परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश VII)

आरंभ में मानवजाति में परिवार नहीं थे, केवल पुरुष और महिला, दो प्रकार के लोग थे! कोई देश नहीं थे, परिवारों की तो बात ही छोड़ो, परंतु मनुष्य की भ्रष्टता के कारण, सभी प्रकार के लोगों ने स्वयं को कबीलों में संगठित कर लिया, बाद में ये देशों और राष्ट्रों में विकसित हो गए। ये देश और राष्ट्र छोटे-छोटे परिवारों से मिलकर गठित हुए थे, और इस तरीके से सभी प्रकार के लोग, भाषा की भिन्नताओं और विभाजित करने वाली सीमाओं के अनुसार, विभिन्न नस्लों में बँट गए। वास्तव में, इस बात की परवाह किए बिना कि दुनिया में कितनी नस्लें हैं, मावजाति का केवल एकही पूर्वज है। आरंभ में, केवल दो प्रकार के ही लोग थे, और ये दो प्रकार पुरुष और स्त्री थे। हालाँकि, परमेश्वर के कार्य की प्रगति, इतिहास और भौगोलिक परिवर्तनों के गुज़रने के कारण, विभिन्न अंशों तक ये दो प्रकार के लोग और भी अधिक प्रकारों में विकसित हो गए। जब हम इसका विचार करते हैं, तो इस बात की परवाह किए बिना कि मानवजाति में कितनी नस्लें शामिल हैं, समस्त मानवजाति परमेश्वर का सृजन है। लोग चाहे किसी भी नस्ल से संबंधित हों, वे सब उसका सृजन हैं; वे सब आदम और हव्वा के वंशज हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के हाथों से सृजन नहीं किए गए हैं, फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज हैं, जिन्हें परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से सृजित किया है। लोग चाहे किसी भी श्रेणी से संबंधित हों, वे सभी उसके प्राणी हैं; चूँकि वे मनुष्य जाति से संबंधित हैं जिसका सृजन परमेश्वर ने किया था, इसलिए उनकी नियति वही है जो मानवजाति की होनी चाहिए, और वे उन नियमों के कारण विभाजित हैं जो मानवजाति को संगठित करते हैं। कहने का अर्थ है, कि बुरा करने वाले और धार्मिक लोग अंततः प्राणी ही हैं। वे प्राणी जो बुरा करते हैं अंततः नष्ट हो जाएँगे, और वे प्राणी जो धार्मिक कर्म करते हैं वे फलस्वरूप जीवित बचे रहेंगे। इन दो प्रकार के प्राणियों के लिए यह सर्वथा उपयुक्त व्यवस्था है। कुकर्मी लोग, अपनी अवज्ञा के कारण, इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे परमेश्वर की सृष्टि हैं किन्तु शैतान के द्वारा लूट लिये गए हैं और इस कारण वे बचाए जाने में असमर्थ हैं। धार्मिक आचरण वाले प्राणी इस तथ्य पर भरोसा नहीं कर सकते हैं कि इस बात से इनकार करने के लिए जीवित बचे रहेंगे कि वे परमेश्वर के द्वारा सृजन किए गए हैं मगर शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उद्धार प्राप्त कर चुके हैं। कुकर्मी लोग ऐसे प्राणी हैं जो परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं; ये ऐसे प्राणी हैं जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है और ये पहले से ही शैतान के द्वारा पूरी तरह से लूट लिए गए हैं। पाप करने वाले लोग भी मनुष्य ही हैं; वे ऐसे लोग हैं जो चरम सीमा तक भ्रष्ट किए जा चुके हैं और ऐसे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है। ठीक जिस प्रकार वे भी प्राणी हैं, धार्मिक आचरण वाले लोग भी भ्रष्ट किए गए हैं, परंतु ये वे लोग हैं जो अपने भ्रष्ट स्वभाव को छोड़कर मुक्त होना चाहते हैं और परमेश्वर का आज्ञा पालन करने में सक्षम हैं। धार्मिक आचरण वाले लोग धार्मिकता से नहीं भरे हैं; बल्कि, वे उद्धार प्राप्त कर चुके हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव को छोड़ कर स्वतंत्र हो गए हैं; वे अंत में डटे रहेंगे, परंतु कहने का यह अर्थ नहीं है कि वे शैतान के द्वारा भ्रष्ट नही किए गए थे। परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाने के बाद, उसके सभी प्राणियों में, वे लोग होंगे जो नष्ट किए जाएँगे और वे होंगे जो जीवित बचे रहेंगे। यह उसके प्रबंधन कार्य की एक अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इस से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। कुकर्मी लोग जीवित नहीं बच सकते हैं; जो लोग अंत तक उसका आज्ञापालन और अनुसरण करते हैं वे निश्चित रूप से जीवित बचेंगे। चूँकि यह कार्य मानवजाति के प्रबंधन का है, इसलिए कुछ होंगे जो बचे रहेंगे और कुछ होंगे जो नष्ट कर दिए जाएँगे। ये अलग-अलग प्रकार के लोगों के अलग-अलग परिणाम है और उसके प्राणियों के लिए सबसे अधिक उपयुक्त व्यवस्थाएँ हैं। मानवजाति के लिए परमेश्वर का अंतिम प्रबंधन परिवारों को ध्वस्त करके, देशों को ध्वस्त करके और राष्ट्रीय सीमाओं को ध्वस्त करके विभाजित करना है। यह परिवारों और राष्ट्र की सीमाओं के बिना एक है, क्योंकि, अंततः, मनुष्य एक ही पूर्वज का है, और परमेश्वर का सृजन है। संक्षेप में, कुकर्मी प्राणी नष्ट कर दिए जाएँगे, और जो परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं, वे जीवित बचेंगे। इस तरह, शेष भविष्य में कोई परिवार नहीं होगा, कोई देश नहीं होगा, विशेषरूप से कोई राष्ट्र नहीं होगा; इस प्रकार की मानवजाति सबसे अधिक पवित्र प्रकार की मानवजाति होगी। आदम और हव्वा का सृजन मूल रूप से इसलिए किया गया था ताकि मनुष्य पृथ्वी की सभी चीजों की देखभाल कर सके; आरंभ में मनुष्य सभी चीजों का स्वामी था। मनुष्य के सृजन में यहोवा का अभिप्राय मनुष्य को पृथ्वी पर अस्तित्व बनाए रखने की और इसके ऊपर की सभी चीजों की देखभाल भी करने की अनुमति भी देना था, क्योंकि तब मनुष्य आरंभ में भ्रष्ट नहीं किया गया था, और पाप करने में असमर्थ था। हालांकि मनुष्य के भ्रष्ट हो जाने के बाद वह चीज़ो का देखभालकर्ता नहीं रहा। और परमेश्वर द्वारा उद्धार मनुष्य के इस प्रकार्य को, मनुष्य के मूल कारण को पुनः-स्थापित करना और मूल आज्ञाकारिता को पुर्नस्थापित करना है; विश्राम में मानवजाति उस परिणाम का सटीक चित्र होगी जो उसका उद्धार का कार्य प्राप्त करने की आशा रखता है। यद्यपि यह अदन के बगीचे के जीवन के समान अब और नहीं होगा, किन्तु उसका मूलतत्व वही होगा; मानवजाति केवल अपनी आरंभिक बिना भ्रष्ट हुई अस्मिता में अब और नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानवजाति होगी जिसे भ्रष्ट किया गया था और फिर उसने उद्धार प्राप्त कर लिया। ये लोग जिन्होंने उद्धार प्राप्त कर लिया है अंततः (अर्थात् जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है) विश्राम में प्रवेश करेंगे। इसी प्रकार, जिन्हें दण्ड दिया गया है उनके परिणाम भी अंत में पूर्ण रूप से प्रकट किए जाएँगे, और उन्हें केवल तभी नष्ट किया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। कहने का अभिप्राय है कि जब उसका कार्य समाप्त हो जाता है, तो वे जो कुकर्मी हैं और वे जिन्हें बचाया जा चुका है, सभी प्रकट किये जाएँगे, क्योंकि सभी प्रकार के लोगों को प्रकट करने का कार्य (इस बात की परवाह किए बिना कि वे कुकर्मी हैं या बचाए गए हैं) सभी मनुष्यों पर एक साथ संपन्न किया जाएगा। कुकर्मी हटा दिए जाएँगे, और जो बचे रह सकते हैं वे साथ-साथ प्रकट किए जाएँगे। इसलिए, सभी प्रकार के लोगों के परिणाम एक साथ प्रकट किए जाएँगे। वह कुकर्मी लोगों को अलग रखने और एक बार में उनका थोड़ा सा न्याय करने या उन्हें दण्डित करने से पूर्व, पहले ऐसे लोगों को विश्राम में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देगा जिन्हें बचाया जा चुका है; सत्य वास्तव में ऐसा नहीं है। जब कुकर्मी नष्ट हो जाते हैं और जो बचे रह सकते हैं वे विश्राम में प्रवेश कर लेते हैं, तब समस्त ब्रम्हाण्ड में उसका कार्य समाप्त हो चुका होगा। वहाँ जो आशीषें पाएँगे और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे उन के बीच प्राथमिकता का क्रम नहीं होगा; जो आशीष पाएँगे वे अनंतकाल तक जीवित रहेंगे, और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे, वे समस्त अनंतकाल तक नष्ट होंगे। कार्य के ये दोनों कदम साथ-साथ पूर्ण होंगे। यह ठीक-ठीक इसलिए है क्योंकि अवज्ञाकारी लोग हैं ताकि आज्ञाकारी लोगों की धार्मिकता प्रकट होगी, और यह ठीक-ठीक इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग हैं जो आशीषें प्राप्त कर चुके हैं ताकि उन कुकर्मियों के दुष्ट आचरण के कारण उनके द्वारा सहे जा रहे दुर्भाग्य प्रकट किए जाएँगे। यदि परमेश्वर ने कुकर्मियों को प्रकट नहीं किया, तो वे लोग जो ईमानदारी से परमेश्वर का आज्ञा पालन करते हैं कभी भी प्रकाश को नहीं देखेंगे; यदि परमेश्वर उन्हें उचित नियति में नहीं पहुँचाता है जो आज्ञा पालन करते हैं, तो जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं वे अपने योग्य दण्ड को प्राप्त नहीं कर पाएँगे। यही परमेश्वर के कार्य की प्रक्रिया है। यदि वह बुरे को दण्ड देने एवं अच्छे को पुरस्कृत करने का यह कार्य नहीं करता, तो उसके प्राणी कभी भी अपनी संबंधित नियतियों में पहुँचने में सक्षम नहीं हो पाते। एक बार जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश कर लेगी तब कुकर्मियों को नष्ट कर दिया जाएगा, समस्त मानवजाति सही मार्ग पर आ जाएगी, और हर प्रकार का व्यक्ति उन प्रकार्यों के अनुसार जो उसे करने चाहिए, अपने स्वयं के प्रकार के साथ हो जाएगा। केवल यही मानवजाति के विश्राम का दिन होगा और मानव जाति के विकास की अपरिहार्य प्रवृत्ति होगी, और जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश करेगी केवल तभी परमेश्वर की महान और चरम कार्यसिद्धि पूर्णता पर पहुँचेगी; यह उसके कार्य का समापन अंश होगा। यह कार्य मानवजाति के ह्रासोन्मुख भौतिक जीवन का अंत करेगा, और यह भ्रष्ट मानवजाति का अंत करेगा। यहाँ से मानवजाति एक नए राज्य में प्रवेश करेगी। यद्यपि मनुष्य का भौतिक अस्तित्व रहता है, किंतु उसके इस जीवन के मूलतत्व और भ्रष्ट मानवजाति के मूलतत्व में महत्त्वपूर्ण अंतर होते हैं। उसके अस्तित्व का अर्थ और भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का अर्थ भी भिन्न होता है। यद्यपि यह एक नए प्रकार के व्यक्ति का जीवन नहीं है, किंतु यह कहा जा सकता है कि यह उस मानवजाति का जीवन है जो उद्धार प्राप्त कर चुकी है और ऐसा जीवन है जिसने मानवता और विवेक को पुनःप्राप्त कर लिया है। ये वे लोग हैं जो कभी परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी थे, और जिन्हें कभी परमेश्वर के द्वारा जीता गया था और फिर उसके द्वारा बचाया गया था; ये वे लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर को लज्जित किया और बाद में उसकी गवाही दी। उसकी परीक्षा से गुज़रकर बचे रहने के बाद, उनका अस्तित्व ही सबसे अधिक अर्थपूर्ण अस्तित्व है; ये वे लोग हैं जिन्होंने शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दी; ये वे लोग हैं जो जीवित रहने के योग्य हैं। जो नष्ट किए जाएँगे ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के गवाह नहीं बन सकते हैं और जो जीवित रहने के योग्य नहीं हैं। उनका विनाश, उनके दुष्ट आचरण के कारण होगा, और विनाश ही उनकी सर्वोत्तम नियति है। जब मनुष्य बाद में एक अच्छे राज्य में प्रवेश करेगा, तब पति और पत्नी के बीच, पिता और पुत्री के बीच या माँ और पुत्र के बीच ऐसा कोई भी संबंध नहीं होगा जैसी मनुष्य कल्पना करता है कि उसे मिलेगा। उस समय, मनुष्य अपने प्रकार के लोगों का अनुसरण करेगा, और परिवार पहले ही ध्वस्त हो चुका होगा। पूरी तरह से असफल होने पर, शैतान फिर कभी मानवजाति को परेशान नहीं करेगा, और मनुष्य का भ्रष्ट शैतानी स्वभाव अब और नहीं होगा। वे अवज्ञाकारी लोग पहले ही नष्ट किये जा चुके होंगे, और केवल वे आज्ञाकारी लोग ही जीवित बचेंगे। और इस प्रकार बहुत थोड़े से परिवार पूर्ण जीवित बचेंगे; तब भी मनुष्यों के बीच भौतिक संबंध अस्तित्व में रहने में कैसे समर्थ होंगे? मनुष्य का अतीत का भौतिक जीवन पूरी तरह से प्रतिषिद्ध होगा; लोगों के बीच भौतिक संबंध कैसे अस्तित्व में रहने में समर्थ होंगे? शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के बिना, लोगों का जीवन अतीत के पुराने जीवन के समान अब और नहीं होगा, बल्कि एक नया जीवन होगा। माता-पिता बच्चों को गँवा देंगे, और बच्चे माता-पिता को गँवा देंगे। पति पत्नियों को गँवा देंगे, और पत्नियाँ पतियों को गँवा देंगी। लोगों का अब एक दूसरे के साथ भौतिक संबंध होता है। जब वे सब विश्राम में प्रवेश कर जाएँगे तो उनके बीच अब और कोई शारीरिक संबंध नहीं होगा। केवल इस प्रकार की मानवजाति में ही धार्मिकता और पवित्रता होगी, और केवल इस प्रकार की मानवजाति ही वह होगी जो परमेश्वर की आराधना करेगी।

— “वचन देह में प्रकट होता है” से उद्धृत

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