93. सिंचन और प्रावधान के सिद्धांत

(1) कार्य व्यवस्था के प्रकाश में, परमेश्वर के कौन-से वचनों को खाना-पीना चाहिए और किस सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए, यह चुनना आवश्यक है। केवल इस तरह से कोई क्रमशः सत्य को समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए तैयार हो सकता है।

(2) परमेश्वर के धर्मोपदेशों और सहभागिता के आधार पर पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य को और जिस मानव का वह उपयोग करता है, उसे जानना और व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करने में स्वयं को प्रशिक्षित करना आवश्यक है;

(3) सत्य पर सहभागिता के लिए प्रत्येक व्यक्ति के क़द, उसकी योग्यता, और व्यावहारिक कठिनाइयों को आधार बनाना आवश्यक है। सबके-लिए-एक-ही जैसी विधियों को काम में न लो, बल्कि अपने दृष्टिकोण को अपने दर्शकों के अनुसार अनुकूलित करो;

(4) परमेश्वर के वचनों को एक सभा में पढ़ा जाना चाहिए, और सत्य पर सहभागिता के माध्यम से भ्रष्टता को इस तरीके से सुधारना चाहिए जो लोगों की वास्तविक स्थिति और उनकी वास्तविक समस्याओं को संश्लेषित करे, जिससे उन्हें अभ्यास का एक मार्ग मिल सके।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता होने के नाते, अगर तुम लोग परमेश्वर के चुने लोगों का नेतृत्व वास्तविकता में करना चाहते हो और परमेश्वर के गवाहों के रूप में सेवा करना चाहते हैं, तो सबसे ज़रूरी है कि लोगों को बचाने में परमेश्वर के उद्देश्य और उसके कार्य के उद्देश्य की समझ तुम में होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और लोगों से उनकी विभिन्न अपेक्षाओं को समझना चाहिए। तुम्हें अपने प्रयासों में व्यावहारिक होना चाहिए; केवल उतना ही अभ्यास करना चाहिए जितना तुम समझते हो और केवल उस पर ही बात करनी चाहिए जो तुम जानते हो। डींगें न मारें, बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोलें, और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ न करें। अगर तुम बढ़ा चढ़ा कर बोलोगे, तो लोग तुमसे घृणा करेंगे और तुम बाद में अपमानित महसूस करोगे; यह बहुत अधिक अनुचित होगा। जब तुम दूसरों को सत्य प्रदान करते हो, तो उनके सत्य प्राप्त कर लेने के लिए यह जरूरी नहीं कि तुम उनसे निपटो या उन्हें फटकारो। अगर खुद तुम्हारे पास सत्य नहीं है, और तुम बस दूसरों से निपटते और फटकारते हो, तो वे तुमसे डरेंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सत्य को समझ जाते हैं। कुछ प्रशासनिक कार्यों में, दूसरों से निपटना और उन्हें काँटना-छाँटना और उन्हें एक हद तक अनुशासित करना तुम्हारे लिए सही है। लेकिन अगर तुम सत्य प्रदान नहीं कर सकते हो और केवल यह जानते हो कि रोबदार कैसे बनें और दूसरों का तिरस्कार कैसे करें, तो तुम्हारा भ्रष्टाचार और भद्दापन प्रकट हो जाएगा। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे लोग तुमसे जीवन या व्यावहारिक चीजों का पोषण प्राप्त करने में असमर्थ हो जाएंगे, वे तुमसे नफ़रत करने लगेंगे, तुमसे घृणा महसूस करने लगेंगे। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है वे तुम से नकारात्मक चीजें सीखेंगे; वे दूसरों से निपटना, उन्हें काँटना-छाँटना, गुस्सा होना और अपना आपा खोना सीखेंगे। क्या यह दूसरों को पौलुस के मार्ग, विनाश की तरफ जाने वाले मार्ग पर ले जाने के समान नहीं है? क्या यह शैतान वाला काम नहीं है? तुम्हारा कार्य सत्य के प्रसार और दूसरों को जीवन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर तुम आँख बंद करके दूसरों से निपटते हो और उन्हें उपदेश देते हो, तो वे कभी भी सत्य को कैसे समझ पाएंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोग देखेंगे कि तुम वास्तव में क्या हो, और वे तुम्हारा साथ छोड़ देंगे। तुम इस तरह से