परमेश्वर के दैनिक वचन | "क्या त्रित्व का अस्तित्व है?" | अंश 296

यीशु के देहधारी होने के सत्य के विकसित होने के बाद ही मनुष्य इस बात को महसूस कर पाया: यह न केवल स्वर्ग का परमेश्वर है, बल्कि यह पुत्र भी है, और यहां तक कि वह आत्मा भी है। यह पारम्परिक धारणा है जिसे मनुष्य धारण किए हुए है, कि एक ऐसा परमेश्वर है जो स्वर्ग में हैः एक त्रित्व जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा है, और ये सभी एक में हैं। सभी मानवों की यही धारणाएं हैं: परमेश्वर केवल एक ही परमेश्वर है, परन्तु उसके तीन भाग हैं, जिसे कष्टदायक रूप से पारंपरिक धारणा में दृढ़ता से जकड़े सभी लोग पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा मानते हैं। केवल यही तीनों संपूर्ण परमेश्वर को बनाते हैं। बिना पवित्र पिता के परमेश्वर संपूर्ण नहीं बनता है। इसी प्रकार से परमेश्वर पुत्र और पवित्र आत्मा के बिना संपूर्ण नहीं है। उनके विचार में वे यह विश्वास करते हैं कि सिर्फ पिता और सिर्फ पुत्र को ही परमेश्वर नहीं माना जा सकता। केवल पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को एक साथ मिलाकर स्वयं सम्पूर्ण परमेश्वर माना जा सकता है। अब, तुममें से प्रत्येक अनुयायी समेत, सभी धार्मिक विश्वासी, इस बात पर विश्वास करते हैं। फिर भी यह विश्वास सही है कि नहीं इस बात को कोई भी स्पष्ट नहीं कर पाता है, क्योंकि हमेशा तुम सब परमेश्वर के मामले में भ्रम के कोहरे में रहते हो। हालांकि तुम सब नहीं जानते कि ये विचार सही हैं या गलत, क्योंकि तुम धार्मिक विचारों से बुरी तरह से संक्रमित हो गए हो। धार्मिक भावनाओं की परम्परावादी धारणाओं को तुम सबने अत्यधिक गहराई से स्वीकार कर लिया है और यह ज़हर तुम्हारे भीतर बहुत ही गहराई से प्रवेश कर चुका है। इसलिए तुम इस मामले में भी इन हानिकारक प्रभाव के सामने अपना समर्पण कर चुके हो क्योंकि त्रित्व का अस्तित्व है ही नहीं। इसका मतलब यह है कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व मौजूद नहीं है। यह सब मनुष्य की पारम्परिक धारणा है और मनुष्य का भ्रामक विश्वास है। सदियों से मनुष्य इस त्रित्व पर विश्वास करता आ रहा है, यह मनुष्य की बुद्धि की धारणाओं से जन्मी, मनुष्य के द्वारा मनगढ़ंत बातें हैं और मनुष्य के द्वारा पहले कभी भी देखी नहीं गई हैं। इन अनेक वर्षों के दौरान कई महान लोग हुए हैं जिन्होंने त्रित्व का "सही अर्थ" समझाया है, परन्तु त्रित्व के तीन अभिन्न-तत्व वाले व्यक्तित्वों के बारे में इस प्रकार का स्पष्टीकरण अस्पष्ट और अनिश्चित है और सभी परमेश्वर की "रचना" के बारे में संभ्रमित हैं। कोई भी महान व्यक्ति कभी भी इसका सम्पूर्ण विवरण प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं हुआ है; अधिकांश स्पष्टीकरण, तर्क के मामलों में और कागज़ पर जायज़ ठहरते हैं, परन्तु किसी भी व्यक्ति को इसके अर्थ की पूरी स्पष्टता से समझ नहीं है। यह इसलिए है क्योंकि यह "महान त्रित्व" जो मनुष्य अपने हृदय में धारण किए हुए है वह अस्तित्व में है ही नहीं। क्योंकि कभी भी किसी ने परमेश्वर के सच्चे स्वरूप को नहीं देखा है या कभी कोई प्राणी इतना भाग्यशाली नहीं हुआ है कि परमेश्वर के स्थान तक भेंट करने के लिए पहुंच पाए यह देखने के लिए कि परमेश्वर के निवास स्थान में क्या-क्या है, ताकि इस बात का निर्धारण कर सके कि "परमेश्वर के भवन" में कितने हज़ारों या लाखों पीढ़ियाँ रहती हैं या यह जांचने के लिए कि परमेश्वर की निहित रचना कितने भागों से निर्मित है। जिसकी मुख्यत: जांच करनी चाहिये वह हैः पिता और पुत्र की आयु, साथ ही साथ पवित्र आत्मा की भी आयु; प्रत्येक व्यक्ति का रूप-रंग; वे कैसे अलग हुए और कैसे वे एक हुए। दुर्भाग्यवश, इन सभी वर्षों में, कोई एक भी मनुष्य इस मामले में सत्य का निर्धारण नहीं कर पाया है। वे बस अनुमान लगाते है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति स्वर्ग में देखने के लिए नहीं गया और न ही सम्पूर्ण मानवजाति के लिए "जांच की रिर्पोट" लेकर वापस आया है ताकि वह इस मामले के सत्य का अभिलेख उन उत्कृष्ट और सच्चे धार्मिक विश्वासियो सौंप सके जो त्रित्व के बारे में चिंतित हैं। निश्चय ही, ऐसे विचार रखने के लिये लोगों को दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यहोवा पिता ने यीशु पुत्र को मानवजाति की रचना करते समय अपने साथ क्यों नहीं रखा था? यदि, आरम्भ में, सभी कुछ यहोवा के नाम से हुआ होता, तो यह बेहतर होता। यदि दोष देना ही है तो, यह यहोवा परमेश्वर की क्षणिक गलती पर डाला जाना चाहिए, जिसने पुत्र और पवित्र आत्मा को उत्पत्ति के समय अपने सामने नहीं बुलाया था, बल्कि अपना कार्य अकेले ही किया। यदि उन सभी ने एक साथ कार्य किया होता, तो क्या वे एक ही नहीं बन गए होते? यदि, उत्पत्ति से लेकर अंत तक, केवल यहोवा का ही नाम होता और अनुग्रह के काल में यीशु का नाम नहीं होता या तब भी उसे यहोवा ही पुकारा जाता, तो क्या परमेश्वर मानवजाति के इस भेदभाव की यातना से बच नहीं जाता? सच तो यह है कि इन सब के लिए यहोवा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता; यदि दोष ही देना है तो, पवित्र आत्मा कोदेना चाहिए, जो यहोवा, यीशु और यहां तक कि पवित्र आत्मा के नाम से हज़ारों सालों से अपना कार्य करता रहा है और मनुष्य को ऐसा भ्रमित कर दिया है और चकरा दिया कि वह जान ही नहीं पाया कि असल में परमेश्वर कौन है। यदि स्वयं पवित्र आत्मा ने किसी रूप या प्रतिकृति के बिना कार्य किया होता और इसके अलावा, यीशु जैसे नाम के बिना कार्य किया होता और मनुष्य उसे न देख पाता न छू पाता, केवल गर्जने की आवाज़ को सुन पाता, तो क्या इस प्रकार का कार्य मनुष्यों के लिए और भी अधिक फायदेमंद नहीं होता? तो अब क्या किया जा सकता है? मनुष्य के विचार एकत्रित होकर इस हद तक पर्वत के समान उच्च और समुद्र के समान व्यापक हो गए हैं, कि आज का परमेश्वर उन्हें अब और नहीं सह सकता, और पूरी तरह से उलझन में है। अतीत में जब केवल यहोवा, यीशु और उन दोनों के मध्य में पवित्र आत्मा था, मनुष्य पहले से ही हैरानी में था कि इसका सामना किस प्रकार करे और अब उसमें सर्वशक्तिमान और जुड़ गया। उसे भी परमेश्वर का एक भाग ही कहा जाता है। कौन जानता है कि वह कौन है और त्रित्व के किस व्यक्तित्व के साथ गुंथा हुआ है, या वह कितने सालों से भीतर छुपा हुआ है? मनुष्य इसे कैसे सह सकता है? पहले तो केवल त्रित्व ही काफी था कि मनुष्य जीवनभर उसकी व्याख्या करता रहे, परन्तु अब यहां पर "एक परमेश्वर में चार व्यक्तित्व" हैं। इसकी व्याख्या किस प्रकार से की जा सकती है? क्या तुम इसकी व्याख्या कर सकते हो? भाइयो और बहनो! तुम लोगों ने आज तक इस प्रकार के परमेश्वर पर विश्वास कैसे किया? मैं तुम सबको सलाम करता हूं। त्रित्व ही झेलने के लिए पर्याप्त था, और अब तुम लोग इस एक परमेश्वर के चार रूपों पर और अटूट विश्वास करने लग गए हो। तुम्हें इन सब से बाहर निकलने के लिए आग्रह किया गया है, लेकिन तुम इन्कार कर देते हो। समझ में नहीं आता! तुम लोग वास्तव में कुछ और ही हो! एक व्यक्ति इन चार परमेश्वरों पर विश्वास तक कर जाता है और उसमें से कुछ भी समझ नहीं पाता; तुम्हें लगता नहीं कि ये एक चमत्कार है? मैं नहीं कह सकता था कि तुम