मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 32. सत्य प्रदान करना दूसरों का नेतृत्व करने का वास्तविक मार्ग है

अगर आप लोग दूसरों का नेतृत्व करने और, सबसे महत्वपू्र्ण बात, परमेश्वर के गवाहों के रूप में सेवा करने का कार्य करना चाहते हैं, तो लोगों को बचाने में परमेश्वर के उद्देश्य और उसके कार्य के उद्देश्य की समझ आप में होनी चाहिए। आपको परमेश्वर की इच्छा और लोगों से उनकी विभिन्न अपेक्षाओं को समझना चाहिए। आपको अपने प्रयासों में व्यावहारिक होना चाहिए; केवल उतना ही अनुभव करना चाहिए जितना आप समझते हैं और केवल वहीं बात करनी चाहिए जो आप जानते हैं। डींगें न मारें, बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोलें, और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ न करें। अगर आप बढ़ा चढ़ा कर बोलेंगे, तो लोग आपसे घृणा करेंगे और आप बाद में अपमानित महसूस करेंगे; यह बहुत अधिक अनुचित होगा। जब आप दूसरों को सत्य प्रदान करते हैं, तो उनके सत्य प्राप्त कर लेने के लिए यह जरूरी नहीं कि आप उन्हें मजबूर करें। अगर आपके पास सत्य नहीं है, फिर भी आप दूसरों को मजबूर करते हैं, तो वे आपसे डरेंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सत्य को समझ जाते हैं। कुछ प्रशासनिक कार्यों में, दूसरों से निपटना और उन्हें काँटना-छाँटना और उन्हें एक हद तक अनुशासित करना आपके लिए सही है। लेकिन अगर आप सत्य प्रदान नहीं कर सकते हैं और केवल यह जानते हैं कि रोबदार कैसे बनें और दूसरों का तिरस्कार कैसे करें, तो आपका भ्रष्टाचार और भद्दापन प्रकट हो जाएगा। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे लोग आपसे जीवन या व्यावहारिक चीजें प्राप्त करने में असमर्थ होंगे, वे आपसे नफ़रत करने लगेंगे, आपसे घृणा महसूस करने लगेंगे। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है वे आप से नकारात्मक चीजें सीखेंगे; वे दूसरों से निपटना और उन्हें काँटना-छाँटना, गुस्सा होना, अपना आपा खोना सीखेंगे। क्या यह दूसरों को पौलुस के मार्ग, विनाश की तरफ जाने वाले मार्ग पर भेजने के समान नहीं है? क्या यह शैतान वाला काम नहीं है? आपका कार्य सत्य के प्रसार और दूसरों को जीवन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर आप आँख बंद करके दूसरों से निपटते हैं और उन्हें उपदेश देते हैं, तो वे कभी भी सत्य को कैसे समझ पाएंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोग देखेंगे कि आप वास्तव में क्या हैं, और वे आपका साथ छोड़ देंगे। आप इस तरह से दूसरों को परमेश्वर के समक्ष लाने की आशा कैसे कर सकते हैं? यह कैसे कार्य कर रहा है? अगर आप इसी तरह से कार्य करते हैं तो आप आपको सौंपे गए सभी कार्यों में विफल हो जाएँगे। इसके अतिरिक्त, अगर हर कोई आपसे दूर रह रहा है, तो आप किस काम को पूरा करने की आशा करते हैं? भूतकाल में, कुछ अगुवों ने बिल्कुल इसी तरह से व्यवहार किया। वे सकारात्मक और व्यावहारिक कार्यों के निष्पादन में विफल रहे; जब कार्य की व्यवस्थाएँ ऊपर से आईं, वे उन्हें क्रियान्वित करने में विफल रहे। उन्होंने विशिष्ट कार्यों को निष्पादित नहीं किया। उन्होंने केवल अपने शब्दों और सिद्धांतों का प्रसार भर किया या आँख मूंदकर दूसरों को निपटाया और उनकी कटाई-छँटाई की। परिणास्वरूप, लोग उनसे डरने लगे और उनसे दूर रहने लगे। उन्होंने काम को पूरा खराब कर दिया और फिर दावा किया कि वे तो केवल अपना कार्य कर रहे थे। अंत में, वे निकाल दिए गए, और घर भेज दिए गए।

