94. समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करने के सिद्धांत

(1) मानवीय भ्रष्टता की विभिन्न समस्याओं से सामना होने पर, सत्य की तलाश करो। उनके सार को स्पष्टता से समझ लो और उनके स्रोत की पहचान करो, और फिर उन्हें हल करने के लिए सत्य का उपयोग करो।

(2) परमेश्वर के वचनों के अनुसार किसी समस्या के सार पर सहभागिता करना आवश्यक है, ताकि अन्य लोग सत्य को समझ सकें और अपने भ्रष्ट सारों को जान सकें, जिससे वास्तविक पश्चाताप उत्पन्न हो।

(3) किसी समस्या का समाधान करते समय, उसके सार को सहभागिता के माध्यम से पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। दूसरों को सत्य की, देह के प्रति अनासक्ति की, और परमेश्वर के प्रेम के लाभ की सच्ची समझ प्रदान करो।

(4) सत्य की समझ और वास्तविकता में प्रवेश के लिए दूसरों की अगुवाई करते समय, और सत्य के अनुसरण में आगे बढ़ने हेतु उनके संकल्प को प्रेरित करने के लिए अपने स्वयं के अनुभव को संश्लेषित करना आवश्यक है, इससे उन्हें अभ्यास का मार्ग मिलता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

इंसान के लिए आवश्यक सत्य परमेश्वर के वचनों में निहित है, और सत्य ही इंसान के लिए अत्यंत लाभदायक और सहायक होता है। तुम लोगों के शरीर को इस टॉनिक और पोषण की आवश्यकता है, इससे इंसान को अपनी सामान्य मानवीयता को फिर से प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह ऐसा सत्य है जो इंसान के अंदर होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, उतनी ही तेज़ी से तुम लोगों का जीवन विकसित होगा, और सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम आध्यात्मिक जगत की चीज़ों को उतनी ही स्पष्टता से देखोगे, और शैतान पर विजय पाने के लिए तुम्हारे अंदर उतनी ही ज़्यादा शक्ति होगी। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करोगे, तो तुम लोग ऐसा बहुत-सा सत्य समझ जाओगे जो तुम लोग समझते नहीं हो। अधिकतर लोग अमल में अपने अनुभव को गहरा करने के बजाय महज़ परमेश्वर के वचनों के पाठ को समझकर और सिद्धांतों से लैस होकर ध्यान केंद्रित करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तो उनके लिए यह कहावत "परमेश्वर के वचन जीवन हैं" वास्तविक कैसे हो सकती है? किसी इंसान का जीवन मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़कर विकसित नहीं हो सकता, बल्कि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाने से ही होता है। अगर तुम्हारी सोच यह है कि जीवन और आध्यात्मिक कद पाने के लिए परमेश्वर के वचनों को समझना ही पर्याप्त है, तो तुम्हारी समझ विकृत है। परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ तब पैदा होती है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि "इसे हमेशा सत्य पर अमल करके ही समझा जा सकता है।" आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों को जानते हो, लेकिन यह नहीं कह सकते कि तुम इन्हें समझते हो। कुछ लोगों का कहना है कि सत्य पर अमल करने का एकमात्र तरीका यह है कि पहले इसे समझा जाए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, निश्चय ही यह पूरे तौर पर सही तो नहीं है। सत्य का ज्ञान प्राप्त करने से पहले, तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया है। किसी उपदेश में कोई बात सुनकर यह मान लेना कि तुम समझ गए हो, सच्ची समझ नहीं होती—इसे महज़ सत्य को शाब्दिक रूप में समझना कहते हैं, यह उसमें छिपे सच्चे अर्थ को समझने के समान नहीं है। सत्य का सतही ज्ञान होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में इसे समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करके आता है। इसलिए, जब तुम सत्य का अनुभव कर लेते हो, तो तुम इसे समझ सकते हो, और तभी तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। संकेतार्थों को और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना की एकमात्र तरीका है। इसलिए, तुम सत्य के साथ हर जगह जा सकते हो, लेकिन अगर तुम्हारे अंदर कोई सत्य नहीं है, तो फिर धार्मिक लोगों की तो छोड़ो, तुम अपने परिवारजनों तक को आश्वस्त करने का भी प्रयास करने की मत सोचना। सत्य के बिना तुम हवा में तैरते हिमकणों की तरह हो, लेकिन सत्य के साथ तुम प्रसन्न और मुक्त रह सकते हो, और कोई तुम पर आक्रमण नहीं कर सकता। कोई सिद्धांत कितना ही सशक्त क्यों न हो, लेकिन वह सत्य को परास्त नहीं कर सकता। सत्य के साथ, दुनिया को झुकाया जा सकता है और पर्वतों-समुद्रों को हिलाया जा सकता है, जबकि सत्य के अभाव में कीड़े-मकौड़े भी शहर की मज़बूत दीवारों को मिट्टी में मिला सकते हैं। यह एक स्पष्ट तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है, लेकिन इसके पश्चात उनके पास मात्र ज्ञान है और वास्तविक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह पाते? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान से युक्त होना सत्य से युक्त होने के बराबर है? क्या यह भ्रांत दृष्टिकोण नहीं है? तू उतना अधिक ज्ञान बोल पाता है जितनी समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम; जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करवाता है। ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों को अनमोल खजाने की तरह मत बरत; वे दुखदाई हैं और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों की बात कर पाते हैं—लेकिन इनमें वास्तविकता का लेशमात्र भी नहीं होता, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग दूसरों को सही राह पर ले जाने में अक्षम होते हैं और उन्हें केवल गुमराह ही करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे लोगों के वर्तमान कष्टों का निवारण तो करना ही चाहिए, उन्हें प्रवेश करने देना चाहिए; केवल यही समर्पण माना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्द मत बोला कर, और दूसरों को अपने आज्ञापालन में बाँधने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह केवल उनके भ्रम को ही बढ़ा सकता है। इस तरह करते रहने से बहुत वाद उत्पन्न होगा, जो लोगों को तुझसे घृणा करवाएगा। ऐसी है मनुष्य की कमी, और यह सचमुच अत्यंत लज्जाजनक है। इसलिए वास्तविक रूप में विद्यमान समस्याओं की अधिक बात कर। अन्य लोगों के अनुभवों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति की तरह मत बरत और उन्हें ऊँचा थामकर रख ताकि दूसरे प्रशंसा कर पाएँ; तुझे अपना विशिष्ट मुक्ति का मार्ग खोजना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को इसी चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

