146. अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति कैसा दृष्टिकोण हो, इसके सिद्धांत

(1) माता-पिता का यह कर्तव्य होता है कि वे अपने बच्चों को, परमेश्वर में आस्था रखने और जीवन के सही मार्ग चलने के लिए, प्रेरित और मार्गदर्शित करें, फिर भी एक बच्चे को जो न्यूनतम शिक्षा देनी चाहिए, उसमें देर नहीं होनी चाहिए;

(2) बच्चों को परमेश्वर के वचन सत्य के अनुसार शिक्षा दी जानी चाहिए और उन्हें ऐसे ईमानदार व्यक्ति बनने की ओर मार्गदर्शित करना चाहिए जो भ्रष्टता को त्याग देते हैं और एक सच्ची पवित्रता जीते हैं;

(3) बच्चों के भविष्य के लिए, उनकी अपनी पसंदों के बारे में, केवल परमेश्वर के वचनों पर आधारित सत्य पर ही सहभागिता करनी चाहिए। इसके अलावा, किसी को अपने बच्चों की पसंद का सम्मान करना चाहिए, और उन्हें कभी भी परमेश्वर में विश्वास करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए;

(4) अपने बच्चों का, परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर मार्गदर्शन करने के लिए, केवल सत्य का उपयोग न करो; यह भी सुनिश्चित करो कि वे कुछ व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करें। तभी वे अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकते हैं और खुद को परमेश्वर के लिए खपा सकते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जहाँ तक बच्चों की बात है, सभी माता-पिता आशा करते हैं कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करें और वे एक दिन आगे बढ़ें, समाज में उनका एक स्थान हो और साथ ही उनके पास एक स्थिर आय और प्रभाव दोनों हो—जिससे वे परिवार का सम्मान कर सकें। हर किसी का यही दृष्टिकोण है। क्या यह आशा करना सही दृष्टिकोण है कि 'बेटा एक अजगर बन जाए, बेटी एक अमरपक्षी बन जाए'? हर कोई चाहता है कि उसके बच्चे किसी प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में जाएँ और फिर उन्नत अध्ययनों को लें, यह सोचता है कि उपाधि अर्जित करने के बादवे भीड़ में अलग से दिखाई दें। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने हृदयों में, हर कोई ज्ञान की आराधना करता है, यह विश्वास करता है कि 'अन्य उद्यमों का मूल्य कम होता है, पुस्तकों का अध्ययन उन सभी से श्रेष्ठतर है।' इसमें सबसे ऊपर, आधुनिक समाज में प्रतिस्पर्धा विशेष रूप से प्रचंड है, और बिना किसी उपाधि के तुम्हारे लिए इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि तुम अपने परिवार के रहने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने में भी समर्थ हो जाओ। इस बारे में हर कोई इसी तरह से सोचता है। एक डिग्री के बिना, कोई भूखा मर सकता है—सभी लोग ऐसा ही सोचते हैं, और यही नज़रिया रखते हैं—मानो कि महज एक डिग्री ही किसी के भविष्य और आजीविका का फैसला कर सकती है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करने और उच्च शिक्षा के संस्थान में भर्ती होने को, अपने बच्चों से अपनी अपेक्षाओं में, सबसे पहली प्राथमिकता देता है। वास्तव में, जिन शिक्षाओं की लोग तलाश करते हैं, वह ज्ञान जिसे वे प्राप्त करते हैं, और उनके वो विचार, ये सब परमेश्वर और सत्य के प्रति विरोधी होते हैं; वे परमेश्वर के द्वारा घृणित और निंदित हैं। इंसान का नज़रिया क्या होता है? वो यह है कि, ज्ञान और शिक्षा के बिना, एक व्यक्ति के पास इस समाज और इस दुनिया में खड़े हो पाने की ताक़त नहीं होती है, और वह एक हीन व्यक्ति, एक कंगाल व्यक्ति होता है। तुम्हारी दृष्टि में, जिस किसी के पास ज्ञान की कमी होती है, जो कोई भी असभ्य, या अधिकतर अशिक्षित होता है, वह कोई ऐसा है जिसे तुम नीची नजरों से देखते हो, जिसका तिरस्कार करते हो, और जिसे तुच्छ मानते हो। क्या यह ऐसा नहीं है? तुम्हारा दृष्टिकोण और तुम्हारा आधार अपने आप में ही ग़लत हैं। तुम लोग अपने बच्चों को स्कूल जाने और एक उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने के लिए बड़ा करते हो,ताकि उनका भविष्य अच्छा हो सके, लेकिन क्या तुमने इस बारे में विचार किया है कि उनके इस प्रकार की शिक्षा को प्राप्त करने के बाद शैतान के कितने अभिप्राय और सिद्धान्त उनके मन में बैठ जाएँगे? लोग इन चीज़ों के बारे में नहीं सोचते हैं; वे केवल यह जानते हैं कि यदि उनके बच्चे उच्च