दूसरों को परमेश्वर के समक्ष लाने की आशा कैसे कर सकते हो? यह कार्य करना कैसे हुआ? अगर तुम इसी तरह से कार्य करते हो तो तुम सभी लोगों को खो दोगे। तुम आखिर किस काम को पूरा करने की आशा करते हो? कुछ अगुवे समस्याओं के समाधान के लिए सत्य का संचार करने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। इसके बजाय, वे बस आँख मूंदकर दूसरों को निपटारा करते हैं और अपनी शक्ति का दिखावा करते है जिससे दूसरे उनसे डरने लगें और उनका कहा मानें—ऐसे लोग झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों के होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव नहीं बदले हैं, वे कलीसिया का काम करने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य की वास्तविकता है' से उद्धृत

जब तुम लोग भविष्य में एक साथ होते हो, तो तुम्हें जीवन में प्रवेश करने के बारे में, स्वभाव में परिवर्तन और स्वयं को जानने जैसी सारपूर्ण चीज़ों के बारे में, बातें करते हुए अधिक समय बिताना चाहिए। जिन मामलों का सत्य से कोई सरोकार न हो, उनकी बात न किया करो। यदि तुम अक्सर इसका अभ्यास करते हो, तो तुम लोग सत्य की थोड़ी-सी वास्तविकता को हासिल कर लोगे। अभी तुम लोग उस कार्य को करने में सक्षम नहीं हो जो जीवन के लिए प्रावधान देता है। जब तुम सब, लोगों की सेवा करते हो और उन्हें प्रावधान देते हो, तो तुम केवल उन्हें नसीहत देकर ऐसा करते हो: “परमेश्वर की अवज्ञा मत करो, परमेश्वर का विरोध मत करो। हम बहुत भ्रष्ट हैं और फिर भी परमेश्वर हमें बचाता है, हमें भविष्य में परमेश्वर के वचनों पर ध्यान देना चाहिए।” यह सुनने के बाद, लोग इसे सिद्धांत के तौर पर समझ लेते हैं, लेकिन फिर भी बाद में उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं होता है, और वे खुद को नकारात्मकता से ऊपर उठा पाने में असमर्थ होते हैं। यह साबित करता है कि तुम लोगों के लिए अभी प्रवेश प्राप्त करना बाक़ी है। तुम अन्य लोगों की कठिनाइयों और भ्रष्ट स्वभावों की जड़ तक नहीं पहुँच सकते हो, तुम मुख्य बात को समझ नहीं सकते हो, क्योंकि तुम अभी भी खुद को नहीं जानते हो। इसलिए, कलीसिया में जीवन के लिए प्रावधान प्रदान करना तुम लोगों की क्षमता से परे है, और तुम केवल लोगों को नसीहत दे सकते हो, बस उनसे यह कह सकते हो कि वे अच्छे बनें और नेकी से आज्ञा-पालन करें। तुम लोग वास्तविक समस्याओं को हल करने में असमर्थ हो, जो साबित करता है कि तुम सब ने सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, कि तुम्हारे लिए अभी भी सत्य को हासिल करना बाक़ी है। तुममें से अधिकांश लोग केवल सिद्धांत का प्रचार करना जानते हो—अर्थात, तुम धर्मशास्त्र के प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते हो, तुम जीवन के लिए प्रावधान नहीं दे सकते हो, इसलिए तुम सभी का क़द बहुत छोटा है। परमेश्वर में आस्था के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण में अभी कोई परिवर्तन होना बाक़ी है। तुम्हारी समझ और तुम्हारी प्रेरणाएँ अभी भी पहले जैसी ही हैं। तुम चाहते हो कि अन्य लोग बदल जाएँ, लेकिन तुम कोई मार्ग नहीं देते हो, और तुम्हारे पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। तुम केवल पत्रों और सिद्धांतों के साथ लोगों को भाषण और नसीहत दे सकते हो। अंततः, तुम्हारी अगुवाई में रहे परमेश्वर के चुने हुए लोग फिर भी सत्य को नहीं समझ पाएँगे, और न ही उन्हें परमेश्वर के कार्य का सही ज्ञान होगा। अगर ऐसा हो, तो वे अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से कैसे निभा पाएँगे? वे परमेश्वर के अनुयायियों के रूप में कैसे उर्जित हो सकेंगे? अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के रूप में, तुम्हें यह समझ लेना और जान लेना चाहिए कि कलीसिया में भाइयों और बहनों को परमेश्वर के वचनों के बारे में किस तरह की समझ है, और उनके पास खुद अपने बारे में किस तरह का ज्ञान है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के रूप में क्या तुम लोगों के पास सत्य की वास्तविकता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नए युग में कैसे पार करें' से उद्धृत

