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परमेश्वर के दैनिक वचन

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परमेश्वर के दैनिक वचन

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन (परमेश्वर को जानने का तरीका)
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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

चूँकि परमेश्वर के द्वारा माँगा गया था, इसलिए जब अब्राहम ने अपने पुत्र—अपने एकलौते प्रिय पुत्र—को परमेश्वर को लौटा दिया (टिप्पणी: यहाँ पर हम "बलिदान" शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते हैं; हमें यह कहना चाहिए कि उसने अपने पुत्र को परमेश्वर को वापस किया), तब परमेश्वर ने न केवल अब्राहम को इसहाक का बलिदान करने की अनुमति नहीं दी, बल्कि उसने उसे आशीषित भी किया। उसने अब्राहम को किस प्रतिज्ञा से आशीषित किया था? उसके वंश को बहुगुणित करने की प्रतिज्ञा से आशीषित किया था। और उन्हें कितनी मात्रा में बहुगुणित करने की प्रतिज्ञा की गई थी? बाइबल हमें निम्नलिखित लेख प्रदान करती है: "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा: और पृथ्वी की सारी जातियाँ तेरे वंश के कारण अपने को धन्य मानेंगी।" वह सन्दर्भ क्या था जिसके अंतर्गत परमेश्वर ने इन वचनों को कहा था? कहने का तात्पर्य है, अब्राहम ने परमेश्वर की आशीषों को कैसे प्राप्त किया था? उसने उन्हें प्राप्त किया ठीक वैसे ही जैसे परमेश्वर पवित्र शास्त्र में कहता है: "क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" अर्थात्, क्योंकि अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञा का अनुसरण किया था, क्योंकि उसने वह सब कुछ किया जो परमेश्वर ने कहा, मांगा और आदेश दिया था, जरा सी भी शिकायत के बगैर इस लिए परमेश्वर ने उस से ऐसी प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण वाक्य है जो उस समय परमेश्वर के विचारों को स्पर्श करता है। क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? शायद तुम लोगों ने परमेश्वर के इन वचनों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया है कि "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" उनका मतलब है कि, जब परमेश्वर ने इन वचनों को कहा, तब वह अपनी ही शपथ खा रहा था। जब लोग कसम खाते हैं तो वे किसकी शपथ खाते हैं? वे स्वर्ग की शपथ खाते हैं, कहने का अभिप्राय है, वे ख़ुदा के लिए कसम खाते हैं और परमेश्वर की शपथ खाते हैं। हो सकता है कि लोगों के पास उस घटना की ज़्यादा समझ नहीं है जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई थी, परन्तु तुम लोग इस बात को समझने के योग्य होगे जब मैं तुम लोगों को सही व्याख्या प्रदान करूंगा। ऐसे मनुष्य से सामना होने पर जो सिर्फ उसके वचनों को सुन सकता है लेकिन उसके हदय को नहीं समझ सकता है उसने एक बार फिर से परमेश्वर को अकेला और खोया हुआ महसूस कराया। निराशा में—और, ऐसा कहा जा सकता है, अवचेतन रूप से—परमेश्वर ने कुछ ऐसा किया जो बहुत ही स्वाभाविक था: परमेश्वर ने अपना हाथ अपने हृदय पर रखा और अब्राहम से स्वयं ही प्रतिज्ञा के फल के विषय में कहा, और इससे मनुष्य ने परमेश्वर को यह कहते हुए सुना "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" परमेश्वर के कार्यां के माध्यम से, तू स्वयं के विषय में सोच सकता है। जब तू अपना हाथ अपने हृदय पर रखता है और स्वयं से कहता है, तो क्या तेरे पास जो कुछ तू कह रहा है उसके विषय में कोई स्पष्ट विचार होता है? क्या तेरी मनोवृत्ति सच्ची है? क्या तू सच्चाई से, और अपने हृदय से बात करता है? इस प्रकार, हम यहाँ देखते हैं कि जब परमेश्वर ने अब्राहम से कहा, तब वह सच्चा एवं ईमानदार था। उसी समय अब्राहम से बात करते और उसे आशीष देते समय, परमेश्वर स्वयं से भी बोल रहा था। वह अपने आप से कह रहा थाः मैं अब्राहम को आशीष दूंगा, और उसके वंश को आकाश के तारों के समान अनगिनित करूंगा, और समुद्र के किनारे की रेत के समान असंख्य कर दूंगा, क्योंकि उसने मेरे वचनों को माना है और यह वही है जिसे मैंने चुना है। जब परमेश्वर ने कहा "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ," तो परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अब्राहम में इस्राएल के चुने हुए लोगों को उत्पन्न करेगा, जिसके बाद वह शीघ्रता से अपने कार्य के साथ इन लोगों की अगुवाई करेगा। अर्थात्, परमेश्वर अब्राहम के वंशजों से परमेश्वर के प्रबन्धन के कार्य का बोझ उठवाएगा, और परमेश्वर का कार्य और वह जिसे परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया गया था वे अब्राहम के साथ प्रारम्भ होंगे, और वे अब्राहम की सन्तानों में निरन्तर आगे बढेंगे, इस प्रकार वे मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर की इच्छा को साकार करेंगे। तुम लोग क्या कहते हो, क्या यह एक आशीषित बात नहीं है? मनुष्य के लिए, इससे बड़ी और कोई आशीष नहीं है; ऐसा कहा जा सकता है कि यह अत्यंत ही आशीषित बात है। अब्राहम के द्वारा हासिल की गई आशीष उसके वंश के बहुगुणित होने के लिए नहीं थी, परन्तु अब्राहम के वंशजों में उसके प्रबंधन, उसके आदेश, और उसके कार्य की उपलब्धि के लिए थी। इसका अर्थ है कि अब्राहम के द्वारा हासिल की गई आशीषें अस्थायी नहीं थीं, परन्तु लगातार जारी रहीं जैसे परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना बढ़ती गई। जब परमेश्वर ने कहा, और जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब उसने पहले ही एक दृढ़ निश्चय कर लिया था। क्या इस दृढ़ निश्चय की प्रक्रिया सही थी? क्या यह वास्तविक थी? परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय किया था कि, उस समय के बाद से, उसकी कोशिशें, वह कीमत जो उसने चुकाई थी, उसका स्वरूप, उसकी हर चीज़, और यहाँ तक कि उसका जीवन भी अब्राहम को और अब्राहम के वंशजों को दे दिया जाएगा। परमेश्वर ने यह भी दृढ़ निश्चय किया कि, इस समूह के लोगों से प्रारम्भ करके, वह अपने कार्यों को प्रदर्शित करेगा, और मनुष्य को अनुमति देगा कि वह उसकी बुद्धि, अधिकार और सामर्थ को देखे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

