146. अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति कैसा दृष्टिकोण हो, इसके सिद्धांत

(1) माता-पिता का यह कर्तव्य होता है कि वे अपने बच्चों को परमेश्वर में आस्था रखने और जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित और मार्गदर्शित करें, फिर भी एक बच्चे को जो न्यूनतम शिक्षा मिलनी चाहिए, उसमें देर नहीं होनी चाहिए।

(2) बच्चों को परमेश्वर के वचन सत्य के अनुसार शिक्षा दी जानी चाहिए और उन्हें ऐसे ईमानदार व्यक्ति बनने की ओर मार्गदर्शित करना चाहिए जो भ्रष्टता का त्याग कर सकते हैं और एक सच्ची मानवता के साथ जीते हैं।

(3) बच्चों के भविष्य के लिए, उनके अपने चयनों के बारे में, केवल परमेश्वर के वचनों पर आधारित सत्य पर ही सहभागिता करनी चाहिए। इसके अलावा, व्यक्ति को अपने बच्चों की पसंद का सम्मान करना चाहिए, और उन्हें कभी भी परमेश्वर में विश्वास करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए।

(4) अपने बच्चों का, परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर मार्गदर्शन करने के लिए केवल सत्य का उपयोग न करो; यह भी सुनिश्चित करो कि वे कुछ व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करें। तभी वे अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकते हैं और खुद को परमेश्वर के लिए खपा सकते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

बच्चों के प्रति व्यवहार के संबंध में, सभी माता-पिता आशा करते हैं कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे और एक दिन नाम कमाएँगे, समाज में एक स्थिर आय और प्रभाव के साथ अपनी भूमिका निभाएँगे। इसी से उनके पुरखों का सम्मान होगा। हर किसी की यही अवधारणा है। जैसी कि कहावत है, "मेरा बेटा अजगर यानी सम्राट बन जाए, और बेटी अमरपक्षी यानी सम्राज्ञी।" क्या यह अवधारणा सही है? हर कोई चाहता है कि उसके बच्चे किसी प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में जाएँ और स्नातकोत्तर अध्ययन करें। वे मानते हैं कि डिग्रियाँ प्राप्त करके उनके बच्चे नाम कमाएँगे, क्योंकि सभी लोग अपने हृदय में ज्ञान की आराधना करते हैं। "अन्य उद्यमों का मूल्य कम होता है, पुस्तकों का अध्ययन उन सभी में श्रेष्ठ है," वे मानते हैं। इसके अलावा, आज का समाज अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। डिग्री के बिना कोई अपना पेट नहीं भर सकता—सभी लोग यही सोचते हैं और यही नजरिया रखते हैं—मानो अकेली डिग्री ही किसी के भविष्य और आजीविका का फैसला कर सकती हो। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी उच्चतर शिक्षा संस्थान में शिक्षा और स्वीकृति प्राप्त करने को अपने बच्चों से अपनी अपेक्षाओं में सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। वास्तव में, लोगों द्वारा प्राप्त की जाने वाली शिक्षा, उनके द्वारा प्राप्त किया जाने वाला ज्ञान, और उनके वे विचार, सब परमेश्वर और सत्य के विरोधी होते हैं; वे परमेश्वर द्वारा घृणित और निंदित हैं। इंसान का नजरिया क्या है? यह कि ज्ञान और शिक्षा के बिना व्यक्ति में इस समाज और दुनिया में खड़े होने की ताकत नहीं होती, और वह एक हीन व्यक्ति, एक अकिंचन व्यक्ति होता है। तुम्हारी दृष्टि में, जिस किसी में ज्ञान की कमी होती है, जो कोई भी असभ्य, या काफी हद तक अशिक्षित होता है, वह ऐसा व्यक्ति होता है जिसे तुम नीची निगाह से देखते हो, जिसका तिरस्कार करते हो और जिसे तुच्छ मानते हो। क्या ऐसा नहीं है? तुम्हारा दृष्टिकोण और तुम्हारा आधार अपने आप में ही गलत हैं। तुम लोग अपने बच्चों को स्कूल जाने और उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने के लिए पालते हो, ताकि उनका भविष्य अच्छा हो सके, लेकिन क्या तुमने कभी विचार किया है कि जब तक वे अपनी शिक्षा प्राप्त करेंगे, तब तक यह शिक्षा उनके मन में कितने जहर भर चुकी होगी? उसके कितने विचार और सिद्धांत उनके मन में बैठ जाएँगे? लोग इन चीजों के बारे में नहीं सोचते; वे केवल यह जानते हैं कि यदि उनके बच्चे किसी उच्चतर शिक्षा संस्थान में अध्ययन करते हैं, तो वे सफल होंगे और अपने पूर्वजों का मान बढ़ाएँगे। परिणामस्वरूप एक दिन आएगा, जब तुम्हारे बच्चे घर लौटेंगे और तुम उनसे परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए कहोगे, और वे अस्वीकार कर देंगे। जब तुम उनसे सत्य के बारे में बात करोगे, तो वे तुम्हें मूर्ख कहेंगे और तुम पर हँसेंगे, और तुम्हारे शब्दों को अवमानना के साथ देखेंगे। जब वह दिन आएगा, तब तुम सोचोगे कि अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा प्राप्त करने के लिए ऐसे विद्यालय में भेजकर तुमने गलत मार्ग चुना, लेकिन तब तक पछताने में बहुत देर हो चुकी होगी। जब वे विचार और दृष्टिकोण व्यक्ति में प्रवेश कर लेते हैं, और उनके भीतर जड़ें जमा लेते हैं और आकार ले लेते हैं, तो उन्हें रातों-रात हटाया या बदला नहीं जा सकता। तुम ऐसी स्थिति को पलट नहीं सकते, और न ही तुम उनके मौजूदा विचारों को सुधार सकते हो, और न तुम उनके विचारों और दृष्टिकोणों से ऐसी चीजें बाहर निकाल सकते हो। ऐसा कोई नहीं, जो कहता हो, "मैं अपने बच्चों को केवल वर्णमाला सीखने के लिए, और यह जानने के लिए पाठशाला भेजूँगा कि परमेश्वर के वचनों को कैसे पढ़ें और समझें। उसके बाद मैं उनका ध्यान परमेश्वर में विश्वास करने पर केंद्रित कराऊँगा, और वे किसी उपयोगी पेशे का भी अध्ययन करेंगे। बेहतर होगा कि वे अच्छी क्षमता और मानवता वाले लोग बनें, जो परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभा सकें। लेकिन यदि वे अपना कर्तव्य नहीं निभा सके, तो उनके पास दुनिया में अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने का एक तरीका होगा, और वह पर्याप्त होगा। यह देखना कि वे परमेश्वर के घर से जो कुछ भी आता है उसे स्वीकार करते हैं, और उन्हें समाज द्वारा दूषित और कलंकित न होने देना मायने रखता है।" जब अपने बच्चों की बात आती है, तो कोई भी उन्हें स्वेच्छा से परमेश्वर के वचनों का सत्य स्वीकार करने, और सत्य और परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुसार व्यवहार करने के एकमात्र उद्देश्य के लिए परमेश्वर के सामने नहीं लाता। लोग ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हैं, और वे यह सोचकर ऐसा करने का साहस नहीं करते कि कहीं उनके बच्चों की कोई आजीविका या समाज में कोई भविष्य न हो। यह दृष्टिकोण किस चीज की पुष्टि करता है? यह इस बात की पुष्टि करता है कि लोग सत्य में और परमेश्वर पर विश्वास करने में रुचि नहीं रखते। उनका ईश्वर में कोई विश्वास नहीं है, उसमें सच्चा विश्वास तो बिलकुल भी नहीं है, और अपने दिलों में वे जिस चीज की सराहना और आराधना करते हैं, वह यह दुनिया ही है। उन्हें लगता है कि अगर वे दुनिया को पीछे छोड़ते हैं, तो उनके पास जीने का कोई रास्ता नहीं होगा, जबकि अगर वे परमेश्वर को पीछे छोड़ देते हैं, तो उनके पास भोजन, कपड़े और मकान हो सकते हैं। उन्हें लगता है कि यदि वे ज्ञान और समाज की शिक्षा को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे समाप्त हो जाएँगे, गोल छेदों वाले समाज में वर्गाकार कील की तरह बेमेल हो जाएँगे, और समाज के द्वारा त्याग और हटा दिए जाने का अर्थ है कि वे जीवित नहीं रह सकते। तुम्हारे पास यह कह पाने के लिए विश्वास की कमी है कि यदि तुम दुनिया को पीछे छोड़ देते हो और परमेश्वर पर भरोसा करते हो, तो तुम जीवित रह सकते हो, कि परमेश्वर तुम्हें एक जीवन-रेखा प्रदान करेगा जिससे तुम जीवित रह सकोगे। तुम्हारे पास यह कहने की न तो समझ है, न ही साहस। इन बातों का उद्देश्य यह माँग करना नहीं है कि तुम वास्तव में इसी तरह अभ्यास करो, बल्कि यह है कि, इससे पहले कि तुम इस तरह से अभ्यास करो और इन मुद्दों को हल करो, इस तरह के विचार और नजरिये तुम्हारे अंदर पहले ही आकार ले चुके होते हैं और तुम्हारे प्रत्येक शब्द और कार्य को नियंत्रित कर रहे होते हैं। वे यह तय कर सकते हैं कि तुम भविष्य में कैसे कार्य करोगे और तुम इन मुद्दों को कैसे सँभालोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

कोई व्यक्ति अपने जन्म, परिवक्व होने, या अपने विवाह से चाहे कितना ही असंतुष्ट क्यों न हो, हर एक व्यक्ति जो इनसे होकर गुज़र चुका है, जानता है कि वह यह चुनाव नहीं कर सकता कि उसे कहाँ और कब जन्म लेना है, उसका रूप-रंग कैसा होगा, उसके माता-पिता कौन हैं, और कौन उसका जीवनसाथी है, वरन उसे केवल परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करना होगा। फिर भी जब लोगों द्वारा अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने का समय आता है, तो वे अपने जीवन के प्रथम हिस्से की समस्त इच्छाओं को जिन्हें वे पूरा करने में असफल रहे थे, अपने वंशजों पर थोप देते हैं। ऐसा वे इस उम्मीद में करते हैं कि उनकी संतान उनके जीवन के प्रथम हिस्से की समस्त निराशाओं की भरपाई कर देगी। इसलिए, लोग अपने बच्चों को लेकर सभी प्रकार की कल्पनाओं में डूबे रहते हैं : उनकी बेटियाँ बड़ी होकर बहुत ही खूबसूरत युवतियाँ बन जाएँगी, उनके बेटे बहुत ही आकर्षक पुरुष बन जाएँगे; उनकी बेटियाँ सुसंस्कृत और प्रतिभाशाली होंगी और उनके बेटे प्रतिभावान छात्र और सुप्रसिद्ध खिलाड़ी होंगे; उनकी बेटियाँ सभ्य, गुणी, और समझदार होंगी, और उनके बेटे बुद्धिमान, सक्षम और संवेदनशील होंगे। वे उम्मीद करते हैं कि उनकी संतान, चाहे बेटे हों या बेटियाँ, अपने बुज़ुर्गों का आदर करेगी, अपने माता-पिता का ध्यान रखेगी, और हर कोई उनसे प्यार और उनकी प्रशंसा करेगा...। इस मोड़ पर जीवन के लिए आशा नए सिरे से अंकुरित होती है, और लोगों के दिल में नई उमंगें पैदा होने लगती हैं। लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में शक्तिहीन और आशाहीन हैं, और उनके पास औरों से अलग दिखने का न तो दूसरा अवसर होगा, न फिर ऐसी कोई आशा होगी, और यह भी कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। और इसलिए, वे अगली पीढ़ी पर, इस उम्मीद से अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं, और आदर्शों को थोप देते हैं, कि उनकी संतान उनके सपनों को पूरा करने और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती है; कि उनकी बेटे-बेटियाँ परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, महत्वपूर्ण, समृद्ध, या प्रसिद्ध बनेंगे। संक्षेप में, वे अपने बच्चों के भाग्य को बहुत ऊँचाई पर देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते कि यह तय करना उनका काम नहीं है कि उनके कितने बच्चे हैं, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ कैसी हैं, इत्यादि बच्चों का थोड़ा-सा भी भाग्य उनके हाथ में नहीं है? मनुष्य अपने भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे अपने भाग्य से बचकर नहीं निकल सकते, फिर भी वे अपने बेटे-बेटियों के भाग्य को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को अपनी क्षमता से बढ़कर नहीं आंक रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

दुनिया में आने वाले हर व्यक्ति का एक लक्ष्य होता है; कोई भी दुनिया में अकारण नहीं आता, न ही इस व्यवस्था में कोई गलती है। हर व्यक्ति का इंसानी दुनिया में आना, चाहे वह कुछ भी अध्ययन या काम करे, इसलिए होता है कि वह उस दुनिया में कोई भूमिका निभा सके। वह क्या भूमिका है? उसकी भूमिका कोई काम पूरा करने या कुछ क्रियाकलाप करने की होती है। उदाहरण के लिए, दो लोग शादी करते हैं और उनके बच्चा होता है, और वे तीन लोग एक पूरा परिवार बनाते हैं। उस परिवार में माँ किसलिए जीती है? वह अपने लक्ष्य और माँ के रूप में अपनी भूमिका निभाने के लिए जीती है। उसका लक्ष्य अपने बच्चे, पति और घर की देखभाल करना है; वह इन्हीं चीजों के लिए जीती है। उस परिवार में बच्चा किसलिए जीता है? बच्चा क्या भूमिका निभाता है? वह उस परिवार की संतान है, जो उसका नाम आगे बढ़ाएगा; वह उस परिवार की अगली पीढ़ी की भूमिका निभाता है। बच्चे की मौजूदगी परिवार को स्थापित करती है और उसे पूर्णता देती है। परिवार को पूर्णता देना—यह बच्चे की पहली भूमिका है। लड़का हो या लड़की, परिवार में उसका अपना लक्ष्य होता है। बच्चे की नियति के लिए कदम-दर-कदम व्यवस्थाएँ—उसका भाग्य कैसा होगा, वह समाज में क्या पढ़ाई करेगा, कहाँ काम करेगा, क्या काम करेगा, परमेश्वर के घर में आकर कौन-सा कर्तव्य निभाएगा, उसके विशेष कौशल, और वह क्या करेगा—क्या सब परमेश्वर द्वारा आयोजित नहीं हैं? क्या बच्चे के पास कोई विकल्प है? दरअसल, परिवार में अपने जन्म के समय से लेकर अपनी नियति के किसी भी चरण पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता; इस सबकी व्यवस्था परमेश्वर करता है। इस कथन में सच्चाई है, "हर चीज की व्यवस्था परमेश्वर करता है," और यह इस बात से संबंध रखता है कि लोग किसलिए लोग जीते हैं। मान लो, तुम संगीत का अध्ययन करते हो—यह तुम्हारी स्थिति है; तुम इस पारिवारिक माहौल में हो। क्या संगीत का अध्ययन करना तुमने चुना है? तुम्हारा यह पाठ्यक्रम लेना तुम्हारी अपनी इच्छा से नहीं था। जब तुम इस तरह का लक्ष्य और इस तरह कार्य पूरा करते हो, तो तुम उसे किसलिए पूरा करते हो? तुम उसे इसलिए पूरा करते हो, क्योंकि यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया गया था; तुम इसे अपनी पसंद से नहीं करते। क्या तुम्हारा इस कार्य को पूरा करना सृष्टिकर्ता के आयोजनों का परिणाम नहीं है? अब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, और तुमने जो पढ़ा है और जो तुम जानते हो, उसे अपने कर्तव्य पर लागू करते हो; इसे किसने तय किया? इसे परमेश्वर द्वारा तय किया गया था; यह