तुम्हें उन अनेक स्थितियों की समझ होनी चाहिए, जिनमें लोग तब होते हैं, जब पवित्र आत्मा उन पर काम करता है। विशेषकर, जो लोग ईश्वर की सेवा में समन्वय करते हैं, उन्हें उन अनेक स्थितियों की और भी गहरी समझ होनी चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य से पैदा होती हैं। यदि तुम बहुत सारे अनुभवों या प्रवेश पाने के कई तरीकों के बारे में केवल बात ही करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बहुत ज़्यादा एकतरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने बिना और सत्य के सिद्धांतों को समझे बिना स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उसके फल को समझे बिना तुम्हारे लिए बुरी आत्माओं के कार्य को पहचानना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्य के साथ-साथ लोगों की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्र में पैठना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले अनेक भटकावों या लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने में होने वाली समस्याओं को भी इंगित करना चाहिए, ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालाँकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए, जो अधिकांश लोगों के लिए समान रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या "भैंस के आगे बीन बजाने" की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली कठिनाइयाँ हल करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, और तुम्हें समस्या के महत्वपूर्ण मुद्दों को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही परमेश्वर की सेवा में समन्वय करने योग्य है।

तुम प्रमुख मुद्दों को समझने और बहुत-सी चीजों को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम हो पाते हो या नहीं, यह तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों पर निर्भर करता है। जिस तरीके से तुम अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम अन्य लोगों की अगुआई भी करते हो। यदि तुम शब्द और सिद्धांत ही समझते हो, तो तुम दूसरों को भी शब्द और सिद्धांत समझने के लिए ही प्रेरित करोगे। तुम जिस तरीके से परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता का अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम दूसरों को परमेश्वर के कथनों की वास्तविकता में प्रवेश कराने के लिए उनकी अगुआई करोगे। यदि तुम बहुत-से सत्यों को समझते हो और परमेश्वर के वचनों से कई चीज़ों में स्पष्ट रूप से अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लेते हो, तो तुम दूसरों को भी बहुत-से सत्य समझाने के लिए उनका नेतृत्व कर पाने में सक्षम हो, और जिन लोगों का तुम नेतृत्व कर रहे हो, उन्हें दर्शनों की स्पष्ट समझ होगी। यदि तुम अलौकिक भावनाओं को समझने पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम जिन लोगों का नेतृत्व करते हो, वे भी वैसा ही करेंगे। यदि तुम अभ्यास की उपेक्षा करते हो और उसके बजाय चर्चा पर ज़ोर देते हो, तो जिन लोगों का तुम नेतृत्व करते हो, वे भी बिना कोई अभ्यास किए, या बिना अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन लाए, चर्चा पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे; वे बिना किसी सत्य का अभ्यास किए, केवल सतही तौर पर उत्साहित होंगे। सभी लोग दूसरों को वही देते हैं, जो उनके पास होता है। व्यक्ति जिस प्रकार का होता है, उसी से वह मार्ग निर्धारित होता है, जिस पर वह दूसरों का मार्गदर्शन करता है, और साथ ही उन लोगों का प्रकार भी, जिनका वह नेतृत्व करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक योग्य चरवाहे को किन चीज़ों से लैस होना चाहिए' से उद्धृत