शिक्षा की एक संस्था में चले जाते हैं, तो वे सफल होंगे और अपने पूर्वजों को सम्मानित करेंगे। जब तक कि एक दिन, तुम्हारे बच्चे वापस आते हैं और तुम उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में नहीं बताते हो, और वे अनिच्छा नहीं दिखाते हैं। तुम्हारे उन्हें सत्य के बारे में बताने के बाद, वे कहते हैं कि तुम मूर्ख हो और तुम पर हँसते हैं, और तुम जो कुछ भी कहते हो उसका उपहास करते हैं। उस समय तुम सोचोगे कि अपने बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा ग्रहण करने के लिए उन विद्यालयों में भेजना ग़लत मार्ग चुनना था, लेकिन अफ़सोस करने के लिए बहुत देर हो जाएगी। एक बार जब उन विचारों और नज़रियों ने एक व्यक्ति में प्रवेश कर लिया हो, और अपनी जड़ें बना ली हों और उनके अंदर आकार ले लिया हो, तो उन्हें रातों-रात हटाया या बदला नहीं जा सकता है। तुम इस तरह की स्थिति को पलट नहीं सकते हो, और न ही तुम उन विचारों को जो अभी उनके पास हैं, ठीक कर सकते हो, या उनके विचारों और नज़रियों से चीज़ों को बाहर निकाल सकते हो। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो यह कहता हो, "मैं अपने बच्चों को केवल वर्णों को सीखने के लिए, और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और समझने के लिए, पाठशाला भेजूँगा। उसके बाद, मैं उन्हें परमेश्वर में विश्वास करने पर ध्यान केंद्रित कराऊँगा, और वे किसी उपयोगी पेशे का भी अध्ययन करेंगे। यह बेहतर होगा कि वे अच्छी क्षमता और मानवता वाले लोग बनें जो परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभा सकें। बहरहाल, यदि वे अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते हैं, तो उनके पास दुनिया में अपने और अपने परिवार के लिए जीविका प्रदान करने का एक तरीका तो होगा ही, और यह पर्याप्त होगा। जो बात मायने रखती है वह यह है कि परमेश्वर के घर से जो कुछ भी आता है, उसे वे स्वीकार करें, और उन्हें समाज द्वारा दूषित और धूमिल होने न दिया जाए।" जब उनके बच्चों की बात आती है, तो उन दृष्टिकोणों और अभिप्रायों को पूर्णतः ग्रहण करने के लिए जिनकी परमेश्वर अपेक्षा करता है, या ऐसा व्यक्ति होने के लिए जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करता है, कोई भी उन्हें परमेश्वर के सामने लाने को तैयार नहीं है। लोग ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हैं और ऐसा करने का साहस नहीं करते हैं। वे भयभीत हैं कि यदि वे ऐसा करते हैं, तो उनके बच्चे गुज़ारा करने के लिए पर्याप्त आय अर्जित करने में समर्थ नहीं होंगे या समाज में उनका कोई भविष्य नहीं होगा। यह दृष्टिकोण किस चीज़ की पुष्टि करता है? यह इस बात की पुष्टि करता है कि सच्चाई में और परमेश्वर में मनुष्यजाति की कोई रुचि, उसका कोई विश्वास और इसके अलावा उसकी कोई वास्तविक आस्था नहीं है। मनुष्यजाति जिस चीज़ को खोजती है और अपने हृदय में जिसकी आराधना करती है वह अभी भी यह दुनिया ही है, सोचती है कि जो लोग इस दुनिया को छोड़ते हैं वे जीवित बचने में समर्थ नहीं रहेंगे। जबकि, अगर वे लोग परमेश्वर को पीछे छोड़ देते हैं, तो उनके पास भोजन, कपड़े और मकान तो फिर भी हो सकते हैं। उन्हें लगता है कि, यदि वे ज्ञान और समाज की शिक्षा को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे बर्बाद हो जाते हैं, वे इस समाज में बेमेल हो जाएँगे, और समाज के द्वारा त्याग दिए और हटा दिए जाने का अर्थ यह होगा कि वे बच नहीं सकते। तुम्हारे पास यह कह पाने के लिए विश्वास की कमी है कि यदि तुम दुनिया को पीछे छोड़ देते हो, और परमेश्वर पर भरोसा करते हो, तो तुम जीवित रह सकते हो, कि परमेश्वर तुम्हें एक जीवन-रेखा देगा जिससे तुम जी सकोगे। तुम्हारे पास न तो यह कहने की समझ है, न ही इसका साहस। इन बातों का अर्थ यह दावा करना नहीं है कि तुम्हारा अभ्यास इसी प्रकार का है, बल्कि यह है कि, इससे पहले कि तुम इस तरह से अभ्यास करो और इन मुद्दों को हल करो, इस तरह के विचार और नज़रिए तुम्हारे अंदर पहले ही आकार ले चुके हैं और तुम्हारे प्रत्येक शब्द और कार्य को नियंत्रित कर रहे हैं। वे यह तय कर सकते हैं कि तुम भविष्य में कैसे कार्य करोगे और तुम इन मुद्दों को कैसे संभालोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

