30. परीक्षण और शोधन से गुजरने के सिद्धांत

(1) परीक्षण और शोधन सब परमेश्वर की योजना के हिस्से हैं। वे उसका प्रेम हैं, और उनके भीतर उसकी इच्छा और उसकी माँगें होती हैं। यही सबसे बड़ा सबक है।

(2) परीक्षणों से गुजरते समय किसी व्यक्ति में कितनी भी भ्रष्टता क्यों न उजागर की जाए, और चाहे वह कितनी ही बार असफल होकर नीचे गिर जाए, उसे परमेश्वर से कभी नाराज नहीं होना चाहिए, बल्कि खुद को जानना चाहिए और ईमानदारी से पश्चाताप करना चाहिए।

(3) परीक्षण और शोधन किसी के स्वभाव को बदलने में सबसे बड़ा सबक होते हैं। यदि कोई परमेश्वर से प्रार्थना और उस पर भरोसा कर सकता है, सत्य की तलाश कर सकता है, स्वेच्छा से कठिनाई से गुजर सकता है, तो वह निश्चय ही दृढ़ता से खड़ा रह सकेगा।

(4) सत्य की तलाश करो और परीक्षणों के बीच सभी मामलों में परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करो, और तुम अंधेरों में नहीं गिरोगे, बल्कि परमेश्वर के वचन द्वारा निश्चय ही निर्देशित होगे और प्रकाश का मार्ग देखोगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग, भविष्य के लिए आशीर्वाद पाने की खोज करते हैं; यह उनकी आस्‍था में उनका लक्ष्‍य होता है। सभी लोगों की यही अभिलाषा और आशा होती है, लेकिन, उनकी प्रकृति के भीतर के भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में तुम शुद्ध नहीं किए गए हो, इन पहलुओं में तुम्हें परिष्कृत किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए एक वातावरण बनाता है, परिष्कृत होने के लिए बाध्य करता है जिससे तुम अपने खुद के भ्रष्टाचार को जान जाओ। अंततः तुम उस बिंदु पर पहुंच जाते हो जहां तुम मर जाना और अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ देना और परमेश्वर की सार्वभौमिकता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना अधिक पसंद करते हो। इसलिए अगर लोगों को कई वर्षों का शुद्धिकरण नहीं मिलता है, अगर वे एक हद तक पीड़ा नहीं सहते हैं, तो वे, अपनी सोच और हृदय में देह के भ्रष्टाचार के बंधन से बचने में सक्षम नहीं होंगे। जिन भी पहलुओं में तुम अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हो, जिन भी पहलुओं में तुम अभी भी अपनी इच्छाएं रखते हो, जिनमें तुम्हारी अपनी मांगें हैं, यही वे पहलू हैं जिनमें तुम्हें कष्ट उठाना होगा। केवल दुख से ही सबक सीखा जा सकता है, जिसका अर्थ है सत्य पाने और परमेश्वर के इरादे को समझने में समर्थ होना। वास्तव में, कई सत्यों को कष्टदायक परीक्षणों के अनुभव से समझा जाता है। कोई भी व्यक्ति एक आरामदायक और सहज परिवेश में या अनुकूल परिस्थिति में परमेश्वर की इच्छा नहीं समझ सकता है, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को नहीं पहचान सकता है, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की सराहना नहीं कर सकता है। यह असंभव होगा!

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परीक्षणों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें' से उद्धृत

मनुष्य की दशा और अपने प्रति मनुष्य का व्यवहार देखकर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, जिससे मनुष्य उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति आज्ञाकारिता दोनों से युक्त हो सकता है, और प्रेम और गवाही दोनों रख सकता है। इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के शुद्धिकरण, और साथ ही उसके न्याय, व्यवहार और काट-छाँट का अनुभव अवश्य करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शुद्धिकरण केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुआयामी प्रभाव के लिए होता है। केवल इसी तरह से परमेश्वर उन लोगों में शुद्धिकरण का कार्य करता है, जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, ताकि उनका संकल्प और प्रेम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाए। जो लोग सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं और जो परमेश्वर को पाने की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शुद्धिकरण से अधिक अर्थपूर्ण या अधिक सहायक कुछ नहीं है। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य द्वारा सरलता से जाना या समझा नहीं जाता, क्योंकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है। अंततः, परमेश्वर के लिए मनुष्य के समान स्वभाव रखना असंभव है, और इसलिए मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को जानना सरल नहीं है। सत्य मनुष्य द्वारा अंतर्निहित रूप में धारण नहीं किया जाता, और वह उनके द्वारा सरलता से नहीं समझा जाता, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से और सत्य को अभ्यास में लाने के संकल्प से रहित है, और यदि वह पीड़ित नहीं होता और उसका शुद्धिकरण या न्याय नहीं किया जाता, तो उसका संकल्प कभी पूर्ण नहीं किया जाएगा। सभी लोगों के लिए शुद्धिकरण कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शुद्धिकरण के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धर्मी