परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश VI)

जो अपने सर्वथा अविश्वासी बच्चों और रिश्तेदारों को कलीसिया में लाते हैं, वे बहुत स्वार्थी हैं और अपनी दयालुता का प्रदर्शन करते हैं। ये लोग इस बात की कोई परवाह न करते हुए कि क्या वे विश्वास करते हैं या क्या यह परमेश्वर की इच्छा है, केवल प्रेम पर ज़ोर देते हैं। कुछ लोग अपनी पत्नी को परमेश्वर के सामने लाते हैं, या अपने माता-पिता को परमेश्वर के सामने लाते हैं, और इस बात की परवाह किए बिना कि क्या पवित्र आत्मा सहमत है या अपना कार्य करता है, वे आँखें बंद करके परमेश्वर के लिए "प्रतिभाशाली लोगों को अपनाते हैं"। इन लोगों के प्रति इस तरह की दया को बढ़ाने से संभवतः क्या लाभ मिल सकता है जो विश्वास नहीं करते हैं? भले ही ये अविश्वासी लोग जो पवित्रात्मा की उपस्थिति से रहित हैं, परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए संघर्ष करते हैं, तब भी वे बचाए नहीं जा सकते हैं जैसा कि कोई सोचता हो कि वह बचाया जा सकता है। जो लोग उद्धार प्राप्त करते हैं उनके लिए वास्तव में प्राप्त करना उतना आसान नहीं है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य और परीक्षणों से नहीं गुज़रे हैं और देहधारी परमेश्वर के द्वारा पूर्ण नहीं बनाए गए हैं, उन्हें पूर्ण नहीं किया जा सकता है। इसलिए जिस क्षण से ये लोग नाममात्र के लिए परमेश्वर का अनुसरण करना आरंभ करते हैं उसी क्षण से उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति का अभाव होता है। उनकी स्थिति और वास्तविक अवस्था के अनुसार, उन्हें बस पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए, पवित्र आत्मा उन पर अधिक ऊर्जा व्यय करने का निर्णय नहीं लेता है, न ही वह उन्हें किसी प्रकार की प्रबुद्धता प्रदान करता है या उनका मार्गदर्शन करता है; वह उन्हें केवल साथ-साथ अनुसरण की अनुमति देता है और अंततः उनके परिणाम को प्रकट करता है—यही पर्याप्त है। मनुष्य का उत्साह और अभिप्राय शैतान से आते हैं और वे किसी भी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य को पूर्ण नहीं कर सकते हैं। चाहे कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का हो, उसमें पवित्र आत्मा का कार्य अवश्य होना चाहिए—क्या कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को पूर्ण कर सकता है? पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील रहते हैं? और माता-पिता क्यों अपने बच्चों से अतिशय स्नेह करते हैं? लोग वास्तव में किस प्रकार के अभिप्रायों को आश्रय देते हैं? क्या यह किसी की अपनी योजनाओं और स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट करने के लिए नहीं है? क्या यह वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए है? क्या यह परमेश्वर के कार्य के लिए है? क्या यह प्राणी के कर्तव्य पूरा करने के लिए है? वे जो पहले परमेश्वर पर विश्वास करते थे और पवित्र आत्मा की उपस्थिति को नहीं पा सके थे, वे कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं पा सकते हैं; यह निर्धारित हो चुका है कि ये लोग नष्ट हो जाएँगे। इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि कोई उनसे कितना प्रेम करता है, यह पवित्र आत्मा के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। मनुष्य का उत्साह और प्रेम, मनुष्य के अभिप्रायों का प्रतिनिधित्व करता है, परंतु परमेश्वर के अभिप्राय का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और परमेश्वर के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। भले ही कोई उन व्यक्तियों की ओर सर्वाधिक संभव मात्रा में प्रेम और दया बढ़ाए जो नाममात्र के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करने का दिखावा करते हैं परंतु नहीं जानते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या है, किन्तु वे लोग तब भी परमेश्वर की सहानुभूति प्राप्त नहीं कर पाएँगे या पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे। भले ही जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं कमजोर क्षमता वाले हों, और बहुत सी सच्चाईयों को नहीं समझते हों, वे तब भी कभी-कभी पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं, परंतु वे जो बल्कि अच्छी क्षमता वाले हैं मगर ईमानदारी से विश्वास नहीं करते हैं, बस पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। ऐसे लोगों के उद्धार की मात्र कोई संभावना नहीं है। यद्यपि वे संदेशों को पढ़ें या कभी-कभी सुनें या परमेश्वर की स्तुति गाएँ, किंतु अंत में विश्राम के समय में शेष नहीं बचेंगे। कोई व्यक्ति ईमानदारी से खोज करता है या नहीं यह इस बात से निर्धारित नहीं होता है कि अन्य लोग उसके बारे में क्या अनुमान लगाते हैं और आसपास के लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं, बल्कि इस बात से निर्धारित होता है कि क्या पवित्र आत्मा उसके ऊपर कार्य करता है, और कि क्या उसमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति है, यह और तो और इस बात से निर्धारित होता है कि क्या एक निश्चित अवधि तक पवित्र आत्मा के कार्य से गुज़रने के बाद उसके स्वभाव में परिवर्तन आता है, और कि क्या उसे परमेश्वर का ज्ञान मिल गया है; यदि पवित्र आत्मा किसी व्यक्ति के ऊपर कार्य करेगा, तो उस व्यक्ति का स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा, परमेश्वर पर विश्वास करने का उसका विचार धीरे-धीरे और अधिक शुद्ध हो जाएगा। जब तक उनमें परिवर्तन होता रहता है, तब तक इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि कोई कितने समय तक परमेश्वर का अनुसरण करता है, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उनके ऊपर कार्य करता है। यदि उनमें परिवर्तन नहीं हुआ है, तो इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा उसके ऊपर कार्य नहीं करता है। यद्यपि ऐसे व्यक्ति कुछ सेवा तो करते हैं, किन्तु वे एक अच्छा भविष्य प्राप्त करने के अपने अभिप्रायों से प्रेरित होते हैं। कभी-कभी की सेवा उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सकती है। अंततः वे तब भी नष्ट कर दिए जाएँगे, क्योंकि उन लोगों की आवश्यकता नहीं है जो केवल राज्य के भीतर सेवाएँ देते हैं, न ही ऐसे किसी की आवश्यकता है जिसका स्वभाव उन लोगों की सेवा के योग्य होने के लिए नहीं बदला है जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है और जो परमेश्वर के प्रति विश्वसनीय हैं। अतीत के ये वचन, "जब कोई प्रभु पर विश्वास करता है, तो सौभाग्य उसके पूरे परिवार पर मुस्कुराता है" अनुग्रह के युग के लिए उपयुक्त है परंतु मनुष्य की नियति से असंबंधित हैं। ये केवल अनुग्रह के युग में एक चरण के लिए ही उपयुक्त हैं। इन वचनों का अभीष्ट अर्थ उस शांति और भौतिक आशीषों पर निर्देशित है जिनका लोग आनंद लेते हैं; इनका अर्थ यह नहीं है कि प्रभु में विश्वास करने वाले व्यक्ति के पूरे परिवार को बचाया जाएगा, न ही इनका अर्थ यह है कि जब कोई व्यक्ति अच्छे भविष्य को पाता है, तो उसके पूरे परिवार को भी विश्राम में लाया जाएगा। चाहे किसी व्यक्ति को आशीषें मिलें या दुर्भाग्य सहना पड़े, इसका निर्धारण व्यक्ति के भाव के अनुसार होगा, यह उस आम भाव के अनुसार नहीं होगा जो वह दूसरों के साथ साझा करता है। राज्य में बस इस प्रकार की लोकोक्ति या इस प्रकार का नियम नहीं है। यदि कोई अंत में बच कर जीवित रहने में सक्षम रहता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को प्राप्त कर लिया है, और यदि कोई विश्राम के दिनों में बचने में सक्षम नहीं हो पाता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि वह व्यक्ति परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी है और उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है। प्रत्येक की एक अनूकूल नियति है। ये नियतियाँ प्रत्येक व्यक्ति के मूलतत्व के अनुसार निर्धारित होती हैं और दूसरों से पूर्णतः असंबंधित है। किसी बच्चे का दुष्ट आचरण उसके माता-पिता को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है, और न ही किसी बच्चे की धार्मिकता को उसके माता-पिता के साथ साझा किया जा सकता है। माता-पिता का दुष्ट आचरण उसकी संतानों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है, और माता-पिता की धार्मिकता को उनके बच्चों के साथ साझा नहीं किया जा सकता है। हर कोई अपने-अपने पापों को धारण करता है। और हर कोई अपने-अपने सौभाग्य का आनंद लेता है। कोई भी दूसरे का स्थान नहीं ले सकता है। यही धार्मिकता है। मनुष्य के विचार में, यदि माता-पिता अच्छा सौभाग्य पाते हैं, तो उनके बच्चे भी वैसा ही पा सकते हैं, यदि बच्चे बुरा करते हैं, उनके पापों के लिए माता-पिता को प्रायश्चित अवश्य करना चाहिए। यह मनुष्य