132. दूसरों के साथ उनके सार के अनुसार व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) दूसरों को कभी भी मानवीय धारणाओं, कल्पनाओं या पारंपरिक संस्कृति के आधार पर मत देखो। उन्हें तो बस परमेश्वर के वचन सत्य के आधार पर देखा जाना चाहिए, जो कि प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति का सार स्पष्ट रूप से देखने का एकमात्र तरीका है।

(2) किसी विशेष क्षण में लोगों का जैसा प्रदर्शन रहा है उसके आधार पर उनका निरूपण मत करो। उनके सार को इस बात से आंका जाना चाहिए कि वे गुजरते समय के साथ कैसा प्रदर्शन करते हैं, यह दूसरों के साथ उचित व्यवहार करने का एकमात्र तरीका है।

(3) दंभी, आत्म-तुष्ट स्वभाव वाले लोग या जो लोग अपराध कर चुके हैं, लेकिन जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, उन्हें बुरे लोग नहीं मानना चाहिए। उनकी प्रेमपूर्वक मदद की जानी चाहिए।

(4) यदि किसी की भी सारभूत रूप से एक दुष्ट व्यक्ति, एक दुष्ट आत्मा, एक मसीह-विरोधी, या एक गैर-विश्वासी व्यक्ति होने की पुष्टि की जाती है, तो उस व्यक्ति को कलीसिया द्वारा बनाये गए नियमानुसार परिष्कृत या निष्कासित किया जाना चाहिए।

(5) धोखेबाज लोग जो अक्सर गलत विचारों को प्रकट करते हैं, जो अक्सर परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं और उसके खिलाफ रक्षात्मक होते हैं, गैर-विश्वासियों में गिने जाते हैं। उन्हें परिष्कृत या निष्कासित किया जाना है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है। यदि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो वे उससे नफरत करते हैं; और अगर वे उससे नफरत करते हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उनसे घृणा करता है। इसलिए, यदि तुम्हें अपने माता-पिता से नफरत करने के लिए कहा जाए, तो क्या तुम ऐसा कर सकोगे? यदि वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे बुरा-भला कहते हैं, तो वे निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं जिनसे वह घृणा करता है और शाप देता है। इन परिस्थितियों में, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यदि वे परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में बाधा डालते हैं या बाधा नहीं डालते? अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा, "कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई? ... क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है।" यह कहावत अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थी, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक उपयुक्त हैं : "उससे प्रेम करो, जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और उससे घृणा करो, जिससे परमेश्वर घृणा करता है।" ये वचन बिलकुल सीधे हैं, फिर भी लोग अकसर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

तुम्हारे पास सत्य है या नहीं और तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो या नहीं, यह तुम्हारे प्रकटन पर या तुम्हारी कभीकभार की बातचीत और आचरण पर नहीं बल्कि तुम्हारे सार पर निर्भर है। प्रत्येक व्यक्ति का सार तय करता है कि उसे नष्ट किया जाएगा या नहीं; यह किसी के व्यवहार और किसी की सत्य की खोज द्वारा उजागर हुए सार के अनुसार तय किया जाता है। उन लोगों में जो कार्य करने में एक दूसरे के समान हैं, और जो समान मात्रा में कार्य करते हैं, जिनके मानवीय सार अच्छे हैं और जिनके पास सत्य है, वे लोग हैं जिन्हें रहने दिया जाएगा, जबकि वे जिनका मानवीय सार दुष्टता भरा है और जो दृश्यमान परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं, वे विनाश की वस्तु होंगे। परमेश्वर के सभी कार्य या मानवता के गंतव्य से संबंधित वचन प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार उचित रूप से लोगों के साथ व्यवहार करेंगे; थोड़ी-सी भी त्रुटि नहीं होगी और एक भी ग़लती नहीं की जाएगी। केवल जब लोग कार्य करते हैं, तब ही मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होते हैं। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है; वह निश्चित तौर पर किसी प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करता। अभी बहुत से लोग हैं, जो मानवता के भविष्य के गंतव्य को समझने में असमर्थ हैं और वे उन वचनों पर विश्वास नहीं करते, जो मैं कहता हूँ। वे सभी जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य का अभ्यास नहीं करते, दुष्टात्मा हैं!

