52. स्‍वयं के साथ उचित ढंग से व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) निरंतर आत्‍म-चिंतन में संलग्‍न रहना और परमेश्‍वर के वचनों के प्रकाश में स्‍वयं को जानना, और अपनी भ्रष्‍टता तथा अपनी कमियों के सत्‍य को समझना जरूरी है। केवल इसी तरह व्‍यक्ति आत्‍म-ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

(2) केवल सत्‍य को समझकर ही लोग इस बात को साफतौर पर देख और समझ सकते हैं कि उनके पास कुछ भी नहीं है और वे एक दीन-हीन प्राणी के सिवा कुछ नहीं हैं, और केवल इसी तरह वे अहंकार और दंभ से खुद को छुटकारा दिला सकते हैं।

(3) जब लोग मुश्किलों और विफलताओं का सामना कर रहे हों, तब उन्‍हें हताश होकर नहीं बैठ जाना चाहिए। केवल आत्‍म-चिंतन के माध्‍यम से स्‍वयं को जानकर और सत्‍य को समझने का प्रयास करके ही वे स्‍वयं के साथ उचित व्यवहार कर सकते हैं।

(4) केवल परमेश्‍वर के वचनों से न्‍याय और ताड़ना प्राप्‍त करने, काटे-छाँटे जाने और व्‍यवहार किये जाने से, और इस तरह अपने भ्रष्‍ट स्‍वभाव के शोधन को संभव बनाने से ही, लोग सत्‍य का अभ्‍यास कर सकते हैं और मनुष्‍य की तरह का जीवन जी सकते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जब लोग अपनी व्यावहारिक समस्याओं को ठीक से नहीं देख पाते, तो इसका प्रभाव उनके परमेश्वर के ज्ञान पर भी पड़ता है। कुछ लोग, यह जानकर कि वे बहुत खराब क्षमता के हैं या उन्होंने गंभीर अपराध किए हैं, खुद को निराशा के हवाले कर देते हैं और आत्मविश्वास खो देते हैं। वे अब सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कठिनाइयाँ सहने को तैयार नहीं होते, न ही वे अपने स्वभावों को बदलने का प्रयास करते हैं; वे मानते हैं कि वे कभी नहीं बदले। दरअसल, इन लोगों में बदलाव तो आए हैं, लेकिन वे खुद इस तथ्य का पता नहीं लगा पाते। इसके बजाय, वे केवल अपनी गलतियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, और अब परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार नहीं होते। यह न केवल उनके सामान्य प्रवेश में देरी करता है, बल्कि परमेश्वर के बारे में उनकी गलत धारणाओं में वृद्धि भी करता है। इतना ही नहीं, इसका प्रभाव उनकी मंजिलों पर भी पड़ता है। इसलिए, यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर तुम लोगों को बहुत सावधानी से विचार करना चाहिए, ताकि तुम्हें गहरा प्रवेश प्राप्त हो सके और तुम परिवर्तन के वे परिणाम प्राप्त कर सको, जो तुम लोगों को प्राप्त करने चाहिए।

कुछ लोग नकारात्मकता के बीच में होने के बावजूद अपने कर्तव्यों का पालन करते समय अभी भी "परिणाम चाहे जो भी हो, अंत तक वफादार रहने" का रवैया बनाए रख सकते हैं। मैं कहता हूँ कि यह परिवर्तन है, लेकिन तुम लोग स्वयं इसे पहचानने में असमर्थ हो। वास्तव में, अगर तुम खुद को ध्यान से जाँचो, तो तुम देखोगे कि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव का एक हिस्सा पहले ही बदल चुका है; हालाँकि जब तुम खुद को लगातार उच्चतम मानकों से मापोगे, तो तुम न केवल उन्हें पूरा करने में सक्षम नहीं होगे, बल्कि अपने भीतर पहले से आए किसी बदलाव को भी नकार दोगे। यहीं लोग भटक जाते हैं। अगर तुम वास्तव में ऐसे व्यक्ति हो जो सही-गलत में भेद कर सकता है, तो अपने भीतर हुए परिवर्तनों के बारे में खुद को जागरूक करने में कोई बुराई नहीं है; न केवल तुम उन्हें देख सकते हो, बल्कि तुम आगे बढ़ने का अभ्यास का मार्ग भी खोज सकते हो। ऐसा होने पर तुम देखोगे कि अगर तुम कड़ी मेहनत करते हो, तो तुम्हारे पास अभी भी आशा है; तुम देखोगे कि तुम वह नहीं हो, जिसे छुटकारा नहीं मिल सकता। अभी मैं तुम्हें यह बताता हूँ : जो लोग अपनी समस्याओं को सही ढंग से देख सकते हैं, उनके पास आशा है; वे नकारात्मकता से बाहर आ सकते हैं।

तुम सत्य को छोड़ देते हो, क्योंकि तुम सोचते हो कि तुम पहले से ही बचाए जाने से परे हो, इसलिए तुम सबसे मौलिक सत्य भी छोड़ देते हो। शायद ऐसा नहीं है कि तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते, बल्कि तुमने ऐसा करने के अवसर त्याग दिए हैं। अगर तुम सत्य को छोड़ देते हो, तो क्या तुम अभी भी बदल सकते हो? अगर तुम सत्य को छोड़ देते हो, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ है? जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, "स्वभाव में बदलाव की कोशिश करना कभी गलत नहीं होता, चाहे इसे जब भी किया जाए।" क्या तुम इन वचनों को भूल गए हो? फिर भी तुम्हें लगता है कि तुम आशाहीन हो। अगर तुमने अपनी सकारात्मक तलाश खो दी है, तो क्या नकारात्मक चीजें सामने नहीं आएँगी? तो फिर तुम नकारात्मक होने से कैसे बच पाओगे? इस प्रकार, मैं अभी भी तुमसे कहता हूँ : तुम्हें खुद को सही ढंग से देखना चाहिए, और सत्य को नहीं छोड़ना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'खुद को सही ढंग से देखो और सत्य को मत छोड़ो' से

लोग भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करते हैं। यह एक तथ्य है। कोई भी इससे बच या भाग नहीं सकता; उन्हें इस तथ्य का सामना करना ही होता है। यह ऐसा क्यों है? कुछ लोग कहते हैं: "मैं हमेशा अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करता रहता हूँ। मैं इसे कभी नहीं बदल सकता। करने को है क्या? क्या मैं बस ऐसा ही हूँ? क्या परमेश्वर मुझे नापसंद करता है, या मुझसे नफ़रत करता है?" क्या ऐसा दृष्टिकोण सही है? क्या ऐसी सोच सही है? लोगों का स्वभाव भ्रष्ट होता है, और वे अक्सर अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करते हैं, इस बात का यह मतलब नहीं होता कि वे बर्बाद हो चुके हैं, उनमें सुधार संभव नहीं है। लोगों का अक्सर भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना यह साबित करता है कि उनका जीवन शैतान के भ्रष्ट स्वभाव से नियंत्रित होता है, और उनका सार शैतान का ही सार है। लोगों को इस तथ्य को मानना और स्वीकार करना चाहिए। इंसान के प्रकृति-सार और परमेश्वर के सार के बीच अंतर होता है। इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद उन्हें क्या करना चाहिए? जब लोग भ्रष्ट स्वभाव को उजागर कर देते हैं; जब वे देह के भोगों में लिप्त होते और परमेश्वर से दूर हो जाते हैं; या जब परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है जो उनके अपने विचारों के विपरीत होता है, और उनके भीतर शिकायतें पैदा होती हैं, तो उन्हें तुरंत ही खुद को अवगत करा देना चाहिए कि यह कोई समस्या है, और भ्रष्ट स्वभाव है; यह परमेश्वर के खिलाफ़ विद्रोह है, परमेश्वर का विरोध है; इसका सत्य के साथ मेल नहीं है, और परमेश्वर के प्रति यह अभिशाप है। जब लोगों को इन चीज़ों का एहसास होता है, तो उन्हें शिकायत नहीं करनी चाहिए, या नकारात्मक और आलसी नहीं हो जाना चाहिए, और उन्हें परेशान तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए; इसके बजाय, उन्हें अधिक गहरे आत्म-चिंतन और आत्म-ज्ञान के लिए सक्षम हो जाना चाहिए। इसके अलावा, उन्हें अग्रसक्रिय रूप से परमेश्वर के सामने आने में सक्षम होना चाहिए, और निष्क्रिय नहीं बनना चाहिए। उन्हें परमेश्वर की झिड़की और अनुशासन को स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने आने की पहल करनी चाहिए, और तुरंत अपनी स्थिति को पलट देना चाहिए, ताकि वे सत्य और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हो जाएँ, और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकें। इस तरह, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता निरंतर सामान्य होता जाएगा, और साथ ही तुम्हारी अंदरूनी स्थिति भी। तुम भ्रष्ट स्वभावों, भ्रष्टता के सार, और शैतान की भिन्न कुरूप स्थितियों की पहचान एक बढ़ती स्पष्टता के साथ करने में सक्षम होगे। फिर तुम इस तरह की मूर्खतापूर्ण और बचकानी बातें नहीं करोगे जैसे कि "यह शैतान था जो मेरे साथ दख़लंदाजी कर रहा था," या "यह ख़याल शैतान ने मुझे दिया था।" इसके बजाय, तुम्हें भ्रष्ट स्वभावों के बारे में, परमेश्वर के प्रति लोगों के विरोध के और शैतान के सार के बारे में, सटीक जानकारी होगी। तुम्हारे पास इन चीज़ों को हल करने का एक अधिक सटीक तरीका होगा, और ये चीज़ें तुम्हें विवश नहीं करेंगी। जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव के एक छोटे से अंश को प्रकट करोगे, या अपराध करोगे, या अपने कर्तव्य को बेपरवाही से निभाओगे, या जब तुम अक्सर खुद को एक निष्क्रिय, नकारात्मक स्थिति में पाओगे, तब भी तुम कमज़ोर नहीं बनोगे और परमेश्वर और उसके उद्धार में विश्वास नहीं खो दोगे। तुम इस तरह की परिस्थितियों के बीच नहीं रहोगे, बल्कि अपने भ्रष्ट स्वभाव का सही ढंग से सामना करोगे, और तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के लिए सक्षम होगे, और, जब कभी तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर होगा, तो तुम तुरंत उसे उलट पाओगे, फ़ौरन परमेश्वर के सामने रहोगे और उसके अनुशासन और फटकार को खोजोगे। न तो तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से, न शैतान के सार से, और न ही तुम अपनी विभिन्न नकारात्मक और निष्क्रिय स्थितियों से नियंत्रित होगे, बल्कि सत्य, उद्धार, और परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके अनुशासन और तिरस्कार की स्वीकृति की तलाश में अपनी आस्था को विकसित करोगे। इस तरह, क्या लोग स्वतंत्र रूप से नहीं जी पाएँगे? यह सत्य का अभ्यास करने और उसे प्राप्त करने का मार्ग है, और वैसे ही, यह उद्धार का मार्ग भी है। भ्रष्ट स्वभावों ने लोगों के भीतर गहरी जड़ें जमा ली हैं; शैतान का सार और उसकी प्रकृति उनके विचारों, व्यवहार और मानसिकता को नियंत्रित करते हैं; फिर भी, सत्य के, परमेश्वर के कार्य के, और उसके उद्धार के होते हुए, इसमें से कोई भी चिंता का विषय नहीं है, और इससे किसी तरह की कठिनाइयाँ सामने नहीं आती हैं। लोगों के भ्रष्ट स्वभावों, या उनकी समस्याओं, या उनकी मजबूरियों के बावजूद, एक मार्ग है जिसे वे अपना सकते हैं। इन चीज़ों को हल करने का एक तरीका है, और इनके हल के लिए अनुरूप सत्य हैं। क्या इस प्रकार उन लोगों के उद्धार की आशा नहीं है?

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

जब लोगों को पता चलता है कि उनकी समस्याएँ कितनी गंभीर हैं तो यह अच्छा है या बुरा? यह अच्छा है। तुम अपनी भ्रष्टता का पता लगाने में जितने अधिक सक्षम होते हो, यह खोज उतनी ही अधिक सटीक होती है, और उतना ही अधिक तुम अपने स्वयं के सार के बारे में जान सकते हो, फिर उतनी ही अधिक संभावना होती है कि तुम्हें बचा लिया जाएगा और तुम उद्धार के और अधिक करीब आ जाओगे; जितना ही अधिक तुम अपनी समस्याओं का पता लगाने में अक्षम होते हो, उतना ही अधिक तुम सोचते हो कि तुम अच्छे व्यक्ति, खासे महान व्यक्ति हो, फिर तुम उद्धार के पथ से और अधिक दूर होते जाते हो, और तुम अब भी बड़े खतरे में होते हो। जो भी व्यक्ति सारा दिन स्वयं का दिखावा करने में बिताता है—अपनी उपलब्धियों को घमंड से दिखाना, कहना कि वे वाक्पटु, तर्कशील हैं, कि वे सत्य को समझते हैं और सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, और त्याग करने में सक्षम हैं—वह विशेष रूप से छोटे कद का