82. नवागंतुकों के सिंचन के सिद्धांत

(1) यह आवश्यक है कि पहले सहभागिता के माध्यम से दर्शन के सत्यों को स्पष्ट किया जाए ताकि नए लोगों की परमेश्वर के कार्य को जानने, उसके प्रति सच्चा विश्वास रखने में अगुवाई की जा सके और इस तरह से एक नींव डाली जाए।

(2) नवागंतुकों के साथ प्रेम और धैर्य से व्यवहार करना चाहिए, और उनकी विभिन्न धारणाओं और अड़चनों को लक्षित करके, परमेश्वर के वचनों के अनुसार उनकी समस्याओं को हल करने के लिए उनके साथ सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए।

(3) पहले, तुम्हें यह पता लगाना चाहिए कि कौन-से नवागंतुक परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखते हैं और सत्य से प्रेम करते हैं। अच्छी योग्यता वालों के लिए सिंचन और प्रावधान देने पर, और उन्हें विकसित तथा प्रशिक्षित करने पर ध्यान दो।

(4) उन लोगों को प्रशिक्षित करना आवश्यक है, जो सुसमाचार फैलाने के लिए एक प्रतिभा रखते हैं ताकि वे दर्शन के बारे में सत्यों पर सहभागिता करना सीखें, इंजीलवाद के सिद्धांतों को समझें और सुसमाचार का प्रचार करें और परमेश्वर के लिए गवाही दें।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के दर्शनों को जानना और उसके कार्य के सामान्य निर्देशों को समझना होगा। यह सकारात्मक प्रवेश है। एक बार जब तुम दर्शनों के सत्य में सही ढंग से महारत हासिल कर लोगे, तो तुम्हारा प्रवेश सुरक्षित हो जाएगा; चाहे परमेश्वर का कार्य कैसे भी क्यों न बदले, तुम अपने हृदय में अडिग बने रहोगे, दर्शनों के बारे में स्पष्ट रहोगे, और तुम्हारे पास तुम्हारे प्रवेश और तुम्हारी खोज के लिए एक लक्ष्य होगा। इस तरह से, तुम्हारे भीतर का समस्त अनुभव और ज्ञान अधिक गहरा और विस्तृत हो जाएगा। एक बार जब तुम इन सारे महत्वपूर्ण चरणों को उनकी संपूर्णता में समझ लोगे, तो तुम्हें जीवन में कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा, और तुम भटकोगे नहीं। यदि तुम कार्यों के इन चरणों को नहीं जानोगे, तो तुम्हें इनमें से प्रत्येक चरण पर नुकसान उठाना पड़ेगा, और तुम्हें चीजें ठीक करने में कुछ ज्यादा दिन लगेंगे, और तुम कुछ सप्ताह में भी सही मार्ग पकड़ने में सक्षम नहीं हो पाओगे। क्या इससे देरी नहीं होगी? सकारात्मक प्रवेश और अभ्यास के मार्ग में बहुत-कुछ ऐसा है, जिसमें तुम लोगों को महारत हासिल करनी होगी। जहाँ तक परमेश्वर के कार्य के दर्शनों का संबंध है, तुम्हें इन बिंदुओं को अवश्य समझना चाहिए : उसके विजय के कार्य के मायने, पूर्ण बनाए जाने का भावी मार्ग, परीक्षणों और क्लेश के अनुभवों के माध्यम से क्या हासिल किया जाना चाहिए, न्याय और ताड़ना के मायने, पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत, तथा पूर्णता और विजय के सिद्धांत। ये सब दर्शनों के सत्य से संबंध रखते हैं। शेष हैं व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण, और साथ ही भावी गवाही। ये भी दर्शनों के सत्य हैं, और ये सर्वाधिक मूलभूत होने के साथ-साथ सर्वाधिक महत्वपूर्ण भी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

