मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना (अंश III)

आज, विजयी बनने हेतु मनुष्य का अनुसरण एवं सिद्ध किया जाना ऐसी चीज़ें हैं जिनका अनुसरण किया जाता है इससे पहले कि मनुष्य के पास पृथ्वी पर एक समान्य जीवन हो, और ऐसे उद्देश्य हैं जिन्हें मनुष्य शैतान के दासत्व से पहले खोजता है। मूल-तत्व में, विजयी बनने एवं सिद्ध किये जाने के लिए मनुष्य का अनुसरण, या इसके लिए बड़ा उपयोगी होना, शैतान के प्रभाव से बचने के लिए है: मनुष्य का अनुसरण (निरन्तर खोज) विजयी बनने के लिए है, परन्तु शैतान के प्रभाव से उसका बचकर निकलना ही अंतिम परिणाम होगा। केवल शैतान के प्रभाव से बचकर निकलने से ही मनुष्य पृथ्वी पर एक सामान्य मनुष्य के जीवन, एवं परमेश्वर की आराधना करने के जीवन को जी सकता है। आज, विजयी बनने के लिए मनुष्य का अनुसरण और सिद्ध किया जाना ऐसी चीज़ें हैं जिनका अनुसरण पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन पाने से पहले किया जाता है। उनका अनुसरण मुख्य रूप से शुद्ध किये जाने और सत्य को अभ्यास में लाने के लिए, और सृष्टिकर्ता की आराधना को हासिल करने के लिए किया जाता है। यदि मनुष्य पृथ्वी पर एक साधारण इंसान के जीवन, एवं ऐसे जीवन को धारण करता है जो कठिनाई या पीड़ा से रहित है, तो मनुष्य विजयी बनने के अनुसरण में संलग्न नहीं होगा। "विजयी बनना" और "सिद्ध किया जाना" ऐसे उद्देश्य हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य को अनुसरण करने के लिए देता है, और इन उद्देश्यों के अनुसरण के माध्यम से वह मनुष्य को प्रेरित करता है कि वह सत्य को अभ्यास में लाये और एक महत्व का जीवन व्यतीत करे। उद्देश्य यह है कि मनुष्य को पूर्ण बनाया जाए और उसे हासिल किया जाए, और विजयी बनने और सिद्ध किये जाने का अनुसरण महज एक माध्यम है। भविष्य में यदि मनुष्य एक बेहतरीन मंज़िल में प्रवेश करता है, तो वहाँ विजयी बनने और सिद्ध किये जाने का कोई संकेत नहीं होगा; वहाँ पर सिर्फ हर एक प्राणी होगा जो अपने कर्तव्य को निभाएगा। आज, मनुष्य को सिर्फ इन बातों का अनुसरण करने के लिए बनाया गया है ताकि मनुष्य के लिए एक दायरे को परिभाषित किया जा सके, ताकि मनुष्य का अनुसरण लक्ष्य की ओर और अधिक केन्द्रित एवं व्यावहारिक हो सके। इसके बगैर, अनंत जीवन में प्रवेश के लिए मनुष्य का अनुसरण अस्पष्ट एवं कल्पना मात्र होगा, और यदि यह ऐसा होता, तो क्या मनुष्य और भी अधिक दयनीय नहीं होता? इस रीति से अनुसरण करना, लक्ष्यों या सिद्धान्तों के बिना—क्या यह स्वयं को धोखा देना नहीं है? अन्ततः, यह अनुसरण स्वाभाविक रूप से फलहीन होगा, अन्त में, मनुष्य तब भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताएगा और स्वयं को इससे छुड़ाने में असमर्थ होगा। स्वयं को ऐसे लक्ष्यहीन अनुसरण के अधीन क्यों करना? जब मनुष्य अनंत मंज़िल में प्रवेश करता है, तो मनुष्य सृष्टिकर्ता की आराधना करेगा, और क्योंकि मनुष्य ने उद्धार को प्राप्त किया है और अनंतकाल में प्रवेश किया है, तो मनुष्य किसी उद्देश्य का पीछा नहीं करेगा, इसके अतिरिक्त, न ही उसे इस बात की चिंता होगी कि उसे शैतान के द्वारा घेर लिया गया है। इस समय, मनुष्य अपने स्थान को जानेगा, और अपने कर्तव्य को निभाएगा, और भले ही उन्हें ताड़ना नहीं दी जाती है या उनका न्याय नहीं किया जाता है, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने कर्तव्य को निभाएगा। उस समय, मनुष्य पहचान एवं रुतबे दोनों में महज एक प्राणी ही होगा। आगे से ऊँच एवं नीच में कोई अन्तर नहीं होगा; प्रत्येक व्यक्ति बस अलग अलग कार्य करेगा। फिर भी मनुष्य तब भी मानवजाति के व्यवस्थित एवं उपयुक्त मंज़िल में जीवन बिताएगा, मनुष्य सृष्टिकर्ता की आराधना करने के लिए अपने कर्तव्य को निभाएगा, और इस प्रकार की मानवजाति ही अनंतकाल की मानवजाति होगी। उस समय, मनुष्य ऐसे जीवन को प्राप्त कर चुका होगा जिसे परमेश्वर के द्वारा प्रकाशित किया गया है, ऐसा जीवन जो परमेश्वर की देखरेख एवं संरक्षण के अधीन है, और ऐसा जीवन जो परमेश्वर के साथ है। मानवजाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन को जीएगी, और सम्पूर्ण मानवजाति सही मार्ग में प्रवेश करेगी। 