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परमेश्वर के दैनिक वचन

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परमेश्वर के दैनिक वचन

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन (परमेश्वर को जानने का तरीका)
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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

जब प्रभु यीशु मानव जाति के साथ रहता था, उसने किसानों को अपने खेतों में देखरेख करते हुए देखा था, वह जानता था कि जंगली पौधे क्या है और खमीर उठना क्या है; वह समझ गया कि मनुष्य अनमोल धन को पसंद करते हैं, इस प्रकार उसने अनमोल धन और अनमोल मोती के अलंकार का प्रयोग किया; और उसने मछुवारों को लगातार जाल फैलाते हुए भी देखा था; और इत्यादि। प्रभु यीशु ने मानव जाति की जीवन में इन गतिविधियों को देखा था; और उसने उस प्रकार के जीवन का अनुभव भी किया था। वह किसी अन्य मनुष्य के समान एक साधारण व्यक्ति था, जो मनुष्यों के तीन वक्त के भोजन और दिनचर्या का अनुभव कर रहा था। उसने व्यक्तिगत रूप से एक औसत इंसान के जीवन का अनुभव किया था, और उसने दूसरों की ज़िन्दगियों को भी देखा था। जब उसने यह सब कुछ देखा और व्यक्तिगत रूप से इन का अनुभव किया, तब उसने यह नहीं सोचा कि किस प्रकार एक अच्छा जीवन पाया जाए या वह किस प्रकार और अधिक स्वतन्त्रता, तथा अधिक आराम से जीवन बिता सकता है। जब वह सच्चे मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, प्रभु यीशु ने लोगों के जीवन में कठिन शारीरिक दुःख देखा, और उसने शैतान की भ्रष्टता के अधीन लोगों के कठिन शारीरिक क्लेश, अभागेपन, और उनकी उदासी को देखा, कि वे शैतान की अधीनता में जी रहे थे, और पाप में जी रहे थे। वह व्यक्तिगत रूप से मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, उसने यह भी महसूस किया कि जो लोग भ्रष्टता के बीच जीवन बिता रहे थे वे लोग कितने असहाय थे, उसने उन लोगों की दुर्दशा को देखा और अनुभव किया जो पाप में जीवन बिताते थे, जो शैतान के द्वारा, अर्थात् बुराई के द्वारा लाए गए अत्याचार में कहीं खो गए थे। जब प्रभु यीशु ने इन चीज़ों को देखा, तो क्या उसने उन्हें अपनी दिव्यता में देखा था या अपनी मानवता में? उसकी मानवता सचमुच में अस्तित्व में थी—यह बिल्कुल जीवन्त थी—वह यह सब कुछ अनुभव कर सकता था और देख सकता था, और वास्तव में उसने इसे उसके सार और उसकी दिव्यता में भी देखा। स्वयं मसीह अर्थात् मनुष्य प्रभु यीशु ने इसे देखा, और वह सब कुछ जो उसने देखा था उस से उसने उस कार्य के महत्व और आवश्यकता का एहसास किया जिसे उसने इस समय अपनी देह में शुरू किया था। यद्यपि वह स्वयं जानता था कि वह उत्तरदायित्व जिसे उसे लेने की जरूरत थी कितना विशाल है, और वह दर्द जिस का वह सामना करेगा कितना बेरहम होगा, और जब उसने पाप में जी रहे मानव जाति की असहाय स्थिति को देखा, जब उसने उनकी ज़िन्दगियों में अभागेपन और व्यवस्था के अधीन उनके कमज़ोर संघर्ष को देखा, तो उसने और अधिक दर्द का अनुभव किया, और मानव जाति को पाप से बचाने के लिए और भी ज़्यादा चिन्तित हो गया था। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करेगा या किस प्रकार का दर्द सहेगा, क्योंकि वह पाप में जी रहे मानव जाति को बचाने के लिए और अधिक दृढ़निश्चयी हो गया था। इस प्रक्रिया के दौरान, क्या तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु ने उस कार्य को और अधिक स्पष्टता से समझना प्रारम्भ कर दिया था जिसे उसे करने की आवश्यकता थी और जो उसे सौंपा गया था। और वह उस कार्य को पूर्ण करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया जिसे उसे लेना था—मानव जाति के सभी पापों को लेने के लिए, मानव जाति के लिए प्रायश्चित करने के लिए ताकि वे आगे से पाप में ना जीएँ और परमेश्वर पापबलि के कारण मनुष्य के पापों को भुला देगा, और इस से उसे स्वीकृति मिलेगी कि वह मानव जाति को बचाने के लिए अपने कार्य को आगे बढ़ा सके। ऐसा कहा जा सकता है कि प्रभु यीशु अपने हृदय में, मानव जाति के लिए अपने आपको न्यौछावर करने, और अपने आपको बलिदान करने का इच्छुक था। वह एक पापबलि के रूप में कार्य करने और सूली पर चढ़ने के लिए भी इच्छुक था, और वह इस कार्य को पूर्ण करने के लिए उत्सुक था। जब उसने मनुष्यों के जीवन की दयनीय दशा को देखा, तो वह जितना जल्दी हो सके अपने लक्ष्य को पूरा करना चाहता था, वह भी बिना किसी मिनट और सेकण्ड की देरी के। जब उसे ऐसी अति शीघ्रता का एहसास हुआ, तब वह यह नहीं सोच रहा था कि उसका दर्द कितना भयानक होगा, और ना ही उसने तनिक भी यह सोचा कि उसे कितना अपमान सहना होगा—उसने बस अपने हृदय में इच्छाशक्ति को थामे रखाः जब तक वह अपने को भेंट चढ़ाए रहेगा, जब तक उसे पापबलि के रूप में सूली पर लटकाकर रखा जाएगा, परमेश्वर की इच्छा की इच्छा को पूरा किया जाएगा और वह अपने नए कार्य की शुरूआत कर पाएगा। पाप में गुज़र रही मानवजाति की ज़िन्दगियाँ, और पाप में बने रहने की उसकी स्थिति पूर्णत: बदल जाएगी। उसकी दृढ़ता और जो उसने करने का निर्णय लिया था वे मानव जाति को बचाने से सम्बन्धित थे, और उसके पास केवल एक उद्देश्य थाः परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना, ताकि वह अपने कार्य के अगले चरण की सफलतापूर्वक शुरूआत कर सके। यह सब कुछ उस समय प्रभु यीशु के मन में था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

देहधारी परमेश्वर सबसे प्रिय है


परमेश्वर ने देह बनकर, इंसानों के बीच रहकर, देखी उनकी बुराई, और हालात ज़िंदगी के। देहधारी परमेश्वर ने महसूस कीं इंसान की मजबूरियां, इंसान की दयनीयता, इंसान का दुख-दर्द। देह में परमेश्वर अपने सहज ज्ञान से, हो गया ज़्यादा दयालु मानव की हालत के लिए, हो गया ज़्यादा चिंतित अपने भक्तों के लिए अपने भक्तों के लिये। अपने भक्तों के लिये।


प्रभु जिनका प्रबंधन करना और जिनको बचाना चाहते हैं, क्योंकि अपने दिल में वो, उनको बहुत चाहते हैं; उसके लिए वो ही सबसे ऊपर हैं। प्रभु ने बड़ी कीमत चुकाई है। कपट भोगा है और चोट खाई है। मगर हारता नहीं है परमेश्वर, काम करता रहता है निरंतर, ना कोई शिकवा, ना पछतावा कोई। देह में परमेश्वर अपने सहज ज्ञान से, हो गया ज़्यादा दयालु मानव की हालत के लिए, हो गया ज़्यादा चिंतित अपने भक्तों के लिए अपने भक्तों के लिये। अपने भक्तों के लिये।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

परमेश्वर के दैनिक वचन

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश XII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश VII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XI) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश XI) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II (अंश IX) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI (अंश V) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश II) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश VII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश VIII) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II (अंश V) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश VIII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश VIII) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X (अंश III) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश X) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश IV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश XI) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश V) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X (अंश II) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II (अंश X) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश V) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश XV) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश VII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XVII) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश XIV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश IX) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश X) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश III) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश I) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश III) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश IV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश VII) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश II) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश VI) परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है (अंश III) परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है (अंश II) परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है (अंश I)

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