अगर आपका स्वभाव नहीं बदला है तो आप परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग स्वयं के लिए बहाने बनाते हैं, कहते हैं: “मैं चीनी लोगों के संपर्क में हूँ, और चीनी लोग बहुत भ्रष्ट होते हैं। परिणामस्वरूप, मैं अपने ऊपर उनके प्रभाव के कारण भ्रष्ट हो गया हूँ। इसलिए, अगर मैंने कुछ अपराध किए हैं, तो निश्चित रूप से, वे क्षमा योग्य हैं। अगर मेरा परदेशियों के साथ संपर्क होता और मुझे उनके प्रभाव से लाभ मिला हो, तो मैं एक बेहतर इंसान बन जाता।” यह तर्क अव्यावहारिक है। किसी के स्वभाव में परिर्वतन कोई ऐसी चीज नहीं है जो दूसरों से सीखी जा सकती है। ज्ञान, ईमानदारी, अंतर्दृष्टि, व्यवहार, बोलने की शैली और अन्य सभी बाहरी चीजें दूसरों से सीखी जा सकती हैं; लेकिन जीवन और सत्य केवल परमेश्वर के वचन से ही प्राप्त हो सकता है। जब आप परमेश्वर के वचनों को आत्मसात करते हैं, तो आपको सत्य को समझने के लिए एक उचित पथ का अनुसरण करना चाहिए, लेकिन यह सत्य को अभ्यास में लाने और वास्तविकता में प्रवेश करने जैसा नहीं है। सत्य को समझने के लिए, उसे इस तरह से आत्मसात करना चाहिए। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के लिए प्रेम के सत्य से संबंधित अवतरण को आत्मसात करने की बात करें। परमेश्वर का वचन कहता है: “प्रेम एक पवित्र और दोषरहित भावना है। प्रेम में, संदेह नहीं होता है, बाधाएँ नहीं होती हैं, कोई दूरी नहीं होती है, जहां आप अपने हृदय का उपयोग प्रेम करने और विचारशील बनने के लिए करते हैं।” यह प्रेम की परिभाषा है। यह सत्य है। परमेश्वर प्रेम के बारे में यहीं बात कहते हैं। लेकिन आप किससे प्रेम करेंगे? क्या आप अपने पति से प्रेम करेंगी? अपनी पत्नी से? अपने भाईयों और बहनों से? नहीं! जब परमेश्वर प्रेम की बात करते हैं, तो वे साथी मनुष्य के प्रति आपके प्रेम के बारे में नहीं कहते हैं, बल्कि मनुष्य के परमेश्वर के प्रति प्रेम के बारे में कहते हैं। यह सच्चे प्रेम का स्वरूप है। इस सत्य को कैसे समझें? इसका अर्थ है परमेश्वर चाहते हैं कि लोग उन पर संदेह नहीं करें या उनसे दूरी नहीं बनाएँ; यह प्रेम पवित्र होता है और दोषरहित होता है। दोष रहित होने का अर्थ है परमेश्वर के प्रति आपकी अपेक्षाएँ अनावश्यक नहीं होती हैं; इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर के प्रति आपका प्रेम बिना किसी शर्त का है और उसके लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं है; इसका अर्थ है कि आप केवल परमेश्वर से प्रेम करते हैं और किसी अन्य से नहीं। परमेश्वर के अतिरिक्त, अन्य कोई भी चीज आपके हृदय में स्थान नहीं बना सकती है; यह भावना पवित्र है और दोषरहित है। इस भावना का आपके हृदय में एक विशेष स्थान है; आप हमेशा उनके बारे में विचार करते हैं और उनकी कमी महसूस करते हैं, और प्रत्येक क्षण उन्हें याद करते रहते हैं। प्रेम का अर्थ है अपने हृदय से प्रेम करना। हृदय से प्रेम करने में विचारशील होना, परवाह करना और अभिलाषा के साथ याद करना शामिल है। अपने हृदय से प्रेम करने के लिए, आपको पहले समझना सीखना चाहिए। वर्तमान समय में, जबकि आपमें समझ की कमी है, आपको अपने हृदय का उपयोग उनके लिए लालायित होने, उनकी लालसा करने, उसकी आज्ञा मानने, उनकी देखभाल करने, उनकी प्रार्थना करने, और उनके लिए रो पड़ने के लिए करना होगा; आपको उनके विचारों और चिंताओं को साझा करने में भी सक्षम होना चाहिए। आपको इन चीजों में अपना दिल लगाना होगा। दिखावटी प्रेम नहीं करें, बोलें: “परमेश्वर! मैं यह आपके लिए कर रहा हूँ, और मैं वह आपके लिए कर रहा हूँ!” केवल तब जब आप अपने हृदय से परमेश्वर को प्यार और संतुष्ट करते हैं, तो इसका व्यावहारिक महत्व होता है। यद्यपि आप इतनी जोर से नहीं बोलते हैं, परमेश्वर आपके हृदय में होते हैं, अपने हृदय में आप उनके बारे में सोच रहे होते हैं। आप अपने पति, अपनी पत्नी, अपने बच्चे, अपने रिश्तेदारों को छोड़ सकते हैं; लेकिन आपका हृदय परमेश्वर के बगैर नहीं रह सकता है। परमेश्वर के बिना, आप जीवित नहीं रह सकते हैं। आप उन्हें छोड़ नहीं सकते हैं। इसी का अर्थ परमेश्वर से प्रेम करना है और उन्हें अपने हृदय में रखना है। परमेश्वर को अपने हृदय से प्रेम करना और उनकी चिंता करना बहुत कुछ है। यही वह सच्चा प्रेम है जिसकी अपेक्षा परमेश्वर आपसे करते हैं; दूसरे शब्दों में, आपको उनसे प्रेम और उनकी चिंता अपने हृदय से करनी चाहिए, और उन्हें सदैव अपने मन में रखना चाहिए। अभ्यास के लिए, अपने हृदय का उपयोग करें, न कि अपनी बोली का। अपने कार्यों का उपयोग बाहरी दिखावे के लिए नहीं करें, बल्कि, मुख्य रूप से, अपने हृदय से अभ्यास करें, अपने हृदय को आपका व्यवहार नियंत्रित करने दें, आपके सभी कार्यों को नियंत्रित करने दें। कोई प्रेरणा नहीं होनी चाहिए, कोई मिलावट नहीं होनी चाहिए, कोई संदेह नहीं होना चाहिए; एक पवित्र हृदय को ऐसा ही होना चाहिए। जहाँ तक बात संदेह की है, संदिग्ध होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि आप हमेशा सोच रहे होते हैं: “क्या परमेश्वर का ऐसा करना उचित है? परमेश्वर ने ऐसा क्यों कहा? अगर यह परमेश्वर ने कहा है, लेकिन इसके पीछे कोई कारण नहीं है, तो मैं इसका पालन नहीं करुंगा। अगर परमेश्वर ऐसा करते हैं, लेकिन यह अन्यायपूर्ण है, तो मैं इसका पालन नहीं करुंगा। मैं फिलहाल इसे छोड़ दूंगा।” संदेह नहीं करने का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर जो कुछ भी कहते हैं और करते हैं वह सही है, और परमेश्वर के लिए कुछ भी सही या गलत नहीं होता है। मनुष्य को परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए, परमेश्वर का ख्याल रखना चाहिए, परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और उनके विचारों और चिंताओं को साझा करना चाहिए। इस पर ध्यान दिए बगैर कि परमेश्वर जो भी कुछ भी करते हैं वह अर्थपूर्ण प्रतीत होता है या नहीं या आपके लिए उपयुक्त है या नहीं, चाहे यह आपकी धारणाओं के अनुकूल हो या नहीं, और चाहे यह आपकी समझ में आता हो या नहीं, या यह आपकी कल्पनाओं के अनुरूप हो या नहीं, आपको हमेशा उनकी आज्ञा माननी चाहिए और परमेश्वर जो कुछ भी करते हैं उनके प्रति एक नम्र, आज्ञाकारी हृदय रखना चाहिए। आखिरकार, क्या इस प्रकार का अभ्यास यह सत्य के अनुरूप नहीं है? क्या यह प्रेम की अभिव्यक्ति और अभ्यास नहीं है? इसलिए, अगर आप परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं, अगर आप उनके वचनों के अभिप्रायों को नहीं समझते हैं, अगर आप उस लक्ष्य या परिणाम को नहीं समझते हैं जिसे वे प्राप्त करना चाहते हैं, अगर आप यह नहीं समझते हैं कि उनके वचन मनुष्य में क्या सिद्ध करना चाहते हैं और क्या उत्तम बनाना चाहते हैं, तो आपने अभी तक सत्य को समझा नहीं है। परमेश्वर जो कहते हैं उसे क्यों