परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है" | अंश 72

परमेश्वर सभी मानव जाति का परमेश्वर है। वह अपने आप को किसी भी देश या राष्ट्र की निजी संपत्ति नहीं बनाता है, और वह किसी भी रूप, देश, या राष्ट्र द्वारा बाधित हुए बिना अपनी योजना का कार्य करता है। शायद तूने इस रूप की कभी कल्पना भी नहीं की होगी, या शायद तू इसके अस्तित्व का इनकार करता है, या शायद उस देश या राष्ट्र के साथ, जिसमें परमेश्वर प्रकट होता है, भेदभाव किया जाता है और पृथ्वी पर सबसे कम विकसित माना जाता है। फिर भी परमेश्वर के पास उसकी बुद्धि है। उसकी शक्ति के द्वारा और उसकी सत्यता और स्वभाव के माध्यम से उसे ऐसे लोगों का समूह मिल गया है जो उसके साथ एक विचार के हैं। और उसे ऐसे लोगों का समूह मिल गया है जैसा वह बनाना चाहता थाः उसके द्वारा जीता गया एक समूह, जो अति पीड़ादायक दुख और सब प्रकार के अत्याचार को सह लेता है और अंत तक उसका अनुसरण कर सकता है। किसी भी रूप में या देश की बाधाओं से मुक्त हो कर परमेश्वर के प्रकट होने का उद्देश्य उसे उसकी योजना का कार्य पूरा करने में सक्षम होने के लिए है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर यहूदिया में देहधारी हुआ, उसका लक्ष्य सूली पर चढ़ाये जाने के कार्य को पूरा करने के द्वारा सारी मानव जाति को पाप से मुक्त करना था। फिर भी यहूदियों का मानना था कि परमेश्वर के लिए ऐसा करना असंभव था, और उन्होंने सोचा कि परमेश्वर के लिए देहधारी होना और प्रभु यीशु के रूप में होना असंभव है। उनका "असंभव" एक ऐसा आधार बन गया जिसके द्वारा उन्होंने परमेश्वर को अपराधी ठहराया और विरोध किया, और अंत में इस्राएल को विनाश की ओर ले गए। आज, कई लोगों ने उसी प्रकार की गलती की है। वे परमेश्वर के किसी भी क्षण आ जाने का प्रचार बहुत हल्के रूप में करते हैं, साथ ही वे उसके प्रकट होने को गलत भी ठहराते हैं; उनका "असंभव" एक बार फिर परमेश्वर के प्रकट होने को उनकी कल्पना की सीमाओं के भीतर सीमित करता है। और इसलिये मैंने कई लोगों को परमेश्वर के शब्दों को सुनने के बाद उन पर हँसने की गलती करते हुए देखा है। क्या यह हँसी यहूदियों द्वारा अपराधी ठहराने और निन्दा करने से अलग है? तुम लोग सच का सामना करने में गम्भीर नहीं हो, उससे भी कम सच के लिए इच्छा और भी कम रखते हो। तुम लोग केवल आँख बंद करके अध्ययन करते हो और उदासीनता पूर्वक प्रतीक्षा करते हो। तुम लोग इस तरह पढ़कर और प्रतीक्षा करके क्या प्राप्त कर सकते हो? क्या तुम लोग परमेश्वर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन पा सकते हो? यदि तू परमेश्वर के कथनों को ही नहीं पहचान सकता है, तो तू परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य कैसे हो सकता है? जहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य की अभिव्यक्ति है, और वहाँ परमेश्वर की वाणी है। केवल वे ही लोग, जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य हैं। अपनी धारणाओं को एक तरफ रख दो! रुको और ध्यान से इन शब्दों को पढ़ो। यदि तू सच के लिए तीव्र इच्छा रखता है, तो परमेश्वर तुझे उसकी इच्छा और शब्दों को समझने के लिए प्रकाशमान करेगा। अपने "असंभव" के विचार को एक तरफ रखो! जितना अधिक लोग यह मानते हैं कि कुछ असंभव है, उतना ही अधिक उसके घटित होने की संभावना है, क्योंकि परमेश्वर की बुद्धि स्वर्ग से भी ऊँची उड़ान भरती है, परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों की तुलना में ऊँचे हैं, और परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सोच और धारणा की सीमा से कहीं ऊँचा होता है। जितना अधिक कुछ असंभव है, उतना अधिक वहाँ सच्चाई को खोजने की आवश्यकता है; जितना अधिक वह मनुष्य की धारणा और कल्पना से परे है, उतना ही अधिक उस में परमेश्वर की इच्छा समाहित होती है। क्योंकि परमेश्वर स्वयं को चाहे जहां भी प्रकट करे, परमेश्वर फिर भी परमेश्वर है, और उसके स्थान और उसके प्रकट होने के तरीकों के कारण उसका तत्व कभी नहीं बदलेगा। उसके पदचिन्ह चाहे कहीं भी क्यों न हों परमेश्वर का स्वभाव एक जैसा बना रहता है। चाहे जहां कहीं भी परमेश्वर के पदचिन्ह क्यों न हों, वह सभी मानव जाति का परमेश्वर है। उदाहरण के लिए, प्रभु यीशु केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं है, बल्कि एशिया, यूरोप और अमेरिका में सभी लोगों का परमेश्वर है, और यहां तक कि पूरे ब्रह्मांड में सिर्फ वो ही परमेश्वर है। इसलिए, हम परमेश्वर के कथनों से परमेश्वर की इच्छा की और उसके प्रकट होने की खोज करें और उसके पदचिन्हों का अनुसरण करें! परमेश्वर ही मार्ग, सत्य और जीवन है। उसके वचन और उसका प्रकट होना समवर्ती है, और उसका स्वभाव और पदचिन्ह हमेशा मानव जाति के लिए उपलब्ध रहेंगे। प्रिय भाइयों और बहनों, मुझे आशा है कि तुम लोग इन शब्दों में परमेश्वर के प्रकट होने को देख सकते हो, और तुम लोग उसके पदचिन्हों का अनुसरण करना शुरू कर दोगे, एक नए युग की ओर और एक सुंदर नए आकाश और नई पृथ्वी में प्रवेश कर सकोगे जो परमेश्वर के प्रकट होने की प्रतीक्षा करनेवालों के लिए तैयार किए गए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