क्या तुम लोगों को पता है कि फिलहाल तुम्हारे अंदर कौन-सी बातें होनी चाहिए? इसके एक पहलू में कार्य के बारे में दर्शन शामिल है, और दूसरा पहलू है तुम्हारा अभ्यास। तुम्हें इन दोनों पहलुओं को समझना होगा। यदि जीवन में प्रगति करने की तुम्हारी खोज में दर्शनों की कमी है, तो तुम्हारी कोई नींव नहीं होगी। यदि तुम्हारे पास केवल अभ्यास के मार्ग हैं और दर्शन बिल्कुल भी नहीं है, और पूरी प्रबंधन योजना के कार्य की कोई भी समझ नहीं है, तो तुम बेकार हो। तुम्हें उन सत्यों को समझना होगा जिसमें दर्शन शामिल हैं, और जहाँ तक अभ्यास से संबंधित सत्यों का प्रश्न है, तुम्हें उन्हें समझने के बाद अभ्यास के उचित मार्गों की खोज करनी होगी; तुम्हें वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, और अपनी स्थिति के अनुसार उसमें प्रवेश करना चाहिए। दर्शन नींव हैं, और यदि तुम इस तथ्य पर ध्यान नहीं देते, तो तुम अंत तक अनुसरण नहीं कर सकोगे। इस तरह अनुभव करना, या तो तुम्हें भटका देगा या तुम्हें नीचे गिराकर विफल कर देगा। तुम्हारे लिए सफल होने का कोई रास्ता नहीं होगा! जिन लोगों की नींव में महान दर्शन नहीं हैं, वे विफल ही होते हैं, सफल नहीं हो सकते। तुम मजबूती से खड़े नहीं रह सकते हो! क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ क्या है? क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर के अनुसरण में क्या शामिल होता है? दर्शनों के बिना, तुम किस मार्ग पर चलोगे? आज के कार्य में, यदि तुम्हारे पास दर्शन नहीं हैं तो तुम किसी भी हाल में पूरे नहीं किए जा सकोगे। ...

एक बार जब लोगों को दर्शन हो जाते हैं, तो उनका एक आधार होता है। जब तुम इस आधार पर अभ्यास करोगे, तो प्रवेश करना बहुत आसान होगा। इस तरह, एक बार जब तुम्हारे पास प्रवेश करने का आधार होगा, तो तुम्हें कोई गलतफहमी नहीं होगी, और तुम्हारे लिए प्रवेश करना बहुत आसान होगा। दर्शनों को समझने का, परमेश्वर के कार्य को जानने का यह पहलू महत्वपूर्ण है; तुम लोगों के भंडार में यह होना ही चाहिए। यदि सत्य का यह पहलू तुम्हारे अंदर नहीं है, और तुम केवल अभ्यास के मार्गों के बारे में ही बात करना जानते हो, तो तुम्हारे अंदर बहुत से दोष होंगे। मुझे पता चला है कि तुम लोगों में से कई सत्य के इस पहलू पर बल नहीं देते, और जब तुम इसे सुनते हो तो ऐसा लगता है कि तुम लोग केवल सिद्धांतों और शब्दों को सुन रहे हो। एक दिन तुम हार जाओगे। इन दिनों कुछ ऐसे कुछ कथन हैं जो तुम्हें ठीक से समझ नहीं आते हैं और जिन्हें तुम स्वीकार नहीं करते हो; ऐसे मामलों में तुम्हें धैर्यपूर्वक खोज करनी चाहिए, और वह दिन आएगा जब तुम समझ जाओगे। थोड़ा-थोड़ा करके तुम अधिक से अधिक दर्शन-लाभ करो। अगर तुम केवल कुछ आध्यात्मिक सिद्धांतों को ही समझ लो, तो भी यह दर्शनों की ओर ध्यान न देने से बेहतर होगा, और यह किसी भी सिद्धांत को न समझने से बेहतर होगा। यह सभी तुम्हारे प्रवेश के लिए सहायक हैं, और तुम्हारे उन संदेहों को दूर कर देंगे। यह तुम्हारे धारणाओं से भरा होने से बेहतर है। नींव के रूप में इन दर्शनों को रखने से तुम कहीं बेहतर स्थिति में होगे। तुम्हें किसी प्रकार की कोई गलतफहमी नहीं होगी, और तुम सिर उठाकर और आत्मविश्वास के साथ प्रवेश कर पाओगे। हमेशा इतने भ्रमित और संदेहयुक्त होकर अनुसरण करने का क्या लाभ? क्या यह रेत में मुँह छिपाने जैसा नहीं है? विश्वास के साथ और सिर उठाकर राज्य में प्रवेश करना कितना अच्छा होगा! इतनी गलतफहमियाँ पालने से क्या लाभ? क्या तुम अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मार रहे हो? एक बार जब तुम्हें यहोवा के कार्य, यीशु के कार्य और कार्य के इस चरण की समझ प्राप्त हो जायेगी, तो तुम्हारे पास एक आधार होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को कार्य को समझना चाहिए—भ्रम में अनुसरण मत करो!' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