तुम सब सत्य का सार निकालने में भटक गए हो; जब तुम ये सभी सार निकाल लेते हो, तो इससे केवल नियम ही प्राप्त होते हैं। तुम्हारा "सत्य का सार प्रस्तुत करना" लोगों को जीवन प्राप्त करने या अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने देने के लिए नहीं है। इसके बजाय, इसके कारण लोग सत्य के भीतर से कुछ ज्ञान और सिद्धांतों में निपुणता प्राप्त करते हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो कि वे परमेश्वर के कार्य के पीछे के प्रयोजन को समझते हैं, जबकि वास्तव में उन्होंने केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों में निपुणता हासिल की है। वे सत्य के मर्म को नहीं समझते हैं, और यह धर्मशास्त्र का अध्ययन करने या बाइबल पढ़ने से भिन्न नहीं है। तुम हमेशा इन पुस्तकों या उन सामग्रियों को संकलित करते रहते हो, और इसलिए सिद्धांत के इस पहलू या ज्ञान के उस पहलू को धारण करने वाले बन जाते हो। तुम सिद्धांतों के प्रथम श्रेणी के वक्ता हो—लेकिन जब तुम बोल लेते हो तो क्या होता है? तब लोग अनुभव करने में असमर्थ होते हैं, उन्हें परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं होती है और स्वयं की भी समझ नहीं होती है। अंत में, उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया होगा वे बस सूत्र और नियम ही होंगे। तुम उन चीजों के बारे में बात कर सकते हो लेकिन और कुछ नहीं। यदि परमेश्वर ने कुछ नया किया, तो क्या तुम लोगों को ज्ञात सभी सिद्धांत उस काम से मेल खाने वाले हो सकते हैं जो परमेश्वर करता है? तुम्हारी ये बातें केवल नियम हैं और तुम लोगों से केवल धर्मशास्त्र का अध्ययन करवा रहे हो: तुम उन्हें परमेश्वर के वचन या सत्य का अनुभव करने की अनुमति नहीं दे रहे हो। इसलिए वे पुस्तकें जिन्हें तुम संकलित करते हो, वे लोगों को केवल धर्मशास्त्र और ज्ञान में, नए सूत्रों, नियमों और प्रथाओं में ही ला सकती हैं। वे लोगों को परमेश्वर के सामने नहीं ला सकती हैं, या लोगों को सत्य को समझने या परमेश्वर की इच्छा को समझने में मदद नहीं कर सकती हैं। तुम सोच रहे हो कि प्रश्न पर प्रश्न पूछने से, जिनके तब तुम उत्तर देते हो, और जिनके लिए तुम एक रूपरेखा या सारांश लिखते हो, इस तरह के व्यवहार से तुम्हारे भाई-बहन आसानी से समझ जाएंगे। याद रखने में आसान होने के अलावा, एक नज़र में ये इन प्रश्नों के बारे में स्पष्ट हैं, और तुमको लगता है कि इस तरह से कार्य करना बहुत अच्छा है। लेकिन वे जो समझ रहे हैं वह वास्तविक मर्म नहीं है; यह वास्तविकता से भिन्न है और सिर्फ शब्द और सिद्धांत हैं। तो यह बेहतर होगा कि तुम इन चीजों को बिल्कुल भी नहीं करो। तुम लोगों को ज्ञान को समझने और ज्ञान में निपुणता प्राप्त करने की ओर ले जाने के लिए ये कार्य करते हो। तुम अन्य लोगों को सिद्धान्तों में, धर्म में लाते हो, और उनसे परमेश्वर का अनुसरण और धार्मिक सिद्धांतों के भीतर परमेश्वर में विश्वास करवाते हो। क्या तब तुम बस पौलुस के समान नहीं हो? तुम सबको लगता है कि सत्य के ज्ञान में निपुणता प्राप्त करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, और उसी तरह परमेश्वर के वचनों के कई अंशों को कंठस्थ करना भी महत्वपूर्ण है। लेकिन लोग परमेश्वर के वचन को कैसे समझते हैं, यह बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। तुम सबको लगता है कि लोगों के लिए ये बहुत आवश्यक है कि वे परमेश्वर के कई वचनों को कंठस्थ करें, कई सिद्धांतों को बोलने में सक्षम हों और परमेश्वर के वचनों के भीतर कई सूत्रों को खोजने में