137. अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के चुने हुए लोगों को परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करना चाहिए और किसी भी अगुआ या कार्यकर्ता का आदर कर उनकी उपासना नहीं करनी चाहिए। सभी चीजों में, उन्हें परमेश्वर और सत्य के प्रति समर्पण करना चाहिए, और उन्हें मनुष्यों द्वारा नियंत्रित नहीं होना चाहिए।

(2) जब तक अगुआ और कार्यकर्ता सही लोग हैं, जिनकी बातें और जिनके कार्य परमेश्वर के वचनों और सत्य के साथ मेल खाते हैं, और जो परमेश्वर को ऊँचा उठा सकते और उसकी गवाही दे सकते हैं, उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए और उनका अनुपालन करना चाहिए।

(3) यदि अगुआ या कार्यकर्ता भ्रष्टता दिखाते हैं, या यदि उनके कार्य सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं, तो उनकी भूलों को सहभागिता के माध्यम से ठीक किया जाना चाहिए। उन लोगों का आँखें मूंदकर अनुपालन नहीं करना चाहिए।

(4) यदि कोई अगुआ या कार्यकर्ता दुराचारी हैं, ऐसी मनमानी करते हैं जिससे कार्य-व्यवस्था का उल्लंघन हो, तो उन्हें झूठे अगुआओं या मसीह-विरोधियों के रूप में गिना जाना चाहिए, और उन्हें उजागर और बर्खास्त किया जाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

एक अगुआ या कार्यकर्ता के साथ व्यवहार करने के तरीके के बारे में लोगों का रवैया कैसा होना चाहिए? अगर अगुआ या कार्यकर्ता जो करता है वह सही है, तो तुम उसका पालन कर सकते हो; अगर वह जो करता है वह गलत है, तो तुम उसे उजागर कर सकते हो, यहाँ तक कि उसका विरोध कर सकते हो और एक अलग राय भी ज़ाहिर कर सकते हो। अगर वह व्यावहारिक कार्य करने में असमर्थ है, और खुद को एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह विरोधी के रूप में प्रकट करता है, तो तुम उसकी अगुआई को स्वीकार करने से इनकार कर सकते हो, तुम उसके ख़िलाफ़ शिकायत करके उसे उजागर भी कर सकते हो। हालाँकि, परमेश्वर के कुछ चुने हुए लोग सत्य को नहीं समझते और विशेष रूप से कायर हैं, इसलिए वे कुछ करने की हिम्मत नहीं करते। वे कहते हैं, "अगर अगुआ ने मुझे निकाल दिया, तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा; अगर उसने सबको मुझे उजागर करने और मेरा त्याग करने पर मजबूर कर दिया, तो मैं परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाऊँगा। अगर मैंने कलीसिया को छोड़ दिया, तो परमेश्वर मुझे नहीं चाहेगा और मुझे नहीं बचाएगा। कलीसिया परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है!" क्या सोचने के ऐसे तरीके उन चीजों के प्रति ऐसे व्यक्ति के रवैये को प्रभावित नहीं करते हैं? क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है कि अगर अगुआ ने तुमको निकाल दिया, तो तुमको बचाया नहीं जायेगा? क्या तुम्हारे उद्धार का प्रश्न तुम्हारे प्रति अगुआ के रवैये पर निर्भर है? इतने सारे लोगों में इतना डर क्यों है? अगर कोई झूठा अगुआ या कोई मसीह विरोधी व्यक्ति तुम्हें धमकी देता है, और तुम इसके ख़िलाफ़ ऊँचे स्तर पर जाकर आवाज़ नहीं उठाते और यहाँ तक कि यह गारंटी भी देते हो कि इसके बाद से तुम अगुआ की बातों से सहमत होगे, तो क्या तुम बर्बाद नहीं हो गये? क्या इस तरह का व्यक्ति सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति है? तुम न केवल ऐसे दुष्ट व्यवहार को उजागर करने की हिम्मत नहीं करते जो शैतानी मसीह विरोधियों द्वारा किया जा सकता है, बल्कि इसके विपरीत, तुम उनका आज्ञापालन करते हो और यहाँ तक कि उनके शब्दों को सत्य मान लेते हो, जिनके प्रति तुम