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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

तुम लोगों को अवश्य परमेश्वर के कार्य के दर्शन को जान लेना चाहिए और उसके कार्य के सामान्य निर्देशों को समझ लेना चाहिए। यह एक सकारात्मक तरीके से प्रवेश है। एक बार जब तुम दर्शन के सत्यों में परिशुद्धता से निपुण हो जाते हो, तो तुम्हारा प्रवेश सुरक्षित बन जाता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसका कार्य कैसे बदलता है, तुम अपने हृदय में अडिग बने रहोगे, दर्शन के बारे में स्पष्ट रहोगे, और तुम्हारे पास तुम्हारे प्रवेश और तुम्हारी तलाश के लिए एक लक्ष्य होगा। इस तरह से, तुम्हारे भीतर का समस्त अनुभव और ज्ञान और गहराई से बढ़ेगा और अधिक परिष्कृत हो जाएगा। एक बार जब तुम बड़ी तस्वीर को उसकी सम्पूर्णता में समझ जाते हो, तो तुम जीवन में कोई नुकसान नहीं भुगतोगे, और तुम खोओगे नहीं। यदि तुम कार्यों के इन चरणों को नहीं जान लेते हो, तो तुम उनमें से प्रत्येक पर नुकसान भुगतोगे। तुम में मात्र कुछ ही दिनों में नाटकीय रूप से सुधार नहीं हो सकता है, और तुम यहाँ तक कि कुछ सप्ताहों में भी सही मार्ग को पकड़ने में समर्थ नहीं हो सकोगे। क्या यह तुम्हारी प्रगति को रोक नहीं रहा है? एक सकारात्मक तरीके से और ऐसे अभ्यासों से अधिक प्रवेश है जिन में तुम लोगों को अवश्य निपुणता प्राप्त करनी चाहिए, और इसलिए भी उसके कार्य के दर्शन के अनेक बिन्दुओं को अवश्य समझना चाहिए, जैसे कि विजय के उसके कार्य का महत्व, भविष्य में सिद्ध बनाए जाने का मार्ग, परीक्षणों और क्लेश के अनुभवों के माध्यम से क्या अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए, न्याय और ताड़ना का महत्व, पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत, और सिद्धता और विजय के सिद्धांत। ये सभी दर्शन के सत्य हैं। शेष व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण, और साथ ही भविष्य की गवाही हैं। ये भी दर्शन से संबंधित सत्य हैं, और सर्वाधिक मौलिक, और साथ ही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान में, तुम लोगों के पास प्रवेश करने और अभ्यास करने के लिए बहुत कुछ है, और यह अब बहुस्तरीय और अधिक विस्तृत है। यदि तुम्हारे पास इन सत्यों का कोई ज्ञान नहीं है, तो यह सबूत है कि तुम ने अभी प्रवेश नहीं किया है। अधिकांश समय, मनुष्य का सत्य का ज्ञान अत्यधिक उथला है; मनुष्य कुछ बुनियादी सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ है और नहीं जानता है कि मामूली मामलों को भी कैसे सँभाला जाए। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होना अपने विद्रोहीपन के स्वभाव की वजह से है, और इसलिए है क्योंकि आज का उसका ज्ञान बहुत ही सतही और एकतरफ़ा है। इस प्रकार, मनुष्य को सिद्ध बनाना आसान कार्य नहीं है। तुम्हारी विद्रोहशीलता बहुत ज़्यादा है, और तुम अपने पुराने अहम् को बहुत ज़्यादा बनाए रखते हो; तुम सत्य के पक्ष में खड़े रहने में असमर्थ हो, और यहाँ तक कि तुम सबसे स्पष्ट सत्यों का अभ्यास करने में भी असमर्थ हो। ऐसे मनुष्यों को नहीं बचाया जा सकता है और ये वे लोग हैं जिन्हें जीता नहीं गया है। यदि तुम्हारे प्रवेश में न विस्तार है और न ही उसका कोई उद्देश्य है, तो तुम तक विकास बहुत ही धीमी गति से आएगा। यदि तुम्हारे प्रवेश में वास्तविकता का ज़रा सा भी अंश नहीं है, तो तुम्हारी तलाश व्यर्थ हो जाएगी। यदि तुम सत्य के सार से अनभिज्ञ हो, तो तुम अपरिवर्तित रहोगे। मनुष्य के जीवन में वृद्धि और उसके स्वभाव में परिवर्तन सभी वास्तविकता में प्रवेश करने के द्वारा और, इससे भी अधिक, विस्तृत अनुभवों में प्रवेश करने के द्वारा प्राप्त होते हैं। यदि तुम्हारे प्रवेश के दौरान तुम्हारे पास कई विस्तृत अनुभव हैं, और तुम्हारे पास अधिक वास्तविक ज्ञान और प्रवेश है, तो तुम्हारा स्वभाव शीघ्रता से बदल जाएगा। भले ही वर्तमान में तुम अभ्यास में अधिक प्रबुद्ध नहीं हो, तब भी तुम्हें कम से कम कार्य के दर्शन के बारे में प्रबुद्ध अवश्य होना चाहिए। यदि नहीं, तो तुम प्रवेश करने में असमर्थ होगे, और तुम ऐसा तब तक करने में असमर्थ रहोगे जब तक कि पहले तुम्हें सत्य का ज्ञान न हो जाए। यदि पवित्र आत्मा तुम्हें तुम्हारे अनुभव में प्रबुद्ध करती है केवल तभी तुम सत्य की अधिक गहरी समझ प्राप्त करोगे और अधिक गहराई से प्रवेश करोगे। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य को अवश्य जानना चाहिए।