6,000 सालों की प्रबंधकीय योजना ने शैतान को पूरी तरह से पराजित कर दिया होगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर ने अपनी सृष्टि के बाद मनुष्य की मूल छवि को पुनः प्राप्त कर लिया होगा, और ऐसे ही, परमेश्वर के मूल इरादे को पूरा कर लिया गया होगा। शुरुआत में, शैतान के द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट किये जाने से पहले, मानवजाति पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जीती थी। आगे चलकर, जब मनुष्य को शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, तो उसने इस सामान्य जीवन को खो दिया, और इस प्रकार वहाँ परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य की, और मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनः प्राप्त करने के लिए शैतान के साथ युद्ध की शुरुआत हुई। जब परमेश्वर के 6,000 साल के प्रबधंन का कार्य समाप्ति पर आता है केवल तभी पृथ्वी पर सारी मानवजाति का जीवन आधिकारिक रूप से प्रारम्भ होगा, केवल तभी मनुष्य के पास एक अद्भुत जीवन होगा, और परमेश्वर मनुष्य की सृष्टि के उस उद्देश्य को जो आदि में था, साथ ही साथ मनुष्य की मूल समानता को भी पुनः प्राप्त करेगा। और इस प्रकार, जब एक बार मनुष्य के पास मानवजाति का सामान्य जीवन होता है, तो मनुष्य विजयी बनने या सिद्ध किये जाने का अनुसरण नहीं करेगा, क्योंकि मनुष्य पवित्र होगा। वह विजय एवं सिद्धता जिसके विषय में मनुष्य के द्वारा बोला गया है वे ऐसे उद्देश्य हैं जिन्हें मनुष्य को दिया गया है ताकि वह परमेश्वर और शैतान के मध्य युद्ध के दौरान अनुसरण करे, और वे सिर्फ इसलिए अस्तित्व में हैं क्योंकि मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया गया है। आपको एक उद्देश्य देने के द्वारा ऐसा हुआ है, और आपसे इस उद्देश्य का अनुसरण करवाने के द्वारा ऐसा हुआ है, जिससे शैतान पराजित हो जाएगा। आपसे विजयी बनने या सिद्ध बनने या इस्तेमाल होने की मांग करना यह अपेक्षा करना है कि आप शैतान को लज्जित करने के लिए गवाही दें। अन्त में, मनुष्य पृथ्वी पर एक सामान्य मनुष्य के जीवन को जीएगा, और मनुष्य पवित्र होगा, और जब यह होता है, तो क्या वे तब भी विजयी बनने का प्रयास करेंगे? क्या वे सभी प्राणी नहीं हैं? विजयी बनना और सिद्ध व्यक्ति होना इन दोनों को शैतान की ओर, और मनुष्य की मलिनता की ओर निर्देशित किया गया है। क्या यह "विजेता" शैतान पर और विरोधी ताकतों पर विजय का संकेत नहीं है? जब आप कहते हैं कि आपको सिद्ध किया गया है, तो आपके भीतर क्या सिद्ध किया गया है? क्या ऐसा नहीं है कि आपने स्वयं को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अलग कर लिया है, ताकि आप परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम को हासिल कर सकें? ऐसी चीज़ों को उन गन्दी चीज़ों के सम्बन्ध में कहा गया है जो मनुष्य के भीतर हैं, और शैतान के सम्बन्ध में कहा गया है; उन्हें परमेश्वर के सम्बन्ध में नहीं कहा गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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