आजकल, वे जो खोज करते हैं और वे जो नहीं करते, दो पूरी तरह भिन्न प्रकार के लोग हैं, जिनके गंतव्य भी काफ़ी अलग हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं, वे लोग हैं जिनका परमेश्वर उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते, वे दुष्टात्माओं और शत्रुओं के समान हैं। वे प्रधान स्वर्गदूत के वंशज हैं और विनाश की वस्तु होंगे। यहाँ तक कि एक अज्ञात परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? जिन लोगों का अंत:करण साफ़ है, परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत-सी कठिनाइयाँ सहते हैं, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं और वे सब विनाश की वस्तु बनेंगे। जो भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता, दुष्ट है और इसके अलावा, वे नष्ट किए जाएँगे। वे सब जो विश्वास करते हैं, पर सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे जो देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं रखते, वे सब नष्ट होंगे। वे सभी जिन्हें रहने दिया जाएगा, वे लोग हैं, जो शोधन के दुख से गुज़रे हैं और डटे रहे हैं; ये वे लोग हैं, जो वास्तव में परीक्षणों से गुज़रे हैं। यदि कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता, शत्रु है; यानी कोई भी जो देहधारी परमेश्वर को नहीं पहचानता—चाहे वह इस धारा के भीतर है या बाहर—एक मसीह-विरोधी है! शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे नहीं, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? क्या ये वे लोग नहीं, जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं? क्या ये वे नहीं, जो विश्वास करने का दावा तो करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं, जो सिर्फ़ आशीष पाने की फ़िराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर के लिए गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन दुष्टात्माओं के साथ घुलते-मिलते हो और उनके प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रखते हो, लेकिन क्या इस मामले में तुम शैतान के प्रति सदिच्छाओं को प्रकट नहीं कर रहे? क्या तुम दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध नहीं हो रहे? यदि आज कल भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर की इच्छा जानने का कोई इरादा न रखते हुए या परमेश्वर की इच्छाओं को अपनी इच्छा की तरह मानने में असमर्थ रहते हुए, आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं, तो उनके अंत और भी अधिक ख़राब होंगे। यदि कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, तो वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम शत्रु के प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रख सकते हो, तो क्या तुममें धार्मिकता की समझ का अभाव नहीं है? यदि तुम उनके साथ सहज हो, जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और निजी भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम अवज्ञाकारी नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य होता है? यदि लोग शत्रुओं के प्रति साफ़ अंत:करण रखते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम करते हैं और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में रुकावट नहीं डाल रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते, और जो ज़बानी तौर पर देहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह-विरोधी हैं, उनकी तो बात ही क्या जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। ये सभी लोग विनाश की वस्तु बनेंगे। मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को आंकता है, वह व्यवहार पर आधारित है; वे जिनका आचरण अच्छा है, धार्मिक हैं और जिनका आचरण घृणित है, दुष्ट हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का सार परमेश्वर को समर्पित है या नहीं; वह जो परमेश्वर को समर्पित है, धार्मिक है और जो नहीं है वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है, भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा, भले ही इस व्यक्ति की बातें सही हो या ग़लत हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

