163. कार्य-व्यवस्थाओं के प्रति व्यवहार के सिद्धांत

(1) कार्य-व्यवस्थाएँ, उपदेश और सहभागिता पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए, उनका पालन करना चाहिए और उन्हें आचरण में लाना चाहिए;

(2) अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करने के लिए, कार्य- व्यवस्था के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना आवश्यक होता है। व्यक्ति को कभी भी अपनी इच्छानुसार, और अपने ही साधनों से, चीज़ों को नहीं करना चाहिए, जो मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलना है;

(3) कार्य-व्यवस्थाएँ, उपदेश और सहभागिता पवित्र आत्मा द्वारा प्रकाशित और प्रबुद्ध होती हैं। उन्हें मानवीय ज्ञान के रूप में गिना जाता है, उन्हें कभी भी परमेश्वर के वचनों का स्थान नहीं लेना चाहिए और न ही उन्हें परमेश्वर के वचनों के रूप में मानना चाहिए;

(4) पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने और कर्तव्य के प्रभावी निष्पादन को सुनिश्चित करने के लिए, बिना किसी उलट-फेर के, कार्य-व्यवस्थाओं, उपदेशों और सहभागिता को तेज़ी से और निर्णायक रूप से कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हो, या तुम जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हो और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम्हारे कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना तुम्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कुछ संपूर्ण नहीं कर पाओगे। कार्य करते समय पालन करने के दो मुख्य सिद्धांत यह हैं : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो तुम आसानी से गलतियाँ नहीं करोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

कलीसिया के कार्यों और मामलों में, परमेश्वर की आज्ञाकारिता के अलावा, उस व्यक्ति के निर्देशों का पालन करो, जिसे पवित्र आत्मा हर चीज़ में उपयोग करता है। ज़रा-सा भी उल्लंघन अस्वीकार्य है। अपने अनुपालन में एकदम सही रहो और सही या ग़लत का विश्लेषण न करो; क्या सही या ग़लत है, इससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं। तुम्हें ख़ुद केवल संपूर्ण आज्ञाकारिता की चिंता करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए' से उद्धृत

कुछ ऐसे लोग हैं जो सर्वोच्च सत्ता की कार्य व्यवस्थाओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में पूरी तरह से लापरवाह हैं। वे सोचते हैं, "सर्वोच्च सत्ता कार्य व्यवस्थाएं करती है और हम यहां नीचे पृथ्वी पर, अपना काम कर रहे हैं। जो कुछ कहा गया है और कुछ कार्य लचीले ढंग से कार्यान्वित किए जा सकते हैं—जब वे नीचे हमारे पास आते हैं, तो उनमें बदलाव किया जा सकता है। आखिरकार, सर्वोच्च सत्ता सिर्फ बात करती है, हम वे हैं जो वास्तव में कार्य कर रहे हैं। हम कलीसिया में स्थिति को समझते हैं पर सर्वोच्च सत्ता नहीं, इसलिए कलीसिया के लोग और काम जो हमें दिए गए हैं, वो जैसे हम उपयुक्त समझें, वैसे करने के लिए हैं। हम जैसे चाहे उसे कर सकते हैं और किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।" ऐसे लोगों के लिए, परमेश्वर की सेवा करने का सिद्धांत यह हैः "अगर मुझे लगता है कि कोई चीज़ ठीक है, तो मैं उस पर ध्यान दूँगा; अगर मुझे लगता है कि कोई चीज़ व्यावहारिक नहीं है, मैं उसे नज़रअंदाज़ कर दूँगा। अगर मैं चाहूँ तो तुम्हारा प्रतिरोध कर सकता हूँ या तुम्हारे विरुद्ध जा सकता हूँ, कोई भी ऐसी चीज़ जो मैं नहीं चाहता, उसे मुझे कार्यान्वित करना या अंजाम नहीं देना है। अगर तुम कुछ कहते हो, वह मुझे अनुपयुक्त लगे, मैं उसे तुम्हारे लिए संपादित कर दूँगा और उसे साफ करने के बाद तुम्हें सौंप दूँगा। जो कुछ भी मैंने अनुमोदित नहीं किया है, वह छपने के लिए नहीं जा सकता।" हर जगह, सर्वोच्च सत्ता की व्यवस्थाओं को वे उनके मूल रूप में प्रचारित करते हैं, लेकिन यह व्यक्ति उन कार्य व्यवस्थाओं के संपादित संस्करण को उन लोगों को भेजता है, जिसकी वे अगुआई करते हैं। ऐसा व्यक्ति हमेशा परमेश्वर को दूर रखना चाहता है और चाहता है कि हर कोई उनका अनुसरण और उन पर विश्वास करे। जिस तरह से वे देखते हैं, कुछ स्थानों में परमेश्वर उनके बराबर नहीं है—उन्हें भी परमेश्वर होना चाहिए और हर किसी को उन पर विश्वास करना चाहिए। वे जो करते हैं, उसका यही स्वरूप है। अगर तुम लोग इस बात को समझ गए हो, तो क्या तुम फिर भी रोओगे जब ऐसे व्यक्ति को हटाया जाएगा और उसके स्थान पर किसी और को लाया जाएगा? क्या तुम्हें फिर भी उनके प्रति सहानुभूति होगी? तुम क्या फिर भी सोचोगे, "सर्वोच्च सत्ता जो करता है वह अनावश्यक और अन्यायपूर्ण है—कैसे सर्वोच्च सत्ता किसी को निकाल सकता है जिसने इतनी यातना भोगी हो?" किसकी खातिर उन्होंने यातना भोगी? उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा की खातिर यातना भोगी है। क्या वे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं? क्या वे अपने कर्तव्य निभा रहे हैं? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और समर्पित हैं? वे कुछ नहीं, वरन शैतान के नौकर हैं और उनका कार्य शैतान का प्रभुत्व है; यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को नष्ट करता है और उसके कार्य को बाधित करता है। यह किस प्रकार का विश्वास है? वे शैतान और मसीह-विरोधी के सिवाय और कुछ नहीं हैं!

