163. कार्य-व्यवस्थाओं के प्रति व्यवहार के सिद्धांत

(1) कार्य-व्यवस्थाएँ, उपदेश और सहभागिता पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए, उनका पालन करना चाहिए और उन्हें आचरण में लाना चाहिए।

(2) अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करने के लिए, कार्य-व्यवस्था के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना आवश्यक होता है। व्यक्ति को कभी भी अपनी इच्छानुसार, और अपने ही साधनों से, चीज़ों को नहीं करना चाहिए, जो मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलना है।

(3) कार्य-व्यवस्थाएँ, उपदेश और सहभागिता पवित्र आत्मा द्वारा प्रकाशित और प्रबुद्ध होती हैं। उन्हें मानवीय ज्ञान के रूप में गिना जाता है, उन्हें कभी भी परमेश्वर के वचनों का स्थान नहीं लेना चाहिए और न ही उन्हें परमेश्वर के वचनों के रूप में मानना चाहिए।

(4) पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने और कर्तव्य के प्रभावी निष्पादन को सुनिश्चित करने के लिए, बिना किसी उलट-फेर के, कार्य-व्यवस्थाओं, उपदेशों और सहभागिता को तेज़ी से और निर्णायक रूप से कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हो, या तुम जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हो और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम्हारे कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना तुम्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कुछ संपूर्ण नहीं कर पाओगे। कार्य करते समय पालन करने के दो मुख्य सिद्धांत यह हैं : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो तुम आसानी से गलतियाँ नहीं करोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

कार्य-व्यवस्थाएँ प्राप्त करने के बाद, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को पहले कार्य-व्यवस्थाओं की विभिन्न आवश्यकताओं और उन आवश्यकताओं के विवरणों और सिद्धांतों के बारे में संगति करनी चाहिए और उन्हें आत्मसात करना चाहिए। उसके बाद उन्हें इन व्यवस्थाओं को निष्पादित और कार्यान्वित करने के लिए एक रास्ता खोजना चाहिए, एक योजना बनानी चाहिए, ताकि उनका कार्यान्वयन अधिक विस्तृत और विशिष्ट तरीके से किया जा सके। सबसे पहले, उन्हें इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि कार्य-व्यवस्थाओं के लिए क्या आवश्यक है, क्या किया जाना चाहिए, सिद्धांत क्या है, और कौन-से लोग और कौन-सा कार्य-क्षेत्र उनके लक्ष्य हैं। यह पहली चीज है, जो कार्य-व्यवस्थाएँ प्राप्त करने के बाद अगुआओं और कार्यकर्ताओं को करनी चाहिए, बजाय इसके कि उन पर केवल उड़ती नजर डालें और फिर उन्हें सभी को पढ़कर सुना दें, या बस उन्हें लोगों को प्रेषित कर दें और उन्हें उनकी सूचना दे दें, इसके अलावा कुछ नहीं—यह सिर्फ कार्य-व्यवस्थाओं को हस्तांतरित करना है, उन्हें लोगों को प्रेषित करना है, यह उन्हें कार्यान्वित करना नहीं है। कार्य-व्यवस्थाओं को कार्यान्वित करने का पहला विशिष्ट कार्य यह है कि सबसे पहले अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कार्य-व्यवस्थाओं की विशिष्ट विषयवस्तु और अपेक्षाओं को, इस कार्य के लिए उच्च के उद्देश्य और अपेक्षाओं को, और उनका महत्व समझने का प्रयास करना चाहिए—जिसके बाद उन्हें उन कार्य-व्यवस्थाओं को कार्यान्वित और साकार करने के लिए एक विशिष्ट योजना प्रस्तुत करनी चाहिए। यह पहला कदम है, जिसे हासिल करना आसान होना चाहिए। मजमून समझने में सक्षम होने के अलावा, पहला कदम हासिल करने के लिए अगुआओं और कार्यकर्ताओं का कार्य के प्रति एक ईमानदार और जिम्मेदार रवैया होना चाहिए, न कि उदासीन और बेफिक्र होने का, बिना तैयारी काम करने का, काम करने का दिखावा करने का। इन कार्य-व्यवस्थाओं को पहले प्रस्तुत किया गया हो या न किया गया हो, चाहे यह कार्य आसानी से पूरा किया जा सके या इसमें कुछ कठिनाई हो, चाहे लोग इसे करने के लिए तैयार हों या न हों, इत्यादि—बात जो भी हो, कार्य-व्यवस्थाओं के प्रति लोगों का रवैया सतही नहीं होना चाहिए, वह "सरपट दौड़ते घोड़े की पीठ पर बैठकर फूलों को सराहना" करने वाला रवैया नहीं होना चाहिए, उन्हें केवल मजमून पढ़कर उसकी सतही बातों पर बखेड़ा नहीं करना चाहिए या नारे नहीं लगाने चाहिए। उनका रवैया क्या होना चाहिए? सबसे पहले, उनका रवैया ऐसा होना चाहिए, जो गंभीर, ईमानदार, जिम्मेदार और दृढ़ हो। तो क्या बात यह है कि उन्हें केवल इस कार्य को ठीक से कार्यान्वित करने में सक्षम होने के लिए ही ऐसा रवैया रखने और कार्य-व्यवस्थाओं की विशिष्ट विषयवस्तु और मदों को समझने-बूझने की आवश्यकता है? नहीं। यह मात्र वह रवैया है, जो लोगों को कोई भी कार्य करते समय रखना चाहिए; यह विशिष्ट कार्य करने के लिए प्रतिस्थापन नहीं है। तो यह रवैया रखने और साथ ही कार्य-व्यवस्थाओं की विशिष्ट विषयवस्तु, अपेक्षाएँ और सिद्धांत समझ लेने के बाद अगुआओं और कार्यकर्ताओं को क्या करना चाहिए? अगला कदम यह है कि कार्य-व्यवस्थाओं के लिए जो आवश्यक है, उसे कैसे निष्पादित किया जाए; इसके लिए विशिष्ट कार्य किया जाना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (10)' से उद्धृत