समर्पित होते हो। क्या यह मूर्खता का प्रतीक नहीं है? फिर, जब तुम्हें क्षति पहुँचती है, तो क्या तुम इसी के योग्य नहीं हो? क्या तुम्हें परमेश्वर के कारण क्षति पहुँची है? तुमने स्वयं ही अपने लिए ऐसा चाहा था। तुमने एक मसीह-विरोधी को अपना अगुआ बनाया, और उसके साथ ऐसा व्यवहार किया मानो वह कोई भाई या बहन हो—और यह तुम्हारी गलती है। किसी मसीह-विरोधी के साथ कैसा रवैया अपनाया जाना चाहिए? उसे बेनकाब करना चाहिए और उसके विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए। यदि तुम इसे अकेले नहीं कर सकते, तो कई लोगों को एक साथ आना होगा और उसके बारे में बताना होगा। यह पता लगने पर कि उच्च पदों पर आसीन कुछ अगुआ और कार्यकर्ता मसीह-विरोधी मार्ग पर चल रहे थे, भाइयों और बहनों को कष्ट दे रहे थे, वास्तविक कार्य नहीं कर रहे, और पद के लाभ का लालच कर रहे थे, तो कुछ लोगों ने उन मसीह-विरोधियों को हटाने के लिए एक याचिका पर हस्ताक्षर किए। इन लोगों ने कितना अद्भुत काम किया! यह दिखाता है कि कुछ लोग सत्य को समझते हैं, उनमें थोड़ी महानता बची है, और वे शैतान द्वारा न तो नियंत्रित हैं और न ही धोखा खाए हुए हैं। यह इस बात को भी साबित करता है कि मसीह-विरोधियों और झूठे अगुओं का कलीसिया में कोई प्रमुख स्थान नहीं है, और वे जो कुछ कहते या करते हैं उसमें अपने असली चेहरे को स्पष्ट दिखाने की उनमें हिम्मत नहीं होती। यदि वे अपना चेहरा दिखाते हैं, तो उनकी निगरानी करने, उनको पहचानने, और उन्हें अस्वीकार करने के लिए लोग मौजूद हैं। अर्थात, जो लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं, उनके लिए किसी व्यक्ति का पद, प्रतिष्ठा, और अधिकार ऐसी चीज़ें नहीं हैं जो उनके हृदय को प्रभावित कर दें; सत्य को समझने वाले सभी लोगों के अंदर विवेक होता है और वे इस बात पर पुनर्विचार करते और सोचते हैं कि लोगों को परमेश्वर में अपनी आस्था के लिए किस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, और साथ ही उन्हें अगुआ और कार्यकर्ताओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। वे यह सोचना भी शुरू करते हैं कि लोगों को किसका अनुसरण करना चाहिए, किन व्यवहारों से लोगों का अनुसरण होता है, और किन व्यवहारों से परमेश्वर का अनुसरण होता है। कई वर्षों तक इन सत्यों पर विचार करने, और उपदेशों को अकसर सुनने के बाद, वे अनजाने में परमेश्वर में विश्वास करने से जुड़े सत्यों को समझने लगे हैं, और इसलिए उन्हें कुछ कद हासिल हुआ है। वे परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर निकल पड़े हैं।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'सत्य का अनुसरण करने वालों को वे निकाल देते हैं और उन पर आक्रमण करते हैं' से उद्धृत

कलीसिया के भीतर अगुआओं और कार्यकर्ताओं का स्तर जो भी हो, अगर तुम लोग हमेशा उनकी आराधना करते हो और परमेश्वर पर विश्वास करने और उद्धार प्राप्त करने के लिए उन पर हर चीज़ के लिए भरोसा करते हो, तो यह प्रेरणा अपने आप में ग़लत है। अगुआओं में उनका स्तर चाहे जो हो, वे हैं तो अभी भी आम इंसान ही। अगर तुम उन्हें अपने से बड़ा समझते हो, अगर तुम्हें लगता है कि वे तुमसे ऊंचे हैं, तुमसे ज़्यादा योग्य हैं, वे तुम्हारी अगुवाई करें, वे उस वर्ग में सर्वश्रेष्ठ हैं, तो फिर यह ग़लत है—यह तुम्हारा भ्रम है। और इस भ्रम का नतीजा क्या होता है? यह भ्रम और यह त्रुटिपूर्ण समझ तुम्हें अनजाने में अपने अगुआओं से ऐसी अपेक्षाएं करने की ओर ले जाएंगे जो वास्तविकता के अनुरूप नहीं हैं; साथ ही, तुम यह जाने बिना ही उनके तथाकथित