किसी की संतान का क्या होगा इस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता

जन्म, बड़ा होना और विवाह, ये सभी विभिन्न मात्राओं में, विभिन्न प्रकार की निराशा लाते हैं। कुछ लोग अपने परिवारों या अपने शारीरिक रंग-रूप से असंतुष्ट होते हैं; कुछ अपने माता-पिता को नापसंद करते हैं; कुछ लोगों को उस परिवेश से शिकायतें होती हैं जिसमें वे बड़े हुए हैं, या वे उससे अप्रसन्न होते हैं। और अधिकांश लोगों के लिए, इन सभी निराशाओं में विवाह सबसे अधिक असंतोषजनक होता है। कोई व्यक्ति अपने जन्म, परिवक्व होने, या अपने विवाह से चाहे कितना ही असंतुष्ट क्यों न हो, हर एक व्यक्ति जो इनसे होकर गुज़र चुका है, जानता है कि वह यह चुनाव नहीं कर सकता कि उसे कहाँ और कब जन्म लेना है, उसका रूप-रंग कैसा होगा, उसके माता-पिता कौन हैं, और कौन उसका जीवनसाथी है, वरन उसे केवल परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करना होगा। फिर भी जब लोगों द्वारा अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने का समय आता है, तो वे अपने जीवन के प्रथम हिस्से की समस्त इच्छाओं को जिन्हें वे पूरा करने में असफल रहे थे, अपने वंशजों पर थोप देते हैं। ऐसा वे इस उम्मीद में करते हैं कि उनकी संतान उनके जीवन के प्रथम हिस्से की समस्त निराशाओं की भरपाई कर देगी। इसलिए, लोग अपने बच्चों को लेकर सभी प्रकार की कल्पनाओं में डूबे रहते हैं : उनकी बेटियाँ बड़ी होकर बहुत ही खूबसूरत युवतियाँ बन जाएँगी, उनके बेटे बहुत ही आकर्षक पुरुष बन जाएँगे; उनकी बेटियाँ सुसंस्कृत और प्रतिभाशाली होंगी और उनके बेटे प्रतिभावान छात्र और सुप्रसिद्ध खिलाड़ी होंगे; उनकी बेटियाँ सभ्य, गुणी, और समझदार होंगी, और उनके बेटे बुद्धिमान, सक्षम और संवेदनशील होंगे। वे उम्मीद करते हैं कि उनकी संतान, चाहे बेटे हों या बेटियाँ, अपने बुज़ुर्गों का आदर करेगी, अपने माता-पिता का ध्यान रखेगी, और हर कोई उनसे प्यार और उनकी प्रशंसा करेगा...। इस मोड़ पर जीवन के लिए आशा नए सिरे से अंकुरित होती है, और लोगों के दिल में नई उमंगें पैदा होने लगती हैं। लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में शक्तिहीन और आशाहीन हैं, और उनके पास औरों से अलग दिखने का न तो दूसरा अवसर होगा, न फिर ऐसी कोई आशा होगी, और यह भी कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। और इसलिए, वे अगली पीढ़ी पर, इस उम्मीद से अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं, और आदर्शों को थोप देते हैं, कि उनकी संतान उनके सपनों को पूरा करने और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती है; कि उनकी बेटे-बेटियाँ परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, महत्वपूर्ण, समृद्ध, या प्रसिद्ध बनेंगे। संक्षेप में, वे अपने बच्चों के भाग्य को बहुत ऊँचाई पर देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते कि यह तय करना उनका काम नहीं है कि उनके कितने बच्चे हैं, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ कैसी हैं, इत्यादि बच्चों का थोड़ा-सा भी भाग्य उनके हाथ में नहीं है? मनुष्य अपने भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे अपने भाग्य से बचकर नहीं निकल सकते, फिर भी वे अपने बेटे-बेटियों के भाग्य को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को अपनी क्षमता से बढ़कर नहीं आंक रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