चाहे कार्य-व्यवस्था की कोई भी श्रेणी हो, अगर अगुआ या कार्यकर्ता द्वारा उसे संप्रेषित किया जाना है, तो अन्य किसी भी चीज से पहले—और अपनी ओर से कोई नमक-मिर्च मिलाए बिना कार्य-व्यवस्थाओं को सटीकता से और सही ढंग से समझ लेने के बाद—अगुआ या कार्यकर्ता को स्थानीय परिवेश के आधार पर उन कार्य-व्यवस्थाओं को अपने नीचे के लोगों को बिना रुके या बिना देरी किए संप्रेषित करने का तरीका ढूँढ़ना चाहिए। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि कार्य-व्यवस्थाओं को किन्हें सूचित किया जाता है, तो अगर परमेश्वर का घर कहता है कि उन्हें विभिन्न स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं तक बढ़ाया जाना चाहिए, जिनमें कलीसिया-अगुआ, कलीसिया-उपयाजक और कलीसिया-उपदेशक के स्तर के लोग शामिल हैं, तो उन्हें इसी स्तर तक संप्रेषित किया जाना चाहिए, आगे नहीं। अगर संप्रेषण हर भाई-बहन तक किया जाना है, तो एकदम परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य-व्यवस्थाओं को हर भाई-बहन तक पहुँचाया जाना चाहिए। अगर, परिवेश के कारण, कार्य-व्यवस्थाओं को पाठ के रूप में संप्रेषित करना असुविधाजनक हो—अगर उसमें जोखिम और बहुत परेशानी हो—तो कार्य-व्यवस्थाओं की मुख्य, महत्वपूर्ण सामग्री प्रत्येक व्यक्ति को मौखिक रूप में सटीक ढंग से बताई जानी चाहिए। और "संप्रेषित" माने जाने हेतु उनके लिए क्या किया जाना चाहिए? अगर वे पाठ के रूप में संप्रेषित की जाती हैं, तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उन सबके पास उनकी एक प्रति हो, वे सब कार्य-व्यवस्थाओं से अवगत हों और उन्हें गंभीरता से लेते हों। अगर कार्य-व्यवस्थाएँ मौखिक रूप से बताई जाती हैं, तो प्राप्तकर्ता से बार-बार पूछा जाना चाहिए कि क्या वे उन्हें स्पष्ट हैं, और क्या वे उन्हें याद कर सकते हैं। यहाँ तक कि तुम उस व्यक्ति से उन्हें अपने आगे दोहराने के लिए भी कह सकते हो; अगर वे दोहरा सकते हैं, और स्पष्ट रूप से दोहरा सकते हैं, और जानते हैं कि परमेश्वर के घर की अपेक्षाएँ, सिद्धांत और विशिष्ट सामग्री क्या हैं, तो यह साबित करता है कि कार्य-व्यवस्थाएँ उनके मस्तिष्क में हैं, कि वे उन्हें याद हैं, और वे उन्हें स्पष्ट रूप से समझते हैं। केवल तभी उन लोगों को कार्य-व्यवस्थाएँ वास्तव में संप्रेषित की गई होंगी। अगर लिखित संप्रेषण के लिए परिस्थितियाँ और परिवेश जैसे कारक उचित और उपयुक्त हैं, तो संप्रेषण लिखित होना चाहिए; अगर परिवेशगत कारक लिखित संप्रेषण की अनुमति नहीं देते, और मौखिक संप्रेषण अपेक्षित है, तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मौखिक संप्रेषण करने वाले व्यक्ति द्वारा बताई जाने वाली सामग्री कार्य-व्यवस्थाओं के बिल्कुल समान हो, उसमें कोई विचलन न हो, या उसमें उनकी व्यक्तिगत व्याख्या न हो, बल्कि वह मूल पाठ की पुन: प्रस्तुति हो—उस स्थिति में कार्य-व्यवस्थाएँ सही रूप में संप्रेषित की गई होंगी। संप्रेषण पूरी तरह से कार्य-व्यवस्थाओं में जो भी विशेष रूप से उल्लिखित है, उसी अनुसार होना चाहिए, न कि उनकी व्यक्तिगत व्याख्याओं और कल्पनाओं पर आधारित अतिशयोक्तियाँ और आधारहीन अटकलें, यहाँ तक कि उनमें परिवर्धन और संशोधन भी शामिल नहीं होने चाहिए। जब "सटीक संप्रेषण" की बात आती है, तो लोगों को यह समझना चाहिए कि कार्य-व्यवस्थाएँ संप्रेषित करने की अपेक्षाएँ कितनी कठोर हैं। कुछ लोग पूछते हैं, "क्या संप्रेषण दोषहीन होना चाहिए?" उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। रोबोट को दोषहीन होना चाहिए; लोगों के लिए सटीक संप्रेषण हासिल करने में सक्षम होना ही काफी कारगर है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के लिए अपेक्षित है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग परमेश्वर को जानने से संबंधित परमेश्वर के वचनों को खाएँ और पिएँ। कुछ लोग पूछते हैं, "अगर परमेश्वर को जानने से संबंधित वचनों में यह शामिल हो कि देहधारण और नबियों व आध्यात्मिक लोगों के बीच अंतर कैसे करें, तो क्या मैं उन्हें पढ़ सकता हूँ?" संप्रेषण करने वाला व्यक्ति कहता है, "कार्य-व्यवस्थाएँ कहती हैं कि तुम्हें उन्हें पढ़ने की अनुमति नहीं है, कि तुम्हें ऐसे सभी वचनों को अनदेखा करना चाहिए जिनमें ऐसी सामग्री शामिल हो, और उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए।" क्या कार्य-व्यवस्थाओं ने यही कहा है? कार्य-व्यवस्थाओं ने इस बारे में कुछ नहीं कहा, इसलिए केवल वह बताएँ जो कार्य-व्यवस्थाओं ने कहा है, उसे ही आगे बढ़ाएँ; उसमें अपना व्यक्तिगत अर्थ या व्याख्या न जोड़ें। कार्य-व्यवस्थाएँ लोगों को केवल एक दायरा देती है; लोग अन्य, संबंधित पाठ पढ़ सकते हैं, लेकिन अगर वे उनकी गलत व्याख्या करते हैं, और अपनी धारणाएँ और व्याख्याएँ उन पर लादते हैं, और फालतू चीजों का संप्रेषण करते हैं, तो क्या वे भटक गए हैं? यह सटीक संप्रेषण नहीं है; यह नमक-मिर्च जोड़ना, और अनर्गल बोलना है। पहले और सर्वोपरि, व्यक्तिगत कार्य-व्यवस्थाएँ सही ढंग से संप्रेषित की जानी चाहिए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं से नीचे के अगुआओं और कार्यकर्ताओं तक पहुँचाई जानी चाहिए, जब तक कि वे हर भाई-बहन तक नहीं पहुँच जातीं—"संप्रेषण" का यही अर्थ है। संप्रेषण परमेश्वर के घर के द्वारा अपेक्षित पद्धति और दायरे के अनुसार होता है। बेशक, संप्रेषित की जाने वाली सामग्री सटीक और त्रुटिहीन होनी चाहिए; उनके आधिकारिक कार्य-व्यवस्थाओं के रूप में आगे बढ़ाए जाने से पहले गलत व्याख्याएँ पेश नहीं की जानी चाहिए—वह सही नहीं होगा, और वह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की ओर से कर्तव्य का परित्याग होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (9)' से उद्धृत

