सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

मसीह के न्याय के अनुभव की गवाहियाँ

ठोस रंग

विषय-वस्तुएँ

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

0 खोज परिणाम

कोई परिणाम नहीं मिला

`

8. यह जानना कि मैं फरीसियों के मार्ग पर चलती आई हूँ

वुज़िन ताइयुआन सिटी, शांग्ज़ी प्रांत

कोई चीज़ जिसके बारे में हमने पिछले संवादों में हमेशा चर्चा की है, वह है पतरस और पौलुस द्वारा चले गए मार्ग। यह कहा जाता है कि पतरस ने स्वयं को और परमेश्वर को जानने पर ध्यान दिया था, और ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित था, जबकि पौलुस ने केवल अपने कार्य, प्रतिष्ठा और हैसियत पर ध्यान दिया था, और ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत था। मैं पौलुस के मार्ग पर चलने से हमेशा डरते रही हूँ, इसी वजह से मैं आमतौर पर प्रायः पतरस के अनुभवों के बारे में परमेश्वर के वचनों को पढ़ती हूँ, ताकि यह देख सकूँ कि उसने परमेश्वर को कैसे जाना। कुछ समय तक ऐसे जीने के बाद, मुझे लगता था कि मैं पहले ही तुलना में ज्यादा आज्ञाकारी बन गई थी, प्रतिष्ठा और हैसियत के लिए मेरी इच्छा कम हो गई थी, और कि मैं स्वयं को थोड़ा-थोड़ा जानने लगी थी। उस समय, मैं यह मानती थी कि भले ही मैं पूरी तरह से पतरस के मार्ग पर नहीं हूँ, लेकिन ऐसा कहा जा सकता था कि मैंने उसका किनारा छू लिया है, और कम से कम इसका अर्थ यह है कि मैं पौलुस के मार्ग पर नहीं जा रही थी। हालाँकि, परमेश्वर के वचन के प्रकाशन से मुझे शर्मिंदगी होती थी।