ज्यादातर लोगों ने अपराध किए हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने परमेश्वर का विरोध किया है, कुछ ने उसके खिलाफ विद्रोह किया है, कुछ ने उसके खिलाफ शिकायत भरे शब्द बोले हैं, और अन्य लोगों ने ऐसी चीजें की हैं जो कलीसिया के लिए हानिकारक थीं या जिन्होंने परमेश्वर के घर को नुकसान पहुँचाया। इन लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? उनके परिणाम उनकी प्रकृति और तदनुरूपी व्यवहार के अनुसार निर्धारित किए जाएँगे। कुछ लोग दुष्ट होते हैं, कुछ मूर्ख होते हैं, कुछ भोंदू होते हैं और कुछ जानवर होते हैं। हर व्यक्ति अलग है। कुछ दुष्ट लोग दुष्ट आत्माओं के वश में होते हैं, जबकि अन्य लोग दुष्ट शैतान के अनुचर हैं। अपनी प्रकृति के लिहाज से कुछ लोग विशेष रूप से भयावह हैं, कुछ विशेष रूप से धोखेबाज हैं, कुछ लोग धन के मामले में विशेष रूप से लालची हैं, और अन्य लोग कामुक होने का आनंद लेते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार अलग है, अतः प्रत्येक व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत प्रकृति और व्यवहार के अनुसार व्यापक रूप से देखा जाना चाहिए। इंसान के नश्वर शरीर की सहज प्रवृत्तियों के अनुसार, चाहे वह कोई भी व्यक्ति हो, उसकी सहज प्रवृत्ति बस स्वतंत्र इच्छा रखने की होती है, वह केवल चीजों के बारे में सोचने में सक्षम होना चाहता है, लेकिन उसके पास आध्यात्मिक संसार में सीधे प्रवेश करने की क्षमता नहीं होती। यह ऐसा है, जैसे कि जब तुम सच्चे परमेश्वर पर विश्वास लाते हो और उसके इस नए कार्य के चरण को स्वीकार करना चाहते हो, लेकिन कोई तुम्हें सुसमाचार सुनाने नहीं आता, तुम्हारे पास तुम्हें प्रबुद्ध करने और तुम्हारा मार्गदर्शन करने के लिए मात्र पवित्र आत्मा का कार्य होता है : इस तरह तुम्हारे लिए यह जानना असंभव होता है कि परमेश्वर भविष्य में क्या करेगा। लोग परमेश्वर की थाह नहीं ले सकते, उनमें ऐसा करने की क्षमता नहीं है, न ही उनमें आध्यात्मिक संसार को सीधे तौर पर समझने या परमेश्वर के कार्य को अच्छी तरह से समझने की क्षमता है, स्वर्गदूत की तरह पूरे मन से उसकी सेवा करने की क्षमता तो उनमें बिलकुल भी नहीं है। परमेश्वर लोगों पर विजय न पाए या उन्हें सुधारे नहीं, या उन्हें सिंचित न करे और उन्हें उन सत्यों की आपूर्ति न करे जिन्हें वह व्यक्त करता है, तो लोग नए कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ होंगे। यदि परमेश्वर यह कार्य न करे, तो उनके भीतर ये चीजें नहीं होंगी, और यह उनकी सहज प्रवृत्ति द्वारा तय किया जाता है। इस प्रकार, जब कुछ लोग विरोध या विद्रोह करते हैं, तो वे परमेश्वर का क्रोध और घृणा झेलते हैं। लेकिन फिर, उनकी सहज प्रवृत्ति पर विचार करके परमेश्वर हर मामले को अलग तरह से लेता है और हर मामले से अलग से निपटता है। इसलिए, परमेश्वर द्वारा किया गया हर कार्य नपा-तुला होता है। वह जानता है कि क्या करना है और कैसे करना है। जहाँ तक उन चीजों का संबंध है, जिन्हें लोग सहज रूप से नहीं कर सकते, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उनसे ऐसा करने की अपेक्षा नहीं करेगा। वह प्रत्येक व्यक्ति से उस वक्त के परिवेश और संदर्भ, वास्तविक स्थिति, लोगों के कार्यों, व्यवहार और अभिव्यक्तियों के अनुसार निपटता है। परमेश्वर कभी किसी के साथ गलत नहीं करेगा। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। उदाहरण के लिए, हव्वा ने साँप के मजबूर करने पर भले एवं बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाया, लेकिन यहोवा परमेश्वर ने उसे यह कहकर धिक्कारा नहीं, "मैंने तुम्हें इसे खाने से मना किया था, फिर भी तुमने ऐसा क्यों किया? तुममें विवेक होना चाहिए; तुम्हें यह पता होना चाहिए कि साँप ने केवल तुम्हें बहकाने के लिए वैसा कहा था।" यहोवा परमेश्वर ने ऐसा नहीं कहा, न ही उसने हव्वा को फटकारा। चूँकि उसने मनुष्यों को बनाया है, इसलिए वह जानता है कि उनकी सहज प्रवृत्तियाँ क्या हैं, उनकी सहज प्रवृत्तियाँ किससे बनी हैं, किस हद तक लोग स्वयं को नियंत्रित कर सकते हैं, और लोग क्या करने में सक्षम हैं। जब परमेश्वर किसी से निपटता है, जब वह किसी के प्रति कोई रवैया अपनाता है—चाहे वह घृणा का हो या नाराजगी का—और जब कोई कुछ स्थितियों में कुछ बातें कहता है, तो परमेश्वर उस व्यक्ति की स्थिति को अच्छी तरह समझता है। लोग हमेशा सोचते हैं कि परमेश्वर में मात्र दिव्यता है, कि वह धार्मिक और अपमान न किए जा सकने योग्य है। वे सोचते हैं कि उसमें कोई मानवता नहीं है, वह लोगों की कठिनाइयों पर विचार नहीं करता, और वह खुद को लोगों के स्थान पर रखकर नहीं देखता; वे मानते हैं कि अगर लोग सत्य के अनुसार अभ्यास नहीं करेंगे तो वह उन्हें दंड देगा, और अगर कोई थोड़ा-सा भी विरोध करेगा तो वह उसे याद रखेगा और बाद में उसे दंड देगा। वास्तव में ऐसा नहीं है। यदि परमेश्वर की धार्मिकता, उसके कार्य और लोगों के प्रति उसके रवैये के बारे में तुम्हारा ऐसा विचार है, तो तुम गंभीर रूप से गलत हो। लोगों से निपटने के लिए परमेश्वर जिस आधार का उपयोग करता है, वह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है। परमेश्वर धार्मिक है; परमेश्वर के अपने सिद्धांत हैं—और देर-सबेर वह सभी मनुष्यों को पूरी तरह से आश्वस्त कर देगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर किस आधार पर लोगों से बर्ताव करता है' से उद्धृत

