138. उन अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार के सिद्धांत जिन्होंने अपराध किए हैं

(1) ऐसे अगुआ या कार्यकर्ता जो सत्य का अनुसरण करते हैं, लेकिन जिन्होंने अपराध किया है, उनके साथ सही व्यवहार किया जाना चाहिए। उनकी प्रेमपूर्वक मदद की जानी चाहिए, और उन पर हमला, उनकी निंदा नहीं करना चाहिए या उनके साथ छल नहीं करना चाहिए।

(2) यदि नव-विकसित अगुआ या कार्यकर्ता मनमानी करके कार्य-व्यवस्था का उल्लंघन करते हैं, तो इसका समाधान उनके साथ सत्य पर सहभागिता करके और उनके साथ निपटारा और काट-छाँट करके किया जाना चाहिए।

(3) सतही अनुभव के अगुआ और कार्यकर्ता जिन्होंने अपराध किए हैं, फिर भी जो विकास के योग्य हैं, उन्हें सहारा देना चाहिए और उनकी प्रेमपूर्वक मदद की जानी चाहिए ताकि वे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकें।

(4) ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता जिन्होंने ऐसे गंभीर अपराध किए हैं जो परमेश्वर के घर के कार्य या संपत्ति को बहुत नुकसान पहुँचा चुके हैं, यदि वे वास्तव में पश्चाताप नहीं करते हैं, तो उन्हें प्रतिस्थापित कर देना चाहिए।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

क्योंकि मानवजाति बहुत ज्यादा भ्रष्ट है, इसलिए इसमें कोई शक नहीं कि पूर्ण किए जाने से पहले हर किसी ने कुछ उल्लंघन किए होंगे, भ्रष्टता प्रकट की होगी, अपने कर्तव्यों में गलतियाँ की होंगी या यहाँ तक कि गलत मार्ग पर भी चले होंगे। यह एक स्वीकृत तथ्य है। हालांकि, अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने चाहे कितने ही उल्लंघन क्यों न किए हों, अगर वे सत्य की खोज करते हैं और उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, तो परमेश्वर का घर उन्हें पश्चाताप का एक मौका जरूर देता है। अगर उनके पास अच्छी इंसानियत है, वे अपनी गलतियों और अपराधों को स्वीकारने, पछतावा करने और ईमानदारी से पश्चाताप करने में सक्षम होते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उन्हें स्वीकार करके उन पर विश्वास करना चाहिए, उनका समर्थन करना चाहिए और उनके साथ सही तरीके से बर्ताव करना चाहिए।

