137. अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के चुने हुए लोगों को (केवल) परमेश्वर के महान स्वरुप का सम्मान करना चाहिए और किसी भी नेता या कार्यकर्ता को महान समझ कर उनकी उपासना नहीं करनी चाहिए। सभी चीज़ों में, उन्हें परमेश्वर और सत्य के प्रति समर्पण करना चाहिए, और उन्हें मनुष्यों द्वारा नियंत्रित नहीं होना चाहिए;

(2) जब तक नेता और कार्यकर्ता सही लोग हैं, जिनकी बातें और जिनके कार्य परमेश्वर के वचनों और सत्य के साथ मेल खाते हैं, और जो परमेश्वर को ऊँचा उठा सकते और उसकी गवाही दे सकते हैं, उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए और उनका अनुपालन करना चाहिए;

(3) यदि नेता या कार्यकर्ता भ्रष्टता दिखाते हैं, या यदि उनके कार्य सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं, तो उनकी भूलों को सहभागिता के माध्यम से ठीक किया जाना चाहिए। उन लोगों का आँखें मूंदकर अनुपालन नहीं करना चाहिए;

(4) यदि कोई नेता या कार्यकर्ता दुराचारी हैं, अपनी मनमानी इस तरह करते हैं जो काम की व्यवस्था के विरुद्ध हो, तो उन्हें झूठे नेताओं या मसीह-विरोधियों के रूप में गिना जाना चाहिए, और उन्हें उजागर और बर्ख़ास्त किया जाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। किसी व्यक्ति को ऊँचा न ठहराओ, न किसी पर श्रद्धा रखो; परमेश्वर को पहले, जिनका आदर करते हो उन्हें दूसरे और ख़ुद को तीसरे स्थान पर मत रखो। किसी भी व्यक्ति का तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं होना चाहिए और तुम्हें लोगों को—विशेषकर उन्हें जिनका तुम सम्मान करते हो—परमेश्वर के समतुल्य या उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए' से उद्धृत

कलीसिया के भीतर अगुआओं और कार्यकर्ताओं का स्तर जो भी हो, यदि तुम लोग हमेशा उनकी आराधना करते हो और परमेश्वर पर विश्वास करने और उद्धार प्राप्त करने के लिए उन पर हर चीज़ के लिए भरोसा करते हो, तो यह प्रेरणा अपने आप में ग़लत है। अगुआओं में उनका स्तर चाहे जो हो, वे हैं तो अभी भी आम इंसान ही। यदि तुम उन्हें अपने से बड़ा समझते हो, अगर तुम्हें लगता है कि वे तुमसे ऊंचे हैं, तुमसे ज़्यादा योग्य हैं, वे तुम्हारी अगुवाई करें, वे उस वर्ग में सर्वश्रेष्ठ हैं, तो फिर यह ग़लत है—यह तुम्हारा भ्रम है। और इस भ्रम का नतीजा क्या होता है? यह भ्रम और यह त्रुटिपूर्ण समझ तुम्हें अनजाने में अपने अगुआओं से ऐसी अपेक्षाएं करने की ओर ले जाएंगे जो वास्तविकता के अनुरूप नहीं हैं; साथ ही, तुम यह जाने बिना ही उनके तथाकथित रुझान और रौब, या उनकी योग्यताओं और प्रतिभाओं की ओर गहराई से आकर्षित होने लगोगे, इस हद तक कि तुम्हें पता भी न चलेगा और तुम उनकी आराधना कर रहे होगे, और वे तुम्हारे परमेश्वर बन चुके होंगे। जब वे तुम्हारे आदर्श और तुम्हारी आराधना के लक्ष्य बनना शुरू हो जाते हैं, तो यह पथ, उस क्षण से लेकर उस पल तक जब तुम उनके अनुयायियों में से एक बन जाते हो, तुम्हें अनजाने में परमेश्वर से दूर ले जाएगा। धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर जाते हुए भी, तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो, तुम परमेश्वर के घर में हो, तुम परमेश्वर की उपस्थिति में हो। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति लुभा चुका होगा जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, या जो मसीह का शत्रु है। यह बहुत ख़तरनाक स्थिति है। अतः इस समस्या को हल करने के लिए, तुम्हें मसीह के शत्रुओं के अलग-अलग स्वभाव और उनके काम करने के तरीकों को ठीक ढंग से समझने में सक्षम होना चाहिए। साथ ही, तुम्हें उनके कार्यों की प्रकृति और उनकी प्रणालियों और चालों को भी समझ लेना चाहिए जिनका उपयोग करना वे पसंद करते हैं; तुम्हें अपने आप पर भी काम करने की शुरुआत करनी चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करते हुए मनुष्य की आराधना करना सही रास्ता नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं: "हां, मैं अगुआओं की आराधना करता हूं लेकिन ऐसा करने के मेरे अपने कारण हैं—जिनकी मैं आराधना करता हूं वे मेरी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हैं।" तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हुए भी मनुष्य की आराधना करने पर क्यों तुले हुए हो? ये सब कुछ हो जाने के बाद, तुम्हें कौन बचाएगा? कौन है जो सचमुच तुम से प्रेम करता है और तुम्हारी रक्षा करता है—क्या तुम सचमुच नहीं देख पाते? तुम इतने नीच क्यों हो? तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उसके वचन को सुनते हो, और यदि कोई सही तरीके से बोलता है और कार्य करता है, और सत्य के सिद्धांतों के अनुसार चलता है, तो क्या सत्य का पालन करना तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है? तुम इतने नीच क्यों हो कि अनुसरण के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करने की ज़िद करते हो जिसकी तुम आराधना करो? तुम शैतान के गुलाम क्यों बनना चाहते हो? इसके बजाय, तुम सत्य के सेवक क्यों नहीं बनते? किसी व्यक्ति में समझदारी और गरिमा है या नहीं, यह देखना है तो यहां देखो। तुम्हें ख़ुद पर काम करना शुरू करना चाहिए, अपने आप को उन सत्यों से युक्त करो जो विभिन्न लोगों और घटनाओं में फ़र्क बताते हैं, उन तमाम मार्गों में भेद करना सीखो जिनमें प्रत्येक प्रकार की घटना और व्यक्ति अभिव्यक्त होते हैं, यह जानो कि सभी मामलों में कौनसे सार और स्वभाव सामने आ रहे हैं। तुम्हें यह भी समझना चाहिए कि तुम किस तरह के व्यक्ति हो, तुम्हारे आसपास के लोग किस तरह के हैं और किस तरह के लोग तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। उन्हें सही ढंग से देखने में तुम्हें सक्षम होना चाहिए। एक बार जब तुम्हें अपनी महत्ता का अंदाज़ा हो जाएगा, तो तुम मसीह के शत्रुओं की चालों में आसानी से नहीं फंसोगे और न ही तुम उनकी चालाकियों से डरोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (4)' से उद्धृत

एक अगुआ या कार्यकर्ता के साथ व्यवहार करने के तरीके के बारे में लोगों का रवैया कैसा होना चाहिए? अगर वह जो करता है वह सही है, तो तुम उसका पालन कर सकते हो; अगर वह जो करता है वह गलत है, तो तुम उसे उजागर कर सकते हो, यहाँ तक कि उसका विरोध कर सकते हो और एक अलग राय भी ज़ाहिर कर सकते हो। अगर वह व्यावहारिक कार्य करने में असमर्थ है, और खुद को एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह विरोधी के रूप में प्रकट करता है, तो तुम उसकी अगुआई को स्वीकार करने से इनकार कर सकते हो, तुम उसके ख़िलाफ़ शिकायत करके उसे उजागर भी कर सकते हो। हालाँकि, परमेश्वर के कुछ चुने हुए लोग सत्य को नहीं समझते और विशेष रूप से कायर हैं, इसलिए वे कुछ करने की हिम्मत नहीं करते। वे कहते हैं, "अगर अगुआ ने मुझे निकाल दिया, तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा; अगर उसने सबको मुझे उजागर करने और मेरा त्याग करने पर मजबूर कर दिया, तो मैं परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाऊँगा। अगर मैंने कलीसिया को छोड़ दिया, तो परमेश्वर मुझे नहीं चाहेगा और मुझे नहीं बचाएगा। कलीसिया परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है!" क्या सोचने के ऐसे तरीके उन चीजों के प्रति ऐसे व्यक्ति के रवैये को प्रभावित नहीं करते हैं? क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है कि अगर अगुआ ने तुमको निकाल दिया, तो तुमको बचाया नहीं जायेगा? क्या तुम्हारे उद्धार का प्रश्न तुम्हारे