यह बात सच है कि दुनिया में आने वाले हर व्यक्ति का एक लक्ष्य होता है; कोई भी दुनिया में अपनी मर्जी से नहीं आता, न ही यह व्यवस्था कोई गलती है। इंसानी दुनिया में आकर हर व्यक्ति, चाहे वह कुछ अध्ययन करे या काम करे, लेकिन वह कोई न कोई भूमिका तो निभाता ही है। वह भूमिका क्या होती है? उनकी भूमिका किसी काम को पूरा कराना या कुछ क्रियाकलाप करना होता है। उदाहरण के लिए, दो लोग शादी करते हैं, उनके बच्चा होता है, और इस तरह तीन लोगों का एक पूरा परिवार बन जाता है। उस परिवार में माँ किसलिए जीती है? वह अपने लक्ष्य और अपनी भूमिका को एक माँ के रूप में पूरा करने के लिए जीती है। उसका लक्ष्य अपने बच्चे, पति और घर की देखभाल करना है; वो इन्हीं चीजों के लिए जीती है। उस परिवार में बच्चा किसलिए रहता है? बच्चा क्या भूमिका निभाता है? वह उस परिवार की संतान है जो उसके वंश को आगे बढ़ाता है; वह उस परिवार की अगली पीढ़ी है। बच्चे की मौजूदगी परिवार को पूर्णता देती है। परिवार को पूर्णता देना बच्चे की पहली भूमिका है। लड़का हो या लड़की, परिवार में उसका अपना लक्ष्य होता है। क्या बच्चे के भाग्य के लिए कदम-दर-कदम व्यवस्थाएं हैं, जैसे उसका भाग्य कैसा होगा, वह समाज में क्या पढ़ाई करेगा, कहाँ काम करेगा, क्या काम करेगा, वह परमेश्वर के घर में आकर कौन-से कर्तव्य का निर्वहन करेगा, उसमें कौन-सा विशेष कौशल है और वह क्या करेगा। क्या इन सारी चीजों की योजना परमेश्वर ने नहीं बनायी है? क्या बच्चे के पास कोई विकल्प है? दरअसल, जिस समय परिवार में बच्चे का जन्म होता है, तब से लेकर नियति के किसी भी चरण तक, उसका अपनी नियति पर कोई नियंत्रण नहीं होता; इन सबकी व्यवस्था परमेश्वर करता है। कथन में सच्चाई है, "हर चीज की व्यवस्था परमेश्वर करता है," और यह उन चीजों से संबंधित होता है जिनके लिए लोग जीते हैं। ... वास्तव में, हर कोई एक-सा होता है। वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के लिए जीते हैं। हर व्यक्ति शतरंज के मोहरे की तरह होता है। परमेश्वर तुम्हें कहाँ रखता है, तुम कहाँ जाते हो, तुम क्या करते हो, तुम एक स्थान पर कब तक रहते हो, इन सारी बातों का आयोजन परमेश्वर करता है। तो परमेश्वर के आयोजनों के संदर्भ में, इंसान किसके लिए जीता है? सही मायने में, वह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के लिए जीता है, उसके प्रबंधन के लिए जीता है; वह स्वयं अपना स्वामी नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्‍यों का भलीभाँति निर्वहन करके ही व्‍यक्ति अपने जीवन को सार्थक बनाता है' से उद्धृत

जन्म देने और बच्चे के पालन-पोषण के अलावा, बच्चे के जीवन में माता-पिता का उत्तरदायित्व उसके बड़ा होने के लिए बस एक औपचारिक परिवेश प्रदान करना है, क्योंकि सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण के अलावा किसी भी चीज़ का उस व्यक्ति के भाग्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता। किसी व्यक्ति का भविष्य कैसा होगा, इसे कोई नियन्त्रित नहीं कर सकता; इसे बहुत पहले ही पूर्व निर्धारित किया जा चुका होता है, किसी के माता-पिता भी उसके भाग्य को नहीं बदल सकते। जहाँ तक भाग्य की बात है, हर कोई स्वतन्त्र है, और हर किसी का अपना भाग्य है। इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके भाग्य को नहीं रोक सकते या उस भूमिका पर जरा-सा भी प्रभाव नहीं डाल सकते जिसे वह जीवन में निभाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह परिवार जिसमें किसी व्यक्ति का जन्म लेना नियत होता है, और वह परिवेश जिसमें वह बड़ा होता है, वे जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने के लिए मात्र पूर्वशर्तें होती हैं। वे किसी भी तरह से किसी व्यक्ति के भाग्य को या उस प्रकार की नियति को निर्धारित नहीं करते जिसमें रहकर कोई व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करता है। और इसलिए, किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते, किसी के भी रिश्तेदार जीवन में उसकी भूमिका निभाने में उसकी सहायता नहीं कर सकते। कोई किस प्रकार अपने ध्येय को पूरा करता है और वह किस प्रकार के परिवेश में रहते हुए अपनी भूमिका निभाता है, यह पूरी तरह से जीवन में उसके भाग्य द्वारा निर्धारित होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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