सफल हों। इसलिए, तुम सब हमेशा इन चीजों को व्यवस्थित करना चाहते हो ताकि हर कोई एक से भजन पत्र से गा रहा हो और एक सी बात कह रहा हो, हर कोई वही सिद्धांत बोलता हो, ताकि हर किसी के पास एक सा ज्ञान हो और हर कोई एक से नियम रखता हो—यही तुम सब लोगों का उद्देश्य है। तुम लोग ऐसा करते हो मानो कि लोगों को बेहतर समझाते हो, जबकि इसके विपरीत तुम सबको कोई अंदाज़ा नहीं है कि ऐसा करके तुम लोगों को उन नियमों के बीच ला रहे हो जो परमेश्वर के वचनों के सत्य के बाहर हैं। लोगों को सत्य की वास्तविक समझ प्राप्त करवाने के लिए, तुमको वास्तविकता के साथ जुड़ना चाहिए, कार्य के साथ जुड़ना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार व्यावहारिक समस्याओं को हल करना चाहिए। केवल इसी तरह से लोग सत्य को समझ सकते हैं और वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। केवल इस तरह का परिणाम हासिल करना ही लोगों को परमेश्वर के सामने लाना है। अगर तुम सिर्फ आध्यात्मिक सिद्धांतों, मतों और नियमों के बारे में बात करते हो, यदि तुम्हारे प्रयास केवल लिखित शब्दों पर केन्द्रित होते हैं, तो तुम लोगों को सत्य की समझ तक नहीं पहुँचा पाओगे, तुम लोगों से वही बातें कहने और नियमों का पालन करने के लिए निर्देशित करोगे। तुम विशेष रूप से लोगों को अपने आपको बेहतर समझने में सक्षम नहीं बना पाओगे, तुम उन्हें पश्चाताप और परिवर्तन की ओर नहीं ले जा पाओगे। यदि आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात कर पाना लोगों के लिए सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने का विकल्प बन पाता, तो कलीसियाओं की अगुवायी करने के लिए तुम लोगों की आवश्यकता न होती।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य से रहित होकर कोई परमेश्वर को नाराज़ करने का भागी होता है' से उद्धृत

जब, तुम आपसी संगति में, उन सिद्धांतों के बारे में बातचीत नहीं करते जिनके बारे में तुमने सुना है, या जो तुम्हारे स्मरण में हैं, या उन आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात नहीं करते जिन्हें तुमने समझा है, बल्कि, इसके बजाय अपनी वर्तमान अवस्था, किसी घटना पर तुम्हारे दृष्टिकोण और रवैये में किस तरह बदलाव आया है और उसपर नई खोज और नई समझदारी ने क्या जानकारियाँ उपलब्ध कराई हैं, अपनी उन चीजों के बारे में बात करते हो जो परमेश्वर की माँग और सत्य के प्रतिकूल हैं, तो उस समय, जब तुम इन चीजों के बारे में बात करने में समर्थ होते हो, तुम्हारी कद-काठी में विकास हो चुका होगा। यदि तुमने अपने दृष्टिकोण, रवैयों, मंशाओं और विचारों के सभी आयामों की जाँच कभी नहीं की है, या उनकी जाँच के बाद तुम यह बताने में असमर्थ हो कि वे सही हैं या गलत, और उनपर तुम्हारा आकलन संभ्रमित है, तो अगर तुम कलीसिया का नेतृत्व कर रहे होते, तो दूसरों को किस चीज से सिंचित करते? (ज्ञान व सिद्धांत।) मुझे लगता है कि तुम उन्हें केवल आध्यात्मिक रीतियों और ज्ञान व सिद्धांत से ही नहीं सिंचित करोगे, बल्कि, शायद अपने बेतुके दृष्टिकोण और परमेश्वर के बारे में अपनी व्यक्तिगत अवधारणाओं, और इससे भी आगे, परमेश्वर के प्रति अपने एकांगी दृष्टिकोण और समझ से भी सिंचित करोगे, जो चीजों की वास्तविक स्थिति और परमेश्वर के सार से बिलकुल असंगत हैं। और उन सभी लोगों का क्या होता है जो ऐसे नेतृत्व से संपोषित होते हैं? वे ज्ञान व सिद्धांत पर केवल बोलने में सक्षम हो जाते हैं। यदि परमेश्वर वास्तव में उनमें कुछ प्रभाव डालना चाहता है और वे इसका प्रतिकार नहीं करते तो यह एक संतोषप्रद परिणाम होगा; वे इसे सही प्रकार से समझने में बिलकुल अक्षम होंगे। यह क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि तुम जो दूसरों को सीख देते हो वे अवधारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। यदि तुम्हारे