व्यक्ति होता है। किस प्रकार के व्यक्ति में उद्धार की अधिक आशा होती है, एवं उद्धार के पथ पर चलने में सक्षम होता है। वे जो असल में अपना भ्रष्ट स्वभाव जानते हैं। उनका ज्ञान जितना अधिक अथाह होता है, वे उद्धार के उतने ही अधिक पास आ जाते हैं। अपने भ्रष्ट स्वभाव को जानना, जानना कि तुम कुछ नहीं, बेकार हो, कि तुम जीते-जागते शैतान हो—जब तुम सच में अपना सार जानते हो, तब यह गंभीर समस्या नहीं होती। यह अच्छी बात है, बुरी बात नहीं है। क्या कोई है जो स्वयं को जितना अधिक जानता है, उतना ही अधिक नकारात्मक होता जाता है, मन ही मन सोचते हुए : "सब समाप्त हो गया, मुझ पर ईश्वर के न्याय और दंड की गाज़ गिरी है, यह सज़ा एवं प्रतिशोध है, परमेश्वर मुझे नहीं चाहता एवं मेरा उद्धार होने की कोई आशा नहीं है"? क्या इन लोगों को ऐसे भ्रम होते हैं? असल में, लोगों को जितनी अधिक पहचान होगी कि वे कितने निराशाजनक हैं, उनके लिए आशा उतनी ही अधिक होगी; उन्हें नकारात्मक नहीं होना चाहिए एवं हार नहीं माननी चाहिए। स्वयं को जानना अच्छी बात है—यह वह रास्ता है जिस पर उद्धार के लिए चलना ही होगा। यदि तुम अपने ही भ्रष्ट स्वभाव से एवं अपने सार से, जो ईश्वर के प्रति अपने विरोध में बहुविध है, पूर्णतः अनभिज्ञ हो, एवं यदि तुम्हारे पास परिवर्तन की अब भी कोई योजना नहीं हैं, तो तुम संकट में हो; ऐसे लोग पहले ही सुन्न हो चुके हैं, वे मृत हैं। क्या मृतक को पुनः जीवित किया जा सकता है? बिल्कुल नहीं, वे पहले ही मृत हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानकर ही तुम सत्‍य की खोज कर सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उनकी उम्र कितनी है, वे किस तरह के वातावरण में पैदा हुए हैं या वे कितने प्रतिभाशाली हैं। बल्कि वह सत्य के प्रति लोगों के रवैये के आधार पर उनसे व्यवहार करता है और यह रवैया उनके स्वभाव से जुड़ा होता है। यदि सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया सही है, स्वीकृति और विनम्रता का है, तो भले ही तुम्हारी क्षमता कम हो, परमेश्वर फिर भी तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हें कुछ न कुछ हासिल करने देगा। अगर तुम्हारे पास अच्छी क्षमता है लेकिन तुम हमेशा अभिमानी बने रहते हो, निरंतर यह सोचते हो कि तुम ही सही हो और हमेशा दूसरों की कही किसी भी बात को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक रहते हो, और हमेशा प्रतिरोध करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे अंदर काम नहीं करेगा। परमेश्वर यही कहेगा कि तुम्हारा स्वभाव बुरा है और तुम कुछ भी पाने के लायक नहीं हो। परमेश्वर उस चीज़ को भी ले लेगा जो कभी तुम्हारे पास थी। इसे ही उजागर किया जाना कहते हैं। साफ तौर पर तुम शून्य हो, हर काम में अनाड़ी हो, फिर भी तुम्हें लगता है कि तुम बहुत कुशल हो, कुछ भी कर सकते हो और हर मामले में दूसरों से बेहतर हो। तुम कभी भी दूसरों के सामने अपने दोषों या अपनी कमियों की चर्चा नहीं करते, न ही तुम उन्हें अपनी कमजोरियाँ और नकारात्मकता दिखाते हो। तुम हमेशा अपनी योग्यता का दिखावा करते हो और दूसरों पर झूठी छाप छोड़ते हो, जिससे उन्हें लगता है कि तुम हर चीज में निपुण हो, तुम में कोई कमजोरी नहीं है, तुम्हें किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है, तुम्हें दूसरों की राय सुनने की कोई आवश्यकता नहीं है, अपनी कमजोरियों को दूर करने के लिए दूसरों की क्षमता से सीखने की आवश्यकता नहीं है, तुम उन्हें यह दिखाने का प्रयास करते हो कि तुम हमेशा दूसरों से बेहतर ही रहोगे। यह किस तरह का स्वभाव है? (अहंकारी स्वभाव।) ऐसा व्यक्ति दयनीय जीवन जीता है। क्या वह वास्तव में धनी होता है? नहीं, वह धनी नहीं होता; वह न तो नई चीजें सीखता है और न ही उन्हें स्वीकार करता है। अंदर से वह बहुत मुरझाया हुआ, सीमित और निर्धन होता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी चीज के पीछे के सिद्धांतों को नहीं समझता, सिद्धांतों पर पकड़ नहीं बना सकता, उसे परमेश्वर की इच्छा की कोई समझ नहीं होती, वह केवल नियमों से चिपका रहता है और उनके शाब्दिक अर्थ को जानने के लिए ही खुद को खपाता रहता है। इसका नतीजा यह होता है कि वह सीमित परिणाम ही प्राप्त कर पाता है। इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव खराब होता है।

जब तुम लोग अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दूसरों के साथ समन्वय करते हो, तो क्या तुम अलग-अलग राय स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हो? क्या तुम दूसरों की राय स्वीकार कर पाते हो? (मैं पहले अपने ही विचारों से चिपका रहता था, लेकिन जब परमेश्वर ने ऐसी स्थितियों की व्यवस्था की जिसमें मुझे दूसरों के साथ काम करने का मौका मिला, तो मैंने देखा कि जब सभी लोग मिलजुल कर चीजों पर चर्चा करते हैं, तो आम तौर पर उसका परिणाम सही होता है, और कई बार तो ऐसा हुआ कि मेरा अपना ही दृष्टिकोण गलत था या उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। तब मुझे समझ में आया कि दूसरों के साथ सद्भावपूर्ण ढंग से काम करना कितना महत्वपूर्ण होता है।) तुमने इससे क्या सीखा? क्या तुम लोगों को लगता है कि कोई भी पूर्ण है? लोग चाहे जितने शक्तिशाली हों, या चाहे जितने सक्षम और प्रतिभाशाली हों, फिर भी वे पूर्ण नहीं हैं। लोगों को यह मानना चाहिए; यह तथ्य है। यह हर उस व्यक्ति का सबसे उपयुक्त रवैया भी है, जो अपनी शक्तियों और फायदों या दोषों को सही ढंग से देखता है; यह वह तार्किकता है जो लोगों के पास होनी चाहिए। ऐसी तार्किकता के साथ तुम अपनी शक्तियों और कमज़ोरियों के साथ-साथ दूसरों की शक्तियों और कमज़ोरियों से भी उचित ढंग से निपट सकते हो, और इसके बल पर तुम उनके साथ सौहार्दपूर्वक कार्य कर पाओगे। यदि तुम सत्य के इस पहलू से सन्नद्ध हो और इसकी वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो, तो तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ सौहार्दपूर्वक रह सकते हो, एक-दूसरे की खूबियों का लाभ उठाकर अपनी किसी भी कमज़ोरी की भरपाई कर सकते हो। इस प्रकार, तुम चाहे जिस कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हो या चाहे जो कार्य कर रहे हो, तुम सदैव उसमें श्रेष्ठतर होते जाओगे और परमेश्वर का आशीष प्राप्त करोगे। यदि तुम हमेशा सोचते हो कि तुम बहुत कुशल हो और दूसरे तुम्हारी तुलना में बदतर हैं, यदि तुम हमेशा अपनी राय को अंतिम राय मनवाना चाहते हो, तो इससे परेशानी होगी। हो सकता है कोई व्यक्ति सही बात कह रहा हो, लेकिन तुम्हें लगता है, "भले ही उसने जो कहा वह सही है, अगर मैं उसकी बात मान लूँ, तो दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मैं उसके जितना कुशल नहीं हूँ? मैं उससे सहमत नहीं हो सकता। मुझे कोई ऐसा रास्ता ढूँढना होगा जिससे कि दूसरों को पता न चले कि मैं उसकी सलाह मान रहा हूँ, लोगों को यही लगना चाहिए कि मैं उस काम को अपने तरीके से ही कर रहा हूँ; तब मेरे बारे में लोगों की राय अच्छी होगी।" यदि तुम हर समय लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार करोगे, तो क्या तुम इसे एक सामंजस्यपूर्ण सहयोग कह सकते हो? इसके दुष्प्रभाव क्या होंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोगों को तुम्हारी सच्चाई पता चल जाएगी। लोग कहेंगे कि तुम बहुत चालाक हो, तुम सत्य के अनुसार काम नहीं करते और तुम बेईमान हो। हर कोई तुमसे घृणा करेगा और तुम्हारी स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम्हें त्याग दिया जाएगा। परमेश्वर उस व्यक्ति को किस दृष्टि से देखता है जिसे हर कोई त्याग देता है? जिस व्यक्ति को हर कोई त्याग देता है, उसके बारे में परमेश्वर क्या सोचता है? परमेश्वर भी उससे घृणा करता है। वह ऐसे व्यक्ति से घृणा क्यों करता है? हो सकता है कि अपने कर्तव्य को पूरा करने के उसके प्रयास सच्चे हों, लेकिन यह किस तरह का दृष्टिकोण है? परमेश्वर को इससे घृणा है। ऐसे व्यक्ति ने परमेश्वर के सामने जिस तरह का स्वभाव प्रकट किया गया है, उससे परमेश्वर को उस व्यक्ति के दिल और दिमाग में जो कुछ है उससे और जो भी उसके इरादे हैं, उन सबसे घृणा हो जाती है; परमेश्वर को यह सब घिनौना और दुष्टतापूर्ण लगता है। अपने लक्ष्य को पाने और दूसरों की प्रशंसा प्राप्त करने के लिए बेहद अवांछनीय तरीकों और चालबाजियों का इस्तेमाल करने वाले व्यवहार से परमेश्वर को नफरत है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

किसी भी व्यक्ति को स्वयं को पूर्ण या प्रतिष्ठित और कुलीन या दूसरों से भिन्न नहीं समझना चाहिए; यह सब मनुष्य के अभिमानी स्वभाव और अज्ञानता से उत्पन्न होता है। हमेशा अपने तुम को विशिष्ट समझना—यह एक अभिमानी स्वभाव है; कभी भी अपनी कमी को स्वीकार नहीं कर पाना, और कभी भी अपनी भूलों एवं असफलताओं का सामना नहीं कर पाना—अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; वह कभी भी दूसरों को अपने से ऊँचा नहीं होने देता है, या अपने से बेहतर नहीं होने देता है—ऐसा उसके अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; दूसरों को खुद से श्रेष्ठ या ताकतवर न होने देना—यह एक अहंकारी स्वभाव के कारण होता है; कभी दूसरों को किसी भी विषय पर अपने से बेहतर विचार, सुझाव और दृष्टिकोण न रखने देना, और, ऐसा होने पर नकारात्मक हो जाना, बोलने की इच्छा न रखना, व्यथित और निराश महसूस करना, तथा परेशान हो जाना—ये सभी चीजें उसके अभिमानी स्वभाव के ही कारण होती हैं। अभिमानी स्वभाव तुमको अपनी प्रतिष्ठा को सँजोने वाला बना सकता है, दूसरों के मार्गदर्शन को स्वीकार करने, अपनी कमियों का सामना करने, तथा अपनी असफलताओं और गलतियों को स्वीकार करने में असमर्थ बना सकता है। इसके अतिरिक्त, जब कोई व्यक्ति तुमसे बेहतर होता है, तो यह तुम्हारे दिल में उस व्यक्ति के प्रति घृणा और जलन पैदा कर सकता है, और तुम स्वयं को विवश महसूस कर सकते हो, कुछ इस तरह कि अब तुम्हारे कर्तव्य निभाना नहीं चाहते और इसे करने में लापरवाह हो जाते हो। अभिमानी स्वभाव के कारण तुम्हारे अंदर ये व्यवहार और आदतें उत्पन्न हो जाती हैं। यदि तुम लोग थोड़ा-थोड़ा करके इन सभी चीजों में अंर्तदृष्टि हासिल करने में सक्षम हो जाते हो, और इनकी समझ विकसित कर लेते हो, तथा इनकी गहराई में उतरते हो; इसके बाद अगर तुम धीरे-धीरे इन विचारों तथा समझ तथा यहाँ तक कि इन व्यवहारों को त्यागने में सक्षम हो जाते हो, और इनसे विवश नहीं होते हो; और यदि अपना कर्तव्य पालन करते समय तुम अपने लिए सही पद प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हो, तथा सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो, एवं उस कर्तव्य का निर्वाह करते हो जो तुम कर सकते हो तथा जो तुम्हें करना चाहिए; तो कुछ समय के बाद, तुम अपने कर्तव्यों का बेहतर ढंग से निर्वाह करने में सक्षम हो जाओगे। यह सत्य-वास्तविकता में प्रवेश है। यदि तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर पाते हो, तो दूसरों को प्रतीत होगा कि तुममें मानवीय समानता है, और लोग कहेंगे, "यह व्यक्ति अपने पद के अनुसार आचरण करता है, और वो अपना कर्तव्य बुनियादी तरीके से निभा रहा है। ऐसे लोग अपना कर्तव्य निभाने में स्वाभाविकता पर, जोश पर, या अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव पर भरोसा नहीं करते। वे संयम से कार्य करते हैं, उनके पास एक दिल है जो परमेश्वर को पूजता है, उन्हें सत्य से प्यार है, और उनके व्यवहार और भावों से यह पता चलता है कि उन्होंने अपने सुखों और प्राथमिकताओं का त्याग कर दिया है।" ऐसा आचरण करना कितना अद्भुत है! ऐसे अवसर पर जब दूसरे तुम्हारी कमियों को सामने लाते हैं, तो तुम न केवल उन्हें स्वीकार करने में सक्षम होते हो, बल्कि तुम आशावादी हो तथा अपनी कमियों एवं दोषों का आत्मविश्वास के साथ सामना करते हो। तुम्हारी मनोस्थिति बिल्कुल सामान्य है, एवं अत्याधिकता और जोशीलेपन से मुक्त है। क्या मानवीय समानता का होना यही नहीं होता? केवल ऐसे लोगों में ही अच्छी समझ होती है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'व्यक्ति के आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत' से उद्धृत

कुछ लोग हैं जो कहते हैं, "मैं बहुत अच्छा व्यक्ति हूँ; मैंने परमेश्वर के विरोध में कुछ नहीं किया है, और मैंने उसके लिए बहुत दुख सहे हैं। वह फिर भी मेरी काट-छाँट क्यों करता है और मुझसे इस तरह क्यों निपटता है? परमेश्वर मुझे कभी भी क्यों स्वीकार नहीं करता या मेरा उत्थान क्यों नहीं करता?" कुछ दूसरे लोग कहते हैं, "मैं एक सीधा-सच्चा व्यक्ति हूँ; मैंने परमेश्वर में तब से विश्वास किया है जब मैं गर्भ में था, और मैं अब भी उसमें विश्वास करता हूँ। मैं कितना शुद्ध हूँ! परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए मैंने अपने परिवार का त्याग कर दिया और अपनी नौकरी छोड़ दी, और मैं अब भी सोचता हूँ कि परमेश्वर मुझे कितना प्यार करता है। अब परमेश्वर लोगों को बहुत प्यार करता प्रतीत नहीं होता, और मैं दरकिनार कर दिया गया और उससे निराश और हताश महसूस करता हूँ।" ये लोग क्या गलती कर रहे हैं? वे अपनी सही जगह पर बने नहीं रहे; वे नहीं जानते कि वे कौन हैं, और वे हमेशा महसूस करते हैं कि वे बहुत आदरणीय हस्ती हैं, जिनका परमेश्वर को सम्मान और उत्थान करना चाहिए, या जिन्हें बहुमूल्य समझना और सँजोना चाहिए। अगर लोगों में हमेशा ऐसी गलत धारणाएँ होंगी, उनकी ऐसी बेतुकी और अनुचित माँगे होंगी, तो इससे परेशानी पैदा होगी। तो फिर लोगों को क्या करना चाहिए, और स्वयं को कैसे जानना और समझना चाहिए, जिससे कि वे इन कठिनाइयों को दूर करने और परमेश्वर से की जाने वाली अपनी इन माँगों को छोड़ने के लिए उस तरीके के अनुरूप हो सकें, जिस तरीके से परमेश्वर मनुष्य के साथ व्यवहार करता है? कुछ लोगों को परमेश्वर के घर द्वारा अगुआ बनाया जाता है और वे कोई हानिकारक या कष्टप्रद कार्य किए बिना अपना काम बहुत अच्छी तरह से करते हैं; बाद में जब परमेश्वर उन्हें उजागर करने के लिए किसी निश्चित स्थिति में रखता है और उनकी अगुआई छीन लेता है, तो वे तर्क करने की कोशिश करने लगते हैं : "वे तो नकली अगुआ, नकली कार्यकर्ता और गड़बड़ी और परेशानी पैदा करने वाले लोग हैं, जिन्हें बदला जाना चाहिए—जब मैं गड़बड़ी या परेशानी पैदा करने वाला नहीं रहा हूँ, तो मुझे क्यों बदला जाना चाहिए?" वे बाहर कर दिया गया महसूस करते हैं। क्यों? वे मानते हैं कि यह पद उनका हक है, कि उन्हें बदला नहीं जाना चाहिए था; वे उन बातों के कारण इसके योग्य हैं, जो उनमें प्रकट हुई हैं। इस प्रकार, उनका यह मत होता है कि परमेश्वर ने उन्हें इस पद से हटा दिया है, जबकि वे इसे करने के लिए योग्य थे, और इसलिए वे इसे स्वीकार नहीं करते—और इस प्रकार उनमें परमेश्वर के कार्यों के प्रति धारणाएँ उत्पन्न होती हैं। और ये धारणाएँ उत्पन्न होने पर वे अपने साथ अन्याय हुआ महसूस करते हैं, और शिकायत करना शुरू कर देते हैं : "क्या यह नहीं कहा गया था कि अगुआओं को चुनने और हटाए जाने के सिद्धांत हैं? मुझे लगता है कि जो हुआ, उसमें कोई सिद्धांत नहीं है, परमेश्वर ने गलती की है!" संक्षेप में, जैसे ही परमेश्वर कुछ ऐसा करता है, जो उनके हितों को नुकसान और उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाता है, वे दोष निकालना शुरू कर देते हैं। क्या यह एक समस्या है? इस समस्या को कैसे हल किया जा सकता है? तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम कौन हो। चाहे तुममें कैसे भी गुण या खूबियाँ हों, या चाहे तुममें कितना भी कौशल या योग्यता हो, या चाहे तुमने परमेश्वर के घर में कितनी भी श्रेष्ठता अर्जित की हो, या चाहे तुमने कितनी भी भाग-दौड़ की हो या कितना भी धनार्जन किया हो, ये चीजें परमेश्वर के लिए कुछ नहीं हैं, और यदि ये चीजें तुम्हें अपनी जगह से महत्त्वपूर्ण लगती हैं, तो क्या तुम्हारे और परमेश्वर के बीच पुनः गलतफहमियाँ और अंतर्विरोध उत्पन्न नहीं हो गए हैं? इस समस्या का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? तुम्हें अपने और परमेश्वर के बीच की दूरी कम करनी चाहिए, इन अंतर्विरोधों को दूर करना चाहिए, और उन चीजों को नकारना चाहिए जिन्हें तुम सही समझते हो और जिनसे चिपके रहते हो। ऐसा करने से तुम्हारे और परमेश्वर के बीच दूरी नहीं रह जाएगी, और तुम अपनी जगह पर सही ढंग से खड़े रहोगे, तुम समर्पण करने में समर्थ होगे, यह समझने में समर्थ होगे कि परमेश्वर जो करता है वह सही होता है, तुम खुद को नकारने और त्यागने में समर्थ होगे। तुम स्वयं द्वारा अर्जित योग्यता को एक तरह की पूँजी नहीं समझोगे, न ही तुम अब परमेश्वर के समक्ष शर्तें या माँगें रखने करने की या उससे पुरस्कार माँगने की कोशिश करोगे। इस समय, तुम्हारे पास अब और कठिनाइयाँ नहीं होंगी। परमेश्वर के प्रति मनुष्य की समस्त गलतफहमियाँ क्यों पैदा होती हैं? वे इसलिए पैदा होती हैं, क्योंकि लोग स्वयं को लेशमात्र भी नहीं जानते; सटीक रूप से, वे नहीं जानते कि परमेश्वर की दृष्टि में वे किस तरह की चीजें हैं। वे स्वयं को बहुत अधिक आँकते हैं और परमेश्वर की दृष्टि में अपनी स्थिति बहुत ऊँची मानते हैं, और वे जिसे किसी व्यक्ति की कीमत और पूँजी समझते हैं, उसे परमेश्वर के वे मापदंड मान लेते हैं जिनसे वह निर्धारित करता है कि वे बचाए जाएँगे या नहीं। यह गलत है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के हृदय में तुम्हारी किस तरह की जगह है, और परमेश्वर का तुम्हारे साथ किस तरह पेश आना उपयुक्त है। यह जानना सत्य के अनुरूप होना और परमेश्वर के विचारों के अनुसार होना है। जब तुम्हारा अभ्यास और स्वयं के साथ तुम्हारा व्यवहार इस ज्ञान के अनुसार होगा, तो तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं होगा। और जब परमेश्वर तुम्हारे साथ पुनः अपने तरीके से पेश आएगा, तो क्या तुम समर्पण नहीं कर पाओगे? तुम अपने हृदय में कुछ असहज महसूस कर सकते हो, या हो सकता है तुम इन चीजों को समझ न सको, और तुम्हें लगे कि ये चीजें वैसी नहीं हैं जैसी तुम चाहते हो, फिर भी, चूँकि तुम इन सत्यों से लैस होगे और इन्हें समझते होगे, और चूँकि तुम अपनी स्थिति में दृढ़तापूर्वक बने रहने में समर्थ होगे, इसलिए तुम परमेश्वर के विरुद्ध अब और नहीं लड़ोगे, जिसका अर्थ है कि तुम्हारे उन आचरणों और अभ्यासों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, जो तुम्हारी बरबादी के कारण हैं। और तब क्या तुम सुरक्षित नहीं होगे? जब तुम सुरक्षित होगे, तो तुम यथार्थवादी महसूस करोगे, इसी का अर्थ पतरस के मार्ग पर चलना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

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