135. विभिन्न तरह के दंभी स्वभाव वाले लोगों के साथ व्यवहार के सिद्धांत

(1) जब तक दंभी लोग जो बुरे नहीं हैं, वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करें, तब तक, उनके दंभी स्वभावों के बावजूद, उनकी प्रेम से सहायता की जानी चाहिए। उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर लाना चाहिए।

(2) जो स्वभाव से दंभी होते हैं, लेकिन सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, और साथ ही अच्छी योग्यता और प्रतिभा वाले होते हैं, वे पदोन्नत और विकसित किए जाने चाहिए। उन्हें कभी भी बहिष्कृत नहीं करना चाहिए।

(3) उन्मादी लोगों को जो मसीह-विरोधियों में गिने जाते हैं, जो अत्यंत दंभी होते हैं और जिनके पास जरा-सी भी समझदारी नहीं होती है, और जो अपनी महत्वाकांक्षाओं में जोशीले और अपने कुकर्मों में बहुमुखी होते हैं, उन्हें अवश्य निष्कासित किया जाना चाहिए।

(4) भटके हुए दंभी लोग, जो अत्यंत बेतुके होते हैं, और जो भ्रांतियों पर सख्ती से जोर देते हैं, सत्य का विरोध करते हैं, और किसी की नहीं सुनते हैं, उन्हें परिष्कृत या निष्कासित किया जाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

शैतान ने जब मनुष्यों को भ्रष्ट कर दिया, तो उनकी प्रकृति शैतानी हो गई। मनुष्य होते हुए भी लोगों ने मनुष्य की तरह बर्ताव करना बंद कर दिया है; बल्कि, वे मानवता के ओहदे को पार कर गए हैं। वे इंसान होने की इच्छा नहीं रखते; वे अब और ऊँचे स्तर की आकांक्षा करते हैं। और यह ऊँचा स्तर क्या है? वे परमेश्वर से बढ़कर होना चाहते हैं, स्वर्ग से बढ़कर होना चाहते हैं, और बाकी सभी से बढ़कर होना चाहते हैं। लोग इस तरह क्यों हो गए हैं, इसका मूल कारण क्या है? कुल मिलाकर यही नतीजा निकलता है कि मनुष्य की प्रकृति बहुत अधिक अहंकारी है। "अहंकारी" एक अपमानजनक शब्द है, और कोई भी इसे अपने साथ जोड़ा जाना पसंद नहीं करता। पर तथ्य यह है कि हर कोई अहंकारी है, और सभी भ्रष्ट मनुष्यों का यही सार है। कुछ लोग कहते हैं, "मैं जरा भी अहंकारी नहीं हूँ। मैंने कभी भी महादूत नहीं बनना चाहा, न ही मैंने कभी परमेश्वर से या दूसरों से ऊंचा उठना चाहा है। मैं हमेशा एक ऐसा व्यक्ति रहा हूँ जो शिष्ट और कर्तव्यनिष्ठ है।" कोई जरूरी नहीं है; ये शब्द गलत हैं। जब लोगों की प्रकृति और सार अहंकारी हो जाते हैं, तो वे ऐसी चीजें करने के काबिल हो जाते हैं जो परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करती हैं, उसके वचनों को ध्यान में रखे बिना चीजें करते हैं, ऐसी चीजें करते हैँ जो परमेश्वर के बारे में धारणाएं उत्पन्न करती हैं, जो उसका विरोध करती हैं, और जो उस व्यक्ति का उत्कर्ष करती हैं और उस व्यक्ति की गवाही देती हैं। तुम्हारा कहना है कि तुम अहंकारी नहीं हो, लेकिन मान लो कि तुम्हें कई कलीसियाओं को चलाने और उनकी अगुआई करने की ज़िम्मेदारी दी जाती है; मान लो कि मैं तुम्हारे साथ नहीं निपटता हूँ, और परमेश्वर के परिवार के किसी सदस्य ने तुम्हारी कांट-छांट नहीं की : थोड़ी देर उनका नेतृत्व करने के बाद, तुम उन्हें अपने पैरों पर गिरा लोगे और अपने सामने समर्पण करवाने लगोगे। और तुम ऐसा क्यों करोगे? यह तुम्हारी प्रकृति द्वारा निर्धारित होगा; यह स्वाभाविक प्रकटीकरण के अलावा और कुछ नहीं होगा। इसे सीखने के लिए तुम्हें दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, और न ही दूसरों से यह कहने की ज़रूरत है कि वे तुम्हें सिखाएं। तुम्हें इनमें से कुछ भी जानबूझकर करने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह की स्थिति स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने आएगी : तुम लोगों से अपने सामने समर्पण करवाओगे, उनसे अपनी आराधना करवाओगे, अपनी प्रशंसा करवाओगे, अपनी गवाही दिलवाओगे, उनसे अपनी सभी बातें मनवाओगे, और उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र से दूर नहीं जाने दोगे। तुम्हारे नेतृत्व में, ऐसी स्थितियाँ स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं। और ये हालात कैसे आते हैं? ये मनुष्य की अहंकारी प्रकृति से निर्धारित होते हैं। अहंकार की अभिव्यक्ति परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका विरोध है। जब लोग अहंकारी, दंभी और आत्मतुष्ट होते हैं, तो उनकी अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने और इच्छानुसार चीज़ों को करने की प्रवृत्ति होती है। वे दूसरों को भी अपनी ओर खींचकर उन्हें अपने आलिंगन में ले लेते हैं। लोगों का ऐसी हरकतें करने का अर्थ है कि उनके अहंकार का सार महादूत जैसा ही बन गया है। जब उनका अहंकार और दंभ एक निश्चित स्तर पर पहुँच जाता है, तो इससे यह तय हो जाता है कि वे महादूत हैं और वे परमेश्वर को दरकिनार कर देंगे। यदि तुम्हारा स्वभाव ऐसा ही अहंकारी है, तो तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अहंकारी स्वभाव ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध की जड़ है' से उद्धृत