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर को नाराज़ करना क्‍या है?' से उद्धृत

हालांकि कुछ लोग 'ऊपर' द्वारा की गई व्यवस्थाओं के कुछ हिस्सों को समझ नहीं पाते, वे उनका पालन करने में सक्षम रहते हैं। वे कहते हैं, "परमेश्वर जो भी करता है ठीक करता है और उसका महत्व होता है। भले ही हम इसे समझ नही पाएँ, हम इसके सम्मुख समर्पण करते हैं। हम परमेश्वर पर कोई फैसला लेने का काम नहीं करेंगे। अगर कोई बात हमें सही प्रतीत नहीं होती तो भी हम इसका पालन करते हैं। हम मनुष्य हैं, हमारे पास मनुष्य का मस्तिष्क है—इसलिए हम क्या जानते हैं? तो हम सिर्फ अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की व्यवस्थाओं के आगे समर्पण करते हैं, जब तक कि वह दिन न आ जाए कि हम उन्हें समझ सकें। अगर वह दिन नहीं भी आता है, तो भी हम खुशी-खुशी समर्पण करेंगे। हम मनुष्य हैं और हमें परमेश्वर के आगे समर्पण करना चाहिए। हमसे यही करने की अपेक्षा की जाती है।" पर अन्य लोग ऐसे नहीं हैं। जब वे देखते हैं कि 'ऊपर' द्वारा क्या किया जा रहा है, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया इसकी छानबीन करने की होती है। वे कहते हैं, "परमेश्वर, हम पहले देखें कि तुम क्या कहते हो और क्या चाहते हो। पहली चीज ठीक है, पर दूसरी इतनी ठीक नहीं है। मैं इसे तुम्हारे लिए ठीक कर दूँगा।" जो व्यक्ति ऐसा कहता है क्या उसके दिल में परमेश्वर के लिए श्रद्धा और आदर की भावना हो सकती है? इससे तो ऐसा लगता है कि उनके मन में परमेश्वर के कार्य को लेकर कुछ धारणाएँ हैं, और इसलिए वे कलीसिया में उसकी व्यवस्थाओं का निर्वाह नहीं करते, बल्कि मनमाने तरीके से अपनी धारणाएँ दूसरे भाई-बहनों में फैलाते रहते हैं, ताकि वे भी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ पालने लग जाएँ। सबसे पहले तो ऐसा व्यक्ति सत्य प्रदान नहीं कर सकता; दूसरे, वे धारणाएँ फैलाते हैं; और तीसरे, वे दूसरों में भी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ पैदा होने का कारण बनते हैं, ताकि वे परमेश्वर के कार्य का विरोध कर सकें, और उससे कुछ अलग करवाने की कोशिश कर सकें, और अंत में परमेश्वर उनकी बात मान ले। ऐसे लोग भी हैं जो इस तरह की चीजें इस उम्मीद में करते हैं कि वे लोगों की धारणाएँ दूर कर सकें, और परमेश्वर को मनाकर उससे अलग तरह से कार्य करवा सकें, ताकि वह लोगों को संतुष्ट कर सके। अगर ऐसे लोग इस तरह के काम करने के बाद पश्चाताप करें और आँसू बहाएँ तो क्या उन्हें परमेश्वर के प्रति श्रद्धालु हृदय वाला व्यक्ति माना जा सकता है? कुछ लोग परमेश्वर की सेवा में थोड़ा अति उत्साह और अज्ञान दिखाते हैं—इसके लिए तुम्हें क्षमा किया जा सकता है। लेकिन अगर तुम आगे भी ऐसे काम करते रहते हो, तो तुम जानते-बूझते हुए गलत काम करोगे, जो एक ज्यादा गंभीर और बड़ा पाप है और एक भयानक चीज है। अगर इन मामलों में तुम लोगों के विचार सरलीकरण के शिकार हैं, और तुम्हें लगता है कि यह कोई बड़ी बात नहीं है, तो तुम एक न एक दिन परमेश्वर को नाराज कर बैठोगे। मैंने ऐसे कुछ लोग देखे हैं; भले ही उनका सफाया न किया गया हो, पर उनका परिणाम पहले ही तय हो चुका था।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर को नाराज़ करना क्‍या है?' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाएँ, उपदेश और संगतियाँ पवित्र आत्मा के कार्य के नए चरणों और दिशा का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए, सभी स्तर के अगुवाओं और कर्मियों को सत्य पर संगति करने और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों का ध्यानपूर्वक पालन करना चाहिए। यह परमेश्वर की सेवा करने का सिद्धांत है और सेवा करने का सही मार्ग भी। जो अपना कार्य करने के लिए ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों से भटक जाता है, वह परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ता और उसमें रुकावट