134. उन लोगों के साथ व्यवहार के सिद्धांत जो सत्य से प्रेम करते हैं

(1) वे सभी जो सत्य से प्रेम करते हैं और पवित्र आत्मा के कार्य को लिए हुए हैं, परमेश्वर के लोगों में गिने जाते हैं। यदि वे अतिक्रमण करते हैं, या ठोकर खाते और गिर पड़ते हैं, तो उन्हें प्रेमपूर्वक मदद करनी चाहिए;

(2) अच्छी योग्यता वाले लोग जो सत्य से प्रेम करते हैं और धार्मिकता की भावना रखते हैं, उन्हें नेताओं और कार्यकर्ताओं के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, और कोई भी उन पर हमला न करे, या उन्हें अपमानित न कर सके;

(3) कलीसिया के पास, अपने केंद्र में, ऐसे लोग होने चाहिए, जो सत्य से प्रेम करते हैं और जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य होता है। उनके सींचन और विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए, और उन्हें कर्तव्य पूरा करने और प्रशिक्षण पाने के अवसर दिए जाने चाहिए;

(4) कलीसिया को सत्य से प्रेम करने वालों को अपनी सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। उन सभी बुरे लोगों को नियंत्रित किया जाना चाहिए जो सत्य से प्रेम करने वालों पर हमला, या उनका बहिष्कार, कर सकते हैं, या जो उन लोगों के साथ छल कर सकते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिनके दिल में सत्य और धार्मिकता के लिए तड़प है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो धार्मिकता, भलाई और सत्य के लिए तरसता है, और विवेक से युक्त होता है। परमेश्वर लोगों के इस हिस्से को बचाता है, और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभाव को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता परिमार्जित हो सके, और उनका जीवन-स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीज़ें नहीं हैं, तो तुमको बचाया नहीं जा सकता। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या धार्मिकता और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुराई का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो बुरी चीज़ों को दूर फेंकने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है; यदि सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य के साथ और उत्पन्न होने वाली घटनाओं के साथ लयबद्ध नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो, और अपने दम पर चीजों को संभालने या हल करने में असमर्थ हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ... ऐसा क्यों कहा जाता है कि पतरस एक फल है? क्योंकि उसमें मूल्यवान चीज़ें हैं, पूर्ण किए जाने योग्य चीज़ें; वह सत्य की तलाश करने के लिए कृतसंकल्प था और दृढ़ इच्छा-शक्ति वाला था; उसमें विवेक था, वह कष्ट सहने को तैयार था, और अपने दिल में वह सत्य से प्रेम करता था, और जो कुछ भी होता था, उसे वह यूँ ही गुज़र जाने नहीं देता था। ये सभी ठोस बातें हैं। यदि तुम्हारे पास इन ठोस बातों में से एक भी नहीं है, तो इसका मतलब परेशानी है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत

यदि तुम सच्चाई से प्रेम करते हो, तो भले ही तुम्हारी क्षमता कुछ तुच्छ हो, चाहे तुम परमेश्वर में बहुत लंबे समय से विश्वास नहीं करते रहे हो, तुम अक्सर गलतियाँ और बेवकूफ़ी के काम करते हो, पर यदि परमेश्वर जब सत्य पर संगति करे तो तुम इसे बहुत पसंद करते हो, यदि सत्य और परमेश्वर के वचनों के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण ईमानदार है, अगर यह खरा और उत्सुक है, यदि तुम सत्य को बटोरे और संजोए रखते हो, तो परमेश्वर तुम पर दया करेगा। परमेश्वर तुम्हारे अज्ञान और तुम्हारी तुच्छ क्षमता से अप्रभावित रहता है, क्योंकि सत्य के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण खरा और उत्सुक है, और तुम्हारा हृदय सच्चा है; परमेश्वर तुम्हारे हृदय और रवैये को आँकता है, और वह हमेशा तुम्हारे प्रति दयालु होगा—और इसलिए तुम्हें उद्धार की आशा होगी। दूसरी ओर, यदि तुम दिल के कठोर और विलासी हो, अगर तुम सच्चाई से घृणा करते हो, और परमेश्वर के वचनों और सच्चाई की किसी भी बात से प्रेम नहीं करते हो, कभी भी इनके प्रति सचेत नहीं होते, और अपने दिल की गहराइयों से विरोधी और तिरस्कारपूर्ण हो, तो फिर तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया कैसा होगा? घृणा, विकर्षण, और निरंतर क्रोध का। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव में कौन—सी दो विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं? प्रचुर दया और गहरा क्रोध। "प्रचुर दया" में "प्रचुर" का अर्थ यह होता है कि परमेश्वर की दया सहिष्णु, धैर्यवान, बर्दाश्त करने वाली है, और यही सबसे बड़ा प्रेम है—"प्रचुर" का यही अर्थ होता है। चूँकि कुछ लोग मूर्ख और तुच्छ क्षमता के होते हैं, परमेश्वर को इसी तरह कार्य करना होता है। अगर तुम सच्चाई से प्रेम करते हो हालाँकि तुम मूर्ख और तुच्छ क्षमता के हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया केवल प्रचुर दया का ही हो सकता है। दया में धैर्य और सहिष्णुता शामिल होते हैं: परमेश्वर तुम्हारे अज्ञान के प्रति सहिष्णु और धैर्यवान है, वह तुम्हें सहारा देने, तुम्हारे लिए प्रावधान देने, और तुम्हारी सहायता करने के लिए तुम्हें पर्याप्त विश्वास और सहिष्णुता प्रदान करता है, ताकि तुम थोड़ा-थोड़ा करके सच्चाई को समझो और धीरे-धीरे आगे बढ़ो। यह किस आधार पर बनाया जाता है? किसी ऐसे व्यक्ति के दृष्टिकोण पर जो सच्चाई से प्रेम करता और उसके लिए तरसता है, जो परमेश्वर, उसके वचनों और सच्चाई के प्रति ईमानदार होता है। ये वो मूलभूत व्यवहार हैं जो लोगों में प्रकट होने चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कलीसिया द्वारा लोगों का पोषण और इस्तेमाल मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि वे सत्य का अनुसरण करते हैं या नहीं; यह सबसे बुनियादी सिद्धांत है। इसका कारण यह है कि कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं, इससे कई समस्याओं का पता चलता है; इससे यह ख़ुलासा होता है कि क्या वे जिस मार्ग पर चल रहे हैं वह सही मार्ग है या गलत, परमेश्वर में उनकी आस्था व्यावहारिक है या नहीं और उनमें किस तरह के गुण मौजूद हैं। अगर वे सचमुच ऐसे व्यक्ति हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं, तो उनमें निश्चित रूप से अपेक्षाकृत बेहतर इंसानियत होगी, वे यकीनन सही मार्ग पर चल रहे होंगे और वे निस्संदेह अपेक्षाकृत उदार व्यक्ति होंगे। इसलिए, परमेश्वर का घर बार-बार ऐसे लोगों को अगुआ चुनने और अगुआ के तौर पर इस्तेमाल करने पर ज़ोर देता है जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं; यह एक महत्वपूर्ण बात है। कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं है; सभी लोगों में कमियां होती हैं। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय, तुम्हें मुख्य पहलुओं पर विचार करना चाहिए: वह व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं, क्या उसमें अच्छी काबिलियत है, क्या वह कृतसंकल्प है और क्या उसमें न्याय की समझ है। अगर कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण कर सकता है, तो उसमें छोटी-मोटी कमियां होने या उसके द्वारा कुछ मामूली अपराध किये जाने को समस्या नहीं माना जाता है। अगर वह सचमुच ऐसा व्यक्ति जो सत्य का अनुसरण कर सकता है, तो उसके सभी अपराधों का समाधान किया जा सकता है। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय बाल की खाल मत निकालो या उसके बाहरी स्वरूप को देखकर फ़ैसला मत करो; तुम्हें उसके सार को देखना होगा। यही महत्वपूर्ण है। सबसे ज़रूरी काम है ऐसे लोगों को ढूंढना जिनमें सचमुच अच्छी काबिलियत है, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जो काम करने में सक्षम हैं; और फिर, कलीसिया में उनके लिए उपयुक्त स्थान की व्यवस्था करो, उनका अच्छी तरह से पोषण और आपूर्ति करो। जब सभी स्तरों पर कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर कदम रखते हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को भी सही मार्ग पर लाने में अगुआई कर सकते हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

कलीसियाई जीवन का एक विशेष सिद्धांत हैः उन लोगों का विशेष ध्यान रखो जो सत्य का अनुसरण करते हैं। उनके साथ अधिक सहभागिता करो, उन्हें अधिक पोषण दो, और उन्हें अधिक सिंचन दो जिससे कि शीघ्रता से उन्हें सहायता मिले और यथाशीघ्र वे अपने जीवन में विकसित हों। जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं उनके लिए, यदि यह स्पष्ट हो जाता है कि एक अवधि तक सिंचित करने के बाद वे सत्य को प्रेम नहीं करते हैं, तो उन पर बहुत अधिक प्रयास व्यय करने की आवश्यकता नहीं है। यह आवश्यक नहीं है क्योंकि तुम मानव रूप से संभव सभी प्रयासों को पहले से ही कर चुके हो। इतना पर्याप्त है तुमने अपने उत्तरदायित्वों को पूरा कर लिया है। कुछ लोगों की राय अलग हो सकती है और वे कहते हैं, "जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं उनका और अधिक सिंचन और पोषण किया जाना चाहिए; तुम्हें दूसरे तरीके सोचने चाहिए ताकि वे सत्य का अनुसरण कर सकें। इसके विपरीत, जो लोग पहले से सत्य का अनुसरण कर रहे हैं उन्हें अब चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वे अनुसरण करने का तरीका जान चुके हैं।" क्या यह दृष्टिकोण सही है? नहीं, यह सही नहीं है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं उनकी प्रकृति यही है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं। इस बात को साबित किया जा सकता है कि सत्य से प्रेम नहीं करने वाले नब्बे फीसदी लोग बेजान हैं। क्या तुम बेजान लोगों में जान डालने के लिए कृतसंकल्प हो? तुम यह कैसे सोचते हो कि तुम्हारे पास ऐसा करने की काबिलियत है? अगर मैं किसी बेजान व्यक्ति से टकराया, तो मैं फ़ौरन भाग जाऊँगा। अगर किसी व्यक्ति में पवित्र आत्मा कार्य नहीं कर रहा है, तो कोई चाहे कुछ भी करे उसका कोई फ़ायदा नहीं होगा। बेहतर होगा कि तुम उस आत्मा को अपना थोड़ा सा प्यार दो और इसे परमेश्वर को समर्पित करो या फिर यह प्यार उन भाई-बहनों को दो जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं। ... तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि तुम्हें किस पर अपने कार्य को केन्द्रित करना चाहिए। क्या सत्य को नहीं खोजने वालों को परमेश्वर पूर्ण बनाएगा? यदि पवित्र आत्मा नहीं बनाएगा, तो लोगों को आँख बंद करके यह क्यों करते रहना चाहिए? तुम पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हो फिर भी हमेशा आत्मविश्वासी रहते हो—क्या यह तुम्हारी मानवीय मूर्खता और अज्ञानता नहीं है? इसलिए, दिल से सत्य को खोजने वाले भाइयों और बहनों को अधिक सहायता दो, क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा उद्धार की वस्तुएँ हैं और उसके पूर्वनियत चुने हुए लोग हैं। यदि हम प्रायः एक हृदय और मन से इन लोगों के साथ सत्य पर सहभागिता करते हैं और एक दूसरे की सहायता करते हैं और पोषण देते हैं, तो अंत में हम सभी उद्धार हासिल करेंगे। यदि तुम इन लोगों के साथ नहीं जुड़ते हो तो तुम परमेश्वर की इच्छा के साथ विश्वासघात कर रहे हो। हर कलीसिया में कुछ गिने-चुने लोग हैं जो सत्य का अनुसरण कर रहे हैं; ऐसे ही लोगों पर पवित्र आत्मा का कार्य केंद्रित होता है। ये कलीसिया के महत्वपूर्ण लोग हैं। कलीसिया के महत्वपूर्ण लोग कैसे अस्तित्व में आते हैं? जिस लोगों पर पवित्र आत्मा अपना ध्यान केंद्रित करता है वे कलीसिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं। अगर तुम इन लोगों का सिंचन कर सकते हो, उनके आध्यात्मिक कद को परिपक्व बना सकते हो और उन्हें परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर कदम रखने के लिए राजी कर सकते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन पर्याप्त और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होगा। अगर तुम इन लोगों का सिंचन करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो और उन्हें अलग-थलग कर देते हो, उन्हें अनदेखा करते हो और फिर मुख्य रूप से उन भावनाहीन बेजान लोगों को बचाने पर ध्यान देते हो जो शैतान के साथी हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया या चुना नहीं गया है और वे सेवाकर्मी हैं, तो इससे साबित होता है कि तुम परमेश्वर के साथ ताल से ताल मिलाकर नहीं चल रहे हो; तुम उसके कार्य में रुकावट डाल रहे हो, पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग नहीं कर रहे हो और तुमने अपने काम में महत्वपूर्ण मुकामों को हासिल नहीं किया है। ... इस प्रकार, जब सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों की बात आती है, तो तुम्हें उनका सिंचन करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए उपाय करने चाहिए, उन्हें पोषण देना चाहिए, और उनकी मदद करनी चाहिए। इन लोगों को सहारा दो ताकि वे परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर कदम रख सकें, और फिर तुम्हारी सेवा परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होगी। तभी तुम्हारी सेवा वास्तव में पवित्र आत्मा के कार्य के सहयोग में होगी। कलीसिया के भीतर जिनके पास उचित मानवता है, उन्हें स्वयं को सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों के बीच रखना चाहिए, उनके संग समरसता के साथ व्यवहार करना चाहिए और सत्य के अनुसरण के माध्यम से धीरे-धीरे एक ही हृदय और मन के साथ स्वयं को परमेश्वर के लिए व्यय करना चाहिए। इस तरह से, जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, वे बचाए जाएँगे और तुम भी बचाए जाओगे, क्योंकि पवित्र आत्मा सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों के बीच कार्य करता है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