तुम पर निर्भर नहीं था। इसे निष्पक्ष रूप से देखते हुए, तुम अभी किसलिए जी रहे हो? वास्तव में, हर कोई एक-सा है। वे सब परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के लिए जीते हैं। हर व्यक्ति शतरंज के एक मोहरे की तरह है। परमेश्वर तुम्हें कहाँ रखता है, तुम कहाँ जाते हो, तुम क्या करते हो, और तुम एक स्थान पर कब तक रहते हो, यह सब परमेश्वर द्वारा आयोजित है। तो परमेश्वर के आयोजनों के संदर्भ में, इंसान किसके लिए जीता है? सही मायने में, वह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के लिए जीता है, उसके प्रबंधन के लिए जीता है; वह स्वयं अपना स्वामी नहीं है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

व्यक्ति वही होता है जिस पर मार्ग पर वह चलता है, चाहे वह जो कोई भी हो—यह संदेह से परे है : जिस मार्ग पर लोग चलते हैं, वह निर्धारित करता है कि वे क्या हैं। वे जिस रास्ते पर चलते हैं और जिस तरह के व्यक्ति हैं, यह उनका निजी मामला है, यह नियत, जन्मजात और उनकी प्रकृति से संबंधित है। तो लोगों को उनके माता-पिता द्वारा जो सिखाया जाता है, उसकी क्या भूमिका है? क्या इससे लोगों की प्रकृति पर कोई फर्क पड़ता है? (नहीं।) लोगों को उनके माता-पिता द्वारा जो कुछ सिखाया जाता है, उससे उनकी प्रकृति पर कोई फर्क नहीं पड़ता। माता-पिता अपने बच्चों को केवल रोजमर्रा के जीवन के लिए कुछ सरल व्यवहार, सोचने और व्यवहार करने के कुछ अपेक्षाकृत मूलभूत तरीके सिखा सकते हैं; उनका माता-पिता से कुछ संबंध होता है। बच्चों के बड़े होने से पहले माता-पिता वही करते हैं, जो उन्हें करना चाहिए : वे अपने बच्चों को सही रास्ते पर चलना, परिश्रमपूर्वक अध्ययन करना, बड़े होने पर सफल होने का प्रयास करना, बुरे काम न करना, बुरा इंसान न बनना सिखाते हैं। माता-पिता की जिम्मेदारियों में यह भी शामिल है कि वे सुनिश्चित करें कि उनके बच्चे व्यवहार के मानदंडों का पालन करें, और वे उन्हें विनम्र होना, अपने से बड़ों को नमस्ते कहना और व्यवहार संबंधी कुछ चीजें सिखाएँ। माता-पिता के प्रभाव में अपने बच्चों की देखभाल करना और उन्हें व्यवहार के कुछ बुनियादी सिद्धांत सिखाना शामिल है—लेकिन व्यक्ति का मिजाज ऐसी चीज नहीं है, जिसे माता-पिता द्वारा सिखाया जा सके। कुछ माता-पिता शांतचित्त होते हैं और जल्दबाजी में कुछ नहीं करते—जबकि उनके बच्चों का मिजाज अधीर होता है, वे कहीं भी अधिक समय तक नहीं रह सकते, 14 या 15 वर्ष की छोटी आयु में ही वे जीवन में अपना रास्ता खुद बनाने लगते हैं। वे जो करते हैं, उसे खुद तय करते हैं, उन्हें अपने माता-पिता की आवश्यकता नहीं होती, वे अत्यधिक स्वतंत्र होते हैं। क्या यह उन्हें उनके माता-पिता ने सिखाया है? नहीं। और इसलिए, व्यक्तियों का मिजाज, स्वभाव—उनके सार से संबंधित चीजें, यहाँ तक कि भविष्य में वे जो रास्ता चुनते हैं—इनमें से किसी का भी उनके माता-पिता से कोई संबंध नहीं होता। कुछ लोग प्रत्युत्तर देते हैं, "ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई संबंध न हो? कुछ लोग कलाकारों की लंबी और प्रतिष्ठित वंशावली से आते हैं। वे इस कहावत के प्रमाण होते हैं कि 'बिना सिखाए खाना खिलाना पिता की गलती है।'" क्या यह सही है? (नहीं।) इस उदाहरण का खंडन के रूप में उपयोग करना गलत है। वंशावली का प्रभाव केवल उनके कौशल पर पड़ता है; हो सकता है कि उनके परिवार में सभी ने एक ही चीज