डालता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का विरोध करता है। अगर कोई ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों के अनुसार अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकता, तो उसे पता नहीं चलेगा कि उसके कार्य अच्छे हैं या बुरे और वे परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं कि नहीं। इसलिए ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाएं, उपदेश और संगतियाँ एक दर्पण हैं जो दर्शाता है कि क्या अगुवा और कर्मी वास्तविकता में प्रवेश कर रहे हैं। जो हमेशा ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों को स्वीकार कर सकते हैं, वे सत्य को स्वीकार कर, वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। अगर कोई देखता है कि ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाएं, उपदेश और संगतियाँ उसकी स्वयं की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं या उसे लगता है कि ये चीज़ें उसके कार्यों और आचरण को उजागर करती हैं या गलत ठहराती हैं और इस प्रकार, शर्मिंदगी के कारण गुस्सा हो जाता है और ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं को आंकता और उन्हें झूठा बताकर उनकी निंदा करता है, तो यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि ऐसा व्यक्ति सत्य का विरोध और उससे घृणा करता है, वह अपने ओहदे को बचाने की कोशिश कर रहा है और गलत मार्ग पर जाने का हठ करता है। निश्चित रूप से, इस तरह का व्यक्ति एक झूठा अगुवा है या मसीह-विरोधी है। कुछ अगुवा और कर्मी खासतौर पर सत्य से घृणा करते हैं। यदि कार्य व्यवस्थाएं, उपदेश और संगतियाँ उनकी स्वयं की धारणाओं के अनुरूप हैं और उनके लिए फायदेमंद हैं, तो वे उन्हें वास्तविक मानेंगे और फिर उन्हें स्वीकार कर दूसरों को सौंप देंगे। लेकिन अगर ये चीज़ें उनकी अपनी अवधारणाओं के अनुरूप नहीं होंगी या उनके लिए फायदेमंद नहीं होंगी, तो वे उन्हें झूठा बताकर नकार देंगे और उन्हें रोक लेंगे। यह पूर्ण रूप से शैतान का कार्य है। चीज़ों के बारे में अपनी अवधारणाओं पर बिना सोचे-समझे भरोसा करना, कोई चीज़ सही है या गलत उसे अपनी प्रसिद्धि, लाभ और हैसियत के फायदे के तराज़ू में तौलना बहुत ही बेतुका है। ऐसा नज़रिया पूर्ण रूप से शैतान का है और उसके पास ज़रा भी सत्य-वास्तविकता नहीं है। निश्चित रूप से ऐसे लोग सत्य से प्यार नहीं करते, सत्य की खोज नहीं करते या परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं रखते। यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाएं, उपदेश और संगतियाँ पवित्र आत्मा के आज के कार्य हैं और पवित्र आत्मा के प्रबोधन और रोशनी से आते हैं। जो पवित्र आत्मा से आता है वह निस्संदेह उन सबकी अगुआई और मार्गदर्शन कर सकता है जो सत्य को समझने के लिए और सत्य में प्रवेश करने के लिए सत्य की तलाश करते हैं। यह तय करने के लिए कि कलीसिया के सभी स्तरों पर अगुवा और कर्मी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपना कार्य और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं या नहीं, हमें देखना चाहिए कि वे ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों को वास्तव में स्वीकार और उनका पालन करते हैं कि नहीं और वे उनके अनुसार अपने कार्य और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं या नहीं। अगर कोई अगुवा या कर्मी कभी भी ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों को स्वीकार और उनका पालन नहीं कर पाता, तो यह निश्चित है कि वह व्यक्ति एक झूठा अगुवा या कर्मी है और उसे हटा देना चाहिए। अगर कोई अगुवा या कर्मी ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों को स्वीकार कर सकता है, तभी वह कलीसिया में सत्य-वास्तविकता की संगति कर पाएगा, पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग कर पाएगा और सत्य-वास्तविकता में परमेश्वर के चुने हुए लोगों का मार्गदर्शन कर पाएगा।