प्रति अगुआ के रवैये पर निर्भर है? इतने सारे लोगों में इतना डर क्यों है? अगर कोई झूठा अगुआ या कोई मसीह विरोधी व्यक्ति तुम्हें धमकी देता है, और तुम इसके ख़िलाफ़ ऊँचे स्तर पर जाकर आवाज़ नहीं उठाते और यहाँ तक कि यह गारंटी भी देते हो कि इसके बाद से तुम अगुआ की बातों से सहमत होगे, तो क्या तुम बर्बाद नहीं हो गये? क्या इस तरह का व्यक्ति सत्य की खोज करने वाला व्यक्ति है? तुम न केवल ऐसे दुष्ट व्यवहार को उजागर करने की हिम्मत नहीं करते जो शैतानी मसीह विरोधियों द्वारा किया जा सकता है, बल्कि इसके विपरीत, तुम उनका आज्ञापालन करते हो और यहाँ तक कि उनके शब्दों को सत्य मान लेते हो, जिनके प्रति तुम समर्पित होते हो। क्या यह मूर्खता का प्रतीक नहीं है? फिर, जब तुम्हें क्षति पहुँचती है, तो क्या तुम इसी के योग्य नहीं हो? क्या तुम्हें परमेश्वर के कारण क्षति पहुँची है? तुमने स्वयं ही अपने लिए ऐसा चाहा था। तुमने एक मसीह-विरोधी को अपना अगुआ बनाया, और उसके साथ ऐसा व्यवहार किया मानो वह कोई भाई या बहन हो—और यह तुम्हारी गलती है। किसी मसीह-विरोधी के साथ कैसा रवैया अपनाया जाना चाहिए? उसे बेनकाब करना चाहिए और उसके विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए। यदि तुम इसे अकेले नहीं कर सकते, तो कई लोगों को एक साथ आना होगा और उसके बारे में बताना होगा। यह पता लगने पर कि उच्च पदों पर आसीन कुछ अगुआ और कार्यकर्ता मसीह-विरोधी मार्ग पर चल रहे थे, भाइयों और बहनों को अनुशासित कर रहे थे, वास्तविक कार्य नहीं कर रहे थे, और पद का लाभ उठा रहे थे, तो कुछ लोगों ने उन मसीह-विरोधियों को हटाने के लिए एक याचिका पर हस्ताक्षर किए। इन लोगों ने कितना अद्भुत काम किया! यह दिखाता है कि लोग सत्य को समझते हैं, उनमें थोड़ी महानता बची है, और वे शैतान द्वारा न तो नियंत्रित हैं और न ही धोखा खाए हुए हैं। यह इस बात को भी साबित करता है कि मसीह-विरोधियों और झूठे अगुओं का कलीसिया में कोई प्रमुख स्थान नहीं है, और वे जो कुछ कहते या करते हैं उसमें अपने असली चेहरे को स्पष्ट दिखाने की उनमें हिम्मत नहीं होती। यदि वे अपना चेहरा दिखाते हैं, तो उनकी निगरानी करने, उनको पहचानने, और उन्हें बाहर निकालने के लिए लोग मौजूद हैं। अर्थात, जो लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं, उनके लिए किसी व्यक्ति का पद, प्रतिष्ठा, और अधिकार ऐसी चीज़ें नहीं हैं जो उनके हृदय को प्रभावित कर दें; सत्य को समझने वाले सभी लोगों के अंदर विवेक होता है और वे इस बात पर विचार करते हैं कि लोगों को परमेश्वर में अपनी आस्था के लिए किस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, और साथ ही उन्हें अगुआ और कार्यकर्ताओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। वे यह सोचना भी शुरू करते हैं कि लोगों को किसका अनुसरण करना चाहिए, किन व्यवहारों से लोगों का अनुसरण होता है, और किन व्यवहारों से परमेश्वर का अनुसरण होता है। कई वर्षों तक इन सत्यों पर विचार करने, और उपदेशों को अकसर सुनने के बाद, वे अनजाने में परमेश्वर में विश्वास करने से जुड़े सत्यों को समझने लगे हैं, और इसलिए उन्हें कुछ कद हासिल हुआ है। वे परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर निकल पड़े हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (1)' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को यह समझना चाहिए कि कलीसिया के सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। उन्हें अच्छाई और बुराई के बीच अंतर करने और यह पहचानने में सक्षम होना चाहिए कि सभी अगुआ और कार्यकर्ता सत्य का अनुसरण करने वालों में से हैं या नहीं। ये वो मौलिक क्षमताएँ हैं जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों में होनी चाहिए। अगर हमारी नज़र में कोई ऐसा अगुआ या कार्यकर्ता आता है जो नेक इंसान है और सत्य की खोज करता है मगर उसने थोड़े-बहुत अपराध या गलत काम किये हैं, तो हमें उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हुए प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए। हमें इन गलतियों या अपराधों का इस्तेमाल केवल लोगों की निंदा करने और मनमाने ढंग से उन पर आरोप लगाने के लिए नहीं करना चाहिए; ना ही हमें इतनी सख्ती बरतनी चाहिए कि पीट-पीट कर उन्हें मार ही डालें; ऐसा करना दूसरों पर झूठे आरोप लगाना और उनको नुकसान पहुँचाना है। अच्छे लोगों ने भी अपराध किए हैं और कभी न कभी गलतियाँ भी की हैं, लेकिन अच्छे लोग पश्चाताप करके बदल सकते हैं। इसलिए, भले ही अच्छे लोगों ने कैसे भी पाप किये हों या कैसी भी गलतियाँ की हों, अगर वे सत्य को स्वीकार करके खुद को पहचानने और पश्चाताप करने में सक्षम होते हैं, तो हमें प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए। अगर कोई अगुआ या कार्यकर्ता एक अच्छा इंसान है जो सत्य की खोज करता है मगर कोई शख्स अतीत में उसके द्वारा किये गए पाप को लेकर अड़ियल रवैया अपनाता है और इस बात को तब तक नहीं भूलता जब तक कि वह उस अगुआ या कार्यकर्ता को बर्बाद नहीं कर देता, तो क्या इसे उस पर अत्याचार करना और उसे सताना नहीं कहा जाएगा? इनमें और लोगों को सताने वाले झूठे अगुआ और मसीह विरोधियों के बीच कोई अंतर नहीं है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दूसरों को सताना नहीं चाहिए; अगुआओं और कार्यकर्ताओं को तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ सही व्यवहार करना चाहिये, इसी तरह अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर के चुने हुए लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। हम सभी को एक दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करना और प्यार से एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए। यह सामान्य इंसानी रिश्तों को निभाने का तरीका और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का संकेत है।

अगर कलीसिया के चुनावों में चुने गए अगुआ और कार्यकर्ता बार-बार दूसरों पर अत्याचार करते हैं और उन पर झूठे आरोप लगाते हैं, तो उन्हें भी दुष्ट लोगों में गिना जा सकता है; फिर ठोस सबूत मिलते ही उनसे उनका इस्तीफ़ा माँगा जाना चाहिए; अगर वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों की आलोचना, आरोप, काँट-छाँट और निपटारे को स्वीकार नहीं करते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उन पर प्रतिबंध लगाने और हटाने के लिए एकजुट होना चाहिए। ऐसा करना नुकसान के स्रोत को हटा देना है जो सबके हित में होगा, यह पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप और कलीसिया जीवन की रक्षा के लिए फायदेमंद है; साथ ही, यह परमेश्वर के कार्य की रक्षा करने की परिभाषा के दायरे में भी आता है। कलीसिया पर परमेश्वर, सत्य और परमेश्वर के वचन का शासन चलता है, वह दुष्ट लोगों की मौजूदगी को बिल्कुल भी बरदाश्त नहीं करती है। अगर कोई कलीसिया झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों को बरदाश्त करती और नज़रंदाज़ करती है, उनके द्वारा पैदा की गई परेशानियों और तबाही के साथ-साथ परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पहुँचाये गए नुकसान को सहन करती है, तो इससे यह साबित होता है कि उस कलीसिया में सत्य को समझने वालों और न्याय को कायम रखने वालों की कमी है; वह कलीसिया पूरी तरह से भ्रमित लोगों से भरी है; यही कारण है कि उस कलीसिया के सदस्य झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों द्वारा छले और काबू में किये जाते हैं; ऐसे लोग केवल दुख भोगते और क्रूरता से दबाये जाते हैं। इससे यह साबित होता है कि अगर परमेश्वर के विश्वासियों में सत्य की समझ नहीं है, तो शैतान द्वारा उनका प्रताड़ित होना और दुष्ट लोगों द्वारा उन पर अत्याचार किया जाना निश्चित है। यहाँ तक कि अगर ‘ऊपर’ की व्यवस्था उनकी मदद करना भी चाहे तो हम ऐसा करने में असमर्थ होंगे। ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं में पहले ही परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए स्पष्ट नियम बताये गए हैं; वे बेशक सत्य और ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार झूठे अगुआओं और झूठे कार्यकर्ताओं को निकाल सकते हैं। यह अधिकार उन्हें परमेश्वर ने दिया है और अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग इस अधिकार का इस्तेमाल करने में असमर्थ होते हैं, तो इसमें और किसी का नहीं बल्कि उन लोगों का ही दोष है।

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कलीसिया के सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ सत्य और सिद्धांतों के आधार पर व्यवहार करना चाहिए। उन्हें ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं का समर्थन और सहयोग करते हुए उन्हें बनाये रखना चाहिए जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार काम करते हैं, जो समस्याओं को हल कर सकते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए व्यावहारिक काम कर सकते हैं। भले ही कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने अतीत में अपराध किये हों और अपने काम में आदर्श परिणाम हासिल न किये हों, लेकिन अगर वे उनमें से हैं जो सत्य की खोज करते हैं और जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को धीरज रखकर इनकी सहायता करनी चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोग उनकी आलोचना और निंदा कर सकते हैं, उनके साथ काँट-छाँट और निपटारा भी कर सकते हैं, मगर उन्हें किसी की निंदा करने और उन पर झूठे आरोप लगाने की अनुमति नहीं है; वे उन्हें बिना वजह निकाल या हटा भी नहीं सकते हैं। उन्हें सत्य के आधार पर और सिद्धांत के अनुसार काम करना चाहिए। ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता जिन्होंने पवित्र आत्मा का कार्य पूरी तरह से नहीं खोया है और जो अब भी कुछ व्यावहारिक काम करने में सक्षम हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कभी भी उनके साथ झूठे अगुआओं और झूठे कार्यकर्ताओं की तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए। उन्हें केवल प्यार से उनकी सहायता करनी और धीरज रखकर उनका साथ देना चाहिए। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की ज़िम्मेदारी है। अगर ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता जो सत्य की खोज नहीं करते हैं और जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, वे पश्चाताप करने से इनकार करते हैं, अपने कर्तव्यों को नज़रंदाज़ करते हुए लापरवाही से काम करते हैं, तो उन्हें हटाकर सबसे दूर कर दिया जाना चाहिए। केवल ऐसा करने से ही परमेश्वर के कार्य की रक्षा हो सकती है और कलीसिया जीवन को किसी भी गड़बड़ी से सुरक्षित रखा जा सकता है। यह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के साथ-साथ परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश के लिए भी फ़ायदेमंद है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को स्पष्ट रूप से यह पता होना चाहिए कि ज़्यादातर अगुआ और कार्यकर्ता ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करने में सक्षम होते हैं। हालांकि उन सभी में भ्रष्टता और अपराध का ख़ुलासा होता है, लेकिन अगर वे मूल रूप से कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार अपने कर्तव्य को पूरा करने में सक्षम होते हैं और ज्यादातर समय में थोड़ा-बहुत वास्तविक काम कर पाते हैं, तो वे निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें उद्धार प्राप्त होने की उम्मीद है; इसलिए, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उन्हें स्वीकार करके उनकी सहायता और उनका सहयोग करना चाहिए। ज़्यादातर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार का यही मूल सिद्धांत है। अगर यह पता चलता है कि कोई अगुआ या कार्यकर्ता बार-बार कार्य व्यवस्थाओं का उल्लंघन कर रहा है, और अगर उनके काम सत्य के अनुकूल नहीं है, तो हम यह यकीन से कह सकते हैं कि वे झूठे अगुआ या मसीह विरोधी ही हैं। जहाँ तक झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों की बात है, ना केवल हमें उन्हें कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए या उनकी बात नहीं माननी चाहिए, बल्कि हमें उन्हें पूरी तरह से उजागर करके उन्हें त्याग देना चाहिए; केवल यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार में, हमें विवेक से काम लेना चाहिए, खासकर यह देखना चाहिए कि उनके पास अच्छी इंसानियत है या नहीं, उनमें सत्य वास्तविकता है या नहीं। हमें कभी भी किसी व्यक्ति की काबिलियत के आधार पर आँख बंद करके उनकी भक्ति नहीं करनी चाहिए। हमें किसी व्यक्ति की काबिलियत को उसका जीवन समझने के बजाय यह पता करना चाहिए कि उस व्यक्ति में सत्य वास्तविकता है या नहीं, क्योंकि यही सबसे मौलिक चीज़ है। ऐसे लोग जो किसी व्यक्ति की काबिलियत से आकर्षित होते हैं वे आसानी से झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों की भक्ति करने लगते हैं, जबकि जो अधिक व्यावहारिक लोग होते हैं वे इस बात पर ध्यान देते हैं कि उस व्यक्ति में सत्य वास्तविकता है या नहीं। अक्सर, ज़्यादातर झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों के पास काबिलियत होती है, वे सभी मीठे बोल बोलने में सक्षम होते हैं, वे दूसरों के सामने अपनी काबिलियत का दिखावा करने के लिए तत्पर रहते हैं, ताकि लोग उनके बारे में ऊँची सोच रखें, आसानी से उनकी भक्ति करें और कुछ लोग उनका अनुसरण करने लगें। हालाँकि, जिनके पास सत्य वास्तविकता होती है वे लोग अक्सर मजबूती से आगे बढ़ते हैं और वास्तविक कार्य करते हैं, व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिए केवल सत्य पर सहभागिता करने पर ध्यान देते हैं; वे खुद का दिखावा करने के बजाय अपना कर्तव्य निभाने की हर संभव कोशिश करते हैं। यही असली और झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के बीच मुख्य अंतर है। अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग वास्तव में सत्य को समझ गए हैं, तो स्वाभाविक रूप से उनमें भी यह विवेक होगा। वे सभी जो आसानी से झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों की भक्ति करने लगते हैं, उनमें से हैं जिनके पास सत्य वास्तविकता नहीं होती। इंसान को सिर्फ़ तभी छला और काबू में किया जाता है जब उसके पास सत्य नहीं होता। इसलिए, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ उनके बाहरी रूप-रंग और प्रचार करने की क्षमता के आधार पर बर्ताव नहीं करना चाहिए। उनके साथ बर्ताव करने की मूल कुंजी यह है कि उनका चरित्र अच्छा है या नहीं, उनके पास सत्य पर सहभागिता करने और व्यावहारिक काम करने की क्षमता है या नहीं। यही बात सबसे महत्वपूर्ण है। अगर वे वास्तव में सत्य पर सहभागिता करने और व्यावहारिक समस्याओं को हल करने में सक्षम हैं, तो भले ही उनका रूप-रंग साधारण हो, मगर वे नेक और भरोसेमंद लोग हैं। अगर वे सत्य पर सहभागिता करने में असमर्थ हैं, तो चाहे उनका रूप-रंग कैसा भी हो और वे कितने