सीखी हो, और प्रकट रूप से उन्होंने भी इसी चीज को चुना हो—लेकिन मूल रूप से यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया गया था। वे इस परिवार में कैसे पैदा हुए? क्या यह परमेश्वर द्वारा नियत नहीं था? माता-पिता केवल उनके बाहरी व्यवहार और शायद कुछ सरल अभिरुचियों को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो उनके जीवन के लक्ष्यों और प्रयासों, और उनके भाग्य का उनके माता-पिता से कोई लेना-देना नहीं होता। कुछ माता-पिता साधारण, कर्तव्यपरायण किसान होते हैं और उनके बच्चे सरकार के मुखिया या उद्योग जगत के दिग्गज बन जाते हैं। कुछ माता-पिता वकील या डॉक्टर—प्रतिभाशाली लोग—होते हैं और उनके बच्चे ऐसे निकम्मे हैं, जिन्हें कहीं नौकरी नहीं मिल सकती। क्या बच्चों को यह उनके माता-पिता ने सिखाया था? अगर माता-पिता वकील हैं, तो क्या ऐसा हो सकता है कि वे अपने बच्चों को कम पढ़ाएँ और उन्हें कम प्रभावित करें? बिलकुल नहीं। किसी माता-पिता ने कभी नहीं कहा, "मैं जीवन में इतना सफल रहा हूँ, लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरा बच्चा मेरे जितना सफल हो; इसमें बहुत ज्यादा मेहनत है, उसका चरवाहा होना अच्छा है।" वे निस्संदेह चाहेंगे कि उनका बच्चा उनका अनुकरण करे, उनके जैसा निकले। इस शिक्षा के समाप्त होने के बाद क्या होता है? बच्चे वैसे ही होते हैं जैसे उन्हें होना चाहिए, वे वैसे ही होते हैं जैसे उनका भाग्य तय करता है। इसे कोई नहीं बदल सकता। अपने बच्चों को स्कूल में खराब प्रदर्शन करते देख माता-पिता नाराज और चिंतित हो जाते हैं। वे यथाशक्ति प्रयास करते हैं, वे ट्यूटर लगाते हैं, और उनके लिए अच्छा विद्यालय चुनते हैं—और होता क्या है? कॉलेज से स्नातक होने के बाद बच्चों को नौकरी नहीं मिल पाती, और उन्हें अपने माता-पिता से पैसे माँगने पड़ते हैं। यह किस तथ्य को दर्शाता है? यह दर्शाता है कि बच्चों की राह का उनके माता-पिता से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ माता-पिता परमेश्वर में विश्वास करते हैं और अपने बच्चों को परमेश्वर में विश्वास करना सिखाते हैं—लेकिन माता-पिता चाहे कुछ भी कहें, बच्चे ऐसा करने से मना कर देते हैं, और माता-पिता इस बारे में कुछ नहीं कर पाते। कुछ माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और उनके बच्चे अपने आप विश्वास करने लगते हैं। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद बच्चे परमेश्वर का अनुसरण करना शुरू कर देते हैं और परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने लगते हैं, और परिणामस्वरूप उनका भाग्य बदल जाता है। माता-पिता कहते हैं, "बिना सिखाए खाना खिलाना पिता की गलती है—हमने अपने बच्चे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।" क्या यहाँ बात ध्यान देने की है? (नहीं।) तुम नहीं देख सकते कि बड़े होने से पहले किसी की राह क्या होगी; जब वे वयस्क हो जाते हैं, तो उनका अपना दिमाग होता है, वे चीजों को समझ सकते हैं, और इसलिए वे चुन लेते हैं कि लोगों के इस समूह में वे किस तरह के व्यक्ति होंगे। कुछ लोग कहते हैं कि वे सरकार में उच्च पद पर काम करना चाहते हैं, दूसरे कहते हैं कि वे वकील या लेखक बनना चाहते हैं; प्रत्येक व्यक्ति अपना चुनाव खुद करता है। कोई यह नहीं कहता, "मैं अपने माता-पिता द्वारा सिखाए जाने की प्रतीक्षा करूँगा, मैं वही बनूँगा जो वे मुझे