अगर अगुवाओं या कर्मियों की संगति पूरी तरह से ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों के अनुरूप होती है, तो उनके कार्य परिणाम प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की स्वीकृति पा सकते हैं। अगर अगुवाओं और कर्मियों की सहभागिता ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों का ध्यानपूर्वक पालन नहीं कर सकती, तो उनके कार्य पवित्र आत्मा के कार्य के नए प्रकाश और नए चरणों के साथ आगे नहीं बढ़ पाएंगे। लोग जिन चीज़ों के बारे में बात करते हैं, अगर वे बहुत ज़्यादा अप्रचलित हैं और पवित्र आत्मा के आज के कार्य के साथ आगे नहीं बढ़ती हैं और अगर वे तब भी सत्य की खोज नहीं करते हैं, तो उनके लिए पवित्र आत्मा का कार्य पाना काफी असंभव है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को ऐसे लोगों के कार्य का निश्चित रूप से कोई फायदा नहीं होगा और तब कलीसिया का जीवन केवल ठहरे हुए पानी का तालाब ही होगा। जो लोग पवित्र आत्मा के आज के कार्य के साथ आगे नहीं बढ़ सकते और ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों को स्वीकार नहीं करते हैं, तो वे खतरे में हैं और आसानी से उन्हें हटाया जा सकता है। इसलिए ऊपरवाला सत्य पर संगति करने और असली कार्य करने के लिए, सारे स्तरों के अगुवाओं और कर्मियों को ध्यानपूर्वक ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों का पालन करने के लिए कहता है। यह उनके लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने और अपने कर्तव्य में वास्तविक परिणामों को हासिल करने का तरीका है। केवल यही सेवा परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। कोई ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों को स्वीकार और उनका पालन कर सकता है कि नहीं, एक संकेत है जो दिखाता है कि वे परमेश्वर के कार्य का पालन कर रहे हैं या मसीह-विरोध के मार्ग पर चल रहे हैं। कार्य करने और अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों का कठोरता से पालन करने वाला व्यक्ति ही वास्तव में परमेश्वर का अनुसरण करता है और परमेश्वर के कार्य का पालन करता है। ऐसे ही व्यक्ति को पवित्र आत्मा के कार्य की स्वीकृति मिलेगी और वह धीरे-धीरे पूर्ण होने और परमेश्वर के उपयोग के लायक बनने के लिए सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करेगा। यह कहा जा सकता है कि ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों का विरोध करने वाले लोग सत्य की खोज नहीं करते, वे सब झूठे अगुवा और मसीह-विरोधी हैं, इस बारे में कोई संशय नहीं है। कोई ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं, उपदेशों और संगतियों को स्वीकार करता है कि नहीं, यह इस बात को प्रत्यक्ष तौर पर दिखाता है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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