मानवीय प्रकृति में कुछ विशेषताएँ होती हैं, जो सभी लोगों में समान होती हैं : इन्हें तुम्हें अवश्य जानना चाहिए। सभी लोग परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने में सक्षम हैं, यह एक साझी विशेषता है, लेकिन हर किसी की अपनी विशेष बड़ी कमजोरी होती है। कुछ लोग इसे पसंद करते हैं तो कुछ लोग उसे पसंद करते हैं, कुछ लोग इसका सम्मान करते हैं तो कुछ लोग उसका सम्मान करते हैं। ये लोगों की प्रकृति में पाए जाने वाले अंतर हैं। कुछ लोग बहुत अधिक कष्ट सहने में सक्षम होते हैं, तो कुछ लोग थोड़ी-सी पीड़ा के बाद ही नकारात्मक हो जाते हैं और शिकायत करना शुरू कर देते हैं और उन्हें सहन करने में कठिनाई होती है। ऐसा क्यों है कि एक ही घटना का सामना करने पर हर कोई अलग तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनकी प्रकृति में अलग चीजें हैं। कुछ लोगों के भ्रष्ट स्वभाव अपनी अभिव्यक्ति में अधिक गंभीर होते हैं, जबकि अन्य लोगों के स्वभाव अधिक मृदु होते हैं; लेकिन होते वे अनिवार्य रूप से एक ही हैं। यह एक साझी विशेषता है। किसी व्यक्ति की प्रकृति कैसी है, यह तय करता है कि वह किस तरह का व्यक्ति है। भले ही उनमें दूसरों के समान विशेषताएँ हों, लेकिन आवश्यक नहीं कि वे एक ही जैसे लोग हों। मैं क्यों कहता हूँ कि वे एक ही जैसे लोग नहीं हैं? क्योंकि यह चीज जो उनकी प्रकृति में है, हो सकता है उतनी स्पष्ट या तीव्र न हो। उदाहरण के लिए, वासना एक साझी मानवीय विशेषता है। यह सबमें होती है। इतना ही नहीं, इस पर काबू पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन कुछ लोगों में यह विशेष रूप से तीव्र होती है। जब यह समस्या सामने आती है, तो वे इस पर काबू पाने में असमर्थ होते हैं, और फिर वे दूसरे के साथ भाग सकते हैं या दूसरे को भगा ले जा सकते हैं। कहा जा सकता है कि ये लोग प्रकृति से दुष्ट होते हैं। कुछ लोग इस समस्या का सामना करने में थोड़े कमजोर होते हैं, या वे वासना के आवेग के प्रति थोड़े संवेदनशील होते हैं, लेकिन वे शर्मनाक कृत्य नहीं करते, वे खुद को नियंत्रित करने और इन कृत्यों से दूर रहने में सक्षम होते हैं। उस स्थिति में तुम यह नहीं कह सकते कि ये लोग अपनी प्रकृति से दुष्ट हैं। जब तक देह है, तब तक वासना युक्त जुनून रहेगा। कुछ लोग अपनी वासना में लिप्त हो जाते हैं और कामुकता में जो मन में आए वह करते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे बिलकुल नहीं होते। वे सत्य का अनुसरण करने, अपने कार्यों को सत्य पर आधारित करने और देह-सुख त्यागने में सक्षम होते हैं। भले ही उनमें भी देह की वासनाएँ होती हैं, लेकिन वे अलग तरह से व्यवहार करते हैं। यहीं लोग एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। कुछ लोग पैसे का लालच करते हैं; जब वे पैसा और अच्छी चीजें देखते हैं, तो उन्हें पाना चाहते हैं, और उनकी उन्हें पाने की इच्छा असाधारण रूप से प्रबल होती है। इन लोगों की प्रकृति लालची और लोभी होती है। कोई चीज देखते ही वे लोभी हो जाते हैं; वे कलीसिया का पैसा तक खर्च और चोरी करने का साहस कर डालते हैं, यहाँ तक कि दसियों हजार युआन भी; जितना अधिक पैसा होता है, उतनी ही अधिक वे इसे करने की हिम्मत करते हैं; वे परमेश्वर से बिलकुल नहीं डरते। यह लालची प्रकृति है। कलीसिया के 10 या 20 युआन खर्च करने पर भी कुछ लोगों का विवेक उन्हें सालता है। वे जल्दी से परमेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना करने के लिए घुटने टेक देते हैं, और पश्चात्ताप के आँसू बहाते हुए परमेश्वर से क्षमा माँगते हैं। हर किसी में कमजोरियाँ होती हैं : तुम यह नहीं कह सकते कि यह एक लालची व्यक्ति है—यह केवल एक भ्रष्ट स्वभाव प्रदर्शित होने का मामला है। कुछ लोग दूसरों की आलोचना करना पसंद करते हैं। वे कहेंगे : "इस आदमी ने कलीसिया के पैसे में से कुछ युआन खर्च कर दिए, लेकिन वह अभी भी परमेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना करने नहीं आया। अगली बार वह दर्जनों युआन खर्च करेगा। यह एक लालची आदमी है!" इस तरह से बात करना ठीक नहीं है। जब लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं, तो उनमें सामान्य कमजोरियाँ होना तय है। कुछ मानवीय कमजोरियाँ भी उनके भ्रष्ट स्वभाव का हिस्सा होती हैं, लेकिन एक भ्रष्ट स्वभाव और उस तरह की प्रकृति के बीच अंतर होता है। तुम इन दोनों को एक ही लाठी से नहीं हाँक सकते या मनमाने ढंग से लोगों की आलोचना नहीं कर सकते। दूसरों की आलोचना करना उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाता है। अगर तुम चीजों में स्पष्ट रूप से भेद नहीं कर सकते या उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो निराधार दावे करने से बचो, ताकि लोगों को चोट न पहुँचे। सत्य को समझे बिना बोलना और कार्य करना असैद्धांतिक है और इससे न तो दूसरों को और न ही स्वयं को कोई लाभ होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'समझना ही होगा कि लोगों की प्रकृतियों में समानताएँ भी हैं और भिन्नताएँ भी' से उद्धृत