सिंचन और नेतृत्व द्वारा दूसरों ने परमेश्वर के बारे में अपनी समझ नहीं बढाई है और, उसके प्रति अपनी गलतफहमियाँ कम नहीं की हैं, तो तुम्हारे कर्त्तव्य का निर्वहन कैसा है? (असंतोषप्रद।) क्या तुम अब यह निर्धारित करने में सक्षम हो कि तुम्हारे सिंचन और कार्य के कौन से हिस्से वास्तव में दूसरों के लिए सहायक और लाभदायक हैं, जिसने परमेश्वर के प्रति उनकी गलतफहमियाँ दूर कर दी हैं, और उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान की हैं और उसके साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करने में मदद की हैं। अगर तुम अपने कार्य में ये परिणाम हासिल कर सकते हो, तब तुम व्यावहारिक कार्य कर रहे हो और अपने कर्त्तव्य का संतोषप्रद निर्वहन कर रहे हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन प्रगति करेगा, तुम्हारे अंदर नया प्रवेश और नयी उच्चतर अंतर्दृष्टि होनी होनी चाहिए, जो हर कदम के साथ और गहरा होता जाता है। इसी में हर इंसान को प्रवेश करना चाहिए। संवाद करने, उपदेश सुनने, परमेश्वर का वचन पढ़ने, या किसी मसले को सँभालकर तुम्हें नयी अंतर्दृष्टि और नई प्रबुद्धता प्राप्त होगी, और तुम पुराने नियमों और पुराने समय में नहीं जियोगे; तुम हमेशा नई ज्योति में जियोगे, और परमेश्वर के वचन से भटकोगे नहीं। इसी को सही पथ पर आना कहते हैं। सतही तौर पर कीमत चुकाने से काम नहीं चलेगा; परमेश्वर का वचन दिन-प्रतिदिन एक उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करता है, और हर दिन नई चीज़ें दिखाई देती हैं, इंसान को भी हर दिन नया प्रवेश करना चाहिए। जब परमेश्वर बोलता है, तो वह उस सबको साकार करता है जो उसने बोला है, और यदि तुम ताल मिलाकर नहीं चलोगे, तो पीछे रह जाओगे। अपनी प्रार्थनाओं में और गहराई लाओ; रुक-रुक कर परमेश्वर के वचनों को खाया-पिया नहीं जा सकता। प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता एवं प्रकाशन को और गहरा करो, इससे तुम्हारी धारणाएं और कल्पनाएं धीरे-धीरे कम होती जाएँगी। अपने आकलन को और मज़बूत करो, और जो भी समस्याएँ आएँ, उनके बारे में तुम्हारे अपने विचार और अपना दृष्टिकोण होना चाहिए। अपनी आत्मा में कुछ चीज़ों को समझ कर, तुम्हें बाहरी चीज़ों में परिज्ञान प्राप्त करना और समस्या के मूल को समझने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुममें ये चीज़ें न हों, तो तुम कलीसिया की अगुवाई कैसे कर पाओगे? यदि तुम किसी वास्तविकता और अभ्यास के मार्ग के बिना, केवल शब्दों और सिद्धांतों की बात करोगे, तो तुम केवल थोड़े समय के लिए ही काम चला पाओगे। नए विश्वासी इसे थोड़ा-बहुत ही स्वीकार कर पाएँगे, लेकिन कुछ समय बाद, जब नए विश्वासी कुछ वास्तविक अनुभव प्राप्त कर लेंगे, तो तुम उन्हें पोषण नहीं दे पाओगे। फिर तुम परमेश्वर के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त कैसे हुए? नई प्रबुद्धता के बिना तुम कार्य नहीं कर सकते। जो लोग नई प्रबुद्धता से रहित हैं, वे नहीं जानते कि अनुभव कैसे करना है, और ऐसे लोग कभी भी नया ज्ञान या नया अनुभव प्राप्त नहीं कर पाते। जीवन आपूर्ति करने के मामले में, वे न तो कभी अपना कार्य कर सकते हैं, न ही परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल के लिए उपयुक्त हो सकते हैं। ऐसा व्यक्ति एकदम बेकार होता है, बस रद्दी माल होता है। दरअसल, ऐसे लोग अपने काम में पूरी तरह से अयोग्य होते हैं, और एकदम अनुपयोगी होते हैं। वे लोग अपना काम तो करते ही नहीं, ऊपर से कलीसिया पर अनावश्यक दबाव भी डालते हैं। मैं इन "आदरणीय वृद्ध जनों" को जल्दी से जल्दी कलीसिया छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ ताकि फिर लोग तुम्हें न देखें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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