का दृष्टिकोण है, और कार्य करने का मनुष्य का तरीका है। यह परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उस मूलतत्व के अनुसार होता है जो उसके आचरण से आता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीके से होता है। कोई भी किसी दूसरे के पापों को धारण नहीं कर सकता है; इससे भी अधिक, कोई भी किसी दूसरे के बदले में दण्ड प्राप्त नहीं कर सकता है। यह परम सिद्धान्त है। माता-पिता की अपनी संतान के लिए अति अनुरक्त देखभाल का अर्थ यह नहीं है कि वे अपनी संतान के बदले में धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं। न ही किसी बच्चे के अपने माता-पिता के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ स्नेह का यह अर्थ है कि वह अपने माता-पिता के लिए धार्मिकता के कर्म कर सकता है। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, "उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्‍की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।" कोई भी अपने बच्चों के लिए अपने गहन प्रेम के आधार पर बुरा कार्य करने वाले अपने बच्चों को विश्राम में नहीं ले जा सकता है, न कोई अपने स्वयं के धार्मिक आचरण के आधार पर अपनी पत्नी (या पति) को विश्राम में पहुँचा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; और इसमें किसी के लिए भी कोई अपवाद नहीं हो सकता है। धार्मिकता करने वाले धार्मिकता करने वाले हैं और बुरा करने वाले, बुरा करने वाले हैं। धार्मिकता करने वाले जीवित बचने में समर्थ होंगे, और बुरा करने वाले नष्ट हो जाएँगे। जो पवित्र है, वे पवित्र हैं; वे अशुद्ध नहीं है। जो अशुद्ध हैं वे अशुद्ध हैं, और उनमें पवित्रता का एक अंश भी नहीं है। सभी दुष्ट लोग नष्ट कर दिए जाएँगे, और सभी धार्मिक लोग जीवित बचेंगे, भले ही बुरा कार्य करने वालों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता दुष्टता के कर्म करें। एक विश्वास करने वाले पति और विश्वास न करने वाली पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं है, और विश्वास करने वाले बच्चों और विश्वास न करने वाले माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं है। ये दोनों असंगत प्रकार हैं। विश्राम में प्रवेश से पहले, उसके शारीरिक संबंधी थे, किन्तु एक बार विश्राम में प्रवेश कर लेने पर, कहने के लिए उसके कोई शारीरिक संबंधी नहीं होंगे। जो अपना कर्तव्य करते हैं और जो नहीं करते हैं वे शत्रु हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो घृणा करते हैं वे एक दूसरे के विरोध में हैं। जो विश्राम में प्रवेश करते हैं और जो नष्ट किए जा चुके हैं वे दो अलग-अलग असंगत प्रकार के प्राणी है। अपने कर्तव्यों को करने वाले प्राणी जीवित बच पाने में समर्थ होंगे, और अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करने वाले प्राणी नष्ट हो जाएँगे; इसके अलावा, यह सब अनंत काल के लिए होगा। क्या तुम एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपने पति से प्रेम करती हो? क्या तुम एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपनी पत्नी से प्रेम करते हो? क्या तुम अपने नास्तिक माता-पिता के प्रति एक प्राणी के रूप में कर्तव्यनिष्ठ हो? क्या परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में मनुष्य का दृष्टिकोण सही है या नहीं? तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? तुम क्या पाना चाहते हो? तुम परमेश्वर से कैसे प्रेम करते हो? जो लोग प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा नहीं कर सकते हैं और पूरा प्रयास नहीं कर सकते हैं, वे नष्ट कर दिए जाएँगे। आजकल लोगों में एक दूसरे के बीच शारीरिक संबंध हैं, उनके बीच खून का रिश्ता है, किंतु बाद में यह सब ध्वस्त हो जाएगा। विश्वासी और अविश्वासी सुसंगत नहीं हैं बल्कि वे एक दूसरे के विरोधी है। वे जो विश्राम में हैं विश्वास करते हैं कि कोई परमेश्वर है और उसके प्रति आज्ञाकारी होते हैं। वे जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी है, वे सब नष्ट कर दिये गए होंगे। पृथ्वी पर परिवारों का अब और अस्तित्व नहीं होगा; माता-पिता या संतानें या पतियों और पत्नियों के बीच के संबंध कैसे हो सकते हैं? विश्वास और अविश्वास की अत्यंत असंगतता से ये शारीरिक संबंध टूट चुके होंगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

