131. दूसरों के साथ उचित व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) सभी लोगों, घटनाओं और चीज़ों के साथ परमेश्वर के वचनों में रहे सत्य के अनुसार व्यवहार करना आवश्यक है। केवल सत्य के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए दूसरों के साथ व्यवहार करना, परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होता है;

(2) दूसरों की ताक़तों और कमज़ोरियों के साथ उचित व्यवहार करो। लोगों से बहुत अधिक अपेक्षा न करो या यह माँग न करो कि वे जितना कर सकते हैं, उससे अधिक करें, और उन्हें बहुत बड़ा या बहुत छोटा न समझो;

(3) परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रति प्रेम रखो। दूसरों के साथ अपने व्यवहार में भावावेशों से निर्देशित न हो या पूर्वाग्रह न रखो, और उन्हें मनमाने ढंग से परिसीमित न करो। उन्हें विकास के दृष्टिकोण से देखो;

(4) सदाचार और प्रतिभा से ईर्ष्या न करो और तुमसे अलग विचारों वाले लोगों का बहिष्कार या दमन मत करो। जब भी तुम्हें अच्छी योग्यता वाले लोगों का पता लगे, जो सच्चाई से प्रेम करते हैं, तो उन्हें सराहना और बढ़ावा दो;

(5) दूसरों के साथ उनके सार के अनुसार व्यवहार करना आवश्यक है। एक अच्छे व्यक्ति को जिसने कोई अतिक्रमण किया हो, सच्चाई की प्रेमपूर्ण सहभागिता के साथ मदद और समर्थन देना चाहिए, जबकि एक बुरे व्यक्ति को नापसंदगी और अस्वीकृति देनी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करने में खासतौर से क्या-क्या शामिल है? उदाहरण के लिए, अगर दूसरों के साथ व्यवहार की बात करें, तो इसके पीछे क्या सिद्धांत हैं कि तुम हैसियत वालों के साथ और बिना हैसियत वालों के साथ किस तरह व्यवहार करोगे, और आम भाइयों और बहनों और विभिन्न स्तरों के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के साथ? तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर सकते जैसाकि अविश्वासी लोग दूसरे लोगों के साथ करते हैं; तुम्हें निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए। तुम इसके नजदीक और उससे दूर नहीं हो सकते; न ही तुम कोई गुट या गिरोह बना सकते हो। तुम लोगों पर सिर्फ इसलिए धौंस नहीं जमा सकते क्योंकि तुम उन्हें पसंद नहीं करते, या उन लोगों की खुशामद नहीं कर सकते जो मजबूत स्थिति में हैं। सिद्धांतों का यही मतलब है। तुम्हें दूसरों के साथ अपने व्यवहार में सिद्धांतवादी होना चाहिए; तुम्हें उन सबसे निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। अगर तुम अच्छे लगने वाले लोगों को लुभाकर अपनी तरफ कर लेते हो और मुश्किल लगने वाले लोगों को बाहर रखते हो, तो क्या तुममें सिद्धांतों की कमी नहीं है? यह दुनिया में जीने के लिए अविश्वासियों का दर्शन है, और लोगों के साथ उनके व्यवहार के अंदाज के पीछे यही सिद्धांत है। यह एक शैतानी स्वभाव भी है और शैतानी तर्कशास्त्र भी। तुम्हें परमेश्वर के परिवार के लोगों के साथ किस सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करना चाहिए? (हर एक भाई-बहन के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए।) तुम उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार कैसे करोगे? हर किसी में छोटे-मोटे दोष और कमियां होती हैं, साथ ही उनमें कुछ विलक्षणताएं भी होती हैं; सभी लोगों में दंभ, कमज़ोरी और ऐसी बातें होती हैं जिनकी उनमें कमी होती है। तुम्हें प्यार से उनकी सहायता करनी चाहिए, सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए, तुम्हें बहुत कठोर नहीं बनना चाहिए या हर छोटी सी बात का बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए। ऐसे लोगों के साथ, जिनकी उम्र कम है या जिन लोगों ने ज़्यादा समय से परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया है, या जिन लोगों ने हाल ही में अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया है या जिन लोगों के कुछ ख़ास अनुरोध हैं, अगर तुम उन्हें चोटी से पकड़ लेते हो और छोड़ते नहीं हो, तो इसे ही कठोर होना कहा जाता है। तुम उन झूठे अगुवाओं और मसीह विरोधियों द्वारा किये गये बुरे कर्मों को अनदेखा कर देते हो, और फिर भी अपने भाई-बहनों में छोटी-मोटी कमियां देखने पर उनकी मदद करने से इनकार कर देते हो, इसके बजाय उन बातों का बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश करते हो और पीठ पीछे उनकी आलोचना करते हो, जिसके कारण और भी लोग उनका विरोध करने लगते हैं, उनका बहिष्कार करके निष्कासित कर देते हैं। यह किस तरह का व्यवहार है? यह सिर्फ़ अपनी निजी प्राथमिकताओं के आधार पर काम करना, और लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने में सक्षम नहीं होना है; यह एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दर्शाता है! यह एक उल्लंघन है! जब लोग कोई काम करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें देख रहा होता है; तुम जो भी करते हो और जैसा भी सोचते हो, वह सब देखता है! अगर तुम सिद्धांतों को ग्रहण करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले सत्य को समझना होगा। एक बात जब तुम सत्य को समझ जाते हो, तब तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो; अगर तुम सत्य को नहीं समझते हो, तो तुम निश्चित ही परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाओगे। सत्य यह बताता है कि तुम्हें लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, और एक बार जब तुम इस बात को समझ जाते हो, तो तुम यह जान जाओगे कि लोगों से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे व्यवहार करना चाहिए। तुम्हें दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, यह परमेश्वर के वचनों में साफ़ तौर पर दिखाया और बताया गया है। परमेश्वर मनुष्यों के साथ जिस रवैये से व्यवहार करता है, वही रवैया लोगों को एक-दूसरे के साथ अपने व्यवहार में अपनाना चाहिए। परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है? कुछ लोग अपरिपक्व अवस्था वाले या कम उम्र के होते हैं, या उन्होंने सिर्फ़ कुछ समय के लिए परमेश्वर में विश्वास किया होता है। कुछ लोगों की प्रकृति और सार बुरे या दुर्भावनापूर्ण नहीं होते हैं, बात बस इतनी है कि वे लोग कुछ हद तक अज्ञानी होते हैं या उनमें क्षमता की कमी होती है, या वे लोग समाज के द्वारा बहुत अधिक संदूषित किए गए हैं। उन लोगों ने सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, इसी वजह से उनके लिए कुछ मूर्खतापूर्ण चीज़ें करने या कुछ नादानी वाले काम करने से खुद को रोक पाना मुश्किल है। हालांकि, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, ऐसी बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं; वह सिर्फ़ लोगों के दिलों को देखता है। अगर वे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कृतसंकल्प हैं, तो वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, और यही उनका उद्देश्य है, फिर परमेश्वर उन्हें देख रहा है, उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, परमेश्वर उन्हें वह समय और अवसर दे रहा है जो उन्हें प्रवेश करने की अनुमति देता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर उन्हें एक झटके से गिरा देता है या सिर बाहर निकालते ही उन्हें मारने लगता है; परमेश्वर ने कभी भी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया है। इसे देखते हुए, अगर लोग एक दूसरे के साथ इस तरह का व्यवहार करते हैं, तो क्या यह उनके भ्रष्ट स्वभाव को नहीं दर्शाता है? यह निश्चित तौर पर उनका भ्रष्ट स्वभाव है। तुम्हें यह देखना होगा कि परमेश्वर अज्ञानी और मूर्ख लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, वह अपरिपक्व अवस्था वाले लोगों के साथ कैसे पेश आता है, वह मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के सामान्य प्रकटीकरण से कैसे पेश आता है, और वह दुर्भावनापूर्ण लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार करता है। परमेश्वर के पास अलग-अलग तरह के लोगों के साथ व्यवहार करने के कई तरीके हैं, और उसके पास विभिन्न लोगों की बहुत सी परिस्थितियों को प्रबंधित करने के भी कई तरीके हैं। तुम्हें इन चीज़ों के सत्य को समझना होगा। एक बार जब तुम इन सत्यों को समझ जाओगे, तब तुम उन्हें अनुभव करने का तरीका जान जाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

तुम लोगों के दैनिक जीवन में, किन स्थितियों में, और कितनी स्थितियों में, तुम परमेश्वर का भय मानते हो, और तुम किन चीज़ों में नहीं मानते? क्या तुम लोग, लोगों से नफ़रत करने में, सक्षम होते हो? जब तुम किसी से नफ़रत करते हो, तो क्या तुम उस व्यक्ति पर टूट पड़ सकते हो या उससे बदला ले सकते हो? (हाँ)। तो ठीक है, तुम लोग काफ़ी डरावने हो! तुम लोग परमेश्वर-भीरु नहीं हो। तुम्हारा इन सब चीज़ों को कर पाने का मतलब है कि तुम्हारा स्वभाव काफी दुष्ट है, एक काफ़ी गंभीर हद तक! प्रेम और नफ़रत ऐसे गुण हैं जो एक सामान्य इंसान में होने चाहिए, लेकिन तुम्हें साफ़ तौर पर यह भेद पता होना चाहिए कि तुम किन चीज़ों से प्रेम करते हो और किनसे नफ़रत। अपने दिल में, तुम्हें परमेश्वर से, सत्य से, सकारात्मक चीज़ों और अपने भाई-बहनों से प्रेम करना चाहिए, जबकि दानव शैतान से, नकारात्मक चीज़ों से, मसीह-विरोधियों से और दुष्ट लोगों से नफ़रत करनी चाहिए। अगर तुम अपने भाई-बहनों के लिए दिल में नफ़रत रखोगे, तो तुम उनको दबाने और उनसे बदला लेने की ओर प्रवृत होगे; यह बहुत भयावह होगा। कुछ लोगों के पास सिर्फ़ नफ़रत और दुष्टता के विचार होते हैं। कुछ समय के बाद, अगर ऐसे लोग उस व्यक्ति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते जिनसे वे नफ़रत करते हैं, तो वे उनसे दूरी बनाना शुरू कर देंगे। हालांकि, वे इसका असर अपने कर्तव्यों पर नहीं पड़ने देते या अपने सामान्य पारस्परिक संबंधों को प्रभावित नहीं होने देते, क्योंकि उनके दिलों में परमेश्वर होता है और वे उसके प्रति श्रद्धा रखते हैं। वे परमेश्वर का अपमान नहीं करना चाहते और ऐसा करने से डरते हैं। हालांकि ऐसे लोगों का किसी इंसान के प्रति कुछ अलग नज़रिया हो सकता है, लेकिन वे उन विचारों को अमल में नहीं लाते या एक भी अनुचित शब्द नहीं बोलते, परमेश्वर का अपमान भी नहीं करना चाहते। यह किस तरह का व्यवहार है? यह खुद के आचरण को नियंत्रित करने और चीज़ों को सिद्धांत और निष्पक्षता के साथ संभालने का एक उदाहरण है। हो सकता है कि तुम किसी के व्यक्तित्व के साथ तालमेल नहीं बिठा पाओ और तुम उसे नापसंद भी कर सकते हो, लेकिन जब तुम उसके साथ मिलकर काम करते हो, तो तुम निष्पक्ष रहते हो और अपना कर्तव्य निभाने में अपनी भड़ास नहीं निकालते, अपने कर्तव्य का त्याग नहीं करते या परमेश्वर के परिवार के हितों पर अपनी चिढ़ नहीं दिखाते। तुम सिद्धांत के अनुसार चीजें कर सकते हो; क्योंकि, तुम परमेश्वर के प्रति बुनियादी श्रद्धा रखते हो। अगर तुम्हारे पास इससे थोड़ा अधिक है, तो जब तुम देखते हो कि किसी व्यक्ति में कोई दोष या कमज़ोरी है—भले ही उसने तुम्हें नाराज़ किया हो या तुम्हारे हितों को नुकसान पहुँचाया हो—फिर भी तुम्हारे भीतर उसकी मदद करने की इच्छा होती है। ऐसा करना और भी बेहतर होगा; इसका अर्थ यह होगा कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसमें इंसानियत, सत्य की वास्तविकता और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा है। यदि तुम अपने वर्तमान क़द के साथ इसे प्राप्त नहीं कर सकते, लेकिन तुम सिद्धांत के अनुसार चीज़ों को कर सकते हैं, आचरण कर सकते हो, और लोगों के प्रति व्यवहार कर सकते हो, तो यह भी परमेश्वर-भीरु होने के रूप में गिना जाता है; यह सबसे मौलिक बात है। यदि तुम इसे भी प्राप्त नहीं कर सकते, और अपने आप को रोक नहीं सकते हो, तो तुम्हें बहुत ख़तरा है और तुम काफ़ी भयावह हो। यदि तुम्हें कोई पद दिया जाता है, तो तुम लोगों को दंडित कर सकते हो और उन्हें कठिनाई में डाल सकते हो; फिर तुम किसी भी क्षण मसीह-विरोधी में बदल सकते हो। मसीह-विरोधी बन जाने वाला व्यक्ति किस प्रकार का होता है? क्या वह ऐसा पुरुष या ऐसी स्त्री नहीं जिसे हटा दिया जाएगा? कोई व्यक्ति अच्छा है या बुरा, और उसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए, इसके लिए लोगों के पास व्यवहार के अपने सिद्धांत होने चाहिए; हालाँकि, उस व्यक्ति का परिणाम क्या होगा—वह परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाएगा या फ़िर उसे न्याय और ताड़ना का सामना करना होगा—यह सब देखना परमेश्वर का कार्य है। इसमें इंसान को टांग नहीं अड़ानी चाहिए; परमेश्वर तुम्हें अपनी ओर से पहल करने की अनुमति नहीं देगा। उस व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना है यह देखना परमेश्वर का कार्य है। अगर परमेश्वर ने यह फ़ैसला नहीं किया है कि इस तरह के लोगों का परिणाम कैसा होगा, उन्हें निकाला नहीं है और उन्हें दंडित नहीं किया है और ऐसे लोगों को बचाया जा रहा है, तब तुमको धैर्य रखकर, प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए; तुम्हें ऐसे लोगों के परिणाम निर्धारित करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, न ही उन पर नकेल कसने या दंडित करने के लिए मानवीय साधनों का उपयोग करना चाहिए। तुम या तो ऐसे लोगों के साथ निपट सकते हो और कांट-छांट कर सकते हो या फ़िर दिल खोलकर तुम इनके साथ तहेदिल से सहभागिता करके इनकी मदद कर सकते हो। लेकिन अगर तुम इन लोगों को दंडित करने, उनका बहिष्कार करने और उन्हें दोषी ठहराने पर विचार करते हो, तो तुम मुश्किल में पड़ जाओगे। क्या ऐसा करना सत्य के अनुरूप होगा? ऐसे ख्याल अत्यधिक आवेशपूर्ण होने के परिणामस्वरूप आएंगे; ऐसे विचार शैतान से आते हैं और मनुष्य के आक्रोश के साथ ही मानवीय ईर्ष्या और घृणा से उत्पन्न होते हैं। ऐसा आचरण सत्य के अनुरूप नहीं है। यह कुछ ऐसा है जिसके कारण तुम्हें दंड मिल सकता है, यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं है। क्या तुम इसलिए लोगों को दंडित करने के कई तरीके सोचने में सक्षम हो, क्योंकि वे तुम लोगों की पसंद के अनुरूप नहीं हैं या उनका तुम्हारे साथ तालमेल नहीं बैठता? क्या तुम लोगों ने पहले कभी इस तरह की चीज़ें की हैं? तुमने इस तरह की कितनी चीज़ें की हैं? क्या तुमने हमेशा अप्रत्यक्ष रूप से लोगों को नीचा दिखाते हुए, उनको टोकते हुए टिप्पणियां नहीं कीं और उन पर व्यंग्य के बाण नहीं चलाये? (हाँ।) जब तुम इस तरह की चीज़ें कर रहे थे, तब तुम लोगों की स्थितियाँ क्या थीं? उस समय, तुम अपनी भड़ास निकालकर खुशी महसूस करते थे; तब तुम्हारी हर बात मानी जाती थी। हालांकि, उसके बाद, तुमने आत्मचिंतन किया, "मैंने बहुत घिनौना काम किया है। मैं परमेश्वर का भय नहीं मानता और मैंने उस व्यक्ति के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।" अपने अंतरतम में, क्या तुमने खुद को दोषी महसूस किया? (हाँ।) हालांकि, तुम लोग परमेश्वर का भय नहीं मानते हो, लेकिन तुम्हारे अंदर ज़मीर की कुछ समझ है। तो, क्या तुम अब भी भविष्य में इस तरह की चीज़ें करने में सक्षम हो? क्या जब लोग तुम्हें नापसंद होते हैं, या जब उनसे तालमेल नहीं बैठता, या जब वे तुम्हारी बात नहीं मानते, नहीं सुनते तो तुम उनपर हमला करने और उनसे बदला लेने, उनका जीना मुहाल करने और उन्हें यह दिखा देने के बारे में सोच सकते हो कि सर्वेसर्वा तुम्हीं हो? क्या तुम ऐसा कहोगे, "अगर तुम वैसा नहीं करोगे जैसा मैं चाहता हूँ, तो मैं तुम्हें दंडित करने का मौक़ा ढूंढ लूँगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा। कोई जान भी नहीं पाएगा और मैं तुम्हें अपने क़दमों पर झुका दूँगा; मैं तुम्हें अपनी ताकत दिखा दूँगा। उसके बाद, कोई भी मेरे साथ बखेड़ा करने की हिम्मत नहीं करेगा!" मुझे बताओ : जो व्यक्ति ऐसी चीज़ें करता है, उसके पास किस तरह की इंसानियत है? उसकी इंसानियत को देखा जाए तो वह व्यक्ति दुर्भावनापूर्ण है। सत्य के साथ उसे मापा जाए तो दिखेगा कि वह परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं रखता। अपनी कथनी और करनी में, उसके पास कोई सिद्धांत नहीं होते हैं; वह निर्दयतापूर्वक कार्य करता है और मनमानी करता है। परमेश्वर-भीरु होने के संदर्भ में, क्या ऐसे लोगों ने जीवन-प्रवेश हासिल किया है? बिल्कुल नहीं; इसका जवाब "नहीं" है, एक सौ प्रतिशत। जब परमेश्वर के प्रति श्रद्धा की बात आए, तो यदि किसी व्यक्ति ने कोई प्रविष्टि हासिल न की हो, तो क्या यह कहा जा सकता है कि इस व्यक्ति के हृदय का एक अंश मात्र भी परमेश्वर का सम्मान नहीं करता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ' से उद्धृत

यदि तुम्हें पता है कि दूसरों के साथ तुम्हारा व्यवहार अनुचित है, तो तुम ऐसा व्यवहार क्यों करते हो? किस वजह से तुम ऐसा व्यवहार कर रहे हो? तुम क्या सोच रहे हो? तुम लोगों से अनुचित व्यवहार क्यों कर रहे हो? क्या इसमें और भी कुछ है? तुम कहते हो, ”मैं उनका सम्मान नहीं करता। मैं उनसे बेहतर हूँ। मैं उनके साथ उचित व्यवहार नहीं करना चाहता। मैं उन्हें हरा देना चलना चाहता हूँ।” यहाँ क्या हो रहा है? यह एक अभिमानी स्वभाव है। एक अभिमानी स्वभाव तुम्हारे भीतर इन अवस्थाओं को जन्म देता है – तुम उस व्यक्ति के साथ उचित व्यवहार नहीं करना चाहते, न ही तुम उसका निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहते हो, तुम उसकी अच्छी चीजों के बारे में तो बात करना ही नहीं चाहते। जब कोई काम करना होता है, तो तुम उसे उस काम के लिए नहीं चुनना चाहते, क्योंकि तुम मन ही मन उसका सम्मान नहीं करते। जब तुम्हारे अंदर ऐसी अवस्था घर कर गयी हो, तो क्या तुम उस व्यक्ति के बारे में आसानी से अपनी राय सुधार सकते हो? नहीं सुधार सकते। इसलिए, इंसान का स्वभाव कई अवस्थाओं को जन्म देता है और ये अवस्थाएँ तुम्हारे अंदर ही होती हैं, तुम्हें नियंत्रित कर रही होती हैं, तुम्हारे कार्यों को, तुम्हारी बातचीत को, तुम्हारे विचारों को और लोगों से तुम्हारे पेश आने के अंदाज को नियंत्रित कर रही होती हैं—ये तुम्हारे पूरे अस्तित्व को नियंत्रित कर रही होती हैं। ये अवस्थाएँ पैदा कैसे होती हैं? ये अवस्थाएँ तुम्हारे स्वभाव से पैदा होती हैं–दरअसल, तुम्हारा स्वभाव तुम्हें नियंत्रित करता है, तुम्हारी अवस्था नहीं। ऐसा स्वभाव तुम्हें सत्य के विरुद्ध कर देता है। इसलिए, यदि इस स्वभाव को सुधारने के लिए सत्य का उपयोग करके तुम अपनी अवस्था को न बदलो, तो तुम कभी भी अपने शैतानी स्वभाव से मुक्त नहीं हो सकते। तो फिर तुम ऐसी अवस्था को कैसे पलट सकते हो? तुम्हें परमेश्वर को स्वीकारने के लिए तैयार रहना चाहिए, उससे प्रार्थना करनी चाहिए, समस्या के सार को अच्छी तरह से समझना चाहिए और परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि वो तुम्हें अनुशासित करे, तुम्हारा निपटारा करे, तुम्हें अभिपुष्टि और समझदारी प्रदान करे। तुम्हारे अंदर सहयोग करने और देह-सुख त्यागने की इच्छा होनी चाहिए। उससे कहो: "मैं फिर कभी ऐसा व्यवहार नहीं करूँगा। हो सकता है कि उस व्यक्ति में कम क्षमता हो, लेकिन मैं उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार करूँगा। यदि वह व्यक्ति किसी कार्य विशेष के लिए अनुकूल है, तो मैं उसे वही कार्य दूँगा। यदि किसी अन्य व्यक्ति से मेरे अच्छे संबंध हैं लेकिन वह व्यक्ति कार्य विशेष के लिए अनुकूल नहीं है, तो मैं उसे वह कार्य नहीं सौंपूँगा। मैं वह कार्य पहले वाले व्यक्ति को दूंगा।" तो क्या इस तरह से तुम्हारी अवस्था में बदलाव नहीं आता है? यानी, अपने पिछले व्यवहार को बदलकर, तुमने अपनी अवस्था के संभावित परिणामों को सुधार लिया है। क्या यह अभ्यास का ही एक पहलू नहीं है? तो, तुम इस प्रकार का अभ्यास कैसे कर सकते हो? यदि तुम सहयोग न करो और अपनी व्यक्तिपरक इच्छा का त्याग न करो, तो क्या तुम ये परिणाम प्राप्त कर सकते हो? बिल्कुल नहीं। इसलिए सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है। तुम्हें पूरी तरह से सहयोग करना चाहिए, सत्य का पालन करने में सक्षम होना चाहिए और सत्य के लिए आज्ञाकारिता का दृष्टिकोण रखकर, दृढ़ता से उसका पालन करना चाहिए—तभी तुम अपनी व्यक्तिपरक इच्छा और व्यक्तिगत अवस्था को त्याग पाओगे और धीरे-धीरे तुम्हारी अवस्था में सुधार आ जाएगा। हो सकता है तुम किसी को नीची नजर से देखो, वह तुम्हारी अवस्था है—फिर भी, यदि तुम उस अवस्था के सहारे नहीं जीते, बल्कि उस व्यक्ति के लिए उस कार्य की व्यवस्था करते हो जो वह कर सकता है और उसके साथ उचित व्यवहार करते हो, तो फिर जब भी उस व्यक्ति का उल्लेख किया जाएगा, तो तुम्हारी अंतरात्मा में सुकून होगा और तुम महसूस करोगे कि शुक्र है तुमने कोई गलत काम नहीं किया। तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो। कुछ समय के बाद, उस व्यक्ति के बारे में तुम्हारी राय बदल जाएगी। ऐसा कैसे होता है? यह परमेश्वर कर रहा है। धीरे-धीरे तुम पर सत्य अपना प्रभाव दिखाने लगता है, तुम्हारी अवस्था बदलने और पलटने लगती है। शुरू-शुरू में तुम्हें दिक्कत आती है; जब तुम उस व्यक्ति का उपयोग कर लेते हो, तो जब भी तुम उस व्यक्ति को देखते हो, तुम्हारा मन घूमने लगता है और तुम्हें महसूस होता है तुमने अपनी निष्ठा गँवा दी। उसका उपयोग कर लेने के बावजूद, तुम उससे ज्यादा बात नहीं करना चाहते, मन ही मन तुम अभी भी उसे नीची नजर से देखते हो। तुम्हारी अवस्था अभी भी पूरी तरह से बदली नहीं है। इसका अर्थ यह है कि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव की जड़ें अभी भी शेष हैं। इतनी नन्हीं-सी अवस्था इतनी पीड़ा दे सकती है— क्या यह स्वभाव की समस्या नहीं है? यह मनुष्य के स्वभाव सार की समस्या है। धीरे-धीरे जब तुम्हारी अवस्था बदलने लगती है, तो तुम उस व्यक्ति के साथ अधिक बोलने लगते हो, अधिक संगति करते हो तथा उसे और अधिक समझने लगते हो; तुम्हें उसकी क्षमता दिखने लगती है और तुम्हें पता लगता है कि दअसल वही उस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति है। तब तुम धीरे-धीरे अपनी नीचता और बेशर्मी को पहचानने लगते हो, तुम्हारे वर्तमान क्रिया-कलाप एवं उस व्यक्ति के साथ तुम्हारा व्यवहार निष्पक्ष है और सत्य के अनुरूप है, और तब तुम्हारे दिल को सुकून मिलता है। लेकिन यह तो केवल शुरुआत है। मगर जब वही समस्या दोबारा तुम्हारे सामने लाएगी, तो जरूरी नहीं कि इस समस्या को सुलझाने के लिए तुम वही तरीका फिर से उपयोग में ला पाओ जो तुमने पहले वाले व्यक्ति के लिए उपयोग किया था। अलग तरीके, अलग अवस्थाएँ हो सकती हैं या वातावरण अलग हो सकता है, जैसे कि लोग, मामले या चीजें अलग हो सकती हैं और इस बात की परीक्षा ले सकती हैं कि तुम्हें सत्य कितना प्रिय है, अपने भ्रष्ट स्वभाव और अपनी इच्छा का त्याग करने के लिए तुम्हारा संकल्प कितना दृढ़ है। ये परमेश्वर के परीक्षण हैं। लोगों के साथ हर समय अपने व्यवहार में, चाहे वे लोग कोई भी हों, चाहे उनके साथ तुम्हारे संबंध अच्छे हों या बुरा हों, वे तुम्हारे करीबी हों या न हों, वे तुम्हारी खुशामद करें या न करें, और चाहे उनकी क्षमता कैसी भी हो—अगर तुम उनके साथ उचित और सही व्यवहार करते हो, तो तुम्हारी अवस्था पूरी तरह से बदल जाएगी। जब लोगों के साथ तुम्हारा व्यवहार तुम्हारी कल्पनाओं, भावनाओं या तुम्हारी उत्तेजना पर आधारित नहीं होता, तो तुम सत्य के इस पहलू को हासिल कर लोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रष्‍ट स्‍वभाव को दूर करने का मार्ग' से उद्धृत

कलीसिया के अगुआ होने के नाते, तुम लोगों को मालूम होना चाहिए कि प्रतिभा का पता कैसे लगाएं, उसे कैसे बढ़ावा दें, और कैसे प्रतिभाशाली लोगों से ईर्ष्या न करें। इस प्रकार, तुम अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभा सकोगे, अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर सकोगे; तुम निष्ठावान बनने के लिए अपना पूरा प्रयास भी कर सकोगे। कुछ लोग हमेशा इस बात डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनकी प्रसिद्धि को चुरा लेंगे और उनसे आगे निकल जाएंगे, अपनी पहचान बना लेंगे जबकि उनको अनदेखा कर दिया जाएगा। इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह अपने से ज़्यादा सक्षम लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या ऐसा व्यवहार स्वार्थी और घिनौना नहीं है? यह किस तरह का स्वभाव है? यह दुर्भावनापूर्ण है! सिर्फ़ खुद के बारे में सोचना, सिर्फ़ अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करना, दूसरों के कर्तव्यों पर कोई ध्यान नहीं देना, और सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचना और परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचना—इस तरह के लोग बुरे स्वभाव वाले होते हैं, और परमेश्वर के पास उनके लिये कोई प्रेम नहीं है। अगर तुम वाकई परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने में सक्षम हो, तो तुम दूसरे लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार कर पाने में सक्षम होगे। अगर तुम किसी व्यक्ति की सिफ़ारिश करते हो, और वह व्यक्ति एक प्रतिभाशाली इंसान बन जाता है, जिससे परमेश्वर के घर में एक और प्रतिभाशाली व्यक्ति का प्रवेश होता है, तो क्या ऐसा नहीं है कि तुमने अपना काम अच्छी तरह पूरा किया है? तब क्या तुम अपने कर्तव्य के निर्वहन में वफ़ादार नहीं रहे हो? यह परमेश्वर के समक्ष एक अच्छा कर्म है, यह एक तरह का विवेक और सूझ-बूझ है जो इंसानों में होनी चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

क्या तुम्हारे दिल में इस तरह की सोच पलती है? जब तुम किसी के बारे में सोचते हो, तो पहले तुम उसकी कमज़ोरियों के बारे में ही सोचते हो, यही सोचते हो कि वह किस तरह से भ्रष्ट है। यही बात है न? अगर तुम इसी तरह से सोचते रहे, तो तुम कभी भी किसी के साथ सामान्य तरीके से काम नहीं कर पाओगे। जब तुम किसी व्यक्ति के बारे में सोचते हो, तो तुम्हें पहले यह विचार करना चाहिए कि वह व्यक्ति परमेश्वर में सच्चा विश्वास करता है या नहीं और उसके पास क्या क्षमताएं हैं। अगर वह व्यक्ति सत्य को स्वीकार कर सकता है, वह उदार और सहनशील है, और अगर तुम जो बात कह रहे हो वो सही है और वह उसे स्वीकार करने और उससे सही तरीके से निपटने में सक्षम है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य का अनुसरण करता है। अगर तुम्हें पता चलता है कि उस व्यक्ति में खामियां हैं और अगर तुम इसके बारे में उसे नहीं बताते हो और वह भी इनसे अनजान रहता है, तो बाद में वह इसके लिए तुम्हें ही दोषी ठहराएगा। हालांकि, जब तुम इन कमियों के बारे में उसे बताते हो और वह न सिर्फ़ तुमसे नफ़रत नहीं करता है बल्कि तुम्हें धन्यवाद देता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो सचमुच सत्य का अनुसरण करता है, जो वास्तव में और सही मायनों में उद्धार की खोज करता है, वह एक नेक इंसान बनने और जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए तैयार है। अगर ऐसा व्यक्ति किसी के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह रखता है या अगर कोई उसे नुकसान पहुँचाता है तो वह उस व्यक्ति के प्रति कुछ हद तक नफ़रत का भाव रखता है, फिर भी ऐसा केवल कुछ समय के लिए ही होगा। इसके बाद, जब वह थोड़ा आत्मचिंतन करेगा और खुद को जानने की कोशिश करेगा, तो वह खुद से नफ़रत करेगा और खुद को ही कोसेगा। यहां तक कि वह दूसरे व्यक्ति से माफ़ी मांगने के लिए भी तैयार होगा। परमेश्वर के सच्चे विश्वासी ऐसे ही होते हैं। वे हमें माफ़ करने में सक्षम हैं, तो हमें भी उन्हें माफ़ करने में सक्षम होना चाहिए। हालांकि, हो सकता है कि वे कुछ समय की कमज़ोरी के कारण हमें माफ़ न करें, तब भी हमें अंदर से उन्हें माफ़ कर देना चाहिए। अगर हम लोगों को माफ़ नहीं कर पाते हैं, तो हम उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। इसके अलावा, अगर कोई तुम्हारे साथ कुछ बुरे काम करता है या तुम्हारे बारे में आलोचना के लहज़े में बात करता है, तो तुम्हें उस व्यक्ति को पश्चाताप करने और बदलने का एक मौक़ा देना चाहिए। क्या तुम ऐसा कह सकते हो कि उस व्यक्ति का बर्ताव हमेशा ऐसा ही रहेगा? क्या वह हमेशा के लिए इसी भ्रष्टता के साथ काम करता रहेगा? अगर तुम पूरे यकीन के साथ इस बात की पुष्टि कर सकते हो, तो तुम उस व्यक्ति को आँक रहे होगे और उसे सीमाओं में बाँध रहे होगे। भले ही ऐसा हो सकता है कि वह अभी तुम्हारी आलोचना करता हो, तुमसे नफ़रत करता हो और तुम्हारे बारे में कुछ पूर्वाग्रह रखता हो, लेकिन चूँकि वह सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास रखता है, और सत्य का अनुसरण करना चाहता है, इसलिये, जल्दी ही उसके अंदर की भ्रष्टता में बदलाव आएगा और फिर वह दूर हो जाएगी। हमें इसी तरह से मामले को देखना चाहिये, हमें मसलों को विकास के नज़रिये से देखना चाहिये। हमें किसी की कमज़ोरियों को लेकर नहीं बैठ जाना चाहिए, हमें हमेशा के लिये यह कहकर उसका तिरस्कार नहीं कर देना चाहिए कि यह व्यक्ति तो अब जीवन भर ऐसा ही रहेगा, या यह व्यक्ति तो ऐसा ही है। ऐसा करना उसे आँकना और एक सीमा में बाँध देना होगा! लोगों को बचाने के लिये परमेश्वर ने ऐसा कभी नहीं कहा है, यह कभी नहीं कहा कि चूँकि इंसान इस हद तक भ्रष्ट हो चुका है, इसलिये उसे बचाना बेकार है, कि बस यही मानवजाति का अंत है। परमेश्वर इन चीज़ों को इस ढंग से बिल्कुल नहीं देखता। इसलिये, हम सभी लोग अब सत्य का अनुसरण कर रहे हैं। हम सब लोग चाहते हैं कि हम सत्य का अनुसरण करें। हम लोग मानते हैं कि हम अगर, कम से कम, अपने लक्ष्य पर टिके रहें, तो कुछ सालों में हमारे अंदर थोड़ा-बहुत बदलाव तो अवश्य आएगा। आख़िरकार हमारा स्वभाव पूरी तरह से बदल जाएगा और हम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कर दिए जाएँगे। तुम सभी लोगों में इस तरह का विश्वास है, है न? चूँकि तुम्हारा विश्वास इस तरह का है, इसलिये तुम्हें मानकर चलना चाहिए कि दूसरों के अंदर भी ऐसा ही विश्वास है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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