सिखाएँगे।" कोई इतना मूर्ख नहीं है। वयस्क होने के बाद लोगों के दिमाग जीवंत हो जाते हैं; धीरे-धीरे, लेकिन निश्चित रूप से, वे परिपक्व हो जाते हैं और उनके सामने मार्ग और लक्ष्य तेजी से स्पष्ट हो जाते हैं; इस समय, वे जिस प्रकार के व्यक्ति हैं और जिस श्रेणी के हैं, यह धीरे-धीरे सतह पर आ जाता है, धीरे-धीरे प्रकट हो जाता है। इस समय से प्रत्येक व्यक्ति का मिजाज धीरे-धीरे स्पष्ट हो जाता है, और साथ ही उनका स्वभाव, वह राह जिसके लिए वे प्रयास करते हैं, उनके जीवन की दिशा, और जिस श्रेणी से के वे हैं, वह सब भी स्पष्ट हो जाता है। यह किस पर आधारित है? अंतिम विश्लेषण में, यह परमेश्वर द्वारा नियत है, और इसका माता-पिता से कोई लेना-देना नहीं है—अब यह तुम्हें स्पष्ट है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग एक)' से उद्धृत

जन्म देने और बच्चे के पालन-पोषण के अलावा, बच्चे के जीवन में माता-पिता का उत्तरदायित्व उसके बड़ा होने के लिए बस एक औपचारिक परिवेश प्रदान करना है, क्योंकि सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण के अलावा किसी भी चीज़ का उस व्यक्ति के भाग्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता। किसी व्यक्ति का भविष्य कैसा होगा, इसे कोई नियन्त्रित नहीं कर सकता; इसे बहुत पहले ही पूर्व निर्धारित किया जा चुका होता है, किसी के माता-पिता भी उसके भाग्य को नहीं बदल सकते। जहाँ तक भाग्य की बात है, हर कोई स्वतन्त्र है, और हर किसी का अपना भाग्य है। इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके भाग्य को नहीं रोक सकते या उस भूमिका पर जरा-सा भी प्रभाव नहीं डाल सकते जिसे वह जीवन में निभाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह परिवार जिसमें किसी व्यक्ति का जन्म लेना नियत होता है, और वह परिवेश जिसमें वह बड़ा होता है, वे जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने के लिए मात्र पूर्वशर्तें होती हैं। वे किसी भी तरह से किसी व्यक्ति के भाग्य को या उस प्रकार की नियति को निर्धारित नहीं करते जिसमें रहकर कोई व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करता है। और इसलिए, किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते, किसी के भी रिश्तेदार जीवन में उसकी भूमिका निभाने में उसकी सहायता नहीं कर सकते। कोई किस प्रकार अपने ध्येय को पूरा करता है और वह किस प्रकार के परिवेश में रहते हुए अपनी भूमिका निभाता है, यह पूरी तरह से जीवन में उसके भाग्य द्वारा निर्धारित होता है। दूसरे शब्दों में, कोई भी अन्य निष्पक्ष स्थितियाँ किसी व्यक्ति के ध्येय को, जो सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित किया जाता है, प्रभावित नहीं कर सकतीं। सभी लोग अपने-अपने परिवेश में जिसमें वे बड़े होते हैं, परिपक्व होते हैं; तब क्रमशः धीरे-धीरे, अपने रास्तों पर चल पड़ते हैं, और सृजनकर्ता द्वारा नियोजित उस नियति को पूरा करते हैं। वे स्वाभाविक रूप से, अनायास ही लोगों के विशाल समुद्र में प्रवेश करते हैं और जीवन में भूमिका ग्रहण करते हैं, जहाँ वे सृजनकर्ता के पूर्वनिर्धारण के लिए, उसकी संप्रभुता के लिए, सृजित प्राणियों के रूप में अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना शुरू करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

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