परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश IV)

मनुष्यों के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर एक व्यक्ति का दण्ड या पुरस्कार पाना यह इस बात पर आधारित होगा कि क्या वे सत्य की खोज करते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं, क्या वे साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं। वे जिन्होंने साक्षात् परमेश्वर को सेवाएँ दीं, पर उसे नहीं जानते या आज्ञापालन नहीं करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ये लोग कुकर्मी हैं, और कुकर्मी निःसंदेह दण्डित किए जाएँगे। इससे अधिक, वे अपने बुरे आचरण के अनुसार दण्ड पाएँगे। परमेश्वर पर मनुष्यों द्वारा विश्वास किया जाता है, और वह मनुष्यों के द्वारा आज्ञापालन किये जाने योग्य भी है। वे लोग जो केवल अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में भी असमर्थ हैं। यदि ये मनुष्य साक्षात् परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, और उसके विजयी किए जाने के कार्य के पूरा होने तक अवज्ञाकारी बने रहते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं—जो देह में दृश्यमान है, तो ये सबसे अधिक अस्पष्ट लोग हैं, और निःसंदेह नष्ट किये जाएँगे। यह उसी प्रकार है जैसे तुम लोगों के बीच यदि कोई मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर को मानता है, परंतु देहधारी परमेश्वर के प्रति सत्य को अमल में नहीं ला पाता है, तो वह अंत में निकाल दिया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा और यदि कोई मौखिक रूप में साक्षात् परमेश्वर को मानता है और देहधारी परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त सत्य को खाता और पीता है परंतु फिर भी अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर को खोजता है, तो भविष्य में और भी अधिक उसका नाश किया जाएगा। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने व उसके विश्राम का समय आने तक नहीं बच सकता है; विश्राम के समय जो लोग बच जाएँगे, उनमें इन लोगों के समान कोई भी नहीं होगा। दुष्ट लोग वे हैं जो सत्य पर अमल नहीं करते, उनका मूल तत्व प्रतिरोध करना और परमेश्वर की अवज्ञा करना है, उनमें परमेश्वर की आज्ञा मानने की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। ऐसे सभी लोग नष्ट होंगे। चाहे तुममें सत्य हो, चाहे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करो, इसका निर्धारण तुम्हारे रूपरंग या कुछेक अवसरों पर तुम्हारी बातचीत और आचरण से नहीं, बल्कि तुम्हारे मूलतत्व के आधार पर होगा। प्रत्येक व्यक्ति का मूलतत्व तय करेगा कि उनका नाश किया जाएगा या नहीं, इसका निर्धारण उनके आचरण में प्रकट उनके मूलतत्व और उनकी सत्य की खोज में प्रकट होता है। उन लोगों में जो यही कार्य करते हैं और उतने ही परिमाण में कार्य करते हैं, वे लोग जिनका मानवीय मूलतत्व अच्छा है, और जो सत्य धारण करते हैं, वे ही लोग बच सकते हैं, परंतु वे जिनके मानवीय मूलतत्व बुरे हैं और जो साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं, वे नष्ट कर दिये जाएँगे। मनुष्य की नियति के संबंध में परमेश्वर के कोई भी कार्य या वचन, मनुष्यों के मूलतत्व के आधार पर उचित रीति से प्रत्येक मनुष्य में कार्य करते हैं, वहाँ कोई संयोग नहीं है, और निश्चय ही लेशमात्र भी त्रुटि नहीं है। केवल जब एक मनुष्य कार्य करेगा तब मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होंगे। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है, वह निश्चित तौर पर किसी प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करेगा। अब बहुत से लोग ऐसे हैं जो मानवजाति के भविष्य की नियति को समझने में असमर्थ हैं, और वे उन वचनों पर भी विश्वास नहीं करते जो मैं कहता हूँ, वे सब जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य पर अमल नहीं करते हैं, वे सब दुष्टात्माएँ हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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