कोई कार्य-व्यवस्था प्राप्त करने के बाद, अंतिम लक्ष्य केवल उसे आगे बढ़ाने और दूसरों को भेजने की सीमा तक कार्यान्वित करना नहीं है; सैद्धांतिक कार्यान्वयन वास्तविक कार्यान्वयन के समान नहीं होता, और इसे कार्य-व्यवस्था का सही निष्पादन नहीं माना जा सकता; यह केवल सैद्धांतिक रूप से लोगों को सूचित करना, उनमें से ज्यादातर को इस कार्य के प्रति अवगत कराता है। यह अपनी जिम्मेदारी पूरी करना नहीं माना जाता, न ही यह अंततः परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक है। कार्य-व्यवस्था को आगे बढ़ाना और दूसरों को भेजना लक्ष्य नहीं है; लक्ष्य उसे कार्यान्वित करना है। तो, विशेष रूप से, उसे कैसे कार्यान्वित किया जाना चाहिए? अगुआओं और कार्यकर्ताओं को विभिन्न स्तरों के संबंधित भाई-बहनों और अन्य अगुआओं और कार्यकर्ताओं को इस बात की संगति करने के लिए एक-साथ बुलाना चाहिए कि यह काम कैसे किया जाना है, और साथ ही इस काम को करने के लिए मुख्य निरीक्षकों और मुख्य सदस्यों का चयन भी करना चाहिए। अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा इस काम के कार्यान्वयन के कार्य का पहला क्रम है संगति करना—इस बारे में संगति करना कि सिद्धांत और परमेश्वर के घर की इस कार्य-व्यवस्था के अनुसार और उस रूप में कैसे कार्य करना है, जो परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्था को कार्यान्वित और निष्पादित करे। संगति के समय ही भाइयों, बहनों, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को अंतत: सबसे उपयुक्त और सिद्धांत के सबसे अनुरूप समाधान चुनने से पहले विभिन्न समाधान प्रस्तावित करने चाहिए, सिद्धांतों के सबसे अनुरूप तरीके और कदम चुनने चाहिए, और यह कि पहले क्या करना है, उसके बाद क्या करना है, ताकि काम व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़े। यह पर्याप्त नहीं है कि सिद्धांत समझने के बाद, लोगों को समस्याएँ नहीं होतीं, वे चीजों की कल्पना करना बंद कर देते हैं, वे कार्य का विरोध करना बंद कर देते हैं, और परमेश्वर के घर की इस कार्य-व्यवस्था का महत्व और उद्देश्य समझने में सक्षम हो जाते हैं। इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि कौन इस काम के लिए सबसे उपयुक्त और कुशल है, कौन इसकी जिम्मेदारी उठा सकता है, किसमें इसे पूरा करने की क्षमता है; इस कार्य को करने के लिए कोई व्यक्ति चुना जाना चाहिए, और योजनाओं को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए, समय-सारणी तय की जानी चाहिए, और पूर्णता के लिए अपेक्षित आँकड़े और सामग्री पूरी तरह से तैयार और स्पष्ट की जानी चाहिए—केवल तभी कार्य कार्यान्वित किया जा रहा होता है। बेशक, कार्यान्वयन से पहले परियोजना के निरीक्षक के साथ विस्तृत, आमने-सामने की चर्चा भी होनी चाहिए, जिसमें उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने पहले ऐसा काम किया है, और इस पर उनके क्या विचार हैं, उन्हें अपने विचारों के बारे में बात करने देनी चाहिए। वे कह सकते हैं, "मेरा विचार है कि पहले यह करें, फिर वह। मुझे अपने साथ काम करने के लिए उस-उस व्यक्ति की आवश्यकता है—जहाँ तक मैं इसे समझता हूँ, उन्होंने यह काम पहले किया है, उन्हें इसका कुछ अनुभव है—इसलिए मैं चाहता हूँ कि उन्हें मेरे साथ काम करने के लिए यहाँ स्थानांतरित कर दिया जाए, क्या तुम्हें यह ठीक लगता है? इस कार्य के लिए कई उपकरणों की भी आवश्यकता है, उन्हें कैसे खरीदा जा सकता है? कौन जानता है कि उपकरण कैसे चुनने हैं? क्या हम ठगे जाएँगे? हममें से कोई भी इसका विशेषज्ञ नहीं है, और आज की दुनिया में हर उद्योग में काफी संख्या में धोखेबाज मौजूद हैं—इसलिए हमें उनके चयन में मदद करने के लिए कोई पेशेवर व्यक्ति रखना चाहिए।" कार्यान्वयन की प्रक्रिया के दौरान क्या इसी प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, और इसी तरह की सामग्री पर संगति दी जानी चाहिए? इतना ही नहीं, जब परमेश्वर का घर इस कार्य को किए जाने की अपेक्षा करता है, तो क्या व्यक्ति को यह पता लगाना चाहिए कि उसे उस तरह से कैसे किया जाए, जिससे सिद्धांत का उल्लंघन न हो? जिन विषयों पर अगुआओं, कार्यकर्ताओं और संबंधित निरीक्षकों द्वारा संगति की जानी चाहिए, उनमें यह भी शामिल है कि क्या परियोजना के लिए कोई समय-सीमा है, उसे पूरा करने में कितना समय लगना चाहिए, क्या विशेषज्ञ कार्यों के लिए कोई विशिष्ट नियम हैं, इत्यादि। "कार्यान्वयन" बोले गए सिद्धांत से कहीं अधिक होता है; उसमें संबंधित कार्य की प्रगति, और अनुवर्ती कार्य में शामिल कुछ प्रश्न और समस्याएँ शामिल होती हैं। कार्य-व्यवस्थाएँ कार्यान्वित करते समय अगुआओं, कार्यकर्ताओं और निरीक्षकों द्वारा इन सभी पर विचार किया जाना चाहिए। अर्थात्, कोई वास्तविक कार्य करने से पहले इसी तरह की संगति, विश्लेषण और चर्चा की जानी चाहिए; कार्यान्वयन का यही तात्पर्य है। इस तरह का कार्यान्वयन उस दृष्टिकोण का एक पहलू है, जिसे विशिष्ट परियोजनाओं में शामिल अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदर्शित किया जाना चाहिए। क्या अगुआओं और कार्यकर्ताओं को यही करना चाहिए? और क्या ऐसा करने का मतलब यह है कि वे भाग ले रहे हैं? अगर अगुआ कहता है, "मैं भी नहीं जानता कि यह काम कैसे करना है। बहरहाल, यह तुम्हें सौंप दिया गया है, कार्य-व्यवस्थाएँ तुम्हें बता दी गई और जारी कर दी गई हैं, मैंने तुम्हें संबंधित मामले बता दिए हैं। तुम जानते हो या नहीं कि इसे कैसे करना है, तुम इसे करते हो या नहीं करते, करते हो तो कैसे करते हो, अच्छी तरह से करते हो या नहीं, इसमें तुम्हें कितना समय लगता है—यह सब तुम पर है, मेरे पास दौड़ते हुए मत आना, इसका मुझसे कुछ लेना-देना नहीं; इतना कर देना मेरे द्वारा अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के समान है।" क्या अगुआओं और कार्यकर्ताओं को ऐसी बात कहनी चाहिए? (नहीं।) अगर कोई अगुआ ऐसा कहता है, तो वह किस तरह का व्यक्ति है? वह नकली अगुआ है। नई कार्य-व्यवस्थाएँ या कोई बड़ा मामला आने पर वह कहता है : "इसे तुम करो, मुझे नहीं पता कि इसे कैसे करना है। वैसे भी, तुम सब-कुछ समझते हो, तुम एक पेशेवर हो—मैं सिर्फ एक आम आदमी हूँ।" यह है नकली अगुआओं का पसंदीदा कथन; वे कोई बहाना ढूँढ़ते हैं, फिर खिसक लेते हैं।

