148. सांसारिक प्रचलनों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) यह स्पष्ट रूप से देखो कि दुनिया के प्रचलन शैतान की बुरी ताकतों से पैदा होते हैं। अपने सार में, वे नकारात्मक चीजें हैं जो परमेश्वर को नकारती हैं और सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होती हैं।

(2) संसार के प्रचलन पाप और व्यभिचार के रंगों की एक बड़ी कठौती है। व्यक्ति को उनकी बुराई और गंदगी को समझ लेना चाहिए, ताकि कहीं ऐसा न हो कि वह उनमें गिर पड़ें।

(3) यह जान लो कि दुनिया के प्रचलन शैतान द्वारा मनुष्य के साथ खेली गईं चालें हैं ताकि मनुष्य परमेश्वर को त्याग दे और उसका विरोध करे। बुरे प्रचलनों का अनुसरण करना अपने स्वयं के विनाश को आमंत्रित करना है।

(4) परमेश्वर में विश्वास करते समय, व्यक्ति को सत्य का अनुसरण करना चाहिए, परमेश्वर का भय मानना चाहिए और बुराई से दूर रहना चाहिए, और परमेश्वर के वचन सत्य के साथ जीना चाहिए। केवल इसी प्रकार कोई शैतान की शक्तियों से छुटकारा पा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

शैतान सामाजिक प्रवृत्तियों द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करता है। "सामाजिक प्रवृत्तियों" में अनेक बातें शामिल हैं। कुछ लोग कहते हैं : "क्या इसका अर्थ नवीतनम फैशन, सौन्दर्य प्रसाधन, बालों की शैली और स्वादिष्ट भोजन है?" क्या ये चीज़ें सामाजिक प्रवृत्तियाँ मानी जाती हैं? ये सामाजिक प्रवृतियों का एक भाग हैं, परन्तु हम यहाँ उनके बारे में बात नहीं करेंगे। हम बस ऐसे विचारों के बारे में बात करना चाहते हैं जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों में उत्पन्न करती हैं, जिस तरह से वे संसार में लोगों से आचरण करवाती हैं, और लोगों में जीवन के लक्ष्यों एवं जीवन को देखने का जो नज़रिया उत्पन्न करती हैं उन पर बात करना चाहते हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; वे मनुष्य के मन की अवस्था को नियन्त्रित और प्रभावित कर सकती हैं। ये सभी प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उठती हैं, और उन सभी का दुष्ट प्रभाव होता है जो निरन्तर मनुष्य को पतित करता रहता है, जिसके कारण लोग लगातार विवेक, मानवता और तर्कशीलता को गँवा देते हैं, और जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और अधिक कमजोर कर देता है, इस हद तक कि हम यह भी कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों में कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनमें कोई विवेक है, और तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। तो ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? ये वो प्रवृत्तियाँ हैं जिन्हें तुम खुली आँखों से नहीं देख सकते। जब कोई नयी प्रवृत्ति दुनिया पर छा जाती है, तो कदाचित् सिर्फ कुछ ही लोग अग्रणी स्थान पर होते हैं, जो प्रवृत्ति स्थापित करने वालों के तौर पर काम करते हैं। वे कुछ नया काम करते हुए शुरुआत करते हैं, फिर कुछ नए विचार या कुछ नए दृष्टिकोण स्वीकार करते हैं। लेकिन, अनभिज्ञता की दशा में, अधिकांश लोग इस किस्म की प्रवृत्ति के द्वारा अभी भी लगातार संक्रमित, सम्मिलित एवं आकर्षित होंगे, जब तक वे सब अनजाने में एवं अनिच्छा से इसे स्वीकार नहीं कर लेते हैं, इसमें डूब नहीं जाते हैं और इसके द्वारा नियन्त्रित नहीं कर लिए जाते हैं। एक के बाद एक, ऐसी प्रवृत्तियाँ लोगों से, जो स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के नहीं हैं; जो नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है, और जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं कर सकते हैं, इन्हें और साथ ही जीवन के दृष्टिकोण एवं मूल्यों को जो शैतान से आते हैं खुशी से स्वीकार करवाती हैं। शैतान उन्हें जीवन के प्रति नज़रिया रखने के बारे में जो बताता है वे उसे और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार कर लेता है जो शैतान उन्हें "प्रदान" करता है, और उसने पास न तो सामर्थ्य है, न ही योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है। तो, ये प्रवृत्तियाँ आखिर क्या हैं? मैंने एक साधारण-सा उदाहरण चुना है जो तुम लोगों को धीरे-धीरे समझ में आ सकता है। उदाहरण के लिए, अतीत में लोग अपने व्यवसाय को इस प्रकार चलाते थे जिससे कोई भी धोखा न खाये; वे वस्तुओं को एक ही दाम में बेचते थे, इस बात की परवाह किए बिना कि कौन खरीद रहा है। क्या यहाँ अच्छे विवेक एवं मानवता के कुछ तत्व व्यक्त नहीं हो रहे हैं? जब लोग अपने व्यवसाय को ऐसे, अच्छे विश्वास के साथ संचालित करते थे, तो यह देखा जा सकता है कि उस समय भी उनमें कुछ विवेक, कुछ मानवता बाकी थी। परन्तु मनुष्य की धन की लगातार बढ़ती हुई माँग के कारण, लोग अनजाने में धन, लाभ, मनोरंजन और अन्य कई चीजों से प्रेम करने लगे थे। संक्षेप में, लोग धन को अधिक महत्वपूर्ण चीज़ के रुप में देखने लगे थे। जब लोग धन को अधिक महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में देखते हैं, तो वे अनजाने में ही अपनी प्रसिद्धि, अपनी प्रतिष्ठा, अपने नाम, और अपनी ईमानदारी को कम महत्व देने लगते हैं; क्या वे ऐसा नहीं करते? जब तुम व्यवसाय करते हो, तो तुम लोगों को ठगने के लिए विभिन्न साधनों का उपयोग करते और धनी बनते हुए देखते हो। यद्यपि जो धन कमाया गया है वह बेईमानी से प्राप्त हुआ है, फिर भी वे और भी अधिक धनी बनते जाते हैं। भले ही तुम्हारा और उनका व्यवसाय एक हो, परन्तु तुम्हारी अपेक्षा उनका परिवार कहीं अधिक जीवन का आनन्द उठाता है, और तुम बुरा महसूस करते हुए खुद से यह कहते हो कि : "मैं वैसा क्यों नहीं कर सकता? मैं उतना क्यों नहीं कमा पाता हूँ जितना वे कमाते हैं? मुझे और अधिक धन प्राप्त करने के लिए, और अपने व्यवसाय की उन्नति के लिए कोई तरीका सोचना होगा।" तब तुम इस बारे में अपना भरसक विचार करते हो कि कैसे बहुत सा पैसा बनाया जाए। धन कमाने के सामान्य तरीके के अनुसार—सभी ग्राहकों को एक ही कीमत पर वस्तुओं को बेच कर—जो धन तुम कमाते हो वह अच्छे विवेक से कमाया गया है। परन्तु यह जल्दी अमीर बनने का तरीका नहीं है। लाभ कमाने की तीव्र इच्छा से प्रेरित होकर, तुम्हारी सोच धीरे-धीरे बदलती है। इस रुपान्तरण के दौरान, तुम्हारे आचरण के सिद्धान्त भी बदलने शुरू हो जाते हैं। जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, तो तुम्हारे मन में संदेह होता है, तुम कहते हो, "यह आख़िरी बार है कि मैंने किसी को धोखा दिया है। मैं ऐसा दोबारा नहीं करूँगा। मैं लोगों को धोखा नहीं दे सकता। लोगों को धोखा देने के गंभीर परिणाम होते हैं। इससे मैं बड़ी मुश्किलों में पड़ जाऊँगा!" जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, तो तुम्हारे हृदय में कुछ नैतिक संकोच होते हैं; यह मनुष्य के विवेक का कार्य है—तुम्हें नैतिक संकोच का एहसास कराना और तुम्हें धिक्कारना, ताकि जब तुम किसी को धोखा दो तो असहज महसूस करो। परन्तु जब तुम किसी को सफलतापूर्वक धोखा दे देते हो, तो तुम देखते हो कि अब तुम्हारे पास पहले की अपेक्षा अधिक धन है, और तुम सोचते हो कि यह तरीका तुम्हारे लिए अत्यंत फायदेमंद हो सकता है। तुम्हारे हृदय में हल्के से दर्द के बावजूद, तुम्हारा मन करता है कि तुम अपनी सफलता पर स्वयं को बधाई दो, और तुम स्वयं से थोड़ा खुश महसूस करते हो। पहली बार, तुम अपने व्यवहार को, अपने धोखे को मंजूरी देते हो। इसके बाद, जब एक बार मनुष्य ऐसे धोखे से दूषित हो जाता है, तो यह उस व्यक्ति के समान हो जाता है जो जुआ खेलता है और फिर एक जुआरी बन जाता है। अपनी अनभिज्ञता में, तुम अपने स्वयं के धोखाधड़ी के व्यवहार को मंजूरी दे देते हो और उसे स्वीकार कर लेते हो। अनभिज्ञता में, तुम धोखाधड़ी को जायज़ वाणिज्यिक व्यवहार मान लेते हो और अपने जीने के लिए और अपनी रोज़ी-रोटी के लिए तुम धोखाधड़ी को अत्यंत उपयोगी साधन मान लेते हो; तुम सोचते हो कि ऐसा करके तुम जल्दी से पैसे बना सकते हो। यह एक प्रक्रिया है : शुरुआत में, लोग इस प्रकार के व्यवहार को स्वीकार नहीं कर पाते, वे इस व्यवहार और अभ्यास को नीची दृष्टि से देखते हैं, फिर वे स्वयं ऐसे व्यवहार से प्रयोग करने लगते हैं, अपने तरीके से इसे आजमाते हैं, और उनका हृदय धीरे-धीरे रूपान्तरित होना शुरू हो जाता है। यह किस तरह का रूपान्तरण है? यह इस प्रवृत्ति की, इस प्रकार के विचार की स्वीकृति और मंजूरी है जिसे सामाजिक प्रवृत्ति के द्वारा तुम्हारे भीतर डाला गया है। इसका एहसास किए बिना, यदि तुम लोगों के साथ व्यवसाय करते समय उन्हें धोखा नहीं देते हो, तो तुम महसूस करते हो कि तुम दुष्टतर हो; यदि तुम लोगों को धोखा नहीं देते हो तो तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी चीज़ को खो दिया है। अनजाने में, यह धोखाधड़ी तुम्हारी आत्मा, तुम्हारी रीढ़ की हड्डी बन जाती है, और एक प्रकार का अत्यावश्यक व्यवहार बन जाती है जो तुम्हारे जीवन में एक सिद्धान्त है। जब मनुष्य इस प्रकार के व्यवहार और ऐसी सोच को स्वीकार कर लेता है, तो क्या यह उसके हृदय में परिवर्तन नहीं लाता है? तुम्हारा हृदय परिवर्तित हो गया है, तो क्या तुम्हारी ईमानदारी भी बदल गयी है? क्या तुम्हारी मानवता बदल गयी है? क्या तुम्हारा विवेक बदल गया है? (हाँ।) हाँ, ऐसे मनुष्यों का हर हिस्सा, उसके हृदय से लेकर उसके विचारों तक, इस हद तक एक गुणात्मक परिवर्तन से गुज़रता है कि वह भीतर से लेकर बाहर तक रूपांतरित हो जाता है। यह परिवर्तन तुम्हें परमेश्वर से दूर करता चला जाता है तथा तुम अधिक से अधिक शैतान के अनुरूप बनते चले जाते हो; तुम अधिक से अधिक शैतान के समान बन जाते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