रुझान और रौब, या उनकी योग्यताओं और प्रतिभाओं की ओर गहराई से आकर्षित होने लगोगे, इस हद तक कि तुम्हें पता भी न चलेगा और तुम उनकी आराधना कर रहे होगे, और वे तुम्हारे परमेश्वर बन चुके होंगे। जब वे तुम्हारे आदर्श और तुम्हारी आराधना के लक्ष्य बनना शुरू हो जाते हैं, तो यह पथ, उस क्षण से लेकर उस पल तक जब तुम उनके अनुयायियों में से एक बन जाते हो, तुम्हें अनजाने में परमेश्वर से दूर ले जाएगा। धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर जाते हुए भी, तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो, तुम परमेश्वर के घर में हो, तुम परमेश्वर की उपस्थिति में हो। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति लुभा चुका होगा जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, या जो मसीह का शत्रु है। यह बहुत ख़तरनाक स्थिति है। अतः इस समस्या को हल करने के लिए, तुम्हें मसीह के शत्रुओं के अलग-अलग स्वभाव और उनके काम करने के तरीकों को ठीक ढंग से समझने और पहचानने में सक्षम होना चाहिए। साथ ही, तुम्हें उनके कार्यों की प्रकृति और उनकी प्रणालियों और चालों को भी समझ लेना चाहिए जिनका उपयोग करना वे पसंद करते हैं; तुम्हें अपने आप पर भी काम करने की शुरुआत करनी चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करते हुए मनुष्य की आराधना करना सही रास्ता नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं: "हाँ, मैं अगुआओं की आराधना करता हूँ लेकिन ऐसा करने के मेरे अपने कारण हैं—जिनकी मैं आराधना करता हूँ वे मेरी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हैं।" तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हुए भी मनुष्य की आराधना करने पर क्यों तुले हुए हो? ये सब कुछ हो जाने के बाद, तुम्हें कौन बचाएगा? कौन है जो सचमुच तुम से प्रेम करता है और तुम्हारी रक्षा करता है—क्या तुम सचमुच नहीं देख पाते? तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उसके वचन को सुनते हो, और अगर कोई सही तरीके से बोलता है और कार्य करता है, और सत्य के सिद्धांतों के अनुसार चलता है, तो क्या सत्य का पालन करना तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है? तुम इतने नीच क्यों हो कि अनुसरण के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करने की ज़िद करते हो जिसकी तुम आराधना करो? तुम शैतान के गुलाम क्यों बनना चाहते हो? इसके बजाय, तुम सत्य के सेवक क्यों नहीं बनते? किसी व्यक्ति में समझदारी और गरिमा है या नहीं, यह देखना है तो यहाँ देखो। तुम्हें ख़ुद पर काम करना शुरू करना चाहिए, अपने आप को उन सत्यों से युक्त करो जो विभिन्न लोगों और घटनाओं में फ़र्क बताते हैं, उन तमाम मार्गों में भेद करना सीखो जिनमें प्रत्येक प्रकार की घटना और व्यक्ति अभिव्यक्त होते हैं, यह जानो कि सभी मामलों में कौन-से सार और स्वभाव सामने आ रहे हैं। तुम्हें यह भी समझना चाहिए कि तुम किस तरह के व्यक्ति हो, तुम्हारे आसपास के लोग किस तरह के हैं और किस तरह के लोग तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। उन्हें सही ढंग से देखने में तुम्हें सक्षम होना चाहिए। जब तुम सत्य से लैस हो जाओगे, तो इस तरह के अध्यात्मिक कद के साथ तुम मसीह के शत्रुओं की चालों में आसानी से नहीं फंसोगे और न ही तुम उनकी चालाकियों से डरोगे।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अजीब और रहस्यमय तरीके से व्यवहार करते हैं, वे स्वेच्छाचारी और तानाशाह होते हैं, वे कभी दूसरों के साथ संगति नहीं करते, और वे दूसरों को अपने आज्ञापालन के लिए मजबूर करते हैं' से उद्धृत

