133. जो भाई-बहन विश्वास में नए हैं, उनके साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) नव आगंतुकों का दूरदर्शिता के सत्य के साथ सींचन किया जाना चाहिए, उनकी सभी धारणाओं और कल्पनाओं को हल करते हुए, ताकि वे जल्द से जल्द सही मार्ग पर दृढ़ता से कदम स्थापित कर सकें;

(2) नव आगंतुकों से बहुत ज्यादा अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उनकी धारणाओं और कठिनाइयों को सत्य पर सहभागिता के माध्यम से फुर्ती से और धैर्यपूर्वक हल करना होगा;

(3) दूसरों को नियंत्रित करने के लिए नियमों का उपयोग नहीं करना चाहिए। सभी लोगों को उनकी वास्तविक स्थितियों के आधार पर सत्य के साथ सींचित किया जाना चाहिए, और असंभव की कोशिश नहीं करनी चाहिए, दूसरों से वे माँगें नहीं करनी चाहिए जिन्हें वे पूरी नहीं कर सकते हैं;

(4) विश्वास में नव-आगंतुकों के साथ अपने व्यवहार में समझदार बनो। जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं उन हीन मानवता वालों के खिलाफ़ सावधानी बरतनी चाहिए, और किसी से व्यक्तिगत या कलीसिया की जानकारी उजागर नहीं करनी चाहिए।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

नए विश्वासियों का सिंचन करना परमेश्वर के घर का सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण कार्य है, ताकि वे तुरंत सच्चे मार्ग पर चलने की एक मजबूत नींव बना सकें और अपनी आस्था में सही मार्ग पर प्रवेश कर सकें। जिन सत्यों के साथ नए विश्वासियों का सिंचन किया जाना चाहिए उनमें शामिल हैं: परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का सत्य; परमेश्वर के देहधारण का सत्य; परमेश्वर के नामों का सत्य; परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के काम के बीच अंतर का सत्य; झूठे मसीहों के बीच सच्चे मसीह को पहचानने का सत्य; पवित्र आत्मा के कार्य को जानने और दुष्ट आत्माओं के काम को पहचानने का सत्य; परमेश्वर के वचनों को वास्तविक जीवन में अपनाने का सत्य; और एक ईमानदार व्यक्ति बनने का सत्य आदि। जिन लोगों ने हाल ही में परमेश्वर के कार्य के सत्य को स्वीकार किया है उन सभी के दिलों में इन सत्यों का गहराई से सिंचन करना ज़रूरी है ताकि वे अच्छी नींव स्थापित कर सकें। इससे यह सुनिश्चित हो सकता है कि वे सच्चे मार्ग पर अटल रहने में सक्षम होंगे और दुष्ट शैतान की कितनी भी मुश्किलों का सामना करने के बावजूद परमेश्वर को धोखा नहीं देंगे या उसे अस्वीकार नहीं करेंगे। जब किसी व्यक्ति का कार्य इस नतीजे पर पहुंचता है सिर्फ़ तभी वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार उसकी सेवा करता है और वास्तव में परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है।

—'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

हमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि जब हम अविश्वासियों में से आये नए लोगों का सिंचन करते हैं, तो हमें स्नेह और संयम से काम लेना चाहिए; हमें उनसे बहुत ऊँची अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए या उनके साथ कांट-छांट करना और निपटना नहीं चाहिए। सख्त अपेक्षाएं रखने या उनके साथ कांट-छांट करने और निपटने से पहले, हमें तब तक इंतज़ार करना चाहिए जब तक वे कुछ सत्य को नहीं समझ जाते और एक अच्छी नींव नहीं बना लेते। अविश्वासियों में से आये किसी नए व्यक्ति ने चाहे कितने ही महीनों तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, अगर उसके पास अच्छी काबिलियत है और उसे सत्य को जानने की कुछ लालसा है, तो उसे पढ़ने के लिए किताबें जारी की जानी चाहिए, जबकि जिन लोगों ने कम से कम छह महीनों तक परमेश्वर में विश्वास किया है उन्हें अनुभव आधारित गवाहियों की सभी किताबें जारी की जानी चाहिए। अविश्वासियों में से आये नए लोगों का सिंचन और देखभाल करते समय, आधे-अधूरे मन से काम नहीं किया जाना चाहिए। वास्तव में वे उन लोगों से ज़्यादा अलग नहीं हैं जिन्हें दूसरे संप्रदायों से मना कर लाया गया है; उनकी इंसानियत भी एक समान है, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि उनके पास बाइबल का ज्ञान नहीं है और यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। उनके ख़िलाफ़ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए या उन्हें बहुत अज्ञानी नहीं माना जाना चाहिए; एक साल तक विश्वास करने के बाद, वे ज़्यादा पिछड़े हुए नहीं नज़र आएंगे। हालांकि, अगर सही समय पर उनका सिंचन नहीं किया जा सकता है, तो कुछ जिंदगियां बर्बाद हो जाएंगी। यही कारण है कि इस समय का उपयोग अविश्वासियों में से आये हर एक नए व्यक्ति का ईमानदारी से सिंचन और पोषण करने में किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम और परमेश्वर के घर के सौहार्द का एहसास कराया जा सके और इससे भी अधिक, उन्हें यह एहसास हो सके कि परमेश्वर सच्चा और विश्वसनीय है। यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। दूसरे संप्रदायों से मना कर लाये गए लोगों की तुलना में, अविश्वासियों में से आये वे लोग जो सही मार्ग को स्वीकार करते हैं, अधिक शुद्ध हैं और वे नई चीज़ों को आसानी से स्वीकार कर सकते हैं। हालांकि, उन्हें कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों से संबंधित कोई भी बात अभी बिल्कुल नहीं बतायी जानी चाहिए। उनके साथ बुद्धिमानी से पेश आना चाहिए और उन्हें परमेश्वर के घर के नियमों के बारे में ज़्यादा बताया जाना चाहिए। उन्हें एकदम से सभा के लिए किसी छोटे समूह में शामिल होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए या कलीसिया के मामलों के बारे में नहीं पूछा जाना चाहिए; इसके अलावा, हमें ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए जो संदिग्ध दिखते हैं और जिनके बारे में ज़्यादा जानकारी मौजूद नहीं है। ये ऐसे सिद्धांत हैं जिन्हें नए लोगों के सिंचन और अगुआई के लिए जानना ज़रूरी है।

अविश्वासियों में से आये नए लोगों के मामले में, हमें सभाओं में अनिवार्य साप्ताहिक उपस्थिति का नियम नहीं बनाना चाहिए। सभाएं उनकी वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर तय की जानी चाहिए और बहुत ज़्यादा या बहुत कम सभाएं आयोजित नहीं की जानी चाहिए; सभाओं की संख्या बहुमत के आधार पर तय की जा सकती है। नए लोगों के साथ बैठकों में, हमें परमेश्वर के वचनों को पढ़ना चाहिए, उन्हें भजन और नृत्य सिखाना चाहिए, प्रार्थना करना सिखाना चाहिए, ताकि वे सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर सकें। इस तरीके से, कई महीनों तक विश्वास करने के बाद, वे कर्तव्य निर्वहन में सक्षम होंगे। उनके साथ खास तौर पर स्नेह और संयम से काम लो, उनका सही तरीके से सिंचन और पोषण करो। किसी भी परिस्थिति में उनकी सकारात्मकता को कमज़ोर मत करो या उनके उत्साह को कम मत करो। हम सब भी कभी अविश्वासी थे; फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि हमने उनसे पहले परमेश्वर में विश्वास किया है। इस कारण से, हमारा इन नए लोगों को नीची नज़र से देखना गलत होगा। परमेश्वर की नज़रों में, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि किसने पहले विश्वास किया और किसने बाद में विश्वास किया। जिसने भी सत्य को हासिल किया है उसके पास अच्छी आस्था है। अगर वे सत्य का अनुसरण करने के लिए तैयार हैं, तो कुछ सालों तक विश्वास रखने के बाद वे भी हमारे जैसे ही होंगे।

—'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

व्यवहार में बुद्धिमत्ता का होना। कुछ लोग कहते हैं: "क्या भाइयों और बहनों के साथ मेल-जोल के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है?" हाँ, होती है, क्योंकि बुद्धि का उपयोग करना तुम्हारे भाइयों और बहनों के लिए और भी अधिक लाभदायक होता है। कुछ लोग पूछेंगेः "क्या भाइयों और बहनों के साथ बुद्धि का उपयोग करना चालाक होना नहीं है?" बुद्धिमानी चालाकी नहीं है, बल्कि, यह चालाकी के ठीक विपरीत है। बुद्धि का उपयोग करने का अर्थ है तब भाइयों और बहनों से बातचीत करने के अपने तरीके पर ध्यान देना जब उनकी कद-काठी छोटी हो, ऐसा न हो कि तुम जो कहते हो वे उसे स्वीकार करने में असमर्थ हों। साथ ही, छोटी कद-काठी वालोंके लिए, खासकर जिनके पास सत्य नहीं करते हैऔर जो कुछ भ्रष्टता को प्रकट करते हैं और जिनके कुछ भ्रष्ट स्वभाव हैं, यदि तुम बहुत ही साधारण और निष्कपट हो और उन्हें सब कुछ बता देते हो, तो तुम्हारे विरुद्ध बातें खोजना या तुम्हारा फायदा उठाना उनके लिए आसान हो सकता है। इसलिए बोलते समय तुम्हें कमोबेश सावधानियाँ अवश्य रखनी चाहिए और तुम्हारे पास कुछ तकनीकें अवश्य होनी चाहिए। हालाँकि, लोगों के प्रति सचेत रहने का अर्थ उनकी सहायता नहीं करना या उनके प्रति प्रेम नहीं होना नहीं है, इसका सिर्फ इतना ही अर्थ है कि उन्हें तुरंत परमेश्वर के घर के बारे में कुछ आवश्यक बातों को नहीं बताना है, और उनके साथ बस सत्य संवादित करना है। यदि उन्हें जीवन में आध्यात्मिक सहायता की ज़रूरत है, अगर उन्हें सत्य के पोषण की आवश्यकता होती है, तो हमें इस संबंध में उन्हें संतुष्ट करने के लिए अपनी क्षमता के अंतर्गत सब कुछ करना है। किन्तु यदि वे परमेश्वर के घर के बारे में इधर-उधर की पूछताछ कर रहे हैं, या अगुवों और कार्यकर्ताओं के बारे में इधर-उधर की पूछताछ कर रहे हैं, तो उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम उन्हें बताते हो, तो वे इस जानकारी को गलत हाथों में दे सकते हैं और इससे परमेश्वर के घर का कार्य प्रभावित होगा। दूसरे शब्दों में, यदि यह कुछ ऐसा है जो उन्हें नहीं जानना चाहिए या कुछ ऐसा है जिसके बारे में उन्हें जानने की आवश्यकता नहीं है, तो उन्हें इसके बारे में कुछ भी मत जानने दो। यदि यह कुछ ऐसा है जो उन्हें जानना चाहिए, तो इसके बारे में उन्हें, वस्तुतः और बिना रोक के, बताने के लिए तुम वह सब करो जो तुम कर सकते हो। तो वे कौन सी बातें हैं जो उन्हें जाननी चाहिए? लोगों को सत्य के अनुसरण को जानना चाहिए: किन सत्यों से उन्हें सुसज्जित होना चाहिए, सत्य के किन पहलुओं को उन्हें समझना चाहिए, कौन से कर्तव्य उन्हें पूरे करने चाहिए, कौन से कर्तव्य पूरा करना उनके लिए उचित होगा, उन्हें उन कर्तव्यों को किस प्रकार से पूरा करना चाहिए, उचितमानवता को कैसे जीना है, कलीसिया का जीवन किस प्रकार से जीना है—इन सभी बातों को लोगों को जानना चाहिए। दूसरी ओर, परमेश्वर के घर के नियम और सिद्धांत, कलीसिया के कार्य, और तुम्हारे भाइयों और बहनों की स्थितियों को बाहरी लोगों या तुम्हारे परिवार के गैर-विश्वासियों के लिए प्रकट नहीं किया जा सकता है। यही वह सिद्धांत है जिसे हमें तब अवश्य पालन करना चाहिए जब हम बुद्धि का उपयोग करते हैं। उदारहण के लिए, तुम्हें अपने अगुवों के नाम और पते के बारे में कभी बात नहीं करनी चाहिए। यदि तुम इन चीजों के बारे में बात करते हो, तो तुम्हें नहीं पता कि कब ये जानकारियाँ अविश्वासियों के कानों में पड़ जाएंगी, और चीजें तब एक बड़ी समस्या बन जाती हैं यदि ये बातें तब कुछ दुष्ट जासूसों या गुप्त एजेंटों तक पहुँच जाती हैं। इन सबके के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है, यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि बुद्धि का होना अत्यंत आवश्यक है। इसके अलावा, जब तुम साधारण और निष्कपट होते हो, तो कुछ व्यक्तिगत बातें ऐसी हैं जिन्हें तुम किसी को भी यूँ ही नहीं बता सकते। यह देखने के लिए तुम्हें अपने भाई और बहनों की कद-काठी का आँकलन करना होगा कि क्या, तुम्हारे उन्हें बताने के बाद तुम जो कहते हो वे उसके बारे में बुरा कह सकते हैं और मज़ाक बना सकते हैं, तुम्हारी बातों के फैल जाने के बाद तुम्हारे लिए समस्या खड़ी कर सकते हैं जो तुम्हारी ईमानदारी को नुकसान पहुंचा सकती है। इसी लिए साधारण और निष्कपट होने के लिए भी बुद्धि की आवश्यकता है।

—'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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