"पैसा दुनिया को नचाता है" यह शैतान का एक फ़लसफ़ा है और यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव-समाज में प्रचलित है। तुम कह सकते हो कि यह एक रुझान है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है। बिलकुल शुरू से ही, लोगों ने इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किंतु फिर जब वे जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आए, तो उन्होंने इसे मूक सहमति दे दी, और महसूस करना शुरू किया कि ये वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? शायद लोग इस कहावत को समान रूप से नहीं समझते, बल्कि हर एक आदमी अपने आसपास घटित घटनाओं और अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस कहावत की अलग-अलग रूप में व्याख्या करता है और इसे अलग-अलग मात्रा में स्वीकार करता है। क्या ऐसा नहीं है? चाहे इस कहावत के संबंध में किसी के पास कितना भी अनुभव हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? तुम लोगों में से प्रत्येक को शामिल करते हुए, दुनिया के लोगों के स्वभाव के माध्यम से कोई चीज़ प्रकट होती हैं। इस तरह प्रकट होने वाली इस चीज़ की व्याख्या कैसे की जाती है? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के हृदय में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना सचमुच गहन है! तो शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस रुझान का उपयोग किए जाने के बाद, यह उनमें कैसे अभिव्यक्त होता है? क्या तुम लोगों को लगता है कि बिना पैसे के तुम लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते, कि पैसे के बिना एक दिन जीना भी असंभव होगा? लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितना पैसा है, और वे उतना ही सम्मान पाते हैं। गरीबों की कमर शर्म से झुक जाती है, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचे और गर्व से खड़े होते हैं, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और रुझान लोगों के लिए क्या लाता है? क्या यह सच नहीं है कि पैसे की खोज में लोग कुछ भी बलिदान कर सकते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और ईमान का बलिदान नहीं कर देते? इतना ही नहीं, क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या यह लोगों का नुकसान नहीं है? (हाँ, है।) क्या मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने के कारण शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे तुम इस लोकप्रिय कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः इसे सत्य के रूप में स्वीकार करने तक की प्रगति करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से शैतान के चंगुल में फँस जाता है, और इस तरह तुम अनजाने में इस कहावत के अनुसार जीने लगते हो। इस कहावत ने तुम्हें किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि तुम सच्चे मार्ग को जानते हो, और हो सकता है कि तुम सत्य को जानते हो, किंतु उसकी खोज करने में तुम असमर्थ हो। हो सकता है कि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, किंतु तुम सत्य को पाने के लिए क़ीमत चुकाने का कष्ट उठाने को तैयार नहीं हो। इसके बजाय, तुम बिलकुल अंत तक परमेश्वर का विरोध करने में अपने भविष्य और नियति को त्याग दोगे। चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न कहे, चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न करे, चाहे तुम्हें इस बात का एहसास क्यों न हो कि तुम्हारे लिए परमेश्वर का प्रेम कितना गहरा और कितना महान है, तुम फिर भी हठपूर्वक अपने रास्ते पर ही चलते रहने का आग्रह करोगे और इस कहावत की कीमत चुकाओगे। अर्थात्, यह कहावत पहले से ही तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारे विचारों को नियंत्रित करती है, और बजाय इस सबको त्यागने के, तुम अपने भाग्य को इस कहावत से नियंत्रित करवाओगे। क्या यह तथ्य कि लोग ऐसा करते हैं, कि वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित और प्रभावित होते हैं, यह नहीं दर्शाता कि शैतान का मनुष्यों को भ्रष्ट करना कारगर है? क्या यह शैतान के फ़लसफ़े और भ्रष्ट स्वभाव का तुम्हारे हृदय में जड़ जमाना नहीं है? अगर तुम ऐसा करते हो, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हाँ।) क्या तुम देखते हो कि कैसे इस तरह से शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया है? क्या तुम इसे महसूस कर सकते हो? (नहीं।) तुमने इसे न तो देखा है, न महसूस किया है। क्या तुम यहाँ शैतान की दुष्टता को देखते हो? शैतान हर समय और हर जगह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। शैतान मनुष्य के लिए इस भ्रष्टता से बचना असंभव बना देता है और वह इसके सामने मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों और उससे आने वाली दुष्ट चीज़ों को तुमसे ऐसी परिस्थितियों में स्वीकार करवाता है, जहाँ तुम अज्ञानता में होते हो, और जब तुम्हें इस बात का पता नहीं चलता कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है। लोग इन चीज़ों को स्वीकार कर लेते हैं और इन पर कोई आपत्ति नहीं करते। वे इन चीज़ों को सँजोते हैं और एक खजाने की तरह सँभाले रखते हैं, वे इन चीज़ों को अपने साथ जोड़-तोड़ करने देते हैं और उन्हें अपने साथ खिलवाड़ करने देते हैं; और इस तरह शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना और अधिक गहरा होता जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है ताकि एक-एक कदम करके लोगों को दुष्टात्माओं के घोंसले में आने के लिए लुभा सके, ताकि सामाजिक प्रवृत्तियों में फँसे लोग अनजाने में ही धन, भौतिक इच्छाओं, दुष्टता एवं हिंसा का समर्थन करें। जब एक बार ये चीज़ें मनुष्य के हृदय में प्रवेश कर जाती हैं, तो मनुष्य क्या बन जाता है? मनुष्य दुष्टात्मा, शैतान बन जाता है! क्यों? मनुष्य के हृदय में कौन से मनोवैज्ञानिक झुकाव हैं? मनुष्य किस बात का सम्मान करता है? मनुष्य दुष्टता और हिंसा में आनंद लेना शुरू कर देता है, वो खूबसूरती या अच्छाई के प्रति प्रेमभाव नहीं दिखाता, शांति के प्रति तो बिलकुल भी नहीं। लोग सामान्य मानवता के साधारण जीवन को जीने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए ऊँची हैसियत एवं अपार धन समृद्धि का आनन्द उठाने की, देह के सुखविलासों में मौज करने की इच्छा करते हैं, और उन्हें रोकने के लिए प्रतिबंधों और बन्धनों के बिना, अपनी स्वयं की देह को संतुष्ट करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं; दूसरे शब्दों में जो कुछ भी वे चाहते हैं, करते हैं। तो जब मनुष्य इस किस्म की प्रवृत्तियों में डूब जाता है, तो क्या वह ज्ञान जो तुमने सीखा है वह खुद को छुड़ाने में तुम्हारी सहायता कर सकता है? पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास की तुम्हारी समझ क्या इस भयानक दुर्दशा से बचने में तुम्हारी सहायता कर सकती है? क्या पारम्परिक नैतिकता एवं अनुष्ठान जिन्हें मनुष्य जानता है, संयम बरतने में लोगों की सहायता कर सकते हैं? उदाहरण के लिए, तीन उत्कृष्ट चरित्र (थ्री करेक्टर क्लासिक) को लो। क्या यह इन प्रवृत्तियों के दलदल में से अपने पाँवों को बाहर निकालने में लोगों की सहायता कर सकता है? (नहीं, नहीं कर सकता है।) इस तरह, मनुष्य और भी अधिक दुष्ट, अभिमानी, दूसरों को नीचा दिखाने वाला, स्वार्थी एवं दुर्भावनापूर्ण बन जाता है। लोगों के बीच अब और कोई स्नेह नहीं रह जाता है, परिवार के सदस्यों के बीच अब और कोई प्रेम नहीं रह जाता है, रिश्तेदारों एवं मित्रों के बीच में अब और कोई तालमेल नहीं रह जाता है; हिंसा मानवीय रिश्तों की विशेषता बन जाती है। हर एक व्यक्ति अपने साथी मनुष्यों के बीच रहने के लिए हिंसक तरीकों का उपयोग करना चाहता है; वे हिंसा का उपयोग करके अपनी दैनिक रोटी झपट लेते हैं; वे हिंसा का उपयोग करके अपने पद को प्राप्त कर लेते हैं और अपने लाभों को प्राप्त करते हैं और वे अपनी मनमर्ज़ी करने के लिए हिंसा एवं बुरे तरीकों का उपयोग करते हैं। क्या ऐसी मानवता भयावह नहीं है? (हाँ।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