जब कोई व्यक्ति भाई-बहनों द्वारा अगुआ के रूप में चुना जाता है, या परमेश्वर के घर द्वारा कोई निश्चित कार्य करने या कोई निश्चित कर्तव्य निभाने के लिए उन्नत किया जाता है, तो इसका यह मतलब नहीं कि उसकी कोई विशेष हैसियत या पहचान है, या वह जिन सत्यों को समझता है, वे अन्य लोगों की तुलना में अधिक गहरे और संख्या में अधिक हैं—तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि यह व्यक्ति परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम है और उसे धोखा नहीं देगा। इसका यह मतलब भी नहीं है कि ऐसे लोग परमेश्वर को जानते हैं और परमेश्वर का भय मानते हैं। वास्तव में उन्होंने इसमें से कुछ भी हासिल नहीं किया है; उन्नति और विकास का सीधे-सीधे अर्थ केवल उन्नति और विकास ही है। उनकी उन्नति और विकास का सीधा-सा अर्थ है कि उन्हें उन्नत किया गया है, और वे विकसित किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और इस विकसित किए जाने का अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस रास्ते पर चलता है और किस चीज का अनुसरण करता है। इस प्रकार, जब कलीसिया में किसी को अगुआ बनने के लिए उन्नत और विकसित किया जाता है, तो उसे सीधे अर्थ में उन्नत और विकसित किया जाता है; इसका यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही योग्य अगुआ है, या सक्षम अगुआ है, कि वह पहले से ही अगुआ का काम करने में सक्षम है, और वास्तविक कार्य कर सकता है—ऐसा नहीं है। जब किसी को अगुआ के रूप में उन्नत और विकसित किया जाता है, तो क्या उसमें सत्य-वास्तविकता होती है? क्या वह सत्य-सिद्धांतों को समझता है? क्या वह व्यक्ति परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं को साकार करने में सक्षम है? क्या उसमें प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी की भावना है? जब उसके सामने कोई समस्या आती है, तो क्या वह सत्य की खोज करने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने में सक्षम होता है? यह सब अज्ञात है। क्या उस व्यक्ति के अंदर परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है? और परमेश्वर से उसका भय आखिर कितना बड़ा है? क्या काम करते समय उसके द्वारा अपनी इच्छा का पालन करने की संभावना रहती है? अगुआ का कार्य करने के दौरान क्या वह लोग परमेश्वर की इच्छा की खोज करने के लिए नियमित रूप से और अकसर परमेश्वर के सामने आता है? क्या वह लोगों का सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए मार्गदर्शन करने में सक्षम है? यह और इसके अलावा बहुत-कुछ, विकसित किए जाने और खोजे जाने की प्रतीक्षा कर रहा है; यह सब अज्ञात रहता है। किसी को उन्नत और विकसित करने का यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही सत्य को समझता है, और न ही इसका अर्थ यह है कि वह पहले से ही अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से करने में सक्षम है। तो किसी को उन्नत और विकसित करने का क्या उद्देश्य और मायने हैं? वह यह है कि ऐसे व्यक्ति को, एक व्यक्ति के रूप में, प्रशिक्षित किए जाने, विशेष रूप से सिंचित और निर्देशित करने के लिए उन्नत किया जाता है, जिससे वह सत्य-सिद्धांतों, और विभिन्न कामों को करने के सिद्धांतों, और विभिन्न समस्याओं को हल करने के सिद्धांतों, साधनों और तरीकों को समझने में सक्षम हो जाए, साथ ही यह भी, कि जब वह विभिन्न प्रकार के परिवेश और लोगों का सामना करे, तो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार और उस रूप में, जिससे परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा हो सके, उन्हें कैसे सँभालना और उनके साथ कैसे व्यवस्थित होना है। क्या यह इंगित करता है कि परमेश्वर के घर द्वारा उन्नत और विकसित की गई प्रतिभा उन्नत और विकसित किए जाने की अवधि के दौरान या उन्नत और विकसित किए जाने से पहले अपना काम करने और अपना कर्तव्य निभाने में पर्याप्त सक्षम है? बेशक नहीं। इस प्रकार, यह अपरिहार्य है कि विकसित किए जाने की अवधि के दौरान ये लोग निपटे जाने, काट-छाँट किए जाने, न्याय किए जाने और ताड़ना दिए जाने, उजागर किए जाने, यहाँ तक कि बदले जाने का भी अनुभव करेंगे; यह सामान्य बात है, उन्हें प्रशिक्षित और विकसित किया जा रहा है। जिन्हें उन्नत और विकसित किया जाता है, लोगों को उनसे उच्च अपेक्षाएँ या अवास्तविक उम्मीदें नहीं करनी चाहिए; यह अनुचित होगा, और उनके साथ अन्याय होगा। तुम लोग उन पर नजर रख सकते हो, और उनके उन कामों की शिकायत कर सकते हो, जिन्हें तुम लोग समस्या पैदा करने वाले मानते हो, लेकिन वे भी विकसित किए जाने की अवधि में हैं, और उन्हें ऐसे लोगों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जिन्हें पूर्ण बना दिया गया है, निर्दोष या ऐसे लोगों के रूप में तो बिलकुल भी नहीं, जो सत्य-वास्तविकता से युक्त हैं। वे तुम लोगों जैसे ही हैं : यह वह समय है, जब उन्हें प्रशिक्षित किया जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि वे साधारण लोगों की तुलना में अधिक काम करते और अधिक जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। उनके पास अधिक काम करने की जिम्मेदारी और दायित्व है; वे अधिक कीमत चुकाते हैं, अधिक कठिनाई सहते हैं, अधिक कष्ट झेलते हैं, अधिक समस्याएँ हल करते हैं, अधिक लोगों की निंदा सहन करते हैं, और निस्संदेह, सामान्य लोगों की तुलना में अधिक प्रयास करते हैं, कम सोते हैं, कम अच्छा भोजन करते हैं, और कम गपशप हैं। यह है उनके बारे में खास; इसके अतिरिक्त वे किसी भी अन्य व्यक्ति के समान होते हैं। मेरे यह कहने का क्या मतलब है? सभी को यह बताना कि उन्हें परमेश्वर के घर के द्वारा विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं की उन्नति और विकास की गलत व्याख्या नहीं करनी चाहिए, और इन लोगों से अपनी अपेक्षाओं में कठोर नहीं होना चाहिए। स्वाभाविक रूप से, लोगों को उनके बारे में अपनी राय में अयथार्थवादी भी नहीं होना चाहिए। उनकी अत्यधिक सराहना या सम्मान करना मूर्खता है, तो उनके प्रति अपनी अपेक्षाओं में अत्यधिक कठोर होना भी मानवीय या यथार्थवादी नहीं है। तो उनके साथ व्यवहार कार्य करने का सबसे तर्कसंगत तरीका क्या है? उन्हें सामान्य लोगों की तरह ही समझना, और जब कोई ऐसी समस्या आए जिसे खोजने की आवश्यकता हो, तो उनके साथ संगति करना और एक-दूसरे की क्षमताओं से सीखना और एक-दूसरे का पूरक होना। इसके अतिरिक्त, यह निगरानी रखना सभी की जिम्मेदारी है कि अगुआ और कार्यकर्ता वास्तविक कार्य कर रहे हैं या नहीं, और वे अपने कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम हैं या नहीं। यदि वे सक्षम न हों, और तुम लोगों ने उनकी असलियत देख ली हो, तो उनकी शिकायत करने या उन्हें हटाने में समय नष्ट न करो; किसी दूसरे को चुन लो, और परमेश्वर के घर के काम में देरी न करो। परमेश्वर के घर के काम में देरी करना खुद को और दूसरों को चोट पहुँचाना है, इसमें किसी का भला नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

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