अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो (अंश II)

अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का अंत करने का निश्चय करता हूँ, उस चरण का नहीं जिस पर मैंने मनुष्यों पर कार्य आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख पुस्तक में प्रत्येक व्यक्ति के वचनों और कार्यों को, एक-एक करके, और साथ ही मेरा अनुसरण करने में उनके मार्ग को, उनके अंतर्निहित अभिलक्षणों को और उनके अंतिम प्रदर्शन को लिखता हूँ। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और सभी अपने स्वयं के प्रकार के लोगों के साथ होंगे, जैसा मैं उन्हें नियत करूँगा। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा, और सबसे कम, दुर्दशा के अंश जिसे वे आमंत्रित करते हैं के आधार पर नहीं, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि वे सत्य को धारण करते हैं या नहीं। इसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं दण्डित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और उनके अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में इस तरह से दण्ड पाते हैं। मैंने अपनी योजना के आरंभ के बाद से उसमें एक भी परिवर्तन नहीं किया है। केवल इतना ही है कि, जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, ऐसा प्रतीत होता है कि जिनके प्रति मैं अपने वचनों को निर्देशित करता हूँ वे, वैसे ही जिन्हें मैं वास्तव में अनुमोदित करता हूँ वे, संख्या में घटते जा रहे हैं। हालाँकि, मैं मानता हूँ कि मेरी योजना में कभी बदलाव नहीं आया है; बल्कि, यह मनुष्य का विश्वास और प्रेम हैं जो हमेशा बदलते रहते हैं, सदैव घट रहे हैं, इस हद तक कि प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है कि वह मेरी चापलूसी करने से ले कर मेरे प्रति उदासीन रहे, या मुझे निकालकर बाहर कर दे। जब तक मैं चिढ़ या घृणा महसूस न करूँ, और अंत में दण्ड न दे दूँ तब तक तुम लोगों के प्रति मेरी प्रवृत्ति न तो उत्साही और न ही उदासीन होगी। हालाँकि, तुम लोगों के दंड के दिन, मैं फिर भी तुम लोगों को देखूँगा, परंतु तुम लोग मुझे देखने में अब और समर्थ नहीं होगे। चूँकि मेरे प्रति तुम लोगों के बीच जीवन पहले से ही थकाऊ और सुस्त हो गया है, इसलिए, कहने की आवश्यकता नहीं कि, मैंने रहने के लिये एक अलग वातावरण चुन लिया है ताकि बेहतर रहे कि तुम लोगों के दूषित वचनों की चोट से बचूँ और तुम लोगों के असहनीय रूप से गंदे व्यवहार से दूर रहूँ, ताकि तुम लोग मुझे अब और मूर्ख न बना सको या मेरे साथ बेपरवाह ढंग से व्यवहार न कर सको। इसके पहले कि मैं तुम लोगों को छोड़ कर जाऊँ, मुझे तुम लोगों को वह करने से परहेज करने के लिए प्रोत्साहित अवश्य करना चाहिए जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं। बल्कि, तुम लोगों को वह करना चाहिए जो सबके लिए सुखद हो, जो सभी मनुष्यों को लाभ पहुँचाता हो, और जो तुम लोगों की स्वंय की मंज़िल के लिए लाभदायक हो, अन्यथा, ऐसा व्यक्ति जो आपदा के बीच दुःख उठाएगा वह तुम्हारे स्वयं के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

परमेश्वर इंसान का अंत तय करता है उसके अंदर मौजूद सत्य के आधार पर

अब समय है, हर इंसान का अंत तय करे परमेश्वर, उस चरण का नहीं जब उसने आकार देना शुरू किया इंसान को। हर शब्द, हर काम हर इंसान का, लिखता है अपनी किताब में परमेश्वर। वो दर्ज करता है उन्हें एक-एक कर। हर इंसान की मंज़िल तय करता है परमेश्वर, नहीं उम्र, ओहदे या दुखों के आधार पर, किस हद तक बुलावा देता है करुणा को, नहीं इस आधार पर, नहीं इस आधार पर, उसमें सत्य है या नहीं, तय होता है महज़ इस आधार पर।

परमेश्वर के अनुसरण में वो इंसान के पथ को देखता है, उसके अंतर्निहित गुणों को, आख़िरी निष्पादन को देखता है। इस तरह परमेश्वर के हाथों बचेगा नहीं इंसान कोई। सभी अपनी किस्म के साथ होंगे, जैसा नियत करेगा परमेश्वर। हर इंसान की मंज़िल तय करता है परमेश्वर, नहीं उम्र, ओहदे या दुखों के आधार पर, किस हद तक बुलावा देता है करुणा को, नहीं इस आधार पर, नहीं इस आधार पर, उसमें सत्य है या नहीं, तय होता है महज़ इस आधार पर।

जो परमेश्वर का अनुसरण न करेगा, वो दण्डित होगा, वो दण्डित होगा। इस सच को कोई बदल नहीं सकता। इसलिये दण्ड के भागी हैं जो लोग, परमेश्वर की धार्मिकता की वजह से हैं, प्रतिकार के तौर पर, अनगिनत दुष्कर्मों के लिये हैं। हर इंसान की मंज़िल तय करता है परमेश्वर, नहीं उम्र, ओहदे या दुखों के आधार पर, किस हद तक बुलावा देता है करुणा को, नहीं इस आधार पर, नहीं इस आधार पर, उसमें सत्य है या नहीं, तय होता है महज़ इस आधार पर।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

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