भी काबिल हों, वे वास्तव में कचरे से अधिक कुछ नहीं हैं और उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अच्छा रूप-रंग, अच्छे हाव-भाव और काबिलियत जैसी चीज़ें किसी इंसान की सत्य वास्तविकता को नहीं दर्शाती हैं। जहां कुछ लोग साधारण दिखते हैं और उनका हाव-भाव भी ज़्यादा अच्छा नहीं होता, मगर उनमें सत्य वास्तविकता होती है और इसलिए, वे उन लोगों में से हैं जो परमेश्वर को खुश करते हैं और परमेश्वर से आशीष पाते हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को केवल इस मौलिक बात पर ध्यान देना चाहिए कि व्यक्ति में सत्य वास्तविकता है या नहीं, क्योंकि अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार करने का यही सिद्धांत है। केवल ऐसे लोग जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार चीज़ों को समझ सकते हैं और दूसरों के साथ व्यवहार कर सकते हैं, उनमें से हैं जो सिद्धांतों के अनुसार काम करते हैं, सत्य को समझते हैं और वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को यह बात स्पष्ट होना चाहिए: परीक्षण, शुद्धिकरण, काँट-छाँट और निपटारे की लंबी प्रक्रिया के बाद ही परमेश्वर इंसान को पूरी तरह से बचाने और पूर्ण करने में सफल होता है। अगर कोई व्यक्ति केवल 8 या 10 वर्षों के लिए परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, सत्य के कुछ पहलुओं को समझता है और उसमें केवल थोड़ी-बहुत वास्तविकता होती है, तो उनका परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किये जाने के योग्य होना मुमकिन नहीं है। यहाँ तक कि अगर परमेश्वर किसी को विशेष रूप से पूर्ण बनाता भी है, तो उसे परमेश्वर के इस्तेमाल के योग्य बनने के लिए कम से कम 10 से 20 वर्षों के परीक्षण, शुद्धिकरण, काँट-छाँट और निपटारे की प्रक्रिया से गुज़रना होगा। यह सच है। भले ही परमेश्वर के घर में सभी स्तरों पर ज़्यादातर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास अब पवित्र आत्मा का कार्य है, इसका मतलब यह नहीं कि वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जाने के योग्य हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि सभी ने कोई न कोई अपराध किया है और कुछ भ्रष्टता भी प्रकट की है, किसी न किसी तरह वे सभी सत्य सिद्धांत के विरुद्ध भी गए हैं। यह बिल्कुल सामान्य बात है। अगर किसी अगुआ या कार्यकर्ता के पास पवित्र आत्मा का कार्य है, फिर भले ही उसने अतीत में कुछ अपराध किये हों और कुछ भ्रष्टता प्रकट की हो, इसका मतलब यह नहीं कि वे एक झूठे अगुआ या झूठे कार्यकर्ता हैं। किसी को भी दूसरों के कोई काम करने के गलत तरीकों या उनके अपराध या भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों पर अड़ियल रवैया अपनाकर उन्हें बार-बार झूठा अगुआ या झूठा कार्यकर्ता बताने का कोई हक़ नहीं; यह बिल्कुल गलत और सत्य के विरुद्ध है। क्योंकि किसी व्यक्ति ने अपराध किये हैं या नहीं, भ्रष्टता प्रकट की है या नहीं, हमें केवल इसी आधार पर किसी अगुआ या कार्यकर्ता को झूठा अगुआ या कार्यकर्ता बताने के बजाय इस सिद्धांत पर उनका मूल्याँकन करना चाहिए कि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं। अगर हम इंसानी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को आँकने की कोशिश करते रहेंगे, तो फ़िर कहीं भी कोई योग्य व्यक्ति नहीं होगा, और अगर ऐसा हुआ तो परमेश्वर का कार्य कैसे आगे बढ़ेगा? परमेश्वर की इच्छा कैसे पूरी होगी? यह एक समस्या हो जाएगी। आज पवित्र आत्मा इंसान को पूर्ण करने का कार्य कर रहा है। वह परमेश्वर के कार्य का अनुभव कराने के लिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई कर रहा है, ताकि वे परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, परीक्षण, शुद्धिकरण