यद्यपि पतरस द्वारा यीशु का अनसुरण प्रारंभ करने के बाद प्राकृतिक प्रकाशन घटित हुए थे, किंतु प्रकृति से वह, बिलकुल आरंभ से ही, ऐसा व्यक्ति था जो पवित्र आत्मा के प्रति समर्पित होने और मसीह के अनुसरण की तलाश करने का इच्छुक था। पवित्र आत्मा के प्रति उसकी आज्ञाकारिता शुद्ध थी : उसने प्रसिद्धि और सौभाग्य की खोज नहीं की, बल्कि इसके बजाय वह सत्य का अनुपालन करने से प्रेरित था। यद्यपि तीन बार ऐसा हुआ कि पतरस ने यीशु को जानने से इनकार कर दिया था, और यद्यपि उसने प्रभु यीशु को जाँचा-परखा था, किंतु ऐसी हल्की-सी मानवीय कमज़ोरी का उसकी प्रकृति से कोई संबंध नहीं था, इसने उसके भविष्य के अनुसरण को प्रभावित नहीं किया था, और यह समुचित रूप से सिद्ध नहीं कर सकता है कि उसकी जाँच-परख मसीह-विरोधी का कार्य था। सामान्य मानवीय कमज़ोरी कुछ ऐसी चीज़ है जो संसार के सभी लोगों द्वारा साझा की जाती है—क्या तुम पतरस के ज़रा भी भिन्न होने की अपेक्षा करते हो? क्या पतरस के बारे में लोगों के कुछ निश्चित विचार इसलिए नहीं हैं क्योंकि उसने अनेक मूर्खतापूर्ण ग़लतियाँ की थीं? और क्या लोग पौलुस द्वारा किए गए समस्त कार्य, और उसके द्वारा लिखी गई सभी पत्रियों के कारण उसकी अत्यधिक प्रशंसा नहीं करते हैं? मनुष्य के सार को अच्छी तरह समझने में भला मनुष्य कैसे सक्षम हो सकता है? निश्चय ही जिनमें सच्ची समझ है वे ऐसी कोई महत्वहीन चीज़ समझ सकते हैं? यद्यपि पतरस के दर्दनाक अनुभवों के कई वर्ष बाइबिल में दर्ज़ नहीं किए गए हैं, किंतु इससे यह साबित नहीं होता है कि पतरस को वास्तविक अनुभव नहीं हुए थे, या पतरस को पूर्ण नहीं बनाया गया था। मनुष्य परमेश्वर के कार्य की पूरी थाह कैसे ले सकता है? बाइबिल के अभिलेख यीशु द्वारा व्यक्तिगत रूप से नहीं चुने गए थे, बल्कि बाद की पीढ़ियों द्वारा संकलित किए गए थे। ऐसा होने से, क्या वह सब जो बाइबिल में दर्ज़ किया गया था मनुष्य के विचारों के अनुसार नहीं चुना गया था? इतना ही नहीं, पतरस और पौलुस के अंत पत्रियों में स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं हैं, अतः मनुष्य पतरस और पौलुस को स्वयं अपनी धारणाओं के अनुसार, और स्वयं अपनी वरीयताओं के अनुसार परखता है। और चूँकि पौलुस ने इतना अधिक कार्य किया था, चूँकि उसके "योगदान" इतने बड़े थे, इसलिए उसने जनसमुदाय का भरोसा जीत लिया था। क्या मनुष्य केवल उथली बातों पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करता है? मनुष्य का सार अच्छी तरह समझने में भला मनुष्य कैसे सक्षम हो सकता है? इसके साथ ही, इस बात को देखते हुए कि पौलुस हज़ारों सालों से आराधना का विषय रहा है, भला कौन उसके कार्य को जल्दबाज़ी में नकारने की हिम्मत करेगा? पतरस मात्र एक मछुआरा था, तो उसका योगदान पौलुस के योगदान जितना बड़ा कैसे हो सकता था? उनके द्वारा दिए गए योगदान की दृष्टि से, पौलुस को पतरस से पहले पुरस्कृत किया जाना चाहिए था, और उसे वह व्यक्ति होना चाहिए था जो परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए बेहतर योग्य था। कौन यह कल्पना कर सकता था कि पौलुस के प्रति अपने बर्ताव में, परमेश्वर ने उससे मात्र उसकी प्रतिभाओं के माध्यम से कार्य करवाया था, जबकि परमेश्वर ने पतरस को पूर्ण बना दिया था। बात निश्चित रूप से यह नहीं है कि प्रभु यीशु ने, बिल्कुल शुरुआत से ही, पतरस और पौलुस के लिए योजनाएँ बना ली थीं : इसके बजाय उन्हें उनकी अंतर्निहित प्रकृतियों के अनुसार पूर्ण बनाया गया था या कार्य में लगाया गया था। और इसलिए, लोग जो देखते हैं वे मनुष्य के बाह्य योगदान मात्र हैं, जबकि परमेश्वर जो देखता है वह मनुष्य का सार है, साथ ही वह पथ है जिसका मनुष्य आरंभ से अनुसरण करता है, और मनुष्य के अनुसरण के पीछे निहित प्रेरणा है। लोग मनुष्य को अपनी धारणाओं के अनुसार, और स्वयं अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार आँकते हैं, फिर भी मनुष्य का निर्णायक अंत उसकी बाहरी चीज़ों के अनुसार निर्धारित नहीं होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