सच्चे अगुआ, ऐसे अगुआ जो अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में सक्षम होते हैं, जब किसी कार्य को उच्च स्तर की विशिष्टता और बारीकियों से कार्यान्वित करते हैं, तो वे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर रहे होते हैं। परमेश्वर के घर की वर्तमान कार्य-व्यवस्थाओं को इस मुकाम तक कार्यान्वित करने के बाद, वे निरीक्षण करना जारी रखते हैं और इस बात पर नजर रखते हैं कि कार्यान्वयन कैसे हो रहा है—साथ ही, अप्रत्याशित परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर नदारद हो जाने या हाथ खड़े कर लेने के बजाय वे उसे ठीक करने के उपाय और समाधान करने में सक्षम होते हैं—"सक्रिय भागीदारी" वाले कार्यान्वयन का यही अर्थ है। जब कोई प्रमुख कार्य-व्यवस्था जारी की जाए, तो अगुआओं और कार्यकर्ताओं को उसे उस समय के सबसे महत्वपूर्ण कार्य के रूप में लेना चाहिए, उसमें शामिल होना चाहिए और उस पर नजर रखनी चाहिए, संबंधित कार्य-व्यवस्था के कार्य के दायरे में "सक्रिय भागीदारी" दिखानी चाहिए, साथ ही अन्य कार्य-परियोजनाओं पर भी नजर रखनी चाहिए, उनके बारे में भी पूछताछ करते रहना चाहिए, उन पर भी नजर रखनी चाहिए, उनकी भी निगरानी करनी चाहिए; यह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है। अगर तुम्हें इस बात का डर हो कि तुम इस कार्य को ठीक से कार्यान्वित करने में विफल हो जाओगे, कि तुम अनुवर्ती कार्य करने में चूक जाओगे, कि तुम अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ पूरी करने में विफल रहोगे, तो तुम्हें उसके लिए पूरी जान लड़ा देनी चाहिए। चूँकि परमेश्वर के घर ने बार-बार जोर दिया है कि यह काम अच्छी तरह से किया जाना चाहिए, और अगर यह अच्छी तरह से न किया गया तो अगुआ और कार्यकर्ता अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करेंगे और बदले जाने के जोखिम में होंगे, इसलिए तुम्हें इस कार्य के कार्यान्वयन में अपना सारा समय और श्रम झोंक देना चाहिए। अगर दूसरा कार्य व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ रहा हो, तो इसे किसी अन्य, उपयुक्त व्यक्ति के प्रबंधन में सौंपा जा सकता है, और समय मिलने पर तुम्हारा किसी विशेष मुद्दे के बारे में पूछताछ और मदद करना पर्याप्त है। क्या तुम लोग इस तरह काम कर सकते हो?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (9)' से उद्धृत