आरंभ में मानवजाति के सृजन के बाद, ये इस्राएली ही थे जिन्होंने कार्य के आधार के रूप में काम किया, और सम्पूर्ण इस्राएल पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का आधार था। यहोवा का कार्य मनुष्य का सीधे नेतृत्व करना और व्यवस्थाओं की स्थापना करके मनुष्य की चरवाही करना था ताकि मनुष्य एक सामान्य जीवन जी सके और पृथ्वी पर सामान्य रूप से यहोवा की आराधना कर सके। व्यवस्था के युग में परमेश्वर एक ही था जिसे मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता था और न ही छुआ जा सकता था। वह केवल शैतान द्वारा पहले भ्रष्ट किए गए मनुष्य की अगुवाई करता था, और वह वहाँ उन मनुष्य को निर्देश देने और उनकी चरवाही करने के लिए था, इसलिए जो वचन उसने कहे वे केवल विधान, अध्यादेश और मनुष्य के रूप में जीवन जीने का सामान्य ज्ञान थे, और उस सत्य के बिल्कुल नहीं थे जो मनुष्य को जीवन प्रदान करता है। उसकी अगुवाई में इस्राएली वे नहीं थे जिन्हें शैतान के द्वारा गहराई तक भ्रष्ट किया गया था। उसका व्यवस्था का कार्य उद्धार के कार्य में केवल सबसे पहला चरण, उद्धार के कार्य का एकदम आरम्भ था, और इसका व्यावहारिक रूप से मनुष्य के जीवन स्वभाव में परिवर्तनों से कुछ लेना-देना नहीं था। इसलिए, उद्धार के कार्य के आरम्भ में उसे इस्राएल में अपने कार्य के लिए देहधारण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसी लिए उसे एक माध्यम की आवश्यकता थी, अर्थात्, एक उपकरण की, जिसके माध्यम से मनुष्य के साथ सम्पर्क किया जाए। इस प्रकार, सृजन किए गए प्राणियों के मध्य ऐसे लोग उठ खड़े हुए जिन्होंने यहोवा की ओर से बोला और कार्य किया, और इस तरह से मनुष्य के पुत्र और भविष्यद्वक्ता मनुष्यों के मध्य कार्य करने के लिए आए। मनुष्य के पुत्रों ने यहोवा की ओर से मनुष्यों के मध्य कार्य किया। परमेश्वर के द्वारा ऐसा बुलाए जाने का अर्थ है कि ऐसे मनुष्य यहोवा की ओर से व्यवस्था निर्धारित करते हैं और ये मनुष्य इस्राएली लोगों के बीच याजक भी थे; ऐसे याजकों का यहोवा के द्वारा ध्यान रखा जाता था, और उनकी रक्षा की जाती थी, और यहोवा के आत्मा द्वारा उनमें कार्य किया जाता था; वे लोगों के मध्य अगुवे थे और सीधे यहोवा की सेवा करते थे। दूसरी ओर, भविष्यद्वक्ता वे थे जो सभी देशों और सभी कबीलों में यहोवा की ओर से मनुष्यों से बातचीत करने के लिए समर्पित थे। ये वे लोग भी थे जिन्होंने यहोवा के कार्य की भविष्यवाणी की थी। चाहे ये मनुष्य के पुत्र हों या भविष्यद्वक्ता, सभी को स्वयं यहोवा की आत्मा के द्वारा ऊपर उठाया गया था और उनमें यहोवा का कार्य था। लोगों के मध्य, ये वे लोग थे जो सीधे यहोवा का प्रतिनिधित्व करते थे; वे केवल कार्य इसलिए करते थे क्योंकि उन्हें यहोवा ने ऊपर उठाया था और इसलिए नहीं कि वे ऐसी देह थे जिसमें स्वयं पवित्र आत्मा ने देहधारण किया था। इसलिए, हालाँकि वे परमेश्वर की ओर से एक-समान रूप से बोलते और कार्य करते थे, किन्तु व्यवस्था के युग में ये मनुष्य के पुत्र और भविष्यद्वक्ता देहधारी परमेश्वर की देह नहीं थे। यह निश्चित रूप से अनुग्रह के युग और अंतिम चरण के विपरीत था, क्योंकि मनुष्य के उद्धार और न्याय का कार्य दोनों देहधारी परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए गए थे, और इसलिए फिर से अपनी ओर से कार्य करने के लिए भविष्यद्वक्ताओं और मनुष्य के पुत्रों को ऊपर उठाने की आवश्यकता नहीं थी। मनुष्य की नज़रों में, उनके कार्य के सार और साधन में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं हैं। और यह इसी कारण से है कि मनुष्य हमेशा देहधारी परमेश्वर के कार्य के साथ भविष्यद्वक्ताओं एवं मनुष्य के पुत्रों के कार्यों को उलझा देता है। देहधारी परमेश्वर