52. स्‍वयं को उचित ढंग से बरतने के सिद्धान्‍त

(1) निरन्‍तर आत्‍म-चिन्‍तन में संलग्‍न रहना और परमेश्‍वर के वचनों की रोशनी में स्‍वयं को जानना, और अपनी भ्रष्‍टता तथा अपनी कमियों के सत्‍य को समझना ज़रूरी है। केवल इसी तरह व्‍यक्ति आत्‍म-ज्ञान उपलब्‍ध कर सकता है।

(2) केवल सत्‍य को समझकर ही लोग इस बात को साफ़तौर पर देख और समझ सकते हैं कि उनके पास कुछ भी नहीं है और वे एक दीन-हीन प्राणी के सिवा कुछ नहीं हैं, और केवल इसी तरह वे अहंकार और दम्‍भ से खुद को छुटकारा दिला सकते हैं;

(3) जब लोग मुश्किलों और विफलताओं का सामना कर रहे हों, तब उन्‍हें हताश होकर नहीं बैठ जाना चाहिए। केवल आत्‍म-चिन्‍तन के माध्‍यम से स्‍वयं को जानकर और सत्‍य को समझने का प्रयास करके ही वे स्‍वयं को ठीक ढंग से बरत सकते हैं;

(4) केवल परमेश्‍वर के वचनों से न्‍याय और ताड़ना प्राप्‍त करने, काटे-छाँटे जाने और व्‍यवहार किये जाने से, और इस तरह अपने भ्रष्‍ट स्‍वभाव के शोधन को सम्‍भव बनाने से ही, लोग सत्‍य का अभ्‍यास कर सकते हैं और मनुष्‍य की तरह का जीवन जी सकते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

लोग अपनी ताकतों और कमज़ोरियों को सही-सही देख पाने में हमेशा असमर्थ होते हैं, और इससे अचेतन तौर पर परमेश्वर के बारे में उनका ज्ञान प्रभावित होता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वयं से हार मानकर आशा ही छोड़ देते हैं, जो अपने स्वभाव को बदलना नहीं चाहते, और सच को व्यवहार में लाने के लिए ज़रूरी कष्टों को उठाना नहीं चाहते ; ऐसे लोग यह मानते हैं कि वे कभी भी बदले ही नहीं। दरअसल, ये लोग बदले हैं, पर ये खुद इसे वास्तव में समझ नहीं पाते : बजाय इसके, वे केवल अपनी समस्याओं की ओर देखते हैं, और परमेश्वर के साथ सहयोग करना नहीं चाहते। इस बात से न केवल उनके सामान्यतः होने वाले प्रवेश में देर होती है, बल्कि परमेश्वर के बारे में उनकी ग़लतफ़हमी को भी बढ़ावा मिलेगा, और भी अधिक इसका उनकी मंज़िल पर भी असर पड़ेगा। इसलिए, यह मुद्दा ऐसा होना चाहिए जिसे आप सब ध्यानपूर्वक सोचे-समझें, ताकि गहनतर प्रवेश हासिल हो, और उन परिवर्तनों तक पहुँचा जा सके जो आप सभी को मिलने चाहिए।

कुछ लोग नकारात्मकता के बीच हैं, पर फिर भी वे अपने कर्तव्यों में “परमेश्वर के प्रति आखिर तक वफ़ादार, चाहे अंत में कुछ भी हो” ऐसा नज़रिया बनाये रख सकते हैं। मैं मानता हूँ कि यह परिवर्तन है, फिर भी आप लोग स्वयं इसको समझ नहीं पा रहे हैं। वास्तव में, यदि आप स्वयं को सावधानीपूर्वक परखें, आप देखेंगे कि आपके भ्रष्ट स्वभाव का एक हिस्सा बदल चुका है ; परन्तु, जब आप स्वयं को मापने के लिए उच्चतम पैमाने का प्रयोग करने लगते हैं, तब न केवल आप उस उच्च स्तर तक पहुँच नहीं पाएँगे, बल्कि वे बदलाव या सुधार जो आप अपने में ला पाए हैं, उन्हें भी नकारेंगे – यह एक मानवीय त्रुटि है। अगर आप सचमुच वो हैं जो सही-गलत का विवेक रखता हो, तब अपने भीतर हुए सुधार के प्रति खुद को जागरूक बनाने में कोई नुकसान नहीं ; उससे न केवल आप अपने स्वयं के परिवर्तनों को देख पाएँगे, बल्कि आप उस आगे के मार्ग को भी देख पाएँगे जिस पर आपको चलना है ; उस समय आप देखेंगे कि जब तक आप कठिन परिश्रम करेंगे, आपके लिए आशा फिर भी बनी रहेगी ; आप कभी-न-सुधरने-योग्य नहीं। मैं अभी आपको बताता हूँ : जो अपनी समस्याओं को स्पष्ट देख सकते हैं, उनके लिए उम्मीद है ; वे नकारात्मकता से बाहर आ सकते हैं।

आप सत्य को त्याग देते हैं इसका कारण है आपका यह सोच लेना कि आप बचाव के परे जा चुके हैं, इसी वजह से आप मूलभूत सच्चाइयों को भी छोड़ देते हैं। संभवतः ऐसा नहीं कि आप सत्य को अभ्यास में ला ही नहीं सकते, बल्कि यह कि आप उन मौकों से चूक जाते हैं जब आप सत्य पर आचरण कर सकें ; यदि आप सत्य को ही त्याग दें, क्या आप फिर भी बदल सकेंगे? और यदि आप सत्य को ही त्याग दें, तब कहाँ है कोई अर्थ परमेश्वर में विश्वास रखने का? क्या यह पहले से ही नहीं कहा जा चुका है, “यह ठीक है चाहे कभी भी स्वभाव में परिवर्तन की चाह की जाए”? क्या आप यह भूल चुके हैं? आप सभी को तो बस यही याद है कि बहुत कम को बचाया जा सकेगा और आप को लगता है कि आप सब के लिए कोई उम्मीद ही नहीं बची। यदि आप सकारात्मक लक्ष्य नहीं रखते, क्या नकारात्मक बातें प्रकट न होंगी? तब आप नकारात्मक होने से कैसे बचेंगे? इस लिए मैं फिर भी आपसे कह रहा हूँ : आप को स्वयं को सही-सही देखना ही होगा, और सत्य का त्याग न करें।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को सही ढंग से देखो और सत्य में विश्वास करना बंद मत करो' से