यदि तुम जो संगति करते हो वह लोगों को चलने के लिए मार्ग दे सकती है, तो यह तुम्हारे वास्तविकता से युक्त होने के बराबर है। तुम चाहे जो कहो, तुम्हें लोगों को अभ्यास में लाना और उन सभी को एक मार्ग देना चाहिए जिसका वे अनुसरण कर सकें। उन्हें केवल ज्ञान ही मत पाने दो; अधिक महत्वपूर्ण चलने के लिए मार्ग का होना है। लोग परमेश्वर में विश्वास करें, इसके लिए उन्हें परमेश्वर द्वारा अपने कार्य में दिखाए गए मार्ग पर चलना चाहिए। अर्थात, परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया पवित्र आत्मा द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने की प्रक्रिया है। तदनुसार, तुम्हारे पास एक ऐसा मार्ग होना चाहिए जिस पर तुम चल सको, फिर चाहे जो हो, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के मार्ग पर चलना चाहिए। बहुत अधिक पीछे मत छूट जाओ, और बहुत सारी चीज़ों की चिंता में मत पड़ो। यदि तुम बाधाएँ उत्पन्न किए बिना परमेश्वर द्वारा दिखाए मार्ग पर चलते हो, तभी तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो और प्रवेश का मार्ग पा सकते हो। यही परमेश्वर के प्रयोजनों के अनुरूप होना और मानवता का कर्तव्य पूरा करना माना जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो' से उद्धृत