स्वभाव स्पष्ट करता है और मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ सार्वजनिक करता है, और अधिक प्रबुद्धता, अधिक वास्तविक काट-छाँट और व्यवहार प्रदान करता है; तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से वह मनुष्य को अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान देता है, और उसे परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के प्रति सच्चा और शुद्ध प्रेम प्राप्त करने देता है। शुद्धिकरण का कार्य करने में परमेश्वर के ये लक्ष्य हैं। उस समस्त कार्य के, जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, अपने लक्ष्य और अपना अर्थ होता है; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता, और न ही वह ऐसा कार्य करता है, जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शुद्धिकरण का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना है। बल्कि इसका अर्थ है शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना, और उसके पूरे जीवन को बदलना। शुद्धिकरण मनुष्य की वास्तविक परीक्षा और वास्तविक प्रशिक्षण का एक रूप है, और केवल शुद्धिकरण के दौरान ही उसका प्रेम अपने अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

जब परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो मनुष्य को कष्ट होता है। जितना अधिक मनुष्य का शुद्धिकरण होगा, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना अधिक विशाल होगा, और परमेश्वर की शक्ति उसमें उतनी ही अधिक प्रकट होगी। इसके विपरीत, मनुष्य का शुद्धिकरण जितना कम होता है, उतना ही कम परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम होता है, और परमेश्वर की उतनी ही कम शक्ति उस में प्रकट होगी। एक व्यक्ति का शुद्धिकरण एवं दर्द जितना ज़्यादा होता है तथा जितनी अधिक यातना वो सहता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना ही गहरा होगा एवं परमेश्वर में उसका विश्वास उतना ही अधिक सच्चा होगा, और परमेश्वर के विषय में उसका ज्ञान भी उतना ही अधिक गहन होगा। तुम अपने अनुभवों में देखोगे कि जो शुद्धि पाते हुए अत्यधिक दर्द सहते हैं, जिनके साथ काफी निपटारा तथा अनुशासन का व्यवहार किया जाता है, और तुम देखोगे कि यही लोग हैं जिनके पास परमेश्वर के प्रति गहरा प्रेम होता है, और उनके पास परमेश्वर का अधिक गहन एवं तीक्ष्ण ज्ञान होता है। ऐसे लोग जिन्होंने निपटारा किए जाने का अनुभव नहीं किया है, जिनके पास केवल सतही ज्ञान होता है, और जो केवल यह कह सकते हैं: "परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह प्रदान करता है ताकि वे परमेश्वर में आनन्दित हो सकें।" यदि लोगों ने निपटारा किए जाने का अनुभव किया है और अनुशासित किए गए हैं, तो वे परमेश्वर के विषय में सच्चे ज्ञान के बारे में बोलने में समर्थ हैं। अतः मनुष्य में परमेश्वर का कार्य जितना ज़्यादा अद्भुत होता है, उतना ही ज़्यादा यह मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अभेद्य होता है और यह तुम्हारी धारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य उतना ही अधिक तुम्हें जीतने और तुम्हें प्राप्त करने में समर्थ होता है, और तुम्हें परिपूर्ण बना पाता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व बहुत अधिक है! यदि उसने मनुष्य को इस तरीके से शुद्ध नहीं किया, यदि उसने इस पद्धति के अनुसार कार्य नहीं किया, तो उसका कार्य अप्रभावी और महत्वहीन होगा। पहले यह कहा गया था कि परमेश्वर इस समूह को चुनेगा और प्राप्त करेगा, वह उन्हें अंत के दिनों में पूर्ण बनाएगा; इसमें असाधारण महत्व है। वह तुम लोगों के भीतर जितना बड़ा काम करता है, उतना ही ज़्यादा तुम लोगों का प्रेम गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का काम जितना अधिक विशाल होता है, उतना ही अधिक उसकी बुद्धि के बारे में समझने में तुम लोग समर्थ होते हो और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर की 6,000 साल की प्रबंधन योजना का अंत हो जाएगा। क्या यह इतनी आसानी से समाप्त हो सकती है? एक बार जब वह मानवजाति पर विजय प्राप्त कर लेगा, तो क्या उसका कार्य पूरा हो जाएगा? क्या यह इतना आसान हो सकता है? लोग वास्तव में कल्पना करते हैं कि यह इतना ही सरल है, परन्तु परमेश्वर जो करता है वह इतना आसान नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम परमेश्वर के कार्य के कौन-से भागका उल्लेख करते हो, मनुष्य के लिए सब कुछ अथाह है। यदि तुम इसे मापने के योग्य होते, तो परमेश्वर के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाता। परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अथाह है; यह तुम्हारी धारणाओं से पूरी तरह विपरीत है, और यह तुम्हारी धारणाओं से जितना ज़्यादा असंगत होता है, उतना ही ज़्यादा यह दर्शाता है कि परमेश्वर का कार्य अर्थपूर्ण है; यदि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो यह अर्थहीन होता। आज, तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का कार्य