हालांकि बढ़ती उम्र के बहुत-से बच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, पर वे कम्प्यूटर गेम्स खेलने और इंटरनेट कैफों में जाने की बुरी आदत को नहीं छोड़ पाते। कम्प्यूटर गेम्स में किस तरह की चीजें होती हैं? उनमें बहुत सारी हिंसा होती है। गेमिंग यानी जुआ—जोकि शैतान की दुनिया है। इन खेलों को बहुत देर तक खेलने के बाद अधिकांश बच्चे कोई असली काम नहीं कर पाते—वे स्कूल या काम पर जाना नहीं चाहते, या अपने भविष्य के बारे में कोई विचार करना नहीं चाहते, अपने जीवन के बारे में विचार करना तो दूर की बात है। आजकल कौनसी चीजें दुनिया के अधिकांश तरुणों के विचारों और आत्माओं को प्रभावित करती हैं? खाना, पीना और गेम्स खेलना। वे जो कुछ भी कहते या सोचते हैं, वह सब अमानवीय है। वे जिन चीजों के बारे में सोचते हैं, उनका वर्णन करने के लिए अब कोई "गंदा" या "बुरा" जैसे शब्दों का उपयोग नहीं कर सकता है; इनमें से बहुत-सी चीजें अमानवीय हैं। यदि तुम उनके साथ सामान्य मानवता के बारे में बात करो या उनके साथ सामान्य मानवता से संबंधित किसी विषय पर बात करो, तो वे इसके बारे में सुनना तक सहन नहीं कर पाते, उनकी न तो इसमें कोई रुचि है और न ही वे इसके बारे में कुछ सुनने के लिए तैयार हैं, और जैसे ही वे ऐसी बातें सुनेंगे वे अपनी नजरें घुमा लेंगे और इससे चिढ़ जाएँगे। सामान्य मनुष्यजाति के साथ वे आम भाषा या कोई आम विषय साझा नहीं कर पाते, किंतु जब वे अपनी तरह के लोगों के साथ होते हैं तो उन्हें बात करने के विषय मिल जाते हैं। इनमें से ज़्यादातर विषय गेम्स खेलने, खाने, पीने और मजे करने से जुड़े होते हैं। जो लोग हमेशा इन्हीं विषयों पर बात करते हैं, उनके हृदय इन्हीं चीजों से भरे होते हैं। उनके भविष्य की क्या संभावनाएँ हैं? क्या उनके भविष्य की कोई संभावनाएँ हैं? क्या ये लोग ऐसी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं जिनमें सामान्य मानवजाति को शामिल होना चाहिए? ये लोग अपनी पढ़ाई पर कोई मेहनत नहीं करते, और अगर कोई उनसे अपने काम में मेहनत करने के लिए कहे, तो क्या वे इसके लिए तैयार होंगे? जैसे ही तुमने उनसे काम करने को कहा, वे क्या सोचेंगे? वे सोचेंगे, "काम करने का क्या फायदा है? यह काम बहुत थका देने वाला है। मुझे इसे कब तक करना पड़ेगा? खेलने में कितना मजा आता है, कितना आराम और आनंद मिलता है। काम करने से मुझे क्या मिलेगा? काम करके भी तुम्हें सिर्फ तीन वक्त का खाना ही तो मिलता है, है न? मैंने तो इससे कोई भला होते नहीं देखा! खेल खेलना बहुत अच्छा है; कंप्यूटर के सामने बैठते ही मेरे पास वह सब-कुछ होता है, जिसकी मुझे आवश्यकता होती है। मेरे पास आभासी दुनिया है, और मेरे लिए उसके अंदर रहना काफी है!" इसके अलावा, यदि तुम उनसे नौ से पांच तक काम करवाते हो, समय पर और निश्चित घंटे काम करवाते हो, तो उन्हें इस बारे में कैसा लगेगा? क्या वे उस समय-सारणी का पालन करने को तैयार होंगे? जब लोग लगातार गेम्स खेलते हुए कम्प्यूटर पर अपना समय नष्ट करते हैं तो उनकी इच्छा-शक्ति खत्म हो जाती है और उनका पतन होने लगता है; फिर वे सामान्य मनुष्य नहीं रह पाते। वे इन खेलों की हिंसा और हत्या की भावनाओं से और आभासी दुनिया की दूसरी चीजों से भर जाते हैं। ये खेल उनकी सामान्य मानवता की चीजों को छीन लेते हैं और वे बस इन्हीं खेलों से भर जाते हैं और इन्हीं में लिप्त रहते हैं, और उनका दिमाग भी इन्हीं में खोया रहता है; ये लोग पतनशील हो जाते हैं। अविश्वासी लोग भी इन्हें पसंद नहीं करते, और अविश्वासियों की इस वर्तमान दुनिया में इन तरुणों को कोई सहारा नजर नहीं आता; उनके माता-पिता उन्हें संभाल नहीं पाते, उनके शिक्षक भी उनका कुछ नहीं कर पाते, और किसी देश की शिक्षा प्रणाली में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इस चलन के सामने हार मानने के अलावा और कुछ कर पाए। दुष्ट शैतान लोगों को लुभाने के लिए और उन्हें भ्रष्ट करने के लिए ये सब चीजें करता है। जो लोग आभासी दुनिया में जीते हैं, उन्हें सामान्य मानवता की जिंदगी में कोई रुचि नहीं रहती; वे काम या अध्ययन करने की मनोदशा में भी नहीं रहते। उन्हें तो बस आभासी दुनिया में वापस जाने की चिंता रहती है, मानो वे किसी चीज के द्वारा सम्मोहित किए जा रहे हों। जब भी वे ऊब महसूस करते हैं या कोई वास्तविक काम कर रहे होते हैं, तो वे इसकी बजाय गेम खेलना चाहते हैं, और धीरे-धीरे गेम खेलना ही उनकी पूरी जिंदगी बन जाता है। गेम खेलना एक तरह से किसी नशीले पदार्थ का सेवन करना है। एक बार जब किसी को गेम खेलने की लत लग जाती है तो फिर इससे बाहर निकलना और पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल हो जाता है। बच्चा हो या कोई बड़ी उम्र का व्यक्ति, एक बार यह बुरी लत लग जाए तो इसे छोड़ना आसान नहीं होता। कुछ बच्चे रात भर जागकर खेलते रहते हैं, और उनके माता-पिता न तो उन्हें नियंत्रित कर पाते हैं और न ही उन पर नजर रख पाते हैं, इसलिए बच्चे दिन-रात कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे खेलते ही रहते हैं। क्या तुम इसे किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला काम कहोगे? अगर गेमिंग सामान्य मानवता के लिए जरूरी होती—अगर यह सही रास्ता होता—तो लोग इसे छोड़ क्यों नहीं पाते हैं? वे इस हद तक इससे वशीभूत कैसे हो सकते हैं? इससे तो यही साबित होता है कि यह एक भला रास्ता, एक सन्मार्ग नहीं है। इस या उस चीज के लिए ऑनलाइन सर्फिंग करते रहना, अस्वस्थ चीजें देखना, और गेम्स खेलना—ये चीजें लोगों को अपने चंगुल में लेकर उन्हें बर्बाद कर देती हैं। इनमें से कोई भी भला रास्ता नहीं है। ये सही रास्ते नहीं हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