एक सुबह, जब मैं आध्यात्मिक प्रार्थनाओं का अभ्यास कर रही थी, तो मैंने परमेश्वर के निम्नलिखित वचन पढ़े: "पतरस का कार्य परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य का निर्वहन था। उसने प्रेरित के किरदार होकर में कार्य नहीं किया था, परन्तु परमेश्वर के प्रेम के उसके अनुसरण के पथक्रम के दौरान कार्य किया था। पौलुस के कार्य के पथक्रम में उसका व्यक्तिगत अनुसरण भी शामिल था… उसके कार्य में कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे-यह सब उसके स्वयं के लिए था, और उसे परिवर्तन के अनुसरण (खोज) के मध्य सम्पन्न नहीं किया गया था। उसके कार्य में हर एक चीज़ एक सौदा था, यह परमेश्वर के प्राणी के किसी भी कर्तव्य या समर्पण को शामिल नहीं करता था। अपने कार्य के पथक्रम के दौरान, पौलुस के पुराने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। उसका कार्य महज दूसरों की सेवा के लिए था, और उसके स्वभाव में बदलावों को लाने में असमर्थ था। …पतरस अलग था: वह ऐसा व्यक्ति था जो काँट-छाँट से होकर गुज़रा था, और व्यवहार एवं शुद्धीकरण से होकर गुज़रा था। पतरस के कार्य का लक्ष्य एवं प्रेरणा मूलभूत रुप से पौलुस से अलग थे। हालाँकि पतरस ने बडी मात्रा में काम नहीं किया था, फिर भी उसका स्वभाव कई बदलावों से होकर गुज़रा था, और जिसकी उसने खोज की वह सत्य, एवं वास्तविक बदलाव था। उसके कार्य को सिर्फ काम के लिहाज से ही सम्पन्न नहीं किया गया था। यद्यपि पौलुस ने बहुत कार्य किया था, फिर भी वह सब पवित्र आत्मा का कार्य था, और हालाँकि पौलुस ने इस कार्य में सहयोग किया था, फिर भी उसने इसका अनुभव नहीं किया था। यह कि पतरस ने बहुत कम कार्य किया था जो केवल इसलिए था क्योंकि पवित्र आत्मा ने उसके माध्यम से अत्यधिक कार्य नहीं किया था" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से)। परमेश्वर के वचनों ने मेरी आत्मा को छू लिया और मैं शांत महसूस करने लगी: पतरस एक ऐसा व्यक्ति था जो एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करता था। वह एक प्रेरित के रूप में अपनी भूमिका के विपरीत परमेश्वर को प्रेम करने की कोशिश करने की अपनी प्रक्रिया के माध्यम से कार्य करता था। लेकिन क्या मैं ऐसी व्यक्ति थी जो एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा कर रही थी या मैं बस एक कार्यकर्ता के रूप में अपना कार्य कर रही थी? इस समय, मैं पूर्व की विभिन्न परिस्थितियों के बारे में सोचती थी: जब कलीसिया में करने के लिए बहुत सारा कार्य होता था, तो अन्य भाई-बहन कहा करते थे: आप लोग सच में परमेश्वर के कार्य के बोझ से दबे हुए हो। तब मैं तपाक से कहती: हम अगुआओं के पास इससे निपटने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कभी-कभी, मेजबान परिवारों में या सह-कर्मियों के सामने, मैं अपने भौतिक शरीर पर विचारशील बनना और स्वयं को आराम देना चाहती, लेकिन फिर मैं सोचती: नहीं, मैं अगुआ हूँ, मुझे सामान्य मानवता में नहीं जीना चाहिए और विलासितापूर्ण नहीं बनना चाहिए। जब भी मुझे परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का मन नहीं करता, मैं तब भी यह सोचती: एक अगुआ के रूप में, अगर मैं परमेश्वर के वचन नहीं खाती और पीती हूँ, तो मैं कैसे दूसरे लोगों की समस्याओं को हल करने में सक्षम होऊँगी? कभी-कभी मैं किसी सह-कर्मी के साथ उस मेजबान ​परिवार के पास जाती जिनके साथ वह ठहरी हुई थी, और जब मैं देखती कि वह मेजबान बहन जितने उत्साह के साथ उसके साथ बर्ताव करती, उतने उत्साह के साथ मुझसे नहीं करती थी, तो मैं परेशान हो जाती: तुम शायद जानती नहीं हो कि मैं कौन हूँ, लेकिन मैं इसकी अगुआ हूँ। कभी-कभी, किसी भी कारण से, मेजबान भाई-बहनों के साथ संवाद करने का मेरा मन नहीं करता, लेकिन फिर मैं सोचती: एक अगुआ के रूप में, यदि मैं आती हूँ लेकिन लोगों के साथ संवाद नहीं करती हूँ तो लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? चूँकि मैं एक अगुआ हूँ, इसलिए मुझे मेजबान परिवारों के साथ संवाद करना ही चाहिए। … इन विभिन्न बर्तावों ने मुझे दिखाया कि: मैं हैसियत की वजह से कार्य कर रही थी। चाहे यह लोगों से संवाद करना हो, सभाओं में शामिल होना हो, या सामान्य मामलों को सँभालना हो, यह सब केवल इसलिए था क्योंकि मैं एक अगुआ थी, जिस वजह से मैं थोड़ा सा अपने कर्तव्य को पूरा करने और थोड़ा सा कार्य करने के लिए बाध्य महसूस करती थी। मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा नहीं कर रही थी, और इससे भी अधिक मैं परमेश्वर को प्रेम करने की अपनी प्रक्रिया के माध्यम से कार्य नहीं कर रही थी जैसी पतरस ने की थी। अगर चीजें पहले की ही तरह जारी रहती, तो जब वह दिन आता कि मुझे निष्कासित और प्रतिस्थापित कर दिया जाता, तब मैं संभवत: उस तरह से अपना कर्तव्य पूरा करना जारी नहीं रखती जिस तरह से मैं अभी करती हूँ। केवल तभी मैंने देखा कि मैं वह व्यक्ति नहीं थी जिसने सत्य का अभ्यास किया ​था या जो परमेश्वर की इच्छा के लिए विचारशील थी। बल्कि, मैं ​एक अधम ख़लनायिका थी जो केवल प्रतिष्ठा और हैसियत के लिए कार्य करती थी। मैं जिस तरह से कार्य करती थी वैसे कार्य करके परमेश्वर के प्रति ईमानदारी रखना असंभव था क्योंकि यह मात्र बेपरवाही से किया जाता था। मैं अपनी इच्छा से सत्य का अभ्यास नहीं कर रही थी और परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील नहीं थी, क्योंकि "यह सब उसके स्वयं के लिए था, और उसे परिवर्तन के अनुसरण (खोज) के मध्य सम्पन्न नहीं किया गया था।" ऐसी सेवा परमेश्वर की इच्छा को संभवतः कैसे संतुष्ट कर सकती थी? पौलुस एक प्रेरित के रूप में अपने पद में कार्य कर रहा था; उसका कार्य लेन-देन से भरा हुआ था। मैं एक अगुआ के रूप में अपने पद में कार्य कर रही थी और व्यय कर रही थी। परमेश्वर में विश्वास करने के लिए ऐसे इरादे और उद्देश्य कैसे पौलुस के प्रयोजनों और उद्देश्यों से अलग हैं?

इस समय, मैं परमेश्वर के समक्ष गिर पड़ी: हे परमेश्वर! समय पर उद्धार के लिए तेरा धन्यवाद, जिसने मुझे मेरी मूर्छा से उठाया, मेरी असली स्थिति का ज्ञान करवाया, और दिखाया कि मैं अभी भी फरीसी पौलुस के मार्ग पर चल रही थी। मेरा कार्य और मेरा कर्तव्य को पूरा करना बिल्कुल फरीसियों की तरह था, जिसने तुझे निराश अवश्य किया होगा। हे, सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मैं तेरे वचन के मार्गदर्शन में अपने गलत इरादों और धारणाओं को दूर करने की इच्छुक हूँ। मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने और परमेश्वर को प्रेम करने की प्रक्रिया के माध्यम से मुझे जो कुछ भी करना चाहिए वह करने में पतरस के उदाहरण का पालन करने, एक अगुआ के तौर पर अपनी भूमिका के पद में अब और कार्य नहीं करने, और पतरस के मार्ग को खोजने और उस ओर बढ़ने के लिए अपनी पूरी कोशिश करने की इच्छुक हूँ!

पिछला:पतन से पहले की एक घमंडी आत्मा

अगला:परमेश्वर की सेवा करते समय नई चालाकियाँ मत ढूँढो

शायद आपको पसंद आये