चीजों पर नजर रखना अपने आप में एक कार्य है। कार्य-व्यवस्थाएँ कितनी अच्छी तरह से कार्यान्वित की जा रही हैं, इस पर नजर रखने के अलावा यह देखना भी जरूरी है कि अगुआ और कार्यकर्ता कड़ाई से कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार ही कार्य कर रहे हैं या नहीं। ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता भी हैं, जो कार्य-व्यवस्थाएँ प्राप्त करने के बाद तुम्हारे साथ आमने-सामने बात करते हुए सभी सही बातें कहते हैं : "हमने पहले ही तय कर लिया है कि कौन क्या करेगा, कौन किसके लिए जिम्मेदार होगा।" लेकिन अपने घर लौटने के बाद वे नजरों से ओझल हो जाते हैं; गिरफ्तार होने के डर से छिप जाते हैं, और लंबे समय तक उन भाई-बहनों से कोई संपर्क नहीं रखते, जिन्हें नहीं पता कि कार्य-व्यवस्थाएँ है भी या नहीं, या वे कार्यान्वित की जा रही हैं या नहीं; इन अगुआओं और कार्यकर्ताओं में कार्य-व्यवस्थाओं की अपेक्षाओं के प्रति अत्यावश्यकता की कोई भावना नहीं होती, और वे उन्हें कार्यान्वित करने के लिए कुछ नहीं करते। इसी प्रकार, ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता भी हैं, जो कार्य-व्यवस्थाओं की कुछ अपेक्षाओं के प्रति कुछ राय रखते हैं, उनके प्रतिरोधी हैं, और धारणाएँ रखते हैं—और जो, अपने घर लौटने के बाद, उनका कार्यान्वयन अलग तरह से करते हैं, जो उन्हें उस रूप में कार्यान्वित नहीं करते जैसा मूल रूप से किया जाना था, बल्कि अपनी ही पसंद के अनुसार, उन्हें एक सरल रूप में परिवर्तित करके या अपना अलग रास्ता अपनाकर, जैसे चाहे वैसे करते हैं, इत्यादि। वरिष्ठ अगुआओं और कार्यकर्ताओं को इस सब पर नजर रखने की जरूरत है। चीजों पर नजर रखने का उद्देश्य कार्य-व्यवस्थाओं द्वारा अपेक्षित हर चीज को सिद्धांत के अनुसार और बिना विचलन के बेहतर ढंग से निष्पादित करना है। चीजों पर नजर रखते समय अगर ऐसे लोग मिलते हैं, जो कार्य नहीं कर रहे, जो जिम्मेदारी नहीं लेते, जो कार्य-व्यवस्थाओं को बहुत धीमी गति से कार्यान्वित करते हैं, जो कार्य-व्यवस्थाओं के विरोधी हैं, उनके कार्यान्वयन का प्रतिरोध करते हैं और उसमें मीन-मेख निकालते हैं, या कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार कार्य नहीं करते, और अपना ही कार्य करते हैं, और अगर ऐसे लोग हैं जो वास्तविक तथ्यों को छिपाने और भाई-बहनों को धोखा देने की सीमा तक जाते हैं, उन्हें विशिष्ट अपेक्षाओं, संबंधित मुद्दों, और व्यवस्थाओं के पीछे की मंशा से अनभिज्ञ रखते हैं, और केवल शब्द हस्तांतरित करते हैं, या भाई-बहनों को अपनी मनमर्जी से सूचित करते हैं, इत्यादि—तो वरिष्ठ अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा इन समस्याओं को सँभाला और हल किया जाना चाहिए। अगर अगुआ और कार्यकर्ता चीजों पर नजर नहीं रखते, और केवल ऊपर से संवाद और मार्गदर्शन करते हैं, तो इन समस्याओं की पहचान नहीं की जा सकती। और इसलिए, कार्य-व्यवस्थाओं को कार्यान्वित करते समय, और मार्गदर्शन प्रदान करने के बाद, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को प्रत्येक स्तर पर उन्हें संप्रेषित करने के अलावा, हर स्तर पर कार्य की निगरानी भी करनी चाहिए। क्षेत्रीय अगुआओं को जिला अगुआओं के कार्य की निगरानी करनी चाहिए; जिला अगुआओं को प्रत्येक कलीसिया के अगुआओं के कार्य की निगरानी करनी चाहिए; और प्रत्येक कलीसिया के अगुआओं को टीमों के कार्य की निगरानी करनी चाहिए। इस निगरानी का क्या उद्देश्य है? यह उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार कार्य-व्यवस्थाओं को सटीक ढंग से कार्यान्वित करने का बेहतर कार्य करने के लिए है। इस प्रकार, चीजों पर नजर रखने का कार्य बहुत महत्वपूर्ण है। निगरानी करते समय, और अगर माहौल अनुमति दे तो, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को जमीन पर क्या हो रहा है, इसकी गहराई में जाना चाहिए, अलग-अलग लोगों से प्रश्न करने चाहिए, निरीक्षण करना चाहिए, पूछताछ करनी चाहिए, और अधिक जानने की कोशिश करनी चाहिए, और कार्य किस तरह कार्यान्वित किया जा रहा है, इससे खुद को अवगत कराना चाहिए; साथ ही, उन्हें इस कार्य को करने के संबंध में भाई-बहनों की कठिनाइयों और विचारों के बारे में और अधिक जानने का प्रयास भी करना चाहिए, क्या उन्होंने कोई ज्ञान प्राप्त किया है, क्या उन्हें इस कार्य के सिद्धांतों की समझ है—यह सब वह विशिष्ट कार्य है, जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाना चाहिए। कलीसिया के जो अगुआ अपेक्षाकृत खराब क्षमता वाले हैं, जिन्हें अपना कार्य करते समय जिम्मेदारी का ज्यादा एहसास नहीं होता, जो अपेक्षाकृत खराब मानवता के हैं, और जिनमें प्रतिबद्धता की कमी है, और जो अपेक्षाकृत आलसी हैं, उनके मामले में निरीक्षण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। और यह निरीक्षण कैसे किया जाता है? "जल्दी करो! उच्च हमारे द्वारा इस कार्य को पूरा किए जाने की प्रतीक्षा कर रहा है, इस कार्य की एक समय-सीमा है, हम देरी नहीं कर सकते।" क्या यही निरीक्षण का सही तरीका है? क्या यह सिर्फ लोगों से जल्दी करने के लिए कहने का मामला है? लोगों का निरीक्षण करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? जब तुम उन लोगों को देखते हो जो संघर्ष कर रहे हैं, तो तुम उन्हें विशिष्ट मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करो, तुम उन्हें प्रशिक्षण दो; जब तुम उन लोगों को देखते हैं जो आलसी हो रहे हैं, तो तुम उनसे निपटो और उनकी काट-छाँट करो। अगर वे कुछ कर सकते हैं लेकिन बहुत आलसी हैं, अगर वे अपने कार्य में सुस्ती बरतते हैं और हीला-हवाला करते हैं, और दैहिक सुखों की लालसा करते हैं, तो जब ऐसी स्थितियाँ आएँ जहाँ उनसे निपटने की जरूरत हो, तो उनसे निपटा जाना चाहिए। और अगर उनसे निपटे जाने के बाद भी समस्या का समाधान न हो और उनके रवैये में कोई बदलाव न आए, तो क्या? पहले उन्हें चेतावनी दो : "यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण है। अगर तुम इसे फिर से इसी तरह के रवैये के साथ लोगे, तो तुम्हें तुम्हारे कर्तव्य से मुक्त कर दिया जाएगा और तुम्हारे स्थान पर किसी और को रख लिया जाएगा। अगर तुम इसे नहीं करना चाहते, तो कोई और करेगा। अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारी कोई प्रतिबद्धता नहीं है, तुम यह कार्य करने के योग्य नहीं हो। अगर तुम कार्य के लिए उपयुक्त नहीं हो, अगर तुम्हारा देह इस कठिनाई को सहन नहीं कर सकता, तो परमेश्वर का घर तुम्हारे बदले किसी और को रख सकता है, या तुम अपना इस्तीफा दे सकते हो। अगर तुम इस्तीफा नहीं देते, और अभी भी यह कार्य करना चाहते हो, तो बेहतर कार्य करो, इसे परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं और सिद्धांतों के अनुसार करो। और अगर यह तुम्हारे वश के बाहर है, और तुम हीला-हवाला करते रहते हो—जो कार्य की प्रगति को प्रभावित करता है और कार्य को नुकसान पहुँचाता हैं—तो परमेश्वर के घर को तुम्हें अनुशासित करना होगा, और तुम्हें जाना पड़ेगा।" अगर चेतावनी दिए जाने के बाद वे पश्चात्ताप करने को तैयार हों, तो वे रह सकते हैं। लेकिन अगर बार-बार चेतावनी दिए जाने के बाद भी उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं आता, और वे बिलकुल भी पश्चात्ताप नहीं करते, और वैसे ही रहते हैं, तो क्या समस्या का जवाब उन्हें बरखास्त करना नहीं है? ऐसा नहीं होना चाहिए कि अगर किसी की कोई छोटी-सी गलती या समस्या हो, तो भी तुम उस पर टूट पड़ो और जाने न दो; उन्हें एक मौका दो, और अगर वे बदल जाएँ, और पश्चात्ताप करने को तैयार हों, और पहले की तुलना में कहीं बेहतर हों, तो उन्हें रहने दो। अगर तुम उन्हें बार-बार मौका देते रहते हो और उनके साथ संगति करते रहते हो, और उनसे निपटना और उनकी काट-छाँट करना काम नहीं आता, और चेतावनियाँ काम नहीं करतीं, और उनकी मदद करने की कोई कोशिश सफल नहीं होती, तो यह कोई साधारण समस्या नहीं है; इन व्यक्तियों की मानवता बहुत खराब है, वे सत्य बिलकुल भी स्वीकार नहीं करते, और इसलिए वे यह कर्तव्य निभाने में सक्षम नहीं हैं। उन्हें विदा करो—वे कर्तव्य-पालन के योग्य नहीं हैं। ऐसे मामले इसी तरह सुलझाए जाते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (10)' से उद्धृत

निरीक्षण के कार्य के ठीक बाद जाँच का कार्य आता है। आम तौर पर, जाँच के कार्य का उद्देश्य यह जानना होता है कि कार्य की किसी मद विशेष की व्यवस्था प्रभावी रही है या नहीं, और कार्य की व्यवस्था किए जाने के बाद, अनुवर्ती कार्य कहाँ तक ले जाया गया है, क्या वह पूरा हुआ है, और कितनी अच्छी तरह से—कितनी सफलता और कुशलता से—वह पूरा किया गया है, कार्य में शामिल लोगों ने उसे किस हद तक अंजाम दिया, किन्हीं विशिष्ट समस्याओं का पता लगाया गया या नहीं, क्या कोई कठिनाइयाँ थीं, क्या उसे सिद्धांत के अनुसार किया गया, इत्यादि। उस कार्य की जाँच करना, जिसे तुमने पहले व्यवस्थित किया है, एक विशिष्ट और आवश्यक कार्य है। कुछ अगुआ और कार्यकर्ता अकसर निम्नलिखित गलती करते हैं : वे सोचते हैं कि जब उन्होंने कार्य को व्यवस्थित कर लिया, तो बस हो गया; वे सोचते हैं, "मैंने अपना मिशन पूरा कर लिया है और अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है; कुछ भी हो, मैंने तुम लोगों को बता दिया कि इसे कैसे करना है, तुम लोग अब इसके बारे में जानते हो, और तुमने इसे करने का वादा किया है, इसलिए बाद में जो होगा, उसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं, जब तुम लोग इसे पूरा कर लो तो आकर मुझे बता देना।" कार्य की व्यवस्था करने के बाद वे छिप जाते हैं। वे कार्य की प्रगति या नवीनतम गतिविधियों की जाँच नहीं करते, न ही इस बात की जाँच करते हैं कि उन्होंने उस कार्य को करने के लिए जिन्हें लगाया है, वे उचित और उपयुक्त हैं या नहीं, या अधिकतर लोग कार्य को किस तरह से ले रहे हैं; न ही वे इस बात की जाँच करते हैं कि क्या उस कार्य के कार्यान्वयन की उनकी योजनाओं को अच्छा फीडबैक मिला है, और क्या वे उपयुक्त हैं, उनमें कोई गलती तो नहीं, या कोई ऐसी जगह तो नहीं जिसकी उन्होंने गलत व्याख्या की हो या जो उच्च की कार्य-व्यवस्थाओं के विपरीत हो। वे इनमें से किसी पर ध्यान नहीं देते, बल्कि सोचते हैं कि व्यवस्था करने के बाद और कुछ नहीं करना है। यह विशिष्ट कार्य न करना है। तो जाँच-कार्य के दौरान क्या जाँच की जाती है? मुख्य महत्व कार्य-व्यवस्थाओं के साथ तुलना करना है : देखो कि क्या कार्य कार्य-व्यवस्थाओं के साथ सुसंगत है, कहीं यह कार्य-व्यवस्थाओं के सिद्धांत पार तो नहीं कर गया, कहीं इसने कार्य-व्यवस्थाओं की अपेक्षाओं का उल्लंघन तो नहीं किया—और यह भी कि जब कार्य किया जा रहा था, तो क्या कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने उसमें गड़बड़ी की हो या उसे बाधित किया हो, या समस्या खड़ी की हो, या बड़ी-बड़ी बातें की हों। स्वाभाविक रूप से, यह कार्य करने के साथ-साथ अगुआ और कार्यकर्ता यह जाँच भी करते हैं कि इन कार्य-व्यवस्थाओं को कार्यान्वित करने में कोई चूक तो नहीं हुई; दूसरे लोगों के कार्य की जाँच करने के साथ-साथ वे अपने कार्य की भी जाँच करते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (10)' से उद्धृत

किसी भी कार्य-व्यवस्था के लिए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बीच-बीच में उसका प्रार्थना-पाठ करना चाहिए, और फिर जाँच करनी चाहिए कि क्या वे इस अवधि के दौरान किसी कार्य को ठीक से व्यवस्थित करने में विफल तो नहीं रहे, या उन्होंने कार्य-व्यवस्थाओं द्वारा अपेक्षित किसी चीज की अनदेखी तो नहीं की—उस हालत में उन्हें जल्दी से संशोधन और हस्तक्षेप करना चाहिए। अगर अन्य कार्य करने के कारण तुम्हारे पास समय न हो, तो तुम इसे अन्य लोगों को सौंप सकते हो, और फिर अनुवर्ती कार्रवाई करना, उसमें शामिल होना और उसकी जाँच करना जारी रख सकते हो; केवल पीछे खड़े रहकर और बगल से देखते हुए उससे संबंधित रिपोर्टें न सुनो। अगर तुम किसी भी कार्य के प्रभारी हो, तो चाहे तुम कितनी भी परियोजनाओं के लिए जिम्मेदार हो, यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तुम लगातार इसमें शामिल रहो और प्रश्न पूछो, और साथ ही चीजों की जाँच भी करो। यह तुम्हारा कार्य है। और इसलिए, चाहे तुम कोई क्षेत्रीय अगुआ हो या जिला अगुआ, कलीसिया अगुआ या कोई टीम अगुआ या निरीक्षक, अपनी जिम्मेदारियों के दायरे का पता लगा लेने के बाद तुम्हें बार-बार जाँच करनी चाहिए कि क्या तुम इस कार्य में अपनी भूमिका निभा रहे हो, क्या तुमने वे जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं जो एक अगुआ या कार्यकर्ता को पूरी करनी चाहिए, तुमने कौन-सा कार्य नहीं किया है, कौन-सा कार्य तुम नहीं करना चाहते, कौन-सा कार्य निष्फल रहा है, और तुम किस कार्य के सिद्धांतों को समझने में असफल रहे हो। ये सभी वे चीजें हैं, जिन पर तुम्हें अकसर विचार करना चाहिए। साथ ही, तुम्हें अन्य लोगों के साथ संगति करना और उनसे प्रश्न पूछना, और परमेश्वर के वचनों और कार्य-व्यवस्थाओं में कार्यान्वयन के लिए एक योजना और सिद्धांतों की पहचान करना सीखना चाहिए। कोई भी कार्य-व्यवस्था, चाहे वह प्रशासन से संबंधित हो या मानव संसाधन से, या कलीसिया के जीवन से या किसी प्रकार के विशेष कार्य से, अगर वह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों को छूती है, अगर वह ऐसी जिम्मेदारी है जिसे तुम्हें पूरा करना है और जो तुम्हारी जिम्मेदारियों के दायरे में आती है, तो तुम्हें उस पर ध्यान देना चाहिए। स्वाभाविक रूप से, कार्य को प्राथमिकता अनुसार व्यवस्थित भी करना चाहिए, ताकि कोई परियोजना पीछे न रह जाए। अगर तुम कहते हो, "मेरे पास तीन सिर और छह भुजाएँ नहीं हैं, मैं कार्य-व्यवस्थाओं में शामिल सभी परियोजनाओं का प्रबंधन नहीं कर सकता"—कुछ ऐसे कार्य होंगे जिनमें तुम व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो सकते—क्या तुमने उन्हें करने के लिए किसी और की व्यवस्था की है? उस व्यक्ति के कार्य समाप्त कर लेने के बाद क्या तुमने प्रश्नों के साथ अनुवर्ती कार्रवाई की या यह देखने में सहायता की कि चीजें मानक के अनुरूप हैं या नहीं? निश्चित रूप से तुम्हारे पास कुछ प्रश्न पूछने और यह देखने का समय था कि चीजें मानक के अनुरूप हैं या नहीं? कुछ अगुआ और कार्यकर्ता कहते हैं, "मैं एक समय में केवल एक ही कार्य कर सकता हूँ। अगर तुम मुझसे यह जाँचने के लिए कहते हो कि कोई परियोजना मानक के अनुरूप है या नहीं, तो मैं केवल एक परियोजना में ही ऐसा कर सकता हूँ; इससे ज्यादा में समस्या होगी।" उस स्थिति में, तुम अगुआ या कार्यकर्ता बनने के योग्य नहीं हो, तुम कार्य करने के लिए उपयुक्त नहीं हो, और तुम्हारे पास कौशल नहीं हैं। तुम्हारे लिए बेहतर होगा कि तुम अपने लिए उपयुक्त कार्य ढूँढ़ो। अगर तुम्हारे पास अपेक्षित कौशल नहीं है, तो आगे बढ़ो और इस्तीफा दे दो, ताकि कोई ऐसा व्यक्ति ढूँढ़ा जा सके, जो यह कार्य कर सके। क्या यह उचित नहीं है? सब-कुछ खुद करने का प्रयास न करो : अंतत: तुम असफल होगे, और परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करोगे, और परमेश्वर के घर को नुकसान पहुँचाओगे—उस स्थिति में तुमने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की होगी। कोई आत्म-जागरूकता न होना, वास्तविक कार्य न करना, फिर भी सब-कुछ खुद करने की कोशिश करना, और हैसियत के लाभों को प्राथमिकता देना, तुम्हें एक प्रामाणिक नकली अगुआ बनाता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (10)' से उद्धृत