क्या आज के समाज में लोगों को अकसर ललचाया जाता है? उन्हें हर मोड़ पर ललचाया जाता है : हर तरह के बुरे चलन, हर तरह की बातें, हर तरह के दृष्टिकोण और विचार, तरह-तरह के लोगों के असंख्य धोखे और प्रलोभन, उनके अनेक शैतानी चेहरे—ये सब तुम्हें ललचाते हैं। अगर तुम अपने भीतर कुछ विशिष्ट सत्यों से लैस नहीं हो, और तुममें वास्तविक आध्यात्मिक कद का अभाव है, तो तुम इन चीजों को भाँप नहीं पाओगे, और हर चीज तुम्हारे लिए एक जाल, एक प्रलोभन साबित होगी। एक ओर तुम सत्य के अभाव में विभिन्न लोगों के शैतानी चेहरे नहीं पहचान पाते और उनसे जीत नहीं पाते; दूसरी तरफ सत्य-वास्तविकता के बिना तुम हर तरह के बुरे चलन, दुष्टता भरे दृष्टिकोण और बेतुके विचारों और बातों का प्रतिरोध नहीं कर पाते। जब ये चीजें तुम पर पड़ती हैं, तो वे एक शीत-लहर की तरह होती हैं, जिससे तुम कम से कम जुकाम और अगर बहुत बुरा हुआ तो सर्दी के दौरे[क] की चपेट में आ सकते हो। सर्दी का यह दौरा जानलेवा भी साबित हो सकता है, और शायद तुम अपनी आस्था छोड़ सकते हो। अगर तुम्हारे पास सत्य नहीं होगा, तो अविश्वासियों की दुनिया की शैतानी बातों के कुछ शब्द तुम्हें धोखे में डाल देंगे और तुम्हें भ्रमित कर देंगे; तुम्हें यह भी पता नहीं होगा कि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करना चाहिए या नहीं, या परमेश्वर में विश्वास करना ठीक है या नहीं। हो सकता है कि आज इकट्ठे होकर तुम अच्छी अवस्था में हो, पर कल घर लौटकर तुम टीवी पर किसी रूमानी सोप ऑपेरा के दो एपिसोड देखो और फिर फँस जाओ। रात को तुम सोने जाओ और प्रार्थना करना भूल जाओ, और तुम्हारे मन में यही खयाल आता रहे कि अगला एपिसोड कब आएगा, और फिर तुम उसे देखते रहो। दो दिन इस सोप ऑपेरा को देखने के बाद परमेश्वर तुम्हारे दिल से निकल जाता है। तुम पूरी तरह उस टीवी शो में डूब जाते हो, और मन ही मन सोचते हो, "मेरा अपना ऐसा प्रबल प्रेम-संबंध कब शुरू होगा? वह मेरी जिंदगी सार्थक कर देगा!" अगर किसी टीवी शो के दो एपिसोड ही तुम्हारा नजरिया बदल सकते हैं, तो क्या तुम्हारा कोई आध्यात्मिक कद है? तुम शैतान की बातें गले लगाने के लिए इतने उतावले हो। क्या तुम्हें भरोसा है कि तुम्हारे पास इन बुरे चलनों का प्रतिरोध करने लायक आध्यात्मिक कद है? परमेश्वर के अनुग्रह ने तुम्हें पौधा-घर में रखा हुआ है। यह न भूलो कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद क्या है : तुम पौधा-घर के एक फूल हो, हवा-बारिश झेलने में असमर्थ। अगर लोग इन प्रलोभनों से नहीं बच सकते, अगर वे उनकी असलियत नहीं देख सकते, तो शैतान उन्हें किसी भी समय और किसी भी जगह से झपटकर ले जा सकता है—इतना छोटा और दयनीय है लोगों का आध्यात्मिक कद। चूँकि तुममें सत्य-वास्तविकता का अभाव है, चूँकि तुम सत्य को नहीं समझते, इसलिए शैतान की सभी बातें तुम्हारे लिए विष के समान हैं; एक बार वे तुम्हारे कानों में पड़ गईं, तो तुम उन्हें बाहर नहीं निकाल पाओगे। तुम कहते हो कि तुम उन्हें सुनोगे नहीं, लेकिन कैसे? क्या तुम शून्य में रहते हो? जब तुम उन्हें सुनते हो, तो तुम उनका प्रतिरोध करने में अक्षम होते हो, तुम उन्हें झेलने में असमर्थ होते हो, और तुम उनमें डूब जाते हो। ये चीजें तुम्हारे जीवन, तुम्हारे विचारों और तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित कर सकती हैं; ये तुम्हारे सर्वस्व को नियंत्रित कर सकती हैं, तुम्हारे समूचे जीवन को निर्देशित कर सकती हैं, यहाँ तक कि तुम्हें परमेश्वर के सम्मुख आने से भी रोक सकती हैं—और ऐसा होने पर तुम्हारा खेल खत्म हो जाएगा और तुम एक तरफ फेंक दिए जाओगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्‍य के बारंबार चिन्‍तन से ही मार्ग मिलता है' से उद्धृत