का प्रकटन मूल रूप से वही था जैसा कि भविष्यद्वक्ताओं और मनुष्य के पुत्रों का था। और देहधारी परमेश्वर तो भविष्यद्वक्ताओं की अपेक्षा और भी अधिक साधारण एवं अधिक वास्तविक था। इसलिए मनुष्य उनके मध्य अंतर करने में पूरी तरह से असमर्थ है। मनुष्य केवल रूप-रंगों पर ध्यान केन्द्रित करता है, इस बात से पूरी तरह से अनजान, कि यद्यपि दोनों काम और बात करते हैं, तब भी उनमें एक महत्वपूर्ण अंतर है। क्योंकि मनुष्य की समझने करने की योग्यता अत्यधिक ख़राब है, इसलिएमनुष्य बुनियादी मुद्दों को समझने में असमर्थ है, और किसी बहुत जटिल बात का अंतर करने में तो और भी कम सक्षम है। भविष्यद्वक्ताओं और जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया है उनके वचन और कार्य सभी मनुष्य का कर्तव्य कर रहे थे, एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कार्य कर रहे थे और वह कर रहे थे जो मनुष्य को करना चाहिए। हालाँकि, देहधारी परमेश्वर के वचन और कार्य उसकी सेवकाई को करने के लिए थे। यद्यपि उसका बाहरी स्वरूप एक सृजन किए गए प्राणी का था, किन्तु उसका कार्य अपने प्रकार्य को नहीं बल्कि अपनी सेवकाई को पूरा करना था। "कर्तव्य" शब्द सृजन किए गए प्राणियों के सम्बन्ध में उपयोग किया जाता है, जबकि "सेवकाई" देहधारी परमेश्वर की देह के संबंध में है। इन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण अन्तर है, और ये दोनों परस्पर विनिमय करने योग्य नहीं हैं। मनुष्य का कार्य केवल अपना कर्तव्य करना है, जबकि परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई का प्रबंधन करना, और उसे पूरा करना है। इसलिए, यद्यपि पवित्र आत्मा के द्वारा कई प्रेरितों का उपयोग किया गया और उसके साथ कई भविष्यद्वक्ता भरे थे, किन्तु उनका कार्य और उनकेवचन केवल सृजन किए गए प्राणी के रूप में केवल अपना कर्तव्य करने के लिए थे। यद्यपि उनकी भविष्यवाणियाँ देहधारी परमेश्वर के द्वारा कहे गए जीवन के मार्ग की अपेक्षा बढ़कर हो सकती थीं, और उनकी मानवता देहधारी परमेश्वर की अपेक्षा अधिक उत्युत्तम थी, किन्तु वे अभी भी अपना कर्तव्य निभा रहे थे, और अपनी सेवकाई को पूर्ण नहीं कर रहे थे। मनुष्य का कर्तव्य उसके प्रकार्य को संदर्भित करता है, और कुछ ऐसा है जो मनुष्य के लिए प्राप्य है। हालाँकि, देहधारी परमेश्वर के द्वारा की जाने वाली सेवकाई उसके प्रबंधन से संबंधित है, और यह मनुष्य के द्वारा अप्राप्य है। चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार प्रकट करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, और इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता है। मनुष्य का कार्य केवल सृजन किए गए प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के किसी दिए गए चरण में सिर्फ़ अपना कर्तव्य करना है। इस प्रकार के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌, यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जायेगा। अपनी सेवकाई को करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य का कर्तव्य करना सृष्टा की माँगों को पूरा करने के लिए अपने स्वयं के दायित्वों का प्रदर्शन है और किसी भी तरह से किसी की सेवकाई करना नहीं माना जा सकता है। परमेश्वर, अर्थात्‌, पवित्रात्मा के अंतर्निहित सार के लिए, परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किन्तु एक सृजन किए गए प्राणी का बाह्य स्वरूप पहने हुए देहधारी परमेश्वर के लिए, उसका कार्य अपनी सेवकाई को पूरा करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है वह अपनी सेवकाई को करने के लिए करता है, और मनुष्य केवल उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन ही अपना सर्वोत्तम कर सकता है।

अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग दो) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग एक) भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए क्या आप जाग उठे हैं? देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं

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