लोग इस प्रकार के महान चमत्कार करने में सक्षम हो! मैं बताता हूँ कि वास्तव में, ब्रह्माण्ड में कहीं भी त्रित्व का अस्तित्व नहीं है। परमेश्वर के न पिता हैं और न पुत्र, पिता और पुत्र के द्वारा संयुक्त तौर पर उपयोग किये जाने वाले एक साधन: पवित्र-आत्मा, की परिकल्पना तो बिल्कुल नहीं है। यह सब बड़ा भ्रम है और संसार में इसका कोई अस्तित्व नहीं है! परन्तु इस प्रकार के भ्रम का अपना मूल है और यह पूरी तरह से बिना आधार के नहीं है, क्योंकि तुम लोगों की बुद्धि बहुत ही साधारण नहीं है और विचार बिना तर्क के नहीं हैं। बल्कि, वे काफी उपयुक्त और प्रवीण हैं, इतने कि किसी शैतान के द्वारा भी अभेद्य हैं। अफसोस यह है कि ये विचार बिल्कुल भ्रामक हैं और इनका अस्तित्व नहीं है! तुम लोगों ने वास्तविक सत्य को देखा ही नहीं है; तुम लोग केवल अनुमान और धारणाएं बना रहे हो, फिर धोखेबाज़ी से दूसरों का विश्वास प्राप्त करने या बुद्धिहीन या तर्कहीन लोगों पर प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए इन सब को कहानी में पिरो रहे हो, ताकि वे तुम्हारी महान और प्रसिद्ध "विशेषज्ञ शिक्षाओं" पर विश्वास करें। क्या यह सच है? क्या जीवन का यह तरीका है जो मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए? यह सब बकवास है! एक शब्द भी उचित नहीं है! इतने सालों में, परमेश्वर तुम लोगों के द्वारा इस प्रकार से विभाजित किया गया है, प्रत्येक पीढ़ी द्वारा इसे इतनी सूक्ष्मता से विभाजित किया गया है कि एक परमेश्वर को बिल्कुल तीन भागों में बांट दिया गया है। और अब मनुष्य के लिए यह पूरी तरह से असम्भव है कि इन तीनों को फिर से एक परमेश्वर बना दिया जाए, क्योंकि तुम लोगों ने उसे बहुत ही सूक्ष्मता से बांट दिया है! यदि मेरा कार्य सही समय पर शुरु ना हो गया होता तो, कहना कठिन है कि तुम इस तरह ढिठाई से कब तक चलते रहते! इस प्रकार से परमेश्वर को विभाजित करते रहने से, वह अब तक कैसे तुम्हारा परमेश्वर बना रह सकता है? क्या तुम लोग अब भी परमेश्वर को पहचान सकते हो? क्या तुम अभी भी उसके पास वापस आओगे? यदि मैं थोड़ा और बाद में आता, तो हो सकता है कि तुम लोग "पिता और पुत्र", यहोवा और यीशु को इस्राएल वापस भेज चुके होते और दावा करते कि तुम स्वयं ही परमेश्वर का एक भाग हो। भाग्यवश, अब ये अंत के दिन हैं। अंत में, वह दिन आ गया है जिसकी मैंने बहुत प्रतीक्षा की है, और मेरे अपने हाथों से इस चरण के कार्य को पूर्ण करने के बाद ही तुम लोगों द्वारा स्वयं परमेश्वर को बांटने का कार्य रूका है। यदि यह नहीं होता, तो तुम लोग और भी अधिक आगे बढ़ जाते, यहां तक कि सभी शैतानों को अपने मध्य में आराधना के लिए वेदी पर रख दिया होता। यह तुम सबकी चालाकी है! परमेश्वर को बांटने के तुम्हारे तरीके! क्या तुम सब अभी भी ऐसा ही करोगे? मैं तुमसे पूछता हूं: कितने परमेश्वर हैं? कौन सा परमेश्वर तुम लोगों के लिए उद्धार लाएगा? पहला परमेश्वर, दूसरा या फिर तीसरा जिससे तुम सब हमेशा प्रार्थना करते हो? उनमें से तुम लोग हमेशा किस पर विश्वास करते हो? पिता पर, या फिर पुत्र पर? या फिर आत्मा पर? मुझे बताओ कि तुम लोग किस पर विश्वास करते हो। हालांकि तुम्हारे हर शब्द में परमेश्वर पर विश्वास दिखता है, लेकिन जिस पर वास्तव में तुम लोग विश्वास करते हो वो तुम्हारा मष्तिष्क है। तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं! फिर भी तुम सबके दिमाग में इस प्रकार के कई "त्रित्व" हैं! क्या तुम इस बात से सहमत नहीं हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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