अत्यंत अद्भुत है, और तुम्हें यह जितना अधिक अद्भुत महसूस होता है, उतना ही अधिक तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर अथाह है, और तुम देखते हो कि परमेश्वर के कर्म कितने महान हैं। यदि उसने मनुष्य को जीतने के लिए केवल सतही और बेपरवाही से कार्य किए होते, और उसके बाद कुछ नहीं किया होता, तो मनुष्य परमेश्वर के कार्य के महत्व को देखने में असमर्थ होता। यद्यपि आज तुम थोड़ा-सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु यह तुम्हारे जीवन की प्रगति के लिए बहुत लाभदायक है; और इसलिए ऐसी कठिनाईयों से गुज़रना तुम लोगों के लिए सर्वथा आवश्यक है। आज, तुम थोड़ा-सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु बाद में तुम सचमुच में परमेश्वर के कार्यों को देखने में सक्षम होगे, और अंततः तुम कहोगे : "परमेश्वर के कर्म बहुत ही अद्भुत हैं!" तुम्हारे हृदय में ये वचन होंगे। कुछ समय के लिए परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का अनुभव करने के बाद (सेवा करने वालों की परीक्षा और ताड़ना का समय), अंततः कुछ लोगों ने कहा : "परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में कठिन है!" यह तथ्य कि वे "वास्तव में कठिन" इन शब्दों का प्रयोग करते हैं दर्शाता है कि परमेश्वर के कर्म अथाह हैं, परमेश्वर का कार्य अत्यधिक महत्व और मूल्य से सम्पन्न है, और मनुष्य के द्वारा संजोकर रखे जाने के बहुत ही योग्य है। यदि, मेरे इतना अधिक काम करने के बाद, तुम्हें थोड़ा-सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, तो क्या तब भी मेरे कार्य का कोई मूल्य हो सकता है? इस कारण तुम कहोगे : "परमेश्वर की सेवा करना वास्तव में कठिन है, परमेश्वर के कर्म बहुत अद्भुत हैं, परमेश्वर सचमुच में विवेकी है! वह बहुत प्यारा है!" यदि, अनुभव की एक अवधि से गुज़रने के बाद, तुम ऐसे शब्दों को कहने में समर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुमने स्वयं में परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण जितना बड़ा होता है, लोगों के हृदय उतने ही अधिक परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके हृदय की यातना उनके जीवन के लिए लाभदायक होती है, वे परमेश्वर के समक्ष अधिक शांत रह सकते हैं, परमेश्वर के साथ उनका संबंध और अधिक निकटता का हो जाता है, और वे परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम और उसके सर्वोच्च उद्धार को और अच्छी तरह से देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षणों से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैकड़ों बार शुद्धिकरण से होकर गुजरना होगा; केवल इस प्रक्रिया से गुजरने और इस कदम पर निर्भर रहने के माध्यम से ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी कर पाओगे और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे। शुद्धिकरण वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शुद्धिकरण और कड़वे परीक्षण ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं। कठिनाई के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम की कमी रहती है; यदि भीतर से उनको परखा नहीं जाता, और यदि वे सच में शुद्धिकरण के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शुद्धिकरण किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और कि तुम उन अनेक समस्याओं पर काबू पाने में असमर्थ हो, जिनका तुम सामना करते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञा कितनी बड़ी है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच जान पाते हैं; और परीक्षण लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाते हैं।

अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया और वह कई दर्दनाक अग्निपरीक्षाओं से होकर गुजरा। यह शुद्धिकरण परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अनुभव बन गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम एक तरह से परमेश्वर से प्रेम करने के अपने संकल्प के कारण रख पाया; परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप में, यह उस शुद्धिकरण और पीड़ा के कारण था, जिसमें से वह होकर गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक और ऐसी चीज़ बन गई, जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शुद्धिकरण की पीड़ा से नहीं गुजरते, तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की प्राथमिकताओं से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है, और मूलत: परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। यद्यपि अपने हृदय में जो कुछ वे सोचते हैं, वह परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की खातिर ही होता है, और भले ही उनके विचार पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित और मानवीय विचारों से रहित प्रतीत होते हैं, परंतु जब उनके विचार परमेश्वर के सामने लाए जाते हैं, तो वह ऐसे विचारों को प्रशंसा या आशीष नहीं देता। यहाँ तक कि जब लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लेते हैं—जब वे उन सबको जान जाते हैं—तो इसे भी परमेश्वर से प्रेम करने का संकेत नहीं माना जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। शुद्धिकरण से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शुद्धिकरण के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ जान सकते हैं। उस समय, जब वे पुनः प्रयास करते हैं, तब वे उपयुक्त रूप से और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सत्यों को अभ्यास में ला सकते हैं; उस समय उनके मानवीय विचार कम हो जाते हैं, उनकी मानवीय भ्रष्टता घट जाती है, और उनकी मानवीय संवेदनाएँ कम हो जाती हैं; केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर के प्रति प्रेम के सत्य का प्रभाव मौखिक ज्ञान या मानसिक तैयारी से हासिल नहीं किया जा सकता, और न ही इसे केवल सत्य को समझने से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग एक मूल्य चुकाएँ, और कि वे शुद्धिकरण के दौरान अधिक कड़वाहट से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध और परमेश्वर के हृदय के अनुसार होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

परीक्षणों से गुज़रते हुए, लोगों का कमज़ोर होना, या उनके भीतर नकारात्मकता आना, या परमेश्वर की इच्छा पर या अभ्यास के लिए उनके मार्ग पर स्पष्टता का अभाव होना स्वाभाविक है। परन्तु हर हालत में, अय्यूब की ही तरह, तुम्हें परमेश्वर के कार्य पर भरोसा अवश्य होना चाहिए, और परमेश्वर को नकारना नहीं चाहिए। यद्यपि अय्यूब कमज़ोर था और अपने जन्म के दिन को धिक्कारता था, उसने इस बात से इनकार नहीं किया कि मनुष्य के जीवन में सभी चीजें यहोवा द्वारा प्रदान की गई थी, और यहोवा ही उन्हें वापस ले सकता है। चाहे उसकी कैसे भी परीक्षा ली गई, उसने अपना विश्वास बनाए रखा। अपने अनुभव में, तुम परमेश्वर के वचनों के द्वारा चाहे जिस भी प्रकार के शुद्धिकरण से गुज़रो, संक्षेप में, परमेश्वर को मानवजाति से जिसकी अपेक्षा है वह है, परमेश्वर में उनका विश्वास और प्रेम। इस तरह से, जिसे वो पूर्ण बनाता है वह है लोगों का विश्वास, प्रेम और अभिलाषाएँ। परमेश्वर लोगों पर पूर्णता का कार्य करता है, जिसे वे देख नहीं सकते, महसूस नहीं कर सकते; इन परिस्थितयों में तुम्हारे विश्वास की आवश्यकता होती है। लोगों के विश्वास की आवश्यकता तब होती है जब किसी चीज को नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है, और तुम्हारे विश्वास की तब आवश्यकता होती है जब तुम अपनी स्वयं की धारणाओं को नहीं छोड़ पाते हो। जब तुम परमेश्वर के कार्यों के बारे में स्पष्ट नहीं होते हो, तो आवश्यकता होती है कि तुम विश्वास बनाए रखो और तुम दृढ़ रवैया रखो और गवाह बनो। जब अय्यूब इस स्थिति तक पहुँचा, तो परमेश्वर उसे दिखाई दिया और उससे बोला। अर्थात्, यह केवल तुम्हारे विश्वास के भीतर से ही है कि तुम परमेश्वर को देखने में समर्थ होगे, और जब तुम्हारे पास विश्वास है तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनायेगा। विश्वास के बिना, वह ऐसा नहीं कर सकता है। परमेश्वर तुम्हें वह सब प्रदान करेगा जिसको प्राप्त करने की तुम आशा करते हो। यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं है, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है और तुम परमेश्वर के कार्यों को देखने में असमर्थ होगे, उसकी सर्वसामर्थ्य को तो बिल्कुल भी नहीं देख पाओगे। जब तुम्हारे पास यह विश्वास होता है कि तुम अपने व्यवहारिक अनुभव में उसके कार्यों को देख सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट होगा और भीतर से वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। उस विश्वास के बिना, परमेश्वर ऐसा करने में असमर्थ होगा। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास खो चुके हो, तो तुम कैसे उसके कार्य का अनुभव कर पाओगे? इसलिए, केवल जब तुम्हारे पास विश्वास है और तुम परमेश्वर पर संदेह नहीं करते हो, चाहे वो जो भी करे, अगर तुम उस पर सच्चा विश्वास करो, केवल तभी वह तुम्हारे अनुभवों में तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन कर देता है, और केवल तभी तुम उसके कार्यों को देख पाओगे। ये सभी चीजें विश्वास के माध्यम से ही प्राप्त की जाती हैं। विश्वास केवल शुद्धिकरण के माध्यम से ही आता है, और शुद्धिकरण की अनुपस्थिति में विश्वास विकसित नहीं हो सकता है। "विश्वास" यह शब्द किस चीज को संदर्भित करता है? विश्वास सच्चा भरोसा है और ईमानदार हृदय है जो मनुष्यों के पास होना चाहिए जब वे किसी चीज़ को देख या छू नहीं सकते हों, जब परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के विचारों के अनुरूप नहीं होता हो, जब यह मनुष्यों की पहुँच से बाहर हो। इसी विश्वास के बारे में मैं बातें करता हूँ। मनुष्यों को कठिनाई और शुद्धिकरण के समय में विश्वास की आवश्यकता होती है, और विश्वास के साथ-साथ शुद्धिकरण आता है; विश्वास और शुद्धिकरण को अलग नहीं किया जा सकता। चाहे परमेश्वर कैसे भी कार्य करे या तुम्हारा परिवेश जैसा भी हो, तुम जीवन का अनुसरण करने में समर्थ होगे और सत्य की खोज करने और परमेश्वर के कार्यों के ज्ञान को तलाशने में समर्थ होगे, और तुममें उसके क्रियाकलापों की समझ होगी और तुम सत्य के अनुसार कार्य करने में समर्थ होगे। ऐसा करना ही सच्चा विश्वास रखना है, ऐसा करना यह दिखाता है कि तुमने परमेश्वर में अपना विश्वास नहीं खोया है। जब तुम शुद्धिकरण द्वारा सत्य का अनुसरण करने में समर्थ हो, तुम सच में परमेश्वर से प्रेम करने में समर्थ हो और उसके बारे में संदेहों को पैदा नहीं करते हो, चाहे वो जो भी करे, तुम फिर भी उसे संतुष्ट करने के लिए सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम गहराई में उसकी इच्छा की खोज करने में समर्थ होते हो और उसकी इच्छा के बारे में विचारशील होते हो, केवल तभी इसका अर्थ है कि तुम्हें परमेश्वर में सच्चा विश्वास है। इससे पहले, जब परमेश्वर ने कहा कि तुम एक सम्राट के रूप में शासन करोगे, तो तुमने उससे प्रेम किया, और जब उसने स्वयं को खुलेआम तुम्हें दिखाया, तो तुमने उसका अनुसरण किया। परन्तु अब परमेश्वर छिपा हुआ है, तुम उसे देख नहीं सकते हो, और परेशानियाँ तुम पर आ गई हैं। तो इस समय, क्या तुम परमेश्वर पर आशा छोड़ देते हो? इसलिए हर समय तुम्हें जीवन की खोज अवश्य करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। यही सच्चा विश्वास कहलाता है, और यही सबसे सच्चा और सबसे सुंदर प्रकार का प्रेम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर पर विश्वास के लिए उसका आज्ञापालन करना और उसके कार्य का अनुभव करना आवश्यक है। परमेश्वर ने बहुत कार्य किया है—यह कहा जा सकता है कि लोगों के लिए यह सब पूर्ण बनाना, शुद्धिकरण, और इससे भी बढ़कर, ताड़ना है। परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण ऐसा नहीं रहा है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप रहा हो; लोगों ने जिस चीज का आनंद लिया है, वह है परमेश्वर के कठोर वचन। जब परमेश्वर आता है, तो लोगों को उसके प्रताप और उसके कोप का आनंद लेना चाहिए। हालाँकि उसके वचन चाहे कितने ही कठोर क्यों न हों, वह मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए आता है। प्राणियों के रूप में लोगों को वे कर्तव्य पूरे करने चाहिए, जो उनसे अपेक्षित हैं, और शुद्धिकरण के बीच परमेश्वर के लिए गवाह बनना चाहिए। हर परीक्षण में उन्हें उस गवाही पर कायम रहना चाहिए, जो कि उन्हें देनी चाहिए, और परमेश्वर के लिए उन्हें ऐसा ज़बरदस्त तरीके से करना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति विजेता होता है। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हें शुद्ध करे, तुम आत्मविश्वास से भरे रहते हो और परमेश्वर पर से कभी विश्वास नहीं खोते। तुम वह करते हो, जो मनुष्य को करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से इसी की अपेक्षा करता है, और मनुष्य का दिल पूरी तरह से उसकी ओर लौटने तथा हर पल उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होना चाहिए। ऐसा होता है विजेता। जिन लोगों का उल्लेख परमेश्वर "विजेताओं" के रूप में करता है, वे लोग वे होते हैं, जो तब भी गवाह बनने और परमेश्वर के प्रति अपना विश्वास और भक्ति बनाए रखने में सक्षम होते हैं, जब वे शैतान के प्रभाव और उसकी घेरेबंदी में होते हैं, अर्थात् जब वे स्वयं को अंधकार की शक्तियों के बीच पाते हैं। यदि तुम, चाहे कुछ भी हो जाए, फिर भी परमेश्वर के समक्ष पवित्र दिल और उसके लिए अपना वास्तविक प्यार बनाए रखने में सक्षम रहते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और इसी को परमेश्वर "विजेता" होने के रूप में संदर्भित करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के कार्य के हर चरण के लिए एक तरीका है, जिसमें लोगों को सहयोग करना चाहिए। परमेश्वर लोगों को शुद्ध करता है, ताकि शुद्धिकरणों से गुज़रने पर उनमें आत्मविश्वास रहे। परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, ताकि उनमें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का आत्मविश्वास हो और वे उसके शुद्धिकरणों को स्वीकार करने और उसके द्वारा निपटान और काँट-छाँट किए जाने के लिए तैयार हो जाएँ। परमेश्वर का आत्मा लोगों में प्रबुद्धता और रोशनी लाने और उनसे परमेश्वर के साथ सहयोग करवाने और अभ्यास करवाने के लिए उनके भीतर कार्य करता है। शुद्धिकरण के दौरान परमेश्वर बात नहीं करता। वह अपनी वाणी नहीं बोलता, फिर भी, ऐसा कार्य है जिसे लोगों को करना चाहिए। तुम्हें वह बनाए रखना चाहिए जो तुम्हारे पास पहले से है, तुम्हें फिर भी परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के निकट होने, और परमेश्वर के सामने गवाही देने में सक्षम होना चाहिए; इस तरह तुम अपना कर्तव्य पूरा करोगे। तुम सबको परमेश्वर के कार्य से स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि लोगों के आत्मविश्वास और प्यार के उसके परीक्षण यह अपेक्षा करते हैं कि वे परमेश्वर से अधिक प्रार्थना करें, और कि वे परमेश्वर के सामने उसके वचनों का अधिक बार स्वाद लें। यदि परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करता है और तुम्हें अपनी इच्छा समझाता है, लेकिन फिर भी तुम उसे अभ्यास में बिलकुल नहीं लाते, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं करोगे। जब तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाते हो, तब भी तुम्हें उससे प्रार्थना करने में सक्षम होना चाहिए, और जब तुम उसके वचनों का स्वाद लेते हो, तो तुम्हें उसके सामने आना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए तथा हताशा या उदासीनता अनुभव करने के किसी भी चिह्न के बिना उसके प्रति विश्वास से भरे होना चाहिए। जो लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे सभाओं के दौरान तो ऊर्जा से भरे होते हैं, लेकिन घर लौटकर अंधकार में गिर जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो एक साथ इकट्ठे भी नहीं होना चाहते। इसलिए तुम्हें स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि वह कौन-सा कर्तव्य है, जिसे लोगों को पूरा करना चाहिए। हो सकता है कि तुम न जानते हो कि परमेश्वर की इच्छा वास्तव में क्या है, लेकिन तुम अपना कर्तव्य कर सकते हो, जब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए तब तुम प्रार्थना कर सकते हो, जब तुम्हें सत्य को अभ्यास में लाना चाहिए तब तुम उसे अभ्यास में ला सकते हो, और तुम वह कर सकते हो जो लोगों को करना चाहिए। तुम अपनी मूल दृष्टि बनाए रख सकते हो। इस तरह, तुम परमेश्वर के कार्य के अगले चरण को स्वीकार करने में अधिक सक्षम होगे। जब परमेश्वर छिपे तरीके से कार्य करता है, तब यदि तुम तलाश नहीं करते, तो यह एक समस्या है। जब वह सभाओं के दौरान बोलता और उपदेश देता है, तो तुम उत्साह से सुनते हो, लेकिन जब वह नहीं बोलता, तो तुममें ऊर्जा की कमी हो जाती है और तुम पीछे हट जाते हो। ऐसा किस तरह का व्यक्ति करता है? वह ऐसा व्यक्ति होता है, जो सिर्फ झुंड के पीछे चलता है। उसके पास कोई उद्देश्य नहीं होता, कोई गवाही नहीं होती, और कोई दर्शन नहीं होता! ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं। यदि तुम इस तरह से जारी रखते हो, तो एक दिन जब तुम पर कोई महान परीक्षण आएगा, तो तुम्हें सजा भोगनी पड़ जाएगी। परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया में एक दृष्टिकोण का होना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के एक कदम पर भी शक नहीं करते, यदि तुम मनुष्य का कर्तव्य पूरा करते हो, तुम ईमानदारी के साथ उसे बनाए रखते हो जिसका परमेश्वर ने तुमसे अभ्यास करवाया है, अर्थात् तुम्हें परमेश्वर के उपदेश याद हैं, और इस बात की परवाह किए बिना कि वह वर्तमान में क्या करता है, तुम उसके उपदेशों को भूलते नहीं हो, यदि उसके कार्य के बारे में तुम्हें कोई संदेह नहीं है, तुम अपना दृष्टिकोण कायम रखते हो, अपनी गवाही बनाए रखते हो, और मार्ग के हर चरण में विजय प्राप्त करते हो, तो अंत में तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कर दिए जाओगे और एक विजेता बना दिए जाओगे। यदि तुम परमेश्वर के परीक्षणों के हर चरण में दृढ़तापूर्वक खड़े रहने में सक्षम हो, और तुम अभी भी बिलकुल अंत तक दृढ़तापूर्वक खड़े रह सकते हो, तो तुम एक विजेता हो, तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो तुम परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से गिर जाओगे, क्योंकि तुम इस बात से अनजान हो कि परमेश्वर लोगों को पूर्ण कैसे बनाता है, और किन उपायों से वह उन्हें पूर्ण बनाता है, और जब परमेश्वर के परीक्षण तुम्हारे ऊपर आएँगे और वे तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाएँगे, तो तुम अडिग रहने में असमर्थ होगे। परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसका संपूर्ण स्वभाव है, और जब परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव लोगों को दिखाया जाता है, तो यह उनकी देह पर क्या लाता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव लोगों को दिखाया जाता है, तो उनकी देह अपरिहार्य रूप से अत्यधिक पीड़ा भुगतेगी। यदि तुम इस पीड़ा को नहीं भुगतते, तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, न ही तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम अर्पित कर पाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाता है, तो वह तुम्हें निश्चित रूप से अपना संपूर्ण स्वभाव दिखाएगा। सृष्टि की रचना के बाद से आज तक, परमेश्वर ने अपना संपूर्ण स्वभाव मनुष्य को कभी नहीं दिखाया है—किंतु अंत के दिनों के दौरान वह इसे लोगों के इस समूह के लिए प्रकट करता है, जिसे उसने पूर्वनियत किया और चुना है, और लोगों को पूर्ण बनाने के द्वारा वह अपने स्वभाव को प्रकट करता है, जिसके माध्यम से वह लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाता है। लोगों के लिए परमेश्वर का यही सच्चा प्रेम है। परमेश्वर के सच्चे प्रेम को अनुभव करने के लिए लोगों को अत्यधिक पीड़ा सहना और एक ऊँची क़ीमत चुकाना आवश्यक है। केवल इसके बाद ही वे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए जाएँगे और परमेश्वर को अपना सच्चा प्रेम वापस दे पाएँगे और केवल तभी परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होगा। यदि लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और यदि वे उसकी इच्छा पर चलना चाहते हैं, और अपना सच्चा प्रेम पूरी तरह से परमेश्वर को देते हैं, तो उन्हें मृत्यु से भी बदतर कष्ट सहने के लिए अत्यधिक पीड़ा और अपनी परिस्थितियों से कई यंत्रणाओं का अनुभव करना होगा। अंततः उन्हें परमेश्वर को अपना सच्चा हृदय वापस देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर से सचमुच प्रेम करता है या नहीं, यह कठिनाई और शोधन के दौरान प्रकट होता है। परमेश्वर लोगों के प्रेम को शुद्ध करता है, और यह भी केवल कठिनाई और शोधन के बीच ही प्राप्त किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

शुद्धिकरण का काम का उद्देश्य मुख्य रूप से लोगों के विश्वास को पूर्ण बनाना है। अंत में यह हासिल होता है कि तुम छोड़ना तो चाहते हो लेकिन, साथ ही तुम ऐसा कर नहीं पाते हो; कुछ लोग लेश-मात्र आशा से भी वंचित होकर भी अपना विश्वास रखने में समर्थ होते हैं; और लोगों को अपने भविष्य के संबंध में अब और कोई भी आशा नहीं होती। केवल इस समय ही परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का समापन होगा। इंसान अभी भी जीवन और मृत्यु के बीच मँडराने के चरण तक नहीं पहुँचे हैं, उन्होंने मृत्यु को नहीं चखा है, इसलिए शुद्धिकरण की प्रक्रिया ख़त्म नहीं हुई है। यहाँ तक कि जो सेवा करनेवालों के चरण पर थे, उनका भी अतिशय शुद्धिकरण नहीं हुआ। अय्यूब चरम शुद्धिकरण से गुज़रा था और उसके पास भरोसा रहने के लिए कुछ नहीं था। लोगों को भी उस स्थिति तक शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए जहाँ उनके पास कोई उम्मीद नहीं रह जाती है और भरोसा करने के लिए कुछ नहीं होता—केवल यही सच्चा शुद्धिकरण है। सेवा करने वालों के समय के दौरान, अगर तुम्हारा दिल हमेशा परमेश्वर के सामने शांत रहा, इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर ने क्या किया और बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे लिए उसकी इच्छा क्या थी, तुमने हमेशा उसकी व्यवस्थाओं का पालन किया, तब मार्ग के अंत में, तुम परमेश्वर ने जो कुछ किया है वो सब कुछ समझ जाओगे। तुम अय्यूब के परीक्षणों से गुजरते हो और इसी समय तुम पतरस के परीक्षणों से भी गुज़रते हो। जब अय्यूब की परीक्षा ली गई, तो उसने गवाही दी, और अंत में उसके सामने यहोवा प्रकट हुआ था। उसके गवाही देने के बाद ही वह परमेश्वर का चेहरा देखने के योग्य हुआ था। यह क्यों कहा जाता है : "मैं गंद की भूमि से छिपता हूँ, लेकिन खुद को पवित्र राज्य को दिखाता हूँ?" इसका मतलब यह है कि जब तुम पवित्र होते हो और गवाही देते हो केवल तभी तुम परमेश्वर का चेहरा देखने का गौरव प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम उसके लिए गवाह नहीं बन सकते हो, तो तुम्हारे पास उसके चेहरे को देखने का गौरव नहीं है। यदि तुम शुद्धिकरण का सामना करने में पीछे हट जाते हो या परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करते हो, इस प्रकार परमेश्वर के लिए गवाह बनने में विफल हो जाते हो और शैतान की हँसी का पात्र बन जाते हो, तो तुम्हें परमेश्वर का प्रकटन प्राप्त नहीं होगा। यदि तुम अय्यूब की तरह हो, जिसने परीक्षणों के बीच अपनी स्वयं की देह को धिक्कारा था और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं की थी, और अपने शब्दों के माध्यम से, शिकायत या पाप किए बिना अपनी स्वयं की देह का तिरस्कार करने में समर्थ था, तो यह गवाह बनना है। जब तुम किसी निश्चित अंश तक शुद्धिकरणों से गुज़रते हो और फिर भी अय्यूब की तरह हो सकते हो, परमेश्वर के सामने सर्वथा आज्ञाकारी और उससे किसी अन्य अपेक्षा या तुम्हारी धारणाओं के बिना, तब परमेश्वर तुम्हें दिखाई देगा। अभी परमेश्वर तुम्हें दिखाई नहीं देता है क्योंकि तुम्हारी अपनी बहुत-सी धारणाएँ हैं, व्यक्तिगत पूर्वाग्रह, स्वार्थी विचार, व्यक्तिगत अपेक्षाएँ और दैहिक हित हैं, और तुम उसका चेहरा देखने के योग्य नहीं हो। यदि तुम परमेश्वर को देखते, तो तुम उसे अपनी स्वयं की धारणाओं से मापते, ऐसा करते हुए उसे सलीब पर चढ़ा दिया जाता। यदि तुम पर कई चीजें आ पड़ती हैं जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, परन्तु फिर भी तुम उन्हें एक ओर करने और इन चीज़ों से परमेश्वर के कार्यों का ज्ञान पाने में समर्थ हो, और शुद्धिकरण के बीच तुम परमेश्वर के प्रति प्यार से भरा अपना हृदय प्रकट करते हो, तो यह गवाह होना है। यदि तुम्हारा घर शांतिपूर्ण है, तुम देह के आराम का आनंद लेते हो, कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं करता है, और कलीसिया में तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारा आज्ञापालन करते हैं, तो क्या तुम परमेश्वर के लिए प्यार से भरा अपना हृदय प्रदर्शित कर सकते हो? क्या यह परिस्थिति तुम्हारा शुद्धिकरण कर सकती है? यह केवल शुद्धिकरण के माध्यम से है कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्यार दर्शाया जा सकता है, और केवल तुम्हारी धारणाओं के विपरीत घटित होने वाली चीज़ों के माध्यम से ही तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो। कई नकारात्मक और विपरीत चीज़ों की सेवा और शैतान के तमाम प्रकटीकरणों—उसके कामों, आरोपों और उसकी बाधाओं और धोखों के माध्यम से परमेश्वर तुम्हें शैतान का भयानक चेहरा साफ़-साफ़ दिखाता है और इस प्रकार शैतान को पहचानने की तुम्हारी क्षमता को पूर्ण बनाता है, ताकि तुम शैतान से नफ़रत करो और उसे त्याग दो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

तुम सभी परीक्षण और शुद्धिकरण के बीच हो। शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए? शुद्धिकरण का अनुभव करने के बाद लोग परमेश्वर को सच्ची स्तुति अर्पित कर पाते हैं, और शुद्धिकरण के दौरान वे यह देख सकते हैं कि उनमें बहुत कमी है। जितना बड़ा तुम्हारा शुद्धिकरण होता है, उतना ही अधिक तुम देह-सुख त्याग सकते हो; जितना बड़ा लोगों का शुद्धिकरण होता है, उतना ही अधिक परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम होता है। तुम लोगों को यह बात समझनी चाहिए। लोगों का शुद्धिकरण क्यों किया जाना चाहिए? इसका लक्ष्य क्या परिणाम प्राप्त करना है? मनुष्य में परमेश्वर के शुद्धिकरण के कार्य का क्या अर्थ है? यदि तुम सच में परमेश्वर को खोजते हो, तो एक ख़ास बिंदु तक उसके शुद्धिकरण का अनुभव कर लेने पर तुम महसूस करोगे कि यह बहुत अच्छा और अत्यंत आवश्यक है। शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? उसके शुद्धिकरण को स्वीकार करने के लिए उससे प्रेम करने के संकल्प का प्रयोग करके : शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें भीतर से यातना दी जाती है, जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घुमाया जा रहा हो, फिर भी तुम अपने उस हृदय का प्रयोग करके परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो, जो उससे प्रेम करता है, और तुम देह की चिंता करने को तैयार नहीं हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। तुम भीतर से आहत हो, और तुम्हारी पीड़ा एक ख़ास बिंदु तक पहुँच गई है, फिर भी तुम यह कहते हुए परमेश्वर के समक्ष आने और प्रार्थना करने को तैयार हो : "हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। यद्यपि मेरे भीतर अंधकार है, फिर भी मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ; तू मेरे हृदय को जानता है, और मैं चाहता हूँ कि तू अपना और अधिक प्रेम मेरे भीतर निवेश कर।" यह शुद्धिकरण के समय का अभ्यास है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम का नींव के रूप में प्रयोग करो, तो शुद्धिकरण तुम्हें परमेश्वर के और निकट ला सकता है और तुम्हें परमेश्वर के साथ और अधिक घनिष्ठ बना सकता है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना चाहिए। यदि तुम अपने हृदय को परमेश्वर पर चढ़ा दो और उसे उसके सामने रख दो, तो शुद्धिकरण के दौरान तुम्हारे लिए परमेश्वर को नकारना या त्यागना असंभव होगा। इस तरह से परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पहले से अधिक घनिष्ठ और पहले से अधिक सामान्य हो जाएगा, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा समागम पहले से अधिक नियमित हो जाएगा। यदि तुम सदैव ऐसे ही अभ्यास करोगे, तो तुम परमेश्वर के प्रकाश में और अधिक समय बिताओगे, और उसके वचनों के मार्गदर्शन में और अधिक समय व्यतीत करोगे, तुम्हारे स्वभाव में भी अधिक से अधिक बदलाव आएँगे, और तुम्हारा ज्ञान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा। जब वह दिन आएगा, जब परमेश्वर के परीक्षण अचानक तुम पर आ पड़ेंगे, तो तुम न केवल परमेश्वर की ओर खड़े रह पाओगे, बल्कि परमेश्वर की गवाही भी दे पाओगे। उस समय तुम अय्यूब और पतरस के समान होगे। परमेश्वर की गवाही देकर तुम सच में उससे प्रेम करोगे, और ख़ुशी-ख़ुशी उसके लिए अपना जीवन बलिदान कर दोगे; तुम परमेश्वर के गवाह होगे, और परमेश्वर के प्रिय व्यक्ति होगे। वह प्रेम, जिसने शुद्धिकरण का अनुभव किया हो, मज़बूत होता है, कमज़ोर नहीं। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कब और कैसे तुम्हें अपने परीक्षणों का भागी बनाता है, तुम इस बात की चिंता नहीं करोगे कि तुम जीओगे या मरोगे, तुम ख़ुशी-ख़ुशी परमेश्वर के लिए सब-कुछ त्याग दोगे, और परमेश्वर के लिए कोई भी बात ख़ुशी-ख़ुशी सहन कर लोगे—इस प्रकार तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा, और तुम्हारा विश्वास वास्तविक होगा। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे, जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा प्रेम किया जाता है, और जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

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