तुम्हें ऐसा कुछ भी करने से बचने की कोशिश करनी चाहिए, जो तुम्हारे दिल को परमेश्वर से और दूर ले जाए; तुम्हें ऐसा कुछ भी कहने से बचना चाहिए, जो तुम्हारे दिल को परमेश्वर से और दूर ले जाए; तुम्हें ऐसी कोई भी चीज पढ़ने या देखने से बचना चाहिए, जो तुम्हारे और परमेश्वर के बीच दूरी बनाए या जिसके कारण तुममें परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और संदेह उत्पन्न हों; तुम्हें ऐसे किसी भी व्यक्ति से दूर रहना चाहिए और उसके साथ बातचीत करने से बचना चाहिए, जो तुम्हें नकारात्मक बना सकता हो, पतित या भोगासक्त बना सकता हो, और तुममें परमेश्वर के विरुद्ध संदेह या प्रतिरोध उत्पन्न करे या तुम्हें उससे दूर कर सकता हो; तुम्हें अपने पास ऐसे लोगों को रखना चाहिए, जो तुम्हें सीख दे सकते हों, तुम्हारी सहायता कर सकते हों और तुम्हें पोषण प्रदान कर सकते हों; और तुम्हें ऐसा कुछ भी करने से बचना चाहिए, जो तुम्हें सत्य से विमुख कर सकता हो या जिसके कारण तुम सत्य से घृणा करने लगो और उसे अस्वीकार या नापसंद कर दो। तुम्हें अपने अंतर्मन में इन सभी बातों को समझना चाहिए; तुम्हें यह कहते हुए आँख मूँदकर जीवन नहीं बिताना चाहिए, "मैं बस आज की चिंता करूँगा, और जीवन जहाँ ले जाएगा, चला जाऊँगा; मैं बस प्रकृति को अपना काम करने दूँगा और परमेश्वर के आयोजनों का पालन करूँगा।" परमेश्वर ने तुम्हारे लिए परिवेशों की व्यवस्था की है और तुम्हें चुनाव करने के लिए स्वतंत्रता प्रदान की है, लेकिन तुम सहयोग नहीं करते; तुम हमेशा उन लोगों के संपर्क में आने की कोशिश करते हो जो धर्मनिरपेक्ष दुनिया से प्रेम करते हैं, अकसर दैहिक सुखों में लिप्त रहते हैं, अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठा नहीं रखते, और कोई जिम्मेदारी नहीं लेते। अगर तुम लगातार उन लोगों के साथ व्यर्थ समय गँवा रहे हो, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तुम्हारा अंत क्या होगा? वे लोग बेपरवाही से बात किया करते हैं कि वे खुद को कैसे तैयार करते हैं और क्या खाना या पहनना पसंद करते हैं या और किस चीज में आनंद लेते हैं, और वे लोगों के बीच संघर्ष और झगड़े के बारे में बात करते हैं। ऐसे प्रलोभनों से सामना होने पर अगर तुम उनसे दूरी नहीं बनाते या उनसे बचने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उनके करीब आने और उनके समूह में शामिल होने का प्रयास करते हो, तो तुम खतरे में हो; ये सब प्रलोभनों से भरे हुए हैं! जब बुद्धिमान लोग ऐसे प्रलोभनों का सामना करते हैं, तो वे यह सोचते हुए उनसे दूरी बना लेते हैं, "मेरे पास उस तरह का आध्यात्मिक कद नहीं है, इसलिए मैं नहीं सुनूँगा, और मैं उनमें शामिल भी नहीं होना चाहता। ये लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, न ही ये उससे प्रेम करते हैं, इसलिए मैं इनसे दूर ही रहूँगा, अकेले बैठकर परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के लिए कोई शांत जगह ढूँढ़ूँगा, अपने मन को शांत करूँगा और उन पर चिंतन करने में समय बिताऊँगा, और परमेश्वर के सामने आऊँगा।" ये सभी सिद्धांत और उद्देश्य हैं : पहले, खुद को परमेश्वर के वचन से दूर न करो; और दूसरे, अपने मन को परमेश्वर से दूर भटकने न दो। इस तरह, तुम सत्य के बारे में अपनी समझ के आधार पर अकसर उसके सामने रहोगे। एक ओर, वह तुम्हें प्रलोभन में पड़ने से बचाएगा, और दूसरी ओर, वह तुम्हारे साथ विशेष दयालुता से पेश आएगा, और यह समझने का अवसर देगा कि सत्य का अभ्यास करने के लिए क्या करना है, और तुम्हें सत्य के विभिन्न पहलुओं के बारे में रोशनी और प्रबुद्धता देगा। इसके अतिरिक्त, जहाँ तक तुम्हारे कर्तव्य निभाने का संबंध है, तो परमेश्वर उसमें तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, जिससे तुम गलतियाँ न करने का भरसक प्रयास कर सको और अकसर चीजों को सही ढंग से कर सको, ताकि तुम सिद्धांतों को समझ सको। इस प्रकार, तुम्हारी रक्षा की जाएगी, है ना? बेशक, सुरक्षित होना सबसे बड़ा या अंतिम लक्ष्य नहीं है। तो फिर, अंतिम लक्ष्य क्या है? अंतिम लक्ष्य सभी प्रकार के लोगों, मामलों और चीजों से सबक सीखने, परमेश्वर की इच्छा समझने, और उसके द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम होना है; वह तुम्हारे जीवन को अवरुद्ध करने के बजाय लगातार सकारात्मक दिशा में विकसित करना है; वह बेकार न बैठकर अपने हाथ का काम करने भर की बात नहीं है, बल्कि अपने जीवन में कभी कोई विकास हासिल न करने की बात है। यही जीवन-विकास की ओर जाने वाला मार्ग है। क्या तुम लोगों में से किसी ने अभी तक ये चीजें की हैं?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग एक)' से उद्धृत

