परमेश्वर के दैनिक वचन | "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" | अंश 146

परमेश्वर के कार्यों को जानना कोई आसान बात नहीं है: तुम्हारी खोज में तुम्हारा स्तर-मान और उद्देश्य होना चाहिए, तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि सच्चे मार्ग को कैसे खोजें, और कैसे मापें कि क्या यह सच्चा मार्ग है या नहीं, और क्या यह परमेश्वर का कार्य है या नहीं। सच्चे मार्ग की तलाश करने में सबसे बुनियादी सिद्धान्त क्या है? तुम्हें देखना होगा कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है कि नहीं, क्या ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसके लिए गवाही देनी है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और गलत मार्ग के मध्य अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलुओं की आवश्यकता होती है, जिनमें सबसे बुनियादी है यह बताना कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास का मनुष्य का सार पवित्र आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उसका विश्वास इसलिए है क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्तरूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास पवित्र आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परन्तु क्योंकि यह देह पवित्रात्मा से आता है और वचन देहधारी होता है, इसलिए मनुष्य जिस में विश्वास करता है वह अभी भी परमेश्वर का अन्तर्निहित सार है। और इसलिए, इस बात का विभेद करने में कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह अवश्य देखना चाहिए कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि क्या इस मार्ग में सत्य है अथवा नहीं। यह सत्य सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था कि जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानि, सभी सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने का बुनियादी ज्ञान) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि क्या यह मार्ग मनुष्य को एक सामान्य मानवता के जीवन ले जाता है या नहीं, क्या बोला गया सत्य सामान्य मानवता की आवश्यकता के अनुसार अपेक्षित है या नहीं, क्या यह सत्य व्यवहारिक और वास्तविक है या नहीं, और क्या यह सबसे सही समय पर है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह मनुष्य को सामान्य और वास्तविक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, मनुष्य का देह में जीवन और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और मनुष्य की भावनाएँ हमेशा से और अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धान्त है। एक अन्य सिद्धान्त है, जो यह है कि क्या मनुष्य के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, क्या इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम को प्रेरित कर सकता है या नहीं, और उसे हमेशा से अधिक परमेश्वर के निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि क्या यह सही मार्ग है अथवा नहीं। सबसे अधिक बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक के बजाए यर्थाथवादी है, और क्या यह मनुष्य का जीवन प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धान्तों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है। मैं ये वचन तुम लोगों से तुम लोगों के भविष्य के अनुभवों में अन्य मार्गों को स्वीकार करवाने के लिए नहीं कहता हूँ, न ही किसी भविष्यवाणी के रूप में कहता हूँ कि भविष्य में एक अन्य नए युग का कार्य होगा। मैं इन्हें कहता हूँ ताकि तुम लोगों को निश्चित हो जाए कि आज का मार्ग ही सच्चा मार्ग है, ताकि आज के कार्य के प्रति तुम लोगों के विश्वास में तुम लोग केवल आधा-अधूरा ही निश्चित नहीं रहोगे और इसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में असमर्थ नहीं रहोगे। यहाँ ऐसे कई हैं जो, निश्चित होने के बावजूद, अभी भी भ्रम में अनुगमन करते हैं; ऐसी निश्चितता का कोई सिद्धान्त नहीं होता है, और कभी न कभी अवश्य हटा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि वे भी जो अपने अनुसरण में विशेष रूप से उत्साही हैं तीन भाग ही निश्चित हैं और पाँच भाग अनिश्चित हैं, जो दर्शाता है कि उनका कोई आधार नहीं है। क्योंकि तुम लोगों की क्षमता बहुत ही कमज़ोर है और तुम्हारा आधार बहुत ही सतही है, इस लिए तुम लोगों को विभेदन की समझ नहीं है। परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है, वह ऐसा कार्य नहीं करता है जो वास्तविक न हो, वह मनुष्यों से अत्याधिक अपेक्षाएँ नहीं रखता है और वह ऐसा कार्य नहीं करता है जो मनुष्यों की समझ से परे हो। वह जो कुछ भी कार्य करता है मनुष्य की सामान्य समझ के दायरे के भीतर है, और सामान्य मानवता की समझ से परे नहीं है, और उसका कार्य मनुष्य की सामान्य अपेक्षाओं के अनुसार है। यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, और उसकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। मनुष्य को अपने स्वभाव का, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान होता है, और उसकी सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक होती है। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक बदलावों में सक्षम हो जाता है—जिस सब का अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि एक मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, उसे परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उसे परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान कराने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता का हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना का हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग अवश्य सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए और यह दुष्टात्मा का कार्य, या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान का कार्य नहीं हो सकता है। तुम लोगों ने इन सभी वर्षों में परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी तुम लोगों को सच्चे और गलत मार्ग के मध्य विभेदन करने या सच्चे मार्क की तलाश करने के सिद्धान्तों का कोई आभास नहीं है। अधिकांश लोगों की इन मामलों में दिलचस्पी भी नहीं होती है; वे सिर्फ़ वहाँ चल पड़ते हैं जहाँ बहुसंख्यक जाते हैं, और वह दोहरा देते हो जो बहुसंख्यक कहते हैं। यह कोई कैसा व्यक्ति है जो सत्य की खोज करता है? और इस प्रकार के लोग सच्चा मार्ग कैसे पा सकते हैं? यदि तुम इन अनेक मुख्य नियमों को समझ लो, तो चाहे जो कुछ भी हो जाए तुम धोखा नहीं खाओगे। आज, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि मनुष्य विभेदन करने में सक्षम हो जाए; यही है वह जो एक सामान्य मानवता के पास होना चाहिए, और जिसे मनुष्य को अपने अनुभव में अवश्य धारण करना चाहिए। यदि, यहाँ तक कि आज भी, मनुष्य अपने अनुगमन में कुछ भी अंतर नहीं करता है और उसकी मानव भावना अभी भी नहीं बढ़ी है, तो मनुष्य अत्यधिक मूर्ख है, और उसकी खोज ग़लत और भटकी हुई है। आज तुम्हारी खोज में थोड़ा सा भी विभेदन नहीं है, और जब कि यह सत्य है, जैसा कि तुम कहते हो, तुमने सही मार्ग प्राप्त कर लिया है, क्या तुमने इसे प्राप्त कर लिया है? क्या तुम कुछ भी अंतर करने में समर्थ रहे हो? सच्चे मार्ग का सार क्या है? सच्चे मार्ग में, तुमने सही मार्ग प्राप्त नहीं किया है, तुमने कुछ भी सत्य प्राप्त नहीं किया है, अर्थात्, तुमने वह प्राप्त नहीं किया है जो परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है, और इसलिए तुम्हारी भ्रष्टता में कोई परिवर्तन नहीं आया है। यदि तुम इस मार्ग में ही खोज करते रहते हो, तो तुम अंततः हटा दिए जाएँगे। आज के दिन तक अनुसरण करके, तुम्हें निश्चित हो जाना चाहिए कि जिस मार्ग को तुमने अपनाया है वह सच्चा मार्ग है, और तुम्हें कोई और संदेह नहीं होने चाहिए। कई लोग हमेशा अनिश्चित रहते हैं और छोटी-छोटी बातों के कारण सत्य की खोज करना रोक देते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर के कार्य का कोई ज्ञान नहीं है, ये वे लोग हैं जो भ्रम में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते हैं वे उसके अंतरंग होने या उसकी गवाही देने में असमर्थ हैं। मैं उन लोगों को यथा शीघ्रसत्य की खोज करने की सलाह देता हूँ जो केवल आशीषों की तलाश करते हैं और केवल उसकी खोज करते हैं जो कि अज्ञात और अमूर्त है, ताकि उनके जीवन में कोई महत्व हो सके। अपने आप को अब और मूर्ख मत बनाओ!

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

सच्चे मार्ग की तलाश के सिद्धांत

सत्य मार्ग खोजने का क्या है सबसे बुनियादी सिद्धांत? देखो पवित्रात्मा काम करता है या नहीं, सत्य व्यक्त होता है या नहीं, देखो किसके लिये गवाही दी है, और तुमने इससे क्या पाया है। परमेश्वर में विश्वास के मायने पवित्रात्मा में विश्वास है। देहधारी परमेश्वर में आस्था उस सच में आस्था है कि वो पवित्रात्मा का साकार रूप है, परमेश्वर के आत्मा ने देह धारण किया है, परमेश्वर वचन है, जो अब देह बन गया है।

देख लो इस मार्ग में सत्य है या नहीं। सत्य जो आम इंसान का जीवन स्वभाव है, सहज बोध है, अंतर्ज्ञान है, बुद्धि है, इंसान होने का बुनियादी ज्ञान है। सत्य जो सृजन के समय इंसान के लिये, परमेश्वर की कामना थी। मार्ग ले जाता है क्या, सामान्य जीवन की तरफ? क्या इसका सत्य चाहता है इंसान, सहज मानवता जिए? क्या ये अमल के लायक है, वक्त के हिसाब से है? गर सत्य है इस राह में तो, अनुभव सच्चा होगा इंसान का, इंसानियत और बोध उसका पूर्ण होगा, आत्मिक और देह जीवन तरतीब में होगा, भावनाएं और ज़्यादा सहज होंगी।

है एक नियम और, जो सत्य-मार्ग बतलाएगा, इस राह की मदद से क्या परमेश्वर को, इंसान ज़्यादा जान पाएगा? सत्य वो है जो इंसान के दिल में परमेश्वर के प्यार को जगाए, सत्य वो है जो इंसान को परमेश्वर के नज़दीक लाए। सत्य सच्चाई लाए, जीवन की आपूर्ति लाए। खोजो इन सिद्धांतों को, फिर खोजो सच्ची राह को, खोजो सच्ची राह को, खोजो सच्ची राह को।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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