सकारात्मक चीज़ों, सकारात्मक लोगों, और सत्य का अनुसरण करने वालों के प्रति लोगों का रवैया, उन्हें सबसे ज़्यादा उजागर करता है। सत्य का अनुसरण करने वालों के प्रति उनका रवैया सत्य और परमेश्वर के प्रति उनके रवैये को दर्शाता है। अगर कोई इस समूह के लोगों को बदनाम करता है, उनसे बुरा बर्ताव करता है और उन पर हमला करता है, तो इससे साबित होता है कि यह व्यक्ति परमेश्वर से नफ़रत करता है, और सत्य और सकारात्मक चीज़ों से भी नफ़रत करता है। बात यही है। आज, कुछ लोग पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं करते हैं। वे जानते हैं कि जो भी पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति का विरोध करता है, उसकी सभी लोग कलीसिया में एक मसीह-विरोधी के रूप में निंदा करेंगे, और इसलिए अब वे सत्य का अनुसरण करने वाले और पवित्र आत्मा के कार्य से युक्त अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बदनाम करने, उन पर हमला करने और उनकी आलोचना करने की पूरी कोशिश करते हैं। वे इन अगुआओं और कार्यकर्ताओं को गिराकर उनकी जगह ले लेना चाहते हैं। क्या ये मसीह-विरोधियों की युक्तियाँ नहीं हैं? मान लो कि कोई ऐसा व्यक्ति है जो कलीसिया में सत्य का अनुसरण करने वालों की आलोचना करता है और उन पर हमला करता रहता है, जो उनकी गलतियाँ खोजने की कोशिश करता रहता है और जो सत्य का अनुसरण करने वालों में भ्रष्टाचार के भाव तलाशता रहता है, और कुछ मिल जाने पर उनकी आलोचना करता है, उन पर हमला करता है, उन्हें बदनाम करता है, अंत में उन्हें बुरा और दुष्ट कहकर तुच्छ बना देता है और सभी को उन्हें अस्वीकार करने पर मजबूर कर देता है। क्या ऐसे लोग दुष्ट नहीं होते? कलीसिया में जो कोई भी सत्य का अनुसरण करने वाले अच्छे लोगों से शत्रुता रखता है, वह दुष्ट है और उसे दंडित किया जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि सत्य का अनुसरण करने वाले अच्छे लोग, परमेश्वर के उद्धार-कार्य के लक्ष्य हैं, वे परमेश्वर के संरक्षण में हैं, और परमेश्वर द्वारा उनकी सुरक्षा की जाती है; ऐसे लोगों से शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने वाला व्यक्ति परमेश्वर से और परमेश्वर के कार्य से शत्रुता रखता है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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