अब तुम कलीसिया में अपने कर्तव्य निभा रहे हो और, इस परिवेश में, तुम्हारे आसपास उपस्थित सभी लोग विश्वासी हैं, और तुम यहाँ परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में अडिग हो सकते हो। अगर तुम्हें अकेले ले जाकर अविश्वासियों के बीच छोड़ दिया जाए, और उनके साथ रहने को कहा जाए, क्या तब भी तुम्हारे दिल में परमेश्वर होगा? तुम्हारे दिल में क्या होगा? अगर तुम उनके साथ रहोगे, तो क्या तुम बहुत आसानी से बिल्कुल उनके जैसे नहीं बन जाओगे? तब तुम शायद यह कहोगे, "चिंता की कोई बात नहीं है, परमेश्वर मेरा ध्यान रखता है और मेरी रक्षा करता है।" पर तुम तब भी हठधर्मी रहोगे और चलन का अनुसरण करोगे, और इस बात का अहसास किए बिना तुम एक छोटी-सी भूल करके झट-से मन-ही-मन कहोगे, "हे परमेश्वर, मुझे माफ कर दो; मैं यह भूल कर बैठा।" जैसे-जैसे समय बीतेगा, तुम दोषी महसूस करना छोड़ दोगे—तुम कुछ भी महसूस नहीं करोगे—और तुम सोचोगे, "परमेश्वर? कहाँ है परमेश्वर? मैंने उसे देखा क्यों नहीं है?" तुम धीरे-धीरे बदलने लगोगे। तुम इतनी आसानी से क्यों बदल जाओगे? सच्चाई यह है कि तुम दरअसल में सिर्फ उस समय नहीं बदलोगे, बल्कि वर्तमान में भी तुम्हारे अंदर सत्य वास्तविकता नहीं है, और तुमने अपने-आपको उन विचारों, उस दृष्टिकोण, स्वभाव और उस समझ से शुद्ध नहीं किया है जो संसार और शैतान से जुड़े हुए हैं। ये चीजें अभी भी तुम्हारे भीतर हैं, और तुम अभी भी जीने के लिए इन पर निर्भर करते हो; बात सिर्फ इतनी है कि अब तुम परमेश्वर के घर में हो। बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि तुम परमेश्वर में विश्वास कर रहे हो और अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हो, पर वास्तव में तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव अभी सुधरना बाकी है, और तुम्हारे भीतर के शैतानी दृष्टिकोण और विचारों की अभी सफाई नहीं हुई है। इसलिए, तुम्हारा आध्यात्मिक कद अभी बहुत छोटा है, और तुम अभी भी एक खतरनाक चरण में हो; तुम अभी भी खतरे में और असुरक्षित हो। तुममें शैतानी स्वभाव हैं, और तुम अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके साथ विश्वासघात कर सकते हो। इस समस्या को सुलझाने के लिए तुम्हें सबसे पहले यह पहचानने की जरूरत है कि कौनसी चीजें बुरी हैं, उनके खतरे क्या हैं, शैतान ऐसे काम क्यों करता है, इन चीजों को स्वीकार करने के बाद लोग किस तरह के जहर के शिकार हो सकते हैं, वे क्या बन सकते हैं, परमेश्वर मनुष्य से किस तरह का व्यक्ति बनने की अपेक्षा करता है, सामान्य मानवता की चीजें कौनसी हैं, सकारात्मक चीजें कौन-सी हैं और नकारात्मक चीजें कौनसी हैं। नकारात्मक पहलू से, तुम्हें इन चीजों को पहचानना चाहिए। सकारात्मक पहलू से, तुम्हें सक्रिय और सकारात्मक रूप से अपने कर्तव्य निभाने चाहिए; अपनी ईमानदारी, अपनी निष्ठा अर्पित करनी चाहिए और चालबाजियों में लिप्त नहीं होना चाहिए; और अपने कर्तव्य और सौंपे गए कामों के प्रति अपने रवैये में अविश्वासियों के तौर-तरीकों या फलसफों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। फिर तुम्हें सत्य के सभी पहलुओं में प्रवेश करना चाहिए, और धीरे-धीरे परमेश्वर और उसके स्वभाव के बारे में एक समझ अर्जित करनी चाहिए। इस तरह, तुम अचेतन रूप से एक आंतरिक कायाकल्प से गुजरोगे : तुम्हारे भीतर और ज्यादा सकारात्मक चीजें होंगी, नकारात्मक चीजें कम होंगी; सक्रिय चीजें ज्यादा होंगी, निष्क्रिय चीजें कम होंगी; और तुम पहले से बेहतर ढंग से अच्छे-बुरे में भेद कर सकोगे। जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद इस स्तर तक पहुँच जाएगा, तो तुममें विभिन्न लोगों, मामलों और सांसारिक चीजों में भेद करने की योग्यता होगी, और तब तुम किसी समस्या के सार को समझ पाओगे। मान लो कि तुम अविश्वासियों द्वारा बनाया गया कोई व्यंग्य-चित्र देखते हो : तुम यह समझ पाओगे कि देखने वालों में यह किस तरह के जहर का संचार करेगा, शैतान लोगों के भीतर किस तरह की चीजें रोपना चाहता है, और इस विधि और चलन से शैतान मनुष्यजाति की किस चीज को खत्म करने की उम्मीद करता है। तुम धीरे-धीरे पूरी तरह से इन चीजों को भाँपने लगोगे। जब तुम इन चीजों के जहर से प्रभावित हुए बिना इन्हें देखने में सक्षम हो जाओगे, जब तुम इनमें भेद करने में सक्षम हो जाओगे, तभी तुम्हारा कदसच में आध्यात्मिक होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

दुनिया के बुरे चलन का अनुसरण करना, अपने भ्रष्ट स्वभाव का अनुसरण करके चरित्रहीनता की ओर बढ़ना बहुत आसान है। एक सत्य वास्तविकता वाला व्यक्ति होना, न्याय भावना, चेतना और तर्कशीलता वाला व्यक्ति होना आसान नहीं है, और इसे हासिल करने से पहले तुम्हें बहुत कष्ट भोगना होगा। लेकिन अगर तुमने इसका संकल्प कर लिया है, और तुम्हें सकारात्मक चीजों से प्रेम है; अगर तुम्हारे पास हृदय भी है और आत्मा भी, और तुम एक शालीन व्यक्ति हो, तो तुम्हें इसके लिए भोगे जाने वाले कष्ट भारी नहीं लगेंगे, और तुम उनसे डरोगे नहीं। अगर तुम्हें सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं है, बल्कि तुम्हें बुरे चलन और सांसारिक लोगों को अच्छी लगने वाली चीजें पसंद हैं, तो शायद सत्य को प्राप्त करना तुम्हारे लिए कुछ मुश्किल होगा, और तुम यह सोचकर कष्ट नहीं भोगना चाहोगे कि किसलिए इतनी मुसीबत उठाई जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा—न पैसा, न पुरस्कार—और इसके लाभ तुम्हें अपनी आँखों के सामने दिखाई नहीं देंगे। क्या यह एक गैर-विश्वासी की मनोस्थिति नहीं है? हमेशा भौतिक लाभ को अपनी आँखों के सामने देखने की इच्छा एक गैर-विश्वासी की मनोस्थिति होती है। क्या तुम लोग कभी इस अवस्था में रहे हो? अगर लोग कभी भी ऐसी मनोस्थिति में रहते हैं तो उन्हें इसके बारे में सोचना और इन्हें समझना चाहिए, और फिर परमेश्वर द्वारा इन्हें उजागर और विश्लेषित किए जाने को स्वीकार करना चाहिए, उसके न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए। इस दुष्टतापूर्ण युग में, ऐसे बुरे चलन के बीच रहते हुए, एक अच्छा व्यक्ति बनना आसान नहीं है; एक न्यायप्रिय व्यक्ति बनना भी आसान नहीं है, और सत्य वास्तविकता की समझ वाला व्यक्ति बनना तो और भी मुश्किल है, और परमेश्वर का भय मानने वाला और बुराई से दूर रहने वाला व्यक्त बनना तो और भी ज्यादा मुश्किल है! यह लोगों के कष्ट सहने के संकल्प पर निर्भर करता है, और इस बात पर भी कि वे सकारात्मक चीजों, न्याय, निष्पक्षता और धार्मिकता से किस हद तक प्रेम करते हैं। अगर इन चीजों के प्रति तुम्हारे दिल में औसत हद तक प्रेम है, तो तुम सोचोगे, "इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे पास ये चीजें हैं या नहीं। वैसे भी दुनिया में रहने का यह अर्थ नहीं है कि मैं मर ही जाऊँगा। और फिर बुरे चलन का अनुसरण करने से मुझे जिंदगी में कोई मुश्किल नहीं हो रही है। क्या इसी तरह से जीना अच्छा नहीं है? मैं जैसे भी जिऊँ, मैं अपनी जिंदगी जी ही लूँगा!" अगर तुम्हारी मानसिकता इसी तरह की है तो तुम कोई प्रगति नहीं कर पाओगे। अर्थात, अगर सत्य की खोज करने का तुम्हारा संकल्प बहुत दृढ़ नहीं है, और सकारात्मक चीजों से प्रेम करने और न्यायप्रियता की भावना वाला व्यक्ति बनने के लिए तुम्हारा उत्साह भी बहुत प्रबल नहीं है, तो यह संभव है कि तुम सत्य से प्राप्त न कर पाओ। लेकिन यह बात भी नहीं है कि कोई भी इसे प्राप्त नहीं कर सकता; यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति कैसे इसकी खोज करता है, और उसमें कितना उत्साह है। तुम लोगों का उत्साह कितना प्रबल है? इस बुरी दुनिया और दुष्ट मानवजाति की तुम्हारी समझ कितनी गहरी है? तुमने अपने भ्रष्ट स्वभाव के बंधन, जंजीरों और उसके घातक प्रभाव को कितनी गहराई से अनुभव किया है? सक्रिय चीज़ों के लिए तुम्हारा प्रेम और तृष्णा कितनी अधिक है? तुम लोगों के दिलों में इतनी छोटी-सी इच्छा है—तृष्णा का एक कण मात्र। लेकिन तृष्णा और प्रेम एक जैसे नहीं हैं, और तुम्हें इस तरह का प्रेम हासिल करना होगा। यह भी आसान नहीं है। अगर तुम अपने दिल की गहराइयों से इन चीजों से प्रेम करते हो, इनकी तृष्णा और लालसा करते हो; सत्य की खोज करते हुए न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हो; और अपने निजी हितों का त्याग करने में सक्षम हो, तो पूरी प्रक्रिया के दौरान तुम्हें इतना कष्ट सहने या इतना मूल्य चुकाने की चिंता नहीं होगी। अगर सकारात्मक चीजों के प्रति तुम्हारे प्रेम की हद औसत है तो तुम्हें यह पछतावा होगा कि तुमने ये त्याग क्यों किए। तुम्हारा इन चीजों को छोडने का मन नहीं होगा, और इन्हें छोड़ पाना तुम्हारे लिए बहुत मुश्किल होगा। इन सब बातों को ध्यान में रखो, क्योंकि तुम्हें एक मूल्यांकन करना होगा। किस बात का मूल्यांकन? इस बात का मूल्यांकन कि सभी पहलुओं से तुम क्या दर्शाते और अभिव्यक्त करते हो; तुम कैसे व्यवहार करते हो; सकारात्मक चीजों से सामना होने पर तुम्हारे मन में क्या आता है; तुम उन्हें किस रवैये से देखते हो; तुम्हारी मनोवृत्ति किस तरह की है; क्या तुम्हारा मन केंद्रित है; बुरे चलन या कुकर्म करने वाले बुरे लोगों से सामना होने पर तुम्हारे मन में क्या प्रतिक्रिया होती है; उनके प्रति तुम्हारा रवैया कैसा होता है; क्या तुम उन्हें पसंद करते हो, उन्हें खुश रखते हो, उनसे मिलने की कामना करते हो; या क्या तुम उनमें शामिल हो जाते हो, या क्या तुम उनसे पीछा नहीं छुड़ा पाते; या क्या तुम उन्हें नापसंद करते हो और वे तुम्हारे अंदर घृणा पैदा करते हैं; तुम किस तरह के व्यक्ति हो—अपने मूल्यांकन से तुम्हें इन सब बातों का पता चलेगा। और यह मूल्यांकन करने के बाद तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें अपना उपचार करना चाहिए और सकारात्मक चीजों और सत्य की खोज करने में सक्षम होने का कड़ा प्रयास करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