अंत के दिनों में मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य के साथ समन्वय करने के लिए, कलीसिया में सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को नए विश्वासियों के सिंचन का नेक काम करना चाहिए, ताकि वे जल्द से जल्द सच्चे मार्ग पर चलने की अच्छी नींव स्थापित कर सकें और परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग में प्रवेश कर सकें। अगर नये विश्वासी परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के बाद, पहले साल में ही अच्छी नींव स्थापित नहीं करते हैं, तो शैतान और मसीह-विरोधियों द्वारा उनको धोखा दिया जाना अभी भी आसान होगा और वे भटककर खतरनाक क्षेत्र में पहुंच जाएंगे। अगर ऐसा होता है, तो हम उन्हें सुसमाचार का प्रचार करने के लिए जो बड़ी कीमत चुकाते हैं वह बेकार चली जाएगी। जो लोग पहले ही परमेश्वर के सामने आ चुके हैं उन्हें शैतान धोखा देकर दूर क्यों ले जाएगा? इसका दोष नये विश्वासियों की कमज़ोरी पर नहीं डाला जा सकता। यह परिस्थिति मुख्य रूप से इसलिए आती है क्योंकि कलीसिया में सभी स्तरों पर अगुआओं ने आपूर्ति और सिंचन के अपने कार्य में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। यह एक ऐसी जिम्मेदारी है जिससे कलीसिया के सभी स्तरों के अगुआ भाग नहीं सकते। परमेश्वर की सेवा करने वाले सभी लोगों ने एक बार परमेश्वर के प्रति वफ़ादार रहने, अपनी इच्छा से परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का संकल्प लिया है। अगर वे परमेश्वर के घर में पहले ही प्रवेश कर चुके लोगों को भी बनाये नहीं रख सकते, तो परमेश्वर की इच्छा कैसे पूरी की जा सकती है? क्या यह परमेश्वर को मूर्ख बनाना और धोखा देना नहीं है? अगर परमेश्वर की सेवा करने वाला कोई व्यक्ति परमेश्वर के सौंपे हुए कार्य और परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकता है, तो वह संभवतः परमेश्वर की प्रशंसा कैसे पा सकता है और उसके राज्य में कैसे प्रवेश कर सकता है? परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का क्या मतलब है? सबसे बुनियादी बात है परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने वाले सभी लोगों को मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के इरादे को समझने, परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए सभी सत्य को समझने और सच्ची आज्ञाकारिता हासिल करके परमेश्वर की आराधना करने में मदद करना। इसका मतलब है कि परमेश्वर की इच्छा धरती पर ही पूरी की जाती है। अगर विभिन्न स्तरों पर कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता खुद को परमेश्वर के उद्धार कार्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित कर सकते हैं, उसके चुने हुए लोगों को उसके वचनों को खाने-पीने और उसके न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर उसके प्रति समर्पित होने के लिए मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं ताकि वे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकें, तो ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले लोग होंगे। इसलिए, नए विश्वासियों का सिंचन करना परमेश्वर के घर का सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण कार्य है, ताकि वे तुरंत सच्चे मार्ग पर चलने की एक मजबूत नींव बना सकें और अपनी आस्था में सही मार्ग में प्रवेश कर सकें। जिन सत्यों के साथ नए विश्वासियों का सिंचन किया जाना चाहिए उनमें शामिल हैं: परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का सत्य; परमेश्वर के देहधारण का सत्य; परमेश्वर के नामों का सत्य; परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के काम के बीच अंतर का सत्य; झूठे मसीहों के बीच सच्चे मसीह को पहचानने का सत्य; पवित्र आत्मा के कार्य को जानने और दुष्ट आत्माओं के काम को पहचानने का सत्य; परमेश्वर के वचनों को वास्तविक जीवन में अपनाने का सत्य; और एक ईमानदार व्यक्ति बनने का सत्य आदि। जिन लोगों ने हाल ही में परमेश्वर के कार्य के सत्य को स्वीकार किया है उन सभी के दिलों में इन सत्यों का गहराई से सिंचन करना ज़रूरी है ताकि उनकी नींव मजबूत हो सके। इससे यह सुनिश्चित हो सकता है कि वे सच्चे मार्ग पर अटल रहने में सक्षम होंगे और दुष्ट शैतान की कितनी भी मुश्किलों का सामना करने के बावजूद परमेश्वर को धोखा नहीं देंगे या उसे अस्वीकार नहीं करेंगे। जब किसी व्यक्ति का कार्य इस नतीजे पर पहुंचता है तभी वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार उसकी सेवा करता है और वास्तव में परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

यह कलीसियाई जीवन का सिद्धांत है : सच्चे दिल से परमेश्वर में आस्था रखने और सत्य का अनुसरण वाले भा‌ई-बहनों के साथ विशेष प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए। विश्वासी चाहे नए हों या वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रख रहे हों, उनके लिए सच्चा प्रेम होना चाहिए, उन्हें वास्तविक सहायता प्रदान की जानी चाहिए और उनके प्रति थोड़ी-बहुत समर्पण की भावना होनी चाहिए। सामान्य समय में, उनके साथ सत्य के बारे में अधिक संगति करनी चाहिए ताकि वे जल्द से जल्द सत्य को समझ कर जीवन में ऊपर उठ सकें। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, और कुछ समय तक उनके सिंचन के बाद, अगर यह पता चले कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते और न ही इसमें उनकी कोई रुचि है, तो उन पर बहुत अधिक समय और प्रयास खपाने की कोई आवश्यकता नहीं है; ऐसा करना अनावश्यक होगा, क्योंकि तुमने अपना दायित्व पूरा कर लिया है और जो कुछ भी परोपकार तुमसे अपेक्षित था, वह सब तुम कर चुके हो। हो सकता है कुछ लोगों की राय अलग हो और वे कहें, "जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते उनका और अधिक सिंचन और पोषण किया जाना चाहिए; तुम्हें उनसे सत्य का अनुसरण करवाने के तरीकों पर विचार करना चाहिए। इसके विपरीत, जो लोग पहले से ही सत्य का अनुसरण कर रहे हैं उन्हें अब चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वे अनुसरण करने का तरीका जान चुके हैं।" क्या यह दृष्टिकोण सही है? नहीं, यह सही नहीं है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं उनकी प्रकृति यही है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं। इस बात को साबित किया जा सकता है कि सत्य से प्रेम नहीं करने वाले नब्बे फीसदी लोग बेजान हैं। क्या तुम बेजान लोगों में जान डालने के लिए कृतसंकल्प हो? तुम यह कैसे सोचते हो कि तुम्हारे पास ऐसा करने की काबिलियत है? अगर मैं किसी बेजान व्यक्ति से टकराया, तो मैं फ़ौरन भाग जाऊँगा। अगर किसी व्यक्ति में पवित्र आत्मा कार्य नहीं कर रहा है, तो कोई चाहे कुछ भी करे उसका कोई फ़ायदा नहीं होगा। बेहतर होगा कि तुम्हारे पास जो थोड़ा-बहुत प्रेम है, तुम उसे परमेश्वर को समर्पित करो या फिर उन भाई-बहनों को दो जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं। कुछ लोग विवेकहीन होते हैं और उन्हें बिल्कुल भी यह अंदाज़ा नहीं होता है कि वे क्या हैं और उनमें कितनी काबिलियत है; कोई व्यक्ति जितना अधिक बेजान होता है वे उसे उतना ही अधिक बचाना चाहते हैं। अंत में, वे उस व्यक्ति को बचाने की कोशिश में अपना सारा समय लगा देते हैं, लेकिन किसी को भी बचा नहीं पाते हैं। आखिरकार, वे अपने ही जीवन प्रवेश में देरी करते हैं और जो भाई-बहन सचमुच सत्य का अनुसरण कर रहे हैं उनका सिंचन करने के लिए कोई नहीं होता, उनके जीवन की प्रगति धीमी हो जाती है। क्या यह एक गंभीर कार्य में देरी करने का मामला नहीं है? तुम्हें समझना होगा कि पवित्र आत्मा किन लोगों पर अपने कार्य को केन्द्रित करता है। क्या परमेश्वर उन लोगों को पूर्ण करता है जो सत्य का अनुसरण नहीं करते? यदि पवित्र आत्मा इतना भी न करे, तो लोग मूर्ख बनकर अपना समय क्यों बर्बाद करेंगे? क्या यह मानवीय अज्ञानता का उदाहरण नहीं है? इसलिए, तुम्हें उन भाई-बहनों को अधिक समर्थन देना चाहिए जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं, क्योंकि उन्हें ही परमेश्वर ने पहले से नियत किया और चुना है, और वह उन्हें ही बचाएगा। यदि तुम अक्सर इन लोगों के साथ सत्य पर संगति करो, पूरे दिलो-दिमाग से एक-दूसरे के साथ तालमेल बैठाओ, एक-दूसरे को समर्थन और पोषण दो, तो अंततः तुम सभी उद्धार प्राप्त कर पाओगे। यदि तुम इन लोगों के साथ सामँजस्य स्थापित न कर पाओ, तो इसका मतलब है तुमने परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया है। हर कलीसिया में कुछ गिने-चुने लोग होते हैं जो सत्य का अनुसरण करतेहैं; ऐसे ही लोगों पर पवित्र आत्मा का कार्य केंद्रित होता है। ये कलीसिया के महत्वपूर्ण लोग होते हैं। कलीसिया के महत्वपूर्ण लोग कैसे अस्तित्व में आते हैं? जिन लोगों पर भी पवित्र आत्मा अपना ध्यान केंद्रित करता है वे कलीसिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं। अगर तुम इन लोगों का सिंचन कर सकते हो, उनके आध्यात्मिक कद को परिपक्व बना सकते हो और उन्हें परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर ला सकते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य-निर्वहन पर्याप्त और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होगा। अगर तुम इन लोगों का सिंचन करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो और उन्हें अलग-थलग कर देते हो, उन्हें अनदेखा करते हो और फिर मुख्य रूप से उन भावनाहीन बेजान लोगों को बचाने पर ध्यान देते हो जो शैतान के साथी हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया या चुना नहीं गया है और वे सेवाकर्मी हैं, तो इससे साबित होता है कि तुम परमेश्वर के साथ ताल से ताल मिलाकर नहीं चल रहे हो; तुम उसके कार्य में रुकावट डाल रहे हो, पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग नहीं कर रहे हो और तुमने अपने काम में महत्वपूर्ण मुकामों को हासिल नहीं किया है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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