केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है (अंश I)

हालांकि परमेश्वर का प्रबंधन मनुष्य के लिए अति गम्भीर लग सकता है, यह मनुष्य की समझ से बाहर नहीं है, क्योंकि परमेश्वर का सम्पूर्ण कार्य उसके प्रबंधन से जुड़ा हुआ है, यह कार्य मनुष्य के उद्धार के कार्य से जुड़ा हुआ है, और मनुष्य के जीवन, रहन-सहन और गंतव्य से सम्बन्धित है। परमेश्वर मनुष्य में और उनके मध्य जो कार्य करता है, ऐसा कहा जा सकता है कि वह बहुत ही प्रायोगिक और अर्थपूर्ण है। यह मनुष्य के द्वारा देखा जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है, और यह काल्पनिक नहीं है। यदि मनुष्य परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य को स्वीकार करने के अयोग्य है, तो इस कार्य का महत्व क्या है? और इस प्रकार का प्रबंधन मनुष्य को उद्धार की ओर किस प्रकार से ले कर जा सकता है? अधिकांश लोग जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे केवल इस बात को ज्यादा महत्व देते हैं कि आशीषों को किस प्रकार प्राप्त किया जाए या आपदा से कैसे बचा जाए। परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख करने पर वे चुपचाप हो जाते हैं और उनकी रुचि समाप्त हो जाती है। उन्हें लगता है कि वे इस प्रकार के कुछ उबाऊ प्रश्नों को जानने से वे अपने जीवन में बढ़ नहीं सकते हैं या किसी भी प्रकार का लाभ प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और इसलिए हालांकि वे परमेश्वर के प्रबंधन के संदेश के बारे में सुन चुके होते हैं, वे उन्हें बहुत ही लापरवाही से लेते हैं। उन्हें वे इतने मूल्यवान नहीं लगते कि उन्हें स्वीकारा जाए और वे अपने जीवन का अंग तो उन्हें बिल्कुल नहीं लगते। ऐसे लोगों के पास परमेश्वर का अनुसरण करने का बहुत ही साधारण लक्ष्य होता हैः आशीषें प्राप्त करने का और वे इस लक्ष्य से मतलब न रखने वाली किसी भी बात पर ध्यान देने में बहुत ही आलस दिखाते हैं। उनके लिए, करने का अर्थ आशीषें प्राप्त करने के लिये परमेश्वर पर विश्वास करना सबसे तर्कसंगत लक्ष्य और उनके विश्वास का आधारभूत मूल्य है। और जो चीज़ें इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता प्रदान नहीं करतीं वे उनसे प्रभावित नहीं होते हैं। आज जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं उनके साथ ऐसी ही समस्या है। उनके लक्ष्य और प्रेरणा तर्कसंगत दिखाई देते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर पर विश्वास समय ही, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपने कर्तव्य को भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी लगा देते हैं, परिवार और भविष्य को त्याग देते हैं, और यहां तक कि सालों अपने घर से दूर व्यस्त रहते हैं। अपने परम लक्ष्य के लिये, वे अपनी रूचियों को बदल डालते हैं, अपने जीवन के दृष्टिकोण को परिवर्तित कर देते हैं, और यहां तक कि अपनी खोज की दिशा तक को बदल देते हैं, फिर भी वे परमेश्वर पर अपने विश्वास के लक्ष्य को नहीं बदल सकते। वे अपने ही आदर्शों के लिये भाग-दौड़ करते हैं; चाहे मार्ग कितना ही दूर हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयां और अवरोध क्यों न आएं, वे डटे रहते हैं और मृत्यु के सामने निडर खड़े रहते हैं। इस प्रकार से अपने आप को समर्पित बनाए रखने के लिए उन्हें किस बात से शक्ति प्राप्त होती है? क्या यह उनका विवेक है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह उनका अटल इरादा है जो उन्हें दुष्ट शक्तियों से अंत तक युद्ध करते रहने की प्रेरणा देता है? क्या यह उनका विश्वास है जिसमें वे बिना प्रतिफल के परमेश्वर की गवाही देते हैं? क्या यह उनकी वफादारी है जिसके लिए वे परमेश्वर की इच्छा को प्राप्त करने के लिए सब कुछ देने के लिए भी तैयार रहते हैं? या यह उनकी भक्ति है जिसमें वे हमेशा व्यक्तिगत असाधारण मांगों को त्याग देते हैं? उन लोगों के लिये जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के प्रबंधन को जानने के लिए कभी भी इतना कुछ नहीं दिया, यह किसी आश्चर्य से कम नहीं! कुछ देर के लिये आइए इस पर चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। फिर भी उनका व्यवहार इस योग्य है कि हम उसका विश्लेषण करें। उन लाभों के अतिरिक्त जो उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े हैं, क्या इन लोगों के लिए जो कभी भी परमेश्वर को नहीं समझ पाते हैं, उसे इतना कुछ देने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? इसमें, हम एक पहले से ही अज्ञात समस्या को देखते हैं: मनुष्य का परमेश्वर के साथ सम्बन्ध केवल एक नग्न स्वार्थ है। यह आशीष देने वाले और लेने वाले के मध्य का सम्बन्ध है। सीधे-सीधे, यह कर्मचारी और नियोक्ता के मध्य के सम्बन्ध के समान है। कर्मचारी नियोक्ता के द्वारा पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ही कार्य करता है। इस प्रकार के सम्बन्ध में, कोई स्नेह नहीं होता है, केवल एक सौदा होता है; प्रेम करने और प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होता है; कोई आपसी समझ नहीं होती केवल अधीनता और धोखा होता है; कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक खाई जो कभी भी भरी नहीं जा सकती। जब चीज़ें इस बिन्दु तक आ जाती हैं, तो कौन इस प्रकार की प्रवृत्ति को बदलने में सक्षम है? और कितने लोग इसे वास्तव में समझने के योग्य हैं कि यह सम्बन्ध कितना निराशजनक बन चुका है? मैं मानता हूं कि जब लोग आशीषित होने के आनन्द में अपने आप को लगा देते हैं, तो कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ इस प्रकार का सम्बन्ध कितना ही शर्मनाक और भद्दा होगा।