यदि वास्तविक जीवन में लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयाँ जीवन-प्रवेश को अव्यवस्थित करती हैं, तो वे परमेश्वर के वचन को अव्यवस्थित करती हैं और उन्हें परमेश्वर के वचन का उपयोग करके हल किया जाना चाहिए; इसके अतिरिक्त, लोगों को परमेश्वर के वचनों को समझना चाहिए और उन समस्याओं को हल करने के लिए परमेश्वर के सही और उपयुक्त वचनों का उपयोग करना चाहिए। उन्हें कैसे हल किया जा सकता है? परमेश्वर के वचनों में उसकी अपेक्षाएँ, मानक और सिद्धांत खोजने और साथ ही यह पता लगाने से, कि परमेश्वर इस मामले को कैसे परिभाषित करता है, वह क्या प्रासंगिक माँगें करता है, और इस मामले की कोई विशिष्ट, विस्तृत व्याख्या मौजूद है या नहीं। यदि परमेश्वर के वचन इस बारे में केवल सामान्य रूप से बात करते हैं, तो तुम्हें उन पर विचार करना चाहिए, और यदि तुम्हें अकेले उनका अर्थ समझ में न आए, तो संगति के लिए अन्य लोगों को खोजो या सामूहिक संगति करो। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए महसूस करो और खोजो, और प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करो, और धीरे-धीरे समस्या के सार को समझो, और अंत में, परमेश्वर के वचन के सिद्धांतों के आधार पर इस प्रकार प्रवेश करो कि इस क्षेत्र में तुम्हारी कठिनाई हल हो जाए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (1)' से उद्धृत

जब तुम स्वयं को जीवन के लिए तैयार कर रहे हो, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने पर ध्यान देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के बारे में ज्ञान के विषय में, मानवीय जीवन के विषय में और विशेष रूप से अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के विषय में बातचीत करने के योग्य होना चाहिए। चूँकि तुम जीवन का अनुसरण करते हो, तो तुम्हारे अंदर ये चीज़ें होनी चाहिए। जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें इनके सामने अपनी स्थिति की वास्तविकता को मापना चाहिए। यानी, जब तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव के दौरान अपनी कमियों का पता चले, तो तुम्हें अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ने, गलत अभिप्रेरणाओं और धारणाओं से मुँह मोड़ने में सक्षम होना चाहिए। अगर तुम हमेशा इन बातों का प्रयास करो और इन बातों को हासिल करने में अपने दिल को उँड़ेल दो, तो तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग होगा, तुम अपने अंदर खोखलापन महसूस नहीं करोगे, और इस तरह तुम एक सामान्य स्थिति बनाए रखने में सफल हो जाओगे। तब तुम ऐसे इंसान बन जाओगे जो अपने जीवन में भार वहन करता है, जिसमें आस्था है। ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, उन्हें अमल में नहीं ला पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे सबसे अहम बात को समझ नहीं पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे जीवन को गंभीरता से नहीं लेते? वे अहम बात को समझ नहीं पाते और उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, उसका कारण यह है कि जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे उनसे अपनी स्थितियों को जोड़ नहीं पाते, न ही वे अपनी स्थितियों को अपने वश में कर पाते हैं। कुछ लोग कहते हैं : "मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़कर उनसे अपनी स्थिति को जोड़ पाता हूँ, और मैं जानता हूँ कि मैं भ्रष्ट हूँ और मेरी क्षमता खराब है, लेकिन मैं परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के काबिल नहीं हूँ।" तुमने केवल सतह को ही देखा है; और भी बहुत-सी वास्तविक चीज़ें हैं जो तुम नहीं जानते : देह-सुख का त्याग कैसे करें, दंभ को दूर कैसे करें, स्वयं को कैसे बदलें, इन चीज़ों में कैसे प्रवेश करें, अपनी क्षमता कैसे बढ़ाएँ और किस पहलू से शुरू करें। तुम केवल सतही तौर पर कुछ चीज़ों को समझते हो, तुम बस इतना जानते हो कि तुम वाकई बहुत भ्रष्ट हो। जब तुम अपने भाई-बहनों से मिलते हो, तो तुम यह चर्चा करते हो कि तुम कितने भ्रष्ट हो, तो ऐसा लगता है कि तुम स्वयं को जानते हो और अपने जीवन के लिए एक बड़ा भार वहन करते हो। दरअसल, तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव बदला नहीं है, जिससे साबित होता है कि तुम्हें अभ्यास का मार्ग मिला नहीं है। अगर तुम किसी कलीसिया की अगुवाई करते हो, तो तुम्हें भाई-बहनों की स्थितियों को समझने और उस ओर उनका ध्यान दिलाने में समर्थ होना चाहिए। क्या सिर्फ इतना कहना पर्याप्त होगा : "तुम अवज्ञाकारी और पिछड़े हुए हो!"? नहीं, तुम्हें खास तौर से बताना चाहिए कि उनकी अवज्ञाकारिता और पिछड़ापन किस प्रकार अभिव्यक्त हो रहा है। तुम्हें उनकी अवज्ञाकारी स्थिति पर, उनके अवज्ञाकारी बर्ताव पर और उनके शैतानी स्वभावों पर बोलना चाहिए, और इन बातों पर इस ढंग से बोलना चाहिए जिससे कि वे तुम्हारे शब्दों की सच्चाई से पूरी तरह आश्वस्त हो जाएँ। अपनी बात रखने के लिए तथ्यों और उदाहरणों का सहारा लो, और उन्हें बताओ कि वे किस तरह विद्रोही व्यवहार से अलग हो सकते हैं, और उन्हें अभ्यास का मार्ग बताओ—यह है लोगों को आश्वस्त करने का तरीका। जो इस तरह से काम करते हैं, वही दूसरों की अगुवाई कर सकते हैं; उन्हीं में सत्य-वास्तविकता होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