कलीसिया के लोकतांत्रिक चुनावों से चुने गए ज्यादातर अगुआ और कार्यकर्ता सही होते हैं, उनमें से केवल कुछ ही लोग वास्तविक काम करने में असमर्थ होते हैं। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: पहली श्रेणी के अगुआओं और कार्यकर्ताओं में पवित्र आत्मा का कार्य स्पष्ट दिखता है और वे पूरी तरह से योग्य होते हैं; दूसरी श्रेणी के अगुआ और कार्यकर्ता कुछ हद तक वास्तविक काम कर पाते हैं, मगर वे थोड़े-बहुत उल्लंघन और भ्रष्टता प्रकट करते हैं; तीसरी श्रेणी के अगुआ और कार्यकर्ता वास्तविक काम करने में असमर्थ तो होते ही हैं, साथ ही उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य भी नहीं होता। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की पहचान करना सीखना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोग केवल तीसरी श्रेणी वालों को ही बेनकाब कर सकते हैं और उनकी शिकायत कर सकते हैं—ऐसे झूठे अगुआ और कार्यकर्ता जो वास्तविक काम करने में असमर्थ हैं और जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है—इन्हें इनके कर्तव्य से हटवा दिया जाना चाहिए। दूसरी श्रेणी के अगुआ और कार्यकर्ता जो कुछ हद तक वास्तविक कार्य करने में सक्षम हैं, मगर थोड़े-बहुत उल्लंघन और भ्रष्टता प्रकट करते हैं—उनके साथ सही तरीके से पेश आना चाहिए और स्नेही दिल से उनकी सहायता करनी चाहिए; उन पर कभी भी हमले करने, उनकी निंदा करने या उन्हें झूठे आरोप में फंसाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। पहली श्रेणी के कुछ अगुआ और कार्यकर्ता पूरी तरह से योग्य होते हैं और उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य स्पष्ट नजर आता है। ये सबसे खास लोगों में से हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को हर हाल में उनकी रक्षा करनी चाहिए, किसी को भी उन पर हमले करने, उनकी निंदा करने या उन्हें झूठे आरोप में फंसाने का मौका नहीं देना चाहिए। वर्तमान में, परमेश्वर के घर में योग्य अगुआओं और कार्यकर्ताओं की संख्या काफी कम है। ज्यादातर दूसरी श्रेणी के अगुआ और कार्यकर्ता ही मौजूद हैं, जो कुछ हद तक वास्तविक काम करने में समर्थ हैं, मगर वे थोड़े-बहुत उल्लंघन करते हैं और भ्रष्टता प्रकट करते हैं। क्योंकि ज्यादातर अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने ज्यादा गंभीर काँट-छाँट और निपटारे या बड़ी परीक्षा और शुद्धिकरण का अनुभव नहीं किया है, इसलिए उनके द्वारा कुछ अपराध करना और भ्रष्टता प्रकट करना सामान्य बात है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि वे वाकई बुरे या दुष्ट लोग हैं। परमेश्वर के चुने गए लोगों को उनके साथ सही तरीके से बर्ताव करना चाहिए। स्नेही दिल से उनकी सहायता बहुत जरूरी है, क्योंकि वर्तमान में जो अगुआ और कार्यकर्ता कुछ हद तक वास्तविक काम करने में समर्थ हैं वे वाकई काफी अच्छे हैं। सत्य पर सहभागिता करके और काँट-छाँट और निपटारे के माध्यम से अपराध और भ्रष्टता के प्रकटन का पूरी तरह से समाधान किया जा सकता है; ऐसे लोगों पर कभी भी हमले करने, उनकी निंदा करने या उन्हें दरकिनार करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, न ही उन्हें बिना किसी ठोस वजह के बदलना या हटाना चाहिए। अगर ऐसे लोग सत्य की खोज करते हैं और इनमें कुछ हद तक अच्छी इंसानियत है, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को हर हाल में इनकी रक्षा करनी चाहिए और कभी भी दुष्ट लोगों को इन पर कोई आरोप लगाने या मनमाने ढंग से हमले करने, निंदा करने या झूठे आरोप में फंसाने का मौका नहीं देना चाहिए। अगर किसी अगुआ या कार्यकर्ता में, जो कुछ हद तक वास्तविक काम करने में समर्थ है, अच्छी इंसानियत है और वह सत्य का अनुसरण कर सकता है, तो उसे निश्चित रूप से बचाया और पूर्ण किया जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं। सिर्फ वही लोग जिनकी इंसानियत दुर्भावना से भरी है और जो हर प्रकार के बुरे काम कर सकते हैं, ऐसे बुरे लोग होते हैं जिन्हें प्रतिबंधित करना और हटा देना चाहिए। जिन अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने अपने पिछले सभी उल्लंघनों और गलत आचरणों को स्वीकार करने के बाद पछतावा करके सच्चा प्रायश्चित कर लिया है, किसी को भी उन्हें तंग करते रहने का कोई हक नहीं है। अगर कोई व्यक्ति इन बातों पर अड़ा रहता है, इन्हें भूलने से इनकार करता है, और इस मामले को पागलों की तरह आगे बढ़ाता रहता है, तो इसे बिना वजह परेशानियाँ खड़ी करना, व्यक्तिगत बदला लेना, अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर हमले करना, उन पर झूठे आरोप लगाना और उनकी निंदा करना कहा जाएगा। परमेश्वर का घर निश्चित रूप से ऐसा कुछ भी नहीं होने देगा। अगर कोई दुष्ट व्यक्ति बिना वजह किसी अगुआ या कार्यकर्ता को तंग करता हुआ पाया जाता है, तो इस मामले की जाँच-पड़ताल करनी चाहिए और इससे गंभीरता से निपटना चाहिए। कलीसिया के पास ऐसे दुष्ट लोगों को अलग करने या निष्कासित करने का पूरा अधिकार है जो जानबूझकर अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर हमले करते हैं या उन पर झूठा आरोप लगाते हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अवश्य ही यह समझना चाहिए कि कलीसिया के सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। उन्हें अच्छाई और बुराई के बीच अंतर करने और यह पहचानने में सक्षम होना चाहिए कि सभी अगुआ और कार्यकर्ता सत्य का अनुसरण करने वालों में से हैं या नहीं। ये वे मूलभूत क्षमताएँ हैं जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों में होनी चाहिए। अगर हमारी नजर में कोई ऐसा अगुआ या कार्यकर्ता आता है जो नेक इंसान है और सत्य की खोज करता है, मगर उसने थोड़े-बहुत उल्लंघन या गलत काम किए हैं, तो हमें उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हुए प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए। हमें इन गलतियों या अपराधों का इस्तेमाल केवल लोगों की निंदा करने और मनमाने ढंग से उन पर आरोप लगाने के लिए नहीं करना चाहिए; न ही हमें इतनी सख्ती बरतनी चाहिए कि पीट-पीट कर उन्हें मार ही डालें; ऐसा करना दूसरों पर झूठे आरोप लगाना और उनको नुकसान पहुँचाना है। अच्छे लोगों ने भी उल्लंघन किए हैं और कभी न कभी कुछ गलतियाँ भी की हैं, लेकिन अच्छे लोग पश्चाताप करके बदल सकते हैं। इसलिए, भले ही अच्छे लोगों ने कैसे भी उल्लंघन किए हों या कैसी भी गलतियाँ की हों, अगर वे सत्य को स्वीकार करके खुद को पहचानने और पश्चाताप करने में सक्षम होते हैं, तो हमें प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए। अगर कोई अगुआ या कार्यकर्ता एक अच्छा इंसान है जो सत्य की खोज करता है, मगर कोई शख्स अतीत में उसके द्वारा किए गए किसी छोटे-मोटे अपराध को लेकर अड़ियल रवैया अपनाता है और इस बात को तब तक नहीं भूलता जब तक कि वह उस अगुआ या कार्यकर्ता को बर्बाद नहीं कर देता, तो क्या इसे उस पर अत्याचार करना और उसे सताना नहीं कहा जाएगा? इनमें और लोगों को सताने वाले झूठे अगुआओं और मसीह-विरोधियों के बीच कोई अंतर नहीं है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दूसरों को सताना नहीं चाहिए; अगुआओं और कार्यकर्ताओं को तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ सही व्यवहार करना चाहिए, इसी तरह अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर के चुने हुए लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। हम सभी को एक-दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करना और प्यार से एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए। यह सामान्य इंसानी रिश्तों को निभाने का रास्ता और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का संकेत है।