अहंकार मनुष्‍य के भ्रष्‍ट स्‍वभाव की जड़ है। लोग जितने ही ज्‍़यादा अहंकारी होते हैं, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि वे परमेश्‍वर का प्रतिरोध करेंगे। यह समस्‍या कितनी गम्‍भीर है? अहंकारी स्‍वभाव के लोग न केवल बाकी सभी को अपने से नीचा मानते हैं, बल्कि, सबसे बुरा यह है कि वे परमेश्‍वर को भी हेय दृष्टि से देखते हैं। भले ही कुछ लोग, बाहरी तौर पर, परमेश्‍वर में विश्‍वास करते और उसका अनुसरण करते दिखायी दें, तब भी वे उसे परमेश्‍वर क़तई नहीं मानते। उन्‍हें हमेशा लगता है कि उनके पास सत्‍य है और वे अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचते हैं। यही अहंकारी स्वभाव का सार और जड़ है और इसका स्रोत शैतान में है। इसलिए, अहंकार की समस्‍या का समाधान अनिवार्य है। यह भावना कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ—एक तुच्‍छ मसला है। महत्‍वपूर्ण बात यह है कि एक व्‍यक्ति का अहंकारी स्‍वभाव उसको परमेश्‍वर के प्रति, उसके विधान और उसकी व्‍यवस्‍था के प्रति समर्पण करने से रोकता है; इस तरह का व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर सत्‍ता स्‍थापित करने की ख़ातिर परमेश्‍वर से होड़ करने की ओर प्रवृत्‍त होता है। इस तरह का व्‍यक्ति परमेश्‍वर में तनिक भी श्रद्धा नहीं रखता, परमेश्‍वर से प्रेम करना या उसके प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है। जो लोग अहंकारी और दंभी होते हैं, खास तौर से वे, जो इतने घमंडी होते हैं कि अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं, वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसके प्रति समर्पित नहीं हो पाते, यहाँ तक कि बढ़-बढ़कर खुद के लिए गवाही देते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं। यदि लोग परमेश्वर का आदर करने की स्थिति में पहुँचना चाहते हैं, तो पहले उन्हें अपने अहंकारी स्वभावों का समाधान करना होगा। जितना अधिक तुम अपने अहंकारी स्वभाव का समाधान करोगे, उतना अधिक आदर तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए होगा, और केवल तभी तुम उसके प्रति समर्पित हो सकते हो, सत्य को प्राप्त कर सकते हो और उसे जान सकते हो।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं कि उनका स्वभाव भ्रष्ट नहीं है, कि वे अभिमानी नहीं हैं। ये कौन-से लोग हैं? वे सबसे अहंकारी लोग हैं। वास्तव में, वे किसी से भी अधिक अभिमानी और विद्रोही हैं; जो व्यक्ति जितना अधिक यह कहता है कि वह भ्रष्ट नहीं है, वह उतना ही अधिक अभिमानी और आत्म-संतुष्ट होता है। दूसरे लोग खुद को क्यों जान पाते हैं और अपनी स्थिति का अनुमान लगा पाते हैं, और तुम क्यों ऐसा नहीं कर पाते? क्या तुम कोई अपवाद हो? कोई संत हो? क्या तुम शून्य में रहते हो? तुम यह स्वीकार नहीं करते कि मानवजाति को शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है, कि लोगों का स्वभाव भ्रष्ट है, और इसलिए तुम सबसे अधिक विद्रोही और अभिमानी हो। तुम्हारे अनुसार दुनिया में बहुत सारे लोग अच्छे हैं—तो यह दुनिया अंधकार से क्यों भरी है, गंदगी और भ्रष्टाचार से क्यों भरी है, संघर्ष से क्यों भरी है? मनुष्य की दुनिया में हर कोई एक-दूसरे से छीना-झपटी क्यों करता है? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले भी कुछ अलग नहीं हैं : वे भी हमेशा एक-दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करते रहते हैं। और इस कलह का जन्म कहाँ से होता है? अहंकार से। संक्षेप में, यह अहंकार से अविभाज्य है, जो मनुष्य के भ्रष्टाचार का सार है; यह मनुष्य की प्रकृति के अहंकार और विद्रोहशीलता का उद्गार है। ऐसा क्यों होता है कि लोग परमेश्वर में विश्वास तो रखते हैं, फिर भी सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं? ऐसा क्यों होता है कि वे परमेश्वर में विश्वास तो रखते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के साथ तालमेल नहीं रख पाते? यह भी लोगों की अहंकारी प्रकृति से ही निर्धारित होता है। मानवजाति हमेशा से ही परमेश्वर का प्रतिरोध और उससे विद्रोह करती रही है, और यह कोई परमेश्वर के अन्याय के कारण नहीं है, यह इसलिए नहीं है कि परमेश्वर में सत्य की कमी है, बल्कि इसलिए है कि मनुष्य को शैतान द्वारा बहुत अधिक भ्रष्ट कर दिया गया है, और मनुष्य बहुत अहंकारी है, उसे बहुत कम समझ है, वह सत्य को बिलकुल स्वीकार नहीं करता, और इसीलिए मनुष्य कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं हो सकता, वह हमेशा परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा होता है, और परमेश्वर से असहमत होता है। मनुष्य और परमेश्वर का संबंध अब किस मुकाम पर आ पहुँचा है? मनुष्य परमेश्वर का शत्रु बन गया है, परमेश्वर का विरोधी बन गया है। परमेश्वर मनुष्य को बचाने और उजागर करने के लिए सत्य व्यक्त करता है, लेकिन मनुष्य उसे स्वीकार नहीं करता और उस पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर मनुष्य से जो करने को कहता है, वह मनुष्य नहीं करता; बल्कि मनुष्य वह करता है, जो परमेश्वर को वीभत्स और घृणित लगता है। परमेश्वर सत्य है, फिर मनुष्य उसे अस्वीकार करता है। परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है, फिर भी मनुष्य उसे पहचान नहीं पाता। इंसान कितना अहंकारी है? पहले ऐसे लोग थे, जो कहते रहते थे कि वे राजा की तरह राज करेंगे। यह अहंकार का लक्षण है, यह मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव है। परमेश्वर ने मनुष्य को बचाने के लिए देहधारण किया, लेकिन परमेश्वर की अगवानी करने के बदले में लोग उससे जीने के लिए खर्च, पुरस्कार, आशीर्वाद माँगने लगे, यहाँ तक कि वे उसकी अगवानी करने के बारे में डींगें मारने लगे और कहने लगे कि वे तो परमेश्वर के प्रिय हैं, ताकि लोग उन्हें आदर से देखें। कुछ लोग तो स्पष्ट रूप से इस बात को जानते थे कि उन्होंने परमेश्वर की अगवानी की है, फिर भी उन्होंने बदले में कलीसियाओं से पैसे माँगे। ये अभिमानी लोग कहते हैं कि उनका स्वभाव भ्रष्ट नहीं है, और कि उनका विश्वास अन्य लोगों से श्रेष्ठतर है, कि परमेश्वर के प्रति उनका समर्पण दूसरों से अधिक है और वे दूसरों से बेहतर कार्य करते हैं। क्या तुम वास्तव में इतना अच्छा कार्य करते हो? यदि तुम वास्तव में अच्छे हो, तो फिर अहंकार से भरे कार्य क्यों करते हो? तुम मानवोचित कार्य करने में सक्षम क्यों नहीं हो? तुम्हारे अंदर थोड़ी-सी भी इंसानियत क्यों नहीं है? लोगों में इस हद तक अहंकार है कि उन्हें सब-कुछ चाहिए, लेकिन उन्हें परमेश्वर नहीं चाहिए, वे हर नीच और घृणित काम करेंगे, लेकिन वे परमेश्वर की आराधना और आज्ञापालन नहीं करेंगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अहंकारी स्वभाव ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध की जड़ है' से उद्धृत

क्या बहुत से लोग इसलिए परमेश्वर का विरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में इसलिए बाधा नहीं डालते क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल चुटकीभर ज्ञान और सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिससे वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इस प्रकार के लोगों का अनुभव केवल सतही होता है, किंतु वे घमंडी और आसक्त प्रकृति के होते हैं और वे पवित्र आत्मा के कार्य को अवमानना से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्यों की "पुष्टि" करने के लिए अपने पुराने तुच्छ तर्कों का उपयोग करते हैं। वे दिखावा भी करते हैं, और अपनी शिक्षा और पांडित्य को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और उन्हें यह भी भरोसा रहता है कि वे संसार भर में यात्रा करने में सक्षम हैं। क्या ये ऐसे लोग नहीं हैं जो पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिए गए हैं और क्या ये नए युग के द्वारा हटा नहीं दिए जाएँगे? क्या ये वही अज्ञानी और अल्पसूचित घृणित लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुलेआम उसका विरोध करते हैं, जो केवल यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कितने मेधावी हैं? बाइबल के अल्प ज्ञान के साथ, वे संसार के "शैक्षणिक समुदाय" में निरंकुश आचरण करने की कोशिश करते हैं, और केवल एक सतही सिद्धांत के साथ लोगों को सिखाते हुए, वे पवित्र आत्मा के कार्य को पलटने का प्रयत्न करते हैं, और इसे अपने खुद के विचारों की प्रक्रिया के इर्दगिर्द घुमाने का प्रयास करते हैं। अपनी अदूरदर्शिता के कारण वे एक ही झलक में परमेश्वर के 6,000 सालों के कार्यों को देखने की कोशिश करते हैं। इन लोगों के पास समझ नाम की कोई चीज ही नहीं है! वास्तव में, परमेश्वर के बारे में लोगों को जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य का आकलन करने में उतने ही धीमे होते हैं। इसके अलावा, वे परमेश्वर के आज के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बहुत कम बात करते हैं, लेकिन वे अपने निर्णय में जल्दबाज़ी नहीं करते हैं। लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, वे उतने ही अधिक घमंडी और अति आत्मविश्वासी होते हैं और उतनी ही अधिक बेहूदगी से परमेश्वर के अस्तित्व की घोषणा करते हैं—फिर भी वे केवल सिद्धांत की बात ही करते हैं और कोई भी वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। इस प्रकार के लोगों का कोई मूल्य नहीं होता है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल की तरह देखते हैं वे ओछे लोग होते हैं! जो लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना करते समय सचेत नहीं रहते हैं, जो अपना मुँह चलाते रहते हैं, जो मीन-नेख निकालते रहते हैं, जो पवित्र आत्मा के धार्मिक कार्यों को नकारने के अपने मिजाज पर लगाम नहीं लगाते हैं, और जो उसका अपमान और ईशनिंदा भी करते हैं—क्या इस प्रकार के अशिष्ट लोग पवित्र आत्मा के कार्य से अनभिज्ञ नहीं हैं? इसके अलावा, क्या वे अत्यंत अहंकारी, अंतर्निहित रूप से घमंडी और दुर्दमनीय लोग नहीं हैं? कोई ऐसा दिन आ भी जाए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार कर लें, तो भी परमेश्वर उन्हें सहन नहीं करेगा। न केवल वे उन्हें तुच्छ समझते हैं जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, बल्कि वे स्वयं भी परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिंदा करते हैं, इस प्रकार के आततायी लोग, न तो इस युग में और न ही आने वाले युग में क्षमा किए जाएँगे, और वे हमेशा के लिए नरक में सड़ेंगे! इस प्रकार के अशिष्ट, आसक्त लोग परमेश्वर में भरोसा करने का दिखावा करते हैं और लोग जितने अधिक इस तरह के होते हैं, उतनी ही अधिक उनकी परमेश्वर के प्रशासकीय आदेशों का उल्लंघन करने की संभावना रहती है। क्या वे सभी अहंकारी लोग, जो स्वाभाविक रूप से उच्छृंखल हैं, और जिन्होंने कभी भी किसी का भी आज्ञापालन नहीं किया है, इसी मार्ग पर नहीं चलते हैं? क्या वे दिन प्रतिदिन परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं, वह परमेश्वर जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध इसलिए करते हो, या आज के कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणाओं का इसलिए उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति लापरवाही बरतते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणाओं और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि इसलिए है कि तुम लोग प्राकृतिक रूप से अत्यंत अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह भी नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्यों के सही और गलत होने के बारे में बताते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। यहाँ तक कि वे उन प्रेरितों को भी व्याख्यान देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और बेमतलब बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही निम्न है, और उनमें बिल्कुल भी समझ नहीं होती है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाएँगे, और नरक की आग द्वारा भस्म कर दिए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के अविवेकी लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान ही परमेश्वर को जान पाता है; न कि अपनी सनक में उसकी आलोचना करने के द्वारा मनुष्य पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के माध्यम से परमेश्वर को जान पाया है। परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान जितना अधिक सही होता जाता है, उतना ही कम वे उसका विरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्वर का विरोध करने की संभावना रहती है। तुम लोगों की धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति, और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह पूँजी है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, और जितना अधिक तुम्हारी नैतिकता जितनी भ्रष्ट होगी, तुम्हारे गुण जितने तुच्छ और तुम्हारी मानवता जितनी निम्न होगी, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग प्रबल धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे देहधारी परमेश्वर के प्रति और भी अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं; इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और कार्यों में विश्वास रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें उसका आज्ञापालन करना चाहिए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो यह मायने नहीं रखता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी न तो कभी उसका आज्ञापालन किया है, न ही उसके वचनों की समग्रता को स्वीकार किया है, बल्कि तुमने परमेश्वर को अपने आगे समर्पण करने और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सबसे अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और गैर-विश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन कैसे कर सकता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही वे लोग होते हैं जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना और उसका विरोध करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के शत्रु और मसीह विरोधी हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं, ऐसे व्यक्ति में कभी भी समर्पण का कोई भाव नहीं होता, न ही उसने कभी खुशी से समर्पण किया होता है या दीनता का भाव दिखाया है। ऐसे लोग दूसरों के सामने अपने आपको ऊँचा उठाते हैं और कभी किसी के आगे नहीं झुकते। परमेश्वर के सामने, ये लोग वचनों का उपदेश देने में स्वयं को सबसे ज़्यादा निपुण समझते हैं और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझते हैं। इनके कब्ज़े में जो "खज़ाना" होता है, ये लोग उसे कभी नहीं छोड़ते, दूसरों को इसके बारे में उपदेश देने के लिए, अपने परिवार की पूजे जाने योग्य विरासत समझते हैं, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए इनका उपयोग करते हैं जो उनकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में इस तरह के कुछ ऐसे लोग हैं। ये कहा जा सकता है कि वे "अदम्य नायक" हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल-दर-साल और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे अपने "पवित्र और अलंघनीय" कर्तव्य को पूरी प्रबलता से लागू करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाता। वे परमेश्वर के घर में "राजा" बनकर युगों-युगों तक बेकाबू होकर दूसरों पर अत्याचार करते चले आ रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करने और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीती-जागती दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने कैसे अस्तित्व में बने रहने दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा आज्ञापालन करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते, फिर इन आततायियों की तो बात ही क्या है जिनके हृदय में थोड़ी-सी भी आज्ञाकारिता नहीं है! इंसान परमेश्वर के कार्य को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता। इंसान अपनी सारी ताक़त लगाकर भी थोड़ा-बहुत ही पा सकता है जिससे वो आखिरकार पूर्ण बनाया जा सके। फिर प्रधानदूत की संतानों का क्या, जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगी रहती हैं? क्या परमेश्वर द्वारा उन्हें ग्रहण करने की आशा और भी कम नहीं है? विजय-कार्य करने का मेरा उद्देश्य केवल विजय के वास्ते विजय प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य धार्मिकता और अधार्मिकता को प्रकट करना, मनुष्य के दण्ड के लिए प्रमाण प्राप्त करना, दुष्ट को दंडित करना, और उन लोगों को पूर्ण बनाना है जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं। अंत में, सभी को उनके प्रकार के अनुसार पृथक किया जाएगा, और जिन लोगों के सोच-विचार से भरे होते आज्ञाकारिता हैं, अंतत: उन्हें ही पूर्ण बनाया जाएगा। यही काम अंतत: संपन्न किया जाएगा। इस दौरान, जिन लोगों का हर काम विद्रोह से भरा है उन्हें दण्डित किया जाएगा, और आग में जलने के लिए भेज दिया जाएगा जहाँ वे अनंतकाल तक शाप के भागी होंगे। जब वह समय आएगा, तो बीते युगों के वे "महान और अदम्य नायक" सबसे नीच और परित्यक्त "कमज़ोर और नपुंसक कायर" बन जाएँगे। केवल यही परमेश्वर की धार्मिकता के हर पहलू और उसके उस स्वभाव को प्रकट कर सकता है जिसका मनुष्य द्वारा अपमान नहीं किया जा सकता, मात्र यही मेरे हृदय की नफ़रत को शांत कर सकता है। क्या तुम लोगों को यह पूरी तरह तर्कपूर्ण नहीं लगता?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

सत्य का अनुसरण करने वाले सभी लोग निश्चित रूप से ऐसे लोग होते हैं जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और सत्य से प्रेम करते हैं। भले ही भ्रष्ट इंसान में अहंकार, दंभ, अभिमान, आत्मतुष्टि, और अड़ियलपन जैसे शैतानी स्वभाव होते हैं, लेकिन अगर लोग सत्य को स्वीकारने और उसका अभ्यास करने में सक्षम हैं, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का पालन कर सकते हैं, तो वे निश्चित रूप से सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं। सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों के दो मुख्य प्रकार हैं : पहले प्रकार के वे लोग हैं जो मानवता में बेहतर हैं लेकिन जिनकी क्षमता कम होती है और जो धीरे-धीरे सत्य को समझते हैं। अधिक सुनने और पालन करने के बावजूद, उनकी क्षमता कम ही रहती है, वे महत्वपूर्ण कार्य नहीं संभाल पाते, और वे अपने कर्तव्य में बहुत अधिक हासिल नहीं करते। दूसरे प्रकार के लोग बेहतर क्षमता वाले लोग होते हैं, लेकिन वे अधिक अहंकारी और आत्मतुष्ट होते हैं और आम तौर पर दूसरों की बात नहीं सुनते हैं। वे तब आश्वस्त महसूस नहीं करते जब दूसरे लोगों का कथन पूरी तरह से सत्य के अनुसार नहीं होता, और उन लोगों के काम आम लोगों द्वारा किए गए काम से बहुत बेहतर नहीं होते। भले ही इस प्रकार का व्यक्ति अपेक्षाकृत अहंकारी और आत्मतुष्ट होता है, परंतु वह सत्य को तेजी से समझता है, और अपना कर्तव्य निभाने में बेहतर होता है क्योंकि उसकी क्षमता अच्छी होती है। इन दो प्रकार के लोगों में से, किसे अधिक आसानी से पूर्ण किया जा सकता है? कौन पूर्ण होने के बाद परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त हो सकता है? भले ही सत्य का अनुसरण करने वाले सभी लोग उद्धार पाने में सक्षम होते हैं, परंतु उनकी क्षमताएँ अलग-अलग होती हैं, इस कारण पूर्ण होने के पश्चात उनका मूल्य भी अलग-अलग होगा। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इसका एहसास होना चाहिए। वास्तव में, पूरी भ्रष्ट मानव जाति में अहंकारी स्वभाव होता है, लेकिन अहंकार के बहुत से अलग-अलग प्रकार होते हैं : कुछ लोग बहुत अहंकारी होने के बावजूद सत्य से प्रेम करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं और किसी भी ऐसी चीज को स्वीकार और उसका पालन कर सकते हैं जो सत्य के अनुसार होती है। यदि वह सत्य के अनुरूप नहीं है, तो वे इसे सुनने से इनकार कर देंगे। इस प्रकार का अहंकार काफी उचित है, इसकी एक अंतिम सीमा है और यह सामान्य अहंकार है। अहंकार का एक प्रकार ऐसा भी होता है जिसमें कोई तर्क नहीं होता, और जिसकी कोई अंतिम सीमा नहीं होती। ऐसे लोग भयानक और तर्कविहीन रूप से अहंकारी होते हैं और किसी की नहीं सुनते। दूसरे लोगों की बातें चाहे सत्य के कितने भी अनुरूप हों, वे इसे स्वीकार या इसका पालन नहीं करेंगे, बल्कि शायद वे दृढ़ता से इसका प्रतिरोध भी करें। वे सच में उन लोगों से घृणा करते हैं जिनके पास सत्य होता है और जो उनके साथ सत्य के अनुसार व्यवहार करते हैं। इस तरह का अहंकार दुष्ट शैतान का स्वभाव है। बड़े लाल अजगर की तरह, इस प्रकार का व्यक्ति जानता है कि परमेश्वर सत्य है, लेकिन वह नहीं सुनता, बल्कि वह तो परमेश्वर के बराबर का दर्जा चाहता है। वे सभी मसीह-विरोधी इस प्रकार के शैतानी राक्षस हैं, और इतने अहंकारी हैं कि वे सारे तर्कों के परे हैं। ऐसे सभी राक्षसों को बचाया नहीं जा सकता। एक अन्य प्रकार का अहंकार भी होता है, जिसमें लोग किसी की भी नहीं सुनते हैं और बेहद बेतुके होते हैं। वे बेतुके होते हैं और अड़ियल भी। वे हठपूर्वक अपने बेतुके तर्क जाहिर करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं। चाहे दूसरे लोग सत्य पर कितने ही स्पष्ट ढंग से संगति क्यों न करें, या वे कितने ही तथ्यों को सूचीबद्ध क्यों न करें, ये लोग तब भी नहीं सुनते, वे कुतर्क करते रहते हैं और अपने बेतुके और झूठे तर्क उगलते रहते हैं। इस तरह के अहंकारी स्वभाव में बुरी आत्माओं की प्रकृति होती है। इस प्रकार का व्यक्ति और भी दुष्ट शैतान के किस्म का होता है। ऐसे लोग मसीह-विरोधी और दुष्टात्माएँ दोनों ही होते हैं, और सबसे खतरनाक शत्रु हैं। ये तीन मुख्य प्रकार के अहंकार और दंभ हैं। तर्कपूर्ण अहंकार काफी आम और सामान्य है। पूरी भ्रष्ट मानव जाति में अहंकारी स्वभाव है। यह एक तथ्य है। कुछ-न-कुछ कौशल और प्रतिभा और बहुत अच्छी क्षमता वाले सभी लोग निश्चित रूप से अत्यंत अहंकारी और आत्मतुष्ट होते हैं; कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अहंकारी न हो। लेकिन, लोग कितने भी अहंकारी और आत्मतुष्ट क्यों न हों, अगर वे दयालु हैं, उनके पास अंतरात्मा और तर्कशीलता है, और वे दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाते या धोखा नहीं देते और वे सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, तो वे अच्छे लोग हैं। लोग चाहे कितने भी अहंकारी और आत्मतुष्ट क्यों न हो, अगर उनकी क्षमता अच्छी हो और वे सत्य का अनुसरण करने में सक्षम हों, तो वे पूरी तरह से बचाए और पूर्ण किए जा सकते हैं। चूँकि जिन लोगों को परमेश्वर पूर्ण करता है, वे सत्य का अनुसरण करने वाले और एक निश्चित क्षमता वाले लोग होने चाहिए, इसलिए अगर किसी व्यक्ति की क्षमता बहुत खराब है, तो वह सत्य को समझने में असमर्थ होगा और पूर्ण नहीं किया जा सकेगा। निश्चित रूप से ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसके पास अच्छी क्षमता हो, संकल्प हो, और जिसमें लेशमात्र भी अहंकार या आत्मतुष्टि न हो। अगर ऐसे लोग हैं, तो वे सिर्फ दिखावा कर रहे हैं या झूठा वेश धारण किए हुए हैं। यह ज्ञात होना चाहिए कि भ्रष्ट मानव जाति का प्रत्येक सदस्य अहंकारी और दंभी स्वभाव वाला होता है; यह एक निर्विवाद तथ्य है। लोगों का अहंकार और आत्मतुष्टि आसानी से सुलझाई जा सकती है। जब परमेश्वर किसी को कुछ बार अनुशासित करता है ताकि वे कई असफलताओं से गुजरें और गिरें, और जब वे वास्तव में सत्य को समझ जाते हैं और अपने प्रकृति सार को जान जाते हैं, तो उनके अहंकार का स्वाभाविक रूप से समाधान हो जाता है। लेकिन अगर लोगों की अंतर्निहित क्षमता बहुत खराब है या वे बेहद बेतुके हैं, तो इसका समाधान संभव नहीं है। इसलिए लोगों के अहंकार में भेद किया जाना चाहिए और उससे सही तरीके से निपटना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि कोई व्यक्ति इसलिए अच्छा नहीं है और उसे इसलिए बचाया और पूर्ण नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह बहुत अहंकारी और आत्मतुष्ट है। लोगों को पूर्ण करने की शर्तें मुख्य रूप से ये हैं कि वे अच्छी क्षमता वाले और सत्य का अनुसरण करने वाले होने चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की क्षमता बहुत खराब है और वह कभी भी सत्य को नहीं समझ सकता है, तो भले ही उसका स्वभाव बेहद नम्र हो और वह बिलकुल भी अहंकारी न हो, पर वह किसी काम का नहीं है और न ही पूर्ण किए जाने के योग्य है। यहाँ पर, परमेश्वर के इरादों को समझने की आवश्यकता है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

अहंकारी स्वभाव के लोगों की भिन्न-भिन्न किस्में होती हैं। कुछ लोगों ने लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास नहीं किया होता है, उन्होंने परमेश्वर के कार्य का सचमुच कोई अनुभव नहीं किया होता है और वे सत्य को नहीं समझते हैं, इसलिए उनके पास परमेश्वर के बारे में धारणाओं का होना अपरिहार्य है। एक अहंकारी स्वभाव अभिमानी और आत्मतुष्ट होता है, हैसियत पाना और दिखावा करना पसंद करता है—यह बहुत सामान्य बात है। शैतान द्वारा भ्रष्ट मानवता के इस नियम का कोई अपवाद नहीं है। झूठे मसीहों व मसीह-विरोधियों और उन आम भ्रष्ट लोगों के बीच का अंतर यह है कि झूठे मसीहों व मसीह-विरोधियों के अहंकार ने उन्हें पूरी तरह से अंतरात्मा और तर्कशीलता से वंचित कर दिया होता है; उनका अहंकार उन्मादी होता है और उनकी महत्वाकांक्षा असीम होती है, वे किसी के सामने नहीं झुकते, वे वे सीधे-सीधे खुद पर संयम नहीं रख पाते, और वे अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए किसी भी बेतुकी हद तक जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, वे परमेश्वर या मसीह होने का दावा कर सकते हैं, या पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति होने का दावा कर सकते हैं, और ऐसी निरर्थक बातें कह सकते हैं कि केवल वे ही सत्य व्यक्त कर सकते हैं, और लोगों को बचा और पूर्ण कर सकते हैं, और लोगों को राज्य में ले जा सकते हैं। वे वास्तव में बेशर्म और हद से ज्यादा मूर्ख होते हैं! क्या ऐसी बेतुकी बातें कहने वाले के पास सामान्य मानवीय विवेक हो सकता है? क्या यह हद दर्जे का अहंकार नहीं है? यह ऐसा मामला है जहाँ शैतानी प्रकृति इतनी फूल जाती है कि यह भयानक रूप से फट पड़ती है और इसे बांध कर रख पाना असंभव हो जाता है! तो, झूठे मसीहों और मसीह-विरोधियों द्वारा जो अभिव्यक्त किया जाता है, वह आम लोगों के भ्रष्ट भावों से पूरी तरह अलग होता है। धारणाएँ रखना, अहंकारी होना, और हैसियत से मोह करना भयानक नहीं हैं; मुख्य प्रश्न यह है कि कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को और परमेश्वर के घर के द्वारा काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार करता है या नहीं। यदि कोई इन बातों को स्वीकार कर सकता है, तो उसके पास परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का एक मौका जरूर होता है। भ्रष्टाचार के सामान्य भाव परमेश्वर के घर के कार्य में न तो बाधा डालते हैं, न इसे नष्ट करते हैं, लेकिन झूठे मसीहों और मसीह-विरोधियों द्वारा किया गया हर कार्य लोगों को धोखा देने और उन्हें सही रास्ते से हटाने के लिए होता है। वे लोगों से परमेश्वर के वचनों को पढ़ना छुड़वा देते हैं और इसके बजाय उन्हें अपनी बातें सुनने और मसीह को छोड़कर अपना अनुसरण करने पर मजबूर करते हैं। वे लोगों को परमेश्वर की आराधना नहीं करने देते, बल्कि उन्हें मजबूर करते हैं कि वे उनका गुणगान करें। यह परमेश्वर के कार्य को बाधित और नष्ट करने का प्रयास करना है। यह शैतान की चालाकी भरी योजना है, शैतान का कार्य है। इसलिए, जो लोग मनुष्य की भ्रांतियों और धारणाओं का प्रचार-प्रसार करते हैं, परमेश्वर के कार्य की आलोचना करते हैं, और पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की और उसके काम की निंदा करते हैं, वे झूठे मसीह और मसीह-विरोधी होते हैं। वे पूरी तरह शैतान के अनुचर हैं जो परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने के लिए आते हैं, वे परमेश्वर की शत्रु ताकतें हैं जो मसीह के विपरीत चलती हैं। इसीलिए जो झूठे मसीह और मसीह-विरोधी हैं उन्हें कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाना चाहिए, और पछतावा करने की प्रतीक्षा में उन्हें दूसरा मौका बिल्कुल नहीं दिया जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे पहले से ही बड़े लाल अजगर की तरह, परमेश्वर के शत्रु की ताकतें बन गए हैं और पूरी तरह से परमेश्वर के शत्रु हैं; पवित्र आत्मा ने काफी समय पहले ही उनमें काम करना बंद कर दिया है, और उन्हें चाहे जितनी भी सलाह दी जाए, उनके किसी काम नहीं आएगी। वे पहले से ही इतनी बुराई कर चुके हैं कि उन्हें बचाया नहीं जा सकता। जब उन्हें दंडित किया जाएगा तभी ये लोग परमेश्वर से क्षमा की भीख माँगेंगे और बुराई करना बंद करेंगे, लेकिन उनकी शैतानी प्रकृति को कभी नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पता होना चाहिए कि शैतान परमेश्वर के प्रति कोई श्रद्धा नहीं रखता, उसे केवल भय है, और जो दुष्ट लोग शैतान से संबंध रखते हैं, वे न केवल परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं रखते, बल्कि वे परमेश्वर से डरते भी नहीं हैं, क्योंकि उन्हें अभी तक दंड नहीं मिला है। परमेश्वर का घर अभी यह कर सकता है कि इन लोगों को निष्कासित कर दे, और इस तरह से उनके शैतानी कर्मों का समाधान करे।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

पिछला: 134. सत्य से प्रेम करने वालों के साथ व्यवहार के सिद्धांत

अगला: 136. उन लोगों के साथ व्यवहार के सिद्धांत जिन्हें उजागर किया गया और हटाया गया है

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें