132. दूसरों के साथ उनके सार के अनुसार व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) दूसरों को कभी भी मानवीय धारणाओं, कल्पनाओं या पारंपरिक संस्कृति के आधार पर मत देखो। उन्हें परमेश्वर के वचनों में निहित सत्य के एकमात्र आधार पर देखा जाना चाहिए, जो कि प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति का सार स्पष्ट रूप से देखने का एकमात्र तरीका है;

(2) लोगों का निरूपण इसके आधार पर मत करो कि वे किसी दिए गए पल में कैसे पेश आते हैं। उनके सार को इस बात से आंका जाना चाहिए कि वे गुज़रते समय के साथ कैसा प्रदर्शन करते हैं, यह दूसरों के साथ उचित व्यवहार करने का एकमात्र तरीका है;

(3) दंभी, आत्म-तुष्ट स्वभाव वाले लोग, या जो लोग अतिक्रमण कर चुके हैं, लेकिन जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, उन्हें बुरे नहीं मान लेना चाहिए। उन्हें प्रेमपूर्वक मदद की जानी चाहिए;

(4) यदि किसी की भी सारभूत रूप से एक दुष्ट व्यक्ति, एक दुष्ट आत्मा, एक मसीह-विरोधी, या एक अविश्वासी व्यक्ति होने की पुष्टि की जाती है, तो उस व्यक्ति को कलीसिया द्वारा बनाये गए नियमानुसार दोषमार्जित या निष्कासित किया जाना चाहिए;

(5) धोखेबाज़ लोग जो अक्सर गलत विचारों को प्रकट करते हैं, जो अक्सर परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं और उसके खिलाफ रक्षात्मक होते हैं, अविश्वासियों में गिने जाते हैं। उन्हें शुद्ध या निष्कासित किया जाना है। उन्हें दोषमार्जित या निष्कासित करना होगा;

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है। यदि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो वे उससे नफ़रत करते हैं; और अगर वे उससे नफरत करते हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उनसे घृणा करता है। इसलिए, यदि तुम्हें अपने माता-पिता से नफ़रत करने के लिए कहा जाए, तो क्या तुम ऐसा कर सकोगे? यदि वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे बुरा-भला कहते हैं, तो वे निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं जिनसे वह घृणा करता है और शाप देता है। इन परिस्थितियों में, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यदि वे परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में बाधा डालते हैं, या यदि वे नहीं डालते हैं? अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा, "कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई? ... क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है।" यह कहावत अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थी, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक उपयुक्त हैं : "उससे प्रेम करो, जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और उससे घृणा करो, जिससे परमेश्वर घृणा करता है।" ये वचन बिलकुल सीधे हैं, फिर भी लोग अकसर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

तुम्हारे पास सत्य है या नहीं और तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो या नहीं, यह तुम्हारे प्रकटन पर या तुम्हारी कभीकभार की बातचीत और आचरण पर नहीं बल्कि तुम्हारे सार पर निर्भर है। प्रत्येक व्यक्ति का सार तय करता है कि उसे नष्ट किया जाएगा या नहीं; यह किसी के व्यवहार और किसी की सत्य की खोज द्वारा उजागर हुए सार के अनुसार तय किया जाता है। उन लोगों में जो कार्य करने में एक दूसरे के समान हैं, और जो समान मात्रा में कार्य करते हैं, जिनके मानवीय सार अच्छे हैं और जिनके पास सत्य है, वे लोग हैं जिन्हें रहने दिया जाएगा, जबकि वे जिनका मानवीय सार दुष्टता भरा है और जो दृश्यमान परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं, वे विनाश की वस्तु होंगे। परमेश्वर के सभी कार्य या मानवता के गंतव्य से संबंधित वचन प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार उचित रूप से लोगों के साथ व्यवहार करेंगे; थोड़ी-सी भी त्रुटि नहीं होगी और एक भी ग़लती नहीं की जाएगी। केवल जब लोग कार्य करते हैं, तब ही मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होते हैं। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है; वह निश्चित तौर पर किसी प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करता। अभी बहुत से लोग हैं, जो मानवता के भविष्य के गंतव्य को समझने में असमर्थ हैं और वे उन वचनों पर विश्वास नहीं करते, जो मैं कहता हूँ। वे सभी जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य का अभ्यास नहीं करते, दुष्टात्मा हैं!

आजकल, वे जो खोज करते हैं और वे जो नहीं करते, दो पूरी तरह भिन्न प्रकार के लोग हैं, जिनके गंतव्य भी काफ़ी अलग हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं, वे लोग हैं जिनका परमेश्वर उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते, वे दुष्टात्माओं और शत्रुओं के समान हैं। वे प्रधान स्वर्गदूत के वंशज हैं और विनाश की वस्तु होंगे। यहाँ तक कि एक अज्ञात परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? जिन लोगों का अंत:करण साफ़ है, परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत-सी कठिनाइयाँ सहते हैं, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं और वे सब विनाश की वस्तु बनेंगे। जो भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता, दुष्ट है और इसके अलावा, वे नष्ट किए जाएँगे। वे सब जो विश्वास करते हैं, पर सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे जो देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं रखते, वे सब नष्ट होंगे। वे सभी जिन्हें रहने दिया जाएगा, वे लोग हैं, जो शोधन के दुख से गुज़रे हैं और डटे रहे हैं; ये वे लोग हैं, जो वास्तव में परीक्षणों से गुज़रे हैं। यदि कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता, शत्रु है; यानी कोई भी जो देहधारी परमेश्वर को नहीं पहचानता—चाहे वह इस धारा के भीतर है या बाहर—एक मसीह-विरोधी है! शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे नहीं, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? क्या ये वे लोग नहीं, जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं? क्या ये वे नहीं, जो विश्वास करने का दावा तो करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं, जो सिर्फ़ आशीष पाने की फ़िराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर के लिए गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन दुष्टात्माओं के साथ घुलते-मिलते हो और उनके प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रखते हो, लेकिन क्या इस मामले में तुम शैतान के प्रति सदिच्छाओं को प्रकट नहीं कर रहे? क्या तुम दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध नहीं हो रहे? यदि आज कल भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर की इच्छा जानने का कोई इरादा न रखते हुए या परमेश्वर की इच्छाओं को अपनी इच्छा की तरह मानने में असमर्थ रहते हुए, आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं, तो उनके अंत और भी अधिक ख़राब होंगे। यदि कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, तो वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम शत्रु के प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रख सकते हो, तो क्या तुममें धार्मिकता की समझ का अभाव नहीं है? यदि तुम उनके साथ सहज हो, जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और निजी भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम अवज्ञाकारी नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य होता है? यदि लोग शत्रुओं के प्रति साफ़ अंत:करण रखते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम करते हैं और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में रुकावट नहीं डाल रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते, और जो ज़बानी तौर पर देहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह-विरोधी हैं, उनकी तो बात ही क्या जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। ये सभी लोग विनाश की वस्तु बनेंगे। मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को आंकता है, वह व्यवहार पर आधारित है; वे जिनका आचरण अच्छा है, धार्मिक हैं और जिनका आचरण घृणित है, दुष्ट हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का सार परमेश्वर को समर्पित है या नहीं; वह जो परमेश्वर को समर्पित है, धार्मिक है और जो नहीं है वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है, भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा, भले ही इस व्यक्ति की बातें सही हो या ग़लत हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

ज़्यादातर लोगों ने अपराध किये हैं, उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने हमेशा परमेश्वर का विरोध किया, कुछ ने परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह किया, कुछ ने परमेश्वर के ख़िलाफ़ शिकायत भरे शब्द बोले या दूसरे लोगों ने कलीसिया के ख़िलाफ़ काम किया या परमेश्वर के घर को नुकसान पहुँचाने वाली हरकतें कीं। इन लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? उनके परिणाम, उनकी प्रकृति और उनके निरंतर व्यवहार के अनुसार निर्धारित किए जाएंगे। कुछ लोग दुष्ट हैं, कुछ लोग मूर्ख हैं, कुछ भोले हैं, और कुछ लोग तो जानवर हैं। सब लोग अलग-अलग हैं। कुछ दुष्ट लोग दुष्ट आत्माओं से ग्रसित हैं, जबकि अन्य लोग दुष्ट शैतान के दूत हैं। अपने स्वभाव के लिहाज़ से कुछ विशेष रूप से भयावह हैं, कुछ विशेष रूप से धूर्त हैं, कुछ लोग विशेष रूप से धन के लोभी हैं, कुछ लोग स्वच्छंद वासना से भरे हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार अलग है, अतः प्रत्येक व्यक्ति को उसके व्यवहार और व्यक्तिगत स्वभाव के अनुसार व्यापक रूप से देखा जाना चाहिये। इंसान के नश्वर शरीर की, वह जो भी हो, सहज प्रवृत्ति बस यही है कि उसके पास एक स्वतन्त्र इच्छा है, और वह केवल चीज़ों के बारे में सोचने के लिए सक्षम है परन्तु उसके पास आत्मिक संसार में सीधे प्रवेश करने की क्षमता नहीं है। जैसे कि जब आप सच्चे परमेश्वर पर विश्वास लाते हैं और आप उसके इस नये कार्य की अवस्था को स्वीकार करना चाहते हैं, परन्तु किसी के द्वारा आपको सुसमाचार सुनाये बगैर, मात्र पवित्र आत्मा के कार्य करने से, मात्र आपको प्रकाशित करने और कहीं न कहीं आपकी अगुवाई करने मात्र से, आपके लिये यह जानना असम्भव है कि परमेश्वर भविष्य में क्या कुछ करने वाला है। लोग परमेश्वर की गहराई को नहीं नाप सकते हैं, उनके पास यह योग्यता या क्षमता नहीं है। लोगों के पास आत्मिक संसार की गहराई को सीधे तौर पर नापने की या परमेश्वर के कार्य के आर-पार देखने की कोई क्षमता नहीं है, फिर एक स्वर्गदूत की तरह पूरे मन से परमेश्वर की सेवा करने की तो बात ही क्या है। जब तक परमेश्वर लोगों पर विजय न पाये, उन्हें न बचाए और उनका पुनः सुधार न करे, या परमेश्वर द्वारा प्रदत्त वस्तुओं से उनका भरण-पोषण न करे, तब तक लोग नये कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं। यदि परमेश्वर यह कार्य नहीं करता है, तो लोगों के भीतर यह सब कुछ नहीं होगा, और यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति के द्वारा तय किया जाता है। अतः जब मैं ऐसी बातों को सुनता हूँ कि लोग विरोध कर रहे हैं या विद्रोह कर रहे हैं, तो मुझे बहुत गुस्सा आता है, परन्तु उसके बाद, जब मैं इन्सान की सहज प्रवृत्तियों पर विचार करता हूँ तो मैं अलग तरह से व्यवहार करता हूँ। इसलिये, परमेश्वर के द्वारा किये गए किसी भी काम को अच्छी तरह से मापा जाता है। परमेश्वर जानता है कि क्या करना है और कैसे करना है। क्योंकि लोग सहज प्रेरणा से उन चीज़ों को नहीं कर सकते हैं, और निश्चित रूप से वह उन्हें ऐसा करने भी नहीं देगा। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के साथ उस वक्त के हालात और संदर्भ, वास्तविक परिस्थिति, लोगों के कर्मों, उनके व्यवहार और अभिव्यक्तियों के अनुसार निपटता है। परमेश्वर कभी किसी के साथ गलत नहीं करेगा। यही परमेश्वर की धार्मिकता है। जैसा कि आप देखते हैं, कि हव्वा ने भले एवं बुरे के ज्ञान के वृक्ष से फल खाया था जब साँप के द्वारा उसे धोखा दिया गया था। परन्तु यहोवा परमेश्वर ने उसे धिक्कारा नहीं था, क्या उसने धिक्कारा था? उसने यह नहीं कहा: "तुमने फल क्यों खाया? मैंने तुम्हें खाने को मना किया था, फिर भी तुमने क्यों खाया? तुम में यह समझ होनी चाहिये और तुम्हें यह जानना चाहिये कि साँप केवल तुम्हें बहकाने के लिये ऐसा कहता है।" उसने उससे ऐसा नहीं कहा, और न ही उस पर दोष लगाया। जैसा कि उसने लोगों को बनाया है, वह जानता है कि लोगों की सहज प्रवृत्तियां क्या हैं, उनकी सहज प्रवृत्तियां किस तरह से बनी हैं, और किस हद तक लोग उन्हें नियन्त्रित कर सकते हैं, और लोग क्या कर सकते हैं। जब परमेश्वर किसी के साथ व्यवहार करता है, जब वह किसी के प्रति एक मनोवृत्ति को अपनाता है-तो भले ही यह तुच्छ, द्वेषपूर्ण या घृणित हो-वह लोगों के शब्दों और उनकी परिस्थितियों के सन्दर्भ की पूरी समझ के आधार पर ऐसा करता है। लोग हमेशा सोचते हैं कि परमेश्वर में मात्र ईश्वरत्व है, धर्मिता है और भलाई है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर के अन्दर कोई मानवीयता नहीं है, वह लोगों की कठिनाइयों पर कोई विचार नहीं करता है, और वह खुद को लोगों के स्थान पर नहीं रखता है; और यह कि जब तक लोग सच्चाई का पालन नहीं करते, तब तक परमेश्वर उन्हें दण्ड देगा, और भले कोई थोड़ा-सा ही विरोध क्यों न करे परमेश्वर याद रखेगा और बाद में उन्हें दण्ड देगा। वास्तव में ऐसा नहीं है। यदि आप परमेश्वर की धार्मिकता, परमेश्वर के कार्य, और लोगों के प्रति परमेश्वर के बर्ताव को इस रीति से समझते हैं, तो आपने बहुत भारी ग़लती की है। लोगों के साथ व्यवहार करने के लिए परमेश्वर का जो आधार है, वह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है। परमेश्वर धर्मी है और वह अपनी निष्ठा से सभी लोगों को कभी न कभी आश्वस्त कर ही लेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर किस आधार पर लोगों से बर्ताव करता है' से उद्धृत

कुछ लोगों के विश्वास को परमेश्वर के हृदय ने कभी स्वीकार नहीं किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं मानता कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता। क्योंकि ये लोग, भले ही कितने ही वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण करते रहे हों, लेकिन इनकी सोच और इनके विचार कभी नहीं बदले हैं; वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धांतों और कार्य करने के तौर-तरीकों, और ज़िन्दा रहने के उनके नियमों एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने परमेश्वर के वचन को कभी अपना जीवन नहीं माना, कभी नहीं माना कि परमेश्वर का वचन सत्य है, कभी परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का इरादा ज़ाहिर नहीं किया, और परमेश्वर को कभी अपना परमेश्वर नहीं माना। वे परमेश्वर में विश्वास करने को एक किस्म का शगल मानते हैं, परमेश्वर को महज एक आध्यात्मिक सहारा समझते हैं, इसलिए वे नहीं मानते कि परमेश्वर का स्वभाव, या उसका सार इस लायक है कि उसे समझने की कोशिश की जाए। कहा जा सकता है कि वह सब जो सच्चे परमेश्वर से संबद्ध है उसका इन लोगों से कोई लेना-देना नहीं है; उनकी कोई रुचि नहीं है, और न ही वे ध्यान देने की परवाह करते हैं। क्योंकि उनके हृदय की गहराई में एक तीव्र आवाज़ है जो हमेशा उनसे कहती है : "परमेश्वर अदृश्य एवं अस्पर्शनीय है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है।" वे मानते हैं कि इस प्रकार के परमेश्वर को समझने की कोशिश करना उनके प्रयासों के लायक नहीं है; ऐसा करना अपने आपको मूर्ख बनाना होगा। वे मानते हैं कि कोई वास्तविक कदम उठाए बिना अथवा किसी भी वास्तविक कार्यकलाप में स्वयं को लगाए बिना, सिर्फ शब्दों में परमेश्वर को स्वीकार करके, वे बहुत चालाक बन रहे हैं। परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है। कुछ लोग पूछते हैं : "क्या अविश्वासी लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ सकते हैं? क्या वे अपना कर्तव्य निभा सकते हैं? क्या वे ये शब्द कह सकते हैं : 'मैं परमेश्वर के लिए जिऊँगा'?" लोग प्रायः जो देखते हैं वह लोगों का सतही प्रदर्शन होता है; वे लोगों का सार नहीं देखते। लेकिन परमेश्वर इन सतही प्रदर्शनों को नहीं देखता; वह केवल उनके भीतरी सार को देखता है। इसलिए, इन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति और परिभाषा ऐसी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

इस प्रकार के लोग होते हैं जो किसी के साथ प्रेम, सहयोग की भावना और धैर्य के साथ पेश आते हैं, लेकिन वे केवल परमेश्वर के ही कट्टर विरोधी, और पक्के दुश्मन होते हैं। जब उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो सत्य का स्पर्श करती है, जो बताती है कि परमेश्वर क्या कहता और चाहता है, वे कठिनाइयाँ उत्पन्न करते हुए, इसे निरंतर संदेह की दृष्टि से देखते हुए और अवधारणाएँ फैलाते हुए, न केवल इसे स्वीकार करने में असमर्थ होते हैं, बल्कि बहुत सारी ऐसी हरकतें भी करते हैं जो परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान पहुंचाती हैं, यहां तक कि कोई बात जब उनके अपने हितों को प्रभावित करती है तो वे परमेश्वर के विरोध में उठ खड़े होने और उसके विरुद्ध चीखने-चिल्लाने में भी समर्थ होते हैं। किस तरह के लोग हैं ये? (वे जो परमेश्वर से घृणा करते हैं।) परमेश्वर के प्रति घृणा सभी लोगों की प्रकृति का एक पहलू है, और सभी में यह सार मौजूद होता है; फिर भी, कुछ लोगों में यह उतना गंभीर नहीं होता। तो, क्यों इस तरह के लोग परमेश्वर से इतनी घृणा करते हैं? वे परमेश्वर के दुश्मन हैं; स्पष्ट शब्दों में–वे दानव हैं, जीवित दानव। क्या लोगों के बीच ऐसे जीवित दानव हैं जिन्हें परमेश्वर बचाता है? (नहीं।) इसलिए, अगर तुम कलीसिया में इस तरह के कुछ जीवित दानव की सही पहचान कर लेते हो, तो तुम्हें अविलंब उन्हें उस जगह से हटा देना होगा। अगर कोई व्यक्ति सामान्यतः बिल्कुल अच्छा व्यवहार करता है, लेकिन उसकी अवस्था में बस एक क्षणिक चूक है, या उसका कद इतना छोटा है कि वह सत्य को नहीं समझ सकता, और वह एक हल्का व्यवधान या बाधा उत्पन्न करता है, तो भी यह व्यवहार सुसंगत नहीं है, और वह अपनी प्रकृति में ऐसा व्यक्ति नहीं है, तो उसे रहने दिया जा सकता है। कुछ लोग हैं जो एक अर्थ में मजबूत होते हैं, अपनी कमजोर मानवता के बावजूद : वे सेवा करने के इच्छुक और पीड़ा सहने के लिए तैयार रहते हैं, और सामान्य परिस्थितियों में, वे अपने कर्त्तव्य का पालन अच्छी तरह करते हैं, और उन्हें सभी लोगों की प्रशंसा प्राप्त होती है; या, यदि प्रशंसा नहीं मिलती है, तो वे कम-से-कम किसी दूसरे की कीमत पर लाभान्वित नहीं हुए हैं। ऐसे लोगों को भी रहने दिया जा सकता है, और हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उन्हें बचा ही लिया जाएगा, वे कम-से-कम सेवा प्रदान कर सकते हैं, और वे अंत तक सेवा कर सकते हैं या नहीं यह उनके व्यक्तिगत प्रयोजन पर निर्भर करता है। फिर भी, यदि ऐसा व्यक्ति एक जीवित दानव या परमेश्वर का शत्रु है, तो वह कभी बचाया नहीं जा सकेगा। यह निश्चित है, और उसे कलीसिया से ज़रूर निकाल दिया जाना चाहिए। कुछ लोगों को पश्चात्ताप का एक अवसर प्रदान करने, एक सबक सिखाने के लिए निकाला जाता है; अन्य इसलिए निकाले जाते हैं कि उनकी प्रकृति जैसी है देख ली गई है, और उन्हें बचाया नहीं जा सकता। हर व्यक्ति अलग होता है। कुछ लोगों ने, जिन्हें निकाला गया है, अपनी उदास और स्याह अवस्था के बावजूद, अपने कर्त्तव्य का त्याग नहीं किया है, और वे उसका पालन कर रहे हैं–उनकी अवस्था उनलोगों जैसी नहीं है जो अपने कर्त्तव्य का पालन बिलकुल नहीं करते, और जो मार्ग वे अपनाते हैं वह अलग है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