लोग भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करते हैं। यह एक तथ्य है। कोई भी इससे बच या भाग नहीं सकता; उन्हें इस तथ्य का सामना करना चाहिए। यह ऐसा क्यों है? कुछ लोग कहते हैं: “मैं हमेशा अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करता रहता हूँ। मैं इसे कभी नहीं बदल सकता। करने को है क्या? क्या मैं बस ऐसा ही हूँ? क्या परमेश्वर मुझे नापसंद करता है, या मुझसे नफ़रत करता है?” क्या ऐसा दृष्टिकोण सही है? क्या ऐसी सोच सही है? लोगों के पास एक भ्रष्ट स्वभाव है, और वे अक्सर अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करते हैं, इस बात का यह मतलब नहीं होता कि वे असाध्य हैं। लोगों का अक्सर एक भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना यह साबित करता है कि उनका जीवन शैतान के भ्रष्ट स्वभाव से नियंत्रित है, और उनका सार शैतान का ही सार है। लोगों को इस तथ्य को मानना और स्वीकार करना चाहिए। इंसान के प्रकृति-सार और परमेश्वर के सार के बीच अंतर होता है। इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद उन्हें क्या करना चाहिए? जब लोग एक भ्रष्ट स्वभाव को उजागर कर देते हैं; जब वे देह के भोगों में लिप्त होते और परमेश्वर से दूर हो जाते हैं; या जब परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है जो उनके अपने स्वयं के विचारों के विपरीत होता है, और उनके भीतर शिकायतें पैदा होती हैं, तो उन्हें तुरंत ही खुद को अवगत करा देना चाहिए कि यह एक समस्या है, और एक भ्रष्ट स्वभाव है; यह परमेश्वर के खिलाफ़ विद्रोह है, परमेश्वर का विरोध है; इसका सत्य के साथ मेल नहीं है, और परमेश्वर के प्रति यह अभिशाप है। जब लोगों को इन चीज़ों का एहसास होता है, तो उन्हें शिकायत नहीं करनी चाहिए, या नकारात्मक और आलसी नहीं हो जाना चाहिए, और उन्हें परेशान तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए; इसके बजाय, उन्हें अधिक गहरे आत्म-चिंतन और आत्म-ज्ञान के लिए सक्षम हो जाना चाहिए। इसके अलावा, उन्हें अग्रसक्रिय रूप से परमेश्वर के सामने आने में सक्षम होना चाहिए, और निष्क्रिय नहीं बनना चाहिए। उन्हें परमेश्वर की झिड़की और अनुशासन को स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने आने की पहल करनी चाहिए, और तुरंत अपनी स्थिति को पलट देना चाहिए, ताकि वे सत्य और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हो जाएँ, और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकें। इस तरह, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता निरंतर सामान्यतर होता जाएगा, और साथ ही तुम्हारी अंदरूनी स्थिति भी। तुम भ्रष्ट स्वभावों, भ्रष्टता के सार, और शैतान की भिन्न कुरूप स्थितियों की पहचान एक बढ़ती स्पष्टता के साथ करने में सक्षम होगे। अब तुम इस तरह की मूर्खतापूर्ण और बचकानी बातें नहीं करोगे जैसे कि "यह शैतान था जो मेरे साथ दख़ल कर रहा था," या "यह एक ख़याल था जो शैतान ने मुझे दिया।" इसके बजाय, तुम्हें भ्रष्ट स्वभावों के बारे में, परमेश्वर के प्रति लोगों के विरोध के और शैतान के सार के बारे में, सटीक जानकारी होगी। तुम्हारे पास इन चीज़ों को हल करने का एक अधिक सटीक तरीका होगा, और ये चीज़ें तुम्हें विवश नहीं करेंगी। जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव के एक छोटे से अंश को प्रकट करोगे, या अपराध करोगे, या अपने कर्तव्य को बेपरवाही से निभाओगे, या जब तुम अक्सर खुद को एक निष्क्रिय, नकारात्मक स्थिति में पाओगे, तब भी तुम कमज़ोर नहीं बनोगे और परमेश्वर और उसके उद्धार में विश्वास नहीं खो दोगे। तुम इस तरह की परिस्थितियों के बीच नहीं रहोगे, बल्कि अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव का सही ढंग से सामना करोगे, और तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के लिए सक्षम होगे, और, जब कभी तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर होगा, तो तुम तुरंत इसे उलट पाओगे, फ़ौरन परमेश्वर के सामने जिओगे और उसके अनुशासन और फटकार की तलाश करोगे। न तो तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से, न शैतान के सार के द्वारा, और न ही तुम्हारी विभिन्न नकारात्मक और निष्क्रिय स्थितियों के द्वारा नियंत्रित होगे, बल्कि सत्य, उद्धार, और परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके अनुशासन और तिरस्कार की स्वीकृति की तलाश में अपनी आस्था को विकसित करोगे। इस तरह, क्या लोग स्वतंत्र रूप से नहीं जी पाएँगे? यह सत्य का अभ्यास करने और उसे प्राप्त करने का मार्ग है, और वैसे ही, यह उद्धार का मार्ग भी है। भ्रष्ट स्वभावों ने लोगों के भीतर गहरी जड़ें जमा ली हैं; शैतान का सार और उसकी प्रकृति उनके विचारों, व्यवहार और मानसिकता को नियंत्रित करते हैं; फिर भी, सत्य के, परमेश्वर के कार्य के, और उसके उद्धार के होते हुए, इसमें से कोई भी चिंता का विषय नहीं होता है, और इससे कोई कठिनाइयाँ सामने नहीं आती हैं। लोगों के भ्रष्ट स्वभावों, या उनकी समस्याओं, या उनकी मजबूरियों के बावजूद, एक मार्ग होता है जिसे वे अपना सकते हैं। इन चीज़ों को हल करने का एक तरीका है, और इनके हल के लिए अनुरूप सच्चाइयाँ हैं। क्या इस प्रकार उन लोगों के उद्धार की आशा नहीं है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें' से उद्धृत