कहते हैं? वे उस स्वर में क्यों बोलते हैं? वे अपने हर शब्द में इतने ईमानदार और निष्कपट क्यों हैं? वे विशिष्ट शब्दों को, और अन्यों को नहीं, उपयोग के लिए क्यों चुनते हैं? क्या आप जानते हैं? अगर नहीं, तो इसका अर्थ है कि आप परमेश्वर की इच्छा या उनके इरादों को नहीं समझते हैं, आप उनके शब्दों के पीछे संदर्भ को नहीं समझते हैं। अगर आप यह समझ नहीं पाते हैं, तो आप सत्य को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? सत्य को प्राप्त करने का अर्थ है कि आप उनकी इच्छा को उनके द्वारा बोले जाने वाले हर शब्द के माध्यम से समझते हैं। एक बार आप समझ जाते हैं, फिर आप उसे अभ्यास में ले आते हैं। आप परमेश्वर के वचन के साथ जीवित रहते हैं, और उसे वास्तविकता बनाते हैं। केवल और केवल तभी, आप कह सकते हैं कि आप वास्तव में सत्य को समझ पाए हैं। आपके द्वारा परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से समझ जाने पर ही आप वास्तव में सत्य को समझ सकते हैं। आप परमेश्वर के वचन को केवल सतही तौर पर समझते हैं। उदाहरण के लिए, आप कहते हैं, “परमेश्वर चाहता है कि हम ईमानदार हों और कपटी न हों; इसलिए, हमें ईमानदार होना चाहिए।” लेकिन परमेश्वर क्यों चाहते हैं कि लोग ईमानदार हों और कपटी न हों? परमेश्वर क्यों चाहते हैं कि लोग उनसे प्रेम करें? वे लोगों से उसकी अपेक्षा क्यों करते हैं? वे इस तरह की परिभाषाएँ क्यों बनाते हैं? सब कुछ एक निश्चित प्रभाव को प्राप्त करने के लिए कहा जाता है। सत्य जिसे परमेश्वर व्यक्त करते हैं वे उन लोगों को लक्षित होते हैं जिनमें सत्य की प्यास है, जो सत्य के लिए प्रयास करते हैं और जो सत्य को पसंद करते हैं। उन लोगों के लिए जो शब्दों और सिद्धांतों की चिंता करते हैं तथा लंबे और आडंबरपूर्ण भाषण देना पसंद करते हैं, वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे। वे स्वयं को बेवकूफ बना रहे हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में गलत दृष्टिकोण रखते हैं; जैसे उनका उद्देश्य गलत होता है, वैसे ही उनका दृष्टिकोण भी गलत होता है। कुछ लोग केवल परमेश्वर के वचनों पर शोध करना जानते हैं, और अध्ययन करते हैं कि परमेश्वर सौभाग्शाली होने के बारे में और मनुष्य के अंतिम गंतव्य के बारे में क्या कहते हैं। अगर परमेश्वर के वचन उनकी धारणाओं के अनुकूल नहीं होते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं और तलाश करना बंद कर देते हैं। इसका अर्थ है कि उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे बस अच्छा करने के तरीके खोजने के लिए, आसान मार्ग अपनाना चाहते हैं ताकि वे स्वयं को महान प्रदर्शित कर सकें और अंततः एक बढ़िया गंतव्य प्राप्त कर सकें। इस तरह के लोग परमेश्वर के वचनों को आत्मसात तो कर सकते हैं, लेकिन उन्हें सत्य प्राप्त नहीं होता है। कुछ अन्य लोग भी हैं जो परमेश्वर के वचनों को आत्मसात करते हैं, लेकिन वे बस बिना रुचि के काम करते हैं; वे सोचते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ को समझ कर सत्य प्राप्त कर लिया है। कितने अज्ञानी हैं वे! परमेश्वर के वचनों को आत्मसात कर लेना सत्य को समझ लेने के बराबर नहीं है; जरूरी नहीं है कि सत्य को पढ़ लेना सत्य को समझ लेने के बराबर हो। परमेश्वर का वचन ही सत्य है। हालांकि, परमेश्वर के वचनों को पढ़ लेने का अर्थ जरूरी नहीं कि आप उनके अर्थ को भी समझ लेंगे और सत्य को प्राप्त कर लेंगे। परमेश्वर के वचनों को आत्मसात कर लेना या तो आपको सत्य की ओर ले जाएगा या शब्दों और सिद्धांतों की ओर ले जाएगा। आप नहीं जानते कि सत्य को प्राप्त करने का अर्थ क्या है। आप अपनी हथेलियों में परमेश्वर के वचनों को रख सकते हैं; लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद, आप फिर भी परमेश्वर की इच्छा को समझने में विफल रहते हैं, आप केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों को ही प्राप्त करते हैं। सर्वप्रथम, आपको पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन इतने सरल नहीं हैं; परमेश्वर के वचन में बहुत गहराई है। कई वर्षों के अनुभव के बगैर, आप परमेश्वर के वचनों को संभवतः कैसे समझ सकते हैं? केवल एक वाक्य को ही पूरी तरह अनुभव करने में आपका पूरा जीवन-काल लग जाएगा। आप परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, लेकिन परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं; आपने उनके वचनों के उद्देश्यों, उनके उद्गम, उस प्रभाव को नहीं समझा है जो वे प्राप्त करना चाहते हैं, या जो वे हासिल करेंगे। आपने इनमें से कुछ भी नहीं समझते हैं, तो आप सत्य को कैसे समझ सकते हैं? संभवतः आपने किताब के पृष्ठों को कई बार पलटा हो; आपने उसे कई बार पढ़ा हो। शायद आपने इसके कई अंशों को कंठस्थ कर लिया हो, लेकिन आप अभी भी बदले नहीं हैं; आपने अभी भी कोई प्रगति नहीं की है। परमेश्वर के साथ आपका संबंध हमेशा की तरह दूरस्थ और विरक्त है। आपके और परमेश्वर के बीच, पहले की ही तरह, अभी भी बाधाएँ हैं। आपको अभी भी उनके प्रति संदेह है। न केवल आप परमेश्वर को नहीं समझते हैं, बल्कि आप उनका विरोध करते हैं और उनका तिरस्कार भी करते हैं। आप परमेश्वर से बहाने बनाते हैं और उनके बारे में धारणाएँ बनाते हैं। इस मामले में, आप कैसे कह सकते हैं कि आपने सत्य प्राप्त कर लिया है? हर किसी के पास परमेश्वर के वचन की प्रतिलिपि है जो वे प्रत्येक दिन पढ़ते हैं, और वे सत्य के संदेश से टिप्पणी बनाते हैं, लेकिन अंत में, अलग-अलग लोग अलग-अलग परिणाम प्राप्त करते हैं। कुछ लोग सिंद्धांतों पर ध्यान देते हैं, जबकि अन्य लोग अपने अभ्यास पर ध्यान केंद्रित करते हैं। कुछ लोग वह अध्ययन करना पसंद करते हैं जो गहरा और रहस्यमय है, जबकि अन्य लोग मनुष्य के भविष्य के गंतव्य के बारे में जानना पसंद करते हैं। कुछ प्रशासनिक आदेशों का अध्ययन करना पसंद करते हैं, जबकि अन्य लोग सांत्वना के शब्दों की तलाश में रहते हैं। कुछ लोग भविष्यवाणियाँ पढ़ना पसंद करते हैं, जबकि अन्य लोग पवित्र आत्मा द्वारा कलीसियाओं को बोले गए वचनों को पढ़ना पसंद करते हैं। और अन्य लोग “मेरे पुत्र” होना भी पसंद करते हैं। लेकिन इससे उन्हें अंत में क्या प्राप्त होता है? आजकल, कुछ नए विश्वासी हैं जो कहते हैं: “देखो परमेश्वर का वचन कितना संत्वना देने वाला है! ‘मेरे पुत्र, मेरे पुत्र!’ दुनिया में और कौन हमें ऐसी सांत्वना दे सकता है?” हालांकि, वे यह नहीं समझते हैं कि ये शब्द किनके लिए अभीष्ट हैं, वे अभी तक समझ नहीं पाए हैं; और यहाँ तक कि परमेश्वर के नए कार्य[क] को एक या दो साल तक स्वीकार करने के बाद भी, कुछ लोग अभी भी समझने में विफल हैं। वे इन बातों को शर्मिंदा हुए बगैर, बिना लाल हुए या झेंपे, कहते हैं। क्या सत्य समझने का अर्थ यहीं है? वे परमेश्वर की इच्छा को भी नहीं समझते हैं, लेकिन वे परमेश्वर के पुत्रों की हैसियत धारण करने