परमेश्वर पर मानवजाति की आस्था का सबसे दुखद पहलू यह है कि मनुष्य परमेश्वर के कार्य के मध्य में अपना प्रबंधन चलाता है और परमेश्वर के प्रबंधन के प्रति बेपरवाह रहता है। मनुष्य का सबसे बड़ी असफलता इस बात में है कि किस प्रकार से एक ही समय में परमेश्वर के प्रति समर्पण को खोजते हुए और उसकी आराधना करते हुए, वह कैसे अपने आदर्श गंतव्य का निर्माण करता है और इस गणित में लगा रहता है कि किस प्रकार से बड़ी से बड़ी आशीष और उत्तम गंतव्य को प्राप्त कर सके। अगर लोग इस बात को समझ भी जायें कि वे कितने दयनीय, घृणित और शोचनीय स्थिति में हैं, तो भी ऐसे कितने लोग हैं जो अपने आदर्शों और आशाओं का परित्याग कर सकते हैं? और ऐसा कौन है जो अपने कदमों को थाम ले और केवल अपने ही बारे में सोचना बंद कर दे? परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके साथ निकटता से सहयोग करें और उसके प्रबंधन को पूर्ण करें। उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो उसे समर्पित होने के लिये अपने दिमाग और देह को उसके प्रबंधकारणीय कार्य के लिये अर्पित कर दें; उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत नहीं है जो अपने हाथ फैलाए खड़े रहें और उससे हर दिन मांगते ही रहें, उसे ऐसे लोग तो बिल्कुल नहीं चाहिए जो थोड़ा-सा कुछ करेंगे और फिर इस बात का इंतज़ार करेंगे कि अब परमेश्वर उनके लिये कुछ करे। परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है जो ज़रा-सा कुछ करेंगे और फिर ऐसा दिखलाएंगे जैसे पता नहीं उन्होंने कितना बड़ा काम कर दिया। वह ऐसे नृशंस लोगों से भी घृणा करता है जो उसके प्रबंधकारणीय कार्य को तो पसंद नहीं करते लेकिन हमेशा स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने की बातें करते रहते हैं। वह उन लोगों से तो और भी अधिक नफ़रत करता है जो मनुष्य को बचाने के लिये उसके काम से पैदा हुए मौके का फायदा उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये लोग इस बात की चिंता कभी नहीं करते कि परमेश्वर अपने प्रबंधकारणीय कार्य के द्वारा क्या प्राप्त और अर्जित करना चाहता है वे केवल परमेश्वर के कार्य के द्वारा उपलब्ध अवसरों का उपयोग करके आशीषें प्राप्त करने के बारे में ही चिंता करते रहते हैं। वे परमेश्वर के हृदय की चिंता नहीं करते, वे पूरी तरह से स्वयं के भविष्य और नियति में व्यस्त रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य को पसंद नहीं करते और उसकी इच्छा और मानवजाति को बचाने के कार्य में ज़रा सा भी दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, वे परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य से अलग जाकर केवल वही करते हैं जो उन्हें भाता है। परमेश्वर उनके व्यवहार का स्मरण नहीं करता, न उनका अनुमोदन करता है और न ही वह उनके प्रति ज़रा-सा भी अनुकूल भाव दिखाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर संपूर्ण सृष्टि का प्रभु है" | अंश 206

पिछले दो युगों के कार्यों में से एक चरण का कार्य इस्राएल में सम्पन्न हुआ; दूसरा यहूदिया में हुआ। सामान्य तौर पर कहा जाए तो, इस कार्य का...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" | अंश 136

देहधारी परमेश्वर के कार्य में दो भाग शामिल हैं। जब सबसे पहली बार उसने देह धारण किया, तो लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया या उसे नहीं...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "क्या त्रित्व का अस्तित्व है?" | अंश 298

यह अधिकांश लोगों को उत्पत्ति से परमेश्वर के शब्दों को याद दिला सकता है: "हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ।" यह...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "आरंभ में मसीह के कथन : अध्याय 88 | अंश 236

अब मैं तुम लोगों के लिए अपने प्रशासनिक आदेशों की घोषणा करता हूँ (जो घोषणा के दिन से प्रभावी होंगे और भिन्न-भिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न...