कुछ ऐसे लोग हैं जो सर्वोच्च सत्ता की कार्य व्यवस्थाओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में पूरी तरह से लापरवाह हैं। वे सोचते हैं, "सर्वोच्च सत्ता कार्य व्यवस्थाएं करती है और हम यहां नीचे पृथ्वी पर, अपना काम कर रहे हैं। जो कुछ कहा गया है और कुछ कार्य लचीले ढंग से कार्यान्वित किए जा सकते हैं—जब वे नीचे हमारे पास आते हैं, तो उनमें बदलाव किया जा सकता है। आखिरकार, सर्वोच्च सत्ता सिर्फ बात करती है, हम वे हैं जो वास्तव में कार्य कर रहे हैं। हम कलीसिया में स्थिति को समझते हैं पर सर्वोच्च सत्ता नहीं, इसलिए कलीसिया के लोग और काम जो हमें दिए गए हैं, वो जैसे हम उपयुक्त समझें, वैसे करने के लिए हैं। हम जैसे चाहे उसे कर सकते हैं और किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।" ऐसे लोगों के लिए, परमेश्वर की सेवा करने का सिद्धांत यह हैः "अगर मुझे लगता है कि कोई चीज़ ठीक है, तो मैं उस पर ध्यान दूँगा; अगर मुझे लगता है कि कोई चीज़ व्यावहारिक नहीं है, मैं उसे नज़रअंदाज़ कर दूँगा। अगर मैं चाहूँ तो तुम्हारा प्रतिरोध कर सकता हूँ या तुम्हारे विरुद्ध जा सकता हूँ, कोई भी ऐसी चीज़ जो मैं नहीं चाहता, उसे मुझे कार्यान्वित करना या अंजाम नहीं देना है। अगर तुम कुछ कहते हो, वह मुझे अनुपयुक्त लगे, मैं उसे तुम्हारे लिए संपादित कर दूँगा और उसे साफ करने के बाद तुम्हें सौंप दूँगा। जो कुछ भी मैंने अनुमोदित नहीं किया है, वह छपने के लिए नहीं जा सकता।" हर जगह, सर्वोच्च सत्ता की व्यवस्थाओं को वे उनके मूल रूप में प्रचारित करते हैं, लेकिन यह व्यक्ति उन कार्य व्यवस्थाओं के संपादित संस्करण को उन लोगों को भेजता है, जिसकी वे अगुआई करते हैं। ऐसा व्यक्ति हमेशा परमेश्वर को दूर रखना चाहता है और चाहता है कि हर कोई उनका अनुसरण और उन पर विश्वास करे। जिस तरह से वे देखते हैं, कुछ स्थानों में परमेश्वर उनके बराबर नहीं है—उन्हें भी परमेश्वर होना चाहिए और हर किसी को उन पर विश्वास करना चाहिए। वे जो करते हैं, उसका यही स्वरूप है। अगर तुम लोग इस बात को समझ गए हो, तो क्या तुम फिर भी रोओगे जब ऐसे व्यक्ति को हटाया जाएगा और उसके स्थान पर किसी और को लाया जाएगा? क्या तुम्हें फिर भी उनके प्रति सहानुभूति होगी? तुम क्या फिर भी सोचोगे, "सर्वोच्च सत्ता जो करता है वह अनावश्यक और अन्यायपूर्ण है—कैसे सर्वोच्च सत्ता किसी को निकाल सकता है जिसने इतनी यातना भोगी हो?" किसकी खातिर उन्होंने यातना भोगी? उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा की खातिर यातना भोगी है। क्या वे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं? क्या वे अपने कर्तव्य निभा रहे हैं? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और समर्पित हैं? वे कुछ नहीं, वरन शैतान के नौकर हैं और उनका कार्य शैतान का प्रभुत्व है; यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को नष्ट करता है और उसके कार्य को बाधित करता है। यह किस प्रकार का विश्वास है? वे शैतान और मसीह-विरोधी के सिवाय और कुछ नहीं हैं!

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर को नाराज़ करना क्‍या है?' से उद्धृत

हालांकि कुछ लोग 'ऊपरवाले' द्वारा की गई व्यवस्थाओं के कुछ हिस्सों को समझ नहीं पाते, फिर भी वे उनका पालन करने में सक्षम रहते हैं। वे कहते हैं, "परमेश्वर जो भी करता है ठीक करता है और उसके मायने होते हैं। भले ही हम इसे समझ नही पाएँ, फिर भी हम इसके सम्मुख समर्पण कर देते हैं। लेकिन हम परमेश्वर की आलोचना नहीं करते! अगर कोई बात हमें सही प्रतीत नहीं होती तो भी हम उस पर ध्यान देते हैं। हम मनुष्य हैं, हमारे पास मनुष्य का मस्तिष्क है—इसलिए हम क्या जानते हैं? तो हम सिर्फ अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की व्यवस्थाओं के आगे समर्पण करते हैं, जब तक कि वह दिन न आ जाए कि हम उन्हें समझ सकें। अगर वह दिन नहीं भी आता है, तो भी हम खुशी-खुशी समर्पण करेंगे। हम मनुष्य हैं और हमें परमेश्वर के आगे समर्पण करना चाहिए। हमसे यही करने की अपेक्षा की जाती है।" पर अन्य लोग ऐसे नहीं हैं। जब वे देखते हैं कि 'ऊपर' द्वारा क्या किया जा रहा है, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया इसकी छानबीन करने की होती है। वे कहते हैं, "परमेश्वर, हम पहले देखें कि तुम क्या कहते हो और क्या चाहते हो। पहली चीज तो ठीक है, पर दूसरी उतनी ठीक नहीं है। मैं इसे तुम्हारे लिए ठीक कर दूँगा।" जो व्यक्ति ऐसा कहता है क्या उसके दिल में परमेश्वर के लिए श्रद्धा और आदर की भावना हो सकती है? इससे तो ऐसा लगता है कि उनके मन में परमेश्वर के कार्य को लेकर कुछ धारणाएँ हैं, और इसलिए वे कलीसिया में उसकी व्यवस्थाओं का निर्वाह नहीं करते, बल्कि मनमाने तरीके से अपनी धारणाएँ दूसरे भाई-बहनों में फैलाते रहते हैं, ताकि वे भी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ पालने लग जाएँ। सबसे पहले तो ऐसा व्यक्ति सत्य प्रदान नहीं कर सकता; दूसरे, वे धारणाएँ फैलाते हैं; और तीसरे, वे दूसरों में भी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ पैदा होने का कारण बनते हैं, ताकि वे परमेश्वर के कार्य का विरोध कर सकें, और उससे कुछ अलग करवाने की कोशिश कर सकें, इस हद तक कि अंत में परमेश्वर उनकी बात मान ले। ऐसे लोग भी हैं जो इस तरह की चीजें इस उम्मीद में करते हैं कि वे लोगों की धारणाएँ दूर कर सकें, और परमेश्वर को निर्भर होने को विवश करके उससे अलग तरह से कार्य करवा सकें, ताकि वह लोगों को संतुष्ट कर सके। अगर ऐसे लोग इस तरह के काम करने के बाद पश्चाताप करें और आँसू बहाएँ तो क्या उन्हें परमेश्वर के प्रति श्रद्धालु हृदय वाला व्यक्ति माना जा सकता है? कुछ लोग परमेश्वर की सेवा में थोड़ा अति उत्साह और अज्ञान दिखाते हैं—उसके लिए तुम्हें क्षमा किया जा सकता है। लेकिन अगर तुम आगे भी ऐसे काम करते रहते हो, तो तुम जानते-बूझते हुए गलत काम करोगे, जो एक ज्यादा गंभीर और बड़ा पाप है और एक भयानक चीज है। अगर इन मामलों में तुम लोगों के विचार सरलीकरण के शिकार हैं, और तुम्हें लगता है कि यह कोई बड़ी बात नहीं है, तो तुम एक न एक दिन परमेश्वर को नाराज कर बैठोगे। मैंने ऐसे कुछ लोग देखे हैं; भले ही उन्हें निकाला न गया हो, पर उनका परिणाम पहले ही तय हो चुका था।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर को नाराज़ करना क्‍या है?' से उद्धृत

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