इस प्रकार के लोग होते हैं जो किसी के साथ प्रेम, सहयोग की भावना और धैर्य के साथ पेश आते हैं, लेकिन वे केवल परमेश्वर के ही कट्टर विरोधी, और पक्के दुश्मन होते हैं। जब उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो सत्य का स्पर्श करती है, जो बताती है कि परमेश्वर क्या कहता और चाहता है, वे कठिनाइयाँ उत्पन्न करते हुए, इसे निरंतर संदेह की दृष्टि से देखते हुए और अवधारणाएँ फैलाते हुए, न केवल इसे स्वीकार करने में असमर्थ होते हैं, बल्कि बहुत सारी ऐसी हरकतें भी करते हैं जो परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान पहुंचाती हैं, यहां तक कि कोई बात जब उनके अपने हितों को प्रभावित करती है तो वे परमेश्वर के विरोध में उठ खड़े होने और उसके विरुद्ध चीखने-चिल्लाने में भी समर्थ होते हैं। किस तरह के लोग हैं ये? (वे जो परमेश्वर से घृणा करते हैं।) परमेश्वर के प्रति घृणा सभी लोगों की प्रकृति का एक पहलू है, और सभी में यह सार मौजूद होता है; फिर भी, कुछ लोगों में यह उतना गंभीर नहीं होता। तो, क्यों इस तरह के लोग परमेश्वर से इतनी घृणा करते हैं? वे परमेश्वर के दुश्मन हैं; स्पष्ट शब्दों में—वे दानव हैं, जीवित दानव। क्या लोगों के बीच ऐसे जीवित दानव हैं जिन्हें परमेश्वर बचाता है? (नहीं।) इसलिए, अगर तुम कलीसिया में इस तरह के कुछ जीवित दानव की सही पहचान कर लेते हो, तो तुम्हें अविलंब उन्हें उस जगह से हटा देना होगा। अगर कोई व्यक्ति सामान्यतः बिल्कुल अच्छा व्यवहार करता है, लेकिन उसकी अवस्था में बस एक क्षणिक चूक है, या उसका कद इतना छोटा है कि वह सत्य को नहीं समझ सकता, और वह एक हलका व्यवधान या बाधा उत्पन्न करता हो, लेकिन यह व्यवहार सुसंगत न हो, और वह प्रकृति से ऐसा व्यक्ति न हो, तो उसे रहने दिया जा सकता है। कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो अपनी कमजोर मानवता के बावजूद एक लिहाज से कुशल होते हैं : वे सेवा करने के इच्छुक होते हैं, यहाँ तक कि पीड़ा सहने के लिए भी तैयार रहते हैं, बस वे कोई अपराध बरदाश्त नहीं करते और जो कोई भी उन्हें ठेस पहुंचाता है, उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं, लेकिन जब उन्हें ठेस नहीं पहुंचाई जाती, तो वे काफी सामान्य होते हैं। उन्होंने दूसरों से लाभ भी नहीं उठाया होता है। ऐसे लोगों को भी रहने दिया जा सकता है, और हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उन्हें बचा ही लिया जाएगा, वे कम-से-कम सेवा प्रदान कर सकते हैं, और वे अंत तक सेवा कर सकते हैं या नहीं, यह उनकी व्यक्तिगत खोज पर निर्भर करता है। लेकिन, यदि ऐसा व्यक्ति जीवित दानव या परमेश्वर का शत्रु है, तो उसे कभी बचाया नहीं जा सकेगा। यह निश्चित है, और उसे कलीसिया से हटा दिया जाना चाहिए। कुछ लोगों को पश्चात्ताप का एक अवसर प्रदान करने, एक सबक सिखाने के लिए हटाया जाता है; दूसरे इसलिए हटाए जाते हैं क्योंकि उनकी असली प्रकृति देख ली गई होती है, और उन्हें बचाया नहीं जा सकता। हर व्यक्ति अलग होता है। हटाए गए कुछ लोगों ने अपनी अवसादग्रस्त और स्याह अवस्था के बावजूद अपने कर्त्तव्य का त्याग नहीं किया है, और वे उसका पालन कर रहे हैं—उनकी अवस्था उन लोगों जैसी नहीं है जो अपने कर्त्तव्य का पालन बिलकुल नहीं करते, और जो मार्ग वे अपनाते हैं वह अलग होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

कलीसियाओं में ऐसे लोग होते हैं जो सोचते हैं कि कुछ मेहनत करना या कुछ जोखिम भरा काम करने का मतलब है कि उन्होंने योग्यता अर्जित कर ली है, और अपने कार्यों के अनुसार वे वास्तव में प्रशंसा के योग्य हैं। लेकिन उनका स्वभाव और सत्य के प्रति उनका रवैया घृणास्पद होते हैं; उन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं होता है, और यह अकेले ही उन्हें घृणा के योग्य बना देता है। ऐसे लोग बेकार होते हैं। जब परमेश्वर देखता है कि लोग तुच्छ क्षमता के हैं, कि उनमें कुछ कमियाँ हैं, और उनमें भ्रष्ट स्वभाव या एक ऐसा सार है जो परमेश्वर का विरोध करता है, तो उसे उनसे कोई विकर्षण नही होता, और वह उन्हें अपने से दूर नहीं रखता। परमेश्वर की ऐसी इच्छा नहीं है, और न ही यह इंसान के प्रति उसका दृष्टिकोण है। परमेश्वर लोगों की तुच्छ क्षमता से नफ़रत नहीं करता, वह उनकी मूर्खता से नफरत नहीं करता, और वह इस बात से भी नफ़रत नहीं करता कि उनके स्वभाव भ्रष्ट हैं। परमेश्वर वास्तव में तब नफ़रत करता है जब लोग सत्य से घृणा करते हैं। यदि तुम सच्चाई से घृणा करते हो, तो केवल इसी एक कारण से, परमेश्वर कभी भी तुमसे खुश नहीं होगा। यह बात पत्थर की लकीर है। यदि तुम सत्य से घृणा करते हो, यदि तुम सत्य से प्रेम नहीं करते हो, यदि तुम बेपरवाह, तिरस्कारपूर्ण, घमंडी हो, और यहाँ तक कि जब परमेश्वर सत्य को व्यक्त करता है तो तुम विकर्षण, प्रतिरोध और अस्वीकृति का प्रदर्शन करते हो, तो