की हिम्मत करते हैं! ऐसे लोग परमेश्वर के वचन से क्या सीखते हैं? वे केवल परमेश्वर के वचन की गलत व्याख्या करते हैं और उन्हें बिगाड़ देते हैं। वे लोग जो सत्य के खिलाफ हैं वे कभी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाएँगे, भले ही वे परमेश्वर के वचन को कितनी भी बार क्यों न पढ़ें। वे सत्य से घृणा करते हैं, और यदि आप उन्हें इसके बारे में बताते भी हैं, तो वे ध्यान नहीं देंगे। वे लोग जो सत्य से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, परमेश्वर की इच्छा की खोज करेंगे और उन्हें समझेंगे; वे पड़ताल करेंगे, और दूसरों को सत्य बताएँगे। केवल इस प्रकार के व्यक्ति से ही आशा है कि वे सत्य को प्राप्त करेंगे। ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों पर शोध करना पसंद करते हैं। वे निरंतर इस बारे में चिंता करते हैं कि परमेश्वर का रुपांतरण कैसे होगा और परमेश्वर अंततः कब प्रस्थान करेंगे। वे हमेशा परमेश्वर के दिन बारे में चिंता करते हैं, लेकिन उन्हें स्वयं अपने जीवन की कोई चिंता नहीं होती है। वे जो इन मुद्दों पर इतने चिंतित रहते हैं वे वास्तव में परमेश्वर के अपने काम हैं। अगर आप हमेशा इस तरह के प्रश्न पूछते रहते हैं, तो आप परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों में दखल दे रहे होते हैं, परमेश्वर की प्रबंधन योजना में दखल दे रहे होते हैं। यह तर्कहीन है। यह परमेश्वर के स्वभाव के खिलाफ एक अपराध है। अगर आप वास्तव में पूछना चाहते हैं, अगर आप वास्तव में जानना चाहते हैं, अगर आप वास्तव में स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, तो परमेश्वर से प्रार्थना करें और बोलें: “हे परमेश्वर, मैं इन चीजों में शामिल नहीं होना चाहता हूँ, वे आपकी प्रबंधन योजना से संबंधित हैं। वे आपके अपने मामले हैं, और मुझे उनमें दखल नहीं देना चाहिए।” परमेश्वर के मामलों को मनुष्य कैसे समझ सकता है? परमेश्वर अपने कार्य या प्रबंधन योजना के बारे में स्वयं नहीं बोलते हैं। अगर परमेश्वर कोई चीज नहीं बताते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे नहीं चाहते हैं कि लोग जानें। हर चीज जो परमेश्वर चाहते हैं कि लोग जानें वह परमेश्वर के वचन वाली किताब में शामिल है, और आपको वास्तव में उसे पढ़ना चाहिए। आपको जो कुछ भी समझने की आवश्यकता है वह इस किताब में शामिल है; कई सत्य हैं जिन्हें आपको समझना चाहिए। आप उन्हें इस किताब के भीतर खोज सकते हैं। जो कुछ भी छोड़ दिया गया है, आपको उन चीजों में नहीं घुसना चाहिए। अगर ऐसा कुछ है जिसे परमेश्वर ने आपको नहीं बताया है, तो भले ही आप कितनी भी छानबीन क्यों न कर लें, यह बेकार होता है। हर चीज जो आपको पता होनी चाहिए, परमेश्वर ने आपको पहले ही बता दी है। कोई भी चीज जो आपको नहीं जानना चाहिए, परमेश्वर नहीं बोलेंगे या बताएँगे। आज, आप में से अधिकतर सही रास्ते पर नहीं हैं। आप यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर के वचन को कैसे पढ़ना चाहिए, अभी भी आप अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह हैं। सत्य को समझने के लिए, आपको अभी भी बहुत लंबा सफ़र तय करना है। अगर आप परमेश्वर के वचन को गहराई से नहीं पढ़ते हैं और अपने कार्य में स्वयं को नहीं लगाते हैं, तो आप सत्य कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

पाद टिप्पणी:

मूल पाठ में “परमेश्वर का नया कार्य” नहीं है।