जब कोई समस्या आ पड़ती है, तो तुम्हारा दिमाग ठंडा और रवैया सही होना चाहिए, और तुम्हें कोई विकल्प चुनना चाहिए। समस्या को हल करने के लिए तुम्हें सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए। सामान्य स्थिति में, कुछ सत्यों को समझने का क्या उपयोग है? यह तुम्हारा पेट भरने के लिए नहीं होता, और यह तुम्हें केवल कहने को कुछ देने के लिए नहीं है, और न ही यह दूसरों की समस्याओं को हल करने के लिए है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसका उपयोग तुम्हारी अपनी समस्याओं, अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए है—खुद की कठिनाइयों को सुलझाने के बाद ही तुम दूसरों की कठिनाइयों को हल कर सकते हो। ऐसा क्यों कहा जाता है कि पतरस एक फल है? क्योंकि उसमें मूल्यवान चीज़ें हैं, पूर्ण किए जाने योग्य चीज़ें; वह सत्य की तलाश करने के लिए कृतसंकल्प था और दृढ़ इच्छा-शक्ति वाला था; उसमें विवेक था, वह कष्ट सहने को तैयार था, और अपने दिल में वह सत्य से प्रेम करता था, और जो कुछ भी होता था, उसे वह यूँ ही गुज़र जाने नहीं देता था। ये सभी ठोस बातें हैं। यदि तुम्हारे पास इन ठोस बातों में से एक भी नहीं है, तो इसका मतलब परेशानी है। तुम अनुभव करने में असमर्थ हो, और तुम्हारे पास कोई अनुभव नहीं है, और तुम दूसरों की कठिनाइयों को हल नहीं कर सकते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम नहीं जानते कि प्रवेश कैसे करें। जब चीज़ें तुम पर आ पड़ती हैं, तो तुम भ्रमित हो जाते हो; तुम व्यथित महसूस करते हो, रोते हो, नकारात्मक हो जाते हो, भाग जाते हो, और चाहे तुम कुछ भी करो, तुम उन्हें सही ढंग से संभाल नहीं पाते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत

क्या तुम लोगों की सत्य की समझ तुम्हारी अपनी अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में तुम्हें पहले यह सोचना होगा कि कौन-से सत्य तुम्हारे सामने आए लोगों, घटनाओं और चीज़ों से संबंध रखते हैं; इन्हीं सत्यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा तलाश सकते हो और अपने सामने आने वाली चीज़ों को उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते कि सत्य के कौन-से पहलू तुम्हारे सामने आई चीज़ों से संबंध रखते हैं, और सीधे परमेश्वर की इच्छा खोजने चल देते हो, तो यह एक अंधा दृष्टिकोण है और परिणाम हासिल नहीं कर सकता। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा समझना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि तुम्हारे साथ किस प्रकार की चीज़ें घटित हुई हैं, वे सत्य के किन पहलुओ से संबंध रखती हैं, और परमेश्वर के वचन में उस विशिष्ट सत्य को देखो, जो तुम्हारे अनुभव से संबंध रखता है। तब तुम उस सत्य में अभ्यास का वह मार्ग खोजो, जो तुम्हारे लिए सही है; इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रबद्ध नहीं होता, न ही वह कोई विधि है। वह मृत नहीं है—वह स्वयं जीवन है, वह एक जीवित चीज़ है, और वह वो नियम है, जिसका अनुसरण प्राणी को अपने जीवन में अवश्य करना चाहिए और वह वो नियम है, जो मनुष्य के पास अपने जीवन में अवश्य होना चाहिए। यह ऐसी चीज़ है, जिसे तुम्हें जितना संभव हो, अनुभव के माध्यम से समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

यदि तुम सत्य को व्यवहार में लाना और उसे समझना चाहते हो, तो सबसे पहले अपने सामने आने वाली कठिनाइयों और अपने आसपास घटने वाली चीज़ों का सार समझो, समझो कि इन मुद्दों के साथ क्या समस्याएँ हैं, साथ ही इस बात को भी समझो कि वो सत्य के किस पहलू से संबंधित हैं। इन चीज़ों की तलाश करो और उसके बाद अपनी वास्तविक कठिनाइयों के आधार पर सत्य की खोज करो। इस तरह, जैसे-जैसे तुम अनुभव प्राप्त करोगे, वैसे-वैसे तुम अपने साथ होने वाली हर चीज़ में परमेश्वर का हाथ देखने लगोगे, और यह भी जानने लगोगे कि वह क्या करना चाहता है और तुममें कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है। शायद तुम्हें कभी ऐसा न लगता हो कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ हो रहा है, वह परमेश्वर में विश्वास और सत्य से जुड़ा है, और बस अपने आप से कहो, "इससे निपटने का मेरा अपना तरीका है; मुझे सत्य की या परमेश्वर के वचनों की आवश्यकता नहीं है। जब मैं सभाओं में भाग लूँगा, या जब मैं परमेश्वर के वचनों को पढूँगा, या अपना कर्तव्य निभाऊँगा, तो मैं अपनी जाँच सत्य और परमेश्वर के वचनों से तुलना करके करूँगा।" अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे जीवन में होने वाली रोज़मर्रा की चीज़ों का, जैसे परिवार, काम-काज, विवाह और तुम्हारे भविष्य से संबंधित विभिन्न चीज़ों का, सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और तुम उन्हें मानवीय तरीकों से हल करते हो, अगर तुम्हारे अनुभव करने का यही तरीका है, तो तुम्हें सत्य कभी प्राप्त नहीं होगा; तुम कभी यह नहीं समझ पाओगे कि परमेश्वर तुम्हारे भीतर क्या करना चाहता है या वह कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