परमेश्वर मूल्यवान मानता है उनको जो उसकी सुनते और उसका आदेश मानते हैं


परमेश्वर को नहीं फर्क पड़ता हो मनुष्य नम्र या महान। जब तक वह सुनता है परमेश्वर की, मानता है परमेश्वर के आदेश और जो सौंपता है परमेश्वर, जुड़ा रहता है उसके कार्य, उसकी योजना और उसकी इच्छा से, जिससे कि उसकी इच्छा और योजना बढ़ सकें बिना अड़चन के, ऐसे कार्य हैं योग्य, योग्य परमेश्वर की स्मृति के, और हैं योग्य प्राप्ति के, प्राप्ति उसके आशीष की। परमेश्वर ऐसे लोगों को सहेजता, और संजोता है उनके कार्यों को, और उनके हृदय और स्नेह को जो हैं उसके लिए। यही है मनोवृत्ति परमेश्वर की।


परमेश्वर को नहीं फर्क पड़ता हो मनुष्य नम्र या महान। जब तक वह सुनता है परमेश्वर की, मानता है परमेश्वर के आदेश और जो सौंपता है परमेश्वर, जुड़ा रहता है उसके कार्य, उसकी योजना और उसकी इच्छा से, जिससे कि उसकी इच्छा और योजना बढ़ सकें बिना अड़चन के, ऐसे कार्य हैं योग्य, योग्य परमेश्वर की स्मृति के, और हैं योग्य प्राप्ति के, प्राप्ति उसके आशीष की। परमेश्वर ऐसे लोगों को सहेजता, और संजोता है उनके कार्यों को, और उनके हृदय और स्नेह को जो हैं उसके लिए। यही है मनोवृत्ति परमेश्वर की। यही है मनोवृत्ति परमेश्वर की।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

परमेश्वर के दैनिक वचन

बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं (अंश I) संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन: अध्याय 27 (अंश I) केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है (अंश I) परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश V) परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश IV) परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश I) क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है (अंश II) परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश III) स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है (अंश III) स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है (अंश II) जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, तब तक परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा (अंश II) केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है (अंश II) परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है (अंश V) परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है (अंश IV) परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है (अंश III) परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है (अंश I) परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार (अंश V) परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार (अंश III) परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार (अंश II) तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है (अंश II) तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है (अंश I) व्यवस्था के युग का कार्य (अंश II) व्यवस्था के युग का कार्य (अंश I) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश IX) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश VIII) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश VII) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश V) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश IV) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश III) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश I) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (अंश VII) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (अंश VI) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (अंश V) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (अंश IV) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (अंश III) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (अंश II) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (अंश I) परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है (अंश IV) संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन: अध्याय 29 (अंश II) राज्य का युग वचन का युग है (अंश I) बाइबल के विषय में (1) (अंश IV) संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन: अध्याय 29 (अंश I) संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन: अध्याय 10 (अंश II) संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन: अध्याय 10 (अंश I) परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3) (अंश III) छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी (अंश III) छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी (अंश I) परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य (अंश VIII) परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य (अंश VII) परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है (अंश II) परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है (अंश I) सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है (अंश III) सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है (अंश II) सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है (अंश I) अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो (अंश III) अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो (अंश II) अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश V) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश VI) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश IV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XVI) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V (अंश I) संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन: अध्याय 26 (अंश I) क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? (अंश II) मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है (अंश III) मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है (अंश I) उद्धारकर्त्ता पहले ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है (अंश III) उद्धारकर्त्ता पहले ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है (अंश II) उद्धारकर्त्ता पहले ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है (अंश I) सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे (अंश II) सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे (अंश I) परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है (अंश III) परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है (अंश II) परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है (अंश I) परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है (अंश II) परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है (अंश I) केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है (अंश IV) परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश VIII) परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार (अंश IV) परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार (अंश I) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश VI) भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है (अंश II) केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है (अंश III) केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है (अंश II) केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है (अंश I) जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं (अंश II) क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है (अंश I) परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है (अंश II) केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है (अंश III) मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है (अंश II) केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है (अंश I) परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे (अंश II) छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी (अंश II) जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, तब तक परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा (अंश I) स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है (अंश IV) आज परमेश्वर के कार्य को जानना (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश XII) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश X) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश VI) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश IV) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II (अंश VIII) परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास (अंश II) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX (अंश II) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश III) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश VIII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश XII) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V (अंश II) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II (अंश II) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX (अंश III) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII (अंश I) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XIV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश V) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश II) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश X) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश V) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश VI) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश II) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश VI) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश XII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश VII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XI) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश XI) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI (अंश V) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश II) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश VII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश VIII) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX (अंश I) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II (अंश V) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश VIII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश VIII) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X (अंश III) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश X) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश IV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश V) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X (अंश II) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश I) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश V) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश XV) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश VII) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश XVII) स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I (अंश XIV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश IX) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III (अंश III) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश I) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II (अंश III) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश IV) परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I (अंश VII) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश II) परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें (अंश VI) परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है (अंश III) परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है (अंश II) परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है (अंश I)

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