जब लोगों को पता चलता है कि उनकी समस्याएँ कितनी गंभीर हैं तो यह अच्छा है या बुरा? यह अच्छा है। तुम अपनी भ्रष्टता का पता लगाने में जितने अधिक सक्षम होते हो, यह खोज उतनी ही अधिक सटीक होती है, और उतना ही अधिक तुम अपने स्वयं के सार के बारे में जान सकते हो, फिर उतनी ही अधिक संभावना होती है कि तुम्हें बचा लिया जाएगा और तुम उद्धार के और अधिक करीब आ जाओगे; जितना ही अधिक तुम अपनी समस्याओं का पता लगाने में अक्षम होते हो, उतना ही अधिक तुम सोचते हो कि तुम अच्छे व्यक्ति, खासे महान व्यक्ति हो, फिर तुम उद्धार के पथ से और अधिक दूर होते जाते हो, और तुम अब भी बड़े खतरे में होते हो। जो भी व्यक्ति सारा दिन स्वयं का दिखावा करने में बिताता है—अपनी उपलब्धियों को घमंड से दिखाना, कहना कि वे वाक्पटु, तर्कशील हैं, कि वे सत्य को समझते हैं और सत्य को अभ्यास में लाते समय त्याग करने में सक्षम हैं—वह विशेष रूप से छोटे कद का व्यक्ति होता है। किस प्रकार के व्यक्ति में उद्धार की अधिक आशा होती है, एवं उद्धार के पथ पर चलने में सक्षम होता है। वे जो असल में अपना भ्रष्ट स्वभाव जानते हैं। उनका ज्ञान जितना अधिक अथाह होता है, वे उद्धार के उतने ही अधिक पास आ जाते हैं। अपने भ्रष्ट स्वभाव को जानना, जानना कि तुम कुछ नहीं, बेकार हो, कि तुम जीते-जागते शैतान हो—जब तुम सच में अपना सार जानते हो, तब यह गंभीर समस्या नहीं रह जाती। यह अच्छी बात है, बुरी बात नहीं है। क्या कोई है जो स्वयं को जितना अधिक जानता है, उतना ही अधिक नकारात्मक होता जाता है, मन ही मन सोचते हुए : "सब समाप्त हो गया, मुझ पर ईश्वर के न्याय और दंड की गाज़ गिरी है, यह सज़ा एवं प्रतिशोध है, परमेश्वर मुझे नहीं चाहता एवं मेरा उद्धार होने की कोई आशा नहीं है"? क्या इन लोगों को ऐसे भ्रम होते हैं? असल में, लोगों को जितनी अधिक पहचान होगी कि वे कितने निराशाजनक हैं, उनके लिए आशा उतनी ही अधिक होगी; उन्हें नकारात्मक नहीं होना चाहिए एवं हार नहीं माननी चाहिए। स्वयं को जानना अच्छी बात है—यह वह रास्ता है जिस पर उद्धार के लिए चलना ही होगा। यदि तुम अपने ही भ्रष्ट स्वभाव से एवं अपने सार से, जो ईश्वर के प्रति अपने विरोध में बहुविध है, पूर्णतः अनभिज्ञ हो, एवं यदि तुम्हारे पास परिवर्तन की अब भी कोई योजना नहीं हैं, तो तुम संकट में हो; ऐसे लोग पहले ही सुन्न हो चुके हैं, वे मृत हैं। क्या मृतक को पुनः जीवित किया जा सकता है? बिल्कुल नहीं, वे पहले ही मृत हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'आप सत्‍य की खोज तभी कर सकते हैं जब आप स्‍वयं को जानें' से उद्धृत

क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनके कार्यकलाप सही और न्यायोचित हैं, कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं, इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करने में समर्थ हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आपको क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते हैं। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आपको पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत ज़रूरतमंद और दयनीय है, वो इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है। इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

परमेश्वर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उनकी उम्र कितनी है, वे किस तरह के वातावरण में पैदा हुए हैं या वे कितने प्रतिभाशाली हैं। बल्कि वह सत्य के प्रति लोगों के रवैये के आधार पर उनसे व्यवहार करता है और यह रवैया उनके स्वभाव से संबंधित होता है। अगर तुमने सत्य का सामना करने के लिये सही रवैया अपनाया है, तुम्हारे अंदर सत्य को स्वीकार करने की प्रवृत्ति है, और तुम एक विनम्र व्यवहार को अपनाते हो, तो भले ही तुम्हारी क्षमता कम हो, परमेश्वर फिर भी तुम्हें प्रबुद्ध करेंगे और तुम्हें कुछ न कुछ हासिल करने देंगे। अगर तुम्हारे पास अच्छी क्षमता है लेकिन तुम हमेशा अभिमानी बने रहते हो, निरंतर यह सोचते हो कि तुम ही सही हो और हमेशा दूसरों की कही किसी भी बात को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक रहते हो, और हमेशा प्रतिरोध करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे अंदर काम नहीं करेगा। परमेश्वर यही कहेगा कि तुम्हारा स्वभाव बुरा है और तुम कुछ भी पाने के लायक नहीं हो। परमेश्वर उस चीज़ को भी ले लेगा जो कभी तुम्हारे पास था। इसे ही उजागर किया जाना कहते हैं। साफ तौर पर तुम शून्य हो, हर काम में अनाड़ी हो, फिर भी तुम्हें लगता है कि तुम बहुत कुशल हो, कुछ भी कर सकते हो और हर मामले में दूसरों से बेहतर हो। तुम कभी भी दूसरों के सामने अपने दोषों या अपनी कमियों की चर्चा नहीं करते, न ही तुम उन्हें अपनी कमजोरियाँ और नकारात्मकता दिखाते हो। तुम हमेशा अपनी योग्यता का दिखावा करते हो और दूसरों के आगे झूठी छाप छोड़ते हो, जिससे उन्हें लगता है कि तुम हर चीज में निपुण हो, तुम में कोई कमजोरी नहीं है, तुम्हें किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है, तुम्हें दूसरों की राय सुनने की कोई आवश्यकता नहीं है, अपनी कमजोरियों को दूर करने के लिए दूसरों की क्षमता से सीखने की आवश्यकता नहीं है, तुम उन्हें यह दिखाने का प्रयास करते हो कि तुम हमेशा दूसरों से बेहतर ही रहोगे। यह किस तरह का स्वभाव है? (अहंकारी स्वभाव।) ऐसा व्यक्ति दयनीय जीवन जीता है। क्या वह वास्तव में धनी होता है? नहीं, वह धनी नहीं होता; वह न तो नई चीजें सीखता है और न ही उन्हें स्वीकार करता है। अंदर से वह बहुत मुरझाया हुआ, सीमित और निर्धन होता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी चीज के पीछे के सिद्धांतों को नहीं समझता, सिद्धांतों को नहीं समझ सकता, उसे परमेश्वर की इच्छा की कोई समझ नहीं होती, वह केवल नियमों से चिपका रहता है और उनके शाब्दिक अर्थ को जानने के लिए ही खुद को खपाता रहता है। इसका नतीजा यह होता है कि वह सीमित परिणाम ही प्राप्त कर पाता है। इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव खराब होता है।

जब तुम लोग अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दूसरों के साथ समन्वय करते हो, तो क्या तुम अलग-अलग राय स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हो? क्या तुम दूसरों की राय स्वीकार कर पाते हो? (मैं पहले अपने ही विचारों से चिपका रहता था, लेकिन जब परमेश्वर ने ऐसी स्थितियों की व्यवस्था की जिसमें मुझे दूसरों के साथ काम करने का मौका मिला, तो मैंने देखा कि जब सभी लोग मिलजुल कर चीजों पर चर्चा करते हैं, तो आम तौर पर उसका परिणाम सही होता है, और कई बार तो ऐसा हुआ कि मेरा अपना ही दृष्टिकोण गलत था या उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। तब मुझे समझ में आया कि दूसरों के साथ सद्भावपूर्ण ढंग से काम करना कितना महत्वपूर्ण होता है।) तुमने इससे क्या सीखा? क्या तुम लोगों को लगता है कि कोई भी पूर्ण है? लोग चाहे जितने शक्तिशाली हों, या चाहे जितने सक्षम और प्रतिभाशाली हों, फिर भी वे पूर्ण नहीं हैं। लोगों को यह मानना चाहिए; यह तथ्य है। यह हर उस व्यक्ति का सबसे उपयुक्त रवैया भी है, जो अपनी शक्तियों और फायदों या दोषों को सही ढंग से देखता है; यह वह तार्किकता है जो लोगों के पास होनी चाहिए। ऐसी तार्किकता के साथ तुम अपनी शक्तियों और कमज़ोरियों के साथ-साथ दूसरों की शक्तियों और कमज़ोरियों से भी उचित ढंग से निपट सकते हो, और इसके बल पर तुम उनके साथ सौहार्दपूर्वक कार्य कर पाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

ऐसे लोग हैं जो कहते हैं, "मैं बहुत अच्छा व्यक्ति हूँ; मैंने परमेश्वर के प्रतिकार में कुछ नहीं किया है, और उसके लिए बहुत दुख सहे हैं। वह फिर भी क्यों मेरी काट-छाँट करता है और मेरे साथ इस तरह पेश आता है? परमेश्वर मुझे कभी स्वीकार क्यों नहीं करता या मुझे बढ़ाता क्यों नहीं?" और फिर दूसरे लोग कहते हैं, "मैं एक सीधा-सच्चा व्यक्ति हूँ; मैं परमेश्वर में तब से विश्वास कर रहा जब से मैं गर्भ में था, और अब भी विश्वास करता हूँ। मैं कितना शुद्ध हूँ! परमेश्वर के लिए स्वयं को व्यय करने के लिए मैंने अपने परिवार का त्याग किया और अपनी नौकरी छोड़ी, और मैं अब भी सोचता हूँ कि परमेश्वर मुझे कितना प्यार करता है। लगता है कि परमेश्वर अब लोगों को उतना प्यार नहीं करता, और मैं दरकिनार कर दिया गया, निराश और हताश महसूस करता हूँ।" ये लोग क्या सब गलत कर रहे हैं? वे अपनी सही जगह पर बने नहीं रहे; वे नहीं जानते कि वे कौन हैं, और वे हमेशा महसूस करते हैं कि वे आदरणीय हैं और उन्हें परमेश्वर का सम्मान और बढ़ावा मिलना चाहिए, या परमेश्वर को उन्हें संजोना और संपोषित करना चाहिए। यदि लोगों में ऐसी गलत धारणाएँ, ऐसे बेतुके और अनुचित आग्रह होंगे, तो इससे परेशानी पैदा होगी। तब, लोगों को क्या करना चाहिए, स्वयं को कैसे जानना चाहिए और स्वयं के साथ कैसे पेश आना चाहिए कि वे इन कठिनाइयों को दूर कर सकें और परमेश्वर से की गई इन मांगों को छोड़ सकें, और परमेश्वर द्वारा व्यक्ति के साथ पेश आने के तरीके के साथ सामंजस्य बिठा सकें? ... तुम्हें यह जानना जरूरी है कि तुम कौन हो। इस बात से कोई मतलब नहीं कि कैसी प्रतिभाएँ या शक्तियाँ तुम्हारे पास हैं, न ही इस बात से कि कितना कौशल या योग्यता तुम्हारे पास है, और न ही इस बात से कि तुमने परमेश्वर के घर में कितनी गुणवत्ता अर्जित की है, या तुमने कितनी भाग-दौड़ की है, या कितना धनार्जन किया है, ये चीजें परमेश्वर के लिए कुछ नहीं हैं, और यदि ये चीजें तुम्हें अपनी जगह से महत्त्वपूर्ण लगती हैं, तो क्या तुम्हारे और परमेश्वर के बीच पुनः गलतफहमियाँ और अंतर्विरोध नहीं उत्पन्न हो गए हैं? इस समस्या का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर और स्वयं के बीच की दूरी को कम करना होगा, इन अंतर्विरोधों को दूर करो, और उन चीजों को नकारो जिन्हें तुम सही समझते हो और जिनसे चिपके रहते हो। ऐसा करने में, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच दूरी नहीं रह जाएगी, और तुम अपनी जगह पर सही ढंग से खड़े रहोगे, तुम समर्पण करने में समर्थ होगे, यह समझने में समर्थ होगे कि परमेश्वर जो करता है वह सही है, तुम खुद को नकारने और त्यागने में समर्थ होगे। तुमने जो योग्यता अर्जित की है उसे तुम एक पूँजी की तरह नहीं देखोगे, न ही तुम अब परमेश्वर के समक्ष शर्तें या माँगें प्रस्तुत करोगे, या उससे पुरस्कार की माँग करोगे। तुम्हारे पास अब और समस्याएँ नहीं होंगी। सभी लोगों में परमेश्वर के प्रति गलतफहमियाँ क्यों पैदा होती हैं? इसलिए कि लोग स्वयं को लेशमात्र भी नहीं जानते; संक्षेप में, वे नहीं जानते कि परमेश्वर की दृष्टि में वे क्या हैं। वे अपनी कीमत बहुत ऊंची मापते हैं और परमेश्वर की दृष्टि में अपनी स्थिति को बहुत ऊँचा आँकते हैं, और वे जिसे किसी व्यक्ति की कीमत और पूँजी समझते हैं उसे परमेश्वर का मापदंड मान लेते हैं जिससे वह निर्धारित करता है कि वे बचाए जाएँगे या नहीं। यह गलत है। तुम्हें यह जरूर जानना चाहिए कि परमेश्वर के हृदय में तुम्हारी जगह कैसी है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारे साथ किस तरह पेश आना उपयुक्त है। यह जानना सत्य और परमेश्वर के दृष्टिकोण के साथ सामंजस्य में होना है। जब तुम्हारा अभ्यास और स्वयं के साथ तुम्हारा व्यवहार इस ज्ञान के साथ सामंजस्य में होगा, तो तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं होगा। और जब परमेश्वर तुम्हारे साथ पुनः अपने तरीके से पेश आता है, तो क्या तुम समर्पण नहीं कर पाओगे? तुम्हें अपने हृदय में कुछ असहजता महसूस हो सकती है, या हो सकता है तुम इन चीजों को समझ नहीं सको, और तुम्हें लगे कि ये चीजें वैसी नहीं हैं जैसा तुम चाहते हो, फिर भी, चूँकि तुम इन सच्चाइयों से लैस होगे और इन्हें समझते हो, और चूँकि तुम अपनी स्थिति में दृढ़तापूर्वक बने रहने में समर्थ होगे, तुम परमेश्वर के विरुद्ध अब और नहीं लड़ोगे। अर्थात, तुम्हारे उन आचरणों और अभ्यासों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा जो तुम्हारी बर्बादी के कारण हैं। और क्या तुम सुरक्षित नहीं रहोगे? जैसे ही तुम सुरक्षित होगे, स्वयं को तुम धरातल पर महसूस करोगे, यही है जिसका अर्थ पतरस के मार्ग पर चलना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

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