के साथ-साथ काँट-छाँट और निपटारे का अनुभव कर सकें; अंत में इससे बड़े परीक्षणों और शुद्धिकरण से गुजरने के बाद ही उन लोगों को पूर्ण किया जाएगा जो सत्य की खोज करते हैं। क्या आज के दौर में हर स्तर के अगुआ और कार्यकर्ता सैकड़ों परीक्षणों और शुद्धिकरण से गुज़र चुके हैं? क्या वे अब पहले से भी ज़्यादा गंभीर न्याय और ताड़ना का अनुभव कर रहे हैं? नहीं। यह समय अभी नहीं आया है। इसलिए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं का मूल्याँकन करने के लिए बहुत ऊँचे मानक का उपयोग मत करो। सभी अगुआओं और कार्यकर्ताओं का मूल्याँकन करने के लिए तुम्हें इन चार मानकों का उपयोग करना चाहिए: पहला, वे ऐसे लोग होने चाहिए जो सचमुच सत्य की खोज करते हैं; दूसरा, वे बेशक दुष्ट लोगों में से नहीं होने चाहिए; तीसरा, उन्हें कुछ व्यावहारिक काम करने में सक्षम होना चाहिए; चौथा, अगर वे अपराध करते हैं या उनमें कोई गड़बड़ी है, तो उन्हें अपने साथ होने वाली काँट-छाँट और निपटारे को स्वीकार करके पश्चाताप करने में सक्षम होना चाहिए। अगर वे इन चार मानकों पर खरे उतरते हैं, तो उन्हें अगुआओं और कार्यकर्ताओं के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है; उन्हें झूठा अगुआ या झूठा कार्यकर्ता बिल्कुल नहीं कहा जाना चाहिए। जिन लोगों के बारे में पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है उन्हें ही झूठा अगुआ या झूठा कार्यकर्ता कहा जा सकता है। उम्मीद की जाती है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग हर स्तर पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ सही ढंग से और निष्पक्ष व्यवहार करेंगे। अगर ऐसे झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं का पता चलता है जिनके पास पक्के तौर पर पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, तो उनके बारे में शिकायत की जानी चाहिए या उन्हें सीधे तौर पर हटा देना चाहिए, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों की ऐसी ज़िम्मेदारी है जो हर हाल में पूरी की जानी चाहिए। कुछ नए चुने गए अगुआ और कार्यकर्ता अपने काम में अनुभव की कमी के कारण मार्ग से भटक जाते हैं, वे अपराध कर सकते हैं और भ्रष्टता भी प्रकट कर सकते हैं, लेकिन अगर वे इन चार मानकों पर खरे उतारते हैं तो हमें उनके साथ प्यार से बर्ताव करते हुए धीरज रखकर उनकी सहायता करनी चाहिए; केवल यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। जिस व्यक्ति के पास परमेश्वर के कार्य का वास्तविक अनुभव है वह इस सत्य को साफ़ तौर पर समझने में सक्षम होगा: आज के समय में ऐसे लोग बहुत कम हैं जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, वास्तव में उनका होना इस कदर दुर्लभ है कि वे कभी दिखाई तक नहीं देते। क्योंकि इंसान गहराई तक भ्रष्ट किया जा चुका है, इसलिए ऐसे लोगों को चुनना लगभग नामुमकिन है जो वाकई में अगुआ और कार्यकर्ता बनने के योग्य हैं और जिन्हें ज़्यादातर लोग अपना आदर्श मानते हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को हर स्तर के अगुआओं और कार्यकर्ताओं का मूल्याँकन करने और उनके साथ व्यवहार करने के तरीके को लेकर अपनी धारणाएँ बदलने की ज़रूरत है; उन्हें हर चीज़ को परमेश्वर के वचनों और निष्पक्ष तथ्यों की रोशनी में देखना चाहिए। केवल यही सत्य के अनुरूप है; केवल ऐसा करके ही वे हर स्तर पर कलीसिया के अगुआओं और कार्यकर्ताओं के प्रति सही रवैया रख सकते हैं; सिर्फ़ तभी कलीसिया में गड़बड़ी पैदा होने से रोका जा सकता है, उसे प्रभावी रूप से टाला जा सकता है और उसका हल किया जा सकता है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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