ऐसी अभिव्यक्तियाँ तुम्हारे लिए परमेश्वर की घृणा का कारण बनेंगी, और तुम बचाए नहीं जाओगे। यदि तुम सत्य से प्रेम करते हो, तो भले ही तुम्हारी क्षमता कुछ तुच्छ हो, चाहे तुम परमेश्वर में बहुत लंबे समय से विश्वास नहीं करते रहे हो, चाहे तुम अक्सर गलतियाँ और बेवकूफ़ी के काम करते हो, पर जब परमेश्वर सत्य पर संगति करता है तो तुम इसे बहुत पसंद करते हो, यदि सत्य और परमेश्वर के वचनों के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण ईमानदार है, अगर यह सच्चा और उत्सुकता भरा है, यदि तुम सत्य को चाहते हो और इसका चाव रखते हो, तो परमेश्वर तुम पर दया करेगा। परमेश्वर तुम्हारे अज्ञान और तुम्हारी तुच्छ क्षमता से अप्रभावित रहता है, क्योंकि सत्य के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण सच्चा और उत्सुकता भरा है, और तुम्हारा हृदय सच्चा है; परमेश्वर तुम्हारे हृदय और रवैये को आँकता है, और वह हमेशा तुम्हारे प्रति दयालु होगा—और इसलिए तुम्हें उद्धार की आशा होगी। दूसरी ओर, यदि तुम दिल के कठोर और विलासी हो, अगर तुम सत्य से घृणा करते हो, और परमेश्वर के वचनों और सत्य की किसी भी बात से प्रेम नहीं करते हो, कभी भी इनके प्रति सचेत नहीं रहते हो, और अपने दिल की गहराइयों से विरोधी और तिरस्कारपूर्ण हो, तो फिर तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया कैसा होगा? खीज, विकर्षण, और निरंतर क्रोध का। परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव में कौन-सी दो विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं? प्रचुर दया और गहरा क्रोध। "प्रचुर दया" में "प्रचुर" का अर्थ यह होता है कि परमेश्वर की दया सहिष्णु, धैर्यवान, सहनशील है, और यही सबसे बड़ा प्रेम है—"प्रचुर" का यही अर्थ होता है। चूँकि कुछ लोग मूर्ख और तुच्छ क्षमता के होते हैं, परमेश्वर को इसी तरह कार्य करना पड़ता है। अगर तुम सत्य से प्रेम करते हो, भले ही तुम मूर्ख और तुच्छ क्षमता के हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया केवल प्रचुर दया का ही हो सकता है। दया में धैर्य और सहिष्णुता शामिल होते हैं: परमेश्वर तुम्हारे अज्ञान के प्रति सहिष्णु और धैर्यवान है, वह तुम्हें सहारा देने, तुम्हारे लिए प्रावधान देने, और तुम्हारी सहायता करने के लिए तुम्हें पर्याप्त विश्वास और सहिष्णुता प्रदान करता है, ताकि तुम थोड़ा-थोड़ा करके सत्य को समझो और धीरे-धीरे आगे बढ़ो। यह किस नींव पर निर्मित किया जाता है? एक ऐसे व्यक्ति के दृष्टिकोण पर जो सत्य से प्रेम करता है और उसके लिए तड़पता है, जो परमेश्वर, उसके वचनों और सत्य के प्रति ईमानदार होता है। ये वे मूलभूत व्यवहार हैं जो लोगों में प्रकट होने चाहिए। लेकिन अगर कोई सत्य से नफ़रत करता है, सत्य का तिरस्कार करता है, इसे अस्वीकार करता है, और इसका विरोध करता है, अगर वह कभी किसी के साथ सत्य पर संगति नहीं करता है, और केवल यही कहता है कि उसने कैसे काम किया है, कि उसके पास कितना अनुभव है, कि वह किस-किस हालात से गुज़र चुका है, कि कैसे परमेश्वर उसे बहुत अच्छा मानता है और उसे महान कार्य सौंपता है—यदि वह केवल ऐसी पूंजी और उपलब्धियों की और अपनी प्रतिभाओं की ही बातें करता है, और इन चीज़ों का उपयोग दिखावा करने के लिए करता है, और सत्य पर कभी भी संगति नहीं करता है, परमेश्वर की गवाही नहीं देता है, या सत्य और परमेश्वर के ज्ञान के संबंध में अपनी समझ और अनुभवों पर संगति नहीं करता है, तो क्या वह सत्य से विमुख नहीं है? सत्य से प्रेम न करने की यही अभिव्यक्ति होती है। कुछ लोग कहते हैं, "यदि वे सत्य से प्रेम नहीं करते तो वे धर्मोपदेशों को कैसे सुन सकते हैं?" क्या हर कोई जो उपदेश सुनता है वह सत्य से प्रेम करता है? कुछ लोग सिर्फ दिखावा करते हैं, वे दूसरों के सामने नाटक करने के लिए मजबूर होते हैं, इस डर से कि अगर वे कलीसिया के जीवन में भाग नहीं लेंगे, तो परमेश्वर का घर उनकी आस्था को स्वीकार नहीं करेगा। परमेश्वर सत्य के प्रति इस तरह के दृष्टिकोण को कैसे परिभाषित करता है? परमेश्वर कहता है कि ऐसे लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, कि वे सत्य का तिरस्कार करते हैं। उनके स्वभाव में एक बात होती है जो उनके जीने या मरने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण, घमंड और छल से भी अधिक महत्व की, होती है : यह है सत्य का तिरस्कार। परमेश्वर यह देखता है। परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को देखते हुए, वह ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है? परमेश्वर उनके प्रति क्रोधित होता है। जब परमेश्वर किसी के प्रति क्रोधित होता है, तो वह उन्हें फटकारता है, या उन्हें अनुशासित और दंडित करता