यह अधिकाधिक आमोद-प्रमोद और धूमधाम के संसार जैसा बनता जा रहा है, सारे लोगों के हृदय इसकी ओर खिंचे चले आते हैं, और कई लोग जाल में फँस जाते हैं और स्वयं को इससे छुड़ा नहीं पाते हैं; बहुत अधिक संख्या में लोग उनके द्वारा छले जाएँगे जो धोखेबाज़ी और जादू-टोने में लिप्त हैं। यदि तुम उन्नति के लिए कठोर प्रयास नहीं करते, और आदर्शों से रहित हो, और तुमने सच्चे मार्ग में अपनी जड़ें नहीं जमाई हैं, तो पाप के ऊँचे उठते ज्वार तुम्हें बहा ले जाएँगे। चीन सभी देशों में सबसे पिछड़ा है; यह वह देश है जहाँ बड़ा लाल अजगर कुण्डली मारकर बैठा है, इसके पास ऐसे लोग सबसे अधिक हैं जो मूर्तियों की पूजा और जादू-टोने करते हैं, सबसे ज़्यादा मंदिर हैं, और यह ऐसा स्थान है जहाँ गंदी दुष्टात्माएँ निवास करती हैं। तुम इसी से जन्मे थे, तुम इसी के द्वारा शिक्षित हुए हो और इसके प्रभाव से तरबतर हुए थे; तुम इसके द्वारा भ्रष्ट और पीड़ित किए गए हो, परंतु जागृत होने के पश्चात तुम इसे त्याग देते हो और परमेश्वर द्वारा पूर्णत: प्राप्त कर लिए जाते हो। यह परमेश्वर की महिमा है, और यही कारण है कि कार्य के इस चरण का अत्यधिक महत्व है। परमेश्वर ने इतने बड़े पैमाने का कार्य किया है, इतने अधिक वचन बोले हैं, और वह अंततः तुम लोगों को पूरी तरह प्राप्त कर लेगा—यह परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का एक भाग है, और तुम शैतान के साथ परमेश्वर की लड़ाई के "विजय के उपहार" हो। तुम लोग सत्य को जितना अधिक समझते हो और कलीसिया का तुम्हारा जीवन जितना बेहतर होता है, उतना ही अधिक वह बड़ा लाल अजगर उसके घुटनों पर लाया जाता है। ये सब आध्यात्मिक संसार के विषय हैं—वे आध्यात्मिक संसार की लड़ाइयाँ हैं, और जब परमेश्वर विजयी होता है, तब शैतान लज्जित और धराशायी होगा। परमेश्वर के कार्य के इस चरण का विशालकाय महत्व है। परमेश्वर इतने विशाल पैमाने पर कार्य इसलिए करता है और लोगों के इस समूह को पूरी तरह इसलिए बचाता है ताकि तुम शैतान के प्रभाव से बच सको, पवित्र देश में रह सको, परमेश्वर की ज्योति में रह सको, और ज्योति की अगुआई और मार्गदर्शन पा सको। तब तुम्हारे जीवन का अर्थ है। तुम लोग जो खाते और पहनते हो, वह अविश्वासियों से भिन्न है; तुम लोग परमेश्वर के वचनों का आनंद लेते हो और सार्थक जीवन जीते हो—और वे किसका आनंद लेते हैं? वे बस अपने "पूर्वजों की विरासत" और अपनी "राष्ट्रीय भावना" का आनंद लेते हैं। उनमें लेश मात्र भी मानवता नहीं है! तुम लोगों के वस्त्र, शब्द और कार्य सब उनसे भिन्न हैं। तुम लोग अंततः गंदगी से पूरी तरह बच जाओगे, शैतान के प्रलोभन के फंदे में अब और नहीं फँसोगे, और प्रतिदिन परमेश्वर का पोषण प्राप्त करोगे। तुम लोगों को सदैव चौकन्ना रहना चाहिए। यद्यपि तुम गंदी जगह में रहते हो, किंतु तुम गंदगी से बेदाग़ हो और परमेश्वर के निकट रह सकते हो, उसकी उत्कृष्ट सुरक्षा प्राप्त कर सकते हो। परमेश्वर ने इस पीले देश के समस्त लोगों में से तुम लोगों को चुना है। क्या तुम सबसे धन्य लोग नहीं हो? तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपनी अशुद्ध देह के भीतर रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में जानवर नहीं हो? चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए। इस संसार में, मनुष्य शैतान का भेष धारण करता है, शैतान का दिया भोजन खाता है, और शैतान के अँगूठे के नीचे कार्य और सेवा करता है, उसकी गंदगी में पूरी तरह रौंदा जाता है। यदि तुम जीवन का अर्थ नहीं समझते हो या सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं करते हो, तो इस तरह जीने का क्या महत्व है? तुम सब वे लोग हो, जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, जो सुधार की खोज करते हो। तुम सब वे लोग हो, जो बड़े लाल अजगर के देश में ऊपर उठते हो, जिन्हें परमेश्वर धार्मिक कहता है। क्या यह सबसे सार्थक जीवन नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (2)' से उद्धृत

फुटनोट :

क. परंपरागत चीनी चिकित्सा पद्धति में "सर्दी का दौरा" शब्द भीषण और जानलेवा अंदरूनी सर्दी के लिए प्रयोग किया जाता है, जो किन्हीं बाहरी तत्वों से पैदा होती है।

पिछला: 147. अपने दैहिक संबंधियों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

अगला: 149. छुट्टियों और सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें