परन्तु मनुष्य की धारणाओं का विरोध करता है; यह धुंधले धार्मिक रंग के साथ मिश्रित नहीं होता है। उसके कार्य के परिणामों को ऐसे व्यक्ति के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है जिसे उसके द्वारा सिद्ध नहीं किया गया है और वे मनुष्य की सोच से परे हैं।

अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग दो) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग एक) भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए क्या आप जाग उठे हैं? देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार तीन चेतावनियाँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है पतरस ने यीशु को कैसे जाना "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन

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