कलीसियाओं में, ऐसे लोग हैं जो सोचते हैं कि कुछ मेहनत करना या कुछ जोखिम भरा काम करने का मतलब है कि उन्होंने योग्यता अर्जित की है, और उनके कार्यों के अनुसार वे वास्तव में प्रशंसा के योग्य होते हैं। लेकिन उनका स्वभाव और सच्चाई के प्रति उनका रवैया घृणास्पद होते हैं; उन्हें सच्चाई से कोई प्रेम नहीं होता है, और यह अकेले ही उन्हें घृणा के योग्य बनाता है। ऐसे लोग बेकार होते हैं। जब परमेश्वर देखता है कि लोग तुच्छ क्षमता के हैं, कि उनकी कुछ असफलताएँ हैं, और उनके पास भ्रष्ट स्वभाव या एक ऐसा सार है जो उसका विरोध करता है, तो उसे उनसे कोई विकर्षण नहीं होता, और वह उन्हें अपने से दूर नहीं रखता है। यह परमेश्वर की इच्छा नहीं, और न ही यह इंसान के प्रति उसका दृष्टिकोण है। परमेश्वर लोगों की तुच्छ क्षमता से नफ़रत नहीं करता, वह उनकी मूर्खता से नफ़रत नहीं करता है, और वह इस बात से भी नफ़रत नहीं करता है कि उनके स्वभाव भ्रष्ट हैं। परमेश्वर वास्तव में तब नफ़रत करता है जब लोग सच्चाई से घृणा करते हैं। यदि तुम सच्चाई से घृणा करते हो, तो केवल उसी एक कारण से, परमेश्वर कभी भी तुमसे खुश नहीं होगा। यह बात पत्थर की लकीर है। यदि तुम सत्य से घृणा करते हो, यदि तुम सत्य से प्रेम नहीं करते हो, यदि तुम बेपरवाह, तिरस्कारपूर्ण, अभिमानी हो, और यहाँ तक कि जब परमेश्वर सत्य को व्यक्त करता है तो तुम विकर्षित, प्रतिरोधी होते हो और तुम इसे अस्वीकार कर देते हो, तो ऐसी अभिव्यक्तियाँ तुम्हारे लिए परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत होने का कारण बनेंगी, और तुम बचाए नहीं जाओगे। यदि तुम सच्चाई से प्रेम करते हो, तो भले ही तुम्हारी क्षमता कुछ तुच्छ हो, चाहे तुम परमेश्वर में बहुत लंबे समय से विश्वास नहीं करते रहे हो, तुम अक्सर गलतियाँ और बेवकूफ़ी के काम करते हो, पर यदि परमेश्वर जब सत्य पर संगति करे तो तुम इसे बहुत पसंद करते हो, यदि सत्य और परमेश्वर के वचनों के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण ईमानदार है, अगर यह खरा और उत्सुक है, यदि तुम सत्य को बटोरे और संजोए रखते हो, तो परमेश्वर तुम पर दया करेगा। परमेश्वर तुम्हारे अज्ञान और तुम्हारी तुच्छ क्षमता से अप्रभावित रहता है, क्योंकि सत्य के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण खरा और उत्सुक है, और तुम्हारा हृदय सच्चा है; परमेश्वर तुम्हारे हृदय और रवैये को आँकता है, और वह हमेशा तुम्हारे प्रति दयालु होगा—और इसलिए तुम्हें उद्धार की आशा होगी। दूसरी ओर, यदि तुम दिल के कठोर और विलासी हो, अगर तुम सच्चाई से घृणा करते हो, और परमेश्वर के वचनों और सच्चाई की किसी भी बात से प्रेम नहीं करते हो, कभी भी इनके प्रति सचेत नहीं होते, और अपने दिल की गहराइयों से विरोधी और तिरस्कारपूर्ण हो, तो फिर तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया कैसा होगा? घृणा, विकर्षण, और निरंतर क्रोध का। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव में कौन—सी दो विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं? प्रचुर दया और गहरा क्रोध। "प्रचुर दया" में "प्रचुर" का अर्थ यह होता है कि परमेश्वर की दया सहिष्णु, धैर्यवान, बर्दाश्त करने वाली है, और यही सबसे बड़ा प्रेम है—"प्रचुर" का यही अर्थ होता है। चूँकि कुछ लोग मूर्ख और तुच्छ क्षमता के होते हैं, परमेश्वर को इसी तरह कार्य करना होता है। अगर तुम सच्चाई से प्रेम करते हो हालाँकि तुम मूर्ख और तुच्छ क्षमता के हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया केवल प्रचुर दया का ही हो सकता है। दया में धैर्य और सहिष्णुता शामिल होते हैं: परमेश्वर तुम्हारे अज्ञान के प्रति सहिष्णु और धैर्यवान है, वह तुम्हें सहारा देने, तुम्हारे लिए प्रावधान देने, और तुम्हारी सहायता करने के लिए तुम्हें पर्याप्त विश्वास और सहिष्णुता प्रदान करता है, ताकि तुम थोड़ा-थोड़ा करके सच्चाई को समझो और धीरे-धीरे आगे बढ़ो। यह किस आधार पर बनाया जाता है? किसी ऐसे व्यक्ति के दृष्टिकोण पर जो सच्चाई से प्रेम करता और उसके लिए तरसता है, जो परमेश्वर, उसके वचनों और सच्चाई के प्रति ईमानदार होता है। ये वो मूलभूत व्यवहार हैं जो लोगों में प्रकट होने चाहिए। लेकिन अगर कोई सच्चाई से नफ़रत करता है, सच्चाई का तिरस्कार करता है, इसे अस्वीकार करता है, और इसका विरोध करता है, अगर वह कभी किसी के साथ सच्चाई पर संगति नहीं करता है, और केवल यही कहता है कि उसने कैसे काम किया है, कि उसके पास कितना अनुभव है, वह किस-किस हालात से गुज़र चुका है, कि कैसे परमेश्वर उसे बहुत अच्छा मानता है और उसे महान कार्य सौंपता है—यदि वह केवल ऐसी पूंजी और उपलब्धियों की और अपनी प्रतिभाओं की ही बातें करता है, और इन चीज़ों का उपयोग दिखावा करने के लिए करता है, और सच्चाई पर कभी भी संगति नहीं करता, परमेश्वर की गवाही नहीं देता, या सच्चाई और परमेश्वर के ज्ञान के संबंध में अपनी समझ और अनुभवों पर संगति नहीं करता है, तो क्या वह सत्य से विमुख नहीं हैं? सत्य से प्रेम न करने की यही अभिव्यक्ति होती है। कुछ लोग कहते हैं, "यदि वे सत्य से प्रेम नहीं करते तो वे धर्मोपदेशों को कैसे सुन सकते हैं?" क्या हर कोई जो उपदेश सुनता है वह सच्चाई से प्रेम करता है? कुछ लोग सिर्फ हरक़तों से गुज़रते हैं, वे दूसरों के सामने एक अभिनय करने के लिए मजबूर होते हैं, इस डर से कि अगर वे कलीसिया के जीवन में भाग नहीं लेते, तो परमेश्वर का घर उनके विश्वास को स्वीकार नहीं करेगा। परमेश्वर सच्चाई के प्रति इस तरह के दृष्टिकोण को कैसे परिभाषित करता है? परमेश्वर कहता है कि ऐसे लोग सच्चाई से प्रेम नहीं करते, कि वे सच्चाई का तिरस्कार करते हैं। उनके स्वभाव में एक बात होती है जो उनके जीने या मरने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण, घमंड और छल से भी अधिक महत्व की, होती है: यह सच्चाई का तिरस्कार करना है। परमेश्वर यह देखता है। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को देखते हुए, वह ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है? जो भी उसके काम में विघ्न डालता तथा हस्तक्षेप करता है और उसके स्वभाव को नाराज़ करता है, उसके प्रति वह क्रोधित होता है। जब परमेश्वर किसी के प्रति क्रोधित होता है, तो वह उन्हें फटकारता है, या उन्हें अनुशासित और दंडित करता है। यदि वे जानबूझकर परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं, तो वह कुछ समय के लिए सहनशील और चौकस रहेगा, और परिस्थिति या अन्य उद्देश्यपूर्ण कारणों से, उसे सेवा प्रदान करने के लिए वह इस अविश्वासी का उपयोग करेगा। लेकिन जैसे ही परिवेश अनुमति देता है, और समय सही होता है, इन लोगों को परमेश्वर के घर से बाहर निकाल दिया जाएगा, क्योंकि वे सेवा प्रदान करने के भी योग्य नहीं हैं। परमेश्वर का प्रकोप ऐसा होता है। परमेश्वर इतना तेज़ क्रोध क्यों करता है? क्योंकि परमेश्वर ने उन लोगों के अंजाम और वर्गीकरण को परिभाषित किया है जो सच्चाई का तिरस्कार करते हैं। परमेश्वर उन्हें शैतान के शिविर में वर्गीकृत करता है, और क्योंकि परमेश्वर उनके प्रति क्रोधित है, और उन्हें तुच्छ मानता है, वह उन पर दरवाजा बंद कर देता है, वह उन्हें परमेश्वर के घर में पैर रखने की अनुमति नहीं देता है, और उन्हें बचाए जाने का मौका नहीं देता है। यह परमेश्वर के क्रोध की एक अभिव्यक्ति है। परमेश्वर उन्हें शैतान, गंदे राक्षस और बुरी आत्माओं के स्तर पर, गैर—विश्वासियों के स्तर पर, रखता है और जब समय सही होता है, तो वह उन्हें हटा देगा। क्या यह उनके साथ निपटने का एक तरीका नहीं है? परमेश्वर का प्रकोप ऐसा होता है। और एक बार उन्हें हटा देने के बाद, कौन-सी बात उनका इंतज़ार करती है? फिर कभी वे परमेश्वर के अनुग्रह और आशीर्वादों का, और परमेश्वर के उद्धार का, आनंद नहीं लेंगे।