सत्य को स्वीकारने वाले ही परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं

जहाँ परमेश्वर का प्रकटन है, वहाँ सत्य की अभिव्यक्ति है, परमेश्वर की वाणी है। वही सुन सकते हैं परमेश्वर की वाणी, वही देख सकते हैं प्रकटन परमेश्वर का, सत्य को जो करते हैं स्वीकार। नामुमकिन जैसे विचार कर दो दरकिनार। नामुमकिन जैसे विचारों का मुमकिन होना सम्भव है। स्वर्ग से ऊँची है परमेश्वर की बुद्धि की उड़ान। उसके ख़्याल और काम बहुत परे हैं, इंसान के सारे ख़्यालों से। कोई चीज़ होती है नामुमकिन जितनी, होता उतना ही ज़्यादा सत्य वहाँ खोज के लिये। होता जितना परे इंसान की संकल्पना से, होता है उतना ही समावेश परमेश्वर के सत्य का उसमें। प्रकट कहीं भी हो वो, परमेश्वर फिर भी परमेश्वर है। कहाँ हुआ वो प्रकट, उसका सार नहीं बदलता इससे। दरकिनार करो अपनी धारणाएँ, ख़ामोश करो दिल को अपने, और पढ़ो इन वचनों को। गर सत्य की तड़प होगी तुम में, तो ज़ाहिर कर देगा परमेश्वर अपनी इच्छा और वचन तुम पर, इच्छा और वचन तुम पर, इच्छा और वचन तुम पर।

वही रहता है स्वभाव परमेश्वर का। जहाँ भी हैं कदम उसके, वहीं है वो मानवता का परमेश्वर। यीशु परमेश्वर है इस्राएलियों का, एशिया का, यूरोप का, सारे जहाँ का। परमेश्वर की इच्छा खोजो उसके कथन से, ढूँढो उसका प्रकटन, अनुसरण करो उसके पदचिन्हों का। सत्य है, मार्ग है, जीवन है परमेश्वर। उसके वचन और प्रकटन उसका, रहते हैं साथ-साथ। स्वभाव और पदचिन्ह उसका, कर दिए जाते हैं इंसानों पर ज़ाहिर सदा। भाइयो-बहनो, उम्मीद है देख सकते हो, तुम इन वचनों में प्रकटन परमेश्वर का। करो अनुसरण उसका एक नए युग में, नए स्वर्ग में, नई धरती की ओर, किया गया तैयार जिसे, उन सब की ख़ातिर, परमेश्वर का इंतज़ार है जिनको, इंतज़ार है जिनको। दरकिनार करो अपनी धारणाएँ, ख़ामोश करो दिल को अपने, और पढ़ो इन वचनों को। गर सत्य की तड़प होगी तुम में, तो ज़ाहिर कर देगा परमेश्वर अपनी इच्छा और वचन तुम पर, इच्छा और वचन तुम पर, इच्छा और वचन तुम पर।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

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