अपना कर्तव्य पूरा करते हुए अगर तुम कोई कठिनाई अनुभव करो, तो तुम्हें उसे सुलझाना चाहिए; अनसुलझी कठिनाइयाँ हमेशा बनी रहती हैं और समय के साथ बदतर हो जाती हैं। बदतर होने से मेरा क्या मतलब है? मेरा मतलब है कि यदि तुम अपनी कठिनाई को सुलझाते नहीं, तो वह तुम्हारी स्थिति को प्रभावित करेगी, और साथ ही अन्य लोगों को भी प्रभावित करेगी। जैसे-जैसे समय गुज़रेगा, तुम्हारी कठिनाई तुम्हें अपना कर्तव्य अच्छी तरह पूरा करने से, सत्य को समझने से और परमेश्वर के आगे आने से रोकेगी। ये सभी समस्याएँ हैं, है न? यह एक गंभीर समस्या है, कोई मामूली समस्या नहीं। व्यक्ति की शिकायतें, आक्रोश, परमेश्वर के बारे में गलत धारणाएँ, परमेश्वर के परिवार के संबंध में गलतफहमियाँ, दूसरों के बारे में पूर्वाग्रह और लोगों से अनबन—समय के साथ, जैसे-जैसे अंदर ये चीज़ें अधिकाधिक बढ़ती जाती हैं, इनके परिणाम क्या होते हैं? ये तुम्हें सत्य की वास्तविकता के पथ पर ले जाती हैं, या बुरे मनुष्यों के पथ पर? उस पथ पर क्या तुम बेहतर से बेहतर होगे या बदतर से बदतर? (बदतर से बदतर।) कितने बदतर? जब ये चीज़ें एक लंबे समय तक लोगों के अंदर बढ़ती जाती हैं, तो उनका विश्वास धीरे-धीरे गायब हो जाता है; जब उनका तथाकथित विश्वास गायब हो जाता है, तो उनका उत्साह भी चला जाता है। जब उनका उत्साह चला जाता है, तो क्या उनमें अपने कर्तव्य पूरे करने की ऊर्जा और इच्छा-शक्ति कम से कमतर नहीं होती जाएगी? वे परमेश्वर में विश्वास के आनंद को महसूस करने में अक्षम हो जाते हैं, अपने कर्तव्य पूरे करने के दौरान उसके आशीष महसूस नहीं कर पाते; और इस प्रकार वे अपनी आंतरिक शक्ति नहीं ढूँढ़ पाते, और वे शिकायतों, नकारात्मकता, धारणाओं और गलतफहमियों से भर जाते हैं और उनसे नियंत्रित होने लगते हैं। जब वे इन चीज़ों के बीच रहते हैं, उनसे घिर जाते हैं और उनसे नियंत्रित होते हैं, तो वे अपने कर्तव्य पूरे करते हुए केवल उन्हें झेलकर बेमन से ही प्रयास कर पाते हैं; वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें उन्हें धीरज और आत्म-संयम पर भरोसा करना चाहिए। वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और उसके आशीष नहीं देख पाते। फिर क्या होता है? चाहे वे कैसे भी अपने कर्तव्य पूरे करें, वे सिद्धांतों को पाने में अक्षम होते हैं। जैसे-जैसे वे इसे जारी रखते हैं, वे अधिकाधिक संभ्रमित हो जाते हैं और आगे का रास्ता नहीं ढूँढ़ पाते, और अपने कर्तव्य पूरे करने का सारा जोश गँवा देते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानव सदृशता पाने के लिए आवश्यक है अपने समूचे हृदय, मन और आत्मा से अपना कर्तव्य सही-सही पूरा करना' से उद्धृत