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परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कलीसिया के सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ सत्य और सिद्धांतों के आधार पर व्यवहार करना चाहिए। उन्हें ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं का समर्थन और सहयोग करते हुए उन्हें बनाए रखना चाहिए जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार काम करते हैं, जो समस्याओं को हल कर सकते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए व्यावहारिक काम कर सकते हैं। भले ही कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने अतीत में कुछ उल्लंघन किए हों और अपने काम में आदर्श परिणाम हासिल न किए हों, लेकिन अगर वे उनमें से हैं जो सत्य की खोज करते हैं और जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को धीरज रखकर उनकी सहायता करनी चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोग उनकी आलोचना कर सकते हैं और उन्हें फटकार भी सकते हैं, उनके साथ काँट-छाँट और निपटारा भी कर सकते हैं, मगर उन्हें किसी की निंदा करने और उन पर झूठे आरोप लगाने की अनुमति नहीं है; वे उन्हें बिना वजह निकाल या हटा भी नहीं सकते हैं। उन्हें सत्य के आधार पर और सिद्धांत के अनुसार काम करना चाहिए। ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता जिन्होंने पवित्र आत्मा का कार्य पूरी तरह से नहीं खोया है और जो अब भी कुछ व्यावहारिक काम करने में सक्षम हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कभी भी उनके साथ झूठे अगुआओं और झूठे कार्यकर्ताओं की तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए। उन्हें केवल प्यार से उनकी सहायता करनी चाहिए और धीरज रखकर उनका साथ देना चाहिए। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की जिम्मेदारी है। अगर ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता जो सत्य की खोज नहीं करते हैं और जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, पश्चाताप करने से इनकार करते हैं, अपने कर्तव्यों को नजरअंदाज करते हुए लापरवाही से काम करते हैं, तो उन्हें हटाकर दूर कर दिया जाना चाहिए। केवल ऐसा करने से ही परमेश्वर के कार्य की रक्षा हो सकती है और कलीसिया जीवन को किसी भी व्यवधान से सुरक्षित रखा जा सकता है। यह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के साथ-साथ परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश के लिए भी फायदेमंद है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? आज के समय में, सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के बीच झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की संख्या काफी कम है। हालाँकि, ज्यादातर अगुआओं और कार्यकर्ताओं में कुछ कमजोरियाँ हैं, उन्होंने भ्रष्टता भी प्रकट की है या कभी न कभी गलत मार्ग पर चले हैं, उन्होंने कुछ उल्लंघन किए हैं, लेकिन अगर वे पश्चाताप करना चाहते हैं और उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, तो परमेश्वर के चुने गए लोगों को प्रेम से उनकी सहायता करनी चाहिए; उन्हें पश्चाताप करने, चीजों को समझने और सही मार्ग पर चलने का मौका देना चाहिए। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की जिम्मेदारी है। केवल किसी को पद से हटाने की खातिर उसकी छोटी-सी गलती या अपराध पर बखेड़ा खडा करना ठीक नहीं है; इससे उसे नुकसान और पीड़ा होगी, और यह एक शैतानी स्वभाव है। पूर्ण किया जाना कोई आसान काम नहीं है। पूर्ण किए जाने की प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति बहुत-सी असफ़लताओं का सामना करता है और काफी भ्रष्टता भी प्रकट करता है, लेकिन अगर वह व्यक्ति सत्य का अनुसरण करना जारी रखता है, तो अंत में उसे सफ़लता जरूर मिलती है। कुछ अगुआ और कार्यकर्ता परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए निडर बन जाते हैं। उन्हें चाहे कितनी भी असफलताओं और हार का सामना करना पड़े, वे कभी भी निराश नहीं होते, और उनका अनुसरण का संकल्प भी बिलकुल स्पष्ट होता है। ये लोग आशा की आखिरी किरण नजर आने तक सत्य की खोज जारी रखते हैं; ऐसे लोगों का अंत में उद्धार जरूर होगा और उन्हें अवश्य पूर्ण किया जाएगा।... इसलिए, अगर किसी अगुआ या कार्यकर्ता को वास्तविक कार्य न कर पाने के कारण बदल दिया जाता है, तब भी हमें उनसे नफरत करने के बजाय उनकी सहायता करने के तरीके ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि वे पश्चाताप करके खुद को वापस सत्य की खोज के मार्ग पर ला सकें; ऐसे काम सत्य और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं। अगर किसी को वास्तविक कार्य न कर पाने के कारण बदला जाना जरूरी है, तो बेशक उसे बदल देना चाहिए। हालांकि, उसके बारे में कोई आखिरी राय नहीं बनानी चाहिए, बल्कि उसके लिए वापस लौटने का मार्ग खुला रखना चाहिए। चेतना और समझ रखने वाले लोगों को इसी तरह काम करना चाहिए; यह तुम्हारी जिम्मेदारी है और यही प्रेम तुम्हारे अंदर होना चाहिए। अगर वह व्यक्ति गलत मार्ग पर चलना जारी रखता है, तो तुम उसे उजागर कर सकते हो, फटकार सकते हो और उस पर कुछ प्रतिबंध भी लगा सकते हो। लेकिन अगर वे सही मार्ग पर चलने की कोशिश करते हैं, तो तुम्हें उनका सहारा बनकर उनकी सहायता करनी चाहिए। अगर तुम्हें ऐसा लगता है कि कोई व्यक्ति अतीत में गलत मार्ग पर चल रहा था और शायद वह अब भी अपने कर्तव्य में परमेश्वर का विरोध करना जारी रखेगा और इसलिए तुम लगातार उस पर प्रतिबंध लगाते रहते हो, तो ऐसा करना गलत है। अगर वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए वास्तविक काम करने और अच्छी तरह अपना कर्तव्य निभाने की कोशिश करता है, मगर तुम उस पर प्रतिबंध लगाकर उसे ऐसा नहीं करने देते हो, तो क्या तुम गलत नहीं कर रहे हो? ऐसा करने से तुम्हारे और एक झूठे अगुआ या मसीह-विरोधी के बीच क्या अंतर रह जाएगा? इसलिए, किसी भी बात को हद से ज्यादा मत बढ़ाओ, सत्य सिद्धांत के अनुरूप काम करो, लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करो और दूसरों को पीड़ा मत पहुंचाओ। कुछ ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता भी होते हैं जिन्हें उनके कर्तव्य से हटा दिए जाने के बाद वे परमेश्वर को दोषी ठहराते हैं और उससे नफरत करने लगते हैं। ऐसे लोग शैतान हैं और हम उनके लिए कोई हमदर्दी नहीं रख सकते। लेकिन अगर वे परमेश्वर को दोषी ठहराने के बजाय सच्चा पश्चाताप करते हैं, खुद से नफरत करते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों से सच्चे मन से माफी माँगते हैं, तो क्या तब भी तुम उनके जख्मों पर नमक छिड़कने की कोशिश करोगे? तुम्हें उनके साथ कुछ हमदर्दी दिखानी चाहिए, उनके साथ प्रेम से बात करके उनकी सहायता करनी चाहिए, उनका आदर करते हुए उन्हें अच्छा महसूस कराना चाहिए, ताकि वे फिर से सही मार्ग पर चल सकें। जिसके पास अच्छी इंसानियत है उसे ऐसा ही बर्ताव करना चाहिए।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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