इंसान का अंत तय करता है परमेश्वर, उनके सार के अनुसार

अगर कोई अंत तक जीवित रह पाता है, ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने परमेश्वर की अपेक्षाएं पूरी की हैं। लेकिन अगर कोई अंतिम विश्राम में जीवित नहीं रहता, ऐसा इसलिए है क्योंकि वह परमेश्वर के प्रति है अवज्ञाकारी, प्रसन्न नहीं कर पाता परमेश्वर को। न किसी बच्चे का दुष्ट आचरण, न ही उसकी धार्मिकता उसके मां-बाप को सौंपी जा सकती है। न ही मां-बाप का दुष्ट आचरण या धार्मिकता उनके किसी बच्चे के साथ साझा की जा सकती है। एक मंज़िल होती है हर इंसान के लायक। उनके सार पर निर्भर यह करता है। किसी इंसान की मंज़िल किसी दूसरे से संबंधित होती नहीं।

हर किसी के हैं अपने गुनाह या आशीष। कोई भी दूसरे का स्थान ले सकता है नहीं। दूसरे के पाप को ले सकता नहीं कोई, दूसरे के बदले सज़ा भुगत सकता नहीं कोई। यह परम सत्य है। धार्मिकता करने वाले हैं धार्मिक। बुरा करने वाले हैं बुरे। धार्मिकता करने वाले रहेंगे जीवित, बुरा करने वाले हो जाएंगे नष्ट। जो पवित्र हैं, उनमें अशुद्धि का कोई दाग़ नहीं। जो अशुद्ध हैं उनमें पवित्रता का एक अंश नहीं। एक मंज़िल होती है हर इंसान के लायक। उनके सार पर निर्भर यह करता है। किसी इंसान की मंज़िल किसी दूसरे से संबंधित होती नहीं।

सभी दुष्ट लोग होंगे नष्ट, धार्मिक लोग बचेंगे जीवित, भले ही बुरा करने वालों की संतानें करें धार्मिक कर्म, भले ही धार्मिक व्यक्ति के मां-बाप करें बुरे कर्म। कोई रिश्ता नहीं इस बात का कि विश्वास करे पति और पत्नी करे न विश्वास, या बच्चे करें विश्वास और मां-बाप करें न विश्वास। ये दोनों प्रकार एक दूसरे से संगत नहीं। एक मंज़िल होती है हर इंसान के लायक। उनके सार पर निर्भर यह करता है। किसी इंसान की मंज़िल किसी दूसरे से संबंधित होती नहीं।

विश्राम में प्रवेश से पहले, शारीरिक संबंधी होते हैं उनके चारों ओर। लेकिन विश्राम में प्रवेश करने के बाद, नहीं होंगे ऐसे कोई भी शारीरिक संबंधी। कर्तव्य पूरा करने वालों के लिए न करने वाले हैं दुश्मन। परमेश्वर से प्रेम करने वालों के लिए परमेश्वर से नफ़रत करने वाले हैं दुश्मन। जो विश्राम में प्रवेश करते हैं वे असंगत हैं उनसे जो होते हैं नष्ट। एक मंज़िल होती है हर इंसान के लायक। उनके सार पर निर्भर यह करता है। किसी इंसान की मंज़िल किसी दूसरे से संबंधित होती नहीं।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

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