है। यदि वे जान-बूझकर परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं, तो वह कुछ समय के लिए सहनशील और चौकस रहेगा, और परिस्थिति या अन्य उद्देश्यपूर्ण कारणों से, उसे सेवा प्रदान करने के लिए वह इस अविश्वासी का उपयोग करेगा। लेकिन जैसे ही परिवेश अनुमति देता है, और समय सही होता है, इन लोगों को परमेश्वर के घर से बाहर निकाल दिया जाएगा, क्योंकि वे सेवा प्रदान करने के भी योग्य नहीं हैं। परमेश्वर का प्रकोप ऐसा होता है। परमेश्वर इतना प्रचंड क्रोध क्यों करता है? क्योंकि परमेश्वर ने उन लोगों के अंत और वर्गीकरण को परिभाषित किया है जो सत्य से घृणा करते हैं। परमेश्वर उन्हें शैतान के शिविर में वर्गीकृत करता है, और क्योंकि परमेश्वर उनके प्रति क्रोधित है, और उनसे घृणा करता है, वह उन पर दरवाज़ा बंद कर देता है, वह उन्हें परमेश्वर के घर में पैर रखने की अनुमति नहीं देता है, और उन्हें बचाए जाने का मौका नहीं देता है। यह परमेश्वर के क्रोध की एक अभिव्यक्ति है। परमेश्वर उन्हें शैतान, घिनौने राक्षसों और बुरी आत्माओं के स्तर पर, गैर—विश्वासियों के स्तर पर, रखता है और जब समय सही होता है, तो वह उन्हें हटा देता है। क्या यह उनके साथ निपटने का एक तरीका नहीं है? परमेश्वर का प्रकोप ऐसा ही होता है। और एक बार हटा दिए जाने के बाद, उनका क्या होता है? वे फिर कभी वे परमेश्वर के अनुग्रह और आशीषों का, और परमेश्वर के उद्धार का, आनंद नहीं ले पाएँगे।

अनुग्रह के युग में, यह कहा गया था कि परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को बचाया जाए और वह नहीं चाहता कि किसी को भी विनाश का सामना करना पड़े। मानव जाति, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया था, उसे बचाने के प्रति परमेश्वर का ऐसा रवैया और ऐसी भावना है। यह परमेश्वर की इच्छा है, लेकिन वास्तव में, बहुत से लोग परमेश्वर का उद्धार स्वीकार नहीं करते; वे शैतान के हैं और उनको बचाया नहीं जाएगा। ये शब्द संपूर्ण मानव जाति के प्रति ईश्वर के रवैये को दर्शाते हैं: उसका प्रेम असीमित है, यह अतुलनीय रूप से विशाल है, यह शक्तिशाली है। लेकिन जो लोग सत्य से घृणा करते हैं, उनको वह मुक्त रूप से अपना प्रेम और उद्धार देने का अनिच्छुक है, न ही वह ऐसा कभी करेगा। यही परमेश्वर का रवैया है। सत्य से घृणा करना किसके तुल्य है? क्या यह खुद को परमेश्वर के खिलाफ स्थापित करना है? क्या यह खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करना है? क्या यह परमेश्वर को खुले तौर पर यह बताने के समान है, "तुझे जो भी कहना है उसे सुनने में मुझे कोई आनंद नहीं आता। अगर मुझे यह पसंद नहीं है, तो यह सत्य नहीं है, और मैं इसे सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करूँगा। यह केवल तभी सत्य होगा जब मैं इसे स्वीकार करूंगा और इसे पसंद करूंगा।" जब तुम्हारा सत्य के प्रति यह रवैया हो, तो क्या यह खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करना नहीं है? यदि तुम परमेश्वर के प्रति खुले तौर पर शत्रुता रखते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बचाएगा? नहीं। यही बात परमेश्वर के क्रोध का कारण है। सत्य से घृणा करने वाले लोगों का सार परमेश्वर से शत्रुता का सार है। परमेश्वर इस सार वाले लोगों को आम लोग नहीं मानता; वह उन्हें दुश्मन मानता है, राक्षस मानता है, और उनको कभी नहीं बचाएगा। यह परमेश्वर के कोप की अभिव्यक्ति है। ... परमेश्वर के किसी व्यक्ति या किसी एक प्रकार के व्यक्तियों के प्रति इतना कुपित होने का एक कारण है। वह परमेश्वर की मर्जी से नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के सत्य के प्रति रवैये से निर्धारित होता है। किसी व्यक्ति का सत्य से घृणा करना, उसके उद्धार पाने के लिए अत्यंत ही घातक है; यह कोई पाप नहीं है जिसे माफ किया या नहीं किया जा सकता, यह व्यवहार का एक रूप भी नहीं है या ऐसी कोई चीज नहीं है जो क्षणिक रूप में उनमें प्रकट होती हो; यह एक व्यक्ति का प्रकृति-सार है, और परमेश्वर ऐसे लोगों से सबसे अधिक घृणा करता है। यदि यह कभी-कभार तुममें प्रकट होता है तो इस बात पर विचार करो कि क्या यह इसलिए है क्योंकि तुम सत्य को नहीं समझते हो, और तुमको खोज करने की जरूरत है, और तुम्हें परमेश्वर की प्रबुद्धता और सहायता की आवश्यकता है, या क्या यह इसलिए है क्योंकि तुम अपने हृदय की गहराई से सत्य से विमुख हो। यदि यह तुम्हारा प्रकृति-सार है, यदि तुमने कभी सत्य से प्रेम नहीं किया है, और सत्य तुम्हारे हृदय में विरक्ति और घृणा पैदा करता है, यदि तुम उसका तिरस्कार करते हो, तो तुम संकट में हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

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