लोग भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करते हैं। यह एक तथ्य है। कोई भी इससे बच या भाग नहीं सकता; उन्हें इस तथ्य का सामना करना ही होता है। यह ऐसा क्यों है? कुछ लोग कहते हैं: "मैं हमेशा अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करता रहता हूँ। मैं इसे कभी नहीं बदल सकता। करने को है क्या? क्या मैं बस ऐसा ही हूँ? क्या परमेश्वर मुझे नापसंद करता है, या मुझसे नफ़रत करता है?" क्या ऐसा दृष्टिकोण सही है? क्या ऐसी सोच सही है? लोगों का स्वभाव भ्रष्ट होता है, और वे अक्सर अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करते हैं, इस बात का यह मतलब नहीं होता कि वे बर्बाद हो चुके हैं, उनमें सुधार संभव नहीं है। लोगों का अक्सर भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना यह साबित करता है कि उनका जीवन शैतान के भ्रष्ट स्वभाव से नियंत्रित होता है, और उनका सार शैतान का ही सार है। लोगों को इस तथ्य को मानना और स्वीकार करना चाहिए। इंसान के प्रकृति-सार और परमेश्वर के सार के बीच अंतर होता है। इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद उन्हें क्या करना चाहिए? जब लोग भ्रष्ट स्वभाव को उजागर कर देते हैं; जब वे देह के भोगों में लिप्त होते और परमेश्वर से दूर हो जाते हैं; या जब परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है जो उनके अपने विचारों के विपरीत होता है, और उनके भीतर शिकायतें पैदा होती हैं, तो उन्हें तुरंत ही खुद को अवगत करा देना चाहिए कि यह कोई समस्या है, और भ्रष्ट स्वभाव है; यह परमेश्वर के खिलाफ़ विद्रोह है, परमेश्वर का विरोध है; इसका सत्य के साथ मेल नहीं है, और परमेश्वर के प्रति यह अभिशाप है। जब लोगों को इन चीज़ों का एहसास होता है, तो उन्हें शिकायत नहीं करनी चाहिए, या नकारात्मक और आलसी नहीं हो जाना चाहिए, और उन्हें परेशान तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए; इसके बजाय, उन्हें अधिक गहरे आत्म-चिंतन और आत्म-ज्ञान के लिए सक्षम हो जाना चाहिए। इसके अलावा, उन्हें अग्रसक्रिय रूप से परमेश्वर के सामने आने में सक्षम होना चाहिए, और निष्क्रिय नहीं बनना चाहिए। उन्हें परमेश्वर की झिड़की और अनुशासन को स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने आने की पहल करनी चाहिए, और तुरंत अपनी स्थिति को पलट देना चाहिए, ताकि वे सत्य और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हो जाएँ, और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकें। इस तरह, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता निरंतर सामान्य होता जाएगा, और साथ ही तुम्हारी अंदरूनी स्थिति भी। तुम भ्रष्ट स्वभावों, भ्रष्टता के सार, और शैतान की भिन्न कुरूप स्थितियों की पहचान एक बढ़ती स्पष्टता के साथ करने में सक्षम होगे। फिर तुम इस तरह की मूर्खतापूर्ण और बचकानी बातें नहीं करोगे जैसे कि "यह शैतान था जो मेरे साथ दख़लंदाजी कर रहा था," या "यह ख़याल शैतान ने मुझे दिया था।" इसके बजाय, तुम्हें भ्रष्ट स्वभावों के बारे में, परमेश्वर के प्रति लोगों के विरोध के और शैतान के सार के बारे में, सटीक जानकारी होगी। तुम्हारे पास इन चीज़ों को हल करने का एक अधिक सटीक तरीका होगा, और ये चीज़ें तुम्हें विवश नहीं करेंगी। जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव के एक छोटे से अंश को प्रकट करोगे, या अपराध करोगे, या अपने कर्तव्य को बेपरवाही से निभाओगे, या जब तुम अक्सर खुद को एक निष्क्रिय, नकारात्मक स्थिति में पाओगे, तब भी तुम कमज़ोर नहीं बनोगे और परमेश्वर और उसके उद्धार में विश्वास नहीं खो दोगे। तुम इस तरह की परिस्थितियों के बीच नहीं रहोगे, बल्कि अपने भ्रष्ट स्वभाव का सही ढंग से सामना करोगे, और तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के लिए सक्षम होगे, और, जब कभी तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर होगा, तो तुम तुरंत उसे उलट पाओगे, फ़ौरन परमेश्वर के सामने रहोगे और उसके अनुशासन और फटकार को खोजोगे। न तो तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से, न शैतान के सार से, और न ही तुम अपनी विभिन्न नकारात्मक और निष्क्रिय स्थितियों से नियंत्रित होगे, बल्कि सत्य, उद्धार, और परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके अनुशासन और तिरस्कार की स्वीकृति की तलाश में अपनी आस्था को विकसित करोगे। इस तरह, क्या लोग स्वतंत्र रूप से नहीं जी पाएँगे? यह सत्य का अभ्यास करने और उसे प्राप्त करने का मार्ग है, और वैसे ही, यह उद्धार का मार्ग भी है। भ्रष्ट स्वभावों ने लोगों के भीतर गहरी जड़ें जमा ली हैं; शैतान का सार और उसकी प्रकृति उनके विचारों, व्यवहार और मानसिकता को नियंत्रित करते हैं; फिर भी, सत्य के, परमेश्वर के कार्य के, और उसके उद्धार के होते हुए, इसमें से कोई भी चिंता का विषय नहीं है, और इससे किसी तरह की कठिनाइयाँ सामने नहीं आती हैं। लोगों के भ्रष्ट स्वभावों, या उनकी समस्याओं, या उनकी मजबूरियों के बावजूद, एक मार्ग है जिसे वे अपना सकते हैं। इन चीज़ों को हल करने का एक तरीका है, और इनके हल के लिए अनुरूप सत्य हैं। क्या इस प्रकार उन लोगों के उद्धार की आशा नहीं है?

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

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610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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