अनुग्रह के युग में, यह कहा गया था कि परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को बचाया जाए और वह नहीं चाहता कि किसी को भी विनाश का सामना करना पड़े। मानव जाति, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया था, उसे बचाने के प्रति परमेश्वर का ऐसा रवैया और ऐसी भावना है। यह परमेश्वर की इच्छा है, लेकिन वास्तव में, बहुत से लोग परमेश्वर के अनुग्रह को स्वीकार नहीं करते; वे शैतान के हैं और उनको बचाया नहीं जाएगा। ये शब्द संपूर्ण मानव जाति के प्रति ईश्वर के रवैये को दर्शाते हैं: उसका प्रेम असीमित है, यह अतुलनीय रूप से विशाल है, यह शक्तिशाली है। लेकिन जो लोग सत्य से घृणा करते हैं, उनको वह मुक्त रूप से अपना प्रेम और उद्धार देने का अनिच्छुक है, न ही वह ऐसा कभी करेगा। यही परमेश्वर का रवैया है। सत्य से घृणा करना किसके तुल्य है? क्या यह खुद को परमेश्वर के खिलाफ स्थापित करना है? क्या यह खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करना है? क्या यह परमेश्वर को खुले तौर पर यह बताने के समान है, "तुझे जो भी कहना है उसे सुनने में मुझे कोई आनंद नहीं आता। अगर मुझे यह पसंद नहीं है, तो यह सत्य नहीं है, और मैं इसे सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करूँगा। यह केवल तभी सत्य होगा जब मैं इसे स्वीकार करूंगा और इसे पसंद करूंगा।" जब तुम्हारा सत्य के प्रति यह रवैया हो, तो क्या यह खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करना नहीं है? यदि तुम परमेश्वर के प्रति खुले तौर पर शत्रुता रखते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बचाएगा? नहीं। यही बात परमेश्वर के क्रोध का कारण है। सत्य से घृणा करने वाले लोगों का सार परमेश्वर से शत्रुता का सार है। परमेश्वर इस सार वाले लोगों को आम लोग नहीं मानता; वह उन्हें दुश्मन मानता है, राक्षस मानता है, और उनको कभी नहीं बचाएगा। यह परमेश्वर के कोप की अभिव्यक्ति है … परमेश्वर के किसी व्यक्ति या किसी एक प्रकार के व्यक्तियों के प्रति इतना कुपित होने का एक कारण है। वह ईश्वर की मर्ज़ी से नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के सत्य के प्रति रवैये से निर्धारित होता है। जब कोई सत्य से घृणा करता है, तो उसकी उद्धार की आशा जलमग्न हो जाती है; यह कोई पाप नहीं है जिसे माफ़ किया या नहीं किया जा सकता, यह व्यवहार का एक रूप भी नहीं है या ऐसी कोई चीज़ नहीं है जो क्षणिक रूप में उनमें प्रकट होती हो; यह एक व्यक्ति की प्रकृति और उसका सार है, और परमेश्वर ऐसे लोगों से सबसे अधिक घृणा करता है। यदि यह कभी-कभार तुममें प्रकट होता है तो इस बात पर विचार करो कि क्या यह इसलिए है क्योंकि तुम सत्य को नहीं समझते हो, और तुमको खोज करने की ज़रूरत है, और तुम्हें परमेश्वर की प्रबुद्धता और सहायता की आवश्यकता है, या क्या यह इसलिए है क्योंकि तुम अपने हृदय की गहराई से सत्य से विमुख हो। यदि यह तुम्हारी प्रकृति और सार है, यदि तुमने कभी सत्य से प्रेम नहीं किया है, और सत्य तुम्हारे हृदय में विरक्ति और घृणा पैदा करता है, यदि तुम उसका तिरस्कार करते हो, तो तुम संकट में हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

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